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लौटकर आना बसंत का!
वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग की यह कविता जीवन और समय के चक्र पर गहराई से प्रकाश डालती है, जहाँ हर दिन एक नई शुरुआत और हर साल एक नया अवसर लेकर आता है।
समाचार4मीडिया ब्यूरो ।। 1 month ago
श्रवण गर्ग, वरिष्ठ पत्रकार।।
पता ही नहीं चल पाता
कब हो जाता है क्षय
कमाये पुण्यों का !
रोज़ रात एक मृत्यु
सुबह पुनर्जन्म
जीने के लिए एक दिन नया
फिर एक नया साल, नया बसंत !
अच्छा लगने लगता है
देखना होते हुए सूना ख़ुद को
जाने लगते हैं छोड़कर जब
एक-एक करके सब लोग
हो जाते हैं अकेले, शून्य
पूरी तरह भारहीन
अपने होने के अहंकार और
गुरुत्वाकर्षण से परे
अच्छी लगने लगती है तब
हर अंतहीन प्रतीक्षा
चीजों के वापस लौटने की —
सूर्य की, बरसात और बसंत की
ढूँढ़ने की क्षणों को
गिर गए थे जो कभी जेब से
पत्तों की तरह पेड़ों से
बिना बताए ,किए कोई आवाज़ !
चले जाते हैं जैसे पिता
बंद करके दरवाज़ा चुपचाप—
गए हों जैसे बाज़ार
लेकर कोई रंगीन झोला
लाने के लिए खूबसूरत सा बसंत !
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