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वरिष्ठ पत्रकार मधुकर उपाध्याय ने मार्क टली को दी श्रद्धांजलि, यूं किया याद
बीबीसी में मार्क टली के साथ काम कर चुके वरिष्ठ पत्रकार और लेखक मधुकर उपाध्याय ने उन्हें याद किया है और श्रद्धांजलि अर्पित की है।
समाचार4मीडिया ब्यूरो ।। 1 month ago
मधुकर उपाध्याय, वरिष्ठ पत्रकार।।
मार्क टली को मैं बहुत तरह से जानता था। उनसे मिलने से बहुत पहले भी और उनसे मिलने के बाद भी। सच कहूं तो शुरू में कभी यह उम्मीद ही नहीं थी कि मेरी उनसे मुलाकात होगी, या कभी ऐसा मौका आएगा कि हम साथ काम करेंगे। यह तो सोचा भी नहीं था।
उस समय मैं दिल्ली में नहीं था। मैं गोरखपुर के एक अख़बार में काम करता था। वह आपातकाल का दौर था। जब बीबीसी के दफ्तरों पर छापे पड़े और बीबीसी का प्रसारण बंद करा दिया गया, तब इसकी खबर अखबारों में छपती थी। उसी समय यह एहसास हुआ कि ऐसा भी कोई पत्रकार हो सकता है, जो सरकार की आंख में आंख डालकर सच कह सके। जो जैसा है, वैसा ही कहे। वह पत्रकार मार्क टली थे।
मार्क टली ने 90 साल की लंबी उम्र पाई। जब वे बतौर संवाददाता दिल्ली आए, तो भारत के होकर ही रह गए। वे लौटकर इंग्लैंड नहीं गए। उन्होंने अपनी ज़िंदगी का बड़ा हिस्सा भारत को समझने और दुनिया को समझाने में लगा दिया।
एक मलाल का ज़िक्र मार्क ने मुझसे एक-दो बार किया था। वे चाहते थे कि उन्हें धार्मिक मामलों का संवाददाता (Religious Affairs Correspondent) बनाया जाए। धर्म के मामले में उनकी समझ किसी एक धर्म तक सीमित नहीं थी। सभी धर्मों में उनकी गहरी पकड़, रुचि और आस्था थी।
अगर पिछले 50 वर्षों के भारत के इतिहास को पलटकर देखें—चाहे वह 1975 की इमरजेंसी हो, ऑपरेशन ब्लू स्टार हो या इंदिरा गांधी की हत्या—तो एक समय ऐसा भी था जब इन घटनाओं की सच्ची जानकारी का एकमात्र भरोसेमंद स्रोत ‘बीबीसी’ हुआ करता था। हर खबर इस बात पर निर्भर करती थी कि मार्क टली क्या रिपोर्ट कर रहे हैं।
जब मैं दिल्ली पहुंचा और बीबीसी गया, तब ईस्ट निजामुद्दीन में बीबीसी का दफ्तर हुआ करता था। वहीं मेरी पहली मुलाकात मार्क टली से हुई। उस समय वहां सिर्फ तीन लोग थे—मार्क टली, सतीश जैकब और मैं। बीबीसी का जो बड़ा विस्तार बाद में हुआ, वह तब नहीं था।
हम गांवों में रिपोर्टिंग के लिए जाते थे। गांवों में लोग हमसे कहते थे—‘आप तो मार्क नहीं हैं, मार्क साहब ऐसे थोड़ी होते हैं।’ लोगों को लगता था कि बीबीसी से जो भी आता है, वही मार्क टली है। रेडियो की आवाज़ से लोग पहचान बना लेते थे, चेहरा नहीं देखते थे, इसलिए यह भ्रम आम था।
मार्क टली काफी समय से बीमार चल रहे थे। उनके पत्रकारिता जीवन के बारे में एक बात खास थी—वे किसी को बैठाकर यह नहीं सिखाते थे कि पत्रकारिता ऐसे करो या वैसे। लेकिन एक पुरानी कहावत है—अच्छा शिक्षक वह नहीं जो सिखाता है, बल्कि वह होता है जिससे देखकर लोग सीख लेते हैं। मार्क टली ऐसे ही थे।
उनसे जुड़े कई किस्से याद आते हैं। एक दिलचस्प बात यह थी कि उनका मानना था कि दिल्ली की राजनीति को समझने के लिए हिंदी और उत्तर भारत को समझना ज़रूरी है। इसी वजह से वे गाज़ीपुर और आसपास के इलाकों में जाते थे—हिंदी, अवधी और भोजपुरी समझने के लिए। हंसते हुए लोग कहते थे कि हिंदी भले न सीखी हो, लेकिन गालियां ज़रूर सीख ली थीं।
मार्क का इस देश के प्रति स्वाभाविक झुकाव था। वे मानते थे कि दिल्ली की राजनीति, उत्तर प्रदेश को समझे बिना अधूरी है।
एक और किस्सा याद आता है। जिस दिन मार्क रिटायर हुए, मैंने उनसे कहा कि आपका एक इंटरव्यू हिंदी सेवा में चलाएंगे, आप हिंदी में बोलिए। उन्होंने कहा—ठीक है। जब मैंने उनका परिचय “सर विलियम मार्क टली” के रूप में दिया, तो उन्होंने कहा—इतना लंबा नाम मत लो, लोग पहचानेंगे नहीं। सिर्फ मार्क टली काफी है।
मार्क टली ऐसे इकलौते पत्रकार थे जिन्हें ब्रिटिश सम्मान (Order of the British Empire) भी मिला और भारत सरकार के पद्म सम्मान भी। दोनों देशों ने उनके योगदान को स्वीकार किया।
एक घटना उन्होंने खुद मुझे सुनाई थी। जब मैंने उनसे कहा कि आपकी किताबें—No Full Stops in India जैसी—बेहद शानदार हैं, तब उन्होंने दांडी मार्च से लौटने के बाद मुझसे कहा कि तुमने क्या देखा, क्या समझा। मैंने उन्हें बताया कि गांधी के दांडी मार्च और मेरे दांडी मार्च के बीच कई चीजें थीं जो होनी चाहिए थीं, लेकिन नहीं हुईं; और कुछ चीजें जो नहीं होनी चाहिए थीं, वे टूट गईं। मार्क ने अपनी किताब में इस बात का जिक्र नाम के साथ किया।
मार्क अक्सर कहते थे कि किताब लिखना बहुत कठिन काम है। बीबीसी के लिए 200 शब्द की रिपोर्ट लिखने के बाद उनका मन करता था कि बस लिख दें—“बीबीसी, मार्क टली, दिल्ली”—और काम खत्म। उससे आगे लिखना उन्हें बहुत मुश्किल लगता था। लेकिन मार्क टली ने एक से एक किताब लिखी हैं। उनका कोई जवाब नहीं है। उनका कोई सानी नहीं है।
(यह लेखक के निजी विचार हैं। लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और मार्क टली के साथ बीबीसी में लंबे समय तक काम कर चुके हैं।)
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