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ओम बिरला की निष्पक्षता पर सवाल: पंकज शर्मा

बिरला से पहले रहे 16 लोकसभा अध्यक्षों में से किसी एक के बारे में भी ऐसी रंग बदलती भूमिका की चर्चा कम ही सुनने को मिली। बिरला आठवें गैर-कांग्रेसी स्पीकर हैं।

समाचार4मीडिया ब्यूरो ।। 5 hours ago

पंकज शर्मा, वरिष्ठ पत्रकार।

स्पीकर ओम बिरला को पद से हटाने का प्रस्ताव लोकसभा में ध्वनिमत से भले ही गिर गया, मगर उस पर हुई चर्चा से यह ध्वनि देश के कोने-कोने तक पहुंच गई कि उनके कार्यकाल में सदन के पीठासीन चेहरों की साख काफी नीचे चली गई है। तीन महीने बाद बिरला को लोकसभा अध्यक्ष बने पूरे सात वर्ष हो जाएंगे और इन सात बरसों में, चलते सदन में, उनके चेहरे से निष्पक्षता का भाव टपकता किसी को दिखाई नहीं दिया।

अक्सर यह देखा गया है कि जब वे सत्तापक्ष की तरफ रुख करते हैं तो उनके चेहरे पर सहज मुस्कान होती है, जबकि प्रतिपक्ष से मुखातिब होते समय उनकी भाषा में चेतावनी और कठोरता का स्वर प्रमुख हो जाता है। संसद के सत्रों के दौरान यह फर्क कई बार साफ दिखाई देता रहा है। बिरला से पहले रहे 16 लोकसभा अध्यक्षों में से किसी एक के बारे में भी ऐसी रंग बदलती भूमिका की चर्चा कम ही सुनने को मिली। बिरला आठवें गैर-कांग्रेसी स्पीकर हैं और भारतीय जनता पार्टी की ओर से चुने गए दूसरे व्यक्ति हैं, जो इस पद तक पहुंचे हैं।

उनसे पहले भाजपा की ओर से सुमित्रा महाजन लोकसभा अध्यक्ष बनी थीं। नरेंद्र मोदी के पहले प्रधानमंत्रित्व काल की शुरुआत में जून 2014 में वे स्पीकर बनीं और उनका 5 साल 11 दिन का कार्यकाल गरिमा, स्वायत्तता और स्थापित संसदीय परंपराओं के पालन की मिसाल माना गया। शायद यही कारण था कि नरेंद्र मोदी के दूसरे कार्यकाल में सुमित्रा ताई को न केवल दूसरा कार्यकाल नहीं मिला बल्कि भाजपा की उम्मीदवारी से भी वंचित रहना पड़ा। आधिकारिक कारण यह बताया गया कि वे 76 वर्ष की हो चुकी थीं और भाजपा ने 75 वर्ष से ऊपर के नेताओं को मार्गदर्शन मंडल में भेजने का सिद्धांत बनाया है।

पूर्व स्पीकरों से सीखने का अवसर-

अगर ओम बिरला चाहते तो अपने पूर्ववर्तियों के अनुभवों से बहुत कुछ सीख सकते थे। विशेष रूप से मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के सोमनाथ चटर्जी का उदाहरण संसदीय गरिमा का महत्वपूर्ण अध्याय है। 2008 में जब वाम दलों ने कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार से समर्थन वापस ले लिया था, तब पार्टी महासचिव प्रकाश करात ने चटर्जी से कहा कि वे भी स्पीकर पद से इस्तीफा दे दें।

चटर्जी ने यह कहते हुए ऐसा करने से इनकार कर दिया कि स्पीकर एक संवैधानिक और गैर-राजनीतिक पद है, इसलिए इस्तीफा देकर इसे राजनीतिक विवाद में नहीं घसीटा जा सकता। परिणामस्वरूप उन्हें पार्टी से निष्कासित कर दिया गया, लेकिन उन्होंने अपना कार्यकाल पूरा किया और 2009 में राजनीति से संन्यास ले लिया। इसी तरह शिवसेना के मनोहर जोशी, तेलुगु देशम पार्टी के जी.एम.सी. बालयोगी, जनता दल के रवि राय और कौदूर सदानंद हेगड़े जैसे गैर-कांग्रेसी स्पीकरों के कार्यकाल से भी बहुत कुछ सीखा जा सकता था।

कांग्रेसी स्पीकरों के आचरण से भी संसदीय व्यवहार की कई मिसालें मिलती हैं। मीरा कुमार, पूर्णो संगमा, शिवराज पाटिल और बलराम जाखड़ जैसे स्पीकरों ने अपने कार्यकाल में सदन की गरिमा बनाए रखने की कोशिश की। इससे पहले बलिराम भगत, गुरुदयाल सिंह ढिल्लों, सरदार हुकुम सिंह, एम.ए. आयंगर और जी.वी. मावलंकर जैसे अध्यक्षों ने भी संसदीय परंपराओं को मजबूत किया।

इतिहास में चौथा ऐसा प्रस्ताव-

बिरला के खिलाफ प्रस्ताव पारित होगा, ऐसी उम्मीद किसी को नहीं थी। यह कदम अधिकतर प्रतीकात्मक ही था। फिर भी यह तथ्य महत्वपूर्ण है कि भारतीय संसद के इतिहास में वे केवल चौथे ऐसे स्पीकर हैं जिनके खिलाफ नियम 94-सी के तहत प्रस्ताव लाया गया। 1954 में जी.वी. मावलंकर के खिलाफ ऐसा प्रस्ताव आया था, लेकिन वह पारित नहीं हुआ। 1966 में सरदार हुकुम सिंह के खिलाफ प्रस्ताव लाने की कोशिश हुई, मगर आवश्यक समर्थन न मिलने के कारण उसे पेश ही नहीं किया जा सका। 1987 में बलराम जाखड़ के खिलाफ प्रस्ताव आया, जो अंततः गिर गया।

इस तरह ओम बिरला तीसरे ऐसे स्पीकर हैं जिनके खिलाफ प्रस्ताव पर लोकसभा में बहस हुई। प्रस्ताव का पारित होना या न होना उतना महत्वपूर्ण नहीं है, जितना यह तथ्य कि 74 वर्षों में तीसरी बार लोकसभा को अपने ही स्पीकर के आचरण पर चर्चा करनी पड़ी। यह स्थिति अपने आप में गंभीर संकेत है। क्या यह तथ्य ही उन्हें यह महसूस कराने के लिए पर्याप्त नहीं होना चाहिए कि उनके आचरण के कारण लोकसभा को लगभग चार दशक बाद ऐसे विवादास्पद दृश्य का सामना करना पड़ा?

भारतीय संसदीय परंपराओं को अनेक राजनीतिक नेताओं ने अपने सदाचार से मजबूत किया है। इन परंपराओं में कहीं-कहीं अवांछित उदाहरण भी मिलते हैं, लेकिन इसके बावजूद संसद की व्यवस्था कुल मिलाकर संतुलित और गरिमापूर्ण बनी रही है। यही उसकी असली ताकत है। अगर इस ताकत का क्षरण हुआ तो भारतीय लोकतंत्र के लिए कठिन समय शुरू हो सकता है। वैसे तो प्रधानमंत्री को भी पूर्णतः निष्पक्ष दृष्टिकोण अपनाना चाहिए, मगर कम से कम स्पीकर से तो यह अपेक्षा अवश्य की जाती है कि वे इस संवैधानिक आसंदी पर बैठते ही अपने राजनीतिक पूर्वाग्रहों को त्याग दें।

( यह लेखक के निजी विचार हैं )


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