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दिल्ली में ‘बज़्म-ए-सहाफ़त’ का आयोजन, उर्दू को बताया विरासत की भाषा
दिल्ली में भारत एक्सप्रेस के उर्दू कॉन्क्लेव ‘बज़्म-ए-सहाफ़त’ का उद्घाटन मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने किया। CMD उपेन्द्र राय ने कहा कि उर्दू मजहब की नहीं, विरासत की भाषा है।
समाचार4मीडिया ब्यूरो ।। 3 months ago
राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में बुधवार को भारत एक्सप्रेस के बैनर तले आयोजित उर्दू कॉन्क्लेव ‘बज़्म-ए-सहाफ़त’ में भाषा, संस्कृति और विकास के सवालों पर गहन संवाद हुआ। उद्घाटन रेखा गुप्ता ने किया, जबकि मुख्य वक्ता के रूप में उपेंद्र राय ने उर्दू के सांस्कृतिक पक्ष को मजबूती से सामने रखा।
कार्यक्रम दिल्ली उर्दू अकादमी में दिल्ली सरकार के सहयोग से हुआ, जिसमें राजनीति, मीडिया और साहित्य जगत के कई नामचीन चेहरों ने शिरकत की। अपने संबोधन में मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने दिल्ली को 'मिली-जुली संस्कृति का जीवंत केंद्र' बताते हुए कहा कि राजधानी की गंगा-जमुनी तहजीब को और मजबूत किया जाएगा।
उन्होंने स्वास्थ्य सेवाओं के क्षेत्र में बड़ा ऐलान करते हुए राजधानी में 1100 ‘आरोग्य मंदिर’ स्थापित करने की योजना सार्वजनिक की। मुख्यमंत्री के मुताबिक अब तक 250 केंद्र शुरू हो चुके हैं और आने वाले समय में हर विधानसभा क्षेत्र में औसतन 15 आरोग्य मंदिर होंगे, जिससे आम नागरिकों को प्राथमिक उपचार सुलभ हो सकेगा।
कॉनक्लेव का केंद्र बिंदु बने उपेंद्र राय ने साफ कहा, 'उर्दू किसी एक मजहब की नहीं, यह हमारी विरासत और समृद्ध संस्कृति की भाषा है।' उन्होंने उर्दू की ऐतिहासिक यात्रा का उल्लेख करते हुए बताया कि यह भाषा अलग-अलग सभ्यताओं के संवाद से निखरी और इसकी जड़ें साझी संस्कृति में हैं।
उन्होंने यह भी कहा कि उर्दू को किसी खांचे में बाँधना भाषा और समाज दोनों के साथ अन्याय है। केंद्रीय सामाजिक न्याय राज्य मंत्री ने उर्दू की मधुरता की सराहना की, वहीं कार्यक्रम में मौजूद वरिष्ठ नेताओं और बुद्धिजीवियों ने उर्दू के संरक्षण और आधुनिक माध्यमों में इसकी उपस्थिति बढ़ाने पर जोर दिया।
उर्दू-हिंदी के सांस्कृतिक सेतु के रूप में मीडिया की भूमिका पर भी चर्चा हुई। सीएमडी उपेंद्र राय ने भारत के ज्ञान-वैभव और वैश्विक नेतृत्व की धारणा पर बोलते हुए युवाओं से आत्मविश्वास और सृजनशीलता के साथ आगे बढ़ने का आह्वान किया।
अंत में अल्लामा इक़बाल के शेर का हवाला देते हुए उन्होंने सामूहिक पहचान और सांस्कृतिक गौरव की बात कही। कुल मिलाकर, ‘बज़्म-ए-सहाफ़त’ ने यह संदेश दिया कि उर्दू किसी समुदाय की नहीं, बल्कि साझा विरासत की आवाज़ है और दिल्ली उसकी गवाही देती है।
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