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'जब स्कोरबोर्ड से आगे निकलकर खेल सिखाता है जिंदगी की बड़ी सीख'

जब भारत एक और शानदार टी20 वर्ल्ड कप जीत का जश्न मना रहा है, तो स्वाभाविक है कि सबसे ज्यादा चर्चा मैच, ट्रॉफी और खिलाड़ियों की हो रही है।

समाचार4मीडिया ब्यूरो ।। 1 hour ago

येसुदास एस. पिल्लई ।।

जब भारत एक और शानदार टी20 वर्ल्ड कप जीत का जश्न मना रहा है, तो स्वाभाविक है कि सबसे ज्यादा चर्चा मैच, ट्रॉफी और खिलाड़ियों की हो रही है। लेकिन इतने बड़े खेल आयोजन हमें कई दूसरी चीजों को समझने का मौका भी देते हैं- जैसे विज्ञापन, ब्रैंडिंग, लीडरशिप, सहानुभूति और नैतिकता।

फाइनल मैच को ध्यान से देखते हुए मेरे मन में कई ऐसे विचार आए, जो सिर्फ मैदान की बाउंड्री तक सीमित नहीं हैं, बल्कि उससे कहीं आगे जाते हैं।

ध्यान खींचने का कारोबार

आज बड़े खेल आयोजन सिर्फ खेल नहीं रह गए हैं, वे ध्यान (Attention) की अर्थव्यवस्था का भी हिस्सा बन चुके हैं। पूरे टूर्नामेंट के दौरान हर तरह के ब्रैंड दर्शकों का ध्यान खींचने की कोशिश करते नजर आए। इसमें कार, मोबाइल फोन, इंश्योरेंस, एयरलाइंस, हीरे, बाथरूम फिटिंग्स, क्विक कॉमर्स प्लेटफॉर्म, मिठाइयां, पेय पदार्थ और कई दूसरी कैटेगरी के ब्रैंड शामिल थे।

लेकिन सबसे ज्यादा जो चीज नजर आई, वह थी विज्ञापनों की बहुत ज्यादा भीड़। आज की आधुनिक ब्रॉडकास्ट तकनीक और ओवर के बीच तय समय होने के बावजूद यह निराशाजनक है कि ब्रॉडकास्टर्स अब भी दर्शकों को जरूरत से ज्यादा विज्ञापन दिखाते हैं। “थोड़ी और कमाई” की इस कोशिश में अक्सर विज्ञापन बीच में ही कट जाते हैं, दर्शक खेल के कुछ पल मिस कर देते हैं और कई बार विज्ञापनदाताओं के साथ विवाद भी हो जाता है कि उनका विज्ञापन सही तरह से चला या नहीं।

विडंबना यह है कि इससे दर्शकों का अनुभव भी खराब होता है और ब्रैंड्स की छवि भी प्रभावित होती है। जब खेल का कोई अहम पल कट जाता है, तो दर्शकों की नाराजगी अक्सर ब्रॉडकास्टर पर नहीं बल्कि उस ब्रैंड पर निकलती है जिसका विज्ञापन उस समय स्क्रीन पर होता है।

यह तब और अजीब लगता है जब मैच आगे बढ़ने के साथ दर्शकों की संख्या लगातार बढ़ रही होती है। ऐसे में ब्रॉडकास्टर्स विज्ञापन की भीड़ बढ़ाने के बजाय मैच के अलग-अलग चरणों के हिसाब से अलग कीमतें तय कर सकते हैं। जहां दर्शकों की भागीदारी ज्यादा हो, वहां प्रीमियम रेट रखे जा सकते हैं और विज्ञापन कम लेकिन ज्यादा असरदार हो सकते हैं। इससे दर्शकों का अनुभव भी बेहतर होगा और विज्ञापन की वैल्यू भी बढ़ेगी।

बिना संदर्भ के विज्ञापन

विज्ञापनों के कंटेंट में भी एक दिलचस्प विरोधाभास देखने को मिला। कुछ ब्रैंड्स ने सीधा-सा संदेश दिया- “आओ और हमारा प्रोडक्ट खरीदो।” शायद वे सोच रहे थे कि मैच के दौरान लोगों का ध्यान ज्यादा होता है और इससे तुरंत खरीदारी हो सकती है।

कुछ ब्रैंड्स ने कहानी और भावनाओं के जरिए संदेश देने की कोशिश की। लेकिन कई विज्ञापन ऐसे भी थे जिनका मैच के संदर्भ से कोई खास संबंध नहीं दिखा। एक विज्ञापन में घर के लिए स्पा सेटअप दिखाया गया, जो आकार में लगभग मुंबई के एक अपार्टमेंट जितना बड़ा लग रहा था। यह संदेश थोड़ा अजीब लगा, क्योंकि यह मैच लगभग 60 करोड़ दर्शकों द्वारा देखा जा रहा था, जिनकी आर्थिक स्थिति और जीवनशैली एक-दूसरे से बहुत अलग है।

ब्रैंडिंग हर कैटेगरी में एक जैसी काम नहीं करती। उदाहरण के लिए, जब कोई लक्जरी कार ब्रैंड अपना सबसे महंगा मॉडल दिखाता है, तो वह पूरे ब्रैंड को एक ऊंची छवि देता है, भले ही ज्यादातर लोग उस कार को कभी खरीद न पाएं।

एक ज्वेलरी ब्रैंड ने तो किशोर बच्चों के गुस्से को भी सेलिब्रेट करने की कोशिश की। यह सांस्कृतिक समझ थी या सिर्फ रचनात्मकता की अति, इस पर बहस हो सकती है। इससे एक अहम सवाल उठता है कि जब 60 करोड़ लोग आपका विज्ञापन देख रहे हों, तो उनमें से कितने लोग सच में समझ पाते हैं कि आप क्या बेचना चाहते हैं- एक प्रोडक्ट, एक वादा या एक भावना?

क्या हम अब भी विज्ञापन सिर्फ मेट्रो शहरों के दर्शकों को ध्यान में रखकर बना रहे हैं और मान लेते हैं कि वही पूरे देश का प्रतिनिधित्व करते हैं?

नेतृत्व के सबक

यदि विज्ञापन की दुनिया इस मैच में थोड़ी असहज दिखी, तो खेल ने हमें नेतृत्व के शानदार सबक दिए। टूर्नामेंट में भारत का सफर भी उतार-चढ़ाव से भरा रहा। लीग चरण में एक बड़ी हार के बाद अगले दौर में पहुंचना काफी हद तक दूसरे टीमों के प्रदर्शन पर निर्भर हो गया था। एक समय ऐसा लगा कि आगे बढ़ना मुश्किल हो जाएगा।

फिर अचानक एक बदलाव हुआ- एक ऐसे बल्लेबाज को टीम में शामिल किया गया, जिसे कई लोग लगभग भूल चुके थे। अगर कोच का भरोसा और दखल न होता, तो शायद यह फैसला कभी नहीं होता।

कई बार नेतृत्व का मतलब तय स्क्रिप्ट का पालन करना नहीं, बल्कि सही समय पर नई स्क्रिप्ट लिखना होता है। फाइनल मैच ने भी टीम की मजबूती को परखा। कप्तान बिना रन बनाए आउट हो गए। एक ऐसा खिलाड़ी, जिसे दुनिया का सबसे सुरक्षित फील्डर माना जाता है, उसने भी एक आसान कैच छोड़ दिया।

एक लाख से ज्यादा दर्शकों से भरे स्टेडियम और करोड़ों टीवी दर्शकों के सामने ऐसे पल किसी का भी आत्मविश्वास तोड़ सकते हैं। लेकिन यहां टीम की प्रतिक्रिया खास थी। टीम ने गलती करने वाले खिलाड़ियों का साथ दिया। कहीं भी नाराजगी या निराशा नहीं दिखी। बस तुरंत अगली गेंद पर ध्यान दिया गया। वही फील्डर जिसने कैच छोड़ा था, बाद में महत्वपूर्ण विकेट लेने में सफल रहा। और कप्तान ने अपनी व्यक्तिगत निराशा के बावजूद गेंदबाजी और फील्डिंग में शानदार रणनीतिक फैसले लिए, जिसने आखिरकार मैच भारत के पक्ष में कर दिया।

सबक साफ था- महान टीमें गलतियां खत्म नहीं करतीं, बल्कि उन्हें संभालना सीखती हैं।

जश्न का अलग नजरिया

जीत के बाद जश्न के पल भी काफी दिलचस्प थे। मैदान पर कई खिलाड़ी अपने पार्टनर के साथ जश्न मनाते दिखे। कोई गले मिल रहा था, कोई किस कर रहा था, कोई बार-बार वीडियो बना रहा था और सोशल मीडिया के लिए पल कैद कर रहा था। कई खिलाड़ी ट्रॉफी के साथ अकेले फोटो खिंचवाने को भी उत्सुक दिखे। यहां तक कि कप्तान ने भी ट्रॉफी के साथ अपने व्यक्तिगत फोटो खिंचवाए।

यह सब असामान्य नहीं है। आखिर ये युवा खिलाड़ी हैं, जिन्होंने अपने खेल के सबसे बड़े मुकाम को हासिल किया है। लेकिन इसी भीड़ और उत्साह के बीच एक खिलाड़ी, जो शायद अपने प्रदर्शन के कारण सबसे ज्यादा तालियों का हकदार था और जिसे मैन ऑफ द टूर्नामेंट भी चुना गया, ने जश्न मनाने का बिल्कुल अलग तरीका चुना। वह कैमरों से दूर अपने परिवार और सपोर्ट स्टाफ के साथ चुपचाप समय बिताता दिखा। उसने खुद को केंद्र में लाने की कोई कोशिश नहीं की।

यह छोटा सा पल याद दिलाता है कि जीत इंसान के चरित्र को भी उजागर करती है। कुछ लोग जीत को जोर से मनाते हैं, कुछ लोग उसे शांत तरीके से जीते हैं। ब्रैंड्स के लिए यह व्यवहारिक अंतर भी मायने रखता है। जब ब्रैंड किसी खिलाड़ी को अपना एंबेसडर बनाते हैं, तो वे सिर्फ उसके खेल से नहीं बल्कि उसकी सोच, परिपक्वता और व्यक्तित्व से भी जुड़ते हैं। अकसर लंबे समय में वही खिलाड़ी ज्यादा सम्मान पाते हैं जिनमें शांत आत्मविश्वास और संतुलन होता है।

एक पल जो गलत लगा

मैच में एक ऐसा पल भी आया जो असहज करने वाला था। एक भारतीय गेंदबाज ने बिना किसी उकसावे के विरोधी बल्लेबाज के शरीर की ओर गेंद फेंक दी, जबकि उस समय मैच पहले ही भारत की पकड़ में था। एक लाख से ज्यादा भारतीय दर्शकों के सामने और लगभग तय जीत के समय ऐसा करना अनावश्यक लगा। क्रिकेट लंबे समय से खुद को जेंटलमैन का खेल कहता आया है और ऐसे पल उस भावना को कमजोर करते हैं।

यहीं से बात फिर ब्रैंड्स की दुनिया तक पहुंचती है। सैकड़ों ब्रैंड क्रिकेट से जुड़ते हैं और खेल के मूल्यों- टीमवर्क, अनुशासन, ईमानदारी और उत्कृष्टता, का दावा करते हैं। लेकिन जब मैदान पर व्यवहार इन मूल्यों के खिलाफ जाता है, तो सवाल उठता है- क्या वे ब्रैंड कभी ऐसे व्यवहार की आलोचना करेंगे? या फिर ब्रैंड की हिम्मत वहीं खत्म हो जाती है जहां व्यापारिक आराम शुरू होता है?

ट्राफी से आगे की बात

खेल में जीत एक देश को जोड़ती है। यह प्रेरणा देती है और ऐसी यादें बनाती है जो जीवन भर साथ रहती हैं। लेकिन अगर हम ध्यान से देखें, तो ऐसे पल हमें बड़ी बातें भी सिखाते हैं- हम कैसे संवाद करते हैं, कैसे नेतृत्व करते हैं और जब करोड़ों लोग हमें देख रहे हों तब हम अपने मूल्यों को कैसे निभाते हैं।

भारत ने ट्रॉफी जरूर जीती। लेकिन उस रात के असली सबक सिर्फ मैच जीतने के बारे में नहीं थे। वे इस बारे में थे कि हम खेल को कैसे खेलते हैं- मैदान पर, बोर्डरूम में और उन कहानियों में जो ब्रैंड पूरे देश को सुनाते हैं।

(लेखक विज्ञापन जगत के सीनियर प्रोफेशनल, उद्यमी, मैराथन धावक, इन्वेस्टर, राइटर, स्पोक्सपर्सन और मेंटर हैं और ये उनके निजी विचार हैं)


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