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शिक्षा के क्षेत्र में अराजकता की जिम्मेदारी किसकी: आलोक मेहता

मुख्य प्रश्न यही है, क्या इन गड़बड़ियों के लिए सीधे प्रधानमंत्री कार्यालय को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है, या फिर मंत्रालय और उसके नेतृत्व को अपनी जवाबदेही स्वीकार करनी चाहिए?

समाचार4मीडिया ब्यूरो ।। 5 hours ago

आलोक मेहता, पद्मश्री, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक।

शिक्षा मंत्रालय से जुड़े अनेक मुद्दों पर सुप्रीम कोर्ट की सख्ती, विश्वविद्यालयों में बढ़ती रिक्तियां और एनसीईआरटी की पाठ्यपुस्तकों को लेकर उठे विवादों ने शिक्षा व्यवस्था को कठघरे में खड़ा कर दिया है। हाल ही में प्रधानमंत्री मोदी ने जिम्मेदारियों को स्पष्ट करने और प्रतिबद्धता सुनिश्चित करने के निर्देश दिए। यह संकेत है कि सरकार भी मानती है कि कहीं न कहीं प्रशासनिक ढीलापन या समन्वय की कमी रही है।

मुख्य प्रश्न यही है, क्या इन गड़बड़ियों के लिए सीधे प्रधानमंत्री कार्यालय को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है, या फिर मंत्रालय और उसके नेतृत्व को अपनी जवाबदेही स्वीकार करनी चाहिए? नीति-निर्धारण और नई शिक्षा नीति जैसे बड़े निर्णयों में प्रधानमंत्री की सक्रिय भूमिका रही है। परंतु दैनिक प्रशासन, नियुक्तियां, पाठ्यक्रम, पुस्तकें और संस्थागत संचालन की प्रत्यक्ष जिम्मेदारी शिक्षा मंत्री और मंत्रालय की ही होती है। ऐसे में यदि व्यवस्थागत त्रुटियां सामने आती हैं, तो उत्तरदायित्व तय करना आवश्यक है।

1- केंद्रीय विश्वविद्यालयों में नेतृत्व और फैकल्टी संकट :

देश में लगभग 54 केंद्रीय विश्वविद्यालय हैं, जिनके कुलपतियों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है। 2024-25 की रिपोर्टों के अनुसार 56 में से लगभग 14 विश्वविद्यालय स्थायी कुलपति के बिना चल रहे थे। फरवरी 2026 तक भी बड़ी संख्या में पद रिक्त हैं। अनुमान है कि 45-46 केंद्रीय विश्वविद्यालयों में 5,000 से 6,000 से अधिक फैकल्टी पद खाली हैं। स्वीकृत लगभग 18,951 शिक्षण पदों में से करीब 5,000 पद रिक्त चल रहे हैं।

जनवरी 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि सभी कुलपतियों और कुलसचिवों की रिक्तियां चार माह के भीतर भरी जाएं। सरकार ने आईआईटी और आईआईएम जैसे संस्थानों में “मिशन मोड” में 17,000 से अधिक पद भरने का दावा किया है, किंतु सेवानिवृत्ति और बढ़ती छात्र संख्या के कारण रिक्तियां बनी हुई हैं। उच्च शिक्षा तंत्र सामाजिक-आर्थिक प्रगति की रीढ़ है; यदि नेतृत्व और शिक्षकों की कमी बनी रहती है, तो शोध, नवाचार और गुणवत्ता पर सीधा असर पड़ता है।

यह स्थिति बताती है कि प्रशासनिक सक्रियता और निगरानी की कमी रही है। नियुक्ति प्रक्रियाएं समय पर पूरी हों, इसके लिए मंत्रालय स्तर पर ठोस और निरंतर प्रयास अपेक्षित हैं। केवल घोषणाएं पर्याप्त नहीं, बल्कि परिणाम भी दिखने चाहिए।

2 -एनसीईआरटी पाठ्यपुस्तक विवाद और न्यायपालिका की सख्ती :

दूसरा बड़ा मुद्दा एनसीईआरटी की कक्षा 8 की सामाजिक विज्ञान पुस्तक *“Exploring Society: India and Beyond”* को लेकर उठा विवाद है। सुप्रीम कोर्ट ने पुस्तक के उस हिस्से पर रोक लगा दी, जिसमें “न्यायपालिका में भ्रष्टाचार” से संबंधित सामग्री थी। कोर्ट ने माफी स्वीकार करने से इनकार करते हुए एनसीईआरटी निदेशक और शिक्षा सचिव को अवमानना नोटिस जारी किया। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट कहा कि बिना शर्त माफी पर्याप्त नहीं होगी; यह जानना आवश्यक है कि ऐसी सामग्री प्रकाशित कैसे हुई। पुस्तक की डिजिटल और भौतिक प्रतियों के वितरण पर भी रोक लगाई गई।

इसी के समानांतर 13 जनवरी 2026 को राजपत्रित “यूजीसी (उच्च शिक्षण संस्थानों में इक्विटी का प्रचार) विनियम, 2026” को लेकर भी विवाद खड़ा हुआ। एससी/एसटी/ओबीसी छात्रों के खिलाफ भेदभाव रोकने के उद्देश्य से “इक्विटी समितियों” और “इक्विटी स्क्वॉड” के गठन का प्रावधान किया गया, किंतु कुछ छात्र संगठनों ने इसे भेदभावपूर्ण और कठोर बताया। इससे शिक्षा नीति पर वैचारिक टकराव और बढ़ गया।

पाठ्यपुस्तक निर्माण की प्रक्रिया बहुस्तरीय होती है। निदेशक, सलाहकार समिति, विषय विशेषज्ञ, संपादक और अकादमिक परिषद की संयुक्त भागीदारी से पुस्तक तैयार होती है। पूर्व संस्करणों में प्रो. हरी वासुदेवन, प्रो. नीलाद्रि भट्टाचार्य, प्रो. एम.एच. कुरैशी, प्रो. सरदा बालगोपालन सहित कई शिक्षाविदों के नाम जुड़े रहे हैं। प्रश्न यह है कि वर्तमान संस्करण में किन स्तरों पर चूक हुई? क्या समीक्षा तंत्र कमजोर पड़ा? या किसी स्तर पर सामग्री की पर्याप्त जांच नहीं हुई?

दिलचस्प यह भी है कि एक ओर सरकार पर “भगवाकरण” के आरोप लगाए जाते रहे हैं, वहीं दूसरी ओर पाठ्यक्रमों में विविध वैचारिक पृष्ठभूमि के विद्वानों की भागीदारी रही है। ऐसे में यह विवाद केवल वैचारिक नहीं, बल्कि प्रक्रियागत जिम्मेदारी का भी है।

3 - जवाबदेही और संतुलन की आवश्यकता :

शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने न्यायपालिका के प्रति सम्मान व्यक्त किया है, परंतु केवल औपचारिक बयान पर्याप्त नहीं होते। यदि मंत्रालय के भीतर समीक्षा और उत्तरदायित्व की स्पष्ट व्यवस्था होती, तो स्थिति यहां तक न पहुंचती। संवेदनशील विषयों पर अतिरिक्त सतर्कता आवश्यक है, विशेषकर जब मामला न्यायपालिका जैसी संवैधानिक संस्था से जुड़ा हो।

समस्या का मूल यह प्रतीत होता है कि मंत्रालय का ध्यान प्रशासनिक मजबूती के बजाय औपचारिक कार्यक्रमों और प्रचार पर अधिक केंद्रित रहा। यदि संस्थानों में नेतृत्व रिक्त है, शिक्षकों के पद खाली हैं और पाठ्यपुस्तकों में विवादास्पद सामग्री छप रही है, तो यह संकेत है कि निगरानी और जवाबदेही की श्रृंखला कहीं कमजोर हुई है।

शिक्षा और लोकतंत्र के बीच संतुलन बनाए रखना संस्थागत जिम्मेदारी है। यह विवाद एक चेतावनी है कि यदि प्रशासनिक सतर्कता कमजोर पड़ी, तो शिक्षा तंत्र में अराजकता बढ़ेगी। उम्मीद की जानी चाहिए कि सुप्रीम कोर्ट की सख्ती और प्रधानमंत्री की चिंता के बाद न केवल शिक्षा मंत्रालय, बल्कि अन्य मंत्रालय भी अपनी कार्यप्रणाली की समीक्षा करेंगे। अंततः शिक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता ही राष्ट्र की बौद्धिक शक्ति का आधार है।

( यह लेखक के निजी विचार हैं )


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