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अब ‘मैड मेन’ नहीं, ‘मशीन माइंड्स’ का है जमाना: सर मार्टिन सोरेल

S4 Capital के फाउंडर व एग्जिक्यूटिव चेयरमैन सर मार्टिन सोरेल ने डॉ. अनुराग बत्रा से बातचीत में बताया कि एआई के दौर में विज्ञापन जगत में कैसे आगे बढ़ें और कौन-सी बड़ी कंपनियां पिछड़ रही हैं।

समाचार4मीडिया ब्यूरो ।। 2 hours ago

ग्लोबल साम्राज्यों के दौर से लेकर आज के डिजिटल इकोसिस्टम तक, S4 Capital के फाउंडर व एग्जिक्यूटिव चेयरमैन सर मार्टिन सोरेल ने आधुनिक विज्ञापन की हर बड़ी बदलती तस्वीर को करीब से देखा है। साल 2026 में उनका मानना है कि अब मार्केटिंग सर्विसेज की दुनिया में भौगोलिक ताकत से ज्यादा टेक्नोलॉजी की ताकत काम करेगी। यानी आगे कौन टिकेगा और कैसे काम करेगा, यह टेक्नोलॉजी तय करेगी।

पिछले पांच दशकों में सोरेल ने विज्ञापन इंडस्ट्री को बार-बार बदलते देखा है। उनका करियर कई बड़े दौरों से गुजरा है। पहले वह Saatchi & Saatchi में सीएफओ रहे, उस समय बड़े-बड़े ग्लोबल कैंपेन का दौर था। फिर उन्होंने WPP को दुनिया की सबसे बड़ी मार्केटिंग सर्विस कंपनी बनाया। अब वह S4 Capital को डिजिटल और डेटा पर आधारित नए मॉडल के रूप में चला रहे हैं। उनका कहना है कि 2026 में मार्केटिंग सर्विसेज दो बड़ी ताकतों से प्रभावित हो रही है- भूगोल और टेक्नोलॉजी और अब साफ तौर पर टेक्नोलॉजी हावी है। 

वह इंडस्ट्री के पहले बड़े बदलाव को 1970 और 1980 के दशक से जोड़ते हैं, जब रोनाल्ड रीगन और मार्गरेट थैचर के दौर में ग्लोबलाइजेशन तेजी से बढ़ा। उस समय यह माना गया कि दुनिया भर के उपभोक्ता धीरे-धीरे एक जैसे हो जाएंगे। यह बात पूरी तरह सही नहीं निकली, लेकिन ग्लोबलाइजेशन ने ब्रैंड्स और एजेंसियों को दुनिया भर में फैलने का मौका दिया और कई सालों तक ग्रोथ मिली।

सोरेल के मुताबिक अब वह ग्लोबलाइजेशन वाला दौर कमजोर पड़ रहा है। दुनिया में राजनीतिक तनाव है, आर्थिक विकास असमान है, महंगाई बनी हुई है और ब्याज दरें ऊंची हैं। यूरोप की रफ्तार धीमी है, अफ्रीका के कुछ हिस्सों में अस्थिरता है। ऐसे माहौल में कंपनियों के लिए विस्तार करना मुश्किल हो गया है। अब क्लाइंट ज्यादा सतर्क हैं, बजट कम कर दिए गए हैं और हर फैसले से साफ नतीजा और मुनाफा चाहिए। यानी अब खर्च सोच-समझकर हो रहा है और बिना ठोस वजह के कोई जोखिम नहीं लिया जा रहा।

दुनिया जहां एक तरफ देशों और क्षेत्रों में बंटती जा रही है, वहीं दूसरी तरफ टेक्नोलॉजी बहुत तेजी से सब कुछ बदल रही है। इंटरनेट, मोबाइल और अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस ने विज्ञापन इंडस्ट्री की बुनियाद ही बदल दी है। अब ताकत पारंपरिक एजेंसियों के बजाय डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के पास चली गई है। कुछ बड़ी टेक कंपनियां पूरे डिजिटल इकोसिस्टम पर हावी हैं। ऐसे में सोरेल का कहना है कि यदि एजेंसियों को टिके रहना है तो उन्हें ज्यादा तेज, एकजुट और टेक्नोलॉजी पर आधारित बनना होगा।

सोरेल का खुद का करियर भी इसी बदलाव की कहानी है। उन्होंने Saatchi से लेकर WPP और फिर S4 Capital तक का सफर तय किया, जो ग्लोबल और मल्टी-ब्रैंड स्ट्रक्चर से बदलकर टेक्नोलॉजी-आधारित, तेज और डेटा आधारित मॉडल की तरफ जाने का उदाहरण है। उनका मानना है कि अब ‘मैड मेन’ यानी सिर्फ क्रिएटिव सोच पर चलने वाला दौर खत्म हो चुका है। अब इंडस्ट्री में क्रिएटिव, मीडिया और टेक्नोलॉजी एक्सपर्ट्स मिलकर काम करते हैं। जो कंपनियां अपने ढांचे और सोच दोनों में बदलाव लाएंगी, वही 2026 और उसके बाद भी प्रासंगिक बनी रहेंगी। 

सर मार्टिन सोरेल ने यह सारी बातें BW बिजनेसवर्ल्ड व एक्सचेंज4मीडिया ग्रुप के चेयरमैन व एडिटर-इन-चीफ डॉ. अनुराग बत्रा से एक बातचीत में कहीं। यह चर्चा विज्ञापन इंडस्ट्री के अतीत, वर्तमान और भविष्य को लेकर थी, जिसमें उन्होंने बताया कि इंडस्ट्री कैसे बदली है और आगे किस दिशा में जा रही है। 

2026 में मार्केटिंग सर्विसेज इंडस्ट्री को कौन-सी ताकतें दिशा दे रही हैं?

मार्टिन सोरेल कहते हैं कि 2026 में मार्केटिंग सर्विसेज को दो चीजें चला रही हैं- भूगोल और टेक्नोलॉजी। पहले भूगोल हावी था, अब टेक्नोलॉजी आगे है। ग्लोबलाइजेशन कमजोर पड़ रहा है और टेक्नोलॉजी, खासकर एआई, इंडस्ट्री को नया आकार दे रही है।

1970 और 80 के दशक में, जब मैं Saatchi & Saatchi में CFO था और बाद में WPP की स्थापना की। उस समय  सबसे बड़ा बदलाव भौगोलिक था। उस समय ग्लोबलाइजेशन तेजी से बढ़ रहा था। रीगन और थैचर की नीतियों ने दुनिया को व्यापार के लिए ज्यादा खुला बनाया। टेड लेविट ने 1983 में कहा था कि एक समय आएगा जब दुनिया भर के उपभोक्ता एक जैसा व्यवहार करेंगे। बाद में उन्होंने माना कि यह बात कुछ बढ़ा-चढ़ाकर कही गई थी, लेकिन इसके बावजूद ग्लोबलाइजेशन का दौर मजबूत रहा।

उस माहौल में Saatchi जैसी एजेंसियां तेजी से बढ़ीं। British Airways का ‘Manhattan Landing’ कैंपेन इस बात का प्रतीक था कि ब्रैंड सीमाओं के पार जा रहे हैं। 1990 के दशक में WPP ने भी इसी दिशा में विस्तार किया। लेकिन 2000 के दशक की शुरुआत में तस्वीर बदलने लगी। पहले इंटरनेट आया, फिर मोबाइल और अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, इन तकनीकों ने इंडस्ट्री को नई दिशा दी। अब भी भूगोल मायने रखता है, लेकिन टेक्नोलॉजी ज्यादा प्रभावशाली हो चुकी है।

इसी दौरान ग्लोबलाइजेशन कमजोर भी पड़ रहा है। दुनिया में राजनीतिक तनाव बना हुआ है। आर्थिक ग्रोथ पाना मुश्किल हो गया है। महंगाई ऊंची है, ब्याज दरें ज्यादा हैं। यूरोप की रफ्तार धीमी है और अफ्रीका के कुछ हिस्सों में अस्थिरता है। ऐसे माहौल में कंपनियों के लिए हर जगह फैलना आसान नहीं है। इसलिए अब सबसे ज्यादा जरूरी है दक्षता। क्लाइंट अब बहुत सोच-समझकर फैसले ले रहे हैं। वे हर जगह निवेश नहीं कर सकते, उन्हें टेक्नोलॉजी को तेजी और बड़े पैमाने पर लागू करना है।

एजेंसी मॉडल भी बदले हैं। Saatchi एक मल्टी-ब्रैंड होल्डिंग कंपनी थी। WPP भी मल्टी-ब्रैंड रही, लेकिन उसने टेक्नोलॉजी और डेटा पर ध्यान बढ़ाया, जिसमें Kantar भी शामिल था, जिसे बाद में बेच देना शायद सही फैसला नहीं था। S4 Capital को चार सिद्धांतों पर बनाया गया है- डिजिटल फोकस, डेटा पर आधारित काम, ज्यादा तेज और कुशल ऑपरेशन, और एक ही ब्रैंड के तहत एकीकृत ढांचा। अब बड़ी होल्डिंग कंपनियां भी इसी दिशा में बढ़ रही हैं।

आखिर में बात यह है कि इंडस्ट्री का फोकस ग्लोबल विस्तार से हटकर अब टेक्नोलॉजी, दक्षता और बंटी हुई वैश्विक व्यवस्था पर आ गया है। यही 2026 की मार्केटिंग सर्विसेज इंडस्ट्री की असली पहचान है।

Publicis इस समय बहुत अच्छा प्रदर्शन कर रही है, इस पर आपका क्या कहना है?

मॉरिस लेवी (Maurice) के बाद आर्थर सदौन एक मजबूत उत्तराधिकारी साबित हुए हैं। यानी कंपनी के पास मजबूत लीडरशिप, साफ रणनीति और ठोस ढांचा है, जो उसकी सफलता की बड़ी वजह है।

क्या उन्होंने सही अधिग्रहण (acquisitions) किए और क्लाइंट्स के सामने सही कहानी बनाई?

Epsilon और Sapient की खरीद उस समय काफी आलोचना का विषय थी। उन्हें खुद लगा था कि कीमत ज्यादा दी गई है, लेकिन बाद में साबित हुआ कि यह फैसले सही थे। इन अधिग्रहणों ने कंपनी को डिजिटल और डेटा के क्षेत्र में मजबूत बनाया, जो आज बेहद जरूरी है। हालांकि, इतनी बड़ी कंपनियों को जोड़ना आसान नहीं होता। “उन्होंने एक व्हेल निगल ली,” कहने का मतलब है कि उन्होंने बहुत बड़ा और जटिल काम अपने जिम्मे ले लिया है। इसलिए अगर अंदरूनी दिक्कतों या चुनौतियों की खबरें आती हैं, तो वह स्वाभाविक है। Publicis का ढांचा पहले देश (geography), फिर क्लाइंट और फिर क्षमता (capability) पर आधारित है। वह कहते हैं कि यही मॉडल उन्होंने Monks में भी अपनाया है।  

इसके बाद Omnicom के मॉडल की आलोचना करते हुए कहते हैं कि Omnicom पहले discipline (जैसे मीडिया, क्रिएटिव आदि), फिर क्लाइंट और फिर देश को प्राथमिकता देता है, जो गलत है। इससे अलग-अलग विभाग आपस में प्रतिस्पर्धा करने लगते हैं। मीडिया क्रिएटिव में घुसने की कोशिश करेगा, क्रिएटिव दूसरे क्षेत्रों में जाएगा और हर विभाग अपना इलाका बचाने की कोशिश करेगा। इसलिए संगठन का ढांचा पहले देश, फिर क्लाइंट और फिर क्षमता के आधार पर होना चाहिए। WPP भी Omnicom की तरह चल रहा है, जो बड़ी गलती है। अगर उन्होंने मैकिन्से की सलाह मानी है, तो जल्द ही इसका असर दिखेगा। country-first मॉडल परफेक्ट नहीं है, लेकिन आज की बंटी हुई और असमान ग्रोथ वाली दुनिया में यह ज्यादा व्यावहारिक है।

पहले अमेरिकी कंपनियों का दबदबा था, फिर ब्रिटिश कंपनियां जैसे Saatchi और WPP आगे आईं। आज Publicis (फ्रांसीसी) और Omnicom (अमेरिकी) लगभग 20 बिलियन डॉलर मार्केट कैप के साथ शीर्ष पर हैं। वहीं WPP की मार्केट वैल्यू करीब 3 बिलियन पाउंड यानी लगभग 4 बिलियन डॉलर रह गई है, जबकि एक समय यह 24 बिलियन डॉलर थी। यानी आकार में बहुत अंतर नहीं है, लेकिन बाजार में उनकी वैल्यू काफी गिर चुकी है।

Dentsu ने पिछले साल कहा था कि वह अपना इंटरनेशनल बिजनेस बेचना चाहती है। लेकिन अब तक वह इसे बेचने में सफल नहीं हुई है। असफलता की वजह क्या है, कीमत ज्यादा है या खरीदने वाला कोई नहीं है?

क्या जापानी कंपनियां बहुराष्ट्रीय बिजनेस चलाने में उतनी मजबूत हैं? उदाहरण के तौर पर Toyota और Sony जैसी कंपनियां सफल रही हैं, भले ही उनके उतार-चढ़ाव रहे हों। लेकिन विज्ञापन के मामले में स्थिति अलग दिखती है।

जब किसी कंपनी की अपने घरेलू बाजार में बहुत मजबूत पकड़ होती है, जैसे Dentsu और Hakuhodo की जापान में है, तो वह एक “किले” की तरह बन जाती है। यानी वह अपने देश में इतनी मजबूत होती है कि बाहर विस्तार करने की जरूरत या लचीलापन कम हो जाता है। इसलिए Dentsu को शायद अपने घरेलू बाजार जापान पर ही ध्यान देना चाहिए, इंटरनेशनल बिजनेस बेचकर आगे बढ़ना चाहिए। यही बात कोरियाई एजेंसियों जैसे Cheil और LG Ad पर भी लागू होती है, जो दक्षिण कोरिया से बाहर ज्यादा नहीं बढ़ पाईं। हालांकि फ्रांस का उदाहरण अलग है, जहां Publicis और Havas ग्लोबली सफल रहीं।

कुछ जापानी नेटवर्क्स में विदेशों में भी जापानी, अक्सर पुरुष, अधिकारियों को ही प्रमुख बनाया जाता था। इससे भरोसे, लचीलेपन और स्थानीय समझ से जुड़ी दिक्कतें पैदा हो सकती हैं। Dentsu के मौजूदा सीईओ के बारे में कहा गया कि वे सक्षम हैं, लेकिन अंग्रेजी नहीं बोलते, जिससे अंतरराष्ट्रीय बैठकों में अनुवादक की जरूरत पड़ती है और काम जटिल हो जाता है। Dentsu को अपने घरेलू बाजार पर ध्यान देना चाहिए। जापान में भी बदलाव आ रहे हैं- नए प्रधानमंत्री की मजबूत स्थिति, शेयर बाजार का रिकॉर्ड स्तर पर होना और येन का कमजोर होना, ये सब बड़े आर्थिक बदलावों के संकेत हैं।

क्या कोई भारतीय कंपनी ग्लोबली इतना बड़ा बन सकती है?

संभव तो है, लेकिन बेहद मुश्किल। सिर्फ अपने दम पर (organically) ऐसा करना बहुत कठिन है, भले ही एआई का दौर हो। इसके लिए बड़ी खरीद-फरोख्त (acquisitions) और भारी निवेश की जरूरत होती है।

अभी मर्जर और अधिग्रहण का माहौल काफी सक्रिय है, लेकिन शून्य से एक ग्लोबल एजेंसी नेटवर्क बनाना बहुत कठिन है। कुछ भारतीय निवेशकों ने Dentsu International को खरीदने की संभावना देखी थी, लेकिन वह अवास्तविक माना गया। आगे चलकर अगर भारी पूंजी और आक्रामक निवेश हो तो संभव है, लेकिन फिलहाल संभावना कम है। सबसे ज्यादा संभावना यही है कि इंडस्ट्री पर Publicis और Omnicom का दबदबा रहेगा। साथ ही यह भी देखना होगा कि क्या सिंडी रोज WPP को फिर से मजबूत बना पाती हैं।

दुनिया में विज्ञापन का बाजार एक ट्रिलियन डॉलर से ज्यादा का हो चुका है। भारत में यह करीब 1,25,000 करोड़ रुपये का है। लेकिन समस्या यह है कि कुल विज्ञापन खर्च बढ़ रहा है, जबकि एजेंसियों की ग्रोथ उतनी तेज नहीं हो रही। सवाल है कि ऐसा क्यों हो रहा है और इस माहौल में S4 के लिए चुनौती क्या है?

एजेंसियों की फीस घट रही है और क्लाइंट्स ज्यादा काम खुद करने लगे हैं। ऐसे में क्लाइंट क्या गलत कर रहे हैं और उन्हें क्या बेहतर करना चाहिए?

तीन चीजें सबसे अहम हैं- फुर्ती (agility), अपने काम और डेटा पर दोबारा नियंत्रण (taking back control) और फर्स्ट-पार्टी डेटा का सही इस्तेमाल। यानी कंपनियों को तेजी से फैसले लेने, अपने ब्रैंड और मार्केटिंग पर खुद की पकड़ मजबूत करने और अपने ग्राहकों के डेटा का सही उपयोग करने पर ध्यान देना चाहिए।

भारत और कुछ हद तक चीन में भी कई कंपनियां अभी तक मार्केटिंग और ब्रैंड बिल्डिंग की असली अहमियत को पूरी तरह नहीं समझतीं। आजकल लंबी अवधि की ब्रैंड रणनीति के बजाय शॉर्ट-टर्म नतीजों पर ज्यादा जोर है। प्राइवेट इक्विटी पांच साल में एग्जिट चाहती है, वेंचर कैपिटल निवेश से पहले ही एग्जिट की सोचती है और लिस्टेड कंपनियां हर तिमाही नतीजे दिखाने के दबाव में रहती हैं। बाजार में अस्थिरता और बिखराव (fragmentation) इस दबाव को और बढ़ा देता है। ऐसे में लंबी अवधि की ब्रैंड बिल्डिंग पीछे छूट जाती है।

एजेंसियों की सलाह बहुत मूल्यवान होती है और उसे उसी नजर से देखा जाना चाहिए। कुछ भारतीय कंपनियां इसे अच्छी तरह समझती हैं, लेकिन कुछ नहीं। भारतीय उद्यमी दुनिया के सर्वश्रेष्ठ में से हैं। बड़े भारतीय बिजनेस लीडर अब देश के बाहर भी विस्तार कर रहे हैं, जैसे सुनील मित्तल का BT में निवेश।

आज के उद्यमियों को क्या सलाह देंगे, खासकर विज्ञापन, मार्केटिंग और मीडिया में?

लोग ‘रेजिलिएंस’ की बात करते हैं, लेकिन असली जरूरत फुर्ती की है क्योंकि दुनिया बहुत अस्थिर है। सबसे अहम बात है- कभी हार मत मानो। अगर आपके पास विजन और जुनून है तो उसे लगातार और तेजी से आगे बढ़ाओ।  मेरा मंत्र है- लगातार प्रयास और गति।

भारत मजबूत स्थिति में है। यह दुनिया के सबसे गतिशील क्षेत्रों में से एक में स्थित है, जहां लैटिन अमेरिका और मध्य पूर्व भी शामिल हैं। अमेरिका हमेशा महत्वपूर्ण रहेगा, लेकिन चीन और ताइवान को लेकर चिंताओं की वजह से कंपनियां जोखिम कम करने के लिए विकल्प तलाश रही हैं। भारत 2050 तक दुनिया की टॉप तीन अर्थव्यवस्थाओं में होगा, शायद उससे पहले। क्रय शक्ति के आधार पर तो वह पहले ही वहां पहुंच सकता है। सिर्फ भारत ही नहीं, बल्कि इंडोनेशिया, वियतनाम, थाईलैंड, फिलीपींस, सिंगापुर और मलेशिया भी उभर रहे हैं। मोदी के नेतृत्व और टेक्नोलॉजी पर जोर ने भारत में बड़े अवसर पैदा किए हैं।

लेकिन एक जोखिम भी है, यदि अमेरिका मैन्युफैक्चरिंग को वापस लाने में सफल होता है, तो कुछ काम जो लागत कम होने के कारण भारत को आउटसोर्स किया गया था, वह वापस अमेरिका जा सकता है। यानी अवसर भी हैं और चुनौतियां भी।


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