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सफलता के लिए बदलाव की रफ्तार पकड़नी होगी: उदय शंकर
जियोस्टार के वाइस चेयरमैन उदय शंकर ने CII बिग पिक्चर समिट में भारतीय मीडिया के भविष्य पर SPNI के एमडी व सीईओ गौरव बनर्जी से बातचीत की।
समाचार4मीडिया ब्यूरो ।। 3 months ago
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'हम अपनी ही कल्पना से सीमित हो जाते हैं।' जियोस्टार के वाइस चेयरमैन उदय शंकर ने भारतीय मीडिया इंडस्ट्री पर यह सीधी और तीखी टिप्पणी करते हुए बातचीत की शुरुआत की। इसी के साथ उन्होंने कंटेंट, टैलेंट, रिस्क लेने और इंडस्ट्री को दोबारा गढ़ने जैसे मुद्दों पर आगे होने वाली चर्चा की दिशा तय कर दी।
उदय शंकर मुंबई में सोमवार को हुए CII बिग पिक्चर समिट के पहले दिन ‘बिल्डिंग M&E टाइटन्स: द उदय शंकर स्कूल ऑफ लीडरशिप’ सत्र में SPNI के एमडी और CEO गौरव बनर्जी से बात कर रहे थे।
अगले एक घंटे में शंकर ने उन फैसलों पर फिर बात की, जिन्होंने भारतीय टीवी को बदल दिया। उन्होंने इंडस्ट्री की उस सुस्ती पर भी चर्चा की, जिसके बारे में उनका मानना है कि यह आज मीडिया के कई हिस्सों को जकड़ रही है। उन्होंने अपनी वही बेचैनी और जिज्ञासा भी समझाई, जो आज भी उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती है। बातचीत में मीडिया इंडस्ट्री को आकार देने वाले कई बड़े मुद्दे शामिल रहे, जैसे- कंटेंट यूज करने के बदले पैटर्न, इंडस्ट्री की सुस्ती, टैलेंट फिलॉसफी, निवेशकों का भरोसा और AI की वजह से होने वाला रीइन्वेंशंस।
उम्मीद कहां है और अगला बड़ा मौका क्या है?
गौरव बनर्जी ने सबसे पहले पूछा कि विज्ञापनों की धीमी रफ्तार, टीवी का अनिश्चित भविष्य और स्ट्रीमिंग की असमान ग्रोथ के बीच शंकर इंडस्ट्री में उम्मीद कहां देखते हैं। उन्होंने पूछा, 'मीडिया का अगला बड़ा मौका कहां है?'
इस पर उदय शंकर ने साफ कहा कि भारतीय मीडिया अभी थका नहीं है। उन्होंने कहा, 'मैं इंडस्ट्री के भविष्य को लेकर बहुत आशावादी हूं।' उनके मुताबिक असली चुनौती यह है कि इंडस्ट्री खुद को कैसे परिभाषित करती है। मीडिया का मूल काम वही है, ऐसा कंटेंट बनाना जो उपभोक्ता का ध्यान खींचे। और यह ध्यान, उन्होंने कहा, आज सबसे ज्यादा है।
उनका कहना था कि लोग आज हर वक्त कंटेंट देख रहे हैं- बस स्टॉप पर, रिसेप्शन में, फ्लाइट का इंतजार करते हुए। लेकिन हमने अपनी इंडस्ट्री पर खुद ही सीमाएं लगा रखी हैं, यही हमारी समस्या है। उनके मुताबिक असली मौका कल्पना में है। उन्होंने कहा, 'हमारी इंडस्ट्री की संभावनाएं हमारी अपनी कल्पना और प्रयोग करने की इच्छा पर निर्भर हैं।'
उन्होंने बताया कि स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म और टेक मीडिया कंपनियां लगातार खुद को बदल रही हैं, जबकि पारंपरिक टीवी पुराने ढांचे में फंसा रह गया है। 'मुद्दा इंडस्ट्री की हालत नहीं है, बल्कि यह है कि हमने खेल कैसे खेला है। गेम बदल चुका है।'
डिस्ट्रिब्यूशन से आगे सोचने और कंटेंट कंपनियों को फिर से परिभाषित करने की जरूरत
गौरव बनर्जी ने पूछा कि क्या मीडिया कंपनियों को खुद को डिस्ट्रिब्यूटर नहीं, बल्कि कहानीकार समझने की जरूरत है?
इस पर उदय शंकर ने तुरंत कहा, 'बिल्कुल।' अपना तर्क समझाने के लिए उन्होंने कहा, 'हमने बहुत सारे ताबूत खरीद लिए, लेकिन हमारे पास डालने के लिए इतने ‘मरे हुए लोग’ ही नहीं हैं। इसलिए हम किसी के मरने का इंतजार करते रहते हैं।' मतलब- मीडिया कंपनियां पुराने मॉडल के खत्म होने का इंतजार कर रही हैं, नए बनाने के बजाय।
उन्होंने बताया कि जब स्टार ने स्ट्रीमिंग शुरू करने की सोची थी, तब डेटा बेहद महंगा था और वाई-फाई लगभग नहीं था। फिर भी उन्होंने ऐसा किया क्योंकि उनका मानना था कि क्रिएटर को डिवाइस नहीं, उपभोक्ता को फॉलो करना चाहिए।
उदय शंकर ने शुरुआती टीवी न्यूज की सीमाएं याद कीं, जब ब्रॉडकास्टर पूरे दिन दर्शकों के घर लौटने का इंतजार करते थे। जबकि आज दर्शकों तक तुरंत पहुंचा जा सकता है। उनका मानना है कि अगला बड़ा कदम मोबाइल से भी आगे जाएगा- शायद वियरेबल्स और एम्बिएंट स्क्रीन की ओर। उन्होंने कहा, असली रुकावट हमारी सोच है, डिस्ट्रिब्यूशन नहीं।
लीडर टीमों को ऐसे भविष्य के लिए कैसे तैयार करें, जो अभी बना ही नहीं
गौरव बनर्जी ने पूछा कि जब भविष्य का मॉडल बना ही नहीं है, तब टीमें कैसे तैयार हों?
इस पर उदय शंकर ने कहा कि भविष्य की तैयारी नहीं की जा सकती, केवल खुद को तैयार किया जा सकता है। 'आपको फुर्तीला, खुले दिमाग वाला और मौके पकड़ने के लिए तैयार रहना चाहिए।' उनके अनुसार स्किल्स हमेशा बदलती हैं, लेकिन सीखते रहने की क्षमता सबसे महत्वपूर्ण है।
उन्होंने याद किया कि पहले टीवी प्रॉडक्शन कितनी बड़ी मशीनों और मुश्किल प्रोसेस से होता था, जबकि आज वही काम फोन पर हो जाता है। उन्होंने कहा, 'यदि कोई एडिटर उन पुराने उपकरणों पर ही अटका रहता और समय के साथ आगे नहीं बढ़ता, तो वह पीछे छूट जाता।' उनका संदेश सीधा था: 'दुनिया बदलती रहेगी। आपको बस उतनी ही तेजी से बदलाव अपनाने के लिए तैयार रहना चाहिए। किसी एक स्किल पर अटकिए मत।'
बड़े निवेशकों को बड़ी आइडियाज पर कैसे भरोसा दिलाएं
इस पर उदय शंकर ने कहा, 'आपके पास शानदार आइडिया होने चाहिए और उन पर मर मिटने जितना विश्वास भी।' लेकिन भरोसा केवल आइडिया पर नहीं, लोगों पर बनता है। 'सबसे पहले मैं देखता हूं कि उस काम के लिए सबसे सही व्यक्ति कौन है।'
उन्होंने कहा कि टैलेंट सिर्फ अपने घनिष्ठ दायरे या इंडस्ट्री के अंदर ही ढूंढने की गलती नहीं करनी चाहिए। मीडिया आज टेक, बिजनेस, मार्केटिंग और ब्रांडिंग जैसे कई नए क्षेत्रों से प्रभावित हो रहा है। 'हमने बाहर की दुनिया से सबसे अच्छा टैलेंट लाने का काम अच्छी तरह नहीं किया है।'
उदय शंकर का टैलेंट खोजने का तरीका
गौरव बनर्जी ने पूछा कि वह टैलेंट कैसे पहचानते हैं? इस पर उदय शंकर ने कहा, 'सबसे पहले, आपको यह जानना चाहिए कि आपके पास क्या नहीं है।'
वे ऐसे लोगों की तलाश करते हैं जो किसी एक काम में 100 प्रतिशत माहिर हों- भले ही बाकी सब में कमजोर हों। उनके अनुसार ऐसे विशेषज्ञ इंडस्ट्री को आगे बढ़ाते हैं और ढर्रे को चुनौती देते हैं। 'जब आप ऐसे 10–20 लोगों को साथ लाते हैं, तो आपकी पूरी टीम मजबूत बन जाती है।'
रिस्क लेने की क्षमता कहां से आती है?
गौरव बनर्जी ने पूछा कि उनकी रिस्क लेने की ताकत कहां से आती है।
उदय शंकर ने कहा, 'जिंदगी एक्सपेरीमेंट और इनोवेशन से चलती है। और यदि आपके प्रयोग फेल नहीं हो रहे, तो आप प्रयोग ही नहीं कर रहे।' उन्होंने कहा कि सफलता हमेशा असफलताओं की नींव पर खड़ी होती है, जिसे लोग बाद में भूल जाते हैं।
फिर गौरव बनर्जी ने उनका सबसे बड़ा रिस्क याद किया- 'सत्यमेव जयते' शो बनाना। यह फैसला उन्होंने तब लिया जब स्टार प्लस टॉप पर था। उदय शंकर ने कहा कि वह तभी प्रयोग करना पसंद करते हैं जब स्थिति मजबूत हो, क्योंकि डर कम होता है।
'सत्यमेव जयते' ने हर नियम तोड़ा- बोलने का तरीका, पैकेजिंग, मार्केटिंग, फॉर्मेट, यहां तक कि इसका सुबह का टाइम-स्लॉट भी। उन्होंने कहा, 'यदि आप मुझसे उस समय पूछते कि यह सफल होगा या नहीं, तो मुझे बिल्कुल पता नहीं था।' लेकिन यह आइडिया मनोरंजन की परिभाषा को आगे बढ़ाता था, इसलिए उन्होंने इसे किया।
अंत में बनर्जी ने पूछा, 'आज आपको किस बात की बेचैनी है?'
इस सवाल पर उदय शंकर ने कहा कि लाइव क्रिकेट प्रॉडक्शन को और बेहतर बनाने का जुनून तो हमेशा रहेगा, लेकिन फिलहाल वह AI को लेकर बेहद उत्साहित हैं। उनका मानना है कि AI क्रिएटिविटी को लोकतांत्रिक बना सकता है- जहां टैलेंट, प्रॉडक्शन क्षमता और लागत जैसी सीमाएं खत्म हो जाएंगी। उन्होंने कहा, 'टैलेंट नहीं मिल रहा? कोई बात नहीं, मैं उसे बना लूंगा।'
उनके लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस एक आजादी है- एक तरीका जिससे कहानी कहने की सीमाएं खत्म हो सकती हैं। उन्होंने कहा, 'फिर हम इसके लिए उत्साहित क्यों न हों? मेरा ध्यान इस बात पर है कि इसे इस्तेमाल करके दर्शकों को और ज्यादा कैसे जोड़ा जाए।'
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