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पत्रकारिता में इन बातों पर फोकस जरूरी, बाकी सब अपने आप संभल जाएगा: संकेत उपाध्याय

समाचार4मीडिया से बातचीत में जाने-माने पत्रकार संकेत उपाध्याय का कहना था- ईको सिस्टम बंटोरने के इस सिस्टम में जागरूक हो जाना ही एक ईको सिस्टम है।

pankaj sharma 1 hour ago

‘एनडीटीवी’ (NDTV) के पूर्व पत्रकार और डिजिटल न्यूज प्लेटफॉर्म ‘द रेड माइक’ (The Red Mike) के को-फाउंडर रहे संकेत उपाध्याय ने नई दिशा में कदम बढ़ाते हुए हाल ही में दो नए और स्वतंत्र यूट्यूब चैनल ‘डबल चेक’ (Double Check) और ‘अवध पंच’ (Awadh Punch) लॉन्च किए हैं। इन दोनों चैनल्स के विजन, डिजिटल पत्रकारिता के बदलते परिदृश्य और मीडिया के सामने मौजूदा चुनौतियों पर समाचार4मीडिया ने उनसे विस्तार से बातचीत की। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के विशेष अंश:

‘Double Check’ शुरू करने के पीछे आपकी मूल सोच क्या रही?

‘Double Check’ मेरे लगभग 24 साल के पत्रकारिता अनुभव का एक परिपक्व विस्तार है। आज मीडिया में “सबसे पहले” होने की होड़ बहुत तेज हो गई है। इस होड़ में कई बार तथ्यात्मक सावधानी पीछे छूट जाती है। हमने यह तय किया कि हम ‘फर्स्ट’ नहीं, ‘फैक्चुअल’ होने पर जोर देंगे। यानी जब तक किसी सूचना को दो स्तर पर परख न लें, तब तक उसे प्रस्तुत नहीं करेंगे। भले हम कुछ मिनट या घंटे पीछे रह जाएं, लेकिन दर्शकों के भरोसे से समझौता नहीं करेंगे।

‘Double Check’ में आपका कंटेंट फोकस क्या है?

इस प्लेटफॉर्म पर दो मुख्य स्तंभ हैं। पहला, गहराई से समझाने वाली पत्रकारिता-यानी एक्सप्लेनर और विश्लेषण। दूसरा, कंज्यूमर अवेयरनेस। मुझे हमेशा लगता रहा है कि टेलीकॉम टैरिफ, बैंकिंग नियम, डिजिटल फ्रॉड या सरकारी गाइडलाइंस जैसी खबरें आम आदमी के जीवन से सीधे जुड़ी होती हैं। इन्हें सिर्फ बिजनेस स्टोरी कहकर अलग नहीं किया जा सकता। हमारा प्रयास रहेगा कि जटिल विषयों को सरल भाषा में समझाया जाए।

आज डिजिटल में स्पीड बहुत अहम है। ऐसे में ‘लेट लेकिन फैक्चुअल’ रहना कितना चुनौतीपूर्ण है?

चुनौती तो है, लेकिन यही पत्रकारिता की असली परीक्षा भी है। कई मित्रों ने कहा कि इससे व्यूज कम हो सकते हैं, क्योंकि बड़ी खबर पर तुरंत प्रतिक्रिया ज्यादा देखी जाती है। लेकिन मेरा अनुभव कहता है कि डिजिटल में एक्सप्लेनर कंटेंट की भी मजबूत ऑडियंस है। लोग सिर्फ शोर नहीं, स्पष्टता भी चाहते हैं। अगर आप ठहरकर, रिसर्च के साथ बात रखते हैं, तो भरोसे की पूंजी बनती है- और वही लंबे समय तक काम आती है।

‘Avadh Punch’ बिल्कुल अलग दिशा का प्रोजेक्ट है। इसकी प्रेरणा क्या रही?

‘Avadh Punch’ मेरे लिए भावनात्मक और सांस्कृतिक दोनों स्तर पर महत्वपूर्ण है। मेरा परिवार अयोध्या से है और अवधी भाषा से मेरा गहरा जुड़ाव है। अक्सर अवधी को सिर्फ एक बोली कहकर नजरअंदाज कर दिया जाता है, जबकि इसी भाषा में रामचरितमानस जैसी कालजयी कृति लिखी गई। हम यह दिखाना चाहते हैं कि अवधी एक समृद्ध भाषा और सांस्कृतिक धरोहर है। यह प्रोजेक्ट कमर्शियल से ज्यादा सांस्कृतिक प्रतिबद्धता का हिस्सा है।

अवधी एक जीवंत बोली है। ‘अवध पंच’ के जरिये वर्ष 1975 से पत्रकारिता में सक्रिय और अब तक 70 से अधिक किताबें लिख चुके मधुकर उपाध्याय अवध की संस्कृति, इतिहास और कहानियों को उसी भाषा में लोगों तक पहुंचा रहे हैं, जिसमें वे बोली जाती हैं।

इस चैनल का नाम ‘Avadh Punch’ रखने के पीछे क्या सोच है?

यह नाम 19वीं सदी में लखनऊ से प्रकाशित व्यंग्य पत्र ‘अवध पंच’ से प्रेरित है। वह सत्ता और प्रशासन पर तीखा व्यंग्य करता था। हम उसी परंपरा की स्मृति के साथ, लेकिन आधुनिक डिजिटल रूप में, भाषा और संस्कृति को आगे बढ़ाना चाहते हैं। हमारे लिए यह सिर्फ कंटेंट नहीं, एक सांस्कृतिक पुनर्स्मरण है।

आपने लंबे समय तक NDTV में काम किया, फिर ‘The Red Mic’ शुरू किया। अब इस नए चरण को कैसे देखते हैं?

हर चरण ने मुझे अलग तरह का अनुभव दिया। NDTV में संस्थागत पत्रकारिता की गहराई सीखी। ‘The Red Mic’ ने डिजिटल स्पेस की चुनौतियों और स्वतंत्र निर्णय लेने की जिम्मेदारी समझाई। निजी जीवन में भी बदलाव आए, खासकर मां के निधन के बाद प्राथमिकताएं बदलीं। तब लगा कि अब वही करना चाहिए जिसमें पेशेवर प्रतिबद्धता और व्यक्तिगत संतुलन दोनों साथ चल सकें। यही सोच इन दोनों नए प्रोजेक्ट्स की वजह बनी।

आगे की स्ट्रैटेजी क्या रहेगी?

स्ट्रैटेजी साफ है- एल्गोरिद्म के पीछे नहीं, कंटेंट की गुणवत्ता के पीछे जाना है। एआई जैसे टूल्स का उपयोग करेंगे, लेकिन अंतिम जिम्मेदारी इंसान की होगी। शॉर्टकट से बचेंगे और भरोसेमंद, रिसर्च-आधारित पत्रकारिता को प्राथमिकता देंगे। हमारा लक्ष्य तेजी से नहीं, स्थायित्व के साथ आगे बढ़ना है।

संकेत उपाध्याय के साथ इस पूरी बातचीत को आप यहां विस्तार से सुन/देख सकते हैं।

 


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