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वरिष्‍ठ पत्रकार राजेश बादल ने कुछ इस तरह याद किया राज्‍यसभा टीवी का सफर 

राजेश बादल एग्जिक्यूटिव डायरेक्टर राज्यसभा टीवी

समाचार4मीडिया ब्यूरो 9 years ago

राजेश बादल
एग्जिक्यूटिव डायरेक्टर
राज्यसभा टीवी
ख़ामोश, लेकिन धड़कती हुई 2016 की यात्रा 
एक साल और गुज़र गया। मीडिया के तमाम रूपों में साल भर के लेखे-जोखे नज़र आ रहे हैं। जो दिखता है, वो बिकता है की तर्ज़ पर। टीआरपी की होड़ में चैनल अपने-अपने लोकप्रिय कार्यक्रमों को दर्शकों के सामने परोस रहे हैं  मैं भी देख रहा हूँ। चुपचाप। राज्यसभा टेलीविजन के पाँच वर्षों के ख़ामोश सफ़र का एक-एक पड़ाव याद आ रहा है।
चार कुर्सियों,  दो कम्प्यूटरों,  पाँच कैमरों, पाँच एडिटिंग मशीनों और कुछ धुनी क़ाबिल सहयोगियों साथ शुरू हुआ यह चैनल कब लोगों के दिलों में धड़कने लगा,  पता ही नहीं चला। न कोई प्रचार,  न विज्ञापन पर ख़र्च,  न कनेक्टिविटी के लिए कोई अभियान। क़रीब-क़रीब सारे चैनलों में तो मार्केटिंग, डिस्ट्रीब्यूशन और आमदनी के लिए विज्ञापन जुटाने वाले अनेक विभाग होते हैं, बड़े-बड़े चेहरे जोड़े जाते हैं,  उनके नाम के साथ प्रोमो और पोस्टर दिखाई देते हैं। राज्यसभा टीवी के साथ तो ऐसा कुछ भी नहीं था। शुरुआत में तो पेशेवर जानकार हमारा मज़ाक़ बनाते थे - अरे ! संसद की प्रोसीडिंग के अलावा क्या दिखा पाओगे ? बिना विज्ञापन के सिर्फ अनुदान पर कैसे चैनल चलेगा। सरकारी दूरदर्शन तक विज्ञापन लेता है। आप विज्ञापन और मार्केटिंग के बिना टीवी इंडस्ट्री में खड़े रह पाएंगे?
ऐसे सवाल कभी-कभी हमें विचलित करते थे,  लेकिन हम डटे रहे । इन सवालों की केंचुली जल्द ही उतर गई। हमारे चन्द पहचाने चेहरे और कुछ एकदम नए चेहरे आज दर्शकों के लिए स्टार बन चुके हैं । चैनल का नाम लेते ही लोगों की आँखों में अपनेपन का भाव हमें एक रिश्ते से बाँध देता है। अपनी तारीफ़ तो सभी करते हैं,  लेकिन यक़ीन मानिए यह बात पीठ थपथपाने के लिए नहीं कर रहा हूँ। जब सुनने को मिलता है कि यही एक चैनल हमारे दिल-दिमाग की बात करता है तो सीना तनिक और चौड़ा हो जाता है। आज भी एक पैसे का विज्ञापन हम नहीं लेते। विज्ञापनों की जगह जनउपयोगी जानकारियाँ देते हैं। दर्शक इन्हें पसंद कर रहे हैं। हमारे एक वरिष्ठ साथी गिरीश निकम इस साल हमसे अलविदा कह गए। जिस दिन उन्होंने चैनल ज्वाइन किया,  उन्हें एक दिन का भी टीवी अनुभव नहीं था। लेकिन जिस दिन वो नहीं रहे,  हमें उनकी लोकप्रियता का अदभुत अहसास हुआ।
समीना अली की शख़्सियत, मोहम्मद इरफ़ान की गुफ़्तगू, अरफ़ा ख़ानम का देशदेशांतर, अमृताराय का सरोकार, अरविन्दसिंह,  अखिलेश सुमन और नीलूव्यास की ज़मीन से जुड़ी समाचार कथाएँ, विनीत दीक्षित की अर्ध सैनिक बलों पर सीरीज़, श्याम सुंदर का आदिवासी समाज पर धारावाहिक -मैं भी भारत, अमृतांशु के लॉ ऑफ द लेंड और कंस्टिट्यूशनली योर्स व कवीन्द्र सचान का तरकश अलग-अलग क्षेत्रों के बेहद सराहे जाने वाले कार्यक्रम हैं। यूरेका में वैज्ञानिकों के साक्षात्कार और विज्ञान बुलेटिन दिखाने वाला राज्यसभा टीवी इकलौता चैनल है।
एंकरिंग से अब तक दूर रहे मीडिया के धुरन्धरों की ख़्याति इस चैनल ने राष्ट्रव्यापी बना दी है। उर्मिलेश, भारतभूषण और सिद्धार्थ वरदराजन, पुरुषोत्तम अग्रवाल और आलोक मेहता जैसे कुछ नाम आदर के साथ लिए जा रहे हैं। भारत के संविधान की कहानी सुनाने वाला भी यही चैनल है। सभी राज्यों के राज्यपालों पर केंद्रित महामहिम राज्यपाल एक धारावाहिक की शक़्ल में पहली बार इसी चैनल पर दिखाई दिया है।
चैनल में परदे के पीछे के अनेक खिलाड़ी होते हैं। उन सबको सलाम। अंत में अपने शो की बात। पाँच साल में विरासत ( पूर्व में उनकी नज़र, उनका शहर नाम से प्रसारित)  ने लोकप्रियता के अनेक कीर्तिमान रचे हैं। इस एक घण्टे के कार्यक्रम में कोई ब्रेक नहीं होता। दर्शक बिना पलक झपकाए इस श्रृंखला को देखते हैं। इस साल गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर पर दो घंटे की फिल्म और ग़ज़ल सम्राट जगजीतसिंह पर पाँच घण्टे की फ़िल्में ख़ास रहीं। हिंदी में तो गुरुदेव पर आज तक इस तरह कोई काम ही नहीं हुआ। क्या यह हैरानी वाली बात नहीं है कि हिंदुस्तान का राष्ट्रगान रचने वाले शिखर पुरुष पर राष्ट्रभाषा में अब तक कोई दस्तावेज़ ही नहीं था। इसी तरह जगजीत सिंह पर इतना शोधपरक काम आज तक नहीं हुआ।
रस्किनबॉन्ड, साहिर लुधियानवी अमृताप्रीतम, मज़रूह सुल्तानपुरी, नीरज, प्रदीप, दुष्यंतकुमार, शरद जोशी, महान कार्टूनिस्ट आरके लक्ष्मण, हिंदी के वाल्टरस्कॉट वृन्दावनलाल वर्मा, राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त, गीतकार शैलेन्द्र, रामधारीसिंह दिनकर, फणीश्वरनाथ रेणु, खुशवंतसिंह, अदाकारा मीनाकुमारी, ज़ोहरा सहगल, महान संपादक राजेन्द्र माथुर और एसपी सिंह जैसे सितारों पर बनी फिल्मों को दर्शकों ने काफी पसंद किया है । यू ट्यूब पर इस श्रृंखला को देखने वालों की संख्या डेढ़ मिलियन याने पन्द्रह लाख पहुँचने जा रही है । अपने आप में यह रिकॉर्ड है। अगले साल मुंशी प्रेमचन्द, केएल सहगल, मेजर ध्यानचंद,  मोहम्मद रफ़ी और पृथ्वीराज कपूर जैसी विभूतियों पर फ़िल्में दिखाई जाएँगी। राज्यसभा टीवी पर नए साल में भी इसी तरह प्यार की बौछार करते रहिए।
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