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स्वाधीनता काल में हिंदी के विरुद्ध राजनीति: अनंत विजय

आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने अपने कालखंड में हिंदी के विरुद्ध मुस्लिम नेताओं के बयानों को जिहाद बताया था। स्वाधीनता पूर्व हिंदी को दुर्बल करने के लिए मुसलमानों ने राजनीति की।

समाचार4मीडिया ब्यूरो ।। 5 hours ago

अनंत विजय, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक।

कुछ दिनों पूर्व नागिरीप्रचारिणी सभा, बनारस की फेसबुक वाल पर एक रील देखी जिसमें कवि अशोक वाजपेयी के वक्तव्य का एक अंश था। उस रील में अशोक वाजपेयी ने आचार्य रामचंद्र शुक्ल की कविता की समझ को रेखांकित किया था। रील देखने के बाद संदर्भ समझने के लिए अशोक वाजपेयी का पूरा भाषण ढूंढा। पता चला कि नागरीप्रचारिणी सभा के तीन प्रकाशनों पर दिल्ली में एक चर्चा का आयोजन था।

मंच पर अशोक वाजपेयी और सभा के प्रधानमंत्री व्योमेश शुक्ल इत्यादि थे। अपने भाषण में वाजपेयी कह रहे हैं कि वो हिंदी साहित्य के वैध विद्यार्थी नहीं रहे हैं। एक जमाने जब सबलोग आचार्य राaमचंद्र शुक्ल इत्यादि को विधिवत पढ़ते थे वैसे उन्होंने नहीं पढ़ा। कुछ छुट्टा, इधर उधर पल्लवग्राही रूप में पढ़ा। उन्होंने शुक्ल जी के निबंध कविता क्या है की पंक्तियों को पढ़ उसपर टिप्पणी की। जब वो शुक्ल को उद्धृत करते थे तो उनके बगल में मंच पर बैठे व्योमेश दाद दे रहे थे। पूरे प्रसंग की चर्चा मैंने एक मित्र से की। मेरे मित्र काशीवासी और साहित्यिक अभिरुचि के हैं।

उनसे अशोक वाजपेयी का कथन बताया कि उन्होंने शुक्ल को विधिवत नहीं पढ़ा है तो उन्होंने गंभीरता से एक प्रश्न पूछा कि ये किसका दुर्भाग्य है ? आचार्य का या अशोक वाजपेयी का। मैं तबतक समझ गया था कि वो ऐसा क्यों पूछ रहे हैं। मैंने छूटते ही कहा कि जाहिर तौर पर दुर्भाग्य तो शुक्ल जी का ही रहा। इतना सुनकर मेरे मित्र जोर से हंसे और बोले कि अगर शुक्ल जी को वो विधिवत और समग्रता में पढ़ लेते तो शुक्ल जी पर बोलने के लिए नहीं आते।

ना ही उनके साथ वामपंथी लेखक संघ से जुड़े लोग मंच पर होते। अब मैं थोड़ा विनोद के भाव में आ गया था। मैंने मित्र से पूछा कि उनके कथन का आधार क्या है। उनके अनुसार अगर अशोक वाजपेयी शुक्ल जी के भाषा संबंधी लेखों को विधिवत पढ़ लेते तो शायद नागिरीप्रचारिणी सभा के प्रकाशनों पर बोलने नहीं आते।

दरअसल शुक्ल जी ने हिंदी और उर्दू को लेकर जो लेख नागिरीप्रचारिणी पत्रिका और लीडर जैसी पत्रिकाओं में वर्ष 1908 से 1917 के कालखंड में लिखा उसको अगर वाजपेयी पढ़ लिए होते तो शुक्ल जी की प्रशंसा कर पाते, इसमें संदेह है। शुक्ल जी ने तो हिंदी के विरुद्ध उस समय के मुसलमान नेताओं के वक्तव्यों को ‘पवित्र जिहाद’ कहा था। वो लिखते हैं कि हिंदी के विरुद्ध अपने पवित्र जिहाद में नवाब अब्दुल मजीद वह हर युक्ति अपनाते हैं, जिसमें उनकी तरह सोचनेवाले व्यक्ति विशेष रूप से निपुण कहे जाते हैं।

क्या गलतबयानी, क्या भ्रांतव्याख्या, क्या धमकी, क्या शेखी, क्या स्तुति, क्या निंदा- वे सबका सहारा लेते हैं। यदि सहारा नहीं लेते हैं तो सिर्फ उचित तर्क देने का। आचार्य रामचंद्र शुक्ल इतने पर नहीं रुकते हैं बल्कि यहां तक कहते हैं कि नवाब साहब जब हिंदुओं को ये याद दिलाते हैं कि पुराने समय में वो मुसलमानों के अधीन थे वहां भी वो ये तथ्य विस्मृत कर जाते हैं कि दिल्ली के मुसलमान बादशाह ब्रिटिश शुरक्षा में आने के पहले मराठों की सुरक्षा में थे। पुराने समय के मुसलमानी साम्राज्य की अपेक्षा सिख और मराठा सम्राज्य जनता की स्मृति में अधिक है।

इसके लिए शुक्ल जी इंपीरियल गजेटियर खंड छह का उदाहरण देते हैं। अशोक वाजपेयी ने सही माना कि वो हिंदी के वैध विद्यार्थी नहीं रहे। जो वैध नहीं रहता है वो क्या होता है ये बताने की आवश्कता नहीं है। अशोक वाजपेयी जैसे लोग भारत की सामासिक संस्कृति की बहुत बातें करते हैं। बहुधा गंगा-जमुनी संस्कृति की भी और हिंदी की जगह पर हिंदुस्तानी को प्राथमिकता देने पर जोर देते रहे हैं। इस पर भी शुक्ल जी ने टिप्पणी की थी। वो लिखते हैं कि जो लोग राजनीतिक दृष्टि से हिंदू-मुस्लिम एकता अत्यंत आवश्यक समझते हैं वे एक बीच का रास्ता पकड़कर ‘हिंदुस्तानी’ लेकर उठे हैं।

इस ‘हिंदुस्तानी’ का समर्थन कुछ उदार समझे जानेवाले मुसलमान और उर्दू की गोद में पले हिंदू भी कर रहे हैं। हम भोली-भाली जनता को उस ‘हिंदुस्तानी से सावधान करना अत्यंत आवश्यक समझते हैं। जो ‘हिंदुस्तानी’ इन लोगों के ध्यान में है वह थोड़ी छनी हुई उर्दू के सिवा कुछ और नहीं है। उर्दू के सब लक्षण जैसे वाक्य रचना की फारसी शैली, अरबी फारसी के अप्रचलित मुंशी-फहम शब्द अरबी-फारसी के कायदे के बहुवचन इसमें वर्तमान रहेंगे तब तो वह ‘हिंदुस्तानी’ कहलाएगी अन्यथा नहीं।

आचार्य शुक्ल उर्दू को अलग भाषा मानते ही नहीं थे वो तो उसको हिंदी की ही एक शाखा मात्र मानते थे। इसको लेकर उनकी बहुत कठोर टिप्पणी है- हर विद्वान जानता है कि उर्दू कोई स्वतंत्र भाषा नहीं है। यह पश्चिमी हिंदी की एक शाखा मात्र है, जिसे मुसलमानों द्वारा अपनी ऐकांतिक रुचियों और पूर्वग्रहों के अनुकूल एक निजी रूप दे दिया गया है। इस प्रकार हिंदी और उर्दू एक ही भाषा के दो रूप हैं।

ये बात तो गणेश शंकर विद्यार्थी ने भी कही थी। शुक्ल जी ये भी कहते हैं कि उर्दू ईर्ष्यावश संस्कृत शब्दों से परहेज करती है और केवल अरबी और फारसी से शब्द उधार लेती है। शुक्ल जी उर्दू को सैन्य छावनी से निकलनेवाली भाषा नहीं मानते हैं। इस तरह की बातों का उपहास करते थे। विचारणीय प्रश्न ये है कि किस तरह से सैयद अहमद ने उर्दू को मुसलमानों की भाषा कहकर राजनीति आरंभ की और उसको एक समुदाय से जोड़ दिया जो विभाजन तक आते आते बहुत गहरा हो गया। शुक्ल जी ही क्यों उस कालखंड के तमाम लेखकों ने उर्दू को लेकर टिप्पणियां की।

स्वाधीन भारत में जब गंगा-जमुनी तहजीब के ध्वजवाहकों ने राजनीति से लेकर सांस्कृतिक लैंडस्केप पर अपना अधिकार जमाना आरंभ किया तो उन्होंने रामचंद्र शुक्ल, प्रताप नाययण मिश्र, भारतेंदु, बालकृष्ण भट्ट और महावीर प्रसाद दिविदी जैसे दिग्गजों के हिंदी-उर्दू संबंधी लेखन को नेपथ्य में धकेलने का प्रयत्न किया। हिंदी-उर्दू के विवाद में ये बात भी उभर कर आई थी कि उर्दू को जमानेवाले लोग सायास अपनी लेखन में भारतीय इतिहास ग्रंथों और पुराणों से उदाहरण नहीं लेकर फारसी से लेने लगे थे। यहां ये भी देखा जाना चाहिए कि उस समय नागरी लिपि को लेकर भी एक बड़ा विमर्श हुआ था।

नागिरीप्रचारिणी सभा की पत्रिका से लेकर अन्य पत्रिकाओं में भी इस पर चर्चा हुई थी। ये कैसे हो गया कि नागरी में नुक्ता का प्रयोग आरंभ हो गया। अभी प्रकाशित नागिरीप्रचारिणी सभा के मुखपत्र के लेखों में नुक्ता का उपयोग किया गया है। कैसे और क्यों ? विमर्श इस बात पर भी होना चाहिए कि हिंदी में नुक्ता का प्रयोग क्यों ? हिंदी वर्णमाला में तो नुक्ता का स्थान है ही नहीं।

प्रश्न भाषा का तो है ही उससे अधिक बड़ा प्रश्न ये है कि किस तरह से भारतीय लेखन को ओझल किया गया। बाद की पीढ़ियों को अपने पूर्वज लेखकों के सोच से दूर किया गया। इस तरह की शिक्षा पद्धति बनाई गई कि भारत और भारतीयता की बात करनेवाले लेखकों के लेखन को पीछे धकेला जा सके। इस संदर्भ में कुबेरनाथ राय का नाम लिया जा सकता है। कुबेरनाथ राय ने भारतीय पौराणिक ग्रंथों से उदाहरण लेकर विपुल लेखन किया।

उनके लेखन को भी लंबे समय तक अनदेखा किया गया। अब जाकर उनके लेखन पर थोड़ी बहुत चर्चा होने लगी है। अकादमिक जगत में रामचंद्र शुक्ल के हिंदी साहित्य का इतिहास को प्रमुखता दी गई। भाषा संबंधी उनके विचार स्थान नहीं बना पाए। हिंदी को हिंदू और हिंदुस्तान से जोड़कर एक विमर्श खड़ा कर दिया गया। हिंदी राष्ट्रवाद तक की बात की गई और उसपर पुस्तकें प्रकाशित हुईं। जब हम भारतीय सभ्यता की पुनर्स्थापना की बात करते हैं तो साहित्य और भाषा पर पूर्व में हुए विचारों को समग्रता में देखना होगा। बिना उसके हिंदी की विकास यात्रा को नहीं समझा जा सकता है।

( यह लेखक के निजी विचार हैं ) साभार - दैनिक जागरण।


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