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नेता के निधन पर जनता का गहरे शोक में डूबना सिर्फ दक्षिण राज्यों में ही क्यों: डॉ. वैदिक

डॉ. वेद प्रताप वैदिक वरिष्ठ पत्रकार ।। नेताओं के लिए आत्महत्या क्यों? खबर है कि तमिलनाडु की पूर्व मुख्यमंत्री स्व. जयललिता के निधन से आहत 470 लोगों ने आत्महत्या कर ली। हो सकता है, अभी कुछ और लोग भी कर लें। इतनी आत्महत्याएं आज तक दुनिया के किसी भी नेता के निधन

समाचार4मीडिया ब्यूरो 9 years ago

डॉ. वेद प्रताप वैदिक वरिष्ठ पत्रकार ।। नेताओं के लिए आत्महत्या क्यों?

खबर है कि तमिलनाडु की पूर्व मुख्यमंत्री स्व. जयललिता के निधन से आहत 470 लोगों ने आत्महत्या कर ली। हो सकता है, अभी कुछ और लोग भी कर लें। इतनी आत्महत्याएं आज तक दुनिया के किसी भी नेता के निधन पर नहीं हुईं। महात्मा गांधी, सुभाष बोस, जवाहरलाल नेहरु, अब्राहम लिंकन, लेनिन, स्तालिन, माओ, हो ची मिन्ह, दिगाल, नेल्सन मंडेला, जिन्ना के अलावा हिटलर, मुसोलिनी और तोजो जैसे तानाशाहों के निधन या उनकी हत्या पर भी इतने लोग कभी नहीं मरे, जितने कि जयललिता के लिए मर गए। इससे हम क्या नतीजा निकालें? क्या यह कि जयललिता इन सब नेताओं से भी ज्यादा महान थीं? क्या उनमें कुछ अति मानवीय गुण थे? उनके पास क्या कोई दैवीय शक्ति थी?

इसमें शक नहीं कि जयललिता ऐसी एकमात्र महिला राजनेता थीं, जिन्होंने अपनी छवि का निर्माण अपनी योग्यता से किया। वे न तो बाप कमाई पर उछलती रहीं और न ही पति-कृपा पर। एम.जी. रामचंद्रन के बाद उन्हें काफी संघर्ष करना पड़ा और वे आपकमाई के दम पर ही आगे बढ़ीं। आयंगर ब्राह्मण होते हुए भी द्राविड़ लोगों का सफल नेतृत्व किया, यह अपने आप में असाधारण तथ्य है। जातिवाद से ग्रस्त दक्षिण की जनता में उन्होंने जाति को लांघकर सफल नेतृत्व किया। उन्होंने जनता को सीधे लाभ पहुंचाने की राजनीति की। उनकी सीधे लाभ की राजनीति की नकल देश के अन्य मुख्यमंत्री भी कर रहे हैं।

इस दृष्टि से देश के मुख्यमंत्रियों में उनका स्थान अनूठा है। उन्होंने भूखों को मुफ्त भोजन, गरीबों को वस्त्र और शिक्षा-चिकित्सा की ठोस सुविधाएं दे कर उनके दिलों में अपना घर बना लिया लेकिन क्या इस आधार पर उन्हें दुनिया के अन्य महापुरुषों से भी अधिक महान माना जा सकता है?

इतिहासकार और समाजशास्त्री तो यह बात बिल्कुल नहीं मानेंगे। लेकिन आम जनता को न तो इतिहास लिखना है और न ही समाजशास्त्र। वह तो बस, अपना हित और अहित ही समझती है। उसका स्वार्थ ही सर्वोपरि है। सत्य है। ब्रह्म है। उसके लिए बाकी सब गौण है, मिथ्या है। इस दृष्टि से वह यदि पेरियार, अन्नादुराई, जयललिता और रामाराव जैसे नेताओं के मरने पर गहरे शोक में डूब जाती है तो इसमें आश्चर्य क्या है लेकिन मुख्य प्रश्न यह है कि ऐसा दक्षिण के राज्यों में ही क्यों होता है? देश के अन्य राज्यों मे क्यों नहीं होता?

इसका एक कारण तो इन दक्षिणी नेताओं की फिल्मी पृष्ठभूमि भी है। नेता बनने के पहले वे अभिनेता के रुप में आम लोगों के दिल में समाए रहते हैं। यह प्रेम में पगा हुआ दिल ही सदमा बर्दाश्त नहीं कर पाता। वह फट पड़ता है। यदि किसी को और कोई कारण समझ पड़ता हो तो हमें बताए !

(साभार: नया इंडिया)

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