सार्वजनिक प्रसारण ढांचे (Broadcasting Infrastructure) से जुड़े अनुबंधों को मजबूत करते हुए दूरसंचार विवाद निपटान एवं अपीलीय न्यायाधिकरण (TDSAT) ने हरियाणा की ब्रॉडकास्टिंग कंपनी Singla Property Dealers Pvt Ltd को प्रसार भारती की संपत्ति खाली करने और बकाया लाइसेंस शुल्क व हर्जाने के रूप में 92 लाख रुपये से अधिक की राशि ब्याज सहित चुकाने का आदेश दिया है।
जस्टिस राम कृष्ण गौतम की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि कंपनी द्वारा ऑल इंडिया रेडियो (AIR) के हिसार परिसर में स्थित प्रसार भारती के ट्रांसमिशन इंफ्रास्ट्रक्चर पर लगातार कब्जा बनाए रखना "अनधिकृत, अवैध और लाइसेंस समझौते की शर्तों के विपरीत" है।
यह आदेश सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय द्वारा कंपनी का FM रेडियो लाइसेंस रद्द किए जाने के लगभग 17 साल बाद आया है। साथ ही यह उस कानूनी लड़ाई का नतीजा है, जिसे प्रसार भारती ने अपने बकाया शुल्क की वसूली और परिसर से उपकरण हटाने के लिए करीब एक दशक पहले शुरू किया था।
Phase-II FM रेडियो लाइसेंसिंग से शुरू हुआ विवाद
इस विवाद की शुरुआत भारत सरकार के वर्ष 2005 में शुरू किए गए Phase-II FM Radio Expansion Programme से हुई थी। इस योजना के तहत निजी कंपनियों ने देश के विभिन्न शहरों में FM रेडियो फ्रीक्वेंसी हासिल करने के लिए बोली लगाई थी।
Singla Property Dealers Pvt Ltd हिसार FM रेडियो स्टेशन के लिए सफल बोलीदाता बनी थी। इसके बाद कंपनी ने अक्टूबर 2006 में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के साथ Grant of Permission Agreement (GOPA) पर हस्ताक्षर किए, जिसके तहत उसे FM रेडियो स्टेशन संचालित करने की अनुमति मिली।
लाइसेंसिंग व्यवस्था के तहत निजी रेडियो प्रसारकों को प्रसार भारती द्वारा उपलब्ध कराई गई जमीन और टावर इंफ्रास्ट्रक्चर का उपयोग कर ट्रांसमिशन सुविधाएं स्थापित करनी थीं। इसी के तहत मार्च 2006 में प्रसार भारती और कंपनी के बीच हिसार स्थित ऑल इंडिया रेडियो परिसर की सुविधाओं के उपयोग के लिए एक अलग इंफ्रास्ट्रक्चर लाइसेंस समझौता हुआ।
इस समझौते के तहत कंपनी को खुली जगह और टावर एपर्चर सुविधाओं का उपयोग करने की अनुमति दी गई थी और इसके बदले उसे सालाना 5.02 लाख रुपये लाइसेंस शुल्क देना था। समझौते में यह भी प्रावधान था कि स्पेस और कॉमन सुविधाओं के शुल्क में हर दो साल में 10% तथा टावर उपयोग शुल्क में हर साल 2.5% की बढ़ोतरी होगी।
लाइसेंस रद्द होते ही समझौता भी खत्म
इंफ्रास्ट्रक्चर समझौते की एक महत्वपूर्ण शर्त यह थी कि यदि सरकार द्वारा दिया गया FM प्रसारण लाइसेंस समाप्त कर दिया जाता है, तो प्रसार भारती के साथ किया गया इंफ्रास्ट्रक्चर समझौता भी स्वतः समाप्त हो जाएगा।
सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने 17 जुलाई 2009 को Singla Property Dealers का GOPA समाप्त कर दिया। इसके साथ ही प्रसार भारती के साथ किया गया इंफ्रास्ट्रक्चर समझौता भी उसी दिन खत्म हो गया।
प्रसार भारती के अनुसार इसके बाद कंपनी पर अपने सभी उपकरण हटाने और परिसर खाली करने की जिम्मेदारी थी। लेकिन बार-बार नोटिस और याद दिलाने के बावजूद कंपनी ने न तो अपने ट्रांसमिशन उपकरण हटाए और न ही इंफ्रास्ट्रक्चर का कब्जा छोड़ा।
सार्वजनिक प्रसारक का कहना था कि कंपनी का यह व्यवहार समझौते की शर्तों का उल्लंघन था और इससे उसे अनुबंध के अनुसार हर्जाना वसूलने का अधिकार मिल गया।
हर्जाने की शर्त बनी मामले का केंद्र
इस मामले में सबसे अहम भूमिका समझौते की Clause 7.7 ने निभाई। इस प्रावधान के अनुसार यदि समझौता समाप्त होने के बाद भी कंपनी अपने उपकरण नहीं हटाती है, तो उसे लागू वार्षिक किराए के पांच गुना के बराबर हर्जाना देना होगा।
प्रसार भारती ने ट्रिब्यूनल को बताया कि लाइसेंस समाप्त होने के बाद भी कंपनी लंबे समय तक परिसर पर कब्जा बनाए रही, जिससे हर्जाने और बकाया शुल्क की राशि लगातार बढ़ती गई।
प्रसार भारती ने यह भी बताया कि समझौता समाप्त होने से पहले ही कंपनी पर अक्टूबर 2007 से जुलाई 2009 के बीच के लाइसेंस शुल्क का बकाया जमा हो चुका था। जब मामला सुनवाई तक पहुंचा, तब तक 31 दिसंबर 2015 तक कंपनी पर कुल बकाया राशि 92 लाख रुपये से अधिक हो चुकी थी।
कंपनी ने नहीं रखा अपना पक्ष
इस मामले की एक महत्वपूर्ण बात यह रही कि प्रतिवादी कंपनी ने कार्यवाही में कोई भागीदारी नहीं की।
ट्रिब्यूनल द्वारा कई अवसर दिए जाने और पुलिस के माध्यम से नोटिस भेजे जाने के बावजूद कंपनी ने न तो कोई जवाब दाखिल किया और न ही सुनवाई में उपस्थित हुई। इसके चलते मामले की सुनवाई एकतरफा (Ex Parte) तरीके से की गई।
ट्रिब्यूनल ने कहा कि प्रसार भारती ने मूल टेंडर दस्तावेज, Grant of Permission Agreement, इंफ्रास्ट्रक्चर लाइसेंस समझौता, सरकार द्वारा जारी समाप्ति पत्र, मांग नोटिस और बकाया राशि की विस्तृत गणना सहित सभी जरूरी दस्तावेज पेश किए। इन दस्तावेजों को प्रसार भारती के अधिकृत प्रतिनिधि के हलफनामे के जरिए प्रमाणित भी किया गया।
जस्टिस गौतम ने कहा कि याचिकाकर्ता द्वारा पेश किए गए साक्ष्यों का प्रतिवादी की ओर से कोई खंडन नहीं किया गया।
पुराने फैसलों का भी दिया गया हवाला
फैसला सुनाते समय ट्रिब्यूनल ने प्रसार भारती और FM रेडियो ऑपरेटरों के बीच हुए ऐसे ही पुराने मामलों का भी उल्लेख किया।
आदेश में विशेष रूप से Chinnar Circuit Limited और Pan India Network Infravest Pvt Ltd से जुड़े मामलों का हवाला दिया गया, जिनमें लाइसेंस समाप्त होने के बाद भी कंपनियां प्रसार भारती के इंफ्रास्ट्रक्चर का उपयोग करती रही थीं।
ट्रिब्यूनल ने कहा कि उन मामलों में भी फैसला प्रसार भारती के पक्ष में आया था और उनमें से कम से कम एक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने भी चुनौती को खारिज कर दिया था।
इससे संकेत मिलता है कि प्रसारण इंफ्रास्ट्रक्चर पर लाइसेंस समाप्त होने के बाद कब्जा बनाए रखने और अनुबंध के तहत हर्जाना वसूलने से जुड़े मामलों में TDSAT लगातार एक समान दृष्टिकोण अपना रहा है।
ट्रिब्यूनल ने दिया हर्जाना और ब्याज देने का आदेश
याचिका को पूरी तरह स्वीकार करते हुए ट्रिब्यूनल ने कंपनी को आदेश दिया कि वह फैसले की तारीख से दो महीने के भीतर लाइसेंस प्राप्त इंफ्रास्ट्रक्चर खाली करे।
इसके अलावा कंपनी को निम्न भुगतान करने का भी आदेश दिया गया:
- 17 जुलाई 2009 से 31 दिसंबर 2015 तक अनधिकृत कब्जे के लिए 80.39 लाख रुपये का हर्जाना।
- लाइसेंस शुल्क बकाया और देरी से भुगतान के शुल्क के रूप में 12.34 लाख रुपये।
- 31 दिसंबर 2015 से वास्तविक भुगतान की तारीख तक पूरी राशि पर 9% वार्षिक साधारण ब्याज।
इस प्रकार ट्रिब्यूनल द्वारा निर्धारित मूल देनदारी 92.7 लाख रुपये से अधिक है, जिसमें आगे बढ़ने वाला ब्याज शामिल नहीं है।
ट्रिब्यूनल ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि कंपनी दो महीने के भीतर परिसर खाली नहीं करती है, तो उसी दर से अतिरिक्त हर्जाना भी लगातार जुड़ता रहेगा।
ब्रॉडकास्टिंग सेक्टर के लिए क्या मायने हैं?
यह फैसला प्रसार भारती और निजी प्रसारकों के बीच होने वाले इंफ्रास्ट्रक्चर-शेयरिंग समझौतों की कानूनी मजबूती को रेखांकित करता है, खासकर उन मामलों में जहां प्रसारण लाइसेंस रद्द या समाप्त हो चुके हों।
उद्योग विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्णय उन बंद या गैर-परिचालन FM रेडियो लाइसेंसधारकों से बकाया राशि वसूलने में प्रसार भारती की स्थिति को और मजबूत करेगा, जो अब भी सरकारी ट्रांसमिशन सुविधाओं पर कब्जा बनाए हुए हैं।
यह फैसला निजी प्रसारकों को भी स्पष्ट संदेश देता है कि इंफ्रास्ट्रक्चर उपयोग से जुड़ी अनुबंधीय जिम्मेदारियां, संचालन लाइसेंस समाप्त हो जाने के बाद भी लागू रहती हैं।
देशभर में ट्रांसमिशन टावरों और प्रसारण ढांचे का विशाल नेटवर्क संचालित करने वाली प्रसार भारती के लिए यह फैसला एक महत्वपूर्ण मिसाल साबित हो सकता है। इससे न केवल उसके इंफ्रास्ट्रक्चर परिसंपत्तियों की सुरक्षा और बेहतर उपयोग सुनिश्चित होगा, बल्कि सार्वजनिक प्रसारण सुविधाओं का उपयोग करने वाले निजी संस्थानों के बीच अनुशासन और अनुपालन भी मजबूत होगा।