MIB के फैसले से BARC को तिमाही में 7.5 करोड़ रुपये से ज्यादा का झटका

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय द्वारा टेलीविजन ऑडियंस रेटिंग्स पर रोक लगाने के फैसले के बाद BARC को हर तिमाही 7.5 करोड़ रुपये से ज्यादा के सीधे राजस्व नुकसान का सामना करना पड़ सकता है।

Last Modified:
Friday, 10 July, 2026
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सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय (MIB) द्वारा टेलीविजन ऑडियंस रेटिंग्स (TV Ratings) पर रोक लगाने के फैसले के बाद ब्रॉडकास्ट ऑडियंस रिसर्च काउंसिल (BARC) को हर तिमाही 7.5 करोड़ रुपये से ज्यादा के सीधे रेवेन्यू नुकसान का सामना करना पड़ सकता है। मंत्रालय ने यह फैसला तब तक के लिए लिया है, जब तक BARC सरकार की नई टेलीविजन रेटिंग एजेंसी (Television Rating Agencies) पॉलिसी के तहत अपना पंजीकरण (Registration) नहीं करा लेता।

फिलहाल BARC को होने वाला सीधा वित्तीय नुकसान इसलिए होगा क्योंकि मंत्रालय ने उसे निर्देश दिया है कि रेटिंग्स बंद रहने की अवधि के दौरान वह न्यूज चैनलों से किसी तरह का सब्सक्रिप्शन शुल्क न वसूले। हालांकि, इंडस्ट्री से जुड़े एक्सपर्ट्स का मानना है कि यदि यह रोक लंबे समय तक जारी रहती है तो इसका असर सिर्फ BARC की कमाई तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि मीडिया प्लानिंग, विज्ञापन डील और विज्ञापन अभियानों के प्रदर्शन को मापने की पूरी प्रक्रिया प्रभावित होगी। साथ ही विज्ञापन बजट का बड़ा हिस्सा डिजिटल प्लेटफॉर्म की ओर जा सकता है।

बाद में मंत्रालय ने इस रोक का दायरा केवल न्यूज चैनलों तक सीमित नहीं रखा, बल्कि इसे सभी टीवी चैनलों और सभी जॉनर पर लागू कर दिया। यानी अब BARC के नए नियमों के तहत पंजीकरण होने तक किसी भी टीवी चैनल की रेटिंग जारी नहीं होगी।

इंडस्ट्री से जुड़े कई अधिकारियों का कहना है कि जब रेटिंग्स दोबारा शुरू होंगी, तब कई न्यूज ब्रॉडकास्टर्स BARC से अपने सब्सक्रिप्शन बिलों में समायोजन (Adjustment) की मांग कर सकते हैं। चूंकि मंत्रालय ने साफ निर्देश दिया है कि रेटिंग्स बंद रहने के दौरान न्यूज चैनलों से कोई शुल्क नहीं लिया जाएगा, इसलिए चैनल यह चाहेंगे कि उस अवधि की फीस भविष्य के तिमाही बिलों में समायोजित कर दी जाए, न कि नया बिल जारी किया जाए।

अधिकारियों का कहना है कि अधिकांश न्यूज नेटवर्क उस अवधि का सब्सक्रिप्शन शुल्क नहीं देना चाहेंगे, जब रेटिंग्स उपलब्ध नहीं थीं। इसके बजाय वे आने वाले बिलों में उसी हिसाब से राशि कम करने की मांग करेंगे।

हालांकि, इंडस्ट्री से जुड़े एक्सपर्ट्स का मानना है कि इस रुकावट से देश में कुल विज्ञापन खर्च (Advertising Spend) में कोई बड़ी कमी नहीं आएगी। लेकिन विज्ञापन बजट का बंटवारा जरूर बदलेगा। इसका सबसे ज्यादा असर छोटे टीवी चैनलों और विशेष श्रेणी (Niche) के चैनलों पर पड़ सकता है, जबकि बड़े टीवी नेटवर्क और डिजिटल प्लेटफॉर्म को इसका फायदा मिल सकता है।

BARC के रेवेन्यू मॉडल पर बढ़ा दबाव

रेटिंग्स पर लगी रोक के बाद BARC का सब्सक्रिप्शन आधारित रेवेन्यू मॉडल भी चर्चा में आ गया है।

वित्त वर्ष 2026-27 के लिए BARC की प्राइसिंग पॉलिसी के अनुसार, उसकी कमाई कई स्रोतों से होती है। इसमें ब्रॉडकास्टर्स से मिलने वाला सब्सक्रिप्शन शुल्क, विज्ञापन से जुड़ा सेस (Cess), प्रीमियम एनालिटिक्स सेवाएं और यूजर लाइसेंस शुल्क शामिल हैं।

इस मॉडल का सबसे अहम हिस्सा ड्यूल-थ्रेशोल्ड प्राइसिंग सिस्टम है। इसके तहत किसी भी ब्रॉडकास्टर को हर साल या तो अपनी नेट टीवी विज्ञापन आय का 0.8 फीसदी देना होता है या फिर प्रति चैनल 20 लाख रुपये, जो भी राशि अधिक हो। इस व्यवस्था का मकसद यह सुनिश्चित करना है कि जिन चैनलों की विज्ञापन आय कम है, वे भी कम से कम तय न्यूनतम शुल्क का भुगतान करें।

उदाहरण के तौर पर, यदि किसी चैनल की सालाना विज्ञापन आय 25 करोड़ रुपये है, तब भी उसे 20 लाख रुपये का न्यूनतम शुल्क देना होगा। वहीं यदि किसी नेटवर्क की विज्ञापन आय 100 करोड़ रुपये है, तो उसे 0.8 फीसदी के हिसाब से लगभग 80 लाख रुपये का भुगतान करना पड़ेगा। सब्सक्रिप्शन फीस के अलावा BARC अपने प्रीमियम डेटा प्रोडक्ट्स के लिए भी अलग से शुल्क लेता है। 

BARC के Prime Package में दर्शकों से जुड़े आंकड़े (Audience Analytics), कार्यक्रमों का विश्लेषण (Programme Analysis) और व्युअरशिप रिपोर्टिंग जैसी सुविधाएं शामिल होती हैं। वहीं, इससे ऊपर का Supreme Package और ज्यादा एडवांस एनालिटिक्स उपलब्ध कराता है। इसमें स्विचिंग-ग्रिड एनालिसिस (Switching Grid Analysis), बिहेवियरल टारगेटिंग (Behavioural Targeting) और व्यक्तिगत दर्शक विश्लेषण (Individual Viewership Analysis) जैसी सेवाएं शामिल हैं।

इसके अलावा BARC अपनी SpotTrek सेवाओं के जरिए भी कमाई करता है। इसके तहत किसी चैनल के कमर्शियल स्पॉट ट्रैकिंग के लिए सालाना 2 लाख रुपये और कमर्शियल के साथ प्रमोशनल स्पॉट ट्रैकिंग के लिए 3 लाख रुपये शुल्क लिया जाता है। इसके अलावा प्रति स्पॉट इस्तेमाल के आधार पर भी शुल्क लिया जाता है, जिसकी शुरुआत 7 रुपये प्रति स्पॉट से होती है।

BARC यूजर लाइसेंस (User Licence) के लिए भी अलग से शुल्क लेता है। यह शुल्क सब्सक्राइबर की कमाई के आधार पर तय होता है। यदि किसी संस्था को तय सीमा से अधिक यूजर जोड़ने होते हैं, तो प्रत्येक अतिरिक्त यूजर के लिए 60 हजार रुपये सालाना का शुल्क देना पड़ता है।

विज्ञापन खर्च कम नहीं होगा, लेकिन उसका बंटवारा बदल जाएगा

Thoth Advisors के मैनेजिंग पार्टनर और BARC इंडिया के पूर्व CEO पार्थो दासगुप्ता का मानना है कि रेटिंग्स पर रोक लगने से देश में कुल विज्ञापन खर्च कम होने की संभावना नहीं है, लेकिन विज्ञापन का पैसा अलग-अलग प्लेटफॉर्म पर नए तरीके से बंटेगा।

उन्होंने कहा, "मुझे नहीं लगता कि कुल विज्ञापन खर्च में कोई कमी आएगी। हां, यह जरूर है कि विज्ञापन का पैसा एक जगह से दूसरी जगह जाएगा। सबसे ज्यादा फायदा बड़े खिलाड़ियों यानी डिजिटल और बड़े टीवी नेटवर्क को होगा, जबकि छोटे चैनलों और छोटे जॉनर को नुकसान उठाना पड़ेगा।"

हालांकि उन्होंने चेतावनी दी कि BARC की अपनी आय जरूर प्रभावित होगी, क्योंकि उसकी कमाई सीधे तौर पर टीवी विज्ञापन और ब्रॉडकास्टर्स के सब्सक्रिप्शन शुल्क पर निर्भर करती है।

उन्होंने कहा, "जहां तक टीवी की कमाई और BARC की आय का सवाल है, क्योंकि BARC की कमाई टीवी विज्ञापन रेवेन्यू का एक प्रतिशत होती है, इसलिए बड़े खिलाड़ियों को फायदा होगा और छोटे खिलाड़ियों को नुकसान होगा। अगर सरकार न्यूज चैनलों की तरह सब्सक्रिप्शन पर रोक लगाए रखती है, तो इस दौरान BARC की कमाई पूरी तरह प्रभावित होगी। मुझे लगता है कि इस स्थिति का सबसे बड़ा फायदा बड़े डिजिटल प्लेटफॉर्म को मिलेगा।"

7.5 करोड़ रुपये का तिमाही नुकसान तो सिर्फ शुरुआत है

Chrome Data Analytics के फाउंडर पंकज कृष्णा के अनुसार, BARC की सालाना कमाई करीब 300 करोड़ रुपये है। इसमें न्यूज चैनलों की हिस्सेदारी लगभग 10 फीसदी, यानी करीब 30 करोड़ रुपये सालाना है।

उन्होंने कहा, "अगर BARC की रेटिंग्स एक तिमाही तक बंद रहती हैं, तो इसका असर दो स्तर पर देखा जाना चाहिए। पहला, BARC की अपनी सब्सक्रिप्शन आय पर और दूसरा, पूरे विज्ञापन इंडस्ट्री में मीडिया प्लानिंग को लेकर पैदा होने वाली अनिश्चितता पर।"

इन आंकड़ों के आधार पर सिर्फ न्यूज चैनलों से मिलने वाले सब्सक्रिप्शन पर रोक के कारण BARC को एक तिमाही में करीब 7.5 करोड़ रुपये का सीधा नुकसान होगा।

पंकज कृष्णा ने कहा, "यह तो केवल तुरंत दिखाई देने वाला नुकसान है। लेकिन इसका असर इससे कहीं ज्यादा बड़ा होगा। अगर एक तिमाही तक रेटिंग्स उपलब्ध नहीं रहतीं, तो विज्ञापनदाता, मीडिया एजेंसियां और ब्रॉडकास्टर्स सभी को कैंपेन प्लानिंग, विज्ञापन दरें तय करने, बेंचमार्क बनाने और प्रदर्शन का मूल्यांकन करने में अनिश्चितता का सामना करना पड़ेगा।"

उन्होंने यह भी कहा कि सरकार का यह कदम मौजूदा टीवी ऑडियंस मेजरमेंट सिस्टम की विश्वसनीयता को लेकर उठ रहे गंभीर सवालों की ओर इशारा करता है।

पंकज कृष्णा ने कहा, "डेटा पर रोक लगाने का फैसला मौजूदा मेजरमेंट सिस्टम की विश्वसनीयता और मजबूती को लेकर उठी चिंताओं से जुड़ा हुआ लगता है। 'लैंडिंग पेज' विवाद लंबे समय से खासकर न्यूज चैनलों में चर्चा का विषय रहा है। ऐसे मामलों में चैनलों की जबरन दृश्यता (Forced Visibility) दर्शकों के देखने के व्यवहार को प्रभावित कर सकती है। इसके अलावा इंडस्ट्री अभी भी पुराने हार्डवेयर आधारित मेजरमेंट सिस्टम पर निर्भर है, जो आज के मल्टी-प्लेटफॉर्म कंटेंट माहौल के लिए पर्याप्त नहीं माना जा सकता।"

यह सिर्फ रेटिंग्स का संकट नहीं, भरोसे का संकट भी है

रेटिंग्स पर लगी रोक के बाद एक बार फिर यह बहस तेज हो गई है कि क्या भारत को दूसरी ऑडियंस मेजरमेंट एजेंसी की जरूरत है।

Sales Strategist LLP के फाउंडर और कनेक्टेड टीवी (CTV) विशेषज्ञ विशाल खन्ना का मानना है कि केवल दूसरी रेटिंग एजेंसी बना देने से इंडस्ट्री की मूल समस्याएं खत्म नहीं होंगी।

उन्होंने कहा, "क्या हमें दूसरी रेटिंग एजेंसी चाहिए? कागज पर देखें तो जवाब हां है। लेकिन हकीकत यह है कि पूरी दुनिया में ऑडियंस मेजरमेंट का कारोबार लगभग एकाधिकार (Monopoly) वाला रहा है। भारत में हम पहले A-MAP और TAM जैसी एजेंसियां भी देख चुके हैं। असली सवाल प्रतिस्पर्धा का नहीं है, बल्कि यह है कि दूसरी मेजरमेंट प्रणाली के लिए पैसा कौन देगा।"

विशाल खन्ना के अनुसार, असली समस्या इंडस्ट्री की गवर्नेंस व्यवस्था में है।

उन्होंने कहा, "यह सिर्फ रेटिंग्स का संकट नहीं है, बल्कि भरोसे की व्यवस्था (Trust Architecture) का संकट है, जो रेटिंग्स के रूप में दिखाई दे रहा है। BARC की असली समस्या कभी सिर्फ एक CEO या किसी एक नियम की नहीं रही। असली समस्या यह है कि जिन लोगों को मापा जा रहा है, वही लोग मापने वाले सिस्टम के मालिक भी हैं। यानी हर हाल में फायदा उन्हीं का होता है।"

उन्होंने सरकार की भूमिका पर भी सवाल उठाए। उनका कहना था, "दुनिया के ज्यादातर देशों में सरकारें ऑडियंस मेजरमेंट का काम नहीं करतीं। यह सरकार का काम नहीं है कि वह इस कारोबार में सीधे दखल दे।"

भारत के मेजरमेंट सिस्टम को आधुनिक बनाने का मौका

इंडस्ट्री के कई अनुभवी लोगों का मानना है कि मौजूदा स्थिति भारत के टेलीविजन ऑडियंस मेजरमेंट सिस्टम को आधुनिक बनाने का बड़ा अवसर भी साबित हो सकती है। पार्थो दासगुप्ता ने बताया कि BARC ने 2017-18 के दौरान डिजिटल ऑडियंस मेजरमेंट का पायलट प्रोजेक्ट भी चलाया था, लेकिन बाद में इसे बंद कर दिया गया।

उन्होंने कहा, "इस समस्या का समाधान दो चरणों में हो सकता है। सबसे पहले BARC को मंत्रालय की सभी शर्तें पूरी करनी चाहिए और जल्द से जल्द नए नियमों के तहत पंजीकरण हासिल करना चाहिए। इसमें वे सभी बिंदु शामिल हैं जिनका उल्लेख सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने किया है। BARC ने 2017-18 में डिजिटल रेटिंग सर्विस का सफल पायलट भी किया था, लेकिन बाद में बोर्ड ने उस परियोजना को रोक दिया। अगर उस समय मिले अनुभवों को लागू किया गया होता तो आज स्थिति अलग हो सकती थी।"

उन्होंने कहा कि दूसरा चरण इससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण है। उनके मुताबिक, अब भारत को ऐसे डेटरमिनिस्टिक (Deterministic) और आउटकम-आधारित (Outcome-Based) ऑडियंस मेजरमेंट सिस्टम की ओर बढ़ना चाहिए, जो टीवी, OTT और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर बदलते दर्शकों के व्यवहार को सही तरीके से माप सके।

दासगुप्ता ने कहा, "अब मेजरमेंट सिस्टम को ज्यादा सटीक और नतीजों पर आधारित बनाना होगा। पूरी दुनिया इसी दिशा में आगे बढ़ रही है। इससे भारत के OTT और डिजिटल प्लेटफॉर्म को भी फायदा होगा और सभी प्लेटफॉर्म के लिए समान अवसर (Level Playing Field) तैयार होगा। दुनिया में इस दिशा में बदलाव हो रहे हैं और अब भारत को भी अंतरराष्ट्रीय मानकों के साथ कदम मिलाना होगा।"

ब्रॉडकास्टर्स और विज्ञापनदाताओं पर पड़ेगा व्यापक असर

रेटिंग्स पर लगी रोक का असर केवल BARC की सब्सक्रिप्शन आय तक सीमित नहीं रहेगा। इसका प्रभाव पूरे टेलीविजन इंडस्ट्री और विज्ञापन बाजार पर भी पड़ेगा। टेलीविजन रेटिंग्स आज भी विज्ञापन इंडस्ट्री की साझा मुद्रा (Common Currency) मानी जाती हैं। विज्ञापन दरें तय करने, मीडिया प्लानिंग करने, विज्ञापन सौदों पर बातचीत करने और किसी कैंपेन की सफलता का आकलन करने के लिए इन्हीं रेटिंग्स का सबसे ज्यादा इस्तेमाल होता है।

एक्सपर्ट्स का मानना है कि बड़े जनरल एंटरटेनमेंट चैनल (GEC) और बड़े टीवी नेटवर्क, जिनके विज्ञापनदाताओं के साथ पहले से मजबूत संबंध हैं, इस स्थिति का सामना अपेक्षाकृत बेहतर तरीके से कर सकते हैं।

लेकिन छोटे ब्रॉडकास्टर्स और विशेष श्रेणी (Niche) के चैनलों पर इसका दबाव बढ़ सकता है। रेटिंग्स उपलब्ध नहीं होने की स्थिति में विज्ञापनदाता अपने बजट का बड़ा हिस्सा उन डिजिटल प्लेटफॉर्म की ओर मोड़ सकते हैं, जहां अब भी रियल-टाइम परफॉर्मेंस मेजरमेंट उपलब्ध है।

इंडस्ट्री के जानकारों का कहना है कि यदि यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है, तो छोटे चैनलों के लिए विज्ञापन जुटाना और अपनी दर्शक संख्या साबित करना और भी मुश्किल हो सकता है।

अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या यह रोक सिर्फ कुछ समय के लिए लगाया गया एक नियामकीय (Regulatory) कदम साबित होगी या फिर यह भारत के ऑडियंस मेजरमेंट सिस्टम में बड़े बदलाव की शुरुआत बनेगी।

इसका जवाब काफी हद तक इस बात पर निर्भर करेगा कि BARC नई Television Rating Agencies Policy के तहत कितनी जल्दी अपना पंजीकरण हासिल करता है और क्या इस दौरान पूरा इंडस्ट्री मिलकर लंबे समय से उठ रहे गवर्नेंस, पारदर्शिता (Transparency) और टीवी, OTT व डिजिटल प्लेटफॉर्म के लिए एकीकृत ऑडियंस मेजरमेंट जैसे मुद्दों का स्थायी समाधान निकालने की दिशा में आगे बढ़ता है।

इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स का मानना है कि यदि इस अवसर का सही इस्तेमाल किया गया, तो भारत का ऑडियंस मेजरमेंट सिस्टम पहले से ज्यादा आधुनिक, पारदर्शी और भरोसेमंद बन सकता है। वहीं, अगर सुधारों में देरी हुई तो इसका असर सिर्फ BARC तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरे टेलीविजन और विज्ञापन इंडस्ट्री को लंबे समय तक इसकी कीमत चुकानी पड़ सकती है।

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हैप्पी बर्थडे शेखर गुप्ता: बदलते मीडिया दौर के साथ बनाई अपनी अलग पहचान

भारतीय पत्रकारिता के जाने-माने नाम शेखर गुप्ता का आज जन्मदिन है। करीब पांच दशक के उनके पत्रकारिता करियर में रिपोर्टिंग, संपादन और मीडिया संस्थान खड़ा करने के कई अहम पड़ाव रहे हैं।

Last Modified:
Wednesday, 26 August, 2026
Shekhar Gupta

भारतीय पत्रकारिता के जाने-माने नाम शेखर गुप्ता आज 69 साल के हो गए हैं। करीब पांच दशक के उनके पत्रकारिता करियर में रिपोर्टिंग, संपादन और मीडिया संस्थान खड़ा करने के कई अहम पड़ाव रहे हैं। प्रिंट पत्रकारिता से शुरू हुआ उनका सफर टेलीविजन और फिर डिजिटल मीडिया तक पहुंचा। बदलते मीडिया दौर के साथ खुद को ढालते हुए उन्होंने पत्रकारिता में अपनी अलग पहचान बनाई।

शेखर गुप्ता का जन्म 1957 में हुआ। उन्होंने पंजाब यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता की पढ़ाई की और 1977 में द इंडियन एक्सप्रेस (The Indian Express) के चंडीगढ़ संस्करण में बतौर जूनियर रिपोर्टर अपने करियर की शुरुआत की। महज तीन साल बाद, 23 साल की उम्र में उन्हें पूर्वोत्तर भारत भेजा गया। उस समय यह इलाका जातीय संघर्ष और राजनीतिक अस्थिरता से गुजर रहा था।

असम में उनकी रिपोर्टिंग, जिसमें नेल्ली नरसंहार भी शामिल था, ने उनके पत्रकारिता के नजरिए को गहराई से प्रभावित किया। इसी दौर की रिपोर्टिंग आगे चलकर उनकी पहली किताब ‘Assam: A Valley Divided’ का आधार बनी, जो 1984 में प्रकाशित हुई।

शुरुआती दौर में ही शेखर गुप्ता ने कठिन और चुनौतीपूर्ण असाइनमेंट करने वाले रिपोर्टर के रूप में पहचान बनाई। राजनीति और राष्ट्रीय सुरक्षा में उनकी विशेष रुचि रही और वह घटनाओं को केवल सरकारी बयानों के आधार पर समझने के बजाय जमीन पर जाकर देखने और समझने पर जोर देते रहे।

दुनिया की बड़ी घटनाओं की रिपोर्टिंग: इंडिया टुडे (India Today) में रिपोर्टर और संपादक के तौर पर शेखर गुप्ता ने 20वीं सदी के आखिरी दशकों की कई महत्वपूर्ण घटनाओं को कवर किया। इनमें ऑपरेशन ब्लू स्टार, श्रीलंका के तमिल उत्तर में उग्रवाद, तियानमेन स्क्वायर का छात्र विद्रोह, बर्लिन की दीवार का गिरना, पहला खाड़ी युद्ध और अफगानिस्तान का संघर्ष शामिल रहे।

उन्होंने पाकिस्तान से भी बड़े पैमाने पर रिपोर्टिंग की और भारत में LTTE के प्रशिक्षण शिविरों का पता लगाया। उस दौर में 24 घंटे चलने वाले न्यूज चैनल और सोशल मीडिया नहीं थे। ऐसे समय में किसी संघर्ष क्षेत्र तक पहुंचना, प्रत्यक्ष जानकारी जुटाना और भरोसेमंद सूत्र विकसित करना पत्रकारिता की सबसे बड़ी ताकत मानी जाती थी।

द इंडियन एक्सप्रेस (The Indian Express) में लंबी पारी:  संघर्ष और फील्ड रिपोर्टिंग से आगे शेखर गुप्ता ने खुद को एक मजबूत संपादकीय नेतृत्वकर्ता के तौर पर भी स्थापित किया। वह दोबारा द इंडियन एक्सप्रेस (The Indian Express) से जुड़े और करीब 19 वर्षों तक इसके एडिटर-इन-चीफ रहे। इसके साथ ही उन्होंने 13 वर्षों तक चीफ एग्जिक्यूटिव की जिम्मेदारी भी संभाली।

द इंडियन एक्सप्रेस में उनके कार्यकाल के दौरान भारतीय मीडिया तेजी से बदल रहा था। टेलीविजन न्यूज का विस्तार हो रहा था, निजी पूंजी का प्रवेश बढ़ रहा था और इंटरनेट पारंपरिक मीडिया के लिए नई चुनौती बनकर सामने आ रहा था। इस दौर में शेखर गुप्ता की पहचान ऐसे संपादक के रूप में बनी, जो रिपोर्टिंग की ताकत और पत्रकारिता की विश्वसनीयता को खास महत्व देते थे।

‘National Interest’ से बनी अलग पहचान: उनका साप्ताहिक कॉलम ‘National Interest’ भी उनकी पत्रकारिता का अहम हिस्सा रहा। इसमें उन्होंने राजनीति, सुरक्षा, अर्थव्यवस्था, विदेश नीति और समाज से जुड़े मुद्दों को एक साथ देखने की कोशिश की। उनके लेखों के चयन को बाद में ‘Anticipating India’ नाम से किताब के रूप में प्रकाशित किया गया। यह कॉलम शेखर गुप्ता की पहचान का एक स्थायी हिस्सा बन गया। इसमें उनका अंदाज विश्लेषणात्मक और स्पष्ट रहा और कई बार उनके विचारों पर असहमति भी देखने को मिली।

‘Walk the Talk’ ने टेलीविजन पर बनाई पहचान: टेलीविजन के दौर में शेखर गुप्ता को एक नई पहचान NDTV 24x7 के कार्यक्रम ‘Walk the Talk’ से मिली। 2003 से 2017 के बीच उन्होंने इस कार्यक्रम में राजनीति, कारोबार, सिनेमा, खेल और सार्वजनिक जीवन से जुड़ी 600 से अधिक हस्तियों से बातचीत की।

कार्यक्रम का अंदाज भी अपने आप में अलग था। मेहमान के साथ चलते हुए बातचीत करने का यह फॉर्मेट सरल दिखाई देता था, लेकिन इसकी खासियत तैयारी, सवालों के बाद किए जाने वाले फॉलो-अप और मेहमानों से सहज तरीके से बातचीत निकालने में थी। बाद में इन बातचीत का एक संग्रह ‘Walk the Talk: Decoding Politicians’ नाम से प्रकाशित हुआ।

संपादक से मीडिया उद्यमी तक:  2014 में द इंडियन एक्सप्रेस से अलग होने के बाद शेखर गुप्ता कुछ समय के लिए India Today Group से वाइस चेयरमैन और एडिटर-इन-चीफ के तौर पर जुड़े। लेकिन उनके करियर का सबसे महत्वपूर्ण बदलाव कुछ वर्षों बाद आया, जब उन्होंने एक बड़े पारंपरिक न्यूज संस्थान का नेतृत्व करने के बाद डिजिटल मीडिया की दुनिया में कदम रखा।

2017 में द प्रिंट (ThePrint) की शुरुआत के साथ शेखर गुप्ता ने खुद को मीडिया उद्यमी के रूप में भी स्थापित किया। यह वह समय था जब डिजिटल मीडिया तेजी से विस्तार कर रहा था और न्यूज की पहुंच, वीडियो की खपत तथा दर्शकों की पसंद तेजी से बदल रही थी। ThePrint को राजनीति, नीति, शासन और सामाजिक बदलाव से जुड़े मुद्दों पर केंद्रित डिजिटल न्यूज प्लेटफॉर्म के तौर पर विकसित किया गया। शेखर गुप्ता ने इस मंच के जरिए डिजिटल दौर में भी पत्रकारिता के मानकों को बनाए रखने पर जोर दिया।

‘Cut the Clutter’ से डिजिटल दर्शकों तक पहुंचे:  ThePrint के साथ शेखर गुप्ता ने खुद भी नए डिजिटल फॉर्मेट अपनाए। उनका नियमित एक्सप्लेनेशन वीडियो शो ‘Cut the Clutter’ डिजिटल दर्शकों के बीच उनकी विश्लेषणात्मक शैली का प्रमुख माध्यम बना। इस कार्यक्रम में नक्शों, ऐतिहासिक संदर्भों, आंकड़ों, रिपोर्टिंग और टिप्पणी के जरिए मौजूदा घटनाओं को समझाने की कोशिश की जाती है। वहीं ‘Off the Cuff’ ने उनकी लंबे इंटरव्यू वाली शैली को डिजिटल दौर में आगे बढ़ाया। आज शेखर गुप्ता ThePrint के Founder, Editor-in-Chief और Chairman हैं। प्रिंट, टेलीविजन और डिजिटल मीडिया—तीनों दौर में उनकी मौजूदगी उन्हें भारतीय पत्रकारिता के उन चुनिंदा संपादकों में शामिल करती है, जिन्होंने मीडिया के बदलते स्वरूप के साथ खुद को लगातार बदला है।

मिल चुके हैं कई सम्मान:  शेखर गुप्ता को पत्रकारिता के क्षेत्र में कई सम्मान मिल चुके हैं। इनमें Inlaks Young Journalist of the Year Award, G.K. Reddy Award for Journalism, Fakhruddin Ali Ahmed Memorial Award for National Integration और वर्ष 2009 में मिला पद्म भूषण शामिल हैं।

वह एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया (Editors Guild of India) के प्रेजिडेंट के तौर पर भी दो कार्यकाल, 2018 से 2020 के बीच, अपनी जिम्मेदारी निभा चुके हैं। करीब पांच दशक तक सार्वजनिक जीवन और पत्रकारिता में सक्रिय रहने वाले किसी भी संपादक की तरह शेखर गुप्ता के विचारों और संपादकीय फैसलों पर प्रशंसा के साथ आलोचना भी हुई है। इसके बावजूद वह सार्वजनिक बहस का लगातार हिस्सा बने रहे हैं।

उनके पूरे करियर में एक चीज लगातार दिखाई देती है-रिपोर्टर का नजरिया। अखबारों का दौर बदला, टेलीविजन आया, डिजिटल प्लेटफॉर्म ने न्यूज के वितरण का तरीका बदल दिया और पत्रकार खुद मीडिया ब्रांड बनने लगे। शेखर गुप्ता ने इन सभी बदलावों के बीच अपने पत्रकारिता के मूल को बनाए रखा।

पढ़ना, सूत्रों से संपर्क बनाए रखना, घटनाओं के पीछे का संदर्भ समझना और खबर को बड़े ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में देखना उनकी पत्रकारिता की खासियतों में शामिल रहा है। जन्मदिन के मौके पर शेखर गुप्ता का यह सफर सिर्फ उनके पदों या उनके द्वारा बनाए गए संस्थानों की वजह से ही उल्लेखनीय नहीं है, बल्कि उस जिज्ञासा और खुद को लगातार नए रूप में ढालने की क्षमता के लिए भी खास है, जिसने उनके भीतर के रिपोर्टर को आज तक जीवित रखा है।

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Amazon समेत चार कंपनयों पर बड़ी कार्रवाई, धतूरे के फल-बीज बेचने पर फूड लाइसेंस सस्पेंड

कर्नाटक खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन विभाग ने Amazon, Swiggy Instamart और BigBasket के फूड लाइसेंस को अगले आदेश तक सस्पेंड कर दिया है।

Last Modified:
Tuesday, 25 August, 2026
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कर्नाटक खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन विभाग ने Amazon, Swiggy Instamart और BigBasket के फूड लाइसेंस को अगले आदेश तक सस्पेंड कर दिया है। यह कार्रवाई इन ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर धतूरे (Datura) के फल और बीजों को इंसानों के खाने के लिए खाद्य उत्पाद के तौर पर लिस्ट किए जाने के बाद की गई है।

विभाग ने मामले की जांच के बाद यह कदम उठाया। अधिकारियों के मुताबिक, धतूरे के फल और बीज जहरीले होते हैं और इनका सेवन लोगों की सेहत के लिए गंभीर खतरा पैदा कर सकता है।

ऑनलाइन बिक रहे थे धतूरे के फल और बीज

नियामक आदेश के मुताबिक, जांच के दौरान अधिकारियों ने पाया कि तीनों प्लेटफॉर्म पर धतूरे के फल और बीज बिक्री के लिए उपलब्ध थे। इनमें से कुछ पैकेट पर FSSAI के फूड लाइसेंस या रजिस्ट्रेशन नंबर भी दर्ज थे। जांच के दौरान अधिकारियों को कुछ गोदामों में धतूरे के फल और बीजों से भरे पैकेट भी मिले। इन्हें ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के जरिए बिक्री और वितरण के लिए रखा गया था।

तुरंत लिस्टिंग हटाने का आदेश

कर्नाटक खाद्य सुरक्षा विभाग ने तीनों कंपनियों को धतूरे को इंसानों के खाने के लिए बेचने वाली सभी लिस्टिंग और विज्ञापन तुरंत हटाने का निर्देश दिया है। इसके साथ ही कंपनियों को धतूरे के फल और बीजों को खाद्य उत्पाद के तौर पर दिखाने, बेचने या वितरित करने पर रोक लगा दी गई है।

विक्रेताओं और सप्लायर्स पर भी कार्रवाई

यह कार्रवाई केवल ऑनलाइन प्लेटफॉर्म तक सीमित नहीं है। विभाग ने इन उत्पादों से जुड़े विक्रेताओं और सप्लायर्स के लाइसेंस और रजिस्ट्रेशन को भी सस्पेंड करने का आदेश दिया है। संबंधित राज्य और केंद्रीय खाद्य सुरक्षा अधिकारियों को भी इन विक्रेताओं और प्रतिष्ठानों के खिलाफ जरूरी कार्रवाई करने के निर्देश दिए गए हैं।

कंपनियों को दिया गया जवाब देने का मौका

जांच के दौरान कंपनियों को अपना पक्ष रखने का मौका भी दिया गया था। आदेश के मुताबिक, Amazon ने कोई जवाब दाखिल नहीं किया, जबकि Swiggy Instamart ने नोटिस के बाद की गई कार्रवाई से जुड़े दस्तावेज जमा करने के लिए अतिरिक्त समय मांगा।

वहीं, BigBasket ने बताया कि उसने धतूरे के फल बेचना बंद कर दिया है। कंपनी ने यह भी कहा कि भविष्य में ऐसे उत्पादों की लेबलिंग में साफ तौर पर 'मानव सेवन के लिए नहीं' (Not for human consumption) लिखा जाएगा। हालांकि, खाद्य सुरक्षा विभाग ने कंपनियों की ओर से दिए गए जवाब और स्पष्टीकरण को संतोषजनक नहीं माना।

अगले आदेश तक जारी रहेगा सस्पेंशन

तीनों प्लेटफॉर्म के फूड लाइसेंस का सस्पेंशन अगले आदेश तक लागू रहेगा। कंपनियों को विभाग के निर्देशों का पालन करने की रिपोर्ट भी जमा करनी होगी। इसके बाद अलग से सुनवाई और आदेश की प्रक्रिया पूरी होने पर ही सस्पेंड किए गए लाइसेंस को बहाल करने पर विचार किया जाएगा।

ऑनलाइन प्लेटफॉर्म की जिम्मेदारी पर उठे सवाल

कर्नाटक की इस कार्रवाई से ऑनलाइन ग्रॉसरी और क्विक-कॉमर्स प्लेटफॉर्म पर बिकने वाले खाद्य उत्पादों की निगरानी को लेकर सवाल खड़े हुए हैं। खासकर ऐसे मामलों में यह जिम्मेदारी महत्वपूर्ण हो जाती है, जहां उत्पाद थर्ड-पार्टी विक्रेताओं के जरिए प्लेटफॉर्म पर बेचे जाते हैं और उनके स्टोरेज या डिलीवरी के लिए प्लेटफॉर्म से जुड़े नेटवर्क का इस्तेमाल किया जाता है।

विभाग ने चेतावनी दी है कि अगर कंपनियां उसके निर्देशों का उल्लंघन करती हैं तो Food Safety and Standards Act, 2006 और संबंधित नियमों के तहत आगे की कार्रवाई की जा सकती है।

बढ़ते ऑनलाइन ग्रॉसरी बाजार के बीच कार्रवाई

भारत में ऑनलाइन ग्रॉसरी और क्विक-कॉमर्स का कारोबार तेजी से बढ़ रहा है। ऐसे प्लेटफॉर्म अब सिर्फ पैकेज्ड फूड ही नहीं, बल्कि कई तरह के खाद्य और घरेलू उत्पाद भी ग्राहकों तक पहुंचा रहे हैं। कर्नाटक की यह कार्रवाई दिखाती है कि खाद्य सुरक्षा से जुड़े नियामक अब डिजिटल मार्केटप्लेस पर मौजूद लिस्टिंग और उनके पीछे काम करने वाली सप्लाई चेन पर भी नजर रख रहे हैं।

 

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हैप्पी बर्थडे सरवेश बागला: डिजिटल मार्केटिंग में बनाई खास पहचान

टेकमैग्नेट आज SEO, PPC, कंटेंट मार्केटिंग और वेब डेवलपमेंट जैसी सेवाएं प्रदान करती है। कंपनी को गूगल प्रीमियर पार्टनर (Google Premier Partner) के रूप में भी पहचान मिली है।

Last Modified:
Monday, 24 August, 2026
sarveshbagla

डिजिटल मार्केटिंग की दुनिया में करीब दो दशक से सक्रिय सरवेश बागला (Sarvesh Bagla) आज अपना जन्मदिन मना रहे हैं। उन्होंने 2006 में टेकमैग्नेट (Techmagnate) की शुरुआत की थी और समय के साथ इसे भारत की जानी-मानी डिजिटल मार्केटिंग एजेंसियों में शामिल किया।

टेकमैग्नेट आज SEO, PPC, कंटेंट मार्केटिंग और वेब डेवलपमेंट जैसी सेवाएं प्रदान करती है। कंपनी को गूगल प्रीमियर पार्टनर (Google Premier Partner) के रूप में भी पहचान मिली है। बागला के नेतृत्व में एजेंसी को विभिन्न इंडस्ट्री ट्रैकर्स ने भारत की प्रमुख SEO और डिजिटल मार्केटिंग एजेंसियों में जगह दी है।

बागला की शैक्षणिक पृष्ठभूमि गणित और टेक्नोलॉजी से जुड़ी रही है। उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदू कॉलेज से गणित में स्नातक किया। इसके बाद उन्होंने इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ प्लानिंग एंड मैनेजमेंट से मास्टर्स ऑफ इंफॉर्मेशन सिस्टम्स और कार्नेगी मेलन यूनिवर्सिटी से मास्टर्स ऑफ साइंस इन इंफॉर्मेशन नेटवर्किंग की पढ़ाई की।

उद्यमिता की दुनिया में आने से पहले वह अमेरिका में वेरिजॉन (Verizon) के साथ सॉफ्टवेयर और सिस्टम्स आर्किटेक्ट के तौर पर काम कर चुके हैं। उन्होंने WFM India की सह-स्थापना की और ब्लॉगर्स व कंटेंट क्रिएटर्स के लिए BlogX भी शुरू किया।

उनके करियर की खास उपलब्धियों में बजाज फिनसर्व (Bajaj Finserv) के साथ किया गया काम भी शामिल है। कंपनी के मुताबिक, टेकमैग्नेट की टीम ने कैंपेन शुरू होने के करीब 18 महीनों के भीतर ‘पर्सनल लोन’ जैसे प्रतिस्पर्धी कीवर्ड पर ब्रांड को शीर्ष रैंकिंग तक पहुंचाने में मदद की।

आज टेकमैग्नेट BFSI, हेल्थकेयर, ऑटोमोटिव और ई-कॉमर्स जैसे क्षेत्रों के लिए डिजिटल मार्केटिंग समाधान उपलब्ध करा रही है। एक सिस्टम आर्किटेक्ट से डिजिटल मार्केटिंग उद्यमी तक बागला का सफर एजेंसी इंडस्ट्री में उनकी अलग पहचान को दर्शाता है।

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FSSAI की कार्रवाई: Marche Retail का लाइसेंस सस्पेंड, SDP Industries के घी की बिक्री पर रोक

खाद्य सुरक्षा को लेकर भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (FSSAI) ने कार्रवाई करते हुए दिल्ली की Marche Retail Pvt Ltd का लाइसेंस 30 दिनों के लिए निलंबित कर दिया है।

Last Modified:
Monday, 24 August, 2026
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खाद्य सुरक्षा को लेकर भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (FSSAI) ने कार्रवाई करते हुए दिल्ली की Marche Retail Pvt Ltd का लाइसेंस 30 दिनों के लिए निलंबित कर दिया है। इसके अलावा दमन की SDP Industries Pvt Ltd को अपने घी उत्पादों की बिक्री करने से रोक दिया गया है।

FSSAI ने रविवार को बताया कि Marche Retail के परिसर में निरीक्षण और उसके बाद की जांच में खाद्य सुरक्षा नियमों से जुड़े कई मामलों में कमियां पाई गईं।

कई स्तरों पर मिली कमियां

नियामक के मुताबिक, Marche Retail के यहां मिली कमियां सिर्फ किसी एक हिस्से तक सीमित नहीं थीं। जांच में प्रतिष्ठान के डिजाइन और संचालन से जुड़े नियमों, साफ-सफाई, कर्मचारियों की व्यक्तिगत स्वच्छता, फूड हैंडलर्स की ट्रेनिंग और जरूरी रिकॉर्ड रखने से जुड़े नियमों में भी खामियां सामने आईं।

FSSAI ने इन कमियों को खाद्य सुरक्षा नियमों के अनुपालन से जुड़ी गंभीर चूक के तौर पर देखा और इसके बाद कंपनी के लाइसेंस को 30 दिनों के लिए निलंबित करने की कार्रवाई की।

SDP Industries के घी की बिक्री पर रोक

इसके साथ ही FSSAI ने SDP Industries Pvt Ltd, जो दमन में स्थित है, के घी उत्पादों की बिक्री पर भी रोक लगा दी है। यह कार्रवाई खाद्य सुरक्षा नियमों के उल्लंघन को लेकर की गई प्रवर्तन कार्रवाई का हिस्सा है। हालांकि, उपलब्ध जानकारी में SDP Industries के मामले में उल्लंघन की विस्तृत जानकारी नहीं दी गई है।

FSSAI की ताजा कार्रवाई से साफ है कि खाद्य नियामक अब सिर्फ उत्पादों की गुणवत्ता ही नहीं, बल्कि खाद्य कारोबार से जुड़े प्रतिष्ठानों में साफ-सफाई, कर्मचारियों की ट्रेनिंग, व्यक्तिगत स्वच्छता और जरूरी रिकॉर्ड रखने जैसे नियमों के पालन पर भी सख्ती से नजर रख रहा है।

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Dream11 का बड़ा बदलाव, Real-Money Gaming से हटकर अब फैन एंगेजमेंट और फ्री कंटेस्ट पर जोर

Dream11 अपने पहले वाले Real-Money Gaming (RMG) मॉडल से फोकस हटाकर अब स्पोर्ट्स फैंस के लिए कंटेंट, फैन एंगेजमेंट और सोशल गेमप्ले पर ज्यादा ध्यान देगी।

Last Modified:
Monday, 24 August, 2026
Dream11

फैंटेसी स्पोर्ट्स प्लेटफॉर्म Dream11 अपने बिजनेस मॉडल में बड़ा बदलाव करता नजर आ रहा है। कंपनी ने यूजर्स को बताया है कि वह अपने पहले वाले Real-Money Gaming (RMG) मॉडल से फोकस हटाकर अब स्पोर्ट्स फैंस के लिए कंटेंट, फैन एंगेजमेंट और सोशल गेमप्ले पर ज्यादा ध्यान देगी। हालांकि, प्लेटफॉर्म पर फ्री कंटेस्ट जारी रहेंगे।

Dream11 ने यूजर्स को भेजे एक नोटिफिकेशन में कहा है कि वह नए फोकस के साथ खुद को स्पोर्ट्स फैंस के लिए 'सिंगल डेस्टिनेशन' के तौर पर तैयार कर रहा है। कंपनी ने यह भी साफ किया है कि यूजर्स फ्री कंटेस्ट में हिस्सा लेना जारी रख सकते हैं। इसके साथ ही Dream11 ने बताया कि जिन यूजर्स की एक्टिव सब्सक्रिप्शन फीस है, उसे 72 घंटे के भीतर रिफंड कर दिया जाएगा।

क्या Dream11 बंद हो रहा है?

Dream11 के इस ऐलान के बाद सोशल मीडिया पर सवाल उठने लगे हैं कि क्या कंपनी अपना पेड गेमिंग बिजनेस पूरी तरह बंद करने जा रही है या फिर प्लेटफॉर्म का नया वर्जन तैयार किया जा रहा है। हालांकि, कंपनी के नोटिफिकेशन में प्लेटफॉर्म को बंद करने की बात नहीं कही गई है।

फिलहाल कंपनी के संदेश से इतना साफ है कि उसके पुराने मॉडल में बड़ा बदलाव किया जा रहा है। पेड कंटेस्ट और सब्सक्रिप्शन को पीछे किया जा रहा है, जबकि फ्री कंटेस्ट, स्पोर्ट्स कंटेंट, फैन एंगेजमेंट और सोशल गेमप्ले को ज्यादा महत्व दिया जा रहा है।

Online Gaming Act के बीच आया बदलाव

Dream11 का यह कदम ऐसे समय आया है जब भारत का ऑनलाइन गेमिंग सेक्टर रेगुलेटरी अनिश्चितता के दौर से गुजर रहा है। Online Gaming Act, 2025 के बाद रियल-मनी ऑनलाइन गेमिंग को लेकर देश में नियम काफी सख्त हुए हैं।

इस कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई आगे बढ़ रही है। इन मामलों में यह तय होना है कि स्किल और चांस दोनों तरह के पैसे वाले ऑनलाइन गेम्स पर लागू प्रतिबंध आगे भी जारी रहेगा या नहीं। ऐसे माहौल में Dream11 का अपने पुराने रियल-मनी मॉडल से फोकस हटाना इंडस्ट्री के लिए अहम माना जा रहा है।

सोशल मीडिया पर भी चर्चा तेज

Dream11 के ऐलान के बाद सोशल मीडिया पर यूजर्स के बीच तरह-तरह की चर्चाएं शुरू हो गई हैं। कुछ यूजर्स का मानना है कि कंपनी अपने पुराने बिजनेस मॉडल को छोड़ रही है, जबकि कुछ का कहना है कि Dream11 अब खुद को सोशल गेमिंग और स्पोर्ट्स एंटरटेनमेंट प्लेटफॉर्म के तौर पर नए सिरे से पेश कर सकता है।

इस बदलाव का असर पूरे फैंटेसी स्पोर्ट्स सेक्टर पर पड़ने को लेकर भी चर्चा हो रही है। कुछ लोगों का कहना है कि अगर भारत में रियल-मनी गेमिंग प्लेटफॉर्म्स का कारोबार काफी कम होता है, तो खिलाड़ी विदेशी या ऑफशोर गेमिंग सेवाओं की तरफ जा सकते हैं। वहीं, कुछ लोग पूरी तरह प्रतिबंध लगाने के बजाय स्पष्ट रेगुलेशन की मांग कर रहे हैं।

सोशल मीडिया पर एक प्रतिक्रिया में यह सवाल भी उठाया गया कि क्या यह Dream11 के पुराने मॉडल के अंत की शुरुआत है। फैंटेसी स्पोर्ट्स में मनोरंजन और मुकाबले के साथ पैसे जीतने का मौका भी होता था, लेकिन रेगुलेटरी बहस के दौरान इसे लेकर जुए से जुड़े सवाल भी उठते रहे हैं।

फिलहाल बंद नहीं, लेकिन दिशा जरूर बदली

फिलहाल Dream11 की तरफ से आया संदेश कंपनी के बंद होने के बजाय बिजनेस मॉडल में बदलाव की ओर इशारा करता है। सब्सक्रिप्शन फीस को 72 घंटे के भीतर रिफंड करने और फ्री कंटेस्ट जारी रखने की बात के साथ कंपनी अब स्पोर्ट्स फैंस को जोड़ने, कंटेंट और सोशल गेमिंग पर ज्यादा ध्यान देती नजर आ रही है। यानी Dream11 के अगले दौर में फोकस रियल-मनी दांव के बजाय स्पोर्ट्स फैनडम और एंगेजमेंट पर रहने वाला है।

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बॉबी पवार ने लॉन्च किया पहला कविता संग्रह ‘An Empty Heart Is a Loaded Gun’

एडवर्टाइजिंग इंडस्ट्री के जाने-माने नाम बॉबी पवार ने अपने रचनात्मक सफर का एक नया अध्याय शुरू किया है। कविता संग्रह का लॉन्च 21 अगस्त को हुआ, जिसमें एडवर्टाइजिंग व मार्केटिंग जगत के दिग्गज मौजूद रहे।

Last Modified:
Sunday, 23 August, 2026
Bobby Pawar

एडवर्टाइजिंग इंडस्ट्री के जाने-माने नाम बॉबी पवार ने अपने रचनात्मक सफर का एक नया अध्याय शुरू किया है। उन्होंने अपना पहला कविता संग्रह ‘An Empty Heart Is a Loaded Gun’ लॉन्च किया है।

पुस्तक का लॉन्च 21 अगस्त को हुआ, जिसमें एडवर्टाइजिंग और मार्केटिंग जगत के प्रमुख लोग मौजूद रहे। यह पुस्तक कविता के जरिए भावनाओं, रिश्तों, पहचान और मानवीय अनुभवों जैसे विषयों को सामने लाती है।

भारत और अमेरिका में एडवर्टाइजिंग इंडस्ट्री में काम कर चुके बॉबी पवार ने अपने करियर की शुरुआत Ogilvy India से की थी। इसके बाद उन्होंने DDB Mudra, JWT और Publicis जैसी प्रमुख एजेंसियों में वरिष्ठ क्रिएटिव लीडरशिप भूमिकाएं निभाईं।

बॉबी पवार ने नवंबर 2023 तक हवास (Havas) में चेयरमैन और चीफ क्रिएटिव ऑफिसर के तौर पर जिम्मेदारी संभाली। इसके बाद उन्होंने एक स्वतंत्र क्रिएटिव के तौर पर अपनी नई पारी शुरू की और अब अपना कविता संग्रह लॉन्च किया है।

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प्रणय रॉय से अरुण पुरी तक : राहुल कंवल ने गिनाए मीडिया बिल्डर्स

एनडीटीवी के सीईओ राहुल कंवल ने बताया कि मजबूत मीडिया संस्थान बनाने के लिए लीडर को दूसरे पत्रकारों को आगे बढ़ने और चमकने की जगह देनी चाहिए।

Last Modified:
Saturday, 22 August, 2026
rahulkanval

एनडीटीवी (NDTV) के सीईओ और एडिटर-इन-चीफ राहुल कंवल (Rahul Kanwal) ने मीडिया संस्थान खड़ा करने की अपनी नेतृत्व सोच साझा की है। एक्सचेंज4मीडिया के साथ हालिया बातचीत में उन्होंने प्रणय रॉय (Prannoy Roy), अरुण पुरी (Aroon Purie) और राघव बहल (Raghav Bahl) जैसे मीडिया उद्यमियों का उदाहरण देते हुए कहा कि लंबे समय तक टिकने वाले संस्थान वही बना पाते हैं, जहां नेतृत्व दूसरे पत्रकारों और एडिटोरियल ब्रांड्स को उभरने का अवसर देता है।

राहुल कंवल ने बताया कि वह रोजाना प्राइम-टाइम शो की एंकरिंग से जानबूझकर दूर रहते हैं। उनके मुताबिक एडिटर-इन-चीफ को जरूरत पड़ने पर खुद पीछे हटना चाहिए, ताकि न्यूज़रूम में दूसरे लोगों को भी अपनी पहचान बनाने का मौका मिले।

कंवल ने एनडीटीवी (NDTV) में प्रणय रॉय के नेतृत्व का उदाहरण देते हुए कहा कि वह दूसरे पत्रकारों की लोकप्रियता को लेकर असुरक्षित नहीं थे। उनके दौर में राजदीप सरदेसाई (Rajdeep Sardesai), बरखा दत्त (Barkha Dutt) और अरनब गोस्वामी (Arnab Goswami) जैसे पत्रकारों ने अपनी अलग पहचान बनाई।

इसी तरह उन्होंने इंडिया टुडे ग्रुप (India Today Group) के अरुण पुरी का उदाहरण दिया, जिन्होंने प्रभु चावला (Prabhu Chawla) और शेखर गुप्ता (Shekhar Gupta) जैसे संपादकीय चेहरों को आगे बढ़ने की जगह दी। राघव बहल के नेटवर्क18 (Network18) का उल्लेख करते हुए भी उन्होंने मजबूत प्रतिभाओं के साथ संस्थान बनाने की इसी सोच को रेखांकित किया।

कंवल ने कहा कि उनकी अपनी नेतृत्व शैली भी ऐसे लोगों को साथ लाने पर आधारित है, जो अलग-अलग क्षेत्रों में उनसे ज्यादा सक्षम हों। उनके मुताबिक, “आपसे बेहतर लोग ही किसी मूल्यवान संस्थान के निर्माण में योगदान देते हैं।” उन्होंने यह भी कहा कि अगर कोई लीडर असुरक्षा की भावना से अपने से कम सक्षम लोगों को नियुक्त करता रहेगा, तो वह कभी एक महान संगठन नहीं बना पाएगा।

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डियाजियो इंडिया में मोहित चेरियन बने कैटेगरी डायरेक्टर

मोहित चेरियन फरवरी 2020 से डियाजियो इंडिया के साथ जुड़े हुए हैं। कंपनी में अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने ब्रांड मार्केटिंग से जुड़ी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभाली हैं।

Last Modified:
Friday, 21 August, 2026
mohitcheriyan

डियाजियो इंडिया (Diageo India) ने मोहित चेरियन को कैटेगरी डायरेक्टर (Category Director) के पद पर प्रमोट किया है। इससे पहले वह कंपनी में सीनियर जनरल मैनेजर, ब्रांड मार्केटिंग के तौर पर कार्यरत थे और BII Scotches के मार्केटिंग की जिम्मेदारी संभाल रहे थे।

मोहित चेरियन फरवरी 2020 से डियाजियो इंडिया के साथ जुड़े हुए हैं। कंपनी में अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने ब्रांड मार्केटिंग से जुड़ी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभाली हैं। नई जिम्मेदारी में चेरियन डियाजियो इंडिया के कैटेगरी से जुड़े बिजनेस और ब्रांड मार्केटिंग को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।

डियाजियो इंडिया में शामिल होने से पहले चेरियन आदित्य बिड़ला फैशन एंड रिटेल (Aditya Birla Fashion and Retail) के साथ काम कर चुके हैं। वहां उनकी अंतिम भूमिका असिस्टेंट वाइस प्रेसिडेंट और हेड ऑफ मार्केटिंग - Allen Solly की थी।

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हैप्पी बर्थडे श्वेता सिंह: दर्शकों और न्यूज इंडस्ट्री के भरोसे का दूसरा नाम हैं आप

वरिष्ठ टीवी पत्रकार और आजतक व गुड न्यूज टुडे की सीनियर मैनेजिंग एडिटर श्वेता सिंह का आज जन्मदिन है।

Last Modified:
Friday, 21 August, 2026
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वरिष्ठ टीवी पत्रकार और आजतक व गुड न्यूज टुडे की सीनियर मैनेजिंग एडिटर श्वेता सिंह का आज जन्मदिन है। भारतीय मीडिया जगत में श्वेता सिंह एक जाना-पहचाना नाम हैं। बेबाक अंदाज़, गहरी समझ और पेशेवर दक्षता ने उन्हें लाखों दर्शकों की पहली पसंद बना दिया है। जटिल मुद्दों को सहज भाषा में समझाने की उनकी क्षमता और प्रभावशाली एंकरिंग शैली ने उन्हें अलग पहचान दिलाई है।

लगातार मेहनत और समर्पण के दम पर उन्होंने पत्रकारिता में नए मानक स्थापित किए हैं। करीब दो दशक से अधिक समय से पत्रकारिता में सक्रिय श्वेता पिछले करीब दो दशक से ‘आजतक’ परिवार का हिस्सा हैं। उनके लंबे अनुभव और संतुलित प्रस्तुति ने उन्हें न्यूज रूम से लेकर दर्शकों तक हर जगह विशेष स्थान दिलाया है।

टीवी न्यूज़ की लगभग हर विधा में दक्ष श्वेता सिंह को अब तक सर्वश्रेष्ठ एंकर, सर्वश्रेष्ठ प्रड्यूसर और सर्वश्रेष्ठ रिपोर्टर जैसे सम्मान मिल चुके हैं। साल 2016 में उन्होंने अलग-अलग आयोजनों में एक ही वर्ष में 12 अवॉर्ड हासिल कर इतिहास रच दिया था। यह उपलब्धि अब तक पत्रकारिता जगत में मिसाल मानी जाती है।

न्यूज़ ब्रॉडकास्टिंग स्पेस में उनके अनुकरणीय योगदान और निरंतर उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए श्वेता सिंह को प्रतिष्ठित ‘एक्सचेंज4मीडिया न्यूज ब्रॉडकास्टिंग अवॉर्ड्स’ (enba) 2023 में  ‘बेस्ट एंकर–हिंदी’ कैटेगरी में गोल्ड मेडल से नवाजा जा चुका है।

वर्तमान में श्वेता सिंह आजतक पर रात 8 बजे प्रसारित होने वाले प्रमुख शो ‘ख़बरदार’ (Khabardar) की एंकरिंग करती हैं। यह शो उनकी संवाद क्षमता, विश्लेषणात्मक सोच और दर्शकों से गहरे जुड़ाव का प्रमाण है।

राष्ट्रीय सुरक्षा, राजनीति, बिज़नेस, खेल और मनोरंजन—हर विषय पर उनकी पकड़ समान रूप से मजबूत है। यही कारण है कि उनकी रिपोर्टिंग हो या एंकरिंग, दर्शक उन्हें भरोसे के साथ देखते हैं। मशहूर टॉक शो ‘सीधी बात’ की मेजबानी से लेकर स्पेशल प्रोग्राम्स तक, उन्होंने अपनी बहुमुखी प्रतिभा से हर मंच पर अपनी छाप छोड़ी है।

श्वेता सिंह ने हमेशा पत्रकारिता को सिर्फ पेशा नहीं, बल्कि जिम्मेदारी की तरह निभाया है। उनकी निर्भीकता और सटीक विश्लेषण ने उन्हें अलग पहचान दी है। यही वजह है कि वह देश की चुनिंदा पत्रकारों में गिनी जाती हैं, जिनकी बात दर्शक न केवल सुनते हैं, बल्कि उस पर भरोसा भी करते हैं। 

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बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर HC का फैसला, कहा- प्रतिबंध लगाना सरकार की नीति का मामला

बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल को लेकर दिल्ली हाईकोर्ट ने बड़ा रुख अपनाया है। कोर्ट ने कहा है कि बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर रोक लगाना या उसकी पहुंच सीमित करना सरकार की नीति से जुड़ा मामला है।

Last Modified:
Friday, 21 August, 2026
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बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल को लेकर दिल्ली हाईकोर्ट ने बड़ा रुख अपनाया है। कोर्ट ने कहा है कि बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर रोक लगाना या उसकी पहुंच सीमित करना सरकार की नीति से जुड़ा मामला है। ऐसे में इस पर फैसला लेना सरकार के अधिकार क्षेत्र में आता है।

दिल्ली हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने केंद्र सरकार से कहा है कि वह बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल को लेकर उठाई गई चिंताओं और सुझावों पर विचार करे। इसके लिए सरकार सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स और दूसरे संबंधित पक्षों से बातचीत कर सकती है। हालांकि, कोर्ट ने सरकार को इस मुद्दे पर फैसला लेने के लिए कोई समयसीमा तय नहीं की है।

बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर दायर हुई थी PIL

यह मामला एक जनहित याचिका (PIL) के जरिए कोर्ट पहुंचा था। याचिका तीन साल के बच्चे की मां कीर्ति दुआ और बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. शरद गुप्ता ने दायर की थी।

याचिकाकर्ताओं ने बच्चों की सोशल मीडिया तक खुली पहुंच पर चिंता जताते हुए इसमें प्रतिबंध लगाने और बच्चों को ऑनलाइन यौन शोषण से जुड़ी सामग्री यानी Child Sexual Abuse Material (CSAM) से बचाने के लिए ज्यादा मजबूत सुरक्षा व्यवस्था की मांग की थी।

याचिकाकर्ताओं का कहना था कि बच्चों का इंटरनेट पर अश्लील और उम्र के लिहाज से अनुचित सामग्री के संपर्क में आना उनके मानसिक और शारीरिक विकास पर असर डाल सकता है। उन्होंने इसे संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार से भी जोड़ते हुए दलील दी।

संविधान के अनुच्छेद 39(f) का भी दिया हवाला

याचिका में संविधान के अनुच्छेद 39(f) का भी हवाला दिया गया। इसमें राज्य से बच्चों को शोषण से बचाने और उन्हें स्वस्थ तरीके से विकास का अवसर देने की अपेक्षा की गई है।

याचिकाकर्ताओं ने Economic Survey 2025-26 का भी जिक्र किया। इसमें युवाओं के बीच सोशल मीडिया की लत और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी चिंताओं को सामने रखा गया था।

याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि सोशल मीडिया कंपनियों की ओर से अपनाए गए स्वैच्छिक सुरक्षा उपाय पर्याप्त नहीं हैं। उनका कहना था कि बच्चों की सुरक्षा के लिए बाध्यकारी यानी कानूनी तौर पर लागू होने वाले नियमों की जरूरत है।

Meta से भी मजबूत तकनीकी व्यवस्था की मांग

याचिका में Meta को भी निर्देश देने की मांग की गई थी कि वह ऐसी तकनीकी व्यवस्था और ऑडिट सिस्टम लागू करे, जिससे बच्चों के यौन शोषण से जुड़ी आपत्तिजनक सामग्री की पहचान कर उसे जल्द से जल्द हटाया जा सके।

Meta की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अरविंद दातार ने कोर्ट को बताया कि Facebook और Instagram पर CSAM की पहचान और उसे हटाने के लिए पहले से ही कई तकनीकी व्यवस्थाएं लागू हैं।

उनके मुताबिक, Facebook पर CSAM की सक्रिय पहचान की दर 99.5 फीसदी और Instagram पर 95.2 फीसदी है। उन्होंने बताया कि प्लेटफॉर्म ऐसी सामग्री की पहचान के लिए कई तकनीकी तरीकों का इस्तेमाल करते हैं। हालांकि, उन्होंने यह भी माना कि कुछ हानिकारक सामग्री सिस्टम की नजर से बच सकती है।

कोर्ट ने प्रतिबंध लगाने का आदेश नहीं दिया

याचिकाकर्ताओं ने इसके बावजूद ज्यादा मजबूत तकनीकी व्यवस्था और नियमित ऑडिट की मांग की। लेकिन हाईकोर्ट ने बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर सीधे प्रतिबंध लगाने या कोई खास पाबंदी तय करने से इनकार कर दिया।

कोर्ट ने साफ किया कि बच्चों को सोशल मीडिया से दूर रखने या उनकी पहुंच सीमित करने जैसे व्यापक फैसले सरकार की नीतिगत जिम्मेदारी के तहत आते हैं।कोर्ट ने केंद्र सरकार को याचिकाकर्ताओं की चिंताओं और सुझावों पर विचार करने को कहा है। इसके लिए सरकार सोशल मीडिया इंटरमीडियरीज और दूसरे संबंधित पक्षों से सलाह-मशविरा कर सकती है।

अब गेंद केंद्र सरकार के पाले में

हाईकोर्ट के इस आदेश के बाद अब इस मुद्दे पर अगली बड़ी कार्रवाई केंद्र सरकार के स्तर पर होगी। सरकार को बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स की जिम्मेदारी और बच्चों की सोशल मीडिया तक पहुंच को लेकर नियमों पर विचार करना होगा।

हालांकि, कोर्ट ने सरकार को कोई निश्चित समयसीमा नहीं दी है। यानी अभी यह साफ नहीं है कि केंद्र सरकार इस मुद्दे पर कब तक कोई अंतिम नीति या फैसला लेकर आएगी।

फिलहाल दिल्ली हाईकोर्ट ने यह साफ कर दिया है कि बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर पूर्ण प्रतिबंध या अन्य व्यापक पाबंदियां तय करना अदालत का नहीं, बल्कि सरकार के नीति-निर्धारण का विषय है। ऐसे में अब बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा को लेकर बहस का अगला दौर कोर्ट के बजाय नीति के स्तर पर होगा।

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