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सामाजिक सरोकारों को छोड़कर पत्रकारिता संभव नहीं: प्रो.संजय द्विवेदी
चिंता तब होती है जब पत्रकार स्वयं पार्टी के प्रवक्ता की तरह व्यवहार करने लगते हैं। पत्रकार की अपनी राजनीतिक समझ होना गलत नहीं है, लेकिन पार्टी लाइन पर चलना पत्रकारिता के लिए खतरनाक है।
समाचार4मीडिया ब्यूरो ।। 5 hours ago
प्रो.संजय द्विवेदी, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष।
वक्त का काम है बदलना और वह बदलता ही रहता है। समय हमेशा आगे बढ़ता है, यही उसकी नैसर्गिक प्रवृत्ति है। ऐसे में पत्रकारिता भी बदली है। आज वह एक सक्षम उद्योग बन चुकी है, जिस पर निर्भर असंख्य लोग अच्छा जीवन जी रहे हैं। बदलाव कई स्तरों पर आए हैं—तकनीक में, भाषा में, प्रस्तुति में, छपाई में और काम करने की शैली में। हर क्षेत्र में प्रगति हुई है। आज हमारे यहां ऐसे समाचार पत्र छप रहे हैं जो दुनिया के श्रेष्ठ अखबारों के समकक्ष खड़े दिखाई देते हैं। गुणवत्ता, प्रस्तुति और छपाई में वे कहीं कमतर नहीं हैं।
टीवी और इंटरनेट आधारित मीडिया में भी हमने उल्लेखनीय प्रगति की है। तकनीक ने काम की गति बढ़ाई है, लेकिन यह भी सच है कि विचार और गुणवत्ता की जगह तकनीक नहीं ले सकती। मीडिया की सबसे बड़ी मजबूरी यह है कि वह समाज से निरपेक्ष नहीं रह सकता। उसे अंततः जनता के दुख-दर्द के साथ खड़ा होना ही पड़ता है। हाल के वर्षों में कोरोना संकट इसका उदाहरण रहा। उस कठिन समय में मीडिया ने आम लोगों की तकलीफों को सामने रखा और समाज को संबल दिया। यह सच है कि मीडिया कभी-कभी विचारधारा के आधार पर पक्ष लेता दिखाई देता है, पर बहुलांश मीडिया अपेक्षित तटस्थता और ईमानदारी से काम करता है।
मीडिया लंबे समय तक महानगर और शहर केंद्रित रहा है, लेकिन अब छोटे कस्बों और गांवों को भी जगह मिलने लगी है। स्थानीय संस्करणों ने अपने स्थानीय सरोकार और माटी की महक के कारण पाठकों के बीच स्वीकार्यता पाई है। अखबारों के पृष्ठ बढ़े हैं, संस्करण बढ़े हैं और जिले-जिले के पन्ने बनने लगे हैं। टीवी चैनल चौबीसों घंटे समाचार देते हैं और डिजिटल मीडिया पल-पल अपडेट होता रहता है। ऐसे में खबरों की उम्र छोटी हो गई है। एक खबर जाती है तो तुरंत दूसरी आ जाती है।
जहां तक अखबारों के प्रसार की बात है, तो प्रतिस्पर्धा के कारण स्कीम और आकर्षण दिए जाते हैं। आज अखबार लाखों की संख्या में छपते और बिकते हैं। चीन, जापान और भारत आज भी प्रिंट मीडिया के बड़े बाजार हैं। अगर आप प्रसार बढ़ाना चाहते हैं तो पाठकों को कुछ आकर्षण देना पड़ता है—इवेंट, इनाम या अन्य योजनाएं। इसमें गलत कुछ भी नहीं है।
टीवी चैनलों पर भी अक्सर सवाल उठते हैं। टीवी मूलतः दृश्य माध्यम है, इसलिए उसमें नाटकीयता होती है। समय के साथ चैनल बहस और खबरों की ओर भी बढ़े हैं। गंभीर चैनल भी मौजूद हैं, लेकिन उन्हें पर्याप्त दर्शक नहीं मिलते। इसलिए केवल मीडिया को दोष देने के बजाय दर्शकों और पाठकों की मीडिया साक्षरता पर भी ध्यान देना होगा। समाज को गंभीर मुद्दों पर स्वस्थ संवाद के लिए तैयार करना पड़ेगा। इसमें समय लगेगा, लेकिन बदलाव संभव है।
पत्रकारिता सामाजिक सरोकारों से अलग नहीं हो सकती। समाचार मीडिया और मनोरंजन मीडिया अलग-अलग क्षेत्र हैं। मनोरंजन का अपना महत्व है और समाचार का अपना। दोनों को मिलाकर देखना उचित नहीं है। बाजार में हर तरह की सामग्री मौजूद है, लेकिन न्यूज मीडिया की जिम्मेदारी अलग है। इतने बड़े और खर्चीले मीडिया संस्थानों को चलाना आसान नहीं है। अगर मीडिया पूरी तरह सरकारी हो जाए तो उस पर भरोसा कम हो जाएगा। वहीं पाठक सस्ता या मुफ्त अखबार चाहते हैं, इसलिए मीडिया को विज्ञापनों पर निर्भर रहना पड़ता है। यदि हम सचमुच स्वतंत्र पत्रकारिता चाहते हैं तो पाठकों और दर्शकों को भी उसके आर्थिक सहयोग के लिए आगे आना होगा।
आज भी कई अच्छे अखबार, वेबसाइट और न्यूज चैनल हैं जो दबाव से मुक्त होकर अपनी बात रखते हैं। लेकिन अगर उन्हें जनसहयोग और आर्थिक आधार नहीं मिलेगा तो यह भूमिका निभाना कठिन हो जाएगा। इसके बावजूद स्थिति निराशाजनक नहीं है। व्यवस्था की आलोचना करने वाली खबरें भी यही मीडिया सामने लाता है।
मीडिया के अस्तित्व को बचाए रखने के लिए जनपक्षधरता जरूरी है। एजेंडा सेटिंग हर जगह होती है, लेकिन यह कहना सही नहीं कि प्रतिपक्ष को जगह नहीं मिलती। संतुलन बनाए रखना भी मीडिया की जिम्मेदारी है। चिंता तब होती है जब पत्रकार स्वयं किसी पार्टी के प्रवक्ता की तरह व्यवहार करने लगते हैं। पत्रकार की अपनी राजनीतिक समझ होना गलत नहीं है, लेकिन पार्टी लाइन पर चलना पत्रकारिता के लिए खतरनाक है।
( यह लेखक के निजी विचार हैं )
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