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युवराज की मौत और सिस्टम की नाकामी: नीरज बधवार

मतलब 27 साल का लड़का अपने पिता की आँखों के सामने ज़िंदा पानी में दफ़न हो गया, ये उनके लिए दुख का विषय नहीं है। तीन घंटे का वक़्त मिलने के बाद भी निकम्मा प्रशासन उसे बचा नहीं पाया।

समाचार4मीडिया ब्यूरो ।। 1 month ago

नीरज बधवार, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक।

नोएडा इंजीनियर की मौत के मामले में अब ये कहकर प्रशासन के पाप कम करने की कोशिश की जा रही है कि मृतक युवराज ने तो शराब पी रखी थी। मैं कह रहा हूँ कि अगर शराब पी भी रखी थी, तब भी पुलिस-प्रशासन के इस निकम्मेपन पर पर्दा कैसे पड़ सकता है कि वो ढाई-तीन घंटे के अंदर भी उस लड़के की जान नहीं बचा पाए। मसला गिरने वाले के शराब पीने का नहीं है, मसला बचाने वालों की योग्यता और नीयत का है।

अगर उसकी जगह किसी की गाड़ी के ब्रेक फेल हो जाते और तब वो गड्ढे में गिर जाती, तो क्या अचानक पुलिस, डिज़ास्टर मैनेजमेंट और फायर ब्रिगेड की टीम में काबिलियत आ जाती? ये देखकर वाकई शर्म आती है कि इतनी बड़े हादसे में प्रशासन के हर तरह से नकारा साबित होने पर आत्मचिंतन करने के बजाय ऐसी बातें करके मामले को हल्का करने की कोशिश की जा रही है।

एक बीजेपी नेता ने तो यहाँ तक कह दिया कि तो क्या हो गया, गाँव-देहात में तो ट्रैक्टर-ट्रॉली पलटने से हर दिन ऐसे हादसे होते रहते हैं। ये मामला नोएडा में हो गया, तो आप लोग इतना तूल दे रहे हैं। मतलब गाँव-देहात में अगर हादसों में लोग मरते हैं, तो नोएडा में किसी का वैसे ही मर जाना सामान्य कैसे हो गया?

सच तो ये है कि कहीं भी कोई ऐसे हादसों में मारा जा रहा है, तो वो सामान्य नहीं है। आज ही कि टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट कहती है कि अकेले दिल्ली में पिछले साल ऐसे हादसों में 250 लोगों की जान गई है जिन्हें टाला जा सकता था। लेकिन ये सब हमारे सोचने का विषय ही नहीं है।

इसके उलट कुछ लोगों को अलग ही चिंता सता रही है। उन्हें इस बात का बुरा लग रहा है कि इस घटना से कुछ लोग योगी सरकार को बदनाम कर रहे हैं। मतलब 27 साल का लड़का अपने पिता की आँखों के सामने ज़िंदा पानी में दफ़न हो गया ये उनके लिए दुख का विषय नहीं है। तीन घंटे का वक़्त मिलने के बाद भी निकम्मा प्रशासन उसे बचा नहीं पाया ये उनके लिए पीड़ा का सबब नहीं है। इस हादसे के बाद उनकी सबसे बड़ी तकलीफ़ ये है कि इससे कहीं योगी सरकार बदनाम न हो जाए।

हर हादसा प्रशासन के लिए एक मौका भी होता है कि वो आत्मचिंतन करे, मगर चिंतन की आड़ में अगर राजनीतिक नफ़े-नुकसान आ जाएँ, तो व्यवस्था ज़िम्मेदारी लेने के बजाय पीड़ित को ही बदनाम करने लग जाती है। हैरानी नहीं होगी अगर नशे में गाड़ी चलाकर गड्ढे में गिरकर प्रशासन को बदनाम करने के लिए पुलिस कहीं युवराज पर ही मरणोपरांत केस न कर दे।

( यह लेखक के निजी विचार हैं )


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