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व्यंग्य: बकरे की कहानी, वरिष्ठ पत्रकार राकेश कायस्थ की जुबानी
व्यंग्य: बकरे की कहानी, वरिष्ठ पत्रकार राकेश कायस्थ की जुबानी
समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
मौजूदा दौर के सबसे लोकप्रिय हिंदी व्यंग्यकारों में से एक राकेश कायस्थ ने बकरीद के मौके पर एक व्यंग्य लिखा है, जिसे उन्होंने अपनी फेसबुल वॉल पर शेयर किया है। उनके व्यंग्य को आप यहां पढ़ सकते हैं:
बलिदानी बकरे का आखिरी पैगाम
समाचार4मीडिया ब्यूरो
9 years ago
समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
मौजूदा दौर के सबसे लोकप्रिय हिंदी व्यंग्यकारों में से एक राकेश कायस्थ ने बकरीद के मौके पर एक व्यंग्य लिखा है, जिसे उन्होंने अपनी फेसबुल वॉल पर शेयर किया है। उनके व्यंग्य को आप यहां पढ़ सकते हैं:
बलिदानी बकरे का आखिरी पैगाम
आप सब मटनपरस्तो को हमारी बिरादरी की तरफ से बक़रीद मुबारक। बक़रीद आपके लिए है, ख़ैर मनाकर थक चुकी हमारी मांओं का तो आज मुहर्रम है। कुर्बान करना आपका ईमान है और कुर्बान होना हमारा मुस्तकबिल। आपका अपने दीन की जानिब फर्ज हैं, लेकिन मुझे ऐसा लगता है कि आप इंसानों पर हमारा बहुत बड़ा कर्ज है। इसीलिये सदियों से हलाल होते आये हैं, ताकि आपको सबाब मिल सके।
मेरे वालिद, वालिद के वालिद और यहां तक कि हमारे बाबा-ए-क़ौम तक हलाल हो गये। हमे बहुत नाज़ है, अपनी कौम और कुर्बान होने की उसकी रवायत पर। लेकिन हमें आजतक कभी ये समझ नहीं आया कि हम आपके इतने अजीज़ है, इसका पता हमें बकरीद के ठीक दो दिन पहले क्यों चलता है? पूरे साल आप ये कहते रहते हैं कि हम बहुत लजीज़ हैं, लेकिन बकरीद के आते ही हम लजीज़ से अजीज़ हो जाते हैं, इतने अजीज़ कि आप भारी दिल से हमारी गर्दन पर छुरी फेर देते हैं। ज़रा दिल पर हाथ रखकर बताइये कि अगर हम लजीज़ ना होते, तब भी आपके इतने अजीज़ होते? खैर जाने दीजिये बक़रीद के मुबारक मौके पर ऐसे सवाल पूछकर आपका मूड खराब नहीं करना चाहता।
हम आपके अजीज़ हैं, इसलिए आप दिल पर पत्थर रखकर हमारी खातिर मुंहमांगी कीमत चुकाते हैं। हमें बलिदान के बाज़ार से अपने घर लाते हैं, वो भी बकरीद से दो दिन पहले। आप हमें कुछ दिन पहले भी ला सकते थे, लेकिन मैं आपकी मजबूरी समझ सकता हूं। लोग तो आजकल अपने बाप तक को दो दिन से ज्यादा घर पर नहीं रखते, फिर हम तो तो बकरे ठहरे, अजीज़ हुए तो क्या! वैसे दो दिनो में आप हमारी जो खातिरदारी करते हैं, उससे हमारा दिल भर आता है।
वो मुलायम-मुलायम शाखें, वो हरी-हरी पत्तियां। जी में आता है कि आपके पहलू में यूं ही बैठे रहें और जुगाली करते रहे। लेकिन फिर हमें अपना फर्ज याद आता है और हम मन ही मन अपना कौमी तराना दोहराते हैं-- मटन की राह में वतन के नौजवां शहीद हो। जी हां, हमारे तमाम हमवतन बकरों का यही कौमी तराना है। जो आपकी मटनपरस्ती है, वही हमारी वतनपरस्ती है। हमारी कौम के कुछ नासमझ ये पूछते हैं- जब इंसान हमसे इतने मुहब्बत करता है, तो वो हमें अपने दिल में क्यों नहीं रखता, पेट में क्यों रखता है। उन अहमक बक़रों को कैसे बताउं कि दिल का रास्ता पेट से होकर जाता है, मुहावरा इंसानों ने हमारी की खातिर ही इजाद किया है। हलाल हो झटका, कबाब हो या कीमा, क्या फर्क पड़ता है, सजना तो हमें इंसान की थालियों में ही है। इसलिए मेरे प्यारे हमवतन बकरों ज़रा भी उदास ना हो। जब दिल घबराये और आंखों के आगे अंधेरा छाये तो ये शेर गुनगुना लेना--
कटते भी चलो बढ़ते भी चलो, बोटी भी बहुत है, पाये भी बहुत
चलते ही चलो कि अब डेरे तंदूरों पे ही डाले जाएंगे..
(साभार: वरिष्ठ पत्रकार राकेश कायस्थ की फेसबुक वॉल से)
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