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वंदे मातरम् के खंडित स्वरूप पर सवाल : अनंत विजय

किसी कविता या गीत को खंडित करने का अधिकार रचनाकार के अलावा किसी अन्य को है? रचनात्मक संवेदना का सर्जनात्मक स्वतंत्रता की बात करनेवालों ने एक कृति को खंडित कर दिया।

समाचार4मीडिया ब्यूरो ।। 18 hours ago

अनंत विजय, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक।

बंकिमचंद चटर्जी लिखित गीत वंदे मातरम् को पूरा गाने का निर्णय भारत सरकार ने लागू कर दिया है। अब खंडित वंदे मातरम् की जगह पूरा गीत गाया जा सकेगा। कुछ समय पहले इस स्तंभ में भारतीय सभ्यतागत चेतना और मूल्यों के पुनर्स्थापना की बात की गई थी। वंदे मातरम् गीत को पूर्ण स्वरूप में गाया जाना भी उसी दिशा में बढ़ा एक कदम है। 150 वर्ष पहले रचित वंदे मातरम् एक ऐसा गीत है जो पुस्तकों और पत्रिकाओं से निकलकर लोक में व्याप्त हो गया।

जो रचनाएं लोक में व्याप्त हो जाती हैं वो अमर हो जाती हैं। कालखंड या समय की सीमाओं से परे जाकर कालजयी हो जाती हैं। वंदे मातरम् ऐसा ही गीत है। खंडित होने के बावजूद बंकिम का ये गीत आजतक जनमानस पर अंकित है। आज जब भारत अपनी सभ्यतागत चेतना को रिक्लेम कर रहा है तो इस गीत को उसके मूल स्वरूप में लाना बहुत आवश्यक था। इस गीत का कई भारतीय भाषाओं में न केवल अनुवाद हुआ है बल्कि असंख्य धुनों पर इसको गाया भी जा चुका है। हिंदी में महावीर प्रसाद द्विवेदी से लेकर सुमित्रानंदन पं तक ने इस गीत का भावानुवाद किया।

द्विवेदी जी का भावानुवाद सरस्वती पत्रिता में प्रकाशित हुआ था। इस बात के प्रमाण अनेक पुस्तकों में मिलते हैं कि वंदे मातरम की रचना 1875 में अक्षय नवमी के दिन हुई थी। अक्षय यानि जिसका क्षय न हो। बंगाल में अक्षय नवमी के दिन जगत जननी माता जगद्धात्री की पूजा की जाती है। कहा जाता है कि मुर्शिदाबाद के लालगोला,जहां बंकिम पदस्थापित थे, के एक मंदिर में मां काली के चित्र को बेड़ियों में जकड़ा हुआ देखकर बंकिम ने उस चित्र को एक रूपक के तौर पर उठाया और इस गीत की रचना की।

बंकिम रचित वंदे मातरम् को लेकर राजनीति 1920 से लेकर 1940 तक होती है। उसके पहले किसी को भी संपूर्ण वंदे मातरम् के पाठ से परेशानी नहीं थी। 1896 में कांग्रेस के कलकत्ता (अब कोलकाता) अधिवेशन में तो गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने पूरा वंदे मातरम् गाया था। 1905 में कांग्रेस के बनारस अधिवेशन में गोपाल कृष्ण गोखले के कहने पर सरला देवी चौधरानी ने इस गीत को गाया।

लेकिन उस वक्त की सांप्रदायिक राजनीति ने एक साहित्यिक रचना को अपना औजार बनाया । जिस साहित्यिक रचना ने पूरे देश को एक राष्ट्रीय पहचान दी उसको राजनीति ने सांप्रदायिक रंग दे दिया। 17 मार्च 1938 को जिन्ना ने नेहरू को वंदे मातरम के विरोध में एक पत्र लिखा। इसके पहले सिंध के नेता अहमद यार दौलताना ने इसका विरोध किया था। मुस्लिम लीग की तरफ से वंदे मातरम का विरोध बढ़ने लगा था। 16 अक्तूबर 1937 को विश्व भारती न्यूज में कृष्ण कृपलानी ने वंदे मातरम् के विभाजनकारी स्वरूप पर एक विध्वसंक लेख लिखा था।

नेताजी सुभाष चंद्र बोस उस लेख को पढ़कर बेहद आहत हुए थे। उन्होंने गुरूदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर को एक पत्र लिखकर जानना चाहा था कि पत्रिका में प्रकाशित लेख में विचार लेखक के हैं या पत्रिका भी उन विचारों से सहमत है। नेताजी ने तब जवाहरलाल नेहरू से लेकर गांधी जी और माडर्न रिव्यू के संपादक रामानंद चट्टोपाध्याय को भी अपनी भावनाओं से अवगत करवाया था। वंदे मातरम् के अविभाजित स्वरूप पर विवाद इतना बढ़ा कि कांग्रेस के नेता दबाव में आ गए। तय किया गा कि गुरूदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर से इसपर राय ली जाए।

रवीन्द्रनाथ ठाकुर को वंदे मातरम् के पहले दो पैराग्राफ पर कोई आपत्ति नहीं थी। उन्होंने तब कहा था कि कविता के बाकी हिस्से के बगैर भी उसकी आत्मा कायम रह सकती है। उन्होंने इस कविता को आनंदमठ से जोड़कर देखा और कहा कि गीत को उपन्यास के साथ मिलाकर इसको देखने से इसपर मुसलमानों को आपत्ति हो सकती है। गुरुदेव ने इस कविता के खंडित स्वरूप की विवेचना करते हुए कहा था कि इसके पहले दो पैरा की स्वतंत्र पहचान हो सकती है और उन दो को पढ़कर भी इसकी भावना बची रहती है।

कांग्रेस कार्यसमिति ने रवीन्द्रनाथ ठाकुर के मत को आधार बनाकर वंदे मातरम् के खंडित स्वरूप को मान्यता दे दी। मजेदार बात ये 1937 में कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक के कुछ ही दिन पहले नेहरू ने पहली बार आनंदमठ पढ़ा था। पढ़ने के बाद 20 अक्तूबर 1937 को लिखा कि मैंने आनंदमठ का अंग्रेजी अनुवाद पढ़ा ताकि वंदे मातरम् की पृष्ठभूमि जान सकूं। नेहरू ने ये भी स्वीकार किया था कि आनंदमठ की भाषा बहुत कठिन है। बहुत स्थान पर उल्लिखित शब्द उनको समझ में नहीं आए। जब उपन्यास ही समझ नहीं आया तो उसमे वर्णित वंदे मातरम् को खंडित करने का समर्थन क्यों किया गया ये समझ से परे था।

गुरुदेव के पत्र को ही कांग्रेस ने वंदे मातरम् को खंडित करने का आधार बनाया था। इस कारण गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर के मत की बंगाल के बौद्धिक जगत में तीखी प्रतिक्रिया हुई थी। उनके मित्र रामानंद चटर्जी ने भी ठाकुर की आलोचना की। उन्होंने माडर्न रिव्यू में गुरुदेव के मत के विरुद्ध संपादकीय लिखा। उन्होंने स्पष्ट किया कि ना तो वंदे मातरम् सांप्रदायिक है और ना ही मुसलमानों के खिलाफ।

अन्यय समाचारपत्रों पत्रिकाओं में भी गुरुदेव के मत के विरुद्ध लेख आदि छपे। तब नेहरू ने ठाकुर के मत के समर्थन में लेख लिखा। बावजूद इसके इन सारी बातों का जिन्ना पर कोई असर नहीं हुआ। वो इस बात पर अड़ा रहा कि वंदे मातरम को नहीं गाया जा सकता है। गांधी भी वंदे मातरम् को लेकर हो रहे विवाद पर क्षुब्ध थे। जुलाई 1939 के हरिजन में लिखे एक लेख में उन्होंने माना कि उनको ये कभी नहीं लगा कि ये (वंद मातरम्) हिंदू टेक्सट है। हम ऐसे समय में हैं जहां सोना भी लोहा लगने लगा है। राजा जी ने भी कहा था कि इससे (गीत को खंडित करने से) कोई लाभ नहीं होगा बल्कि ये भविष्य के विभाजन की नींव बनेगा। राजा जी की आशंका सच साबित हुई। वंदे मातरम् को खंडित करने के करीब 10 वर्षों के अंदर भारत का विभाजन हो गया।

कुछ दिनों पूर्व महात्मा गांधी अंतराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा और भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, शिमला की वंदे मातरम् पर आयोजित दो दिन की राष्ट्रीय संगोष्ठी में भाग लेने का अवसर मिला। वहां भी इस गीत को खंडित करने पर चर्चा हुई। मेरे मन में भी कई प्रश्न उठे। क्या किसी कवि को दूसरे लेखक की रचना को विभाजित करने या विभाजित करने के पक्ष में अपना मत देने का अधिकार है। जब हम साहित्यिक रचनात्मकता को परखते हैं तो रचनात्मक या लेखकीय संवेदना की बात भी आती है। क्या बौद्धिक स्वतंत्रता हमें इस बात की अनुमति देता है कि किसी लेखक की मृत्यु के बाद कोई दूसरा लेखक उसकी कृति में काट-छांट के पक्ष में अपना मत दे सकता है।

क्या इसपर राष्ट्रव्यापी बहस नहीं होनी चाहिए थी। क्या अकादमिक जगत को वंदे मातरम् के खंडित किए जाने पर नए सिरे से विचार नहीं करना चाहिए। जो कृति स्वाधीनता का मंत्र था उसको खंडित करने का अधिकार राजनीतिक दल को था क्या। क्या मुसलमानों को या मुस्लिम नेताओं को खुश करने के लिए वंदे मातरम् का विभाजन किया गया था। क्या इसको तुष्टीकरण न माना जाए। क्या स्वाधीन भारत में राजनीतिशास्त्र के दिग्गजों ने वंदे मातरम् के विभाजन को तुष्टीकरण के तौर पर देखा।

आज जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भारत की सभ्यतागत मूल्यों की पुनर्स्थापना में लगे हैं तब ये प्रश्न अकादमिक और बौद्धिक जगत के सामने चुनौती बनकर खड़े हैं। इस चुनौती से मुठभेड़ करना ही होगा ताकि इतिहास की गलतियों पर चर्चा करके देश की नई पीढ़ी को ये बताया जाए कि किस तरह से राजनीतिक लाभ-लोभ के लिए रचनात्मकता और सृजनात्मकता से खिलवाड़ किया गया।

( यह लेखक के निजी विचार हैं ) साभार - दैनिक जागरण।


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