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क्या दुनिया वैसी नहीं रहेगी जैसी हम जानते हैं?

मैं जब विज्ञापन इंडस्ट्री में चल रहे बड़े बदलावों की खबरें देख रहा था, तो मेरे मन में एक सवाल आया कि इन बदलावों से क्लाइंट्स को आखिर क्या फायदा होगा।

समाचार4मीडिया ब्यूरो ।। 12 hours ago

चिंतामणि राय, स्ट्रैटजिक मार्केटिंग और मीडिया एडवाइजर ।।

मैं जब विज्ञापन इंडस्ट्री में चल रहे बड़े बदलावों की खबरें देख रहा था, तो मेरे मन में एक सवाल आया कि इन बदलावों से क्लाइंट्स को आखिर क्या फायदा होगा। मैंने मान लिया था कि किसी न किसी तरह फायदा जरूर होगा, बस मुझे समझ नहीं आ रहा था। फिर मैंने मार्टिन सोरेल का डॉ. अनुराग बत्रा के साथ इंटरव्यू देखा और थोड़ी मिली-जुली भावनाओं के साथ यह महसूस किया कि उन्हें भी इसका साफ जवाब नहीं दिख रहा।

अब सवाल उठता है कि मिली-जुली भावनाएं क्यों? एक तरफ तो राहत थी कि यदि सर मार्टिन भी यही सवाल पूछ रहे हैं, तो मैं अकेला नहीं हूं। लेकिन दूसरी तरफ निराशा भी थी कि इंडस्ट्री को अब ब्रैंड को संभालने वाले लोगों से ज्यादा बैलेंस शीट संभालने वाले लोग चला रहे हैं।

पिछले 50 से ज्यादा सालों से मैं इस इंडस्ट्री से जुड़ा हूं। इस दौरान मैंने विज्ञापन इंडस्ट्री में मार्केटिंग की तुलना में कहीं ज्यादा बदलाव देखे हैं। जैसे होल्डिंग कंपनियों का आना (जो आज के बड़े बदलावों के केंद्र में हैं), कम्युनिकेशन सर्विसेज का विस्तार, जिसमें पीआर, डायरेक्ट मार्केटिंग और डिजाइन जैसे नए विशेषज्ञ क्षेत्र जुड़े। साथ ही मीडिया के काम को अलग करके स्पेशलिस्ट मीडिया एजेंसियों को दे दिया गया।

इसके साथ-साथ इंडस्ट्री में बहुत कुछ नया सीखा भी गया। टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल पहले मीडिया प्लानिंग में हुआ, फिर प्रोडक्शन में और बाद में क्रिएटिव काम में भी आने लगा। नए मीडिया प्लेटफॉर्म के लिए काम करना सीखा गया और ऐसे दर्शकों से जुड़ना सीखा गया जो एक साथ कई काम करते हैं। इन सभी बदलावों से क्लाइंट्स को सीधे या अप्रत्यक्ष रूप से फायदा हुआ।

लेकिन मार्केटिंग के क्षेत्र में इस दौरान एक अलग तरह का बदलाव आया है। मार्केटिंग अब अपनी दिशा खोती हुई नजर आती है। डिजिटल मीडिया और टेक्नोलॉजी को लेकर इतनी ज्यादा चिंता और उत्साह है कि “परफॉर्मेंस मार्केटिंग” को “ब्रैंड मार्केटिंग” से अलग मानने जैसी अजीब सोच पैदा हो गई है। और अब CMO यानी चीफ मार्केटिंग ऑफिसर की भूमिका भी कमजोर होती दिख रही है।

विज्ञापन इंडस्ट्री में पहले भी कंपनियों के स्तर पर मर्जर, अधिग्रहण और री-स्ट्रक्चरिंग होती रही है, लेकिन वह बदलाव पूरे इंडस्ट्री स्तर पर नहीं होते थे।

अब ऐसा लग रहा है कि क्लाइंट्स की जरूरतें प्राथमिकता में नहीं हैं। WPP की तीन साल की रणनीति पेश करते हुए उसकी सीईओ Cindy Rose ने कहा, “आज हम एक सरल और ज्यादा इंटीग्रेटेड WPP बनाने की योजना पेश कर रहे हैं। हमारा उद्देश्य बिजनेस को स्थिर करना, ऑर्गेनिक ग्रोथ लाना, भविष्य में निवेश की क्षमता बनाना और शेयरहोल्डर्स को बेहतर रिटर्न देना है।” लेकिन इसमें क्लाइंट्स का कोई जिक्र नहीं था।

इस बदलाव का केंद्र है AI आधारित पूरी तरह इंटीग्रेटेड समाधान देना, जो WPP Open नाम के मार्केटिंग प्लेटफॉर्म पर आधारित होगा।

अब कंपनी चार मुख्य ऑपरेटिंग यूनिट्स के जरिए काम करेगी- WPP Media, WPP Creative, WPP Production और WPP Enterprise Solutions।

लेकिन सवाल यह है कि WPP Media की जरूरत क्यों पड़ी? यह GroupM से अलग कैसे है? WPP की वेबसाइट कहती है कि “नए दौर में नई सोच की जरूरत है। ब्रैंड्स को एक ऐसे रणनीतिक पार्टनर की जरूरत है जो उन्हें बदलाव के दौर में आगे बढ़ने में मदद करे। इसलिए GroupM अब WPP Media बन गया है।” लेकिन क्या GroupM यह काम पहले नहीं कर सकता था?

इसी तरह WPP Creative को उन मशहूर एजेंसी ब्रैंड्स का घर बताया जा रहा है जो मानव कल्पना को आगे बढ़ाते हैं और अपनी अलग पहचान भी बनाए रखते हैं। लेकिन सच तो यह है कि ये एजेंसियां पहले भी यही काम कर रही थीं। फर्क सिर्फ इतना है कि अब इसमें WPP Open जुड़ गया है।

इस पर मार्टिन सोरेल ने कहा, “लोग इंटीग्रेशन की बात करते हैं, लेकिन यदि आप प्लानिंग और बजट अलग-अलग विभागों के हिसाब से करेंगे, तो उनके बीच प्रतिस्पर्धा होगी। यदि आप किसी देश के प्रमुख से कहें कि सभी विभागों को साथ लाओ, तो कम से कम उस स्तर पर इंटीग्रेशन हो सकता है।”

पूरी तरह इंटीग्रेटेड कम्युनिकेशन प्रोग्राम का विचार नया नहीं है। मैंने खुद करीब 40 साल पहले Ogilvy में ऐसा काम किया था। लगभग 20 साल पहले तो “इंटीग्रेटेड कम्युनिकेशन” मेरे पदनाम का हिस्सा भी था। फर्क सिर्फ इतना है कि अब इसमें AI जुड़ गया है और लोग इस बात को लेकर अनिश्चित हैं कि इससे कितना बड़ा बदलाव आएगा।

असल में हुआ यह कि जब विज्ञापन एजेंसियों ने अलग-अलग कम्युनिकेशन सेवाएं जोड़नी शुरू कीं, तो धीरे-धीरे वे अलग-अलग स्पेशलिस्ट विभाग बन गईं। हर विभाग की अपनी कमाई, अपना मुनाफा और अपने क्लाइंट्स थे। उन्हें अपना अलग बिजनेस लाने के लिए भी प्रोत्साहित किया गया। ऐसे में विभागों के बीच प्रतिस्पर्धा होना स्वाभाविक था।

2018 में Ogilvy ने एक बड़ा कदम उठाया। उसने अपने सभी सब-ब्रैंड्स जैसे Ogilvy & Mather, Ogilvy One और Ogilvy Public Relations को खत्म कर दिया और फिर से एक ही एजेंसी और एक ही ब्रैंड के रूप में काम शुरू किया। यह उसी पुराने मॉडल की तरह था जिसे फुल-सर्विस एजेंसी कहा जाता है।

अब विडंबना यह है कि इसकी होल्डिंग कंपनी फिर से अलग-अलग विभागों के आधार पर ढांचा बना रही है ताकि “पूरी तरह इंटीग्रेटेड” समाधान दे सके।

इसी दौरान Omnicom ने Interpublic Group (IPG) का अधिग्रहण भी कर लिया और नई कंपनी की संरचना सामने आई।

जैसे-जैसे WPP और Omnicom आगे बढ़ रहे हैं, उनका मुख्य एजेंडा साफ दिखता है- खर्च कम करना। दोनों कंपनियों ने लागत घटाने के लक्ष्य तय किए हैं, हजारों कर्मचारियों की छंटनी की है (Omnicom में करीब 4000) और कई एजेंसियों का विलय किया है।

अब WPP के पास Ogilvy, VML और AKQA हैं। वहीं Omnicom के पास BBDO, McCann और TBWA हैं।

पिछले दो सालों में इन कंपनियों ने दुनिया के कई मशहूर एजेंसी ब्रैंड्स को खत्म कर दिया, जैसे- JWT, Y&R, Grey, FCB, Lintas और DDB।

इन नामों की अपनी पहचान थी और वे ब्रैंड्स की देखभाल करने के लिए जाने जाते थे।

मैं खुद Lintas में था जब इसे Interpublic Group ने खरीदा और Ogilvy में था जब इसे WPP ने अधिग्रहित किया। दोनों ही कंपनियों ने वित्तीय अनुशासन पर जोर दिया, लेकिन उन्होंने हमारे पेशेवर काम में हस्तक्षेप नहीं किया।

आज स्थिति बदल गई है। इंडस्ट्री का केंद्र अब क्लाइंट से हटकर कॉर्पोरेशन की तरफ चला गया है। पहले इंडस्ट्री की भाषा ब्रैंड, उपभोक्ता, क्रिएटिविटी और आइडियाज के बारे में होती थी। अब यह प्लेटफॉर्म, ऑपरेटिंग यूनिट, इंटीग्रेशन फ्रेमवर्क और शेयरहोल्डर रिटर्न जैसी बातों के इर्द-गिर्द घूमती है।

टेक्नोलॉजी, खासकर AI, को भविष्य का आधार बताया जा रहा है। लेकिन टेक्नोलॉजी सिर्फ एक टूल है, यह किसी कंपनी का उद्देश्य तय नहीं कर सकती।

क्लाइंट्स की जरूरत आज भी वही है- मजबूत और लंबे समय तक चलने वाले ब्रैंड बनाना। इसके लिए कल्पना, समझदारी और लोगों व संस्कृति की गहरी समझ जरूरी है। AI काम को तेज कर सकता है, टार्गेटिंग को बेहतर बना सकता है और प्रोडक्शन सस्ता कर सकता है, लेकिन यह रणनीतिक और क्रिएटिव सोच की जगह नहीं ले सकता।

यदि मौजूदा बदलावों से एजेंसियां टेक्नोलॉजी का बेहतर इस्तेमाल करें, फालतू खर्च कम करें और बेहतर सहयोग करें, तो क्लाइंट्स को फायदा होगा। लेकिन यदि इसका नतीजा सिर्फ लागत घटाना, एजेंसियों का विलय और उनकी अलग पहचान खत्म होना है, तो इंडस्ट्री कुछ बहुत कीमती खो देगी।

जो एजेंसी ब्रैंड्स आज खत्म हो रहे हैं, वे सिर्फ नाम नहीं थे। वे ब्रैंड, क्रिएटिविटी और क्लाइंट सर्विस के बारे में सोचने के अलग-अलग तरीकों का प्रतिनिधित्व करते थे।

हो सकता है यह इंडस्ट्री के लंबे चक्र का एक और दौर हो। पिछले 50 सालों में विज्ञापन इंडस्ट्री कई बार खुद को बदल चुकी है- कभी नए मीडिया के कारण, कभी नई टेक्नोलॉजी के कारण और कभी आर्थिक परिस्थितियों के कारण। हर बार अंत में वही सच्चाई सामने आई है कि यह बिजनेस संरचना या प्लेटफॉर्म को बेहतर बनाने के लिए नहीं, बल्कि क्लाइंट्स को आगे बढ़ाने के लिए मौजूद है।

(यहां व्यक्त किए गए विचार पूरी तरह लेखक के अपने निजी विचार हैं)


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