भारत में गवर्नेंस की समस्या केवल सरकार या व्यवस्था तक सीमित नहीं है। नागरिक अनुशासन, सार्वजनिक व्यवहार और जिम्मेदारी की कमी भी देश के विकास और संस्थागत सुधारों में बड़ी बाधा बनती जा रही है।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
राजीव बुद्धिराजा, मार्केटिंग विशेषज्ञ
भारत में गवर्नेंस यानी सुशासन पर चर्चा कोई नई बात नहीं है। हम नेताओं की आलोचना करते हैं, अफसरशाही पर सवाल उठाते हैं, नीतियों का विश्लेषण करते हैं और हर विफलता के लिए व्यवस्था को जिम्मेदार ठहराते हैं। टीवी डिबेट से लेकर सोशल मीडिया तक, हर जगह सिस्टम पर चर्चा होती है। लेकिन इस पूरी बहस में एक सवाल अक्सर गायब रहता है — क्या भारत की गवर्नेंस समस्या की शुरुआत हम नागरिकों से भी होती है?
गवर्नेंस केवल संसद, मंत्रालयों और सरकारी दफ्तरों तक सीमित नहीं है। यह ट्रैफिक सिग्नल पर हमारे व्यवहार, सार्वजनिक स्थानों पर हमारी आदतों, कतार में खड़े रहने की हमारी संस्कृति और दूसरों के अधिकारों के प्रति हमारे सम्मान से भी तय होता है। किसी भी देश का सार्वजनिक जीवन उसके नागरिकों के व्यवहार का प्रतिबिंब होता है।
भारत में एक बड़ा विरोधाभास दिखाई देता है। भारतीय दुनिया भर में अपनी प्रतिभा, मेहनत और नवाचार के लिए पहचाने जाते हैं। भारतीय कंपनियां वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा करती हैं और भारतीय पेशेवर दुनिया की बड़ी संस्थाओं का नेतृत्व करते हैं। लेकिन सार्वजनिक जीवन में अक्सर वही समाज नियमों को बोझ की तरह देखने लगता है।
हम विश्वस्तरीय सड़कें चाहते हैं, लेकिन ट्रैफिक नियमों का पालन नहीं करते। साफ शहरों की मांग करते हैं, लेकिन सार्वजनिक स्थानों को अपनी जिम्मेदारी नहीं मानते। भ्रष्टाचार की आलोचना करते हैं, लेकिन सुविधा मिलने पर “जुगाड़” और “सिफारिश” का रास्ता अपनाने से भी नहीं हिचकते।
यही वह जगह है जहां भारत का असली गवर्नेंस संकट दिखाई देता है। क्योंकि शासन केवल सरकार और नागरिक के बीच एकतरफा संबंध नहीं है, बल्कि यह सामाजिक अनुबंध है। सरकार व्यवस्था बनाती है, लेकिन समाज उसे सफल या विफल बनाता है।
जिन देशों को बेहतर गवर्नेंस के उदाहरण के रूप में देखा जाता है — जैसे जापान, सिंगापुर या संयुक्त अरब अमीरात — वहां केवल कानून सख्त नहीं हैं, बल्कि नागरिक अनुशासन सामाजिक संस्कृति का हिस्सा बन चुका है। लोग सार्वजनिक स्थानों का सम्मान करते हैं, नियमों का पालन बिना डर के करते हैं और सामूहिक जिम्मेदारी को समझते हैं।
भारत में समस्या क्षमता की नहीं, निरंतरता की है। प्राकृतिक आपदाओं, धार्मिक आयोजनों या राष्ट्रीय संकट के समय भारतीय समाज असाधारण सहयोग और जिम्मेदारी का परिचय देता है। लेकिन रोजमर्रा की जिंदगी में वही अनुशासन अक्सर गायब हो जाता है।
इसका असर केवल सामाजिक नहीं, आर्थिक और संस्थागत भी है। जब नागरिक अनुशासन कमजोर होता है, तो कानून लागू करने की लागत बढ़ जाती है। पुलिस गंभीर अपराधों की जगह अव्यवस्था संभालने में व्यस्त हो जाती है। नगर निगम बार-बार गंदगी साफ करने में संसाधन खर्च करते हैं। अदालतों पर मामलों का बोझ बढ़ता है क्योंकि नियमों का पालन सामाजिक आदत नहीं बन पाता।
बेशक, इसका अर्थ यह नहीं कि सरकारें अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो जाती हैं। व्यवस्था को पारदर्शी, जवाबदेह और कुशल बनाना सरकार की जिम्मेदारी है। लेकिन उतना ही सच यह भी है कि नागरिक जिम्मेदारी के बिना कोई भी व्यवस्था लंबे समय तक प्रभावी नहीं रह सकती।
भारत को आज केवल आर्थिक विकास नहीं, बल्कि “सिविक मैच्योरिटी” यानी नागरिक परिपक्वता की जरूरत है। अगर हर नागरिक पांच छोटी आदतें बदल ले — ट्रैफिक नियमों का पालन करे, सार्वजनिक स्थानों को साफ रखे, कतारों का सम्मान करे, छोटी रिश्वत और प्रभाव संस्कृति को नकारे और बच्चों को जिम्मेदार नागरिक बनने की शिक्षा दे तो यह किसी बड़े कानून से कम बदलाव नहीं होगा।
एक विकसित राष्ट्र केवल ऊंची जीडीपी, बड़ी इमारतों या आधुनिक तकनीक से नहीं बनता। वह जिम्मेदार नागरिकों से बनता है, जो समझते हैं कि स्वतंत्रता और जिम्मेदारी साथ-साथ चलती हैं। भारत के सामने सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि देश विकसित बन सकता है या नहीं। असली सवाल यह है कि क्या हम भारतीय विकसित समाज की तरह व्यवहार करने के लिए तैयार हैं?
( यह लेखक के निजी विचार हैं )
दोस्तों, हर साल 21 अप्रैल को भारत में नेशनल PR डे मनाया जाता है। यह दिन 1958 में 'पब्लिक रिलेशंस सोसायटी ऑफ इंडिया' (Public Relations Society of India) की स्थापना की याद में मनाया जाता है।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
डॉ. सुरेश गौर, पीआर गुरु ।।
दोस्तों, हर साल 21 अप्रैल को भारत में नेशनल PR डे मनाया जाता है। यह दिन 1958 में 'पब्लिक रिलेशंस सोसायटी ऑफ इंडिया' (पब्लिक रिलेशंस Society of India) की स्थापना की याद में मनाया जाता है। लेकिन यह सिर्फ एक सालगिरह नहीं है। यह उस पेशे को सम्मान देने का दिन है, जो अक्सर खुद सुर्खियों में नहीं रहता, लेकिन तय करता है कि सुर्खियां किस दिशा में जाएंगी।
अक्सर लोग पब्लिक रिलेशंस यानी PR को सिर्फ प्रेस रिलीज भेजने या मीडिया मैनेजमेंट तक सीमित मान लेते हैं। लेकिन असल में यह सिर्फ काम का एक छोटा हिस्सा है। PR की असली कला किसी संगठन और जनता के बीच भरोसा बनाने में होती है। यही वजह है कि एक PR प्रोफेशनल को एक ही दिन में कई अलग-अलग भूमिकाएं निभानी पड़ती हैं। नेशनल PR डे पर इन्हीं भूमिकाओं और उनके पीछे की कला को समझना जरूरी है।
स्ट्रैटेजिस्ट की भूमिका
किसी खबर के सार्वजनिक होने से पहले PR की शुरुआत एक शांत कमरे और व्हाइटबोर्ड से होती है। यहां सबसे बड़ा सवाल होता है कि लोगों को क्या जानना चाहिए और वे अभी इसकी परवाह क्यों करें। यहीं से कहानी की शुरुआत होती है।
अच्छी PR रणनीति सिर्फ दिखावा नहीं होती, बल्कि बिजनेस के लक्ष्यों और जनता की जरूरतों के बीच संतुलन बनाती है। चाहे नया प्रोडक्ट लॉन्च हो, कोई संकट हो या नई पॉलिसी, PR स्ट्रैटेजिस्ट देर रात तक सोशल मीडिया का माहौल समझता है, सुबह-सुबह नियमों के ड्राफ्ट पढ़ता है और कंपनी को बताता है कि लोगों की प्रतिक्रिया कैसी हो सकती है।
इस भूमिका की असली कला दूरदृष्टि में है। एक अच्छा स्ट्रैटेजिस्ट सिर्फ खबरों पर प्रतिक्रिया नहीं देता, बल्कि पहले से अंदाजा लगा लेता है कि आगे क्या हो सकता है।
स्टोरीटेलर की भूमिका
डेटा जानकारी देता है, लेकिन कहानियां लोगों को जोड़ती हैं। PR इन दोनों के बीच पुल का काम करता है। उदाहरण के तौर पर, बायोमेडिकल रिसर्च की एक रिपोर्ट को “20 लाख मरीजों के लिए नई उम्मीद” के रूप में लोगों तक पहुंचाया जाता है। इसी तरह CSR पहल को “गांव की पहली लाइब्रेरी” की कहानी बनाकर पेश किया जाता है।
इस भूमिका में संवेदनशीलता और संतुलन बहुत जरूरी है। जरूरत से ज्यादा प्रचार भरोसा तोड़ देता है और मुश्किल भाषा लोगों की दिलचस्पी खत्म कर देती है। PR प्रोफेशनल कठिन बातों को आसान और इंसानी भाषा में समझाता है, बिना सच्चाई से समझौता किए।
आज के 3 सेकंड वाले अटेंशन स्पैन के दौर में यह किसी कला से कम नहीं है। एक अच्छा स्टोरीटेलर जानता है कि दर्शक अपना समय मुफ्त में नहीं देते, उसे कमाना पड़ता है।
डिप्लोमैट की भूमिका
मीडिया, सरकार, निवेशक, कर्मचारी, एक्टिविस्ट और ग्राहक- हर किसी का नजरिया अलग होता है। PR वह कड़ी है जो इन सभी को जोड़ती है।
जब कोई पत्रकार मुश्किल सवाल पूछता है, तो PR प्रोफेशनल उससे बचने की कोशिश नहीं करता। वह जवाब देता है, संदर्भ समझाता है और रिश्तों को भी संभालता है। जब कर्मचारी बदलाव के दौरान खुद को अनसुना महसूस करते हैं, तो PR सिर्फ नोटिस जारी नहीं करता, बल्कि बातचीत के मंच तैयार करता है।
इस भूमिका की असली ताकत संतुलन में है। PR प्रोफेशनल कंपनी का पक्ष भी रखता है और जनता की चिंता भी समझता है। भरोसा इसी बीच के रास्ते में बनता है।
क्राइसिस मैनेजर की भूमिका
कोई भी PR टीम को अच्छे दिनों में फोन नहीं करता। फोन तब आता है जब कोई ट्वीट गलत वजह से वायरल हो जाए, फैक्ट्री में हादसा हो जाए या CEO का बयान गलत तरीके से पेश हो जाए।
क्राइसिस मैनेजर की भूमिका बहुत कठिन होती है। इसमें नींद छोड़कर स्थिति को संभालना पड़ता है। “नो कमेंट” कहने की बजाय यह कहना पड़ता है कि “अभी हमारे पास पूरी जानकारी नहीं है, लेकिन हम कार्रवाई कर रहे हैं।”
इस भूमिका की कला है- संयम, तेजी और जिम्मेदारी। तेजी से काम करना जरूरी है, लेकिन बिना लापरवाही के। पारदर्शिता जरूरी है, लेकिन बिना नुकसान पहुंचाए। सबसे पहले लोगों की सुरक्षा और फिर ब्रांड की छवि।
रिसर्चर की भूमिका
जिस बात को खुद नहीं समझते, उसे लोगों तक सही तरीके से पहुंचाया नहीं जा सकता। हर साफ-सुथरे मैसेज के पीछे लंबी रिसर्च, डेटा, मीडिया ऑडिट, प्रतिस्पर्धियों की रणनीति और नियमों की समझ होती है।
PR रिसर्चर 80 पन्नों की रिपोर्ट पढ़ता है ताकि प्रवक्ता 80 सेकंड में सही जवाब दे सके। उसे पता होता है कि कौन-सा शब्द किस समुदाय को प्रभावित करेगा और कौन-सा डेटा पत्रकार इस्तेमाल करेगा।
गलत जानकारी के इस दौर में यह भूमिका बेहद जरूरी है। PR की विश्वसनीयता एक गलत तथ्य से खत्म हो सकती है।
डिजिटल एक्सपर्ट की भूमिका
अब खबरें सिर्फ टीवी या अखबारों तक सीमित नहीं हैं। सुबह का Reddit पोस्ट रात तक टीवी डिबेट बन सकता है। इसलिए PR को सोशल मीडिया, सेंटिमेंट डैशबोर्ड, इन्फ्लुएंसर और कमेंट सेक्शन पर लगातार नजर रखनी पड़ती है।
लेकिन असली कला सिर्फ टेक्नोलॉजी इस्तेमाल करने में नहीं, बल्कि सही फैसला लेने में है। हर ट्वीट का जवाब जरूरी नहीं और हर ट्रेंड पर ब्रांड की राय देना भी जरूरी नहीं।
एक अच्छा डिजिटल PR प्रोफेशनल जानता है कि कब बोलना है, कब समझाना है और कब चुप रहना है।
काउंसलर की भूमिका
PR का सबसे मुश्किल काम बयान लिखना नहीं, बल्कि कभी-कभी यह कहना होता है कि “हमें बयान जारी नहीं करना चाहिए” या “माफी आपको खुद मांगनी होगी।”
PR प्रोफेशनल कंपनी के बड़े अधिकारियों को सलाह देता है। इसके लिए हिम्मत, भरोसा और वर्षों की मेहनत से बनाई गई साख चाहिए।
यह भूमिका शॉर्ट टर्म फायदे की जगह लॉन्ग टर्म प्रतिष्ठा को प्राथमिकता देती है। कभी-कभी यह चेतावनी भी देती है कि कोई कैंपेन लोगों को नाराज कर सकता है।
एजुकेटर की भूमिका
दुनिया तेजी से जटिल होती जा रही है- चाहे बायोमेडिसिन हो, फिनटेक हो या क्लाइमेट टेक। PR आम लोगों और विशेषज्ञों के बीच अनुवादक का काम करता है।
यह “CRISPR” जैसी तकनीक को आसान भाषा में समझाता है और यह भी बताता है कि कोई नीति किसान के लिए क्यों जरूरी है।
लोकतंत्र में समझ से सहमति बनती है और बाजार में समझ से अपनापन बढ़ता है। इसलिए PR सिर्फ प्रचार नहीं, बल्कि जागरूकता का भी काम करता है।
एथिक्स की भूमिका
ऊपर बताई गई सारी भूमिकाएं बेकार हैं अगर उनमें नैतिकता नहीं है। नैतिकता के बिना PR सिर्फ प्रचार बनकर रह जाता है।
एक ईमानदार PR प्रोफेशनल हमेशा खुद से पूछता है- क्या यह सच है? क्या यह सही है? क्या हम कल भी इसका बचाव कर पाएंगे?
वह सच छिपाने की बजाय सही जानकारी देने की कोशिश करता है। क्योंकि जनता का भरोसा उधार की तरह होता है, जिसे सम्मान के साथ लौटाना पड़ता है।
इतने सारे रोल क्यों जरूरी हैं?
दोस्तों, कंपनियां सिर्फ खराब प्रोडक्ट की वजह से नहीं टूटतीं। वे तब कमजोर पड़ती हैं जब लोगों का भरोसा खत्म होने लगता है। और भरोसा तब टूटता है जब संवाद खत्म हो जाए, भ्रम बढ़ जाए या अहंकार दिखने लगे।
PR का सबसे बड़ा काम इसी भरोसे को बनाए रखना है। यह शुरुआती चेतावनी देने वाली प्रणाली है, स्पष्ट जानकारी देने वाला माध्यम है और रिश्तों को मजबूत रखने वाला जरिया है।
PR में करियर बनाने वाले छात्रों के लिए यह समझना जरूरी है कि यह आसान पेशा नहीं है। इसमें जिज्ञासा, धैर्य और मजबूत नैतिक सोच चाहिए। कई बार उन गलतियों के लिए भी आलोचना झेलनी पड़ती है जो आपकी नहीं होतीं और कई बार उन संकटों का श्रेय भी नहीं मिलता जिन्हें आपने टाल दिया।
कंपनियों के नेताओं के लिए भी संदेश साफ है- PR टीम को सिर्फ संकट आने पर मत बुलाइए। उन्हें शुरुआत से शामिल कीजिए। जितनी जल्दी सही जानकारी मिलेगी, उतना बेहतर वे आपकी साख की रक्षा कर पाएंगे।
पत्रकारों और कंटेंट क्रिएटर्स के लिए भी यह याद रखना जरूरी है कि PR और मीडिया दोनों का मकसद एक ही है- जनता तक भरोसेमंद जानकारी पहुंचाना।
नेशनल PR डे पर सलाम
आज का दिन उन PR प्रोफेशनल्स के नाम है, जो खुद पीछे रहकर दूसरों की आवाज को आगे बढ़ाते हैं। उन लोगों के नाम, जो गलत समय पर भी फोन उठाते हैं, सही शब्द चुनते हैं और जानते हैं कि शब्द बाजार, समाज और लोगों की सोच बदल सकते हैं।
दोस्तों, पब्लिक रिलेशंस सिर्फ कला नहीं, बल्कि कला, विज्ञान और जिम्मेदारी का मेल है। इसका मकसद एक ही है- भरोसा कमाना, उसे बनाए रखना और टूट जाए तो फिर से जोड़ना।
यही इस पेशे की सबसे बड़ी ताकत है। और यही वजह है कि यह सिर्फ एक दिन नहीं, बल्कि पूरी जिंदगी देने लायक करियर है।
सभी PR प्रोफेशनल्स को नेशनल PR डे की बहुत-बहुत शुभकामनाएं।
अपने एक लेख में सीनियर मार्केटिंग विशेषज्ञ शुभ्रांशु सिंह ने कहा, गोवा फेस्ट केवल एक फेस्टिवल नहीं, बल्कि भारतीय विज्ञापन और मीडिया इंडस्ट्री की सामूहिक पहचान और विरासत है।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
शुभ्रांशु सिंह, सीनियर मार्केटिंग विशेषज्ञ।।
देश की ऐडवर्टाइजिंग और क्रिएटिव इंडस्ट्री में ‘गोवा फेस्ट 2026’ को लेकर जारी बहस के बीच सीनियर मार्केटिंग विशेषज्ञ शुभ्रांशु सिंह ने इस प्रतिष्ठित आयोजन का समर्थन करते हुए कहा है कि किसी भी संस्था को उसकी कमियों की वजह से खत्म करने की बजाय उसे बेहतर बनाने की कोशिश होनी चाहिए।
एक विस्तृत लेख में शुभ्रांशु सिंह ने गोवा फेस्ट पर उठ रही आलोचनाओं का जवाब देते हुए कहा कि भारत में इंडस्ट्री द्वारा बनाई और लगातार चलाए जाने वाली संस्थाएं बहुत कम हैं। ऐसे में गोवा फेस्ट केवल एक फेस्टिवल नहीं, बल्कि भारतीय विज्ञापन और मीडिया इंडस्ट्री की सामूहिक पहचान और विरासत है।
उन्होंने लिखा कि गोवा फेस्ट की शुरुआत किसी सरकारी आदेश, कानून या किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी की पहल से नहीं हुई थी। इसे ‘एडवरटाइजिंग एजेंसीज एसोसिएशन ऑफ इंडिया’ और ‘द एडवरटाइजिंग क्लब’ ने मिलकर बनाया और पिछले 19 वर्षों से लगातार आगे बढ़ाया है।
शुभ्रांशु सिंह के मुताबिक, ‘किसी भी संस्था को खड़ा करना आसान नहीं होता। संस्थाएं अपने आप नहीं बनतीं, बल्कि लगातार प्रयास, भागीदारी और समय के साथ मजबूत होती हैं। उन्होंने कहा कि आज लोग गोवा फेस्ट की मौजूदगी को सामान्य मानने लगे हैं, लेकिन यही किसी सफल संस्था की सबसे बड़ी पहचान होती है।’
उन्होंने दुनिया की कई बड़ी संस्थाओं और आयोजनों का उदाहरण देते हुए कहा कि ‘कान्स लायंस’, ‘ऑस्कर’, ‘ओलंपिक’ और ‘दावोस’ जैसे मंच भी विवादों, पक्षपात और आलोचनाओं से गुजरे हैं। बावजूद इसके, लोगों ने इन संस्थाओं को खत्म करने की जगह सुधारने की कोशिश की।
शुभ्रांशु सिंह ने माना कि गोवा फेस्ट को लेकर उठ रहे कई सवाल पूरी तरह जायज हैं। उन्होंने नेटवर्क एजेंसियों के वर्चस्व, जूरी में सीमित प्रतिनिधित्व, ब्रैंड साइड क्लाइंट्स की कम भागीदारी, बढ़ती लागत और सीखने की बजाय एंटरटेनमेंट पर अधिक फोकस जैसे मुद्दों को वास्तविक चिंताएं बताया।
हालांकि उन्होंने सवाल उठाया कि यदि गोवा फेस्ट नहीं होगा, तो भारतीय विज्ञापन और मीडिया इंडस्ट्री के पास ऐसा कौन-सा साझा मंच है, जहां बड़े स्तर पर लोग एकत्र हों, नए विचारों पर चर्चा करें, बेहतरीन काम को पहचान मिले और इंडस्ट्री के लिए साझा मानक तय किए जा सकें।
उन्होंने कहा कि फिलहाल इसका कोई विकल्प मौजूद नहीं है। गोवा फेस्ट भले ही परफेक्ट न हो, लेकिन यह वही मंच है जिसे इंडस्ट्री ने खुद बनाया और वर्षों तक जिंदा रखा।
अपने लेख में शुभ्रांशु सिंह ने भारत में ‘इंस्टीट्यूशन बिल्डिंग’ यानी संस्थाएं खड़ी करने की कमजोर संस्कृति पर भी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि भारत में लोग संस्थाओं की आलोचना तो खूब करते हैं, लेकिन उन्हें मजबूत बनाने के लिए उतनी प्रतिबद्धता नहीं दिखाते।
उन्होंने लिखा कि अक्सर एक पीढ़ी बेहद मेहनत से कोई संस्था खड़ी करती है, जबकि अगली पीढ़ी उसकी कमियां गिनाने लगती है। यही स्थिति अब गोवा फेस्ट के साथ भी दिखाई दे रही है।
शुभ्रांशु सिंह ने ‘मोमेंटम’ यानी निरंतरता की अहमियत समझाते हुए कहा कि 19 वर्षों में गोवा फेस्ट ने इंडस्ट्री के भीतर रिश्ते, संवाद, पहचान और साझा संस्कृति तैयार की है। यदि ऐसी संस्थाएं कमजोर पड़ती हैं, तो उनकी जगह तुरंत कोई बेहतर विकल्प तैयार नहीं हो जाता। इसके बजाय इंडस्ट्री छोटे-छोटे बिखरे मंचों में टूट जाती है और सामूहिक पहचान कमजोर होने लगती है।
उन्होंने सुझाव दिया कि गोवा फेस्ट को बेहतर बनाने के लिए जूरी सिस्टम में सुधार, स्वतंत्र एजेंसियों के लिए अलग श्रेणी, क्लाइंट्स की ज्यादा भागीदारी और युवा प्रोफेशनल्स व क्षेत्रीय एजेंसियों के लिए कम लागत वाले विकल्प जैसे कदम उठाए जाने चाहिए।
लेख के अंत में शुभ्रांशु सिंह ने इंडस्ट्री से अपील करते हुए कहा कि केवल आलोचना करने की बजाय लोगों को आगे आकर बदलाव की प्रक्रिया में शामिल होना चाहिए। उनके मुताबिक, किसी भी संस्था को मजबूत बनाने का रास्ता उसे छोड़ देना नहीं, बल्कि उसके भीतर रहकर सुधार करना होता है।
उन्होंने कहा, ‘गोवा फेस्ट परफेक्ट नहीं है, लेकिन यह हमारा अपना मंच है। इसकी आलोचना हो सकती है, लेकिन इससे दूरी बनाने की नहीं, इसे बेहतर बनाने की जरूरत है।’
(यह लेखक के निजी विचार हैं।)
बिहार में फिल्म और नाट्य संस्थान की मांग एक बार फिर तेज हो गई है। कला और संस्कृति विभाग की पहल के बाद उम्मीद जताई जा रही है कि राज्य को जल्द अपना संस्थान मिल सकता है।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
अनंत विजय, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक।
बिहार में फिल्म और नाट्य शिक्षा को लेकर लंबे समय से महसूस की जा रही कमी अब एक बार फिर चर्चा में है। हाल ही में फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (FTII), पुणे की ओर से सोशल मीडिया पर साझा की गई एक जानकारी ने इस बहस को नई दिशा दे दी। पोस्ट में बताया गया कि बिहार सरकार के कला एवं संस्कृति विभाग के सचिव प्रणव कुमार ने संस्थान का दौरा किया और वहां चलाए जा रहे शॉर्ट टर्म कोर्स तथा आउटरीच कार्यक्रमों की जानकारी ली। साथ ही बिहार में ऐसे कार्यक्रम शुरू करने की संभावनाओं पर भी चर्चा हुई।
इस पहल ने बिहार विधानसभा चुनाव से पहले की गई उन घोषणाओं की याद दिला दी, जिनमें राज्य में फिल्म और नाट्य संस्थान स्थापित करने की बात कही गई थी। उस समय तत्कालीन उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने सोशल मीडिया पर जानकारी साझा करते हुए कहा था कि बिहार फिल्म एवं नाट्य संस्थान की स्थापना को मंजूरी दी गई है, जो राज्य की कला और संस्कृति को नई पहचान देगा। वहीं विजय कुमार सिन्हा ने भी राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (NSD) की तर्ज पर बिहार नाट्य विद्यालय खोलने की बात कही थी।
अब जबकि बिहार में नई सरकार का गठन हो चुका है और सम्राट चौधरी मुख्यमंत्री की भूमिका में हैं, उम्मीद जताई जा रही है कि चुनाव पूर्व किए गए वादों पर ठोस पहल होगी। FTII पुणे का हालिया दौरा भी इसी दिशा में एक संभावित कदम माना जा रहा है।
दरअसल, बिहार लंबे समय से रंगमंच और अभिनय की समृद्ध परंपरा वाला राज्य रहा है। मनोज बाजपेयी, पंकज त्रिपाठी, अखिलेंद्र मिश्रा और विजय कुमार जैसे कलाकारों ने राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई है। लेखक और निर्देशक अमिताभ सिन्हा जैसे फिल्मकार भी बिहार से निकलकर FTII पुणे तक पहुंचे। बावजूद इसके राज्य में आज तक कोई सरकारी फिल्म और टेलीविजन संस्थान या नाट्य विद्यालय स्थापित नहीं हो पाया।
हर साल बिहार के सैकड़ों छात्र अभिनय, फिल्म निर्माण, पटकथा लेखन, निर्देशन और तकनीकी क्षेत्रों में करियर बनाने का सपना देखते हैं। लेकिन संस्थान नहीं होने के कारण उन्हें दिल्ली, मुंबई या दूसरे राज्यों का रुख करना पड़ता है। आर्थिक रूप से कमजोर और मध्यमवर्गीय परिवारों के कई प्रतिभाशाली छात्र महंगे निजी संस्थानों तक पहुंच ही नहीं पाते।
इसी कारण अब यह मांग उठ रही है कि बिहार में केवल अभिनय प्रशिक्षण ही नहीं, बल्कि साउंड रिकॉर्डिंग, एडिटिंग, डबिंग, सिनेमैटोग्राफी और वीएफएक्स जैसी आधुनिक तकनीकी विधाओं का प्रशिक्षण देने वाला संस्थान स्थापित किया जाए। अगर राज्य सरकार चाहे तो केंद्र सरकार के सहयोग से FTII पुणे या सत्यजीत रे फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट (SRFTI), कोलकाता का क्षेत्रीय केंद्र बिहार में खोला जा सकता है।
बिहार में फिल्म सिटी निर्माण की चर्चा भी पिछले कुछ समय से चल रही है। बांका क्षेत्र में संभावनाओं को लेकर अधिकारियों और फिल्म जगत से जुड़े लोगों ने दौरा भी किया था। लेकिन केवल फिल्म सिटी बनाने से काम नहीं चलेगा। इसके लिए प्रशिक्षित मानव संसाधन भी जरूरी होगा और यह तभी संभव है जब राज्य में फिल्म शिक्षा का मजबूत ढांचा तैयार किया जाए।
हाल ही में पश्चिम बंगाल में अमित शाह द्वारा विश्वस्तरीय नाट्य और कला विद्यालय की बात किए जाने के बाद बिहार में भी ऐसी अपेक्षाएं बढ़ गई हैं। बिहार के लोगों का मानना है कि “डबल इंजन” सरकार का लाभ राज्य को कला और संस्कृति के क्षेत्र में भी मिलना चाहिए।
बिहार में प्रतिभा की कोई कमी नहीं है। जरूरत केवल अवसर, संसाधन और संस्थागत समर्थन की है। यदि राज्य सरकार इस दिशा में गंभीर पहल करती है, तो यह केवल कला शिक्षा का विस्तार नहीं होगा, बल्कि बिहार के युवाओं के सपनों को नई उड़ान देने वाला बड़ा बदलाव साबित हो सकता है।
( यह लेखक के निजी विचार हैं ) साभार - दैनिक जागरण।
सिंगुर और नंदीग्राम आंदोलन ने पश्चिम बंगाल की राजनीति बदल दी। लेकिन उद्योगों के पलायन और धीमी आर्थिक वृद्धि ने अब राज्य की विकास नीति और औद्योगिक भविष्य पर नए सवाल खड़े कर दिए हैं।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
मिलिंद खांडेकर, वरिष्ठ पत्रकार।
पश्चिम बंगाल की राजनीति में सिंगुर और नंदीग्राम केवल दो जगहों के नाम नहीं हैं, बल्कि वे ऐसे मोड़ साबित हुए जिन्होंने राज्य की सत्ता, अर्थव्यवस्था और राजनीतिक दिशा तीनों को बदल दिया। साल 2006 में वाम मोर्चा (Left Front) ने 235 सीटों के साथ ऐतिहासिक जीत दर्ज की थी। उस समय तक लेफ्ट की सरकार को लगभग 30 साल पूरे हो चुके थे और मुख्यमंत्री बुद्धदेब भट्टाचार्य यह समझ चुके थे कि केवल कृषि और कुटीर उद्योगों के भरोसे बंगाल को आगे नहीं बढ़ाया जा सकता।
इसी सोच के तहत कोलकाता के पास सिंगुर में टाटा मोटर्स (Tata Motors) को नैनो कार प्लांट लगाने के लिए जमीन दी गई। वहीं नंदीग्राम में केमिकल हब के लिए भूमि अधिग्रहण शुरू हुआ। यह वामपंथी राजनीति के पारंपरिक आर्थिक मॉडल से बड़ा बदलाव था। लेकिन यहीं से विरोध की राजनीति भी शुरू हो गई।
भूमि अधिग्रहण के खिलाफ आंदोलन तेज हुआ और तृणमूल कांग्रेस (TMC) की नेता ममता बनर्जी को एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा मिल गया। ममता बनर्जी लंबे समय से वाम मोर्चा को सत्ता से हटाने की कोशिश कर रही थीं, लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिल रही थी। सिंगुर और नंदीग्राम आंदोलन ने उन्हें जनता के बीच नई पहचान और समर्थन दिया।
विरोध इतना बढ़ा कि टाटा मोटर्स को सिंगुर प्रोजेक्ट बंद करना पड़ा। उसी दौरान गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने रतन टाटा को मशहूर संदेश भेजा — “Welcome to Gujarat.” कुछ ही दिनों में टाटा मोटर्स ने गुजरात के साणंद में अपना प्लांट लगाने का फैसला कर लिया। यह घटना भारतीय राजनीति और उद्योग जगत दोनों में एक बड़े प्रतीक के रूप में देखी गई। सिंगुर और नंदीग्राम आंदोलन ने अंततः पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चा की तीन दशक पुरानी सत्ता खत्म कर दी। साल 2011 में ममता बनर्जी “परिवर्तन” के नारे के साथ सत्ता में आईं। लेकिन 15 साल बाद अब वही “परिवर्तन” सवालों के घेरे में है।
आलोचकों का मानना है कि राजनीतिक बदलाव के बावजूद आर्थिक नीतियों में बड़ा परिवर्तन नहीं हुआ। ममता सरकार ने लक्ष्मी भंडार जैसी कई कल्याणकारी योजनाएं शुरू कीं, लेकिन बड़े उद्योगों को आकर्षित करने में राज्य अपेक्षित सफलता हासिल नहीं कर पाया। संसद में सरकार द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार, 2011 से 2025 के बीच करीब 7 हजार कंपनियों ने पश्चिम बंगाल से अपना रजिस्टर्ड ऑफिस दूसरे राज्यों में शिफ्ट कर लिया। इनमें 110 सूचीबद्ध कंपनियां भी शामिल थीं।
इसका असर राज्य की अर्थव्यवस्था पर साफ दिखाई देता है। कभी कोलकाता की तुलना मुंबई से होती थी। 1961 में बंगाल प्रति व्यक्ति आय के मामले में देश के शीर्ष पांच राज्यों में शामिल था, लेकिन अब वह निचले राज्यों में गिना जाने लगा है। वहीं गुजरात जैसे राज्यों ने तेज औद्योगिक विकास के जरिए अपनी आर्थिक स्थिति मजबूत कर ली।
इसी पृष्ठभूमि में भाजपा ने अपने चुनावी घोषणा पत्र में सिंगुर में इंडस्ट्रियल पार्क बनाने का वादा किया है। यह केवल एक विकास परियोजना नहीं, बल्कि एक राजनीतिक और आर्थिक प्रतीक के रूप में देखा जा रहा है। भाजपा यह संदेश देने की कोशिश कर रही है कि बंगाल को फिर से उद्योग और निवेश की राह पर लौटना होगा।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बंगाल में वास्तविक परिवर्तन केवल सत्ता बदलने से नहीं आएगा। इसके लिए आर्थिक नीतियों में स्पष्ट बदलाव, उद्योगों के लिए भरोसेमंद माहौल और रोजगार आधारित विकास मॉडल की जरूरत होगी। सिंगुर का घाव आज भी बंगाल की राजनीति और अर्थव्यवस्था दोनों में महसूस किया जाता है।
( यह लेखक के निजी विचार हैं )
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में भाजपा की सफलता को 2029 लोकसभा चुनाव की बड़ी रणनीति से जोड़कर देखा जा रहा है। पूर्वी भारत में बढ़ती पकड़ BJP के राष्ट्रीय समीकरण बदलने का संकेत मानी जा रही है।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
आलोक मेहता, पद्मश्री, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक।
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी (BJP) की बड़ी सफलता को अब केवल एक राज्य की राजनीतिक जीत नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे 2029 लोकसभा चुनाव की संभावित रणनीतिक नींव के रूप में देखा जा रहा है। बंगाल में मिली बढ़त भाजपा के लिए पूर्वी भारत में राजनीतिक विस्तार का संकेत है, जिसका असर आने वाले राष्ट्रीय चुनावों में दिखाई दे सकता है।
2024 लोकसभा चुनाव में भाजपा अपने दम पर पूर्ण बहुमत से पीछे रह गई थी और उसे 240 सीटों पर संतोष करना पड़ा था। हालांकि राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) ने सरकार बना ली, लेकिन भाजपा के लिए यह स्पष्ट संदेश था कि उसे नए क्षेत्रों में राजनीतिक मजबूती हासिल करनी होगी। इसी संदर्भ में अब पश्चिम बंगाल को सबसे अहम राज्य माना जा रहा है।
बंगाल में लोकसभा की 42 सीटें हैं और लंबे समय तक यहां तृणमूल कांग्रेस (TMC) का दबदबा रहा है। लेकिन हालिया विधानसभा चुनावों में भाजपा के प्रदर्शन ने यह संकेत दिया है कि पार्टी अब ग्रामीण और अर्धशहरी क्षेत्रों में भी संगठनात्मक आधार मजबूत कर चुकी है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि यह रुझान कायम रहता है, तो 2029 लोकसभा चुनाव में भाजपा बंगाल में अपनी सीटें दोगुनी से अधिक कर सकती है।
भाजपा की रणनीति अब केवल हिंदी पट्टी तक सीमित नहीं दिखती। पार्टी पूर्वी भारत को अपने नए विस्तार क्षेत्र के रूप में देख रही है। ओडिशा, असम और बिहार में उसकी बढ़ती ताकत इसी दिशा की ओर इशारा करती है। असम में मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के नेतृत्व में भाजपा लगातार मजबूत हुई है, जबकि ओडिशा में भी पार्टी ने पिछले वर्षों में तेजी से विस्तार किया है।
बिहार में भी भाजपा ने अपनी स्थिति मजबूत करने की कोशिश तेज कर दी है। यहां पार्टी के पास सम्राट चौधरी जैसे बड़े चेहरे हैं, जबकि जनता दल यूनाइटेड (JDU) के साथ गठबंधन भी उसके लिए अहम बना हुआ है। राजनीतिक समीकरणों को देखें तो भाजपा 2029 में बिहार से अपनी सीट संख्या बढ़ाने की तैयारी में दिखाई देती है।
हालांकि भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र बने रहेंगे। उत्तर प्रदेश की 80 लोकसभा सीटें राष्ट्रीय राजनीति की धुरी मानी जाती हैं। 2024 में यहां भाजपा को बड़ा नुकसान हुआ था। ऐसे में पार्टी 2029 से पहले संगठनात्मक और सामाजिक समीकरणों को मजबूत करने में जुटी हुई है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की भूमिका और प्रदेश नेतृत्व की एकजुटता भी आने वाले समय में महत्वपूर्ण रहेगी।
महाराष्ट्र में भी 2024 में भाजपा को उम्मीद से कम सफलता मिली थी। लेकिन मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के नेतृत्व में पार्टी यहां फिर से मजबूती हासिल करने की कोशिश कर रही है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि गठबंधन स्थिर रहता है और विपक्ष बिखरा रहता है, तो भाजपा महाराष्ट्र में वापसी कर सकती है।
इसके अलावा गुजरात, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, दिल्ली और ओडिशा जैसे राज्यों में भाजपा अपनी मौजूदा बढ़त बरकरार रखने की रणनीति पर काम कर रही है। वहीं राजस्थान, हरियाणा, कर्नाटक, झारखंड, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में पार्टी संगठन को और मजबूत करने की कोशिश जारी है। भाजपा नेतृत्व अब 2029 को केवल अगला चुनाव नहीं, बल्कि राजनीतिक वर्चस्व की अगली बड़ी लड़ाई के रूप में देख रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह लगातार चुनावी तैयारी और संगठन विस्तार पर फोकस बनाए हुए हैं।
राजनीतिक तौर पर यह भी दिलचस्प है कि कांग्रेस और कई क्षेत्रीय दल पूर्वी भारत में कमजोर स्थिति में दिखाई दे रहे हैं। बंगाल में वाम दलों की पकड़ पहले जैसी नहीं रही, जबकि बिहार में राष्ट्रीय जनता दल (RJD) और कांग्रेस को चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। ऐसे में भाजपा इस राजनीतिक खालीपन को अवसर के रूप में देख रही है।
हालांकि 2029 की तस्वीर अभी दूर है और राजनीति में परिस्थितियां तेजी से बदलती हैं, लेकिन इतना तय माना जा रहा है कि पश्चिम बंगाल अब राष्ट्रीय राजनीति का सबसे महत्वपूर्ण रणक्षेत्र बनने जा रहा है। भाजपा की नजर यहां सिर्फ एक चुनावी जीत पर नहीं, बल्कि राष्ट्रीय बहुमत के नए गणित पर टिकी हुई है।
( यह लेखक के निजी विचार हैं )
एमेजॉन ने भारत में अपनी स्ट्रीमिंग स्ट्रैटेजी को बड़ा आकार देते हुए Amazon के Prime Video और MX Player को एकीकृत करने का फैसला लिया है।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
कंचन श्रीवास्तव, एक्सचेंज4मीडिया
एमेजॉन ने भारत में अपनी स्ट्रीमिंग स्ट्रैटेजी को बड़ा आकार देते हुए Amazon के Prime Video और MX Player को एकीकृत करने का फैसला लिया है। इस कदम के बाद अब इंडस्ट्री में सबसे ज्यादा चर्चा इस बात को लेकर है कि कंपनी के वरिष्ठ अधिकारियों करण बेदी और अमोघ दुसाद की भूमिका आगे क्या होगी।
एमेजॉन ने गुरुवार को इस इंटीग्रेशन की घोषणा करते हुए साफ किया कि कंपनी अब अपने फ्री और पेड स्ट्रीमिंग बिजनेस को एक ही प्लेटफॉर्म के तहत चलाएगी। इस नए स्ट्रक्चर में गौरव गांधी पूरे एकीकृत प्लेटफॉर्म का नेतृत्व जारी रखेंगे।
अब तक एमेजॉन की AVOD (Advertising Video on Demand) स्ट्रैटेजी मिनीटीवी और एमएक्स प्लेयर के जरिए आगे बढ़ रही थी। एमएक्स प्लेयर के डायरेक्टर और हेड करण बेदी प्लेटफॉर्म की ग्रोथ और बिजनेस स्ट्रैटेजी संभालते हैं। वहीं अमोघ दुसाद, हेड ऑफ कंटेंट के तौर पर ओरिजिनल कंटेंट और प्रोग्रामिंग को मजबूत करने में अहम भूमिका निभा रहे हैं।
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इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स का मानना है कि अमोघ दुसाद का ट्रांजिशन नए स्ट्रक्चर में अपेक्षाकृत आसान रहेगा, क्योंकि कंटेंट की भूमिका एकीकृत प्लेटफॉर्म में और मजबूत होगी। वहीं करण बेदी के लिए स्थिति थोड़ी जटिल मानी जा रही है, क्योंकि नए स्ट्रक्चर में कई बिजनेस और प्लेटफॉर्म फंक्शंस एक साथ आ रहे हैं, जिससे जिम्मेदारियों का ओवरलैप हो सकता है।
हालांकि, अभी तक एमेजॉन ने किसी भी अधिकारी के पद या जिम्मेदारियों में बदलाव को लेकर आधिकारिक घोषणा नहीं की है। कंपनी से इस संबंध में प्रतिक्रिया का इंतजार किया जा रहा है।
इंडस्ट्री में यह भी चर्चा है कि करण बेदी संभवतः Applause Entertainment से जुड़ सकते हैं और वहां समीर नायर की जगह ले सकते हैं। हालांकि इस पर अब तक कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।
विशेषज्ञों के मुताबिक, यह इंटीग्रेशन एमेजॉन की बड़ी स्ट्रैटेजी का हिस्सा है, जिसके तहत कंपनी अलग-अलग ब्रैंड्स को चलाने के बजाय एक मजबूत और एकीकृत वीडियो इकोसिस्टम बनाना चाहती है। इस नए मॉडल में AVOD, SVOD (Subscription Video on Demand), TVOD (Transactional Video on Demand) और ऐड-ऑन सब्सक्रिप्शन—all-in-one प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध होंगे।
बता दें कि एमएक्स प्लेयर ने जहां फ्री कंटेंट, इंटरनेशनल डब्ड शोज और माइक्रोड्रामा के जरिए बड़ी ऑडियंस बनाई, वहीं प्राइम वीडियो ने प्रीमियम कंटेंट और फ्रेंचाइज़ आधारित प्रोग्रामिंग पर फोकस किया। अब दोनों को मिलाकर एमेजॉन एक ऐसा प्लेटफॉर्म तैयार कर रहा है, जो विज्ञापन और सब्सक्रिप्शन—दोनों से मजबूत रेवेन्यू मॉडल बना सके।
ग्लोबल स्तर पर भी अब फ्री और पेड स्ट्रीमिंग के बीच का अंतर तेजी से कम हो रहा है। ऐसे में एमेजॉन का यह कदम न केवल भारत में बल्कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी उसकी पकड़ को मजबूत करने की दिशा में देखा जा रहा है।
(अंग्रेजी में लिखी गई मूल कॉपी को आप यहां क्लिक कर पढ़ सकते हैं।)
वर्ष 2026 में भी अगर कोई राजनीतिक ब्रैंड सबसे ज्यादा मजबूत, प्रभावशाली और व्यापक दिखाई देता है, तो वह है ’ब्रैंड मोदी-BJP’।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
शांतोमय रे, फाउंडर व डायरेक्टर, K-फैक्टर कम्युनिकेशंस।।
देश की राजनीति अब सिर्फ चुनावी रैलियों और घोषणाओं तक सीमित नहीं रह गई है। आज राजनीति एक ऐसे ‘ब्रैंड मार्केट’ में बदल चुकी है, जहां नेताओं की पहचान, उनकी छवि, संदेश और जनता से जुड़ाव सबसे बड़ी ताकत बन चुके हैं। वर्ष 2026 में भी अगर कोई राजनीतिक ब्रैंड सबसे ज्यादा मजबूत, प्रभावशाली और व्यापक दिखाई देता है, तो वह है ’ब्रैंड मोदी-BJP’।
K-फैक्टर कम्युनिकेशंस के फाउंडर और डायरेक्टर शांतोमय रे ने अपने विश्लेषण में बताया है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भारतीय जनता पार्टी ने मिलकर एक ऐसा राष्ट्रीय राजनीतिक ब्रैंड तैयार किया है, जिसकी पहुंच और पहचान देशभर में सबसे ज्यादा मजबूत बनी हुई है।
ब्रैंड मोदी-BJP’ क्यों है सबसे ताकतवर? विश्लेषण के मुताबिक नरेंद्र मोदी अब सिर्फ एक राजनीतिक नेता नहीं रह गए हैं, बल्कि वे आकांक्षा, मजबूत नेतृत्व और राष्ट्रीय पहचान का प्रतीक बन चुके हैं। भाजपा ने मोदी के नेतृत्व को पार्टी की सबसे बड़ी पहचान में बदल दिया है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि मोदी-BJP की ताकत पांच बड़े आधारों पर टिकी हुई है:
: अलग-अलग राज्यों और वर्गों में लगातार मजबूत पकड़
: नरेंद्र मोदी का पार्टी की केंद्रीय पहचान बन जाना
: राष्ट्रीय मुद्दों और नैरेटिव पर मजबूत नियंत्रण
: विकास और महत्वाकांक्षा से जुड़ी छवि
: योजनाओं और फैसलों की डिलीवरी को लगातार प्रचारित करना
इसी वजह से भाजपा आज देश में एक ‘डिफॉल्ट राष्ट्रीय विकल्प’ की तरह दिखाई देती है।
‘ब्रैंड ममता’ की चमक क्यों हुई कमजोर? पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने लंबे समय तक खुद को एक मजबूत क्षेत्रीय नेता के रूप में स्थापित किया। उनकी छवि संघर्ष करने वाली और बंगाल की पहचान से जुड़ी नेता की रही है। तृणमूल कांग्रेस ने भी इसी भावनात्मक जुड़ाव के दम पर वर्षों तक अपनी पकड़ मजबूत बनाए रखी। लेकिन 2026 के राजनीतिक माहौल में ‘ब्रैंड ममता’ को पहले जैसी धार नहीं मिल रही है।
विश्लेषण में इसके कई कारण बताए गए हैं:
: संदेश और राजनीतिक नैरेटिव में नई ऊर्जा की कमी
: लंबे कार्यकाल के बाद एंटी-इनकंबेंसी का असर
: शासन को लेकर मतदाताओं के बीच थकान की भावना
: भविष्य को लेकर स्पष्ट दिशा का अभाव
हालांकि रिपोर्ट यह भी कहती है कि ममता बनर्जी की पहचान खत्म नहीं हुई है, लेकिन अब उनके सामने खुद को नए तरीके से पेश करने की चुनौती खड़ी हो गई है।
‘ब्रैंड विजय’ के रूप में नया राजनीतिक मॉडल: 2026 की राजनीति में एक नया ट्रेंड ‘ब्रैंड विजय’ के रूप में सामने आया है। यहां विजय का मतलब ऐसे नए नेताओं और राजनीतिक चेहरों से है, जो खुद को एंटी-एस्टैब्लिशमेंट और बदलाव लाने वाले विकल्प के तौर पर पेश कर रहे हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक यह नया राजनीतिक मॉडल पारंपरिक राजनीति से अलग तरीके से काम करता है:
: तेजी से बदलने वाले संदेश
: डिजिटल प्लेटफॉर्म पर मजबूत मौजूदगी
: युवाओं और शहरी वोटर्स पर फोकस
: सिस्टम के खिलाफ छवि तैयार करना
विश्लेषण में कहा गया है कि जहां मोदी स्थिरता और बड़े राष्ट्रीय नेतृत्व का प्रतीक हैं, वहीं ममता प्रतिरोध की राजनीति का चेहरा रही हैं। दूसरी ओर “ब्रैंड विजय” बदलाव और नई राजनीति का संकेत देता है। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि सिर्फ तेजी और चर्चा बना लेना काफी नहीं होता। लंबे समय तक टिके रहने के लिए संगठनात्मक मजबूती और गहरी राजनीतिक पकड़ जरूरी होती है।
राजनीति अब ‘ब्रैंड’ की जंग: रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत की राजनीति अब पूरी तरह “मल्टी-ब्रैंड मार्केट” में बदल चुकी है। यहां हर राजनीतिक दल और नेता जनता का भरोसा जीतने के लिए लगातार अपनी छवि और संदेश को बदलने की कोशिश कर रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार आज चुनाव सिर्फ प्रदर्शन के आधार पर नहीं जीते जाते, बल्कि इस बात पर भी निर्भर करते हैं कि कौन-सा राजनीतिक ब्रैंड जनता की सोच और उम्मीदों के साथ सबसे तेजी से खुद को जोड़ पाता है।
(यह लेखक के निजी विचार हैं।)
मौजूदा स्थिति के आधार पर कह सकते हैं कि पश्चिम बंगाल की मौजूदा राजनीति दो धाराओं के बीच संतुलन की कहानी बनती जा रही है।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
रुहैल अमीन, सीनियर एडिटर, एक्सचेंज4मीडिया।।
पश्चिम बंगाल की राजनीति हमेशा से अपनी अलग पहचान के लिए जानी जाती रही है। यहां के मतदाता जल्दी राजनीतिक बदलाव नहीं करते और भावनात्मक जुड़ाव का असर चुनावी फैसलों में साफ दिखाई देता है। यही वजह है कि लंबे समय तक जनता से जुड़ने वाले नेता यहां मजबूत बने रहते हैं।
लेकिन अब राज्य की राजनीति में एक नया बदलाव नजर आने लगा है। एक तरफ मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का जनता के साथ गहरा भावनात्मक रिश्ता कायम है, वहीं दूसरी ओर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विकास आधारित राजनीति को भी राज्य के एक वर्ग, खासकर युवाओं और शहरी मतदाताओं के बीच स्वीकार्यता मिल रही है।
बंगाल की राजनीति में भरोसे की परंपरा: पश्चिम बंगाल में राजनीतिक भरोसे का खास महत्व रहा है। यहां लोग लंबे समय तक एक ही विचारधारा या नेता से जुड़े रहते हैं। ममता बनर्जी ने भी इसी भरोसे और अपनत्व के आधार पर अपनी मजबूत पहचान बनाई। उनकी सादगी भरी छवि और आम लोगों से जुड़ाव ने उन्हें ‘दीदी’ के रूप में हर घर तक पहुंचाया। महिलाओं और ग्रामीण वर्ग के लिए चलाई गई योजनाओं ने भी उनकी लोकप्रियता को और मजबूत किया। यही कारण है कि ‘ब्रैंड ममता’ आज भी राज्य की राजनीति में गहराई से जड़ा हुआ है।
बदलती सोच और नई उम्मीदें: हालांकि समय के साथ मतदाताओं की सोच में बदलाव आ रहा है। खासकर युवा वर्ग अब रोजगार, उद्योग, निवेश और बेहतर बुनियादी ढांचे जैसी चीजों को प्राथमिकता देने लगा है। भावनात्मक जुड़ाव अभी भी अहम है, लेकिन अब विकास और भविष्य की संभावनाओं पर भी बराबर ध्यान दिया जा रहा है।
‘ब्रैंड मोदी’ की बढ़ती मौजूदगी: इसी बदलती सोच के बीच ‘ब्रैंड मोदी’ का असर बंगाल में बढ़ा है। नरेंद्र मोदी की राजनीति का फोकस विकास, इंफ्रास्ट्रक्चर और आर्थिक प्रगति पर रहा है, जिसने खासकर शहरी और युवा मतदाताओं को आकर्षित किया है। भारतीय जनता पार्टी ने भी जमीनी स्तर पर अपनी मौजूदगी मजबूत की है और उन क्षेत्रों में पहुंच बनाई है, जहां पहले उसकी पकड़ कमजोर थी। मोदी की आक्रामक प्रचार शैली और प्रभावी संवाद ने भी पार्टी को राज्य में मजबूती दिलाई है।
भावनात्मक जुड़ाव अब भी अहम: इसके बावजूद, बंगाल की राजनीति में सांस्कृतिक पहचान और भावनात्मक जुड़ाव की भूमिका अभी भी बेहद महत्वपूर्ण है। कोई भी राजनीतिक दल यहां लंबे समय तक टिकना चाहता है, तो उसे जनता की भावनाओं और सांस्कृतिक समझ के साथ तालमेल बैठाना होगा।
आगे की चुनौती और संभावनाएं: ममता बनर्जी के सामने चुनौती है कि वे अपने मजबूत भावनात्मक जुड़ाव को बनाए रखते हुए विकास और रोजगार से जुड़ी उम्मीदों को भी पूरा करें। वहीं नरेंद्र मोदी और बीजेपी के लिए जरूरी है कि वे अपनी बढ़ती लोकप्रियता को स्थायी भरोसे में बदलें।
कुल मिलाकर कह सकते हैं कि पश्चिम बंगाल की मौजूदा राजनीति दो धाराओं के बीच संतुलन की कहानी बनती जा रही है। एक ओर ‘ब्रैंड ममता’ का मजबूत भावनात्मक आधार है, तो दूसरी ओर ‘ब्रैंड मोदी’ की विकास आधारित अपील तेजी से उभर रही है। राज्य के मतदाता अब न केवल भावनात्मक रूप से सोच रहे हैं, बल्कि वे अपने भविष्य, रोजगार और विकास को भी उतना ही महत्व दे रहे हैं। आने वाले समय में यही संतुलन तय करेगा कि बंगाल की राजनीति किस दिशा में आगे बढ़ेगी।
(यह लेखक के निजी विचार हैं। मूल रूप से अंग्रेजी में लिखे गए इस आर्टिकल को आप यहां क्लिक कर पढ़ सकते हैं।)
सत्तापक्ष की आलोचना विपक्ष की अपनी पहचान को कमजोर करती है। मार्केटिंग और ब्रांडिंग के सिद्धांतों के जरिए समझाया गया है कि सकारात्मक नैरेटिव और अलग पहचान ही प्रभावी राजनीतिक रणनीति बन सकती है।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
प्रभाकर मुंदकुर, विज्ञापन विशेषज्ञ।
भारतीय राजनीति में आज जिस तरह की विपक्षी राजनीति दिखाई दे रही है, उसे यदि मार्केटिंग और ब्रांडिंग के नजरिये से देखा जाए तो एक बड़ी रणनीतिक कमजोरी साफ नजर आती है। मार्केटिंग की दुनिया में एक पुराना और बेहद महत्वपूर्ण सिद्धांत है कि कोई भी ब्रांड अपने प्रतिद्वंद्वी की चर्चा करके खुद को मजबूत नहीं बनाता।
सफल ब्रांड हमेशा अपनी पहचान, अपनी कहानी और अपने विजन पर ध्यान देते हैं। लेकिन भारतीय राजनीति में विपक्ष का बड़ा हिस्सा लगातार सत्तारूढ़ दल और उसके नेताओं की आलोचना को ही अपनी मुख्य रणनीति बना चुका है। प्रेस कॉन्फ्रेंस, सोशल मीडिया पोस्ट, बयान और राजनीतिक अभियान—सबका केंद्र अक्सर यही होता है कि सरकार क्या गलत कर रही है।
मार्केटिंग की भाषा में यह केवल अप्रभावी नहीं बल्कि कई बार उल्टा नुकसान पहुंचाने वाला तरीका साबित होता है। आज की दुनिया “अटेंशन इकॉनमी” यानी ध्यान की अर्थव्यवस्था पर चलती है। लोगों का ध्यान सीमित होता है और जिस चीज पर बार-बार चर्चा होती है, वह लोगों के दिमाग में अधिक गहराई से बैठ जाती है। यही कारण है कि मार्केटिंग विशेषज्ञ नए या चुनौती देने वाले ब्रांड्स को सलाह देते हैं कि वे मार्केट लीडर का नाम बार-बार न लें। क्योंकि हर उल्लेख, चाहे वह नकारात्मक ही क्यों न हो, उस ब्रांड की पहचान और प्रभाव को और मजबूत करता है।
राजनीति में भी यही नियम लागू होता है। जब विपक्ष लगातार किसी एक नेता या पार्टी को अपने भाषणों और अभियानों का केंद्र बना देता है, तो जनता के मन में वही नेता सबसे महत्वपूर्ण और प्रभावशाली बन जाता है। यानी विपक्ष अनजाने में उसी व्यक्ति या दल की “मेंटल प्रेजेंस” बढ़ा देता है, जिसे वह कमजोर करना चाहता है।
हर क्षेत्र में एक प्रमुख खिलाड़ी होता है। जैसे सर्च इंजन की बात हो तो सबसे पहले गूगल का नाम आता है, सॉफ्ट ड्रिंक में कोका-कोला और ऑनलाइन रिटेल में अमेज़न। मार्केट लीडर को सबसे ज्यादा पहचान और याददाश्त का फायदा मिलता है। छोटे या चुनौती देने वाले ब्रांड सीधे हमले करके कम ही सफल होते हैं। वे आमतौर पर खेल के नियम बदलते हैं और अपनी अलग पहचान बनाते हैं।
राजनीति में भी यही स्थिति है। जब कोई नेता राष्ट्रीय राजनीति का मुख्य चेहरा बन जाता है, तब विपक्ष के सामने दो रास्ते होते हैं—या तो वह उसी नेता द्वारा तय किए गए नैरेटिव के भीतर खेलता रहे, या फिर पूरी बहस का केंद्र बदल दे। लेकिन आज भारत में विपक्ष अक्सर पहला रास्ता चुनता दिखाई देता है। वह सरकार की हर नीति, हर बयान और हर कदम पर प्रतिक्रिया देता है, लेकिन अपनी अलग दिशा या स्पष्ट विजन कम ही प्रस्तुत कर पाता है।
केवल नकारात्मक राजनीति लंबे समय तक प्रभावी नहीं रहती। मार्केटिंग में भी यदि कोई ब्रांड केवल अपने प्रतिद्वंद्वी की आलोचना करे और खुद कोई सकारात्मक विकल्प न दे, तो उसकी छवि कमजोर हो जाती है। ऐसा ब्रांड शोर तो पैदा करता है, लेकिन विश्वास और पहचान नहीं बना पाता। राजनीति में भी मतदाता केवल यह नहीं देखते कि कौन किसका विरोध कर रहा है। वे यह जानना चाहते हैं कि कौन भरोसेमंद है, किसके पास स्पष्ट सोच है और कौन भविष्य के लिए बेहतर विकल्प प्रस्तुत कर सकता है।
पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी का उभार इस दृष्टि से एक रोचक उदाहरण माना जा सकता है। कई वर्षों तक भाजपा वहां मुख्य राजनीतिक शक्ति नहीं थी। लेकिन लगातार विरोध और आक्रामक आलोचना ने एक तरह से उसकी राजनीतिक उपस्थिति को और मजबूत कर दिया। जितनी ज्यादा चर्चा हुई, उतना ही उसका प्रभाव और ध्रुवीकरण बढ़ता गया। मार्केटिंग में इसे “मेंटल अवेलेबिलिटी” कहा जाता है-यानी कोई नाम जितना ज्यादा चर्चा में रहेगा, लोगों के दिमाग में उतना ही मजबूत होगा। कई बार लगातार आलोचना किसी ब्रांड या नेता को कमजोर नहीं बल्कि वैधता प्रदान कर देती है।
मार्केटिंग यह भी सिखाती है कि सफल चुनौती देने वाले ब्रांड कुछ खास सिद्धांतों पर चलते हैं। पहला, वे बाजार के नेता की लगातार चर्चा नहीं करते। दूसरा, वे अपनी अलग पहचान बनाते हैं। उदाहरण के तौर पर एप्पल ने कभी यह कहकर अपनी पहचान नहीं बनाई कि माइक्रोसॉफ्ट खराब है। उसने खुद को सरलता, रचनात्मकता और अलग सोच के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया। तीसरा, सफल ब्रांड खेल के नियम बदलते हैं। और चौथा, वे भावनात्मक जुड़ाव बनाते हैं। लोग केवल तथ्यों से प्रभावित नहीं होते, बल्कि कहानियों, उम्मीदों और भावनाओं से भी जुड़ते हैं।
भारतीय विपक्ष की वर्तमान राजनीति में कई कमजोरियां इसी संदर्भ में दिखाई देती हैं। उसकी राजनीति अक्सर नेता-केंद्रित हो जाती है, मतदाता-केंद्रित नहीं। वह सरकार के कदमों पर प्रतिक्रिया देने में अधिक व्यस्त दिखाई देता है, बजाय खुद एजेंडा तय करने के। उसके पास एक स्पष्ट और लगातार दोहराया जाने वाला नैरेटिव कम दिखाई देता है। इसके अलावा आलोचना पर अत्यधिक निर्भरता उसकी अपनी पहचान को कमजोर करती है।
मीडिया का प्रभाव भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। राजनीति में लगातार टकराव और बहस मीडिया को सामग्री देते हैं। जब विपक्ष लगातार प्रधानमंत्री या सरकार पर हमला करता है, तो मीडिया और सोशल मीडिया में वही चेहरे और वही नाम बार-बार दिखाई देते हैं। इससे सत्ता पक्ष की केंद्रीयता और मजबूत होती है। मार्केटिंग में कोई भी ब्रांड अपने विज्ञापन बजट का उपयोग प्रतिद्वंद्वी को प्रसिद्ध करने के लिए नहीं करेगा, लेकिन राजनीति में कई बार यही अनजाने में हो जाता है।
मतदाता भी उपभोक्ताओं की तरह मानसिक शॉर्टकट का इस्तेमाल करते हैं। जो नाम सबसे ज्यादा सुनाई देता है, वह ज्यादा परिचित लगता है। परिचय भरोसा पैदा करता है और लगातार दृश्यता महत्व का संकेत बन जाती है। इसलिए कई बार लगातार हमले भी सत्ताधारी नेताओं को और मजबूत बना देते हैं।
यदि राजनीति में मार्केटिंग की रणनीतियों को गंभीरता से अपनाया जाए, तो विपक्ष का तरीका अलग हो सकता है। उसे केवल विरोध नहीं बल्कि एक सकारात्मक और स्पष्ट विजन प्रस्तुत करना होगा। उसे अपनी अलग पहचान बनानी होगी, जो केवल किसी नेता के विरोध पर आधारित न हो। उसे जनता की समस्याओं, आकांक्षाओं और भविष्य की बात करनी होगी। लगातार आक्रामक आलोचना के बजाय सूक्ष्म लेकिन प्रभावी अंतर दिखाना अधिक लाभदायक हो सकता है।
अंततः सबसे बड़ी सीख यही है कि ध्यान सबसे मूल्यवान पूंजी है। जिस व्यक्ति, विचार या दल पर सबसे ज्यादा ध्यान दिया जाएगा, वही सबसे मजबूत बनेगा। इसलिए किसी भी चुनौती देने वाले राजनीतिक दल के लिए सबसे जरूरी काम यह नहीं है कि वह नेता को लगातार निशाना बनाए, बल्कि यह है कि वह खुद को इतना मजबूत, स्पष्ट और विश्वसनीय विकल्प बनाए कि जनता उसे अपने आप स्वीकार करने लगे। जब तक यह बदलाव नहीं होगा, तब तक आलोचना तो होती रहेगी, लेकिन उसका राजनीतिक लाभ जरूरी नहीं कि विपक्ष को मिले।
( यह लेखक के निजी विचार हैं )
तमिलनाडु इस समय एक बड़े बदलाव के दौर से गुजर रहा है। इतने बड़े बदलाव की उम्मीद बहुत कम लोगों ने की थी, यहीं से कहानी शुरू होती है।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
अनूप चंद्रशेखरन, सीओओ (रीजनल कंटेंट), 'द इपिक कंपनी' ।।
तमिलनाडु इस समय एक बड़े बदलाव के दौर से गुजर रहा है। इतने बड़े बदलाव की उम्मीद बहुत कम लोगों ने की थी, यहीं से कहानी शुरू होती है। लेकिन सवाल यह है कि तमिलगा वेट्री कझगम (TVK) ने यह सब इतनी कम समय में कैसे कर दिखाया?
2026 के तमिलनाडु चुनाव में एक ऐसा कैंपेन मॉडल देखने को मिला, जिसे सिर्फ दिखाई देने वाले आंकड़ों से समझना आसान नहीं है। विजय हर जगह कैंपेन करने नहीं गए, उन्होंने हर विधानसभा क्षेत्र में जाकर रैली भी नहीं की। फिर ऐसा क्या था जो नजर नहीं आया- कुछ ऐसा, जो किसी जादुई असर जैसा लगा? TVK की सफलता को अक्सर विजय की पहले से मौजूद लोकप्रियता और उस फैन बेस के डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर तेजी से एक्टिव होने से जोड़ा जाता है। लेकिन इससे नतीजा तो समझ आता है, तरीका नहीं।
इस कैंपेन ने यह दिखाया कि राजनीतिक कम्युनिकेशन अब कैसे बनता है, कैसे फैलता है और कैसे लंबे समय तक बना रहता है- इसमें बड़ा बदलाव आ चुका है। पारंपरिक कैंपेन ज्यादा रैलियां, ज्यादा भाषण और ज्यादा मौजूदगी पर टिके होते हैं। लेकिन यह कैंपेन अलग तरीके से काम कर रहा था। इसमें हर एक कदम को ज्यादा दूर तक पहुंचाया गया। तमिलनाडु में यह कुछ ऐसा लगा जैसे अचानक हुई राजनीतिक बारिश पर एक बड़ा छाता खुल गया हो।
अगर तुलना करें एम. के. स्टालिन और एडप्पाडी के. पलानीस्वामी जैसे नेताओं से, तो विजय का मैदान में बोलने का समय काफी कम था। उनके 30-35 मिनट के एक भाषण को सिर्फ एक इवेंट नहीं रहने दिया गया। उसे छोटे-छोटे वीडियो क्लिप्स, कैप्शन वाले पोस्ट और विजुअल कट्स में तोड़ा गया- एक भाषण से 15 से 25 तक कंटेंट पीस तैयार किए गए। कैंपेन ने ज्यादा बोलने की कोशिश नहीं की, बल्कि जो बोला गया, उसे डिजिटल तरीके से ज्यादा दूर तक पहुंचाया गया। उनकी पब्लिक अपीयरेंस भी कम थीं और ज्यादा फोकस्ड थीं। असली फर्क उस अपीयरेंस के बाद दिखा।
उनकी मौजूदगी में एक सिनेमाई अंदाज भी था- लाइट्स का आना-जाना, सिल्हूट्स का दिखना और गायब होना। लोग सिर्फ उन्हें सुनने नहीं, देखने भी आते थे। वे उस चेहरे को देखने आते थे, जिसे वे लंबे समय से स्क्रीन पर देखते आए थे। उनके डायलॉग्स में भी वही फिल्मी असर था: “अगर मैं कुछ तय कर लूं, तो फिर मैं खुद की भी नहीं सुनता।” इसके साथ ही उन्होंने एक अलग रणनीति अपनाई- कम दिखना, कम इंटरव्यू देना, जिससे उनकी अनुपस्थिति ही जिज्ञासा पैदा करे। पहले रैली एक मैसेज का अंत होती थी- लोग आते थे, भाषण होता था और बात वहीं खत्म हो जाती थी। लेकिन अब रैली अंत नहीं, शुरुआत बन गई है।
अब एक भाषण शाम के साथ खत्म नहीं होता, बल्कि आगे बढ़ता है- आवाज से स्क्रीन तक, एक व्यक्ति से दूसरे तक। जो पहले एक पल होता था, अब वह लहर बन जाता है। रैली अब मंजिल नहीं, एक शुरुआत है, जहां से मैसेज आगे फैलता है।
रैलियों की टाइमिंग भी अब सिर्फ लॉजिस्टिक्स या क्षेत्रीय प्लानिंग के हिसाब से तय नहीं होती थी। इसे इस तरह प्लान किया गया कि ज्यादा से ज्यादा लोग उसे देख सकें- खासतौर पर वीकेंड और शाम के समय, जब डिजिटल न्यूज और YouTube की व्यूअरशिप सबसे ज्यादा होती है। इससे भाषण सिर्फ वहां मौजूद लोगों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि पहले से एक्टिव डिजिटल दुनिया में पहुंच गया। कई बार दर्जनों YouTube चैनलों ने इन्हें लाइव दिखाया और कुछ ही मिनटों में क्लिप्स अलग-अलग प्लेटफॉर्म्स पर फैल गईं।
एक कैमरापर्सन ने बताया कि चाहे समय कुछ भी हो, इवेंट कवर करना जरूरी था। अगर यह दूसरे चैनल पर पहले चला गया और उनके चैनल पर नहीं, तो नौकरी पर खतरा आ सकता था। यानी यह सिर्फ विजय का कैंपेन नहीं रहा, बल्कि कई लोगों की रोजी-रोटी का हिस्सा बन गया था। यही उस डिमांड का स्तर था, जो समय के साथ बनाया गया।
इस तरीके ने रैली की परिभाषा ही बदल दी। जहां पहले रैली एक अंत होती थी, अब वह एक बड़े कंटेंट सिस्टम का हिस्सा बन गई। हर ग्राउंड इवेंट से कई तरह का कंटेंट निकला- वीडियो, एडिटेड क्लिप्स, तस्वीरें और अलग-अलग प्लेटफॉर्म्स के लिए फॉर्मेट्स। ये एक के बाद एक नहीं, बल्कि साथ-साथ चलते थे।
इस कैंपेन की ताकत उसका नेटवर्क था। यह सिर्फ ऑफिशियल सोशल मीडिया या पेड मीडिया पर निर्भर नहीं था, बल्कि फैन कम्युनिटीज, माइक्रो-क्रिएटर्स और लोकल डिजिटल ग्रुप्स के जरिए कंटेंट तेजी से फैलता था। कंटेंट वहीं नहीं रुकता था जहां बना, बल्कि तुरंत उठाकर नए तरीके से पेश किया जाता और आगे बढ़ाया जाता था। जो चीज बाहर से अचानक लगती थी, वह असल में एक पहले से तैयार सिस्टम का हिस्सा थी।
यह सिस्टम एक दिन में नहीं बना। धीरे-धीरे विकसित हुआ। विजय का अंदाज- उनकी आवाज, स्क्रिप्ट, हाव-भाव- सबमें एक सिनेमाई पहचान थी। लोग सिर्फ एक नेता नहीं देख रहे थे, बल्कि किसी ऐसे व्यक्ति को देख रहे थे जिसे वे पहले से जानते थे।
शुरुआत में फैन ग्रुप्स को व्यवस्थित कर उन्हें पहचान दी गई। धीरे-धीरे यह एक ऐसा ग्राउंड नेटवर्क बन गया जो खुद भी काम कर सकता था। आखिरी चरण में यह एक “Anil मॉडल” जैसा बन गया- जहां छोटे-छोटे लोकल प्रयास मिलकर बड़ा असर पैदा करते हैं, ठीक वैसे जैसे रामायण में गिलहरी का उदाहरण दिया जाता है।
इस सिस्टम में स्पीड बहुत अहम थी। डिजिटल दुनिया में जो कहानी पहले फैलती है, वही सच बन जाती है। तेज काम करके इस कैंपेन ने शुरुआत में ही नैरेटिव सेट कर दिया और बाद में रिएक्ट करने की जरूरत ही नहीं पड़ी। यह सब सोचा-समझा था।
यहां तक कि वीडियो रिकॉर्डिंग भी प्लान के तहत होती थी- कैमरा एंगल, फ्रेमिंग, भीड़ की प्रतिक्रिया- सब कुछ इस तरह सेट किया जाता था कि बाद में उसे दोबारा इस्तेमाल किया जा सके। बड़ी भीड़ सिर्फ समर्थन नहीं, बल्कि कंटेंट भी बन गई। फिजिकल और डिजिटल दुनिया के बीच की लाइन जानबूझकर धुंधली कर दी गई।
मैसेजिंग भी इसी सिस्टम के हिसाब से बनाई गई- सीधी, बार-बार दोहराई जा सकने वाली और प्रतीकों से भरी। पार्टी का ‘सीटी’ (whistle) चिन्ह ऐसा ही था, जिसे लोग आसानी से पहचान लेते थे, खासकर युवा। यह नाम से ज्यादा याद रहता था और सीधे जुड़ाव बनाता था।
कुल मिलाकर, इस कैंपेन ने राजनीतिक स्केल की परिभाषा बदल दी। एक अपीयरेंस से कई आउटपुट बने और हर आउटपुट कई रास्तों से आगे बढ़ा। अब मेहनत और पहुंच का रिश्ता सीधा नहीं रहा।
यह सिर्फ सोशल मीडिया का अच्छा इस्तेमाल नहीं, बल्कि एक नया मॉडल है- जहां मौजूदगी, कंटेंट, नेटवर्क, टाइमिंग, स्पीड और प्रतीक- all एक साथ काम करते हैं। स्केल अब कभी-कभार नहीं, बल्कि बार-बार हासिल किया जा सकता है।
इसका असर सिर्फ एक चुनाव तक सीमित नहीं है। जैसे-जैसे डिजिटल दुनिया और ज्यादा बिखरी हुई (decentralised) हो रही है, वैसे-वैसे सिर्फ सेंट्रल मैसेजिंग पर चलने वाले कैंपेन पीछे छूट सकते हैं। अब सवाल यह नहीं है कि कैंपेन कितना बोलता है, बल्कि यह है कि उसका हर शब्द कितनी दूर तक पहुंचता है।
यहां तक कि बच्चों से वोट की अपील करने जैसी साधारण लगने वाली बात भी काम कर गई- धीरे-धीरे, चुपचाप, लेकिन असरदार तरीके से।
यह बदलाव अचानक नहीं हुआ। यह पहले से ही शुरू हो चुका था- कैंपेन के चलने के तरीके में। और जब नतीजे आए, तब तक नतीजा तय हो चुका था।
(यह लेख लेखक के निजी विचार हैं।)