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सिर्फ सत्ता नहीं, बदलाव की कहानी है ‘Revolutionary Raj’: आलोक मेहता

वरिष्ठ संपादक (पद्मश्री) और जाने-माने लेखक आलोक मेहता ने अपनी कॉफी टेबल बुक “Revolutionary Raj: Narendra Modi’s 25 Years” से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर समाचार4मीडिया से खास बातचीत की है।

pankaj sharma 2 days ago

वरिष्ठ संपादक (पद्मश्री) और जाने-माने लेखक आलोक मेहता की नई कॉफी टेबल बुक “Revolutionary Raj: Narendra Modi’s 25 Years” हाल ही में प्रकाशित हुई है। शुभी पब्लिकेशंस द्वारा प्रकाशित इस पुस्तक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सार्वजनिक जीवन के 25 वर्षों (गुजरात के नेतृत्व से लेकर देश की बागडोर संभालने तक) की राजनीतिक, प्रशासनिक और वैचारिक यात्रा का विश्लेषण किया गया है। इस पुस्तक की भूमिका केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने लिखी है। इस पुस्तक से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर समाचार4मीडिया ने आलोक मेहता से विस्तार से बातचीत की। प्रस्तुत हैं इस विशेष बातचीत के प्रमुख अंश:

आपको यह किताब “Revolutionary Raj: Narendra Modi’s 25 Years” लिखने का विचार कैसे आया? इसे तैयार करने में कितना समय लगा और इसके नाम के पीछे क्या सोच है?

यह विचार मूल रूप से पब्लिशर शुभी पब्लिकेशंस की ओर से आया। वे पहले भी मेरी पुस्तक “नमन नर्मदा” प्रकाशित कर चुके हैं, जिसकी भूमिका स्वयं प्रधानमंत्री ने लिखी थी। उनका सुझाव था कि मैं वर्षों से अखबारों और विभिन्न मंचों पर जो विश्लेषण लिखता रहा हूँ, उसे एक व्यवस्थित और प्रेज़ेंटेबल कॉफी टेबल बुक के रूप में संकलित किया जाए।

मैंने सोचा कि पिछले 25 वर्षों में नरेंद्र मोदी की सार्वजनिक यात्रा (गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में 13 वर्ष और उसके बाद प्रधानमंत्री के रूप में कार्यकाल) को एक समग्र परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए। यह केवल 10 वर्षों का नहीं, बल्कि 25 वर्षों के प्रशासनिक अनुभव का विश्लेषण है।

जहां तक नाम की बात है, “Revolutionary Raj” का आशय केवल सत्ता से नहीं, बल्कि उस परिवर्तन से है जो सामाजिक, प्रशासनिक और विकासात्मक स्तर पर दिखाई देता है। क्रांति केवल राजनीतिक उथल-पुथल नहीं होती; पंचायत से लेकर कश्मीर और नॉर्थ-ईस्ट तक जो बदलाव आए, वे भी एक प्रकार का परिवर्तन हैं।

इस किताब की खासियत क्या है, जो पाठकों को इसे पढ़ने के लिए प्रेरित करे?

यह एक विश्लेषणात्मक संदर्भ पुस्तक है। इसमें पंचायत स्तर पर हुए बदलाव, ग्रामीण विकास, बिजली-पानी की उपलब्धता, औद्योगिक विकास, सामाजिक सुधार, स्वास्थ्य योजनाएँ जैसे आयुष्मान भारत, शिक्षा और विदेश नीति—इन सभी पहलुओं को समेटने की कोशिश की गई है। मैं स्वयं एक छोटे गांव से आया हूँ, जहां कभी सड़क, पानी और बिजली जैसी सुविधाएं नहीं थीं। आज जो परिवर्तन दिखता है, उसे एक पत्रकार की दृष्टि से समझना जरूरी है। यह पुस्तक उसी परिवर्तन को परखने और समझने का प्रयास है।

क्या इसमें आलोचनात्मक दृष्टिकोण को भी जगह दी गई है?

यह पुस्तक मेरी दृष्टि से लिखा गया विश्लेषण है। मैंने केवल उपलब्धियों की सूची नहीं बनाई, बल्कि चुनौतियों और समस्याओं का भी उल्लेख किया है—जैसे कश्मीर की परिस्थितियाँ, नॉर्थ-ईस्ट की जटिलताएँ, आतंकवाद और विदेश नीति से जुड़ी चुनौतियां। मेरा मानना है कि पत्रकार का काम केवल आलोचना करना नहीं, बल्कि सकारात्मक परिवर्तनों को भी दर्ज करना है। यदि समाज में 80 प्रतिशत सुधार हुआ है और 20 प्रतिशत समस्याएं हैं, तो दोनों को संतुलित रूप में देखना चाहिए।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह को जब आपने यह पुस्तक भेंट की, तो उनकी क्या प्रतिक्रिया रही?

प्रधानमंत्री जी के लिए यह एक सरप्राइज़ था। इस बारे में मैंने पहले कोई औपचारिक चर्चा नहीं की थी। उन्होंने इसे सकारात्मक रूप से लिया और इस बात पर सहमति जताई कि ऐसी पुस्तकों को लाइब्रेरी तक पहुंचना चाहिए ताकि अधिक लोग पढ़ सकें। अमित शाह जी से भी चर्चा के दौरान मैंने यही आग्रह किया कि लाइब्रेरी सिस्टम को प्रोत्साहित किया जाए। यह किसी सरकार द्वारा प्रायोजित पुस्तक नहीं है, बल्कि एक स्वतंत्र पत्रकार का विश्लेषण है।

क्या आपको लगता है कि मीडिया इन विकासात्मक पहलुओं को पर्याप्त गहराई से नहीं देखता?

मीडिया का स्वभाव आलोचनात्मक होता है और होना भी चाहिए। कमियां उजागर करना उसका दायित्व है। लेकिन साथ ही सकारात्मक बदलावों को भी दर्ज करना जरूरी है। राज्यों में क्षेत्रीय भाषाओं के अखबार कई अच्छे कार्यों को विस्तार से प्रकाशित करते हैं। केवल दिल्ली-केंद्रित दृष्टि से भारत को नहीं देखा जा सकता। विकास और परिवर्तन को संतुलित दृष्टिकोण से देखना आवश्यक है।

डिजिटल दौर में क्या किताबों की प्रासंगिकता कम हो रही है?

मुझे ऐसा नहीं लगता। जब टीवी आया तब कहा गया कि अखबार खत्म हो जाएंगे। जब इंटरनेट आया, तब कहा गया कि किताबें नहीं पढ़ी जाएंगी। लेकिन पुस्तक मेलों में आज भी भारी भीड़ होती है। भारत ही नहीं, दुनिया भर में लोग पढ़ रहे हैं। डिजिटल और पुस्तक—दोनों साथ-साथ चल सकते हैं। पढ़ने की आदत खत्म नहीं हुई है।

क्या इस पुस्तक का हिंदी संस्करण भी आएगा?

यह निर्णय पब्लिशर पर निर्भर करता है। कॉफी टेबल बुक महंगी होती है, इसलिए संभव है कि हिंदी संस्करण अलग प्रारूप में आए। कई लोगों ने इसकी मांग की है। उम्मीद है कि भविष्य में यह हिंदी पाठकों तक भी पहुंचे।

आलोक मेहता के साथ इस पूरी बातचीत को आप यहां विस्तार से सुन/देख सकते हैं।


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