सूचना-प्रसारण मंत्रालय ने ओवर-द-टॉप प्लेटफॉर्म्स को सख्त चेतावनी जारी करते हुए कहा है कि वे अपने कंटेंट में नशीले पदार्थों और साइकोट्रॉपिक ड्रग्स के उपयोग को बढ़ावा देने या उनके महिमामंडन से बचें।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो
सूचना-प्रसारण मंत्रालय (MIB) ने ओवर-द-टॉप (OTT) प्लेटफॉर्म्स को सख्त चेतावनी जारी करते हुए कहा है कि वे अपने कंटेंट में नशीले पदार्थों और साइकोट्रॉपिक ड्रग्स के उपयोग को बढ़ावा देने या उनके महिमामंडन से बचें।
मंत्रालय की यह चेतावनी इस बात को लेकर आई है कि इस तरह का कंटेंट युवा दर्शकों पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है। मंत्रालय ने ओटीटी प्लेटफॉर्म्स को उनके "सामाजिक उत्तरदायित्व" की याद दिलाते हुए कहा है कि उन्हें यह सुनिश्चित करना चाहिए कि उनके कंटेंट में किसी भी रूप में नशीले पदार्थों के सेवन को फैशनेबल या स्वीकार्य न दिखाया जाए।
मंत्रालय ने यह भी निर्देश दिया है कि ऐसे कार्यक्रमों में जहां कहानी या पटकथा के हिस्से के तौर पर ड्रग्स का चित्रण होता है, वहां पब्लिक हेल्थ मैसेज और डिस्क्लेमर शामिल किए जाएं, ताकि दर्शकों को ड्रग्स के दुष्परिणामों के प्रति जागरूक किया जा सके।
सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 के तहत अधिसूचित 'सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यस्थ दिशा-निर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम, 2021' का हवाला देते हुए मंत्रालय ने कहा कि किसी भी प्रकाशक को ऐसा कंटेंट प्रकाशित, प्रसारित या प्रदर्शित नहीं करना चाहिए, जो किसी कानून के तहत प्रतिबंधित हो या जिसे किसी अदालत ने अवैध घोषित किया हो।
मंत्रालय की ओर से जारी इस सलाह में कहा गया, “ऐसे चित्रण के गंभीर प्रभाव होते हैं, विशेषकर युवा और संवेदनशील दर्शकों पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर। ओटीटी प्लेटफॉर्म्स को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि उनके द्वारा होस्ट किए गए कंटेंट में किसी भी रूप में नशीले पदार्थों के सेवन का महिमामंडन या प्रचार-प्रसार न हो। यदि किसी कहानी में ड्रग्स का उपयोग दिखाया गया है, तो उसे समाज में 'फैशनेबल' या 'स्वीकार्य' न दिखाया जाए।”
इसके साथ ही मंत्रालय ने ओटीटी प्लेटफॉर्म्स को यह भी प्रोत्साहित किया है कि वे ऐसे कंटेंट, जैसे डॉक्यूमेंट्री फिल्में, का निर्माण और प्रचार करें जो नशीले पदार्थों के दुष्प्रभावों को उजागर करें। इसे उनके कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (सीएसआर) का हिस्सा बनाने की भी सलाह दी गई है।
मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि इन निर्देशों का पालन न करने पर ओटीटी प्लेटफॉर्म्स के कंटेंट की गहन जांच की जा सकती है। इसमें सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 और मादक पदार्थ एवं साइकोट्रॉपिक पदार्थ अधिनियम (एनडीपीएस), 1985 के प्रावधानों के तहत कार्रवाई की जा सकती है।
गौरतलब है कि ओटीटी प्लेटफॉर्म्स लंबे समय से सूचना और प्रसारण मंत्रालय के निशाने पर हैं। सरकार इनके कंटेंट को नियंत्रित करने के उपायों पर विचार कर रही है। हालांकि, ओटीटी प्लेटफॉर्म्स और कंटेंट निर्माताओं ने इस कदम का लगातार विरोध किया है और इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर खतरा बताया है।
इंटरनेट की शुरुआत से एक अनकहा समझौता चला आ रहा था- "हम तुम्हें मुफ्त में कंटेंट देंगे और बदले में तुम हमारे विज्ञापन देखोगे।" लेकिन 2026 में यह समझौता टूट रहा है।
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Vikas Saxena
इंटरनेट की शुरुआत से एक अनकहा समझौता चला आ रहा था- "हम तुम्हें मुफ्त में कंटेंट देंगे और बदले में तुम हमारे विज्ञापन देखोगे।" लेकिन 2026 में यह समझौता टूट रहा है। आज दुनिया भर के करोड़ों यूजर इस सौदे को मानने से इनकार कर रहे हैं। वे न सिर्फ ऐड्स को इग्नोर कर रहे हैं, बल्कि उनसे बचने के लिए अपनी जेब से पैसे खर्च करने को भी तैयार हैं। इसी से जन्म हुआ है एक नई अर्थव्यवस्था का- Ad Avoidance Economy।
यह कोई ट्रेंड नहीं, यह एक बड़ा बदलाव है और इसके आंकड़े चौंकाने वाले हैं।
Ad Avoidance क्या है?
Ad Avoidance यानी यूजर्स का जानबूझकर ऐड्स से दूर रहना। आज के समय में इसके कई अलग-अलग रूप देखने को मिलते हैं:
ऐड ब्लॉकर्स: ये ऐसे सॉफ्टवेयर टूल्स होते हैं, जिन्हें ब्राउजर में इंस्टॉल किया जाता है। ये वेबसाइट्स पर आने वाले ऐड्स को अपने आप ब्लॉक कर देते हैं, जिससे यूजर को ऐड दिखाई ही नहीं देते।
Skip Culture: जैसे ही मौका मिलता है, यूजर ऐड स्किप कर देता है, चाहे वो वीडियो प्लेटफॉर्म पर “Skip Ad” बटन दबाना हो या OTT पर कंटेंट को आगे बढ़ा देना। यह भी ad avoidance का ही हिस्सा है।
Premium Subscriptions: आज कई लोग ऐड से बचने के लिए पैसे देने को भी तैयार हैं। जैसे Spotify Premium, YouTube Premium, Netflix और JioHotstar Premium, ये सभी “ad-free experience” के बदले यूजर्स से फीस लेते हैं।
Privacy Browsers: कुछ ब्राउजर जैसे Brave पहले से ही ऐसे बनाए गए हैं, जो ऐड्स और ट्रैकर्स को डिफॉल्ट रूप से ब्लॉक कर देते हैं। इससे यूजर को ज्यादा प्राइवेसी और बिना ऐड का अनुभव मिलता है।
कुल मिलाकर, आज का यूजर विज्ञापन देखने से बचने के लिए हर तरीका अपना रहा है, चाहे टेक्नोलॉजी का सहारा लेना हो या फिर पैसे खर्च करना। यह सभी मिलकर एक ऐसी इकनॉमी बना रहे हैं, जहां यूजर की सबसे बड़ी चाहत है- "बस मुझे ऐड मत दिखाओ।"
आंकड़े जो बताते हैं असली तस्वीर
अगर आप सोचते हैं कि सिर्फ कुछ “tech-savvy” (टेक एक्सपर्ट) लोग ही ऐड्स ब्लॉक करते हैं, तो जरा ये आंकड़े देखिए:
Statista और Blockthrough (eyeo) के आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, 2023 की दूसरी तिमाही में दुनियाभर में करीब 91.2 करोड़ (912 मिलियन) लोग नियमित रूप से ऐड ब्लॉकर का इस्तेमाल कर रहे थे और यह संख्या लगातार बढ़ रही है। Backlinko के मार्च 2026 अपडेट के अनुसार, GWI के 2025 की दूसरी तिमाही में डेटा में करीब 29.5% इंटरनेट यूजर्स किसी न किसी रूप में ऐड ब्लॉकिंग का इस्तेमाल करते हैं, जो लगभग 1.77 अरब लोगों के बराबर है। यानी दुनिया का करीब हर तीसरा इंटरनेट यूजर किसी न किसी तरीके से ऐड्स को ब्लॉक या फिल्टर कर रहा है।
मोबाइल पर यह बदलाव और भी तेज है। 2014 में सिर्फ 9.9 करोड़ लोग मोबाइल पर ऐड ब्लॉकर का इस्तेमाल करते थे, लेकिन 2023 तक यह संख्या बढ़कर 49.6 करोड़ हो गई, यानी करीब पांच गुना से ज्यादा उछाल। वहीं डेस्कटॉप पर यह आंकड़ा 41.6 करोड़ के आसपास है।
देशों की बात करें तो जर्मनी में करीब 49% इंटरनेट यूजर्स ऐड ब्लॉकर्स इस्तेमाल करते हैं। इंडोनेशिया, वियतनाम और चीन में यह आंकड़ा 38–40% से ज्यादा है। Statista और GWI के सर्वे के मुताबिक भारत में भी करीब 50% इंटरनेट यूजर्स किसी न किसी रूप में ऐड ब्लॉकिंग टूल्स का इस्तेमाल कर रहे हैं, जो मोबाइल-फर्स्ट इंटरनेट यूसेज की वजह से तेजी से बढ़ रहा है।
प्राइवेसी पर फोकस करने वाला ब्राउजर Brave भी तेजी से लोकप्रिय हो रहा है। अक्टूबर 2025 तक इसके 10 करोड़ (100 मिलियन) मंथली एक्टिव यूजर्स हो चुके हैं और इसमें डिफॉल्ट रूप से सभी ऐड्स और ट्रैकर्स ब्लॉक होते हैं।
Spotify और YouTube Premium: सब्सक्रिप्शन इकनॉमी का असली चेहरा
अगर ऐड से बचाव सिर्फ "फ्री में" होता, तो शायद इंडस्ट्री इसे नजरअंदाज कर सकती थी। लेकिन यूजर अब इसके लिए पैसे भी दे रहे हैं और यही सबसे बड़ी बात है।
Spotify की बात करें तो कंपनी के Q1 2026 (जनवरी–मार्च 2026) के आधिकारिक SEC filing के अनुसार, Spotify के 29.3 करोड़ (293 मिलियन) प्रीमियम सब्सक्राइबर्स हो चुके हैं। Q1 2025 में यह 26.8 करोड़ थे, यानी एक साल में 9% की बढ़ोतरी और 2.5 करोड़ (25 मिलियन) नए पेइंग यूजर्स। इन सभी ने मुख्यतः एक ही वजह से प्रीमियम लिया- ऐड-फ्री म्यूजिक सुनने के लिए। Spotify के कुल 76.1 करोड़ मंथली एक्टिव यूजर्स हैं (Q1 2026), जिनमें से 48.3 करोड़ ऐड-सपोर्टेड फ्रीम यूजर्स हैं, जो या तो ऐड्स सहते हैं, या एक दिन प्रीमियम लेने की राह पर हैं।
YouTube Premium की कहानी भी कम रोचक नहीं है। YouTube की आधिकारिक घोषणा और Statista के अनुसार, मार्च 2025 तक YouTube Premium और YouTube Music के मिलाकर 12.5 करोड़ (125 मिलियन) subscribers हो चुके थे — जो फरवरी 2024 में 10 करोड़ थे, यानी एक साल में 25% की छलांग। 2020 में यह सिर्फ 3 करोड़ थे। 2026 पहली तिमाही में एल्फाबेट के सीईओ सुंदर पिचई ने अर्निंग कॉल्स में कंफर्म किया कि
यह सब्सक्रिप्शन इकनॉमी की ताकत है। लोग महीने के ₹149 (India, YouTube Premium Individual Plan) या $13.99 (US) खर्च करने को तैयार हैं, सिर्फ इसलिए कि कोई ऐड न आए।
भारत का OTT बाजार: ऐड से प्रीमियम की ओर सफर
भारत में यह बदलाव और भी नाटकीय है। यहां OTT मार्केट की कहानी "फ्री से प्रीमियम" की तरफ जाने की कहानी है।
FICCI-EY 2026 की रिपोर्ट (मार्च 2026) के अनुसार, भारत में डिजिटल सब्सक्रिप्शन रेवेन्यू 60% बढ़कर ₹16,300 करोड़ (INR 163 billion) हो गईं। 2025 में पेड वीडियो सब्सक्रिप्शन 21.6 करोड़ (216 मिलियन) तक पहुंच गईं, जो 14.3 करोड़ घरों में फैली हैं। तुलना के लिए, 2024 में यह संख्या 11.1 करोड़ थी (FICCI-EY 2025 Report, मार्च 2025)। यानी एक साल में लगभग दोगुनी।
JioHotstar (Disney+ Hotstar और JioCinema का विलय) ने 2025 की शुरुआत में IPL के लिए फ्रीमियम मॉडल से पेड सब्सक्रिप्शन की तरफ शिफ्ट किया और इस एक रणनीतिक कदम ने मार्केट को 14.3 करोड़ भुगतान करने वाले घरों तक पहुंचाने में बड़ी भूमिका निभाई।
भारत में औसत OTT व्युअर अब 3 प्लेटफॉर्म्स सब्सक्राइब करता है और हर महीने ₹1,360 से ज्यादा खर्च करता है। भारत में Connected TV (CTV) यूजर्स की संख्या 2024 के 6.97 करोड़ से बढ़कर 2025 में 12.92 करोड़ हो गई, यानी सालभर में 85% की ग्रोथ (FICCI-EY 2026)। बड़े screen पर देखने वाले प्रीमियम एक्सपीरियंस के लिए ज्यादा भुगतान करते हैं।
यूजर आखिर ऐड्स से क्यों भाग रहा है?
यह समझना जरूरी है कि यह सिर्फ "ऐड्स पसंद नहीं" जैसी बात नहीं है। इसके पीछे कई ठोस कारण हैं:
ऐड्स से बचने की वजहें (Ad Avoidance के कारण):
ऐड्स की बाढ़: eyeo की 2023 Ad-Filtering रिपोर्ट के मुताबिक, 63.2% यूजर्स ऐड्स इसलिए ब्लॉक करते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि हर जगह बहुत ज्यादा विज्ञापन हैं।
Intrusive Ads (परेशान करने वाले फॉर्मेट): Auto-play वीडियो जो अचानक आवाज के साथ चल पड़ते हैं, या पॉप-अप्स जो पूरी स्क्रीन ढक लेते हैं—इनको 53.4% से ज्यादा यूजर्स “रुकावट डालने वाला” मानते हैं (eyeo, 2023)।
प्राइवेसी की चिंता: करीब 40.3% यूजर्स कहते हैं कि वे अपनी प्राइवेसी बचाने के लिए ऐड ब्लॉकर इस्तेमाल करते हैं। eyeo और The Harris Poll के नवंबर 2024 सर्वे के मुताबिक, 96% ad-filtering यूजर्स ऑनलाइन प्राइवेसी के लिए खुद कदम उठाते हैं।
धीमी वेबसाइट (Slow Loading): जिन वेबसाइट्स पर ज्यादा ऐड होते हैं, वे धीमी खुलती हैं और मोबाइल डेटा भी ज्यादा खर्च करती हैं, खासतौर पर भारत जैसे मोबाइल-फर्स्ट देशों में यह बड़ी वजह है।
बार-बार वही ऐड (Repetitive Targeting): अगर आपने एक बार कोई प्रोडक्ट देख लिया, तो वही ऐड हर जगह दिखता रहता है। कई यूजर्स इसे “पीछा करने जैसा” अनुभव मानते हैं, जो उन्हें परेशान करता है।
सख्ती का उल्टा असर: जब YouTube ने 2024–2025 में ऐड ब्लॉकर्स के खिलाफ सख्त कदम उठाए और ऐसे यूजर्स के लिए वीडियो लोडिंग धीमी कर दी, तो इसका उल्टा असर देखने को मिला। All About Cookies के सर्वे के मुताबिक, 22% यूजर्स और ज्यादा ऐड ब्लॉकिंग टूल्स खोजने लगे। वहीं सिर्फ 11% लोगों ने कहा कि वे अब ऐड ब्लॉकर कम इस्तेमाल करेंगे।
ब्रैंड्स और विज्ञापनदाताओं पर असर क्या पड़ रहा है?
eyeo और Blockthrough की 2023 Ad-Filtering रिपोर्ट के मुताबिक, ऐड ब्लॉकर्स की वजह से 2024 में दुनियाभर के पब्लिशर्स को करीब 54 अरब डॉलर का नुकसान हुआ, जो ग्लोबल डिजिटल ऐड स्पेंड का लगभग 8% है। रिपोर्ट यह भी बताती है कि अगर “Acceptable Ads” जैसे सिस्टम न होते, तो यह नुकसान 116 अरब डॉलर तक पहुंच सकता था।
Ad Fatigue (ऐड्स से थकान) अब एक बड़ी मार्केटिंग समस्या बन चुकी है। eyeo और The Harris Poll के नवंबर 2024 सर्वे में 89% यूजर्स ने कहा कि ऑनलाइन ऐड्स की संख्या और उनकी परेशान करने वाली प्रकृति पर इंडस्ट्री लेवल पर लिमिट लगनी चाहिए।
ROI (रिटर्न ऑन इन्वेस्टमेंट) भी लगातार गिर रहा है। पारंपरिक डिस्प्ले ऐड्स का असर कम होता जा रहा है। “Banner blindness” यानी यूजर्स का बैनर ऐड्स को बिना देखे नजरअंदाज करना, अब एक साबित मनोवैज्ञानिक व्यवहार बन चुका है।
ट्रस्ट (विश्वास) भी बड़ा मुद्दा बन गया है।
अगर कोई यूजर सिर्फ ऐड्स से बचने के लिए पैसे देने लगे, तो यह ब्रैंड के लिए साफ संकेत है कि कहीं न कहीं वह यूजर एक्सपीरियंस में फेल हो रहा है।
इंडस्ट्री का जवाब: बदलाव की कोशिश
विज्ञापन इंडस्ट्री अब खुद को बदलने की कोशिश कर रही है:
Native Advertising: ऐसे ऐड्स जो कंटेंट जैसे दिखते और महसूस होते हैं। ये कम ब्लॉक होते हैं क्योंकि ये कंटेंट के साथ घुल-मिल जाते हैं।
Content Marketing: ब्रैंड्स अब खुद कंटेंट बना रहे हैं- वीडियो, ब्लॉग, पॉडकास्ट, जहां ऐड अलग से नहीं, बल्कि कंटेंट का हिस्सा बन जाता है।
Influencer Integration: क्रिएटर इकॉनमी में ब्रैंड्स अब इन्फ्लुएंसर्स के जरिए प्रोडक्ट को “सिफारिश” की तरह पेश कर रहे हैं, जिससे वह ऐड कम और पर्सनल सुझाव ज्यादा लगता है।
Acceptable Ads Program: eyeo (AdBlock Plus बनाने वाली कंपनी) का यह प्रोग्राम ऐसे ऐड्स को अनुमति देता है जो यूजर को परेशान नहीं करते। 2025 तक इसमें करीब 40 करोड़ यूजर्स शामिल हो चुके थे (स्रोत: eyeo; eMarketer 2026)। इससे साफ है कि यूजर्स हर ऐड के खिलाफ नहीं हैं- वे सिर्फ खराब और intrusive ऐड्स से परेशान हैं।
Short-form Subtle Branding: YouTube Shorts और Instagram Reels जैसे फॉर्मेट्स में ब्रैंडिंग इतनी नेचुरल तरीके से होती है कि यूजर उसे स्किप करने की सोचता ही नहीं।
क्या विज्ञापन का भविष्य बदल रहा है?
2026 में एक बात साफ नजर आ रही है- विज्ञापन का पुराना “Interruption Model”, यानी कंटेंट के बीच में जबरदस्ती ऐड दिखाना, अब पहले जैसा असरदार नहीं रहा है। यूजर्स अब ऐसे ऐड्स से बचने लगे हैं और उन्हें नजरअंदाज करना सीख चुके हैं।
अब इंडस्ट्री में धीरे-धीरे बड़ा बदलाव दिख रहा है। पहले जहां ब्रांड्स यूजर्स पर ऐड्स “थोपते” थे, वहीं अब फोकस यूजर को बेहतर अनुभव देने पर शिफ्ट हो रहा है। मतलब Interruption से Experience की तरफ बढ़त हो रही है।
इसी तरह, पहले जहां सिर्फ मैसेज “पुश” करने पर जोर था, अब ब्रांड्स यूजर के साथ जुड़ने और उन्हें एंगेज करने पर ध्यान दे रहे हैं। यानी Push से Engagement की तरफ ट्रेंड बदल रहा है।
साथ ही, डेटा के अंधाधुंध इस्तेमाल के बजाय अब भरोसा जीतना ज्यादा जरूरी हो गया है। इसलिए Data से Trust की तरफ भी साफ बदलाव दिख रहा है।
कुल मिलाकर, अब Privacy-first advertising को भविष्य माना जा रहा है—जहां यूजर को साफ-साफ पता हो कि उसका डेटा कैसे और क्यों इस्तेमाल किया जा रहा है। यही अप्रोच आने वाले समय में विज्ञापन की दिशा तय करेगी।
इंडस्ट्री के लिए साफ चेतावनी
Ad Avoidance Economy अब सिर्फ कुछ लोगों की शिकायत नहीं रही, बल्कि करोड़ों यूजर्स का एक बड़ा संकेत बन चुकी है।
जब Spotify पर Q1 2026 में 29.3 करोड़ लोग पैसे देकर ऐड्स से बच रहे हों, जब YouTube Premium के 12.5 करोड़ सब्सक्राइबर्स (मार्च 2025) ऐड-फ्री एक्सपीरियंस के लिए पैसे दे रहे हों, और भारत में डिजिटल सब्सक्रिप्शन तेजी से बढ़ रहा हो, तो यह इंडस्ट्री के लिए एक साफ संदेश है।
अगर विज्ञापन यूजर के अनुभव का सम्मान नहीं करेंगे, अगर वे लगातार परेशान करने वाले, दोहराव वाले और प्राइवेसी में दखल देने वाले बने रहेंगे—तो यूजर उन्हें पूरी तरह से नजरअंदाज कर देगा। और इसके लिए वह पैसे खर्च करने को भी तैयार है।
जो इंडस्ट्री इस बदलाव को समझ लेगी, वही आगे टिकेगी। जो नहीं समझेगी- वह धीरे-धीरे यूजर के लिए “इनविजिबल” हो जाएगी।
एक समय था जब ब्रैंड्स के लिए टीवी पर 30 सेकंड का ऐड सबसे कीमती माना जाता था। लेकिन अब तस्वीर बदल गई है।
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Vikas Saxena
एक समय था जब ब्रैंड्स के लिए टीवी पर 30 सेकंड का ऐड सबसे कीमती माना जाता था। लेकिन अब तस्वीर बदल गई है। आज वही पैसा (कई बार उससे भी ज्यादा) Instagram Reel जैसे प्लेटफॉर्म पर सिर्फ 15 सेकंड के वीडियो पर खर्च हो रहा है। भारत का ऐडवर्टाइजिंग मार्केट अब ऐसे दौर में पहुंच चुका है, जहां “मोबाइल-फर्स्ट इंडिया” सीधे “मोबाइल-फर्स्ट ऐडवर्टाइजिंग” बन गया है। साफ शब्दों में कहें तो अब ज्यादातर ऐड मोबाइल स्क्रीन को ध्यान में रखकर बनाए जा रहे हैं।
आंकड़े भी यही बताते हैं कि भारत में डिजिटल ऐड पर होने वाले कुल खर्च का करीब 78% हिस्सा अब सिर्फ मोबाइल पर ही खर्च हो रहा है। यानी जो टीवी कभी “सबसे बड़ी स्क्रीन” और ऐड का सबसे ताकतवर जरिया माना जाता था, उसकी पकड़ अब कमजोर पड़ रही है। और यह बदलाव इतना तेजी से आया है कि पूरी इंडस्ट्री अभी भी इसे समझने और अपनाने में लगी हुई है।
₹49,000 करोड़ का डिजिटल साम्राज्य और उसका राजा है मोबाइल
ET Brand Equity और Ipsos की रिपोर्ट "The State of Digital Advertising in India 2025-26" (सितंबर 2025) के अनुसार, भारत का कुल ऐड खर्च FY2025 (अप्रैल 2024 – मार्च 2025) में ₹1,11,000 करोड़ पहुंच गया- यह पिछले साल की तुलना में 11% की वृद्धि है।
इसमें सबसे बड़ा हिस्सा डिजिटल ऐड का है- ₹49,000 करोड़, यानी कुल बाजार का 44%। पहली बार डिजिटल ने टेलीविजन को पीछे छोड़ दिया है। टेलीविजन का हिस्सा 27%, प्रिंट का 18%, OTT का 5%, OOH (आउटडोर) का 3%, रेडियो का 2% और सिनेमा का 1% रह गया है। FY2026 में यह डिजिटल खर्च और 15% बढ़कर ₹56,400 करोड़ तक पहुंचने का अनुमान है, जो कुल बाजार का 46% होगा। और इस पूरे डिजिटल साम्राज्य का राजा है- मोबाइल। उसी Ipsos रिपोर्ट के अनुसार, 78% डिजिटल ऐड खर्च मोबाइल प्लेटफॉर्म पर होता है। स्मार्टफोन अब "commerce, content और engagement" तीनों के लिए primary screen बन चुका है।
Sensor Tower की "State of Digital Advertising India 2026" रिपोर्ट (फरवरी 2026) के अनुसार, 2025 में भारत का कुल डिजिटल ऐड खर्च US$4.2 बिलियन रहा और 2026 में इसके US$5 बिलियन तक पहुंचने का अनुमान है। ResearchAndMarkets (फरवरी 2026) के अनुसार, सभी digital channels- Search, Social, Display, Video, OTT, Retail Media- मिलाकर 2026 में भारत का Digital Ad Spend Market US$14.56 बिलियन तक पहुंच सकता है।
अरब इंटरनेट यूजर्स- और ज्यादातर मोबाइल पर
DataReportal की "Digital 2026: India" रिपोर्ट (नवंबर 2025) के अनुसार, 2025 के अंत तक भारत में 103 करोड़ (1.03 बिलियन) इंटरनेट यूजर्स थे- internet penetration 70% पर पहुंच गई। इसके साथ ही 106 करोड़ cellular mobile connections सक्रिय थे, जो देश की कुल आबादी का 72.5% है।
ET Brand Equity–Ipsos रिपोर्ट के अनुसार, 2025 में भारत में 5.6 करोड़ नए इंटरनेट यूजर्स जुड़े। 2026 में Connected TV (CTV) यूजर्स 40 मिलियन से बढ़कर 50 मिलियन तक पहुंचने का अनुमान है। 5G की बात करें तो जनवरी 2026 में भारत में 40 करोड़ 5G users थे- 2025 के 36.5 करोड़ से 9.59% की वृद्धि।
यह सारे आंकड़े एक बात साफ करते हैं: भारत अब दुनिया के सबसे बड़े मोबाइल इंटरनेट बाजारों में से एक है और इसी वजह से ब्रैंड्स के लिए मोबाइल स्क्रीन सबसे जरूरी ऐड माध्यम बन गई है।
OTT, Reels और Shorts- ब्रैंड्स की नई दुनिया
अब OTT प्लेटफॉर्म्स (जैसे Netflix, JioCinema, Hotstar आदि) पर ऐड करना कोई नया प्रयोग नहीं रहा, बल्कि मीडिया प्लानिंग का जरूरी हिस्सा बन गया है। Ipsos की रिपोर्ट के मुताबिक, 2025 वह साल था जब OTT को “ऑप्शन” नहीं, बल्कि “कोर” यानी जरूरी प्लेटफॉर्म माना जाने लगा। पहली बार 2025 में OTT ऐड को कुल एड खर्च में एक अलग और अहम कैटेगरी के तौर पर देखा गया। इसी साल भारत में OTT यूजर्स की संख्या बढ़कर करीब 60 करोड़ से ज्यादा हो गई, जिससे ब्रैंड्स के लिए यह प्लेटफॉर्म और भी अहम बन गया।
Connected TV (CTV) यानी इंटरनेट से जुड़े स्मार्ट टीवी पर भी तेजी से ग्रोथ दिख रही है। Deloitte और PwC की रिपोर्ट के अनुसार, CTV ऐड खर्च 2022 में करीब ₹450 करोड़ था, जो 2024 तक बढ़कर ₹1,500 करोड़ हो गया यानी तीन गुना से ज्यादा।
Madison World की रिपोर्ट कहती है कि 2025 के अंत तक यह खर्च ₹2,300-2,500 करोड़ तक पहुंच सकता है, और 2027 तक ₹3,500 करोड़ तक जाने की उम्मीद है। वहीं WPP Media के अनुमान के मुताबिक, भारत का कुल ऐडवर्टाइजिंग मार्केट 2026 में ₹2 लाख करोड़ के आसपास पहुंच सकता है।
अब OTT सिर्फ कंटेंट देखने का प्लेटफॉर्म नहीं रहा, बल्कि ब्रैंड्स के लिए बड़ा एड प्लेटफॉर्म बन चुका है। JioCinema और JioStar जैसे प्लेटफॉर्म IPL जैसे बड़े इवेंट्स में ब्रैंड्स को ऐसे एड ऑप्शन दे रहे हैं, जहां वे दर्शकों तक हर स्तर पर पहुंच सकते हैं।
खास बात यह है कि अब ऐसे ऐड ज्यादा पसंद किए जा रहे हैं जिन्हें स्किप नहीं किया जा सकता और जिन पर दर्शकों का पूरा ध्यान जाता है। यानी साफ है—OTT अब एडवर्टाइजिंग की दुनिया का एक बड़ा और मजबूत खिलाड़ी बन चुका है।
Reels और Shorts- "15 सेकंड में बिकती दुनिया"
इन्फ्लुएंसर मार्केटिंग- ₹3,375 करोड़ की नई अर्थव्यवस्था
इन्फ्लुएंसर मार्केटिंग अब एक "एक्सपेरिमेंट" नहीं बल्कि मेनस्ट्रीम ऐडवर्टाइजिंग स्ट्रेटजी है। इंडस्ट्री रिपोर्ट्स के अनुसार, 2025 में भारत का इन्फ्लुएंसर मार्केटिंग बाजार ₹3,000 से ₹3,500 करोड़ के बीच था और 2026 में यह ₹3,375 करोड़ तक पहुंचने का अनुमान है- यानी 25% CAGR से वृद्धि।
Kofluence की इन्फ्लुएंसर मार्केटिंग Research Report 2025 के अनुसार, Instagram इन्फ्लुएंसर मार्केटिंग के लिए सबसे बड़ा प्लेटफॉर्म बना हुआ है- 50% से अधिक brand allocations यहाँ जाते हैं। Micro-influencers (10,000 से 1 लाख followers) Tier-2 और Tier-3 शहरों में hyperlocal campaigns के जरिए brands को ज्यादा ROI दे रहे हैं। FMCG, E-commerce, Beauty, Finance और Food सेक्टर इन्फ्लुएंसर मार्केटिंग में सबसे बड़े निवेशक हैं।
Sensor Tower की 2026 रिपोर्ट के अनुसार, Shopping category ने 2025 में भारत के डिजिटल ऐड खर्च का 28-30% हिस्सा घेरा, जिसमें Flipkart, Reliance Retail और Amazon के बीच सबसे कड़ा मुकाबला रहा। Flipkart की Big Billion Day 2025 campaign में लगभग 80% audience युवा users थे।
टेलीविजन की घटती ताकत: लाइसेंस वापस, ऐड गायब
टीवी पर घट रहा असर: ऐड और दर्शक दोनों कम हुए
जहां एक तरफ डिजिटल और मोबाइल तेजी से बढ़ रहे हैं, वहीं टीवी की हालत कुछ ठीक नहीं दिख रही। WPP की रिपोर्ट के मुताबिक, 2025 में भारत का कुल TV ऐड रेवेन्यू करीब 1.5% गिरकर ₹47,740 करोड़ रह गया।
TAM Media Research के आंकड़े बताते हैं कि 2025 में TV पर दिखने वाले ऐडों की संख्या (ad volumes) में पिछले साल के मुकाबले 11% की गिरावट आई। इसकी बड़ी वजह रही- रियल मनी गेमिंग गेम पर बैन, FMCG कंपनियों का कम खर्च और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स की तेज बढ़त।
FICCI और Ernst & Young (FICCI-EY रिपोर्ट) के अनुसार, 2024 में भी टीवी सेक्टर की कमाई 4.5% घट गई थी। यह लगातार दूसरा साल था जब गिरावट देखी गई (2023 में 2% गिरावट आई थी)। इतना ही नहीं, 2024 में TV पर ऐड से होने वाली कमाई 6% कम हो गई और ऐड देने वाले ब्रैंड्स की संख्या भी 12% घट गई। दर्शकों की संख्या में भी गिरावट आई है। FY25 में एक्टिव DTH यूजर्स करीब 5.69 करोड़ रह गए, जो FY24 के 6.19 करोड़ से कम हैं।
Dentsu का अनुमान है कि आने वाले समय में TV का कुल ऐड खर्च में हिस्सा और घट सकता है- 2027 तक यह 21% से गिरकर करीब 15% तक आ सकता है। इस गिरावट का असर साफ दिख रहा है। पिछले तीन सालों में 50 से ज्यादा TV चैनलों के लाइसेंस वापस किए जा चुके हैं। इसमें Zee Entertainment, TV Today Network, NDTV और ABP Network जैसे बड़े नाम भी शामिल हैं।
साफ है कि टीवी जो कभी ऐड की दुनिया का सबसे बड़ा मंच था, अब डिजिटल के सामने अपनी पकड़ खोता जा रहा है।
प्रोग्रामैटिक, रिटेल मीडिया और AI- अगली पीढ़ी का ऐडवर्टाइजिंग
अब मोबाइल पर दिखने वाले ऐड पहले जैसे नहीं रहे। अब यह पूरी तरह से ऑटोमेटेड (अपने आप चलने वाले) और डेटा के आधार पर तय होने लगे हैं।
Ipsos की रिपोर्ट के मुताबिक, 2025 में डिजिटल ऐड का 40% से ज्यादा हिस्सा अब प्रोग्रामैटिक ट्रेडिंग के जरिए हो रहा है। यानी कंप्यूटर और AI खुद तय करते हैं कि कौन-सा ऐड किसे और कब दिखाना है।
Retail media भी तेजी से बढ़ रहा है। Amazon Ads, Flipkart Ads, JioMart, Blinkit और Zepto जैसे प्लेटफॉर्म पर ऐड में साल-दर-साल 20% से ज्यादा की बढ़त देखी गई है। यह ग्रोथ सर्च और सोशल मीडिया ऐड से भी तेज है। FMCG और E-commerce कंपनियां मिलकर digital advertising का करीब 68% खर्च कर रही हैं, यानी सबसे ज्यादा पैसा यही सेक्टर लगा रहे हैं।
Sensor Tower की 2026 रिपोर्ट के अनुसार, 2025 में सॉफ्टवेयर कैटेगरी में ऐड खर्च सबसे तेजी से बढ़ा- इसमें 84% की जबरदस्त ग्रोथ दर्ज की गई। इसके बाद Food & Dining में 38% और Travel & Tourism में 40% की बढ़त रही।
अब AI (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) भी ऐड का बड़ा हिस्सा बन चुका है। Ad buying (ऐड खरीदना), टार्गेटिंग (किसे दिखाना है) और creative बनाना- इन सबमें AI का इस्तेमाल आम हो गया है।
AI की मदद से ब्रैंड्स अब छोटे शहरों (Tier-2 और Tier-3) के लोगों के लिए उनकी भाषा में, उनकी पसंद के हिसाब से पर्सनलाइज्ड ऐड बना रहे हैं। यानी हर यूजर को अलग-अलग और ज्यादा जुड़ा हुआ कंटेंट दिख रहा है। आने वाले समय में, खासकर 2026 में, यह ट्रेंड और तेज होने वाला है। साफ है—मोबाइल एडवर्टाइजिंग अब सिर्फ बड़ी नहीं, बल्कि ज्यादा स्मार्ट भी हो चुकी है।
टीवी बनाम मोबाइल: नंबरों में पूरी कहानी
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पैमाना |
टेलीविजन (2025) |
मोबाइल/डिजिटल (2025-26) |
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कुल Ad Spend में हिस्सा |
27% (₹47,740 Cr, घटता हुआ) |
44% (₹49,000 Cr, बढ़ता हुआ) |
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Ad Volume growth (2025) |
-11% (TAM data) |
+20% (digital, Ipsos) |
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Brands की संख्या |
-12% (2024 vs 2023) |
लगातार नए advertiser जुड़ रहे |
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CTV ad revenue |
₹1,500 Cr (2024) |
₹2,300-2,500 Cr (2025 est.) |
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2027 तक projected share |
15% (Dentsu) |
46%+ (Ipsos) |
जमीनी हकीकत: Tier-2 भारत बदल रहा है खेल
अब मोबाइल ऐड का असली विस्तार बड़े शहरों में नहीं, बल्कि छोटे शहरों (Tier-2 और Tier-3) में हो रहा है। Ipsos की रिपोर्ट के मुताबिक, आने वाले 20-30 करोड़ नए इंटरनेट यूजर्स अपनी स्थानीय भाषा (vernacular) में कंटेंट देखना पसंद करेंगे। यही वजह है कि ShareChat (और Moj), Dailyhunt (Josh) और InMobi जैसे भारतीय प्लेटफॉर्म तेजी से आगे बढ़ रहे हैं। ये प्लेटफॉर्म regional कंटेंट और अलग-अलग ऑडियंस को टारगेट करने की रणनीति के जरिए Google और Meta Platforms जैसी बड़ी कंपनियों को चुनौती दे रहे हैं।
वहीं दूसरी तरफ, Accenture की रिपोर्ट बताती है कि 77% भारतीय यूजर्स इतने सारे OTT प्लेटफॉर्म देखकर कन्फ्यूज हो जाते हैं। इसी वजह से अब लोग ऐसे प्लान पसंद कर रहे हैं, जिनमें कई OTT एक साथ मिल जाएं। जैसे Airtel का Xstream और Jio का JioFiber, इनमें एक ही पैक में कई OTT प्लेटफॉर्म मिल जाते हैं (Airtel में 25+ और Jio में 16 तक)।
CTV (Connected TV) यानी इंटरनेट वाले स्मार्ट टीवी का इस्तेमाल भी तेजी से बढ़ रहा है। MiQ की रिपोर्ट के अनुसार, 2025 तक भारत में CTV यूजर्स की संख्या 87% बढ़कर करीब 13 करोड़ तक पहुंच गई है। यानी अब 6-7 करोड़ घरों में CTV इस्तेमाल हो रहा है। इसके अलावा, छोटे शहरों में Reels और शॉर्ट वीडियो का क्रेज और भी ज्यादा है। खासकर Diwali, Eid, Onam और Pongal जैसे त्योहारों के दौरान ये वीडियो तेजी से वायरल होते हैं।
यही वजह है कि अब ब्रैंड्स के लिए ये शॉर्ट वीडियो सिर्फ सोशल मीडिया कंटेंट नहीं, बल्कि पूरे देश में चलने वाले बड़े ऐड कैंपेन का मजबूत विकल्प बन चुके हैं।
'स्क्रीन' की लड़ाई खत्म हो चुकी है
अगर यह पूछा जाए कि "स्क्रीन की लड़ाई" खत्म हुई या नहीं- तो जवाब है: हां, खत्म हो चुकी है। और जीता है मोबाइल। 78% डिजिटल ad spend, 103 करोड़ internet users, 601 मिलियन OTT दर्शक, 200 billion YouTube Shorts daily views (जून 2025), Reels पर 50% Instagram screen time, ₹3,375 करोड़ का influencer economy, और 50 से अधिक TV channels का बंद होना- यह सब मिलकर एक ही कहानी कह रहे हैं। टेलीविजन अभी मरा नहीं है, लेकिन वह अब "King Screen" नहीं रहा। मोबाइल ने वह ताज छीन लिया है।
FY2026 में डिजिटल ऐड के ₹56,400 करोड़ तक पहुंचने और टोटल ऐड मार्केटिंग के ₹2 लाख करोड़ को छूने के अनुमानों के साथ, यह साफ है कि भारत की ऐडवर्टाइजिंग इंडस्ट्री का भविष्य मोबाइल स्क्रीन पर लिखा जा रहा है- Reels में, Shorts में, OTT ads में, और influencer की आवाज में।
टेक कंपनी Google जल्द ही अपने AI चैटबॉट Gemini में विज्ञापन जोड़ सकती है।
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Samachar4media Bureau
टेक कंपनी Google जल्द ही अपने AI चैटबॉट Gemini में विज्ञापन जोड़ सकती है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, कंपनी इस प्लेटफॉर्म को ज्यादा कमाई करने वाला बनाने की दिशा में काम कर रही है। अगर ऐसा होता है, तो यूजर्स को AI से बातचीत के दौरान स्पॉन्सर्ड कंटेंट भी दिख सकता है।
अब तक AI चैटिंग को एक साफ-सुथरा और बिना विज्ञापन वाला अनुभव माना जाता था, लेकिन आने वाले समय में यह बदल सकता है। बताया जा रहा है कि जेमिनी में यूजर की सर्च हिस्ट्री और पूछे गए सवालों के आधार पर विज्ञापन दिखाए जा सकते हैं। यानी जो आप सर्च करेंगे या पूछेंगे, उसी हिसाब से आपको सुझाव और प्रमोटेड कंटेंट दिख सकता है।
जानकारों का कहना है कि Google अपने AI प्रोडक्ट्स से कमाई बढ़ाना चाहता है। कंपनी पहले ही अपने AI-आधारित सर्च फीचर्स में विज्ञापन दिखा रही है और उसे अच्छा रिस्पॉन्स भी मिला है। अब इसी मॉडल को जेमिनी में लागू करने की तैयारी चल रही है। इससे AI जवाबों के साथ शॉपिंग रिकमेंडेशन और ब्रांडेड सुझाव भी दिख सकते हैं।
रिपोर्ट्स में यह भी कहा जा रहा है कि जेमिनी में पर्सनलाइज्ड विज्ञापन, कॉन्टेक्स्ट के हिसाब से सुझाव और AI जनरेटेड स्पॉन्सर्ड रिस्पॉन्स जैसे फीचर्स जोड़े जा सकते हैं। हालांकि, कंपनी की ओर से अभी तक इस पर आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है।
अगर जेमिनी में विज्ञापन आते हैं, तो इसका असर पूरी AI इंडस्ट्री पर पड़ सकता है। इससे OpenAI के ChatGPT को भी सीधी टक्कर मिल सकती है। हालांकि कंपनियां यह कह रही हैं कि विज्ञापन से जवाबों की गुणवत्ता पर असर नहीं पड़ेगा, लेकिन एक्सपर्ट्स मानते हैं कि इससे यूजर का अनुभव जरूर बदल सकता है।
एक्सपर्ट्स का कहना है कि AI अब सिर्फ टेक्नोलॉजी नहीं रहा, बल्कि तेजी से एक बिजनेस प्लेटफॉर्म बनता जा रहा है। कंपनियां सब्सक्रिप्शन, प्रीमियम फीचर्स, विज्ञापन और स्पॉन्सर्ड रिजल्ट के जरिए कमाई के नए रास्ते तलाश रही हैं।
डिजिटल ऐडवर्टाइजिंग कंपनी 'ऐडकाउंटी मीडिया इंडिया लिमिटेड' (AdCounty Media India Limited) के बोर्ड में जल्द बड़ा बदलाव होगा।
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Samachar4media Bureau
डिजिटल ऐडवर्टाइजिंग कंपनी 'ऐडकाउंटी मीडिया इंडिया लिमिटेड' (AdCounty Media India Limited) के बोर्ड में जल्द बड़ा बदलाव होगा। कंपनी ने 28 अप्रैल 2026 को हुई बोर्ड मीटिंग में दो अहम नियुक्तियों को मंजूरी दी है।
मिली जानकारी के मुताबिक, कुमार सौरव को कंपनी का एडिशनल डायरेक्टर (एग्जिक्यूटिव) नियुक्त किया गया है। उन्हें आगे चलकर होल-टाइम डायरेक्टर बनाया जाएगा और उनका कार्यकाल 5 साल का होगा। हालांकि, इसके लिए शेयरधारकों की मंजूरी अभी बाकी है।
वहीं, प्रतीक भंसाली को भी कंपनी के बोर्ड में शामिल किया गया है। उन्हें नॉन-एग्जिक्यूटिव इंडिपेंडेंट डायरेक्टर के तौर पर एडिशनल डायरेक्टर बनाया गया है। उनका कार्यकाल भी 5 साल का होगा और उनकी नियुक्ति भी शेयरधारकों की मंजूरी के अधीन रहेगी।
कंपनी ने साफ किया है कि दोनों ही नियुक्तियां 28 अप्रैल 2026 से लागू मानी जाएंगी। साथ ही, कंपनी जल्द ही पोस्टल बैलेट के जरिए शेयरधारकों से इन नियुक्तियों पर मंजूरी लेगी।
कंपनी के मुताबिक, कुमार सौरव इस समय AdCounty Media में चीफ स्ट्रैटेजी ऑफिसर के तौर पर काम कर रहे हैं और उन्हें मोबाइल ऐडवर्टाइजिंग इंडस्ट्री का अच्छा अनुभव है। उन्होंने कंपनी की ग्रोथ स्ट्रैटेजी बनाने और उसे लागू करने में अहम भूमिका निभाई है। इससे पहले वह Dentsu International, Mindshare जैसी बड़ी कंपनियों में भी काम कर चुके हैं और Lufthansa, Timex, GSK और Swatch जैसे बड़े क्लाइंट्स के साथ काम कर चुके हैं।
वहीं, प्रतीक भंसाली एक कंपनी सेक्रेटरी और लॉ ग्रेजुएट हैं, जिनके पास 10 साल से ज्यादा का अनुभव है। उन्हें कॉरपोरेट गवर्नेंस, रेगुलेटरी कंप्लायंस और बोर्ड से जुड़े मामलों की अच्छी समझ है। वह कई कंपनियों को कंप्लायंस और गवर्नेंस से जुड़े मामलों में सलाह देते रहे हैं।
कंपनी ने यह भी बताया कि कुमार सौरव और प्रतीक भंसाली का कंपनी के किसी भी मौजूदा डायरेक्टर से कोई संबंध नहीं है। साथ ही, उन्हें किसी भी रेगुलेटरी अथॉरिटी द्वारा डायरेक्टर बनने से रोका नहीं गया है।
चुनाव के दौरान फेक और भ्रामक कंटेंट पर भारतीय चुनाव आयोग (ECI) ने बड़ा एक्शन लिया है। इस बार खास तौर पर ‘आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस’ (AI) से बने या एडिट किए गए कंटेंट पर सख्ती बरती जा रही है।
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Samachar4media Bureau
चुनाव के दौरान फेक और भ्रामक कंटेंट पर भारतीय चुनाव आयोग (ECI) ने बड़ा एक्शन लिया है। आयोग ने बताया कि अब तक 11,000 से ज्यादा ऐसे सोशल मीडिया पोस्ट और कंटेंट पर कार्रवाई की गई है, जो चुनाव से जुड़े थे और नियमों का उल्लंघन कर रहे थे।
आयोग के मुताबिक, 15 मार्च को चुनाव की घोषणा के बाद से लगातार निगरानी की जा रही है। इस दौरान कई पोस्ट हटाए गए, कुछ मामलों में एफआईआर दर्ज हुई और कई जगह सफाई (क्लैरिफिकेशन) और जवाब (रिबटल) भी जारी किए गए।
इस बार खास तौर पर ‘आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस’ (AI) से बने या एडिट किए गए कंटेंट पर सख्ती बरती जा रही है। आयोग ने साफ कहा है कि अगर कोई भ्रामक या फर्जी एआई कंटेंट सामने आता है, तो सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को उसे 3 घंटे के अंदर हटाना होगा।
साथ ही, राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों को भी निर्देश दिया गया है कि अगर वे एआई से बना या एडिट किया हुआ कंटेंट इस्तेमाल करते हैं, तो उसे साफ तौर पर “AI-Generated”, “Digitally Enhanced” या “Synthetic Content” लिखकर बताना जरूरी होगा, ताकि वोटर्स को गुमराह न किया जा सके।
बता दें कि असम, केरल और पुडुचेरी में चुनाव हो चुके हैं, जबकि तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में इसी महीने मतदान होना है। ऐसे में चुनाव आयोग सोशल मीडिया पर फैल रही गलत जानकारी को रोकने के लिए पूरी तरह सख्त नजर आ रहा है।
एक तरफ टेलीविजन- जो दशकों से भारतीय घरों का केंद्र रहा है। दूसरी तरफ OTT- जो स्मार्टफोन और स्मार्ट TV की स्क्रीन पर तेजी से छा रहा है।
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Vikas Saxena
एक तरफ टेलीविजन- जो दशकों से भारतीय घरों का केंद्र रहा है। दूसरी तरफ OTT- जो स्मार्टफोन और स्मार्ट TV की स्क्रीन पर तेजी से छा रहा है। 2025-26 में एक ऐतिहासिक बदलाव आया है: पहली बार डिजिटल मीडिया ने टेलीविजन को पीछे छोड़ दिया, विज्ञापन बजट उसी दिशा में मुड़ रहे हैं और T20 वर्ल्डकप 2026 ने इस बदलाव पर मुहर लगा दी।
8 मार्च 2026. अहमदाबाद के नरेंद्र मोदी स्टेडियम में T20 World Cup का फाइनल था- भारत बनाम न्यूजीलैंड। स्टेडियम में एक लाख से ज्यादा दर्शक थे, लेकिन असली तमाशा डिजिटल स्क्रीन पर था। JioHotstar पर उस दिन पीक पर 7.25 करोड़ (72.5 million) लोग एक साथ लाइव स्ट्रीम देख रहे थे- यह दुनिया का अब तक का सबसे बड़ा LIVE स्ट्रीमिंग रिकॉर्ड था, किसी भी डिजिटल प्लेटफॉर्म पर, किसी भी इवेंट के लिए। यह सिर्फ एक क्रिकेट रिकॉर्ड नहीं था। यह भारत के बदलते मीडिया परिदृश्य का सबसे बड़ा सबूत था कि अब स्क्रीन बड़ी नहीं, इंटरनेट कनेक्शन बड़ा है।
बड़ी तस्वीर: 2025 में पलट गई बाजी
FICCI-EY की मार्च 2026 में जारी रिपोर्ट 'Stories, Scale and Impact: Unlocking India's Media and Entertainment Economy' ने साफ कर दिया कि भारत की मीडिया इंडस्ट्री एक बड़े संरचनात्मक बदलाव से गुजर रही है, जो अब वापस नहीं होने वाला।
भारत का मीडिया और एंटरटेनमेंट (M&E) सेक्टर 2025 में 9% बढ़कर ₹2,78,000 करोड़ ($32 billion) तक पहुंच गया, जो देश की nominal GDP per capita growth (7.7%) से भी तेज है। सेक्टर अब देश की GDP में 0.8% योगदान देता है और 27.5 लाख लोगों को सीधे रोजगार देता है। लेकिन इस रिपोर्ट की सबसे बड़ी हेडलाइन यह थी: पहली बार डिजिटल मीडिया ने ₹1,00,000 करोड़ का आंकड़ा पार किया और M&E सेक्टर का सबसे बड़ा सेगमेंट बन गया- टेलीविजन को पीछे छोड़ते हुए।
विज्ञापन बाजार: डिजिटल का दबदबा, TV हो रहा कमजोर
FICCI-EY 2026 रिपोर्ट के मुख्य पॉइंट्स:
कुल मिलाकर, साफ है कि विज्ञापन बाजार तेजी से डिजिटल की तरफ शिफ्ट हो रहा है, जबकि TV की पकड़ धीरे-धीरे कमजोर पड़ रही है।
WPP Media TYNY 2026: ₹2 लाख करोड़ की तरफ
18 फरवरी 2026 को WPP Media (पूर्व GroupM) ने अपनी ताजा TYNY (This Year Next Year) रिपोर्ट जारी की। यह 2026 के लिए भारत का सबसे भरोसेमंद और प्रामाणिक विज्ञापन पूर्वानुमान है। इसमें बताया गया है कि 2026 में भारत का कुल विज्ञापन राजस्व 9.7% बढ़कर ₹2,01,891 करोड़ तक पहुंचने का अनुमान है, यानी पहली बार ₹2 लाख करोड़ का आंकड़ा पार होगा।
तब WPP Media में दक्षिण एशिया के CEO प्रशांत कुमार ने कहा था, “डिजिटल अब विज्ञापन खर्च का लगभग 68% हिस्सा संभाल रहा है। अब यह पूरा इकोसिस्टम सिर्फ इम्प्रेशन्स पर नहीं, बल्कि नतीजों (आउटकम्स) पर आधारित है।”
2026 में किस चैनल में कितनी ग्रोथ: WPP Media का अनुमान:
साफ है कि जहां डिजिटल विज्ञापन तेजी से दो अंकों में बढ़ रहा है, वहीं टेलीविजन की ग्रोथ अब एकल अंक में भी मुश्किल से टिक पा रही है।
टीवी की कहानी: खत्म नहीं, बदल रहा है रूप
FICCI-EY रिपोर्ट में एक अहम बात कही गई है- “टेलीविजन खत्म नहीं हो रहा, बल्कि खुद को बदल रहा है।”
2025 में TV के 74.5 करोड़ वीकली व्युअर्स थे। यह आंकड़ा TV की पहुंच (रीच) को दर्शाता है। लेकिन विज्ञापनदाताओं का भरोसा डगमगा रहा है।
TV का संकट दरअसल दो मोर्चों पर है:
पहला- स्पोर्ट्स कंटेंट का OTT पर पलायन: T20 वर्ल्डकप 2026 के सेमीफाइनल में भारत vs इंग्लैंड मैच को 32 करोड़ से ज्यादा लोगों ने टीवी और डिजिटल मिलाकर देखा, लेकिन इसमें से बड़ा हिस्सा OTT पर था। फाइनल में तो JioHotstar पर 7.25 करोड़ concurrent व्युअर्स- यह linear TV के एकल चैनल के लिए कभी संभव नहीं था।
दूसरा- Connected TV का उभार: FICCI-EY रिपोर्ट के अनुसार Connected TV homes 2025 में बढ़कर लगभग 4 करोड़ वीकली होम्स हो गए- 2024 के 3 करोड़ से 33% की बढ़त। यानी TV स्क्रीन जिंदा है, बस उस पर चल OTT रहा है।
JioStar ने BARC India और Nielsen के साथ मिलकर ICC Men's T20 वर्ल्डकप 2026 के दौरान एक बड़ा cross-screen स्टडी किया। इस स्टडी में सामने आया कि TV और डिजिटल (OTT) विज्ञापन कैंपेन में ऑडियंस का overlap यानी एक ही दर्शक दोनों जगह देखने का प्रतिशत 10% से भी कम था। यानी साफ है कि TV देखने वाले और OTT पर कंटेंट देखने वाले लोग काफी हद तक अलग-अलग हैं।
इसका मतलब यह है कि ब्रैंड्स के लिए सिर्फ एक प्लेटफॉर्म पर फोकस करना काफी नहीं है- बेहतर पहुंच के लिए TV और डिजिटल दोनों पर मौजूद रहना जरूरी है।
OTT का उभार: नंबरों में
FICCI-EY 2026 रिपोर्ट: OTT सेक्टर के ताजा आंकड़े
OTT की तेज रफ्तार जारी
कुल मिलाकर, साफ है कि OTT सेक्टर तेजी से बढ़ रहा है और आने वाले समय में मीडिया इंडस्ट्री का सबसे बड़ा ग्रोथ इंजन बन सकता है।
FAST: नया गेम-चेंजर जो TV और OTT के बीच खड़ा है
इस पूरे बदलाव में एक नया किरदार तेजी से उभर रहा है- FAST (Free Ad-Supported Streaming TV)। FAST यानी वह स्ट्रीमिंग टीवी जो बिल्कुल मुफ्त है, लेकिन बीच-बीच में विज्ञापन दिखाता है- ठीक वैसे जैसे पुराना linear TV करता था, बस अब यह इंटरनेट पर है। Samsung TV Plus, JioTV, MX Player- ये सब FAST के उदाहरण हैं।
Statista के अनुसार भारत में FAST (Free Ad-Supported Streaming TV) मार्केट:
यानी साफ है कि FAST सेगमेंट भी OTT के साथ-साथ तेजी से उभर रहा है और आने वाले समय में विज्ञापन आधारित स्ट्रीमिंग का बड़ा प्लेटफॉर्म बन सकता है।
FAST क्यों इतना important है? क्योंकि यह उस दर्शक तक पहुंचता है जो सब्सक्रिप्शन नहीं दे सकता या नहीं देना चाहता, लेकिन विज्ञापन देखने को तैयार है। यह विज्ञापनदाताओं के लिए एक नई, कॉस्ट-इफैक्टिव इनवेंट्री (cost-effective inventory) है।
CTV: जहां TV और OTT मिलते हैं
Connected TV (CTV) यानी स्मार्ट टीवी पर OTT देखना, एक ऐसा प्लेटफॉर्म बन गया है जो विज्ञापनदाताओं को TV की बड़ी स्क्रीन और OTT की सटीक टार्गेटिंग- दोनों का फायदा एक साथ देता है।
WPP Media के अनुसार, साल 2025 में भारत में CTV वाले घरों की संख्या 6.5 करोड़ से ज्यादा हो चुकी है, जो देश के कुल TV घरों का करीब 30% है। यानी अब CTV इतना बड़ा हो गया है कि इसे नजरअंदाज करना किसी भी ब्रैंड के लिए मुश्किल है।
CTV विज्ञापन की खासियतें:
कुल मिलाकर, CTV विज्ञापन TV की रीच और डिजिटल की precision (जहां किसी खास तरह के लोगों को ही टार्गेट किया जाता) दोनों का बेहतरीन कॉम्बिनेशन देता है।
WPP Media TYNY 2026 रिपोर्ट में TV की 3.1% growth की वजह सिर्फ CTV और addressable TV बताई गई है। यानी जो TV बचा हुआ है, वह CTV की बदौलत बचा हुआ है।
T20 World Cup 2026 के दौरान JioHotstar पर CTV viewership में उल्लेखनीय उछाल देखा गया- बड़ी स्क्रीन पर live cricket देखने की आदत तेजी से बन रही है। यह विज्ञापनदाताओं के लिए प्रीमियम इनवेंट्री है।
2026 की नई ताकत: कॉमर्स + AI + OTT
WPP Media की TYNY 2026 रिपोर्ट के अनुसार, अब विज्ञापन का भविष्य सिर्फ डिजिटल नहीं, बल्कि कॉमर्स-आधारित डिजिटल बनता जा रहा है।
कॉमर्स-आधारित विज्ञापन 2026 में सबसे तेज़ बढ़ने वाला सेगमेंट बन गया है, जिसमें करीब 24.2% की ग्रोथ का अनुमान है। इसमें क्विक कॉमर्स (जैसे Blinkit, Zepto, Instamart), रिटेल मीडिया और सोशल कॉमर्स मिलकर एक नया एडवर्टाइजिंग इकोसिस्टम तैयार कर रहे हैं।
WPP Media के COO अश्विन पदम्नाभन का कहना है कि “2026 का विज्ञापन बाजार अब सिर्फ रीच पर नहीं, बल्कि outcome (नतीजे) और intelligence (डेटा की समझ) पर आधारित होगा। क्विक कॉमर्स अब सिर्फ डिलीवरी प्लेटफॉर्म नहीं रहा, बल्कि एक मजबूत मीडिया चैनल बन चुका है।”
इसके साथ ही AI की भूमिका भी तेजी से बढ़ रही है। AI-पावर्ड सर्च, वॉयस और नई तरह की खोज (agentic discovery) मिलकर करीब 8% ग्रोथ दे सकते हैं।
OTT प्लेटफॉर्म्स भी AI का इस्तेमाल कर रहे हैं, जिससे अब दर्शकों को hyper-personalized ads दिखाए जा रहे हैं, यानी सही समय पर, सही व्यक्ति को, सही कंटेंट के बीच में विज्ञापन।
कुल मिलाकर, 2026 में विज्ञापन की दुनिया में कॉमर्स, AI और OTT का कॉम्बिनेशन सबसे बड़ा गेमचेंजर बनकर उभर रहा है।
2028 तक का रोडमैप
FICCI-EY 2026 रिपोर्ट का अनुमान:

WPP Media के अनुसार 2026 में भारत का कुल विज्ञापन बाजर ₹2,01,891 करोड़ का होगा, जिसमें डिजिटल की हिस्सेदारी 68.1% होगी।
चुनौतियां जो अभी बाकी हैं
चुनौतियां: जहां इंडस्ट्री अभी जूझ रही है
मेजरमेंट की समस्या:
अभी तक ऐसा कोई एक कॉमन सिस्टम नहीं है, जो Linear TV और OTT—दोनों को एक साथ सही तरीके से माप सके। TV के लिए BARC India का डेटा है, जबकि OTT प्लेटफॉर्म्स अपने-अपने अलग मेट्रिक्स इस्तेमाल करते हैं। जब तक यह गैप खत्म नहीं होता, मीडिया प्लानिंग अलग-अलग ही बनी रहेगी।
Fragmentation (बिखराव):
भारत में 50 से ज्यादा OTT प्लेटफॉर्म्स हैं। ऐसे में ब्रैंड्स के लिए यह तय करना मुश्किल हो जाता है कि उनकी असली ऑडियंस कहाँ है और बजट कहाँ खर्च करें। इससे विज्ञापन और ज्यादा महंगा और जटिल हो जाता है।
CTV CPMs (महंगी विज्ञापन दरें):
Connected TV पर विज्ञापन की लागत (CPM) अभी काफी ज्यादा है—कभी-कभी IPL जैसे बड़े इवेंट के बराबर। छोटे और मझोले ब्रैंड्स के लिए यह एक बड़ी रुकावट बनती है।
Content की बढ़ती लागत:
OTT प्लेटफॉर्म्स को अच्छा और प्रीमियम कंटेंट बनाने के लिए भारी निवेश करना पड़ता है। JioStar का ₹33,000 करोड़ का कंटेंट बजट इसका बड़ा उदाहरण है। लेकिन इस लागत को सब्सक्रिप्शन और विज्ञापन से निकालना अभी भी चुनौती बना हुआ है।
स्क्रीन वही है, सोच बदल गई है
ICC Men's T20 World Cup 2026 के फाइनल में करीब 7.25 करोड़ लोगों ने एक साथ JioHotstar पर मैच देखा। कुछ अनौपचारिक आंकड़ों के मुताबिक यह संख्या 82 करोड़ तक भी बताई जा रही है। यह सिर्फ क्रिकेट का उत्साह नहीं था, बल्कि OTT की ताकत का बड़ा उदाहरण था।
FICCI-EY रिपोर्ट इसे “point of no return” कहती है, यानी अब वापसी का रास्ता नहीं है। डिजिटल मीडिया ने टीवी को न सिर्फ रेवेन्यू और विज्ञापन में, बल्कि अब एंगेजमेंट में भी पीछे छोड़ दिया है। लेकिन एक अहम सच्चाई यह भी है कि TV खत्म नहीं हुआ है- बस उस पर OTT आ गया है।
CTV का बढ़ता यूज़र बेस, JioStar जैसे प्लेटफॉर्म्स की linear + digital रणनीति, और WPP Media का यह आंकड़ा कि TV और डिजिटल की ऑडियंस में overlap 10% से भी कम है, ये सब दिखाता है कि दोनों प्लेटफॉर्म एक-दूसरे के विकल्प नहीं, बल्कि पूरक हैं।
लिहाजा, ये कहना गलत नहीं होगा कि जो ब्रैंड इस “AND” को समझेगा, यानी TV और OTT, FAST और सब्सक्रिप्शन, मोबाइल और CTV, वही 2026 और आगे के विज्ञापन दौर में असली विजेता बनेगा।
भारत में विज्ञापन की दुनिया बदल रही है। ब्रैंड्स अब करोड़ों रुपये इन्फ्लुएंसर्स पर लगा रहे हैं, छोटे क्रिएटर्स बड़े खिलाड़ी बन रहे हैं और ASCI भी इस नए बाजार को नियमों की लगाम देने में जुटा है।
by
Vikas Saxena
टीवी के परदे से इंस्टाग्राम के स्क्रीन तक, भारत में विज्ञापन की दुनिया बदल रही है। ब्रैंड्स अब करोड़ों रुपये इन्फ्लुएंसर्स पर लगा रहे हैं, छोटे क्रिएटर्स बड़े खिलाड़ी बन रहे हैं और ASCI भी इस नए बाजार को नियमों की लगाम देने में जुटा है।
कुछ साल पहले तक किसी प्रोडक्ट का विज्ञापन मतलब था- टीवी पर कोई बड़ा सेलिब्रिटी, चमकदार स्टूडियो और एक याद रह जाने वाला जिंगल। लेकिन आज की तस्वीर बिल्कुल अलग है। अब विज्ञापन आता है उस लड़की के मोबाइल से, जो रोजाना अपने किचन में खाना बनाने की रील डालती है, उस लड़के से जो अपने शहर की गलियों में बाइक चलाते हुए टेक रिव्यू करता है, या उस मां से जो अपने बच्चे की परवरिश के टिप्स शेयर करती है। यही है इन्फ्लुएंसर मार्केटिंग और भारत में यह अब एक विशाल इंडस्ट्री बन चुकी है।
भारत में बाजार का आकार
यदि आंकड़ों की बात करें, तो तस्वीर और भी साफ हो जाती है। Ernst & Young (EY) की आधिकारिक रिपोर्ट 'State of Influencer Marketing in India' के अनुसार, भारत की इन्फ्लुएंसर मार्केटिंग इंडस्ट्री 2026 तक ₹3,375 करोड़ (लगभग 40.4 करोड़ डॉलर) तक पहुंचने का अनुमान है, जो 2022 से 2026 के बीच 18% की CAGR (Compound Annual Growth Rate) से बढ़ रही है।
वैश्विक नजरिए से देखें तो Influencer Marketing Hub की बेंचमार्क रिपोर्ट 2025 के अनुसार, दुनियाभर में इन्फ्लुएंसर मार्केटिंग इंडस्ट्री 2025 में 32.55 अरब डॉलर तक पहुंच गई है और भारत इस ग्लोबल बाजार में तेजी से अपनी जगह बना रही है। वहीं, Statista के अनुमानों के अनुसार, भारत का इन्फ्लुएंसर मार्केटिंग बाजार 2027 तक ₹10,750 करोड़ (लगभग 105 अरब रुपये) से ऊपर जाने की संभावना है।
TV से Reels तक: ब्रैंड्स क्यों बदल रहे हैं रास्ता?
सवाल यह है कि आखिर ब्रैंड्स टेलीविजन और प्रिंट मीडिया से हटकर इन्फ्लुएंसर्स की तरफ क्यों जा रहे हैं?
जवाब सीधा है- भरोसा और पहुंच (रीच)। EY की रिपोर्ट के अनुसार, मोबाइल फोन पर बिताए जाने वाले समय का 50% हिस्सा सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर जाता है। इसीलिए मार्केटर्स के लिए अब इन्फ्लुएंसर मार्केटिंग को अपनी समग्र कम्युनिकेशन स्ट्रैटेजी में शामिल करना जरूरी हो गया है।
EY की उसी रिपोर्ट के अनुसार, 56% से ज्यादा भारतीय ब्रैंड्स अपने बजट का 2% से अधिक हिस्सा इन्फ्लुएंसर मार्केटिंग पर खर्च कर रहे हैं। इसके अलावा 70% से ज्यादा ब्रैंड्स अपना इन्फ्लुएंसर मार्केटिंग बजट या तो बरकरार रखना चाहते हैं या उसे लगभग 10% तक बढ़ाना चाहते हैं और तीन में से चार ब्रैंड स्ट्रैटेजी में अब इन्फ्लुएंसर मार्केटिंग एक अनिवार्य हिस्सा बन चुकी है।
ROI यानी निवेश पर रिटर्न के मामले में भी इन्फ्लुएंसर मार्केटिंग आगे है। Influencer Marketing Hub की बेंचमार्क रिपोर्ट 2025 के अनुसार, ब्रैंड्स इन्फ्लुएंसर मार्केटिंग पर खर्च किए गए हर डॉलर पर औसतन $5.78 का रिटर्न पाते हैं- यह एक वैश्विक औसत है।
इंस्टाग्राम अभी भी इन्फ्लुएंसर मार्केटिंग के बजट का 50% से ज्यादा हिस्सा अपने पास रखता है और Reels खासतौर पर ऊंची एंगेजमेंट देती हैं। YouTube, LinkedIn और Moj जैसे रीजनल प्लेटफॉर्म्स भी तेजी से आगे बढ़ रहे हैं।
छोटे क्रिएटर्स की बड़ी भूमिका: नैनो और माइक्रो इन्फ्लुएंसर्स का उदय
इन्फ्लुएंसर मार्केटिंग की दुनिया में एक बड़ा बदलाव आया है- अब करोड़ों फॉलोअर्स वाले सेलिब्रिटीज से ज्यादा महत्व मिल रहा है उन "छोटे" क्रिएटर्स को, जो हजारों की तादाद में अपनी कम्युनिटी से गहराई से जुड़े हैं।
इन क्रिएटर्स को चार श्रेणियों में बांटा जाता है:
GrabOn की 2025 रिपोर्ट के अनुसार, भारत में YouTube और इंस्टाग्राम जैसे प्लेटफॉर्म्स पर कंटेंट क्रिएटर्स की संख्या 25 लाख से 35 लाख के बीच अनुमानित है। Kofluence की 2025 रिपोर्ट बताती है कि इंस्टाग्राम पर 1.8 से 2.3 मिलियन भारतीय क्रिएटर्स सक्रिय हैं, जिनमें अधिकांश नैनो और माइक्रो कैटेगरी में हैं।
लेकिन असली बात यह है कि इन छोटे क्रिएटर्स की ताकत उनके एंगेजमेंट रेट में है। HypeAuditor के State of Influencer Marketing 2025 रिपोर्ट के मुताबिक, माइक्रो-इन्फ्लुएंसर्स का एंगेजमेंट रेट 5-10% के आसपास होता है, जबकि सेलिब्रिटीज का यह आंकड़ा अक्सर 2% से भी नीचे रह जाता है।
Kofluence की 2025 रिपोर्ट के अनुसार, आधे से ज्यादा मार्केटर्स अब मानते हैं कि 10,000 से 1,00,000 फॉलोअर्स वाले क्रिएटर्स सबसे बेहतर ROI देते हैं।
टियर-2 और टियर-3 शहर: नई उम्मीद का केंद्र
भारत की भाषाई और सांस्कृतिक विविधता के कारण तमिल, मराठी, बंगाली और कन्नड़ जैसी भाषाओं में कंटेंट बनाने वाले रीजनल इन्फ्लुएंसर्स तेजी से उभर रहे हैं। EY की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में शॉर्ट वीडियो प्लेटफॉर्म्स खासतौर पर नॉन-मेट्रो क्षेत्रों के यूजर्स में बेहद लोकप्रिय हैं, जिससे कंटेंट कंजम्पशन का एक नया आयाम खुला है।
Kofluence के अनुसार, 3.5 से 4.5 मिलियन क्रिएटर्स कंटेंट बना रहे हैं, जिनमें से अधिकांश टियर-2 और टियर-3 शहरों से हैं। ब्रैंड्स अब इन शहरों में हाइपरलोकल कैम्पेन चलाकर अपनी पहुंच बना रहे हैं।
किन सेक्टर्स में सबसे ज्यादा निवेश?
EY की रिपोर्ट के अनुसार, Lifestyle, Fashion और Beauty इन्फ्लुएंसर मार्केटिंग की ग्रोथ को आगे ले जाने के लिए तैयार हैं क्योंकि इन कैटेगरी में व्यक्तिगत जुड़ाव सबसे गहरा है। इसके अलावा FMCG, ऑटोमोबाइल और कंज्यूमर ड्यूरेबल्स भी इन्फ्लुएंसर मार्केटिंग में तेजी से निवेश बढ़ा रहे हैं।
ASCI की गाइडलाइंस: जब नियम आए बाजार को संभालने
जहां बाजार इतनी तेजी से बढ़ रहा हो, वहां नियमन की जरूरत भी उतनी ही जरूरी हो जाती है। भारत में ऐडवर्टाइजिंग स्टैंडर्ड काउंसिल ऑफ इंडिया (ASCI) इस काम को अंजाम दे रहा है।
भारत में एक दोहरी नियामक व्यवस्था है। एक तरफ ASCI है, जो एक स्व-नियामक संस्था है और नैतिक पारदर्शिता को बढ़ावा देती है। दूसरी तरफ Central Consumer Protection Authority (CCPA) है, जो Consumer Protection Act, 2019 के तहत वैधानिक नियामक के रूप में काम करती है और भ्रामक विज्ञापनों पर जुर्माना लगाने तथा प्रतिबंध लगाने का अधिकार रखती है।
ASCI की गाइडलाइंस इन्फ्लुएंसर्स से अपेक्षा करती हैं कि वे पेड पार्टनरशिप्स को #Ad या #Sponsored जैसे स्पष्ट लेबल से डिस्क्लोज करें। डिस्क्लोजर ऐसी जगह और ऐसे तरीके से होनी चाहिए कि दर्शक उसे आसानी से और तुरंत देख सके। यानी:
पहले क्या होता था: इन्फ्लुएंसर्स पेड प्रमोशन को छुपाने के लिए कई तरकीबें अपनाते थे- जैसे #ad को 15-20 hashtags के बीच दबा देना, जहां कोई देखे ही न, या पोस्ट के बिल्कुल आखिर में बारीक अक्षरों में लिख देना। लेकिन, ASCI की गाइडलाइंस अब कहती हैं कि डिस्क्लोजर ऐसी जगह और ऐसे तरीके से होनी चाहिए कि दर्शक उसे आसानी से और तुरंत देख सके।
Campaign Asia की रिपोर्ट के अनुसार, वीडियो के लिए भी विशेष नियम हैं- 15 सेकंड तक के वीडियो में लेबल कम से कम 3 सेकंड दिखना चाहिए, 15 सेकंड से 2 मिनट के वीडियो में एक-तिहाई समय, और 2 मिनट से लंबे वीडियो में पूरे समय।
गाइडलाइंस के अनुसार, जहां भी advertiser का influencer के साथ 'material connection' हो- यानी कोई भी आर्थिक लाभ, मुफ्त प्रोडक्ट, डिस्काउंट, गिफ्ट, ट्रिप या रोजगार का प्रस्ताव- वहां उसे विज्ञापन के रूप में स्पष्ट रूप से बताना अनिवार्य है।
अप्रैल 2025 का बड़ा अपडेट: हेल्थ और फाइनेंस इन्फ्लुएंसर्स पर नई शर्तें
7 अप्रैल 2025 को ASCI ने दूसरे संशोधन के तहत अपनी गाइडलाइंस में एक महत्वपूर्ण बदलाव किया, जिसकी घोषणा 28 अप्रैल 2025 को एक प्रेस रिलीज के जरिए की गई। इसमें खासतौर पर Banking, Financial Services व Insurance (BFSI) और Health & Nutrition सेक्टर के इन्फ्लुएंसर्स पर नए नियम लागू किए गए।
इससे पहले, BFSI और Health & Nutrition से जुड़ी किसी भी बात के लिए सभी इन्फ्लुएंसर्स को योग्यता होना अनिवार्य था। नई गाइडलाइंस में एक जरूरी अंतर किया गया है- सामान्य प्रचार (generic promotions) और तकनीकी सलाह (technical advice) के बीच।
LexOrbis और Lexology में published legal analysis के अनुसार, Financial influencers (finfluencers) को SEBI रजिस्ट्रेशन नंबर, CA credentials या CFP certification स्पष्ट रूप से दिखाना होगा। इसके साथ ही Health influencers को MBBS डिग्री, न्यूट्रिशनिस्ट सर्टिफिकेशन, या फिटनेस ट्रेनर क्रेडेंशियल्स प्रदर्शित करने होंगे, जब वे तकनीकी सलाह दे रहे हों।
ASCI की CEO मनीषा कपूर का कहना है, “इन्फ्लुएंसर मार्केटिंग अब सिर्फ साधारण प्रमोशन तक सीमित नहीं रही है, बल्कि अब यह ब्रैंड कम्युनिकेशन के कई पहलुओं में रणनीतिक साझेदारी का रूप ले चुकी है। नए गाइडलाइंस खास तौर पर BFSI (बैंकिंग, फाइनेंस) और हेल्थ व न्यूट्रिशन सेक्टर में काम करने वाले इन्फ्लुएंसर्स के लिए जरूरी स्पष्टता और बारीकी लेकर आते हैं।”
उल्लंघन के क्या परिणाम?
ASCI की गाइडलाइंस तकनीकी रूप से कानूनी तौर पर बाध्यकारी (legally binding) नहीं हैं, लेकिन CCPA के Consumer Protection Act, 2019 के तहत इन्हें कानूनी ताकत मिलती है। जब कोई ब्रैंड या इन्फ्लुएंसर गाइडलाइंस का उल्लंघन करता है, तो परिणाम गंभीर हो सकते हैं- कॉन्ट्रैक्ट समाप्त करना, पेमेंट रोकना, और ब्रैंड्स इन्फ्लुएंसर्स से हर्जाना भी वसूल सकते हैं। ASCI का CCPA जैसी रेगुलेटरी बॉडीज के साथ बढ़ता तालमेल अब नियमों के पालन को और ज्यादा सख्त बना रहा है। यानी अब ASCI अकेले नहीं, बल्कि सरकारी संस्थाओं के साथ मिलकर काम कर रहा है, जिससे नियम तोड़ने वालों पर ज्यादा कड़ी कार्रवाई हो सकती है।
चुनौतियां: सब कुछ उतना आसान नहीं
इस चमकते बाजार के पीछे कुछ गंभीर चुनौतियां भी हैं।
ROI मापना कठिन: EY की रिपोर्ट के अनुसार, मार्केटर्स के लिए सबसे बड़ी चुनौती इन्फ्लुएंसर मार्केटिंग कैम्पेन के ROI का सटीक आकलन करना है।
फर्जी फॉलोअर्स और एंगेजमेंट फ्रॉड: कई इन्फ्लुएंसर्स नकली फॉलोअर्स खरीदते हैं, जिससे ब्रैंड्स को नुकसान होता है। 2025 में ब्रैंड्स अब "कितने फॉलोअर्स?" की बजाय "कितना असर?" का सवाल पूछ रहे हैं।
भ्रामक दावे: ASV Legal की analysis के अनुसार, वेलनेस इन्फ्लुएंसर्स अक्सर ऐसे सप्लीमेंट्स और 'डिटॉक्स रेजीम' का प्रचार करते हैं जिनके पास पर्याप्त वैज्ञानिक आधार नहीं होता। '7 दिनों में चमकती त्वचा' या 'guaranteed fat loss' जैसे दावे स्पष्ट रूप से भ्रामक माने जाते हैं और प्रतिबंधित हैं।
AI का प्रवेश: AI से बने वर्चुअल इन्फ्लुएंसर्स भारत में भी तेजी से बढ़ रहे हैं। ये consistency और scalability देते हैं, लेकिन असली इन्फ्लुएंसर मार्केटिंग की मूल ताकत- authenticity- उनमें नहीं होती।
बच्चों की सुरक्षा: ASCI ने स्पष्ट रूप से ऐसे किसी भी आचरण पर रोक लगाई है जो बच्चों की विश्वसनीयता का फायदा उठाए।
आगे का रास्ता: 2026 और उसके बाद
रिसर्च और मार्केटर्स के अनुसार, वैश्विक इन्फ्लुएंसर बाजार 2031 तक 38.9 अरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है, जो 2025 से 2031 के बीच 22.4% की CAGR से बढ़ेगा। भारत के लिए, लाइव कॉमर्स यानी इन्फ्लुएंसर्स द्वारा सीधे live-streamed shopping events के जरिए प्रोडक्ट बेचना तेजी से बढ़ने वाला है, खासकर फैशन, ब्यूटी और कंज्यूमर इलेक्ट्रॉनिक्स में।
Influencer Marketing Hub के अनुसार, इन्फ्लुएंसर मार्केटिंग का इकोसिस्टम अब 6,939 विशेष सेवा प्रदाताओं और प्लेटफॉर्म्स को सपोर्ट करता है, जो 2019 में महज 1,120 थे। यह दर्शाता है कि यह उद्योग अब परिपक्व होता जा रहा है।
भरोसे की नई दुकान
इन्फ्लुएंसर मार्केटिंग अब कोई प्रयोग नहीं, बल्कि एक मुख्यधारा की ताकत है। भारत में जहां एक तरफ 95 करोड़ से ज्यादा इंटरनेट यूजर्स हैं, वहीं दूसरी तरफ लाखों छोटे क्रिएटर्स हैं जो अपनी भाषा में, अपने शहर की कहानियां सुनाते हैं। यही मेल (authenticity और reach का) इन्फ्लुएंसर मार्केटिंग को इतना शक्तिशाली बनाता है।
लेकिन जैसे-जैसे यह मार्केट बड़ी होती जाएगी, जवाबदेही भी उतनी ही जरूरी होगी। ASCI की गाइडलाइंस और CCPA के नियम इसी दिशा में एक कदम हैं- ताकि यह "रील वाली दुकान" उपभोक्ताओं के साथ ईमानदार रहे।
जैसा कि एक इंडस्ट्री एक्सपर्ट ने कहा- "People don't mind being sold to- they mind being sold to without knowing it." यानी लोग ऐड या प्रमोशन से परेशान नहीं होते, उन्हें दिक्कत तब होती है जब उन्हें पता ही नहीं चलता कि जो दिखाया जा रहा है, वो असल में एक विज्ञापन है और यही सोच इस पूरी इंडस्ट्री की नींव होनी चाहिए।
आशा भोसले अपनी बहुमुखी आवाज के लिए जानी जाती थीं। उन्होंने भारत के विज्ञापन जगत में भी अपनी आवाज का खास योगदान दिया।
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Samachar4media Bureau
भारतीय संगीत जगत से एक बड़ी खबर सामने आई है। दिग्गज प्लेबैक सिंगर आशा भोसले का रविवार को 92 साल की उम्र में निधन हो गया। उनके जाने के साथ ही करीब सात दशकों से भी ज्यादा लंबा एक शानदार संगीत सफर खत्म हो गया।
आशा भोसले अपनी बहुमुखी आवाज के लिए जानी जाती थीं। उन्होंने फिल्मी गानों से लेकर ग़जल, पॉप और कई तरह के म्यूजिक में अपनी अलग पहचान बनाई। लेकिन कम लोग जानते हैं कि उन्होंने भारत के विज्ञापन जगत में भी अपनी आवाज का खास योगदान दिया।
जब भारत में रेडियो और टीवी पर विज्ञापन धीरे-धीरे अपनी पहचान बना रहे थे, उस दौर में आशा भोसले उन चुनिंदा बड़ी गायिकाओं में थीं जिन्होंने जिंगल्स (विज्ञापन गीत) को अपनी आवाज दी। उनकी वजह से ये जिंगल्स सिर्फ प्रचार का जरिया नहीं रहे, बल्कि लोगों के दिलों में बस जाने वाले गाने बन गए।
उनके मशहूर विज्ञापन कामों में Himalaya Bouquet का जिंगल “फूल के समान है” काफी लोकप्रिय हुआ था। इसे मशहूर शायर जां निसार अख्तर ने लिखा था और संगीतकार रवि ने इसे कंपोज किया था। इस जिंगल की मिठास और सुरीलापन लोगों को लंबे समय तक याद रहा।
कई साल बाद, 2002 में उन्होंने Rasna के लिए “रसिला रोजाना उत्सव” जिंगल गाया, जो उस समय काफी हिट रहा। उनकी पहचान भरी आवाज ने इस विज्ञापन को हर उम्र के लोगों के बीच लोकप्रिय बना दिया।
विशेषज्ञों के मुताबिक 1970 के दशक से लेकर 2000 के शुरुआती सालों तक भारत में विज्ञापन और फिल्म संगीत का गहरा रिश्ता रहा। उस समय बड़े सिंगर और म्यूजिक डायरेक्टर छोटे-छोटे जिंगल्स में भी काम करते थे। आशा भोसले की खासियत थी कि वह कम समय में भी गाने के जरिए असर छोड़ देती थीं, इसलिए वह इस फॉर्मेट के लिए बिल्कुल फिट बैठती थीं।
अगर उनके पूरे करियर की बात करें, तो उन्होंने हजारों गाने गाए और कई भाषाओं में अपनी आवाज का जादू बिखेरा। उन्हें दादासाहेब फाल्के पुरस्कार और पद्म विभूषण जैसे बड़े सम्मानों से नवाजा गया।
उन्होंने कई बार नेशनल अवॉर्ड और फिल्मफेयर अवॉर्ड भी जीते। खास बात ये रही कि बाद में उन्होंने खुद ही अवॉर्ड की रेस से हटकर नए कलाकारों को मौका देने का फैसला लिया, जो उनकी महानता को दर्शाता है।
देश ही नहीं, विदेशों में भी उनकी जबरदस्त पहचान थी। उन्होंने दुनियाभर में कई कॉन्सर्ट किए और उनके फैंस हर जगह मौजूद थे।
आशा भोसले का जाना सिर्फ एक महान गायिका का जाना नहीं है, बल्कि एक ऐसी आवाज का खो जाना है जिसने भारतीय संगीत और विज्ञापन—दोनों दुनिया को नई पहचान दी। उनकी आवाज हमेशा लोगों के दिलों में जिंदा रहेगी।
डिजिटल आउटडोर ऐडवर्टाइजिंग कंपनी 'साइनपोस्ट इंडिया' (Signpost India Limited) में बड़ा बदलाव देखने को मिला है।
by
Vikas Saxena
डिजिटल आउटडोर ऐडवर्टाइजिंग कंपनी 'साइनपोस्ट इंडिया' (Signpost India Limited) में बड़ा बदलाव देखने को मिला है। कंपनी की नॉन एग्जिक्यूटिव- इंडिपेंडेंट डायरेक्टर अमिता देसाई ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है।
जानकारी के मुताबिक, अमिता देसाई ने 10 अप्रैल 2026 को अपना इस्तीफा दिया, जो उसी दिन कामकाज खत्म होने के बाद से लागू हो गया है। उनके इस्तीफे के साथ ही वे कंपनी की नॉमिनेशन और रिम्यूनरेशन कमेटी की सदस्य भी नहीं रहेंगी।
कंपनी के मुताबिक, अमिता देसाई ने इस्तीफा देने की वजह अपने अन्य प्रोफेशनल कामों को बताया है। उनका कहना है कि नए कामों के चलते वे कंपनी को पर्याप्त समय नहीं दे पा रही थीं, इसलिए उन्होंने पद छोड़ना सही समझा।
अमिता देसाई ने अपने इस्तीफे में साफ किया है कि इसके पीछे कोई और बड़ी या छुपी हुई वजह नहीं है। उन्होंने कंपनी के बोर्ड और मैनेजमेंट का सहयोग के लिए धन्यवाद भी किया और भविष्य के लिए कंपनी को शुभकामनाएं दीं।
अमिता देसाई के पास कॉर्पोरेट गवर्नेंस, कंप्लायंस और एडवाइजरी सर्विसेज में 30 साल से ज्यादा का अनुभव है। वे Institute of Company Secretaries of India की फेलो मेंबर हैं और साथ ही Insolvency and Bankruptcy Board of India में रजिस्टर्ड इनसॉल्वेंसी प्रोफेशनल भी हैं।
उन्होंने अपने करियर में कई बड़ी कंपनियों, स्टार्टअप्स, MSME और मल्टीनेशनल कंपनियों के साथ काम किया है। कॉर्पोरेट कानून, फॉरेन इन्वेस्टमेंट, आईपीओ, फंड रेजिंग और ESG जैसे जटिल मामलों में उनकी अच्छी पकड़ मानी जाती है।
वहीं कंपनी की बात करें तो Signpost India डिजिटल आउट ऑफ होम यानी DOOH ऐडवर्टाइजिंग सेक्टर में तेजी से आगे बढ़ती कंपनी है। कंपनी ने भारत में बड़े डिजिटल बिलबोर्ड, बस क्यू शेल्टर, ई-बाइक जैसे कई इनोवेटिव प्रोजेक्ट्स पर काम किया है और इस सेक्टर में अपनी मजबूत पहचान बनाई है।
फिलहाल, अमिता देसाई के इस्तीफे के बाद कंपनी के बोर्ड में यह एक अहम बदलाव माना जा रहा है। अब आगे कंपनी इस खाली पद को कैसे भरती है और इससे उसकी रणनीति पर क्या असर पड़ता है, इस पर नजर रहेगी।
कोलकाता स्थित 'वेरिटास ऐडवर्टाइजिंग लिमिटेड' (Veritaas Advertising Limited ) से जुड़ी एक अहम जानकारी सामने आई है।
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Samachar4media Bureau
कोलकाता स्थित 'वेरिटास ऐडवर्टाइजिंग लिमिटेड' (Veritaas Advertising Limited ) से जुड़ी एक अहम जानकारी सामने आई है। दरअसल, कंपनी ने स्टॉक एक्सचेंज को जानकारी देते हुए बताया है कि उस पर फिलहाल कॉरपोरेट गवर्नेंस से जुड़े कुछ नियम लागू नहीं होते हैं।
कंपनी ने नेशनल स्टॉक एक्सचेंज बताया कि सेबी के नियमों के अनुसार, कुछ छोटी कंपनियों को इन प्रावधानों से छूट दी जाती है।
आसान भाषा में समझें तो, जिन कंपनियों की पूंजी 10 करोड़ रुपये से कम होती है और नेटवर्थ 25 करोड़ रुपये से कम होती है, या जो SME प्लेटफॉर्म पर लिस्टेड होती हैं, उन पर ये सख्त कॉरपोरेट गवर्नेंस नियम लागू नहीं होते।
वेरिटास ऐडवर्टाइजिंग ने बताया कि उसके शेयर NSE के SME प्लेटफॉर्म (NSE Emerge) पर लिस्टेड हैं, इसलिए मार्च 2026 तिमाही के लिए उस पर ये नियम लागू नहीं होंगे।