बदल रही दर्शकों की पसंद: ‘Free’ से ज्यादा पसंद किया जा रहा ‘Ad-Free’ कंटेंट

इंटरनेट के शुरुआती दौर से डिजिटल दुनिया एक सरल फॉर्मूले पर चलती रही है, यूजर्स को मुफ्त कंटेंट मिलता है और बदले में वे विज्ञापन देखते हैं। लेकिन 2026 में यह मॉडल तेजी से बदलता नजर आ रहा है।

Vikas Saxena by
Published - Friday, 12 June, 2026
Last Modified:
Friday, 12 June, 2026
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इंटरनेट के शुरुआती दौर से डिजिटल दुनिया एक सरल फॉर्मूले पर चलती रही है, यूजर्स को मुफ्त कंटेंट मिलता है और बदले में वे विज्ञापन देखते हैं। लेकिन 2026 में यह मॉडल तेजी से बदलता नजर आ रहा है। दुनिया भर में बड़ी संख्या में लोग अब विज्ञापनों से बचने के लिए पैसे खर्च करने को तैयार हैं। वे सिर्फ ऐड्स को नजरअंदाज नहीं कर रहे, बल्कि विज्ञापन-मुक्त अनुभव के लिए प्रीमियम सेवाओं की सदस्यता भी ले रहे हैं।

यही बदलाव ‘Ad Avoidance Economy’ को जन्म दे रहा है, जहां उपभोक्ता का समय और ध्यान पहले से कहीं अधिक मूल्यवान हो गया है। यह केवल एक अस्थायी ट्रेंड नहीं, बल्कि डिजिटल मीडिया, विज्ञापन और कंटेंट इंडस्ट्री की दिशा बदलने वाला बड़ा परिवर्तन है। इसके पीछे मौजूद आंकड़े भी इसी बदलाव की गंभीरता को दिखाते हैं।

Ad Avoidance क्या है?

Ad Avoidance यानी यूजर्स का जानबूझकर ऐड्स से दूर रहना। आज के समय में इसके कई अलग-अलग रूप देखने को मिलते हैं:

ऐड ब्लॉकर्स: ये ऐसे सॉफ्टवेयर टूल्स होते हैं, जिन्हें ब्राउजर में इंस्टॉल किया जाता है। ये वेबसाइट्स पर आने वाले ऐड्स को अपने आप ब्लॉक कर देते हैं, जिससे यूजर को ऐड दिखाई ही नहीं देते।

Skip Culture: जैसे ही मौका मिलता है, यूजर ऐड स्किप कर देता है, चाहे वो वीडियो प्लेटफॉर्म पर “Skip Ad” बटन दबाना हो या OTT पर कंटेंट को आगे बढ़ा देना। यह भी ad avoidance का ही हिस्सा है।

Premium Subscriptions: आज कई लोग ऐड से बचने के लिए पैसे देने को भी तैयार हैं। जैसे Spotify Premium, YouTube Premium, Netflix और JioHotstar Premium, ये सभी “ad-free experience” के बदले यूजर्स से फीस लेते हैं।

Privacy Browsers: कुछ ब्राउजर जैसे Brave पहले से ही ऐसे बनाए गए हैं, जो ऐड्स और ट्रैकर्स को डिफॉल्ट रूप से ब्लॉक कर देते हैं। इससे यूजर को ज्यादा प्राइवेसी और बिना ऐड का अनुभव मिलता है।

कुल मिलाकर, आज का यूजर विज्ञापन देखने से बचने के लिए हर तरीका अपना रहा है, चाहे टेक्नोलॉजी का सहारा लेना हो या फिर पैसे खर्च करना। यह सभी मिलकर एक ऐसी इकनॉमी बना रहे हैं, जहां यूजर की सबसे बड़ी चाहत है- "बस मुझे ऐड मत दिखाओ।"

आंकड़े जो बताते हैं असली तस्वीर

अगर आप सोचते हैं कि सिर्फ कुछ “tech-savvy” (टेक एक्सपर्ट) लोग ही ऐड्स ब्लॉक करते हैं, तो जरा ये आंकड़े देखिए:

Statista और Blockthrough (eyeo) के आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक,  2023 की दूसरी तिमाही में दुनियाभर में करीब 91.2 करोड़ (912 मिलियन) लोग नियमित रूप से ऐड ब्लॉकर का इस्तेमाल कर रहे थे और यह संख्या लगातार बढ़ रही है। Backlinko के मार्च 2026 अपडेट के अनुसार, GWI के 2025 की दूसरी तिमाही में डेटा में करीब 29.5% इंटरनेट यूजर्स किसी न किसी रूप में ऐड ब्लॉकिंग का इस्तेमाल करते हैं, जो लगभग 1.77 अरब लोगों के बराबर है। यानी दुनिया का करीब हर तीसरा इंटरनेट यूजर किसी न किसी तरीके से ऐड्स को ब्लॉक या फिल्टर कर रहा है।

मोबाइल पर यह बदलाव और भी तेज है। 2014 में सिर्फ 9.9 करोड़ लोग मोबाइल पर ऐड ब्लॉकर का इस्तेमाल करते थे, लेकिन 2023 तक यह संख्या बढ़कर 49.6 करोड़ हो गई, यानी करीब पांच गुना से ज्यादा उछाल। वहीं डेस्कटॉप पर यह आंकड़ा 41.6 करोड़ के आसपास है।

देशों की बात करें तो जर्मनी में करीब 49% इंटरनेट यूजर्स ऐड ब्लॉकर्स इस्तेमाल करते हैं। इंडोनेशिया, वियतनाम और चीन में यह आंकड़ा 38–40% से ज्यादा है। Statista और GWI के सर्वे के मुताबिक भारत में भी करीब 50% इंटरनेट यूजर्स किसी न किसी रूप में ऐड ब्लॉकिंग टूल्स का इस्तेमाल कर रहे हैं, जो मोबाइल-फर्स्ट इंटरनेट यूसेज की वजह से तेजी से बढ़ रहा है।

प्राइवेसी पर फोकस करने वाला ब्राउजर Brave भी तेजी से लोकप्रिय हो रहा है। अक्टूबर 2025 तक इसके 10 करोड़ (100 मिलियन) मंथली एक्टिव यूजर्स हो चुके हैं और इसमें डिफॉल्ट रूप से सभी ऐड्स और ट्रैकर्स ब्लॉक होते हैं।

Spotify और YouTube Premium: सब्सक्रिप्शन इकनॉमी का असली चेहरा

अगर ऐड से बचाव सिर्फ "फ्री में" होता, तो शायद इंडस्ट्री इसे नजरअंदाज कर सकती थी। लेकिन यूजर अब इसके लिए पैसे भी दे रहे हैं और यही सबसे बड़ी बात है।

Spotify की बात करें तो कंपनी के Q1 2026 (जनवरी–मार्च 2026) के आधिकारिक SEC filing के अनुसार, Spotify के 29.3 करोड़ (293 मिलियन) प्रीमियम सब्सक्राइबर्स हो चुके हैं। Q1 2025 में यह 26.8 करोड़ थे, यानी एक साल में 9% की बढ़ोतरी और 2.5 करोड़ (25 मिलियन) नए पेइंग यूजर्स। इन सभी ने मुख्यतः एक ही वजह से प्रीमियम लिया- ऐड-फ्री म्यूजिक सुनने के लिए। Spotify के कुल 76.1 करोड़ मंथली एक्टिव यूजर्स हैं (Q1 2026), जिनमें से 48.3 करोड़ ऐड-सपोर्टेड फ्रीम यूजर्स हैं, जो या तो ऐड्स सहते हैं, या एक दिन प्रीमियम लेने की राह पर हैं।

YouTube Premium की कहानी भी कम रोचक नहीं है। YouTube की आधिकारिक घोषणा और Statista के अनुसार, मार्च 2025 तक YouTube Premium और YouTube Music के मिलाकर 12.5 करोड़ (125 मिलियन) subscribers हो चुके थे — जो फरवरी 2024 में 10 करोड़ थे, यानी एक साल में 25% की छलांग। 2020 में यह सिर्फ 3 करोड़ थे। 2026 पहली तिमाही में एल्फाबेट के सीईओ सुंदर पिचई ने अर्निंग कॉल्स में कंफर्म किया कि

YouTube Music और YouTube Premium ने लॉन्च के बाद से अपने non-trial (यानी पेड) सब्सक्राइबर्स में अब तक की सबसे बड़ी तिमाही बढ़ोतरी दर्ज की है। हालांकि कंपनी ने नई सटीक संख्या सार्वजनिक नहीं की है।

यह सब्सक्रिप्शन इकनॉमी की ताकत है। लोग महीने के ₹149 (India, YouTube Premium Individual Plan) या $13.99 (US) खर्च करने को तैयार हैं, सिर्फ इसलिए कि कोई ऐड न आए।

भारत का OTT बाजार: ऐड से प्रीमियम की ओर सफर

भारत में यह बदलाव और भी नाटकीय है। यहां OTT मार्केट की कहानी "फ्री से प्रीमियम" की तरफ जाने की कहानी है।

FICCI-EY 2026 की रिपोर्ट (मार्च 2026) के अनुसार, भारत में डिजिटल सब्सक्रिप्शन रेवेन्यू 60% बढ़कर ₹16,300 करोड़ (INR 163 billion) हो गईं। 2025 में पेड वीडियो सब्सक्रिप्शन 21.6 करोड़ (216 मिलियन) तक पहुंच गईं, जो 14.3 करोड़ घरों में फैली हैं। तुलना के लिए, 2024 में यह संख्या 11.1 करोड़ थी (FICCI-EY 2025 Report, मार्च 2025)। यानी एक साल में लगभग दोगुनी।

JioHotstar (Disney+ Hotstar और JioCinema का विलय) ने 2025 की शुरुआत में IPL के लिए फ्रीमियम मॉडल से पेड सब्सक्रिप्शन की तरफ शिफ्ट किया और इस एक रणनीतिक कदम ने मार्केट को 14.3 करोड़ भुगतान करने वाले घरों तक पहुंचाने में बड़ी भूमिका निभाई।

भारत में औसत OTT व्युअर अब 3 प्लेटफॉर्म्स सब्सक्राइब करता है और हर महीने ₹1,360 से ज्यादा खर्च करता है। भारत में Connected TV (CTV) यूजर्स की संख्या 2024 के 6.97 करोड़ से बढ़कर 2025 में 12.92 करोड़ हो गई, यानी सालभर में 85% की ग्रोथ (FICCI-EY 2026)। बड़े screen पर देखने वाले प्रीमियम एक्सपीरियंस के लिए ज्यादा भुगतान करते हैं।

यूजर आखिर ऐड्स से क्यों भाग रहा है?

यह समझना जरूरी है कि यह सिर्फ "ऐड्स पसंद नहीं" जैसी बात नहीं है। इसके पीछे कई ठोस कारण हैं:

  1. ऐड्स से बचने की वजहें (Ad Avoidance के कारण):

    ऐड्स की बाढ़: eyeo की 2023 Ad-Filtering रिपोर्ट के मुताबिक, 63.2% यूजर्स ऐड्स इसलिए ब्लॉक करते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि हर जगह बहुत ज्यादा विज्ञापन हैं।

    Intrusive Ads (परेशान करने वाले फॉर्मेट): Auto-play वीडियो जो अचानक आवाज के साथ चल पड़ते हैं, या पॉप-अप्स जो पूरी स्क्रीन ढक लेते हैं—इनको 53.4% से ज्यादा यूजर्स “रुकावट डालने वाला” मानते हैं (eyeo, 2023)।

    प्राइवेसी की चिंता: करीब 40.3% यूजर्स कहते हैं कि वे अपनी प्राइवेसी बचाने के लिए ऐड ब्लॉकर इस्तेमाल करते हैं। eyeo और The Harris Poll के नवंबर 2024 सर्वे के मुताबिक, 96% ad-filtering यूजर्स ऑनलाइन प्राइवेसी के लिए खुद कदम उठाते हैं।

    धीमी वेबसाइट (Slow Loading): जिन वेबसाइट्स पर ज्यादा ऐड होते हैं, वे धीमी खुलती हैं और मोबाइल डेटा भी ज्यादा खर्च करती हैं, खासतौर पर भारत जैसे मोबाइल-फर्स्ट देशों में यह बड़ी वजह है।

    बार-बार वही ऐड (Repetitive Targeting): अगर आपने एक बार कोई प्रोडक्ट देख लिया, तो वही ऐड हर जगह दिखता रहता है। कई यूजर्स इसे “पीछा करने जैसा” अनुभव मानते हैं, जो उन्हें परेशान करता है।

    सख्ती का उल्टा असर: जब YouTube ने 2024–2025 में ऐड ब्लॉकर्स के खिलाफ सख्त कदम उठाए और ऐसे यूजर्स के लिए वीडियो लोडिंग धीमी कर दी, तो इसका उल्टा असर देखने को मिला। All About Cookies के सर्वे के मुताबिक, 22% यूजर्स और ज्यादा ऐड ब्लॉकिंग टूल्स खोजने लगे। वहीं सिर्फ 11% लोगों ने कहा कि वे अब ऐड ब्लॉकर कम इस्तेमाल करेंगे।

ब्रैंड्स और विज्ञापनदाताओं पर असर क्या पड़ रहा है?

eyeo और Blockthrough की 2023 Ad-Filtering रिपोर्ट के मुताबिक, ऐड ब्लॉकर्स की वजह से 2024 में दुनियाभर के पब्लिशर्स को करीब 54 अरब डॉलर का नुकसान हुआ, जो ग्लोबल डिजिटल ऐड स्पेंड का लगभग 8% है। रिपोर्ट यह भी बताती है कि अगर “Acceptable Ads” जैसे सिस्टम न होते, तो यह नुकसान 116 अरब डॉलर तक पहुंच सकता था।

Ad Fatigue (ऐड्स से थकान) अब एक बड़ी मार्केटिंग समस्या बन चुकी है। eyeo और The Harris Poll के नवंबर 2024 सर्वे में 89% यूजर्स ने कहा कि ऑनलाइन ऐड्स की संख्या और उनकी परेशान करने वाली प्रकृति पर इंडस्ट्री लेवल पर लिमिट लगनी चाहिए।

ROI (रिटर्न ऑन इन्वेस्टमेंट) भी लगातार गिर रहा है। पारंपरिक डिस्प्ले ऐड्स का असर कम होता जा रहा है। “Banner blindness” यानी यूजर्स का बैनर ऐड्स को बिना देखे नजरअंदाज करना, अब एक साबित मनोवैज्ञानिक व्यवहार बन चुका है।

ट्रस्ट (विश्वास) भी बड़ा मुद्दा बन गया है।
अगर कोई यूजर सिर्फ ऐड्स से बचने के लिए पैसे देने लगे, तो यह ब्रैंड के लिए साफ संकेत है कि कहीं न कहीं वह यूजर एक्सपीरियंस में फेल हो रहा है।

इंडस्ट्री का जवाब: बदलाव की कोशिश

विज्ञापन इंडस्ट्री अब खुद को बदलने की कोशिश कर रही है:

Native Advertising: ऐसे ऐड्स जो कंटेंट जैसे दिखते और महसूस होते हैं। ये कम ब्लॉक होते हैं क्योंकि ये कंटेंट के साथ घुल-मिल जाते हैं।

Content Marketing: ब्रैंड्स अब खुद कंटेंट बना रहे हैं- वीडियो, ब्लॉग, पॉडकास्ट, जहां ऐड अलग से नहीं, बल्कि कंटेंट का हिस्सा बन जाता है।

Influencer Integration: क्रिएटर इकॉनमी में ब्रैंड्स अब इन्फ्लुएंसर्स के जरिए प्रोडक्ट को “सिफारिश” की तरह पेश कर रहे हैं, जिससे वह ऐड कम और पर्सनल सुझाव ज्यादा लगता है।

Acceptable Ads Program: eyeo (AdBlock Plus बनाने वाली कंपनी) का यह प्रोग्राम ऐसे ऐड्स को अनुमति देता है जो यूजर को परेशान नहीं करते। 2025 तक इसमें करीब 40 करोड़ यूजर्स शामिल हो चुके थे (स्रोत: eyeo; eMarketer 2026)। इससे साफ है कि यूजर्स हर ऐड के खिलाफ नहीं हैं- वे सिर्फ खराब और intrusive ऐड्स से परेशान हैं।

Short-form Subtle Branding: YouTube Shorts और Instagram Reels जैसे फॉर्मेट्स में ब्रैंडिंग इतनी नेचुरल तरीके से होती है कि यूजर उसे स्किप करने की सोचता ही नहीं।

क्या विज्ञापन का भविष्य बदल रहा है?

2026 में एक बात साफ नजर आ रही है- विज्ञापन का पुराना “Interruption Model”, यानी कंटेंट के बीच में जबरदस्ती ऐड दिखाना, अब पहले जैसा असरदार नहीं रहा है। यूजर्स अब ऐसे ऐड्स से बचने लगे हैं और उन्हें नजरअंदाज करना सीख चुके हैं।

अब इंडस्ट्री में धीरे-धीरे बड़ा बदलाव दिख रहा है। पहले जहां ब्रांड्स यूजर्स पर ऐड्स “थोपते” थे, वहीं अब फोकस यूजर को बेहतर अनुभव देने पर शिफ्ट हो रहा है। मतलब Interruption से Experience की तरफ बढ़त हो रही है।

इसी तरह, पहले जहां सिर्फ मैसेज “पुश” करने पर जोर था, अब ब्रांड्स यूजर के साथ जुड़ने और उन्हें एंगेज करने पर ध्यान दे रहे हैं। यानी Push से Engagement की तरफ ट्रेंड बदल रहा है।

साथ ही, डेटा के अंधाधुंध इस्तेमाल के बजाय अब भरोसा जीतना ज्यादा जरूरी हो गया है। इसलिए Data से Trust की तरफ भी साफ बदलाव दिख रहा है।

कुल मिलाकर, अब Privacy-first advertising को भविष्य माना जा रहा है—जहां यूजर को साफ-साफ पता हो कि उसका डेटा कैसे और क्यों इस्तेमाल किया जा रहा है। यही अप्रोच आने वाले समय में विज्ञापन की दिशा तय करेगी।

इंडस्ट्री के लिए साफ चेतावनी

Ad Avoidance Economy अब सिर्फ कुछ लोगों की शिकायत नहीं रही, बल्कि करोड़ों यूजर्स का एक बड़ा संकेत बन चुकी है।

जब Spotify पर Q1 2026 में 29.3 करोड़ लोग पैसे देकर ऐड्स से बच रहे हों, जब YouTube Premium के 12.5 करोड़ सब्सक्राइबर्स (मार्च 2025) ऐड-फ्री एक्सपीरियंस के लिए पैसे दे रहे हों, और भारत में डिजिटल सब्सक्रिप्शन तेजी से बढ़ रहा हो, तो यह इंडस्ट्री के लिए एक साफ संदेश है।

अगर विज्ञापन यूजर के अनुभव का सम्मान नहीं करेंगे, अगर वे लगातार परेशान करने वाले, दोहराव वाले और प्राइवेसी में दखल देने वाले बने रहेंगे—तो यूजर उन्हें पूरी तरह से नजरअंदाज कर देगा। और इसके लिए वह पैसे खर्च करने को भी तैयार है।

जो इंडस्ट्री इस बदलाव को समझ लेगी, वही आगे टिकेगी। जो नहीं समझेगी- वह धीरे-धीरे यूजर के लिए “इनविजिबल” हो जाएगी।

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BCCI ने मुथूट फिनकॉर्प को बनाया टाइटल स्पॉन्सर

भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) ने नॉन-बैंकिंग फाइनेंस कंपनी मुथूट फिनकॉर्प को मार्च 2028 तक होने वाले सभी अंतरराष्ट्रीय मैचों के लिए टाइटल स्पॉन्सर बनाया है।

Samachar4media Bureau by
Published - Saturday, 26 September, 2026
Last Modified:
Saturday, 26 September, 2026
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भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) ने नॉन-बैंकिंग फाइनेंस कंपनी मुथूट फिनकॉर्प को मार्च 2028 तक होने वाले सभी अंतरराष्ट्रीय मैचों के लिए टाइटल स्पॉन्सर बनाया है। इकनॉमिक टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक, यह डील 150 करोड़ रुपये तक की है।

रिपोर्ट में बताया गया है कि कि मुथूट फिनकॉर्प हर मैच के लिए अधिकतम 4.3 करोड़ रुपये का भुगतान करेगा। वहीं, मौजूदा साइकल के 35 मैचों के लिए बीसीसीआई ने 4.85 करोड़ रुपये प्रति मैच की कीमत तय की थी।

पिछले टाइटल स्पॉन्सर आईडीएफसी फर्स्ट ने पिछली साइकल में प्रति मैच 4.2 करोड़ रुपये का भुगतान किया था। इस साइकल में 56 मैच शामिल थे और यह अगस्त में खत्म हुई। आईडीएफसी फर्स्ट ने 2023 में तीन साल के लिए 235.2 करोड़ रुपये की डील के तहत ये अधिकार हासिल किए थे।

बीसीसीआई ने टाइटल स्पॉन्सरशिप अधिकारों की बिक्री के लिए पहली बार 20 जुलाई को टेंडर जारी किया था। इसमें बोली जमा करने की आखिरी तारीख 13 अगस्त थी, जिसे बाद में बढ़ाकर 7 सितंबर कर दिया गया था।

रिपोर्ट में कहा गया है कि टेंडर प्रक्रिया के जरिए पार्टनर नहीं मिलने के बाद बीसीसीआई ने मुथूट फिनकॉर्प के साथ सीधे डील की है।

एक स्पोर्ट्स मार्केटिंग अधिकारी के जरिए रिपोर्ट में बताया गया है कि नई डील आईडीएफसी फर्स्ट की ओर से दिए गए 4.2 करोड़ रुपये प्रति मैच से ज्यादा है, लेकिन बीसीसीआई की ओर से तय 4.85 करोड़ रुपये के बेस प्राइस से कम है।

अधिकारी ने कहा कि यह डील दिखाती है कि क्रिकेट स्पॉन्सरशिप मार्केट अब भी मजबूत बना हुआ है। हालांकि, यह बीसीसीआई के लिए एक तरह का रियलिटी चेक भी है, क्योंकि बोर्ड अपनी तय उम्मीद तक पहुंचने में सफल नहीं रहा।

यह नई डील ऐसे समय हुई है जब बीसीसीआई ने टीम इंडिया से जुड़े द्विपक्षीय क्रिकेट मैचों के लिए कैंपा, एसबीआई लाइफ और चैटजीपीटी को एसोसिएट पार्टनर बनाया है। इन तीनों नई स्पॉन्सरशिप डील की कुल कीमत 130 करोड़ रुपये से ज्यादा है, जो पिछली साइकल के मुकाबले 44 प्रतिशत ज्यादा है।

मामले से जुड़े लोगों ने पहले इकनॉमिक टाइम्स को बताया था कि कैंपा कोला 1.31 करोड़ रुपये प्रति मैच की बोली के साथ सबसे ऊंची बोली लगाने वाली कंपनी रही। इसके बाद चैटजीपीटी और एसबीआई लाइफ ने 1.2 करोड़ रुपये प्रति मैच की बोली लगाई। बिसलेरी और इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन ने भी 1.2 करोड़ रुपये प्रति मैच की बोली लगाई थी और वे एसोसिएट पार्टनरशिप के लिए दौड़ में थे।

बीसीसीआई ने एसोसिएट पार्टनर अधिकारों के लिए रिजर्व प्राइस भी बढ़ाकर 95 लाख रुपये प्रति मैच कर दिया था। पहले यह 82 लाख रुपये प्रति मैच था।

डब्ल्यूपीपी मीडिया की ‘स्पोर्टिंग नेशन’ रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में 2025 में स्पोर्ट्स स्पॉन्सरशिप पर 7,942 करोड़ रुपये खर्च हुए, जो सालाना आधार पर 7 प्रतिशत की बढ़ोतरी है। इस दौरान स्पॉन्सरशिप मार्केट में क्रिकेट की हिस्सेदारी भी एक साल पहले के 85 प्रतिशत से बढ़कर 89 प्रतिशत हो गई।

फिनटेक और फैंटेसी स्पोर्ट्स जैसी कई नई कैटेगरी के बाहर होने के बावजूद क्रिकेट स्पॉन्सरशिप मार्केट में बड़े ब्रैंड्स की दिलचस्पी बनी हुई है। बीसीसीआई की कुछ बड़ी डील में अपोलो टायर्स के साथ फ्रंट-ऑफ-जर्सी स्पॉन्सरशिप डील भी शामिल है, जिसकी कीमत 579 करोड़ रुपये है। इसके अलावा एशियन पेंट्स के साथ 145 करोड़ रुपये की डील भी है।

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क्रेयॉन्स ऐडवर्टाइजिंग ने अमित बांका को बनाया नया CFO

क्रेयॉन्स ऐडवर्टाइजिंग लिमिटेड ने अमित बांका को कंपनी का नया चीफ फाइनेंशियल ऑफिसर (CFO) नियुक्त किया है।

Vikas Saxena by
Published - Friday, 25 September, 2026
Last Modified:
Friday, 25 September, 2026
Crayons874

क्रेयॉन्स ऐडवर्टाइजिंग लिमिटेड ने अमित बांका को कंपनी का नया चीफ फाइनेंशियल ऑफिसर (CFO) नियुक्त किया है। कंपनी ने 23 सितंबर 2026 को स्टॉक एक्सचेंज को इसकी जानकारी दी।

कंपनी के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स की 23 सितंबर को हुई बैठक में अमित बांका की CFO और Key Managerial Personnel (KMP) के तौर पर नियुक्ति को मंजूरी दी गई। उनकी नियुक्ति 23 सितंबर 2026 से प्रभावी हो गई है।

कंपनी ने बताया कि उनकी नियुक्ति कंपनी के रोजगार से जुड़े नियमों और शर्तों के आधार पर की गई है।

अमित बांका को फाइनेंस के क्षेत्र में 24 साल से ज्यादा का अनुभव है। उन्होंने वित्तीय रणनीति, ऑपरेशनल कामकाज और संगठन के विकास से जुड़े क्षेत्रों में काम किया है। उन्हें फाइनेंशियल प्लानिंग एंड एनालिसिस, कॉरपोरेट रिस्ट्रक्चरिंग, ट्रेजरी मैनेजमेंट, कंप्लायंस और टीम लीडरशिप का भी अनुभव है।

कंपनी ने यह भी बताया कि अमित बांका की नियुक्ति का कंपनी के किसी डायरेक्टर से कोई संबंध नहीं है। 

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Maxposure के शेयर भाव में हलचल पर NSE को जवाब, कंपनी बोली- कोई अप्रकाशित जानकारी नहीं

मैक्सपोजर लिमिटेड (Maxposure Limited) ने अपने शेयरों की कीमत में हाल में हुई महत्वपूर्ण हलचल को लेकर नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) को स्पष्टीकरण दिया है।

Vikas Saxena by
Published - Monday, 21 September, 2026
Last Modified:
Monday, 21 September, 2026
Maxposure543

मैक्सपोजर लिमिटेड (Maxposure Limited) ने अपने शेयरों की कीमत में हाल में हुई महत्वपूर्ण हलचल को लेकर नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) को स्पष्टीकरण दिया है। कंपनी ने कहा है कि उसके पास ऐसी कोई जानकारी, घटना, घटनाक्रम या आने वाली घोषणा नहीं है, जिसे SEBI Listing Regulations, 2015 के तहत शेयर बाजार को बताना जरूरी हो और जिसका असर कंपनी के शेयर की कीमत या कारोबार की मात्रा पर पड़ सकता हो।

बता दें कि मैक्सपोजर लिमिटेड नई पीढ़ी के मीडिया और एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री की एक प्रमुख कंपनी है, जिसका खास फोकस एविएशन मार्केट पर है।

कंपनी ने यह स्पष्टीकरण 18 सितंबर 2026 को NSE के सर्विलांस डिपार्टमेंट को भेजा। यह जवाब NSE की 17 सितंबर 2026 की उस चिट्ठी के संदर्भ में दिया गया है, जिसमें कंपनी के शेयरों की कीमत में महत्वपूर्ण उतार-चढ़ाव को लेकर स्पष्टीकरण मांगा गया था।

कंपनी ने कहा कि उसने SEBI (Listing Obligations and Disclosure Requirements) Regulations, 2015 के तहत लागू सभी जरूरी खुलासा नियमों का पालन किया है। कंपनी के मुताबिक, 3 सितंबर 2026 को हुई बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स की बैठक के नतीजे और उससे जुड़े जरूरी खुलासे उसी दिन NSE को भेज दिए गए थे।

मैक्सपोजर ने यह भी कहा कि फिलहाल कंपनी से जुड़ी ऐसी कोई अन्य महत्वपूर्ण जानकारी या प्राइज-सेन्सिटिव इनफॉर्मेशन, घटना या घटनाक्रम लंबित नहीं है, जिसे SEBI LODR Regulations के Regulation 30 के तहत स्टॉक एक्सचेंज को बताना बाकी हो।

कंपनी ने साफ किया कि उसके पास ऐसी कोई अप्रकाशित जानकारी या घोषणा नहीं है, जिसका हाल में कंपनी के शेयरों की कीमत या कारोबार की मात्रा में हुई हलचल से कोई संबंध हो सकता है।

कंपनी के मुताबिक, शेयर की कीमत और कारोबार की मात्रा में यह बदलाव बाजार की स्थितियों और बाजार में मौजूद दूसरे कारणों की वजह से हो सकता है। इन कारणों पर कंपनी का नियंत्रण नहीं है। मैक्सपोजर ने कहा कि वह आगे भी लागू नियमों के तहत सभी जरूरी खुलासे करती रहेगी और ऐसी किसी भी महत्वपूर्ण घटना या जानकारी के बारे में स्टॉक एक्सचेंज को उचित समय पर जानकारी देती रहेगी।

 

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ISA जल्द ला सकता है क्रॉस-मीडिया मीजरमेंट सिस्टम

ISA का सिस्टम WFA के Halo फ्रेमवर्क और ब्रिटेन के ‘Origin’ मॉडल पर आधारित होगा, जिसकी शुरुआत वीडियो मेजरमेंट से होने की उम्मीद है।

Samachar4media Bureau by
Published - Wednesday, 16 September, 2026
Last Modified:
Wednesday, 16 September, 2026
ISA854

कंचन श्रीवास्तव, सीनियर एडिटर, एक्सचेंज4मीडिया ।।

भारत के करीब ₹1.55 लाख करोड़ के ऐड मार्केट में एक बड़ी चुनौती अब भी बनी हुई है कि अलग-अलग मीडिया प्लेटफॉर्म पर चलने वाले किसी ऐड कैंपेन को वास्तव में कितने अलग-अलग लोग (यूनिक कंज्यूमर्स) देखते हैं। फिलहाल इंडस्ट्री के पास ऐसा कोई साझा मीजरमेंट सिस्टम नहीं है, जो टीवी, डिजिटल और दूसरे मीडिया प्लेटफॉर्म को मिलाकर यह बता सके कि किसी कैंपेन की कुल रीच कितनी रही और एक ही व्यक्ति तक ऐड कितनी बार पहुंचा।

इस कमी को दूर करने के लिए इंडियन सोसायटी ऑफ ऐडवर्टाइजर्स (ISA) अगले कुछ महीनों में क्रॉस-मीडिया मीजरमेंट (CMM) सिस्टम लॉन्च करने की तैयारी कर रहा है। इस मामले से जुड़े सूत्रों ने एक्सचेंज4मीडिया को यह जानकारी दी है। प्रस्तावित सिस्टम के पहले चरण में वीडियो को शामिल किया जाएगा, क्योंकि यह ऐडवर्टाइजिंग का सबसे बड़ा इन्वेंट्री सेगमेंट है। आगे चलकर इस सिस्टम में दूसरे मीडिया को भी शामिल किया जा सकता है।

यह पहल ISA के करीब तीन साल से चल रहे प्रयास का अगला बड़ा कदम है। ऐडवर्टाइजर लंबे समय से ऐसे साझा सिस्टम की जरूरत महसूस कर रहे हैं, जिससे अलग-अलग और तेजी से बढ़ते मीडिया प्लेटफॉर्म पर ऑडियंस को एक समान तरीके से मापा जा सके।

WFA के Halo फ्रेमवर्क से प्रेरित होगा सिस्टम

ISA के एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक, भारत में तैयार किया जा रहा यह सिस्टम वर्ल्ड फेड्रेशन ऑफ ऐडवर्टाइजर्स (WFA) के Halo फ्रेमवर्क के सिद्धांतों के आधार पर तैयार किया जा रहा है। Halo एक ऐसा कॉमन फ्रेमवर्क है, जिसका मकसद अलग-अलग मीडिया पर कितने अलग-अलग लोगों तक ऐड पहुंचा और उन्होंने उसे कितनी बार देखा, यह पता लगाना है। यानी यह पता लगाया जा सके कि किसी कैंपेन को कुल कितने अलग लोगों ने देखा और उनमें से कितने लोगों तक ऐड बार-बार पहुंचा। 

ISA ने इस दिशा में ब्रिटेन के Origin मॉडल का भी अध्ययन किया है। Origin को Halo फ्रेमवर्क पर आधारित सफल मॉडलों में से एक माना जाता है।

ISA के अधिकारी ने बताया कि भारतीय सिस्टम की शुरुआत वीडियो मीजरमेंट से होने की उम्मीद है। इसके बाद इसे धीरे-धीरे दूसरे मीडिया तक बढ़ाया जाएगा। यानी शुरुआत से ही हर माध्यम को एक ही सिस्टम में शामिल करने के बजाय इसे चरणबद्ध तरीके से आगे बढ़ाया जाएगा।

ऐडवर्टाइजर्स, एजेंसीज और प्लेटफॉर्म्स को साथ लाने की तैयारी

ISA की CMM पहल पर उसकी क्रॉस मीडिया मीजरमेंट सब-कमेटी के भीतर काफी समय से चर्चा और विचार-विमर्श चल रहा है। अब ISA इस प्रक्रिया में ज्यादा से ज्यादा इंडस्ट्री स्टेकहोल्डर्स को शामिल करने की तैयारी कर रहा है। इनमें ऐडवर्टाइजर्स, मीडिया एजेंसीज, ब्रॉडकास्टर्स, डिजिटल प्लेटफॉर्म्स, पब्लिशर्स और मीजरमेंट/डेटा कंपनीज शामिल हैं। 

मौजूदा मीजरमेंट सिस्टम और डेटा प्रोवाइडर्स जैसे BARC और TAM की भी इस प्रक्रिया में भूमिका हो सकती है। इंडस्ट्री यह समझने की कोशिश कर रही है कि अलग-अलग स्रोतों से आने वाले डेटा और मीजरमेंट मेथडोलॉजी को एक कॉमन फ्रेमवर्क के तहत किस तरह इस्तेमाल किया जा सकता है। ISA का मकसद मौजूदा मीजरमेंट करेंसी को तुरंत खत्म करना नहीं है। इसके बजाय एक ऐसी न्यूट्रल मीजरमेंट layer तैयार करने की कोशिश है, जो अलग-अलग जगहों से मिले आंकड़ों को जोड़कर यह बताए कि कैंपेन कितने अलग-अलग लोगों तक पहुंचा।

ऐडवर्टाइजर 10 से ज्यादा टचपॉइंट्स का कर रहे इस्तेमाल

इंडस्ट्री से जुड़े ऐडवर्टाइजर्स के मुताबिक, मीडिया का दायरा लगातार बढ़ रहा है और आज एक ऐडवर्टाइजर अपने ऑडियंस तक पहुंचने के लिए औसतन 10 से ज्यादा टचपॉइंट्स का इस्तेमाल करता है। टीवी, कनेक्टेड टीवी, यूट्यूब, सोशल मीडिया, स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म्स, ऑडियो और दूसरे डिजिटल प्लेटफॉर्म पर एक ही व्यक्ति तक ऐड पहुंच सकता है। ऐसे में हर प्लेटफॉर्म का अलग-अलग डेटा मिलने से यह पता लगाना मुश्किल हो जाता है कि वास्तव में कितने यूनिक कंज्यूमर्स तक कैंपेन पहुंचा।

ऐडवर्टाइजर्स का मानना है कि करीब ₹1.5 लाख करोड़ के सालाना ऐडवर्टाइजिंग खर्च वाले बाजार में यह समझना जरूरी है कि ऑडियंस किस माध्यम पर और किस तरह जुड़ रही है। इसके लिए एक अकाउंटेबल, न्यूट्रल और क्रेडिबल क्रॉस-मीडिया मीजरमेंट सिस्टम की जरूरत है।

TV और CTV मिलाकर करीब 25% ऐड मार्केट

पिच मेडिसन ऐडवर्टाइजिंग रिपोर्ट (PMAR) 2026 के मुताबिक, भारत में 2025 में लीनियर टीवी का ऐडवर्टाइजिंग खर्च करीब ₹32,855 करोड़ रहा। इंडस्ट्री के एक अनुमान के मुताबिक, कनेक्टेड टीवी (CTV) समेत ब्रॉडर लार्ज-स्क्रीन इकोसिस्टम का ऐडवर्टाइजिंग खर्च करीब ₹38,855 करोड़ रहा। इसमें CTV का ऐडवर्टाइजिंग खर्च करीब ₹6,000 करोड़ रहने का अनुमान है, जो एक साल में दोगुना हुआ है। TV और CTV को मिलाकर यह आंकड़ा भारत के कुल ऐडवर्टाइजिंग खर्च का करीब 25% बैठता है।

Halo से Origin और अब भारत की तैयारी

दुनिया में ISA जिस मॉडल को समझने की कोशिश कर रहा है, उसमें WFA का Halo फ्रेमवर्क अहम है। यह ऐडवर्टाइजर्स की पहल पर तैयार किया गया एक ओपेन फ्रेमवर्क है। इसमें कुछ साझा तकनीकी तरीके और नियम दिए गए हैं, जिनकी मदद से अलग-अलग देश अपनी जरूरत के हिसाब से ऐसा क्रॉस-मीडिया मेजरमेंट सिस्टम बना सकते हैं, जिसमें लोगों की निजी जानकारी सुरक्षित रहे।

ब्रिटेन का Origin मॉडल, जिसे Incorporated Society of British Advertisers (ISBA) के नेतृत्व में तैयार किया गया है, Halo फ्रेमवर्क पर आधारित सबसे विकसित मॉडलों में से एक माना जाता है। इसमें टीवी, डिजिटल प्लेटफॉर्म और पैनल डेटा को एक साथ जोड़कर ऑडियंस को मापा जाता है, जबकि लोगों की निजी जानकारी सुरक्षित रखी जाती है। इसका मकसद यह पता लगाना है कि अलग-अलग प्लेटफॉर्म पर एक ही ऐड कितने लोगों तक पहुंचा और लोगों ने उसे कुल कितनी बार देखा।

WFA के मुताबिक, Origin अब ब्रिटेन के ऐडवर्टाइजिंग मार्केट के खर्च के हिसाब से 60% से ज्यादा हिस्से को कवर करता है। अमेरिका में ऐडवर्टाइजर्स द्वारा विकसित Aquila भी इसी तरह के मॉडल पर काम कर रहा है और इसके ट्रायल्स चल रहे हैं। 

ISA अब Origin और Aquila दोनों का अध्ययन कर रहा है, ताकि यह समझा जा सके कि भारत में क्रॉस-मीडिया मीजरमेंट सिस्टम को किस तरह तैयार किया जा सकता है। Origin में सिंगल-सोर्स पैनल को प्लेटफॉर्म डेटा के साथ जोड़ा जाता है। यह प्राइवेसी-प्रिजर्विंग एनवॉयरमेंट में काम करता है और स्वतंत्र ऑ़डिट के अधीन है। इसका मकसद यह पता लगाना है कि TV और डिजिटल के जरिए कितने नए लोगों तक ऐड पहुंचा और कितने लोगों को वही ऐड दोबारा दिखा।

सबसे बड़ी चुनौती टेक्नोलॉजी नहीं, इंडस्ट्री की सहमति

इंडस्ट्री के जानकारों के मुताबिक, CMM सिस्टम तैयार करने में तकनीक शायद सबसे बड़ी चुनौती नहीं होगी। असली चुनौती अलग-अलग स्टेकहोल्डर्स को एक साझा सिस्टम पर सहमत करना हो सकती है।

ऐडवर्टाइजर्स को independent और comparable मीजरमेंट चाहिए। एजेंसीज ऐसा करेंसी सिस्टम चाहती हैं, जिसे मीडिया प्लानिंग सिस्टम्स में इस्तेमाल किया जा सके। वहीं ब्रॉडकास्टर्स और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स अपने डेटा और commercial interests को लेकर सतर्क रहते हैं। दूसरी तरफ मीजरमेंट कंपनीज की अपनी मेथोलॉजी और इंफ्रास्टचर्स पहले से मौजूद हैं। ऐसे में सभी पक्षों को एक साझा फ्रेमवर्क पर लाना ISA के लिए बड़ी चुनौती हो सकती है।

इस पूरी पहल का अंतिम मकसद काफी सीधा है- यह पता लगाना कि किसी कैंपेन ने कितने अलग लोगों तक पहुंच बनाई, लोगों को कितनी बार ऐड दिखा और किस चैनल ने अतिरिक्त (incremental) रीच दी।

ISA की क्रॉस मीडिया मीजरमेंट सब-कमेटी की अध्यक्षता ITC Ltd के चीफ डिजिटल मार्केटिंग ऑफिसर शुवादीप बनर्जी कर रहे हैं। शुवादीप बनर्जी से इस मामले में टिप्पणी के लिए संपर्क किया गया, लेकिन उनकी प्रतिक्रिया नहीं मिल सकी। ISA चेयरमैन सुनील कटारिया ने एक्सचेंज4मीडिया के सवालों का जवाब नहीं दिया।

भारत में CMM की जरूरत क्यों बढ़ रही है?

भारत में TV, कनेक्टेड टीवी, यूट्यूब और दूसरे डिजिटल वीडियो प्लेटफॉर्म्स, social मीडिया, स्ट्रीमिंग सर्विसेज और ऑडियो जैसे कई माध्यमों की ऑडियंस अब एक-दूसरे से काफी हद तक overlap करती है। लेकिन इन सभी के मीजरमेंट सिस्टम अभी भी काफी हद तक प्लेटफॉर्म या medium-specific हैं।

उदाहरण के लिए, किसी ऐडवर्टाइजर को यह पता हो सकता है कि TV पर उसके ऐड को कितने इम्प्रेशंस मिले और डिजिटल पर कितने इम्प्रेशंस मिले। लेकिन दोनों को मिलाकर यह पता लगाना आसान नहीं है कि वास्तव में कितने अलग-अलग लोगों तक ऐड पहुंचा।

एक साझा क्रॉस मीडिया फ्रेमवर्क आने से फोकस सिर्फ इस बात पर नहीं रहेगा कि ऐडवर्टाइजर ने कितनी ऐडवर्टाइजिंग इन्वेंट्री खरीदी, बल्कि यह भी देखा जा सकेगा कि उसे वास्तव में कितनी इक्रीमेंटल ऑडियंस मिली। इसका असर आगे चलकर मीडिया प्लानिंग, ऐडवर्टाइजिंग प्राइसिंग, कैंपेन ऑप्टमाइजेशन और टीवी, डिजिटल वीडियो समेत अलग-अलग प्लेटफॉर्म के योगदान के आकलन पर भी पड़ सकता है।

TV ratings के बदलते दौर में पहल महत्वपूर्ण

ISA की यह पहल ऐसे समय में सामने आ रही है जब भारत का टीवी मीजरमेंट इकोसिस्टम भी बदलाव के दौर से गुजर रहा है। टीवी रेटिंग्स काफी समय से रुकी हुई हैं। सरकार की TV Ratings Policy 2026 में रेटिंग्स इकोसिस्टम को लेकर नए प्रावधान किए गए हैं। इनमें transparency, accountability, data protection और independent oversight को मजबूत करने से जुड़े प्रावधान शामिल हैं। BARC नए रेगुलेट्री फ्रेमवर्क के तहत काम कर रहा है। वहीं मार्केट में TAM जैसे स्थापित खिलाड़ियों से भी ज्यादा कम्पटीशन देखने को मिल सकता है।

दूसरी तरफ दूसरे मीडिया की मीजरमेंट करेंसीज में भी कई चुनौतियां हैं। इंडियन रीडरशिप सर्वे (IRS) पिछले सात साल से रुका हुआ है। वहीं Out-of-Home (OOH) इंडस्ट्री के सामने भी अब तक कोई साझा मीजरमेंट सिस्टम नहीं है। डिजिटलमीडिया का मीजरमेंट बाकी माध्यमों की तुलना में ज्यादा विकसित है, लेकिन यहां भी बड़ी मात्रा में मीजरमेंट डेटा बड़ी टेक्नोलॉजी कंपनियों के नियंत्रण में रहता है।

ऐसे में ISA का प्रस्तावित क्रॉस-मीडिया मीजरमेंट सिस्टम अगर आकार लेता है, तो इसका उद्देश्य अलग-अलग मीडिया की ऑडियंस को एक साझा फ्रेमवर्क में देखकर ऐडवर्टाइजर्स को कैंपेन की वास्तविक रीच और फ्रीक्वेंसी समझने में मदद करना होगा। 

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Vimal Elaichi के विज्ञापन मामले में PB Agro को झटका, दिल्ली हाई कोर्ट ने याचिका की खारिज

विमल इलायची (Vimal Elaichi) बनाने वाली कंपनी PB Agro LLP को दिल्ली हाई कोर्ट से झटका लगा है।

Samachar4media Bureau by
Published - Tuesday, 15 September, 2026
Last Modified:
Tuesday, 15 September, 2026
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विमल इलायची (Vimal Elaichi) बनाने वाली कंपनी PB Agro LLP को दिल्ली हाई कोर्ट से झटका लगा है। कोर्ट ने महाराष्ट्र फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (FDA) की ओर से Vimal Elaichi के सेलिब्रिटी ब्रैंड एंबेसडर्स शाहरुख खान, अजय देवगन और टाइगर श्रॉफ को जारी किए गए कारण बताओ नोटिस को चुनौती देने वाली PB Agro की याचिका खारिज कर दी है।

PB Agro ने महाराष्ट्र FDA की ओर से 11 अगस्त को जारी किए गए इन नोटिस को चुनौती दी थी। इन नोटिस में आरोप लगाया गया था कि Vimal Elaichi के विज्ञापन के जरिए Vimal Pan Masala का अप्रत्यक्ष या सरोगेट प्रचार किया जा रहा है। Vimal Pan Masala महाराष्ट्र में प्रतिबंधित है।

इस मामले में जस्टिस स्वर्णा कांता शर्मा ने सुनवाई के बाद अपना फैसला सुरक्षित रखा था। मुख्य सवाल यह था कि क्या दिल्ली हाई कोर्ट के पास महाराष्ट्र FDA की ओर से जारी किए गए इन नोटिस पर सुनवाई करने का क्षेत्रीय अधिकार है।

केंद्र और CCPA ने याचिका का विरोध किया

केंद्र सरकार और Central Consumer Protection Authority (CCPA) ने PB Agro की याचिका की सुनवाई योग्य होने का विरोध किया था। उनका कहना था कि चूंकि कारण बताओ नोटिस महाराष्ट्र सरकार के विभाग ने जारी किए हैं, इसलिए कंपनी को इस मामले में बॉम्बे हाई कोर्ट का रुख करना चाहिए।

सुनवाई के दौरान महाराष्ट्र सरकार की ओर से पेश न होने को लेकर भी सवाल उठाया गया। वकील रुख्मिणी बोबडे ने दलील दी कि महाराष्ट्र सरकार, जिसने कारण बताओ नोटिस जारी किया है, वह अपने नोटिस का बचाव करने के लिए अदालत में मौजूद नहीं है।

वहीं, PB Agro की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता दयान कृष्णन और मोहित माथुर ने कंपनी का पक्ष रखा। कंपनी की दलील थी कि कारण बताओ नोटिस केवल तीनों अभिनेताओं को जारी किए गए हैं, कंपनी को नहीं। जबकि विज्ञापन अभियान के खिलाफ किसी भी नियामकीय कार्रवाई का सीधा असर कंपनी पर पड़ सकता है। दिल्ली हाई कोर्ट ने अब PB Agro की इस याचिका को खारिज कर दिया है।

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Century Business Media IPO को पहले दिन मिला अच्छा रिस्पॉन्स

सेंचुरी बिजनेस मीडिया (Century Business Media) को IPO के पहले ही दिन निवेशकों की अच्छी प्रतिक्रिया मिली है।

Vikas Saxena by
Published - Saturday, 12 September, 2026
Last Modified:
Saturday, 12 September, 2026
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सेंचुरी बिजनेस मीडिया (Century Business Media) को IPO के पहले ही दिन निवेशकों की अच्छी प्रतिक्रिया मिली है। 11 सितंबर 2026 को बोली के पहले दिन यह इश्यू कुल 1.14 गुना सब्सक्राइब हुआ। खास बात यह रही कि आखिरी घंटों में योग्य संस्थागत खरीदारों यानी QIB की तरफ से जोरदार मांग आई और उनका हिस्सा 3.51 गुना सब्सक्राइब हो गया। इसके साथ ही IPO पहले दिन ही पूरी तरह सब्सक्राइब हो गया।

गैर-संस्थागत निवेशकों की बड़ी HNI (bHNI) श्रेणी में 0.59 गुना सब्सक्रिप्शन मिला। वहीं छोटी HNI (sHNI) श्रेणी 0.04 गुना सब्सक्राइब हुई। खुदरा निवेशकों का हिस्सा 0.11 गुना सब्सक्राइब हुआ। कर्मचारी श्रेणी में अभी तक कोई बोली नहीं मिली और यह हिस्सा 0 गुना रहा।

दिन के दौरान IPO की मांग में तेजी देखने को मिली। सुबह 11:15 बजे तक कुल सब्सक्रिप्शन 0.08 गुना था। दोपहर 12:15 बजे यह 0.12 गुना और 01:15 बजे 0.12 गुना रहा। 02:15 बजे कुल सब्सक्रिप्शन 0.13 गुना और 04:15 बजे 0.14 गुना था। इसके बाद आखिरी अपडेट में QIB की ओर से आई मांग के चलते कुल सब्सक्रिप्शन बढ़कर 1.14 गुना हो गया।

IPO की प्रमुख जानकारी

Century Business Media IPO का प्राइस बैंड ₹70 से ₹74 प्रति शेयर रखा गया है। IPO 11 सितंबर 2026 को खुला है और इसमें बोली लगाने की आखिरी तारीख 16 सितंबर 2026 है। न्यूनतम 3,200 शेयरों के लिए बोली लगानी होगी।

क्या करती है Century Business Media?

Century Business Media साल 1999 में स्थापित एक विज्ञापन सेवा कंपनी है। कंपनी मुख्य रूप से आउट-ऑफ-होम (OOH) मीडिया के क्षेत्र में काम करती है। इसमें डिजिटल और गैर-डिजिटल दोनों तरह के विज्ञापन माध्यम शामिल हैं।

कंपनी एयरपोर्ट आउट-ऑफ-होम (AOOH), रेलवे आउट-ऑफ-होम (ROOH) और मेट्रो आउट-ऑफ-होम (MOOH) सेगमेंट में काम करती है। कंपनी के पास पांच एयरपोर्ट्स पर विज्ञापन के विशेष अधिकार हैं। इसके अलावा ईस्ट सेंट्रल रेलवे जोन के तहत 714 रेलवे स्टेशनों पर भी इसके पास विज्ञापन अधिकार हैं। कंपनी की मौजूदगी बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल और पूर्वोत्तर राज्यों में है।

कंपनी के वित्तीय आंकड़े

वित्त वर्ष 2026 में कंपनी का परिचालन से राजस्व ₹46.43 करोड़ रहा, जो वित्त वर्ष 2025 के ₹36.65 करोड़ से अधिक है। वित्त वर्ष 2024 में यह ₹32.03 करोड़ था। कंपनी का टैक्स से पहले का मुनाफा (PBT) वित्त वर्ष 2026 में ₹7.46 करोड़ रहा, जबकि वित्त वर्ष 2025 में यह ₹6.37 करोड़ और वित्त वर्ष 2024 में ₹4.89 करोड़ था।

कंपनी का कुल मुनाफा वित्त वर्ष 2026 में ₹5.56 करोड़ रहा। वित्त वर्ष 2025 में यह ₹4.71 करोड़ और वित्त वर्ष 2024 में ₹3.69 करोड़ था। वहीं कुल संपत्ति वित्त वर्ष 2026 में बढ़कर ₹31.28 करोड़ हो गई, जो वित्त वर्ष 2025 में ₹22.37 करोड़ और वित्त वर्ष 2024 में ₹21.24 करोड़ थी।

IPO से जुटाई रकम का इस्तेमाल

कंपनी IPO से मिलने वाली रकम का इस्तेमाल कई कामों में करेगी। इसमें ₹4.21 करोड़ मीडिया एसेट खरीदने के लिए पूंजीगत खर्च, जबकि ₹3.77 करोड़ पटना एयरपोर्ट पर विज्ञापन अधिकारों के लिए सिक्योरिटी डिपॉजिट के भुगतान में लगाए जाएंगे।

इसके अलावा कंपनी ₹1.45 करोड़ के कुछ कर्ज के भुगतान, ₹3.25 करोड़ कार्यशील पूंजी की जरूरतों और सामान्य कॉरपोरेट उद्देश्यों के लिए भी IPO से जुटाई गई रकम का इस्तेमाल करेगी।

निवेशकों के लिए प्रमुख जोखिम

Century Business Media के कारोबार में सरकारी रियायत और लाइसेंस समझौतों पर निर्भरता एक प्रमुख जोखिम है। इसके अलावा कंपनी का कारोबार कुछ खास भौगोलिक क्षेत्रों में केंद्रित है।

कंपनी पर विज्ञापन अधिकारों से जुड़े न्यूनतम मासिक गारंटी भुगतान की जिम्मेदारियां भी हैं। साथ ही, सिक्योरिटी डिपॉजिट की बड़ी जरूरत और कारोबार में ज्यादा कार्यशील पूंजी की आवश्यकता भी कंपनी के लिए जोखिम पैदा कर सकती है। इसके अलावा ग्राहकों से भुगतान मिलने में देरी यानी रिसीवेबल्स रिस्क भी एक प्रमुख जोखिम है।

 

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AdCounty Media का AdTech विस्तार, Adaxx Pro से मजबूत होगी प्रोग्रामेटिक व ब्रैंडिंग क्षमता

डिजिटल ऐडवर्टाइजिंग और परफॉर्मेंस मार्केटिंग कंपनी AdCounty Media India Limited ने Adaxx Adtech & Media LLP के अधिग्रहण को लेकर अपडेट जारी किया है।

Samachar4media Bureau by
Published - Wednesday, 09 September, 2026
Last Modified:
Wednesday, 09 September, 2026
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डिजिटल ऐडवर्टाइजिंग और परफॉर्मेंस मार्केटिंग कंपनी AdCounty Media India Limited ने Adaxx Adtech & Media LLP के अधिग्रहण को लेकर अपडेट जारी किया है। कंपनी ने मार्च 2026 में Adaxx Adtech & Media में 99.95% हिस्सेदारी 10 करोड़ रुपये में हासिल की थी। इस अधिग्रहण के बाद Adaxx Adtech & Media, AdCounty Media की सब्सिडियरी बन गई है।

कंपनी के मुताबिक, इस अधिग्रहण का मकसद उसकी प्रोग्रामेटिक ऐडवर्टाइजिंग और ब्रैंडिंग क्षमताओं को मजबूत करना है। AdCounty Media ने बताया कि अब Adaxx Pro उसके टेक्नोलॉजी इकोसिस्टम में प्रोग्रामेटिक ऐडवर्टाइजिंग और ब्रैंडिंग प्लेटफॉर्म के तौर पर काम करेगा।

क्या काम करेगा Adaxx Pro?

Adaxx Pro के जरिए AdCounty Media को डिजिटल विज्ञापन अभियानों में ऑडियंस टार्गेटिंग, डिजिटल मीडिया खरीद, कैंपेन ऑप्टिमाइजेशन, इन्वेंट्री मैनेजमेंट और ब्रैंड रीच जैसी क्षमताएं मजबूत करने में मदद मिलेगी।

इससे कंपनी ब्रैंड्स के लिए ज्यादा टार्गेटेड और मापने योग्य डिजिटल विज्ञापन कैंपेन चलाने में सक्षम होगी। कंपनी का कहना है कि इससे विज्ञापनदाताओं को सही ऑडियंस तक बड़े स्तर पर पहुंचने में मदद मिलेगी।

प्रोग्रामेटिक से लेकर CTV तक सेवाओं का विस्तार

AdCounty Media के मुताबिक, Adaxx Pro को अपने मौजूदा प्लेटफॉर्म में शामिल करने से उसकी डिजिटल ऐडवर्टाइजिंग सेवाओं का दायरा और बढ़ेगा। कंपनी पहले से प्रोग्रामेटिक ऐडवर्टाइजिंग, Connected TV (CTV), डिस्प्ले ऐडवर्टाइजिंग, परफॉर्मेंस मार्केटिंग, मोबाइल ऐडवर्टाइजिंग और Apple Search Ads जैसी सेवाएं देती है।

कंपनी का कहना है कि Adaxx Pro के जुड़ने से वह ब्रैंड मार्केटिंग और परफॉर्मेंस-बेस्ड कस्टमर एक्विजिशन दोनों को एक ही इंटीग्रेटेड सिस्टम के जरिए सपोर्ट कर सकेगी।

ब्रैंडिंग और परफॉर्मेंस मार्केटिंग को जोड़ने पर जोर

कंपनी के अनुसार, इस इंटीग्रेशन से विज्ञापनदाता एक ही रणनीति के तहत ब्रैंड अवेयरनेस, कंसिडरेशन और परफॉर्मेंस जैसे अलग-अलग लक्ष्यों पर काम कर सकेंगे। AdCounty Media का मानना है कि दोनों प्लेटफॉर्म की टेक्नोलॉजी और ऑपरेशनल क्षमताओं को जोड़ने से विज्ञापन अभियानों की रीच, एंगेजमेंट और मापने योग्य रिटर्न को बेहतर किया जा सकेगा।

कंपनी के बिजनेस के लिहाज से भी यह अधिग्रहण महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इससे AdCounty Media का संभावित बाजार केवल AI आधारित परफॉर्मेंस मार्केटिंग तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि डिस्प्ले ऐडवर्टाइजिंग, ब्रैंड बिल्डिंग और प्रोग्रामेटिक मीडिया तक इसका विस्तार होगा।

नए ब्रैंड्स और एजेंसियों तक पहुंच बढ़ाने की उम्मीद

AdCounty Media का कहना है कि इस विस्तार से उसे नए क्लाइंट्स और ऐसे ब्रैंड्स व एजेंसियों के साथ काम करने के मौके मिल सकते हैं, जो एक ही प्लेटफॉर्म से इंटीग्रेटेड डिजिटल ऐडवर्टाइजिंग सॉल्यूशन चाहते हैं।

अधिग्रहण पर बात करते हुए AdCounty Media India Limited के चेयरमैन और जॉइंट मैनेजिंग डायरेक्टर Aditya Jangid ने कहा कि Adaxx Adtech & Media और उसके प्रॉपराइटरी सॉल्यूशन Adaxx Pro का अधिग्रहण कंपनी की टेक्नोलॉजी आधारित ऐडवर्टाइजिंग क्षमताओं को मजबूत करने की दिशा में अहम कदम है।

उन्होंने कहा कि Adaxx Pro से कंपनी की प्रोग्रामेटिक और ब्रैंडिंग सेवाएं मजबूत होंगी और वह ब्रैंड्स व एजेंसियों को ज्यादा इंटीग्रेटेड समाधान दे सकेगी। कंपनी दोनों प्लेटफॉर्म की टेक्नोलॉजी के बीच तालमेल के जरिए एक स्केलेबल और ग्लोबल स्तर पर प्रासंगिक AdTech बिजनेस तैयार करने की संभावना देख रही है।

कुल मिलाकर, Adaxx Pro का इंटीग्रेशन AdCounty Media को प्रोग्रामेटिक, परफॉर्मेंस और ब्रैंडिंग को एक साथ जोड़ने वाले व्यापक टेक्नोलॉजी-आधारित ऐडवर्टाइजिंग इकोसिस्टम की ओर ले जाने वाला कदम है।

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विमल इलायची ऐड केस: दिल्ली HC में सुनवाई, FDA की शक्तियों और अधिकार क्षेत्र पर उठे सवाल

विमल इलायची के विज्ञापन को लेकर महाराष्ट्र खाद्य एवं औषधि प्रशासन (FDA) की ओर से शुरू की गई कार्रवाई को चुनौती देने वाली याचिका पर सोमवार को दिल्ली हाई कोर्ट में सुनवाई हुई।

Samachar4media Bureau by
Published - Tuesday, 08 September, 2026
Last Modified:
Tuesday, 08 September, 2026
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विमल इलायची के विज्ञापन को लेकर महाराष्ट्र खाद्य एवं औषधि प्रशासन (FDA) की ओर से शुरू की गई कार्रवाई को चुनौती देने वाली याचिका पर सोमवार को दिल्ली हाई कोर्ट में सुनवाई हुई।

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से सवाल उठाया गया कि खाद्य सुरक्षा से जुड़े अधिकारी किसी विज्ञापन अभियान को रोकने या उसमें शामिल सेलिब्रिटी से सोशल मीडिया पर किए गए प्रचार को हटाने के लिए तभी निर्देश दे सकते हैं, जब पहले यह तय हो कि संबंधित उत्पाद के खिलाफ प्रथम दृष्टया कानून का उल्लंघन बनता है। यह मामला W.P.(C) 12664/2026 है और इसकी सुनवाई जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने की।

विज्ञापन रोकने की शक्ति पर याचिकाकर्ता ने उठाए सवाल

याचिकाकर्ता के वकील ने Food Safety and Standards Act, 2006 (FSS Act) के तहत FSSAI और राज्य के खाद्य सुरक्षा अधिकारियों की शक्तियों के दायरे पर सवाल उठाया। दलील दी गई कि खाद्य सुरक्षा कानून मुख्य रूप से किसी खाद्य उत्पाद की सुरक्षा, उसमें इस्तेमाल सामग्री और तय मानकों से जुड़े मामलों से संबंधित है। ऐसे में विज्ञापन अभियान को रोकने या ब्रांड एंबेसडर्स को सोशल मीडिया से अपने प्रचार हटाने के लिए कहना खाद्य सुरक्षा अधिकारियों की शक्तियों के दायरे में आता है या नहीं, यह महत्वपूर्ण सवाल है।

वकील ने कहा कि किसी विज्ञापन को रोकने या सेलिब्रिटी को अपने प्रचार से पीछे हटने के लिए कहने से पहले प्रभावित पक्ष को सुनना और यह तय करना जरूरी है कि संबंधित उत्पाद वास्तव में कानून का उल्लंघन करता है या नहीं।

मामला विमल पान मसाला के कथित सरोगेट विज्ञापन से जुड़ा

महाराष्ट्र FDA की कार्रवाई का संबंध विमल इलायची के जरिए विमल पान मसाला के कथित सरोगेट विज्ञापन से है। FDA की ओर से इस अभियान से जुड़े सेलिब्रिटीज को शो-कॉज नोटिस जारी किए गए हैं। इनमें शाहरुख खान, अजय देवगन और टाइगर श्रॉफ के नाम शामिल हैं।

नियामक का आरोप है कि इलायची के नाम से चलाए जा रहे विज्ञापनों के जरिए प्रतिबंधित विमल पान मसाला का अप्रत्यक्ष प्रचार किया जा रहा है।

FSSAI और CCPA की शक्तियों में अंतर का तर्क

याचिकाकर्ता के वकील ने FSSAI की शक्तियों और Central Consumer Protection Authority (CCPA) की शक्तियों के बीच अंतर भी बताया। दलील दी गई कि भ्रामक विज्ञापनों से निपटने के लिए उपभोक्ता संरक्षण कानून के तहत CCPA को विशेष अधिकार मिले हैं, जबकि FSSAI की मुख्य जिम्मेदारी खाद्य सुरक्षा और मानकों से जुड़ी है।

वकील ने FSS Act की धारा 24, 52 और 53 का हवाला देते हुए कहा कि इन प्रावधानों में ऐसा कोई व्यापक अधिकार नहीं दिया गया है, जिसके आधार पर नियामक विज्ञापन हटाने या सेलिब्रिटी एंडोर्समेंट रोकने जैसे निर्देश जारी कर सके।

याचिकाकर्ता की ओर से यह भी कहा गया कि धारा 53 मुख्य रूप से दंड से संबंधित प्रावधान है और इसे अपने आप में विज्ञापन हटाने का निर्देश देने की शक्ति के तौर पर नहीं पढ़ा जा सकता।

केंद्र और CCPA ने दिल्ली हाई कोर्ट के अधिकार क्षेत्र पर उठाया सवाल

सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार और CCPA की ओर से सबसे पहले दिल्ली हाई कोर्ट के अधिकार क्षेत्र पर आपत्ति जताई गई। केंद्र की ओर से दलील दी गई कि इस मामले की सुनवाई के लिए दिल्ली उचित मंच नहीं है, क्योंकि विवादित शो-कॉज नोटिस महाराष्ट्र सरकार के नाम से जारी हुआ है और पूरी कार्रवाई महाराष्ट्र की खाद्य सुरक्षा व्यवस्था से जुड़ी है।

केंद्र के वकील ने कहा कि जिन लोगों को नोटिस भेजे गए हैं, उनमें शामिल ब्रांड एंबेसडर्स भी मुंबई में रहते हैं। ऐसे में केवल इसलिए दिल्ली हाई कोर्ट में मामला नहीं लाया जा सकता कि याचिकाकर्ता नई दिल्ली में स्थित है।

केंद्र ने यह भी बताया कि जिस महाराष्ट्र सरकार ने विवादित शो-कॉज नोटिस जारी किया है, वह इस मामले में पक्षकार नहीं है। केंद्र की ओर से कहा गया कि ऐसे में नोटिस जारी करने वाली महाराष्ट्र सरकार के पास अदालत के सामने अपनी कार्रवाई का बचाव करने का अवसर ही नहीं है।

FSS Act की धारा 30 का दिया हवाला

केंद्र की ओर से FSS Act की धारा 30 का भी हवाला दिया गया। इस धारा के तहत राज्य सरकार को अपने राज्य में Commissioner of Food Safety नियुक्त करना होता है, ताकि खाद्य सुरक्षा और मानकों से जुड़े कानूनों को प्रभावी तरीके से लागू किया जा सके।

केंद्र की दलील थी कि खाद्य सुरक्षा से जुड़े सभी अधिकार केवल केंद्र सरकार या FSSAI के पास नहीं हैं। कानून में राज्य सरकारों और राज्य स्तर के खाद्य सुरक्षा अधिकारियों की भी अलग जिम्मेदारियां तय की गई हैं। इसलिए महाराष्ट्र FDA की कार्रवाई को केवल FSSAI की शक्तियों के नजरिए से नहीं देखा जा सकता।

अब अधिकार क्षेत्र पर हाई कोर्ट के फैसले का इंतजार

सोमवार की सुनवाई के बाद फिलहाल इस मामले में क्षेत्रीय अधिकार क्षेत्र (Territorial Jurisdiction) सबसे अहम मुद्दा बन गया है। एक तरफ याचिकाकर्ता यह सवाल उठा रहा है कि FSS Act के तहत खाद्य सुरक्षा अधिकारियों के पास विज्ञापन और सेलिब्रिटी एंडोर्समेंट के खिलाफ इस तरह की कार्रवाई करने की कितनी शक्ति है। दूसरी तरफ केंद्र सरकार और CCPA का कहना है कि इस मामले को दिल्ली हाई कोर्ट में ही नहीं सुना जाना चाहिए। जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने क्षेत्रीय अधिकार क्षेत्र के मुद्दे पर फैसला सुरक्षित रख लिया है।

हाई कोर्ट के इस फैसले से यह तय होगा कि दिल्ली हाई कोर्ट आगे विमल इलायची विज्ञापन मामले से जुड़े बड़े कानूनी सवालों पर सुनवाई करेगा या नहीं। इनमें FSS Act के तहत खाद्य सुरक्षा अधिकारियों की विज्ञापनों और सेलिब्रिटी प्रचार को लेकर शक्तियों का दायरा भी शामिल है।

 

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Bright Outdoor Media में डायरेक्टर्स की सैलरी बढ़ाने की तैयारी, शेयरधारक लेंगे फैसला

आउटडोर विज्ञापन के क्षेत्र में काम करने वाली और भारत की पहली सूचीबद्ध OOH (Out-of-Home) कंपनी Bright Outdoor Media Limited की बोर्ड मीटिंग में कई अहम फैसले लिए गए हैं।

Vikas Saxena by
Published - Thursday, 03 September, 2026
Last Modified:
Thursday, 03 September, 2026
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आउटडोर विज्ञापन के क्षेत्र में काम करने वाली और भारत की पहली सूचीबद्ध OOH (Out-of-Home) कंपनी Bright Outdoor Media Limited की बोर्ड मीटिंग में कई अहम फैसले लिए गए हैं। कंपनी के बोर्ड ने डायरेक्टर्स की पारिश्रमिक यानी सैलरी बढ़ाने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। हालांकि, यह बढ़ोतरी कंपनी के सदस्यों की मंजूरी और कंपनी कानून के तहत जरूरी नियमों के पालन के अधीन होगी।

कंपनी ने स्टॉक एक्सचेंज को दी जानकारी में बताया कि बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स की बैठक 2 सितंबर 2026 को हुई। यह बैठक शाम 4 बजे शुरू हुई और 4:30 बजे खत्म हो गई।

डायरेक्टर्स की बढ़ सकती है सैलरी

बोर्ड ने डायरेक्टर्स के पारिश्रमिक को बढ़ाने के प्रस्ताव को मंजूरी दी है। यह बढ़ोतरी कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 197 के तहत तय कुल मैनेजेरियल रिम्यूनरेशन की सीमा से ज्यादा हो सकती है।

हालांकि, इस प्रस्ताव को लागू करने से पहले कंपनी की आने वाली वार्षिक आम बैठक (AGM) में शेयरधारकों की मंजूरी लेनी होगी। इसके साथ ही कंपनी को कंपनी अधिनियम, 2013 और उसके तहत बनाए गए नियमों, जिसमें Schedule V भी शामिल है, के सभी लागू प्रावधानों का पालन करना होगा।

28 सितंबर को होगी AGM

कंपनी ने अपनी 21वीं वार्षिक आम बैठक (AGM) की तारीख भी तय कर दी है। AGM सोमवार, 28 सितंबर 2026 को दोपहर 12 बजे आयोजित की जाएगी। यह बैठक Hotel Peninsula Grand, Sakinaka Junction, Lokmanya Tilak Nagar, Saki Naka, Andheri (East), Mumbai में होगी।

बोर्ड ने AGM के लिए कंपनी के वित्त वर्ष 2025-26 के डायरेक्टर्स’ रिपोर्ट को भी मंजूरी दे दी है।

वोटिंग प्रक्रिया के लिए स्क्रूटिनाइजर नियुक्त

AGM में होने वाली वोटिंग प्रक्रिया को पूरा कराने के लिए बोर्ड ने M/s Nikunj Kanabar & Associates, Practicing Company Secretaries को स्क्रूटिनाइजर नियुक्त किया है। इसके अलावा, AGM में रखे जाने वाले प्रस्तावों पर वोट देने के योग्य शेयरधारकों की पहचान के लिए कंपनी ने कट-ऑफ डेट तय करने को भी मंजूरी दी है।

कुल मिलाकर, बोर्ड मीटिंग में कंपनी की AGM से जुड़े जरूरी प्रस्तावों को मंजूरी दी गई है। अब डायरेक्टर्स के बढ़े हुए पारिश्रमिक समेत प्रस्तावित मुद्दों पर शेयरधारकों की मंजूरी 28 सितंबर की AGM में ली जाएगी।

 

 

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Himalaya की पैकेजिंग की नकल पड़ी भारी, HC ने Healing Pharma के प्रोडक्ट्स पर लगाई रोक

दिल्ली हाई कोर्ट ने Himalaya Global Holdings Ltd. को बड़ी राहत देते हुए Healing Pharma India Private Limited के कुछ प्रोडक्ट्स की बिक्री, निर्माण, डिस्ट्रीब्यूशन और विज्ञापन पर रोक लगा दी है।

Samachar4media Bureau by
Published - Wednesday, 26 August, 2026
Last Modified:
Wednesday, 26 August, 2026
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दिल्ली हाई कोर्ट ने Himalaya Global Holdings Ltd. को बड़ी राहत देते हुए Healing Pharma India Private Limited के कुछ प्रोडक्ट्स की बिक्री, निर्माण, डिस्ट्रीब्यूशन और विज्ञापन पर रोक लगा दी है।English Headline:  कोर्ट ने माना कि Healing Pharma के कुछ प्रोडक्ट्स की पैकेजिंग, नाम और रंगों का इस्तेमाल Himalaya के प्रोडक्ट्स से इतना मिलता-जुलता है कि आम ग्राहक दोनों को लेकर भ्रमित हो सकता है।

जस्टिस A. J. Bhambhani ने 18 अगस्त को इस मामले में अंतरिम आदेश जारी किया। यह मामला ट्रेडमार्क, कॉपीराइट और प्रोडक्ट की पहचान से जुड़े विवाद से संबंधित है।

किन प्रोडक्ट्स को लेकर है विवाद?

Himalaya ने आरोप लगाया था कि Healing Pharma के कुछ प्रोडक्ट्स के नाम और उनकी पैकेजिंग उसकी मशहूर दवाओं से मिलती-जुलती है। विवादित प्रोडक्ट्स में Liverheal, Liverheal 52, Liverheal DS, Senstone, Braintat, Spermax, Pilefine और Confidance X शामिल हैं।

 Himalaya का कहना था कि इन प्रोडक्ट्स की पैकेजिंग और नाम उसके Liv.52, Cystone, Mentat, Speman, Pilex और Confido प्रोडक्ट्स से मिलते हैं।

Himalaya ने क्या आरोप लगाया?

Himalaya ने कोर्ट को बताया कि उसके प्रोडक्ट्स की खास पैकेजिंग, रंगों का कॉम्बिनेशन, डिजाइन और विजुअल लेआउट लंबे समय से इस्तेमाल किए जा रहे हैं और ग्राहकों के बीच उनकी एक अलग पहचान बन चुकी है।

कंपनी का आरोप था कि Healing Pharma ने अपने प्रोडक्ट्स के लिए इन्हीं तरह के नाम, रंग और पैकेजिंग डिजाइन का इस्तेमाल किया। Himalaya ने इसे ट्रेडमार्क और कॉपीराइट का उल्लंघन बताते हुए Passing Off का भी आरोप लगाया।

Passing Off का मतलब ऐसी स्थिति से है, जहां किसी कंपनी का प्रोडक्ट या उसकी पैकेजिंग इस तरह पेश की जाए कि ग्राहक उसे किसी दूसरी स्थापित कंपनी के प्रोडक्ट से जोड़कर देख सकता है।

आम ग्राहक हो सकता है भ्रमित: कोर्ट

दिल्ली हाई कोर्ट ने शुरुआती तौर पर माना कि दोनों कंपनियों के प्रोडक्ट्स के नाम, पैकेजिंग और रंगों में काफी समानता है।

कोर्ट के मुताबिक, सामान्य समझ रखने वाला और सही-सही याद न रखने वाला ग्राहक दोनों प्रोडक्ट्स को लेकर भ्रमित हो सकता है।

कोर्ट ने कहा कि इस स्तर पर Himalaya ने अपने पक्ष में Prima Facie Case यानी पहली नजर में मजबूत मामला बनाया है। कोर्ट ने यह भी माना कि सुविधा का संतुलन Himalaya के पक्ष में है और अंतरिम राहत नहीं मिलने पर कंपनी को ऐसी क्षति हो सकती है जिसकी भरपाई बाद में आसानी से नहीं की जा सकेगी।

इसी आधार पर कोर्ट ने Healing Pharma को विवादित ट्रेड ड्रेस वाले इन प्रोडक्ट्स के निर्माण, बिक्री, डिस्ट्रीब्यूशन और विज्ञापन से रोक दिया है।

Healing Pharma ने दी समझौते की पेशकश

सुनवाई के दौरान Healing Pharma ने कोर्ट को बताया कि उसने Liverheal 52 की बिक्री 10 नवंबर 2025 से बंद कर दी थी और अब यह प्रोडक्ट सिर्फ Liverheal नाम से बेचा जा रहा है। कंपनी ने इस विवाद को बातचीत के जरिए सुलझाने के लिए मध्यस्थता (Mediation) की इच्छा भी जताई। Himalaya ने भी इस प्रस्ताव पर सहमति जताई।

इसके बाद दिल्ली हाई कोर्ट ने दोनों पक्षों को Delhi High Court Mediation and Conciliation Centre भेज दिया है।

तीन हफ्ते में पूरी करनी होगी मध्यस्थता

दोनों पक्षों को 24 अगस्त 2026 को मध्यस्थता केंद्र के सामने पेश होने का निर्देश दिया गया है। कोर्ट ने कहा है कि मध्यस्थता की प्रक्रिया तीन सप्ताह के भीतर पूरी की जाए। फिलहाल मामले की अगली सुनवाई 30 सितंबर 2026 को होगी। आगे की कार्रवाई मध्यस्थता के नतीजे पर भी निर्भर करेगी।

इस मामले में अंतिम फैसला अभी नहीं आया है। फिलहाल हाई कोर्ट का अंतरिम आदेश Himalaya के प्रोडक्ट्स की पैकेजिंग और ब्रांड पहचान की सुरक्षा के लिहाज से अहम माना जा रहा है। 

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