गोवा फेस्ट पर उठे सवालों के बीच शुभ्रांशु सिंह बोले, इसे बेहतर बनाना सबकी जिम्मेदारी

अपने एक लेख में सीनियर मार्केटिंग विशेषज्ञ शुभ्रांशु सिंह ने कहा, गोवा फेस्ट केवल एक फेस्टिवल नहीं, बल्कि भारतीय विज्ञापन और मीडिया इंडस्ट्री की सामूहिक पहचान और विरासत है।

Last Modified:
Monday, 11 May, 2026
Shubhranshu Singh


शुभ्रांशु सिंह, सीनियर मार्केटिंग विशेषज्ञ।।

देश की ऐडवर्टाइजिंग और क्रिएटिव इंडस्ट्री में ‘गोवा फेस्ट 2026’ को लेकर जारी बहस के बीच सीनियर मार्केटिंग विशेषज्ञ शुभ्रांशु सिंह ने इस प्रतिष्ठित आयोजन का समर्थन करते हुए कहा है कि किसी भी संस्था को उसकी कमियों की वजह से खत्म करने की बजाय उसे बेहतर बनाने की कोशिश होनी चाहिए।

एक विस्तृत लेख में शुभ्रांशु सिंह ने गोवा फेस्ट पर उठ रही आलोचनाओं का जवाब देते हुए कहा कि भारत में इंडस्ट्री द्वारा बनाई और लगातार चलाए जाने वाली संस्थाएं बहुत कम हैं। ऐसे में गोवा फेस्ट केवल एक फेस्टिवल नहीं, बल्कि भारतीय विज्ञापन और मीडिया इंडस्ट्री की सामूहिक पहचान और विरासत है।

उन्होंने लिखा कि गोवा फेस्ट की शुरुआत किसी सरकारी आदेश, कानून या किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी की पहल से नहीं हुई थी। इसे ‘एडवरटाइजिंग एजेंसीज एसोसिएशन ऑफ इंडिया’ और ‘द एडवरटाइजिंग क्लब’ ने मिलकर बनाया और पिछले 19 वर्षों से लगातार आगे बढ़ाया है।

शुभ्रांशु सिंह के मुताबिक, ‘किसी भी संस्था को खड़ा करना आसान नहीं होता। संस्थाएं अपने आप नहीं बनतीं, बल्कि लगातार प्रयास, भागीदारी और समय के साथ मजबूत होती हैं। उन्होंने कहा कि आज लोग गोवा फेस्ट की मौजूदगी को सामान्य मानने लगे हैं, लेकिन यही किसी सफल संस्था की सबसे बड़ी पहचान होती है।’

उन्होंने दुनिया की कई बड़ी संस्थाओं और आयोजनों का उदाहरण देते हुए कहा कि ‘कान्स लायंस’, ‘ऑस्कर’, ‘ओलंपिक’ और ‘दावोस’ जैसे मंच भी विवादों, पक्षपात और आलोचनाओं से गुजरे हैं। बावजूद इसके, लोगों ने इन संस्थाओं को खत्म करने की जगह सुधारने की कोशिश की।

शुभ्रांशु सिंह ने माना कि गोवा फेस्ट को लेकर उठ रहे कई सवाल पूरी तरह जायज हैं। उन्होंने नेटवर्क एजेंसियों के वर्चस्व, जूरी में सीमित प्रतिनिधित्व, ब्रैंड साइड क्लाइंट्स की कम भागीदारी, बढ़ती लागत और सीखने की बजाय एंटरटेनमेंट पर अधिक फोकस जैसे मुद्दों को वास्तविक चिंताएं बताया।

हालांकि उन्होंने सवाल उठाया कि यदि गोवा फेस्ट नहीं होगा, तो भारतीय विज्ञापन और मीडिया इंडस्ट्री के पास ऐसा कौन-सा साझा मंच है, जहां बड़े स्तर पर लोग एकत्र हों, नए विचारों पर चर्चा करें, बेहतरीन काम को पहचान मिले और इंडस्ट्री के लिए साझा मानक तय किए जा सकें।

उन्होंने कहा कि फिलहाल इसका कोई विकल्प मौजूद नहीं है। गोवा फेस्ट भले ही परफेक्ट न हो, लेकिन यह वही मंच है जिसे इंडस्ट्री ने खुद बनाया और वर्षों तक जिंदा रखा।

अपने लेख में शुभ्रांशु सिंह ने भारत में ‘इंस्टीट्यूशन बिल्डिंग’ यानी संस्थाएं खड़ी करने की कमजोर संस्कृति पर भी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि भारत में लोग संस्थाओं की आलोचना तो खूब करते हैं, लेकिन उन्हें मजबूत बनाने के लिए उतनी प्रतिबद्धता नहीं दिखाते।

उन्होंने लिखा कि अक्सर एक पीढ़ी बेहद मेहनत से कोई संस्था खड़ी करती है, जबकि अगली पीढ़ी उसकी कमियां गिनाने लगती है। यही स्थिति अब गोवा फेस्ट के साथ भी दिखाई दे रही है।

शुभ्रांशु सिंह ने ‘मोमेंटम’ यानी निरंतरता की अहमियत समझाते हुए कहा कि 19 वर्षों में गोवा फेस्ट ने इंडस्ट्री के भीतर रिश्ते, संवाद, पहचान और साझा संस्कृति तैयार की है। यदि ऐसी संस्थाएं कमजोर पड़ती हैं, तो उनकी जगह तुरंत कोई बेहतर विकल्प तैयार नहीं हो जाता। इसके बजाय इंडस्ट्री छोटे-छोटे बिखरे मंचों में टूट जाती है और सामूहिक पहचान कमजोर होने लगती है।

उन्होंने सुझाव दिया कि गोवा फेस्ट को बेहतर बनाने के लिए जूरी सिस्टम में सुधार, स्वतंत्र एजेंसियों के लिए अलग श्रेणी, क्लाइंट्स की ज्यादा भागीदारी और युवा प्रोफेशनल्स व क्षेत्रीय एजेंसियों के लिए कम लागत वाले विकल्प जैसे कदम उठाए जाने चाहिए।

लेख के अंत में शुभ्रांशु सिंह ने इंडस्ट्री से अपील करते हुए कहा कि केवल आलोचना करने की बजाय लोगों को आगे आकर बदलाव की प्रक्रिया में शामिल होना चाहिए। उनके मुताबिक, किसी भी संस्था को मजबूत बनाने का रास्ता उसे छोड़ देना नहीं, बल्कि उसके भीतर रहकर सुधार करना होता है।

उन्होंने कहा, ‘गोवा फेस्ट परफेक्ट नहीं है, लेकिन यह हमारा अपना मंच है। इसकी आलोचना हो सकती है, लेकिन इससे दूरी बनाने की नहीं, इसे बेहतर बनाने की जरूरत है।’

(यह लेखक के निजी विचार हैं।)

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मोदी-शाह के नेतृत्व में सेकुलर संक्रमण से मुक्त हुई भारतीय राजनीति: प्रो.संजय द्विवेदी

एक धर्मप्राण देश में धार्मिक प्रतीकों, भगवा रंग, सन्यासियों के प्रति जैसी विरक्ति मुख्यधारा की राजनीति में दिखती थी, वह अन्यत्र दुर्लभ है। भाजपा जैसे दल भी इस सेकुलर विकार से कम ग्रस्त न थे।

Last Modified:
Saturday, 27 June, 2026
sanjaydwivedi

प्रो.संजय द्विवेदी, राजनीतिक विश्वेषक और वरिष्ठ पत्रकार।

उत्तर प्रदेश एक ऐसे मुख्यमंत्री से रूबरू है, जिसे राजनीति के मैदान में बहुत गंभीरता से नहीं लिया जा रहा था। उनके बारे में यह ख्यात था कि वे एक खास वर्ग की राजनीति करते हैं और भारतीय जनता पार्टी भी उनकी राजनीतिक शैली से पूरी तरह सहमत नहीं है। लेकिन उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ ने जिस तरह अपनी पकड़ बनाई है और देश में एक अलग माडल खड़ा दिया है, वह सर्वत्र चर्चा का विषय है।

इससे यह भी साबित हो रहा है कि ‘अपनी राजनीति’ के प्रति भाजपा का आत्मदैन्य कम हो रहा है। वहीं असम में हेमंत विश्वशर्मा उम्मीदों का चेहरा बनकर उभरे हैं, असम में तीसरी बार सरकार बनाकर भाजपा ने पूर्वोत्तर में इतिहास रच दिया है। इसी तरह गृहमंत्री अमित शाह की रणनीति से पश्चिम बंगाल की विजय ऐतिहासिक कही जा रही है और वहां बने मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के ताबड़तोड़ फैसलों ने जनविश्वास की हिलोरें पैदा की हैं। जड़ता को तोड़कर एक नई उम्मीद बनी है। केंद्रीय राजनीति में नरेंद्र मोदी और अमित शाह के आगमन ने भारतीय राजनीति के परिदृश्य को बदलकर रख दिया है।

वैचारिक हीनग्रंथि से बाहर आई भाजपा-

भाजपा का आज तक का ट्रैक हिंदुत्व का वैचारिक और राजनीतिक इस्तेमाल कर सत्ता में आने का रहा है। देश की राजनीति में चल रहे विमर्श में भाजपा बड़ी चतुराई से इस कार्ड का इस्तेमाल तो करती थी, किंतु उसके नेतृत्व में इसे लेकर एक हिचक बनी रहती थी। वो हिचक अटल जी से लेकर आडवानी तक हर दौर में दिखी है। भाजपा का हर नेता सत्ता पाने के बाद यह साबित करने में लगा रहता है वह अन्य दलों के नेताओं के कम ‘सेकुलर’ नहीं है। उत्तर प्रदेश की ‘आदित्यनाथ परिघटना’ दरअसल भाजपा की वैचारिक हीनग्रंथि से मुक्ति को स्थापित करती नजर आती है।

नरेंद्र मोदी के राज्यारोहण के बाद योगी आदित्यनाथ का उदय भारतीय राजनीति में एक अलग किस्म की राजनीति की स्वीकृति का प्रतीक है। एक धर्मप्राण देश में धार्मिक प्रतीकों, भगवा रंग, सन्यासियों के प्रति जैसी विरक्ति मुख्यधारा की राजनीति में दिखती थी, वह अन्यत्र दुर्लभ है। भाजपा जैसे दल भी इस सेकुलर विकार से कम ग्रस्त न थे। धर्म और धर्माचार्यों का इस्तेमाल, धार्मिक आस्था का दोहन और सत्ता पाते ही सभी धार्मिक प्रतीकों से मुक्ति लेकर सारी राजनीति सिर्फ तुष्टीकरण में लग जाती थी। प्रधानमंत्रियों समेत जाने कितने सत्ताधीशों के ताज जामा मस्जिद में झुके होगें, लेकिन हिंदुत्व के प्रति उनकी हिचक निरंतर थी।

यह भी कम आश्चर्यजनक नहीं की एक समय में दीनदयाल जी उदार थे, तो अटलजी और बलराज मधोक अपनी वक्रता के चलते उग्र नेता माने जाते थे। अटलजी का दौर आया तो लालकृष्ण आडवाणी उग्र कहे जाने लगे, फिर एक समय ऐसा भी आया जब आडवानी उदार हो गए और नरेंद्र मोदी उग्र मान जाने लगे। आज की व्याख्याएं सुनें- नरेंद्र मोदी उदार हो गए हैं और योगी आदित्यनाथ और गृहमंत्री अमित शाह उग्र माने जाने लगे हैं। अब तो असम के मुख्यमंत्री हेमंत विश्वशर्मा और पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी भी आदित्यनाथ की परंपरा के मुख्यमंत्री कहे जाने लगे हैं।

सेकुलर संक्रमण से मुक्ति से मिली नई पहचान-

यह मीडिया, बौद्धिकों की अपनी रोज बनाई जाती व्याख्याएं हैं। लेकिन सच यह है कि अटल, मधोक, आडवानी, मोदी, अमित शाह या आदित्यनाथ, हेमंत विश्वशर्मा और शुभेंदु अधिकारी कोई अलग-अलग लोग नहीं है। एक विचार के प्रति समर्पित राष्ट्रनायकों की सूची है यह। इसमें कोई कम जा ज्यादा उदार या कठोर नहीं है। किंतु भारतीय राजनीति का विमर्श ऐसा है जिसमें वास्तविकता से अधिक ड्रामे पर भरोसा है।

भारतीय राजनेता की मजबूरी है कि वह टोपी पहने, रोजा भले न रखे किंतु इफ्तार की दावतें दे। आप ध्यान दें सरकारी स्तर पर यह प्रहसन लंबे समय से जारी रहा है। भाजपा भी इसी राजनीतिक क्षेत्र में काम करती है। उसमें भी इस तरह के रोग हैं। वह भी राष्ट्रनीति के साथ थोड़े तुष्टिकरण को गलत नहीं मानती। जबकि उसका अपना नारा रहा है सबको न्याय, तुष्टिकरण किसी का नहीं। उसका एक नारा यह भी रहा है-“राम, रोटी और इंसाफ। ”

लंबे समय के बाद भाजपा में अपनी वैचारिक लाइन को लेकर गर्व का बोध दिख रहा है। असरे बाद वे भारतीय राजनीति के सेकुलर संक्रमण से मुक्त होकर अपनी वैचारिक भूमि पर गरिमा के साथ खड़े दिख रहे हैं। समझौतों और आत्मसमर्पण की मुद्राओं के बजाए उनमें अपनी वैचारिक भूमि के प्रति हीनताग्रंथि के भाव कम हुए हैं। अब वे अन्य दलों की नकल के बजाए एक वैचारिक लाइन लेते हुए दिख रहे हैं।

दिखावटी सेकुलरिज्म के बजाए वास्तविक राष्ट्रीयता के उनमें दर्शन हो रहे हैं। मोदी जब एक सौ चालीस करोड़ हिंदुस्तानियों की बात करते हैं तो बात अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक से ऊपर चली जाती है। यहां देश सम्मानित होता है, एक नई राजनीति का प्रारंभ दिखता है। एक भगवाधारी सन्यासी जब मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठता है तो वह एक नया संदेश देता है। वह संदेश त्याग का है, परिवारवाद के विरोध का है, तुष्टिकरण के विरोध का है, सबको न्याय का है।

भारतीयता का विमर्श अब केंद्रीय विमर्श-

आजादी के बाद के सत्तर सालों में देश की राजनीति का विमर्श भारतीयता और उसकी जड़ों की तरफ लौटने के बजाए घोर पश्चिमी और वामपंथी रह गया था। जबकि बेहतर होता कि आजादी के बाद हम अपनी ज्ञान परंपरा की और लौटते और अपनी जड़ों को मजबूत बनाते। किंतु सत्ता,शिक्षा, समाज और राजनीति में हमने पश्चिमी तो, कहीं वामपंथी विचारों के आधार पर चीजें खड़ी कीं। इसके कारण हमारा अपने समाज से ही रिश्ता कटता चला गया।

सत्ता और जनता की दूरी और बढ़ गयी। सत्ता दाता बन बैठी और जनता याचक। सेवक मालिक बन गए। ऐसे में लोकतंत्र एक छद्म लोकतंत्र बन गया। यह लोकतंत्र की विफलता ही है कि हम सत्तर साल के बाद सड़कें बना रहे हैं। यह लोकतंत्र की विफलता ही है कि हमारे अपने नौजवानों ने भारतीय राज्य के खिलाफ बंदूकें उठा रखी थीं। गृहमंत्री अमित शाह के दृढ़संकल्प की बदौलत आज माओवादी आतंक का अंत भी हमने देखा।

पिछले सत्तर सालों में लोकतंत्र की विफलता की ये कहानियां सर्वत्र बिखरी पड़ी हैं। राजनीतिक तंत्र के प्रति उठा भरोसा भी साधारण नहीं था। आज ऐसा लगता है कि राजनीति से कुछ हो सकता है। मोदी,शाह, आदित्यनाथ भरोसे के प्रतीक बन गए। इसका मतलब यह भी है कि ये कुछ कह रहे हैं तो करेंगें भी।

नरेंद्र मोदी, अमित शाह, आदित्यनाथ देश की इन्हीं उम्मीदों के चेहरे हैं। तीनों अंग्रेजी नहीं बोलते। तीनों जन-मन-गण के प्रतिनिधि हैं। यह भारतीय राजनीति का बदलता हुआ चेहरा है। क्या सच में भारत खुद को पहचान रहा है ? वह जातियों, पंथों, क्षेत्रों की पहचान से अलग एक बड़ी पहचान से जुड़ रहा है- वह पहचान है भारतीय होना, राष्ट्रीय होना।

एक समय में राजनीति हमें नाउम्मीद करती हुयी नजर आती थी। बदले समय में वह उम्मीद जगा रही है। कुछ चेहरे ऐसे हैं जो भरोसा जगाते हैं। एक आकांक्षावान भारत बनता हुआ दिखता है। यह आकांक्षाएं राजनीति दलों के एजेंडे से जुड़ पाएं तो देश जल्दी और बेहतर बनेगा। राजनीतिक विमर्श और जनविमर्श को साथ लाने की कवायद हमें करनी ही होगी। जल्दी बहुत जल्दी। यह जितना और जितना जल्दी होगा भारत अपने भाग्य पर इठलाता दिखेगा।

( यह लेखक के निजी विचार हैं )

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Cannes Lions में भारत के प्रदर्शन पर घबराने की नहीं, आत्ममंथन की जरूरत: प्रभाकर मुंदकर

वरिष्ठ विज्ञापन विशेषज्ञ प्रभाकर मुंदकर का मानना है कि भारतीय विज्ञापन इंडस्ट्री के पास रचनात्मक प्रतिभा की कोई कमी नहीं है।

Last Modified:
Friday, 26 June, 2026
Prabhakar Mundkur....

प्रभाकर मुंदकुर, वरिष्ठ विज्ञापन विशेषज्ञ ।।

हर साल जून में दुनिया भर की विज्ञापन इंडस्ट्री की नजरें प्रतिष्ठित कान्स लायंस (Cannes Lions) पुरस्कारों पर टिकी रहती हैं। इन पुरस्कारों को विज्ञापन जगत में रचनात्मक उत्कृष्टता का सबसे बड़ा सम्मान माना जाता है। ऐसे में जब किसी देश का प्रदर्शन उम्मीद के मुताबिक नहीं रहता, तो पूरी इंडस्ट्री में इसकी वजहों को लेकर चर्चा शुरू हो जाती है।

इसी क्रम में विज्ञापन विशेषज्ञ प्रभाकर मुंदकर ने अपने गेस्ट कॉलम में भारत के कान्स लायंस 2026 प्रदर्शन का विश्लेषण करते हुए कहा है कि इसे संकट के रूप में देखने के बजाय आत्ममंथन का अवसर माना जाना चाहिए। मुंदकर के अनुसार, इस वर्ष भारत के अपेक्षाकृत कमजोर प्रदर्शन को लेकर दो तरह की बातें सामने आई हैं।

एक पक्ष का मानना है कि भारत की ओर से कम प्रविष्टियां भेजी गईं, जबकि दूसरा पक्ष इसे वैश्विक स्तर की प्रतिस्पर्धा के अनुरूप पर्याप्त मजबूत काम न होने से जोड़ता है। हालांकि उनका कहना है कि वास्तविकता इन दोनों के बीच कहीं है। उन्होंने लिखा कि असली सवाल यह नहीं है कि भारत ने कम 'लायंस' जीते, बल्कि यह है कि क्या वैश्विक स्तर पर उत्कृष्ट रचनात्मकता की परिभाषा भारत की तुलना में अधिक तेजी से बदल गई है।

मुंदकर के मुताबिक, पहले विज्ञापन पुरस्कारों में मौलिकता, प्रस्तुति और कहानी कहने की कला को प्रमुखता मिलती थी, लेकिन अब बेहतरीन काम वही माना जा रहा है, जिसमें रचनात्मकता के साथ टेक्नोलॉजी, इनोवेशन, सांस्कृतिक प्रासंगिकता और स्पष्ट व्यावसायिक परिणाम भी दिखाई दें।

उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) को भारत के प्रदर्शन के लिए जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं होगा। उनके अनुसार, AI केवल एक टूल है। पुरस्कार जीतने वाले विचार मशीन नहीं, बल्कि इंसान तैयार करते हैं। सफल अभियान इसलिए नहीं जीतते कि उनमें AI का इस्तेमाल हुआ है, बल्कि इसलिए कि वे वास्तविक समस्याओं का नए तरीके से समाधान प्रस्तुत करते हैं।

मुंदकर ने कहा कि अब वैश्विक प्रतिस्पर्धा पहले की तुलना में कहीं अधिक कठिन हो चुकी है। लैटिन अमेरिकी देशों का लगातार मजबूत प्रदर्शन, एशियाई बाजारों का बढ़ता आत्मविश्वास और यूरोपीय एजेंसियों का तकनीक के साथ उत्कृष्ट क्राफ्ट का संतुलन यह दिखाता है कि प्रतिस्पर्धा का स्तर काफी ऊपर जा चुका है।

उन्होंने यह भी कहा कि केवल कम प्रविष्टियां भारत के प्रदर्शन की वजह नहीं हो सकतीं। अतीत में कई देशों ने सीमित प्रविष्टियों के बावजूद उल्लेखनीय सफलता हासिल की है। पुरस्कारों का निर्णय अंततः गुणवत्ता और सफलता दर पर निर्भर करता है, केवल संख्या पर नहीं।

हालांकि उन्होंने माना कि अब एजेंसियां पुरस्कारों के लिए प्रविष्टियां भेजने के मामले में अधिक चयनात्मक हो रही हैं। ग्राहक भी पुरस्कारों पर होने वाले खर्च और उसके प्रतिफल को लेकर पहले से अधिक सवाल पूछ रहे हैं। ऐसे में बड़ी संख्या में प्रविष्टियां भेजने का दौर धीरे-धीरे समाप्त हो सकता है।

मुंदकर का मानना है कि भारतीय विज्ञापन इंडस्ट्री के पास रचनात्मक प्रतिभा की कोई कमी नहीं है। भारत पहले भी ऐसे अभियान तैयार कर चुका है, जिन्होंने वैश्विक स्तर पर अपनी पहचान बनाई और यह साबित किया कि भारतीय विचार दुनिया के सर्वश्रेष्ठ कामों से मुकाबला कर सकते हैं।

उन्होंने कहा कि इस वर्ष के नतीजों से घबराने की नहीं, बल्कि आत्ममंथन करने की जरूरत है। इंडस्ट्री को यह सोचना होगा कि क्या वह पुरस्कार जीतने वाले अभियानों पर अधिक ध्यान दे रहा है या फिर ऐसे कामों पर, जो व्यवसाय और समाज की वास्तविक समस्याओं का समाधान प्रस्तुत करें। साथ ही यह भी देखना होगा कि रणनीतिक सोच, डेटा, तकनीक, नवाचार तथा इंजीनियरिंग, व्यवहार विज्ञान और प्रोडक्ट डिजाइन जैसी बहु-विषयक विशेषज्ञता में पर्याप्त निवेश हो रहा है या नहीं।

अपने लेख के अंत में मुंदकर ने कहा कि जो रचनात्मक काम वास्तव में बिजनेस बदलते हैं, संस्कृति को प्रभावित करते हैं और मापने योग्य परिणाम देते हैं, वही अंततः पुरस्कार भी जीतते हैं। उनके अनुसार, महान रचनात्मकता का उद्देश्य ट्रॉफियां हासिल करना नहीं होता, बल्कि उत्कृष्ट काम करना होता है और पुरस्कार स्वयं उसके पीछे आते हैं।

उन्होंने निष्कर्ष में कहा कि यदि भारतीय विज्ञापन इंडस्ट्री बदलते वैश्विक मानकों के अनुरूप खुद को विकसित करती है, तो कान्स लायंस 2026 का यह प्रदर्शन भविष्य में किसी असफलता के रूप में नहीं, बल्कि भारतीय रचनात्मकता के अगले दौर की शुरुआत के रूप में याद किया जाएगा।

(यह लेखक के निजी विचार हैं।)

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NDTV से प्रियदर्शन के रिटायरमेंट पर भावुक हुए रवीश रंजन शुक्ला, साझा कीं यादें

करीब 25 वर्षों तक एनडीटीवी इंडिया से जुड़े रहे प्रियदर्शन को याद करते हुए रवीश रंजन शुक्ला ने उनके साथ बिताए अनुभवों, मार्गदर्शन और कार्यशैली का जिक्र किया है।

Last Modified:
Wednesday, 24 June, 2026
Priyadarshan Ji Retirement

वरिष्ठ पत्रकार और ‘एनडीटीवी इंडिया’ (NDTV India) में एसोसिएट एडिटर रवीश रंजन शुक्ला ने वरिष्ठ पत्रकार प्रियदर्शन के संस्थान से सेवानिवृत्त होने पर एक भावुक फेसबुक पोस्ट साझा की है। करीब 25 वर्षों तक एनडीटीवी इंडिया से जुड़े रहे प्रियदर्शन को याद करते हुए रवीश रंजन शुक्ला ने उनके साथ बिताए अनुभवों, मार्गदर्शन और कार्यशैली का जिक्र किया है। उन्होंने लिखा कि प्रियदर्शन न सिर्फ बेहतरीन पत्रकार और साहित्यकार रहे, बल्कि अपनी सादगी, शालीनता और तथ्यपरक पत्रकारिता के लिए भी हमेशा सम्मानित रहे। अपनी पोस्ट में उन्होंने प्रियदर्शन के साथ जुड़े कई संस्मरण साझा किए हैं।

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'Osoji' से यूं दुनिया में मजबूत होती है जापान की ब्रैंड पहचान

मैच खत्म होने के बाद स्टेडियम की सफाई करते जापानी प्रशंसकों की तस्वीरें और वीडियो अक्सर सोशल मीडिया पर वायरल हो जाती हैं।

Last Modified:
Monday, 22 June, 2026
Sandeep Goel9586

डॉ. संदीप गोयल, फाउंडर व चेयरमैन,

मैच खत्म होने के बाद स्टेडियम की सफाई करते जापानी प्रशंसकों की तस्वीरें और वीडियो अक्सर सोशल मीडिया पर वायरल हो जाती हैं। दुनिया भर के लोग इसे देखकर हैरान होते हैं, लेकिन जापान में यह कोई असाधारण बात नहीं है। वहां के लोगों के लिए यह एक सामान्य सामाजिक जिम्मेदारी है, जो "Osoji" नाम की एक सांस्कृतिक सोच से जुड़ी हुई है।

Osoji का शाब्दिक अर्थ है "बड़ी सफाई"। पारंपरिक रूप से यह नए साल के स्वागत से पहले घरों और कार्यस्थलों की गहरी सफाई करने की परंपरा है, लेकिन इसकी भावना सिर्फ सालाना सफाई तक सीमित नहीं है। यह जापानी जीवनशैली का हिस्सा है और तीन प्रमुख सिद्धांतों पर आधारित है।

Shared Responsibility (साझी जिम्मेदारी) : सार्वजनिक जगहों जैसे स्टेडियम, पार्क, सड़क या रेलवे स्टेशन को साफ रखना केवल सफाई कर्मचारियों की जिम्मेदारी नहीं है। वहां आने वाले हर व्यक्ति की भी यह जिम्मेदारी है कि वह जगह को साफ-सुथरा रखे।

Atarimae (अतारिमाए – बिल्कुल स्वाभाविक बात) : जब जापानी लोगों से पूछा जाता है कि वे सफाई क्यों करते हैं, तो उनका जवाब होता है कि यह तो एक सामान्य और स्वाभाविक काम है। यानी सफाई करना उनके लिए कोई खास उपलब्धि या दिखावा नहीं, बल्कि रोजमर्रा की जिम्मेदारी है।

Leaving No Trace (कोई निशान या गंदगी पीछे न छोड़ना) : यह एक जापानी कहावत पर आधारित है, जिसका अर्थ है कि जब आप किसी जगह से जाएं तो उसे गंदा छोड़कर न जाएं। कोशिश करें कि वह जगह आपको जैसी मिली थी, उससे भी ज्यादा साफ हालत में छोड़ें।

कहां से आती है यह आदत

जापान में सफाई और जिम्मेदारी की आदत सिर्फ दिखावे या कैमरे के लिए नहीं होती, बल्कि यह बचपन से सिखाई जाने वाली एक गहरी संस्कृति है। वहां बच्चों को बहुत छोटी उम्र से यह सिखाया जाता है कि स्कूलों में खुद ही अपनी कक्षा, गलियारे और यहां तक कि बाथरूम तक साफ करना उनकी जिम्मेदारी है। इसके लिए अलग से सफाई कर्मचारी नहीं रखे जाते। ऐसा इसलिए किया जाता है ताकि बच्चों में यह भावना विकसित हो कि हर कोई बराबर है, किसी काम को छोटा या बड़ा नहीं समझना चाहिए और अपने आसपास की चीजों का सम्मान करना चाहिए। यह आदत उन्हें विनम्र बनाती है और उनके भीतर अनुशासन और जिम्मेदारी की भावना पैदा करती है। इसके पीछे जापान की धार्मिक सोच भी जुड़ी हुई है, खासकर शिंटो धर्म की परंपराएं, जिनमें सफाई को पवित्रता माना जाता है, और जेन बौद्ध धर्म की वह सीख जिसमें शारीरिक काम को ध्यान और आत्म-अनुशासन का हिस्सा माना जाता है।

स्टेडियम में सफाई की परंपरा

जापानी लोगों की यही आदत अंतरराष्ट्रीय खेलों में भी दिखाई देती है, खासकर वर्ल्ड कप जैसे बड़े आयोजनों में। दुनिया ने पहली बार यह दृश्य 1998 के फ्रांस वर्ल्ड कप में देखा था और तब से हर बड़े टूर्नामेंट में यह देखने को मिलता है। जापानी फैंस मैच देखने आते हैं और साथ में बड़े नीले प्लास्टिक बैग लाते हैं, जिन्हें वे मैच के दौरान हवा भरकर उत्साह दिखाने के लिए इस्तेमाल करते हैं। लेकिन मैच खत्म होने के बाद वही बैग वे कचरा इकट्ठा करने के लिए इस्तेमाल करते हैं और स्टेडियम पूरी तरह साफ कर देते हैं।

खास बात यह है कि वे यह काम सिर्फ अपनी टीम के लिए नहीं करते। चाहे जापान जीते या हारे, या उनका मैच हो या किसी और टीम का, वे हमेशा स्टैंड्स को साफ करके ही जाते हैं। उदाहरण के तौर पर 2026 वर्ल्ड कप में नीदरलैंड्स के साथ 2-2 ड्रॉ के बाद जापानी फैंस ने डलास स्टेडियम के अपने पूरे हिस्से को साफ कर दिया, और यह घटना सोशल मीडिया पर काफी वायरल हुई।

यह आदत सिर्फ जापानी फैंस तक सीमित नहीं है, बल्कि खिलाड़ी भी इसी सोच को अपनाते हैं। जापान की राष्ट्रीय फुटबॉल टीम, जिसे “समुराई ब्लू” कहा जाता है, मैच या टूर्नामेंट खत्म होने के बाद अपने ड्रेसिंग रूम को पूरी तरह साफ करके छोड़ती है। वे अपने कपड़े अच्छे से तह करके रखते हैं और कई बार आयोजकों के लिए हाथ से लिखा धन्यवाद संदेश और ओरिगामी (कागज से बनी क्रेन) भी छोड़ जाते हैं। इसका मतलब यह है कि जापान में अनुशासन और साफ-सफाई की संस्कृति सिर्फ दिखावे की चीज नहीं, बल्कि हर व्यक्ति की आदत का हिस्सा है, चाहे वह खिलाड़ी हो या आम नागरिक।

जब उसने कई सालों तक जापान का दौरा किया, तो उसे यह बात बहुत खास लगी कि वहां लोगों की यह नागरिक जिम्मेदारी वाली आदत सिर्फ किसी बड़े अवसर या साल में एक बार होने वाली सफाई (ओसोजी) तक सीमित नहीं है। यह आदत उनकी रोजमर्रा की जिंदगी में शामिल है। यह सोच जापान के शिंटो धर्म और बौद्ध धर्म से जुड़ी हुई है, जहां “पवित्रता” और “साफ-सफाई” को बहुत महत्व दिया जाता है। इन आदतों के जरिए लोगों को यह सिखाया जाता है कि हर व्यक्ति की जिम्मेदारी है, दूसरों का ध्यान रखना जरूरी है और अपने काम को पूरी जागरूकता (mindfulness) के साथ करना चाहिए।

अलग-अलग आदतों का मतलब:

Sōji (स्कूल की सफाई की जिम्मेदारी) : जापान में स्कूलों में बच्चे खुद अपनी कक्षा, गलियारे और टॉयलेट साफ करते हैं। सफाई के लिए अलग से कर्मचारी नहीं होते। इससे बच्चों में विनम्रता, टीमवर्क और अपनी जगह की जिम्मेदारी सीखने को मिलती है।

Gomi Hiroi (कचरा अपने साथ ले जाना) : जापान में लोग अक्सर सार्वजनिक जगहों पर कचरा नहीं छोड़ते, बल्कि उसे अपने साथ घर ले जाते हैं। इसलिए स्टेडियम में भी लोग मैच के बाद अपना कचरा खुद उठाते हैं और साफ करके जाते हैं।

Mottainai (चीजों की बर्बादी न करना) : यह सोच कहती है कि किसी भी चीज़ को बेकार नहीं करना चाहिए। हर संसाधन का पूरा उपयोग करना चाहिए और कचरे को सही तरीके से अलग-अलग करके रीसायकल करना चाहिए।

Meiwaku wo Kakenai (दूसरों को परेशानी न देना) : इसका मतलब है कि ऐसा कोई काम नहीं करना जिससे दूसरों को असुविधा हो। इसलिए जापान में लोग शांति से रहते हैं, पब्लिक ट्रांसपोर्ट में शोर नहीं करते और जगहें साफ-सुथरी रहती हैं।

अंत में 5S सिस्टम का मतलब : इन सभी आदतों को मिलाकर एक तरीका बनता है जिसे 5S कहा जाता है। इसमें काम और जीवन को इस तरह व्यवस्थित किया जाता है कि जगह साफ, सुरक्षित और अच्छी बनी रहे।

इन सभी आदतों का प्रभाव जापान की प्रसिद्ध 5S कार्यप्रणाली में भी दिखाई देता है, जिसमें चीजों को व्यवस्थित रखना, सफाई बनाए रखना और अच्छी आदतों को लगातार जारी रखना शामिल है।

खेल के मैदान से परे, जापानी प्रशंसकों और खिलाड़ियों का व्यवहार दुनिया को यह संदेश देता है कि खेल सिर्फ जीत और हार का नाम नहीं है। यह सम्मान, अनुशासन, कृतज्ञता और अच्छे नागरिक होने का भी प्रतीक है।

जापानी प्रशंसकों की इस पहल से अन्य देशों के समर्थक भी प्रेरित हुए हैं। मोरक्को, सऊदी अरब और फ्रांस जैसे देशों के प्रशंसक भी अब मैचों के बाद अपने स्टैंड्स की सफाई करते दिखाई देते हैं। उम्मीद की जा रही है कि भविष्य में भारत में भी ऐसी संस्कृति को बढ़ावा मिलेगा और शायद एक दिन आईपीएल मैचों के बाद भी दर्शक स्टेडियम साफ करते नजर आएं।

जापान की यह परंपरा दुनिया को बताती है कि बदलाव के लिए बड़े अभियानों की नहीं, बल्कि छोटी-छोटी जिम्मेदार आदतों की जरूरत होती है।

(यह लेखक के निजी विचार हैं।)

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IT और MBA नौकरियों के दिन ढल गए? पढ़िए इस सप्ताह का 'हिसाब किताब'

लंबे समय तक सॉफ़्टवेयर इंजीनियरिंग की पढ़ाई के बाद हर साल करीब एक लाख युवाओं को इन कंपनियों में नौकरी मिल जाती थी। लेकिन पिछले दो वर्षों से भर्ती लगभग रुकी हुई है।

Last Modified:
Monday, 22 June, 2026
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मिलिंद खांडेकर, वरिष्ठ पत्रकार।

केंद्र सरकार के चीफ इकोनॉमिक एडवाइज़र वी. अनंत नागेश्वरन की ट्रोलिंग हो रही है। उन्होंने ANI को दिए एक इंटरव्यू में कहा कि सॉफ़्टवेयर और MBA डिग्री के आधार पर आसानी से नौकरी मिलने के दिन अब ढल रहे हैं। आने वाले समय में वेल्डिंग, प्लंबिंग और इलेक्ट्रिकल कार्यों से जुड़े कुशल लोगों की मांग बढ़ने वाली है। उनकी आलोचना इस आधार पर की जा रही है कि सरकार अब बेरोज़गार युवाओं को वेल्डिंग और प्लंबिंग करने की सलाह दे रही है। लेकिन यह आलोचना सही नहीं है। अगर हम आंकड़ों और बदलती अर्थव्यवस्था को देखें तो समझ सकते हैं कि नौकरियों का स्वरूप किस तरह बदल रहा है।

भारत की पांच बड़ी आईटी कंपनियों में 15 लाख से अधिक कर्मचारी कार्यरत हैं। लंबे समय तक सॉफ़्टवेयर इंजीनियरिंग की पढ़ाई के बाद हर साल करीब एक लाख युवाओं को इन कंपनियों में नौकरी मिल जाती थी। लेकिन पिछले दो वर्षों से भर्ती लगभग रुकी हुई है। इसकी सबसे बड़ी वजह आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस (AI) है। सॉफ़्टवेयर कोडिंग जैसे कई कार्य अब AI पहले से बेहतर और तेज़ी से कर रहा है, जिससे बड़ी संख्या में कर्मचारियों की आवश्यकता कम होती जा रही है।

टीसीएस और इंफोसिस जैसी कंपनियां वर्षों से दूसरी कंपनियों के सॉफ़्टवेयर और कंप्यूटर सिस्टम की देखरेख करके कमाई करती रही हैं। लेकिन AI के बढ़ते उपयोग के कारण ऐसे ऑर्डर्स में कमी आने लगी है। दुनिया की प्रमुख आईटी सेवा कंपनी Accenture ने भी आने वाले महीनों के लिए अपने बिक्री अनुमान को घटा दिया है। इसके बाद न्यूयॉर्क स्टॉक एक्सचेंज (NYSE) में उसके शेयरों में 18 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। इसका असर भारतीय आईटी कंपनियों पर भी पड़ा और निफ्टी आईटी इंडेक्स तीन वर्षों के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया।

चीफ इकोनॉमिक एडवाइज़र की बातों को शेयर बाज़ार भी अप्रत्यक्ष रूप से सही ठहराता दिखाई देता है कि आईटी कंपनियों के सामने चुनौतियां बढ़ रही हैं। हालांकि इसका अर्थ यह नहीं है कि आईटी कंपनियां बंद हो जाएंगी, बल्कि उनके काम का स्वरूप बदल सकता है और कर्मचारियों की आवश्यकता कम हो सकती है।

टीसीएस के चेयरमैन एन. चंद्रशेखरन ने हाल ही में कहा है कि अगले तीन वर्षों में कंपनी में कर्मचारियों के बराबर AI एजेंट काम कर सकते हैं। उनके अनुसार, टीसीएस में लगभग 5 लाख AI एजेंट कार्य करेंगे, जबकि वर्तमान में कंपनी में करीब 5.4 लाख कर्मचारी हैं।

AI को लेकर यह धारणा बन रही है कि कंप्यूटर के सामने बैठकर किए जाने वाले अधिकांश कार्य AI कर सकता है, लेकिन हाथों से किए जाने वाले तकनीकी और व्यावहारिक कार्य फिलहाल उसकी पहुंच से बाहर हैं। भारतीय समाज में लंबे समय से हाथ से किए जाने वाले कामों को अपेक्षाकृत कम महत्व दिया जाता रहा है, जबकि आज इलेक्ट्रिशियन, एसी टेक्नीशियन और अन्य तकनीकी पेशों से जुड़े लोग कई व्हाइट-कॉलर एंट्री-लेवल नौकरियों से अधिक आय अर्जित कर रहे हैं।

Randstad India की एक रिपोर्ट के अनुसार, डेटा एंट्री ऑपरेटर या जूनियर अकाउंटेंट जैसी एंट्री-लेवल व्हाइट-कॉलर नौकरियों में औसतन ढाई लाख रुपये सालाना वेतन मिलता है, जबकि एसी टेक्नीशियन तीन लाख रुपये से अधिक सालाना कमाते हैं। दूसरी ओर, टीसीएस और इंफोसिस जैसी कंपनियों में एंट्री-लेवल कर्मचारियों का वेतन पिछले लगभग 20 वर्षों से तीन से साढ़े तीन लाख रुपये वार्षिक के आसपास ही बना हुआ है। महंगाई को ध्यान में रखें तो वास्तविक रूप से यह आय पहले की तुलना में काफी कम हो चुकी है।

स्पष्ट है कि AI के कारण व्हाइट-कॉलर नौकरियों के सामने नई चुनौतियां खड़ी हो रही हैं। लेकिन इस चुनौती का समाधान ट्रोलिंग नहीं, बल्कि नई तकनीकों को अपनाने और AI जैसी उभरती तकनीकों को सीखने में है।

( यह लेखक के निजी विचार हैं )

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मादक पदार्थों से देश को बचाने का अभियान: आलोक मेहता

गृह मंत्री और अमेरिकी राजदूत के बीच हुई बैठक का महत्व इसलिए भी है क्योंकि भारत पंजाब, राजस्थान, गुजरात और समुद्री मार्गों के माध्यम से होने वाली ड्रग्स तस्करी की चुनौती का सामना कर रहा है।

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Monday, 22 June, 2026
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आलोक मेहता, पद्मश्री, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक।

सीमा पर आतंकी गतिविधियों पर नियंत्रण और माओवादी नक्सल प्रभावित क्षेत्रों को मुक्त करने के बाद भारत सरकार अब मादक पदार्थों (नारकोटिक्स) की तस्करी तथा उसके ज़हर को समाज में फैलने से रोकने के लिए व्यापक अभियान चला रही है। पिछले दिनों एक अनौपचारिक बातचीत में मैंने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से इसी संबंध में सवाल किया तो उन्होंने दृढ़ता के साथ कहा कि, “हम पिछले वर्षों से इस समस्या से निपटने के लिए कदम उठा रहे हैं और अब नारकोटिक्स पर नियंत्रण के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रयास करेंगे। यह आतंकवाद की तरह पूरी दुनिया के लिए और खासकर भावी नई पीढ़ी को सुरक्षित करने के लिए प्राथमिकता का मुद्दा है।”

इसी लक्ष्य से गृह मंत्री अमित शाह ने इस सप्ताह भारत में अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर से मुलाकात की। इस बैठक में आतंकवाद-रोधी सहयोग, सीमा सुरक्षा तथा मादक पदार्थों (नारकोटिक्स) की तस्करी के विरुद्ध संयुक्त प्रयासों पर विशेष चर्चा हुई। दोनों देशों ने इस बात पर ज़ोर दिया कि नशीले पदार्थों का अवैध व्यापार अब केवल कानून-व्यवस्था का विषय नहीं रह गया है, बल्कि यह राष्ट्रीय सुरक्षा, सामाजिक स्थिरता और युवाओं के भविष्य से जुड़ा गंभीर प्रश्न बन चुका है।

अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर और गृह मंत्री अमित शाह की इस सप्ताह की बैठक केवल एक सामान्य कूटनीतिक मुलाकात नहीं थी। यह उस बढ़ती वैश्विक चिंता का प्रतीक है, जिसमें ड्रग्स तस्करी, संगठित अपराध और आतंकवाद एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हाल के वर्षों में विभिन्न देशों के राष्ट्राध्यक्षों और प्रधानमंत्रियों के साथ हुई बैठकों में आतंकवाद के साथ नारकोटिक्स के मुद्दे की गंभीरता पर चर्चा करते रहे हैं। अमेरिका के साथ आर्थिक और व्यापार के नए समझौते पर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प से भी निर्णायक बातचीत हो चुकी है।

गृह मंत्री अमित शाह और अमेरिकी राजदूत के बीच हुई बैठक का महत्व इसलिए भी है क्योंकि भारत पंजाब, राजस्थान, गुजरात और समुद्री मार्गों के माध्यम से होने वाली ड्रग्स तस्करी की चुनौती का सामना कर रहा है। गृह मंत्री अमित शाह पहले भी कई मंचों पर चेतावनी दे चुके हैं कि “मादक पदार्थों का व्यापार और नार्को-टेररिज्म भारत के लिए दीर्घकालिक सुरक्षा खतरा बन सकता है।”

इस वर्ष जनवरी 2026 में भारत और अमेरिका ने संयुक्त ड्रग नीति कार्य समूह की बैठक भी आयोजित की थी, जिसमें दोनों देशों ने मादक पदार्थों और उनके उत्पादन में प्रयुक्त रसायनों की तस्करी रोकने के लिए सहयोग बढ़ाने का संकल्प लिया था।

भारत आज एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। एक ओर वह दुनिया की सबसे युवा आबादी वाला देश है, दूसरी ओर यही युवा वर्ग ड्रग्स माफिया का सबसे बड़ा लक्ष्य भी है। पंजाब सीमा से होने वाली तस्करी, ड्रोन के जरिए भेजे जा रहे नशीले पदार्थ, अंतरराष्ट्रीय अपराध सिंडिकेट और नार्को-टेरर नेटवर्क भारत के सामने गंभीर चुनौती प्रस्तुत करते हैं।

अमित शाह ने पिछले महीने भी एक बैठक में कहा था कि ड्रग्स का खतरा सीमाहीन है और इसके खिलाफ वैश्विक गठबंधन आवश्यक है। उन्होंने देशों के बीच वास्तविक समय की खुफिया साझेदारी और समन्वित कानूनी ढांचे की आवश्यकता पर ज़ोर दिया। भारत का मानना है कि अकेला कोई देश ड्रग्स माफिया को समाप्त नहीं कर सकता। इसलिए आवश्यक है संयुक्त राष्ट्र स्तर पर सहयोग, साझा खुफिया नेटवर्क, वित्तीय निगरानी, समुद्री सुरक्षा और सीमा प्रबंधन।

पिछले वर्षों (2020–2024) के दौरान भारत की विभिन्न एजेंसियों—विशेषकर नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (NCB), डीआरआई, बीएसएफ, कोस्ट गार्ड तथा राज्यों की पुलिस—ने सीमा क्षेत्रों, बंदरगाहों और समुद्री मार्गों के खिलाफ बड़े पैमाने पर कार्रवाई की है। यदि 2020–2024 में भारत की चुनौती मुख्यतः पंजाब सीमा और बंदरगाहों तक सीमित दिखाई देती थी, तो 2025 ने दिखाया कि समुद्री मार्ग राष्ट्रीय सुरक्षा का प्रमुख मोर्चा बन चुका है।

2025 में गुजरात तट के पास 1,800 करोड़ रुपये मूल्य की मेथामफेटामाइन पकड़ी गई। 33 करोड़ रुपये का हशीश ऑयल जहाज़ से बरामद हुआ। भारतीय नौसेना ने पश्चिमी हिंद महासागर में 2.5 टन से अधिक मादक पदार्थ जब्त किए। इससे यह संकेत स्पष्ट रूप से मिलता है कि ड्रग्स तस्कर भूमि सीमाओं के साथ-साथ समुद्री मार्गों का भी बड़े पैमाने पर उपयोग कर रहे हैं और सुरक्षा एजेंसियों को अब “नार्को-टेरर” के खिलाफ समुद्र में भी उतनी ही बड़ी लड़ाई लड़नी पड़ रही है।

ड्रग्स की समस्या केवल सीमावर्ती राज्यों या अपराध जगत तक सीमित नहीं रह गई है। पिछले कुछ वर्षों में स्कूलों, कॉलेजों, विश्वविद्यालयों, हॉस्टलों, पब, बार, रिसॉर्ट, होटल और नाइटलाइफ़ से जुड़े इलाकों में भी नशीले पदार्थों की पहुँच बढ़ने को लेकर चिंता व्यक्त की जा रही है।

विभिन्न अध्ययनों और सरकारी अभियानों से संकेत मिलता है कि ड्रग्स का प्रयोग कम उम्र में शुरू हो रहा है और युवाओं को प्रभावित कर रहा है। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) द्वारा 10 शहरों में किए गए एक अध्ययन में पाया गया कि कुछ बच्चों में नशीले पदार्थों के प्रयोग की शुरुआत औसतन 12.9–13 वर्ष की आयु के आसपास हो रही है, जबकि कुछ मामलों में शुरुआत 11 वर्ष की आयु तक देखी गई। अध्ययन में लगभग 15 प्रतिशत विद्यार्थियों द्वारा किसी न किसी मनःप्रभावी पदार्थ को आज़माने की बात सामने आई।

प्रकाशित एक अन्य सर्वेक्षण में कक्षा 8 से 12 तक के छात्रों में 10 प्रतिशत से अधिक द्वारा पिछले वर्ष किसी न किसी प्रकार के पदार्थ सेवन की जानकारी सामने आई थी। विशेषज्ञों के अनुसार इसके प्रमुख कारण हैं—साथियों का दबाव, सोशल मीडिया और डिजिटल प्रभाव, परिवार में तनाव, मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याएँ, जिज्ञासा और प्रयोग करने की प्रवृत्ति तथा आसान उपलब्धता।

कॉलेजों में स्थिति और अधिक जटिल हो जाती है क्योंकि छात्रों को अधिक स्वतंत्रता, हॉस्टल जीवन और नाइटलाइफ़ का संपर्क मिलता है। पुलिस और जनप्रतिनिधियों ने कॉलेज परिसरों के आसपास नशे की उपलब्धता को लेकर चिंता व्यक्त की है। नागपुर में स्थानीय प्रशासन ने कॉलेजों से निगरानी बढ़ाने की अपील की और छात्र समुदाय में बढ़ती नशे की प्रवृत्ति पर चिंता जताई। कर्नाटक के बेलगावी में पुलिस ने कॉलेज परिसरों के आसपास विशेष अभियान चलाया और बड़ी संख्या में युवाओं के नशीले पदार्थों के संपर्क में होने की बात सामने आई।

सामुदायिक चर्चाओं और छात्र अनुभवों में भी यह चिंता दिखाई देती है कि कुछ हॉस्टलों और विश्वविद्यालय क्षेत्रों में गांजा, सिंथेटिक ड्रग्स और अन्य पदार्थों की उपलब्धता पहले की तुलना में अधिक दिखाई दे रही है। बड़े महानगरों—जैसे दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु, गोवा, पुणे और हैदराबाद—में पुलिस समय-समय पर होटल, पब, फार्महाउस पार्टियों और निजी आयोजनों पर छापे मारती रही है।

विशेषज्ञों के अनुसार अब केवल हेरोइन या अफीम ही समस्या नहीं हैं। शहरी क्षेत्रों में एमडीएमए, एलएसडी, मेफेड्रोन, मेथम्फेटामिन और पार्टी ड्रग्स का खतरा बढ़ा है। इनका उपयोग अक्सर पार्टी संस्कृति, नाइट क्लब, निजी पार्टियों और कुछ मामलों में कॉलेज नेटवर्क से जुड़ा पाया जाता है।

2025–26 के दौरान पंजाब के नशामुक्ति कार्यक्रमों में 90,000 से अधिक लोगों का उपचार किया गया। यह बताता है कि समस्या कितनी व्यापक हो चुकी है। कश्मीर के स्थानीय अध्ययनों में युवाओं के बीच नशे की बढ़ती प्रवृत्ति को गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती बताया गया है। गोवा लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय पर्यटकों और नाइटलाइफ़ के कारण ड्रग्स नियंत्रण एजेंसियों की विशेष निगरानी में रहा है। स्थानीय समुदायों ने भी स्कूलों और युवाओं तक ड्रग्स पहुँचने पर चिंता व्यक्त की है।

युवाओं में ड्रग्स की लत केवल स्वास्थ्य समस्या नहीं है। इसके कारण पढ़ाई में गिरावट, स्कूल छोड़ना, मानसिक अवसाद, चिंता विकार, हिंसक व्यवहार, सड़क दुर्घटनाएँ, अपराध में शामिल होना और पारिवारिक संबंधों के टूटने जैसी स्थितियाँ बन रही हैं। एम्स और अन्य स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि यदि शुरुआती हस्तक्षेप न किया जाए तो ड्रग्स का प्रयोग धीरे-धीरे निर्भरता और फिर लत में बदल जाता है।

बहरहाल, भारत अभी अमेरिका या कनाडा जैसी ओपिऑयड महामारी की स्थिति में नहीं है, लेकिन कई विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि शुरुआत की आयु कम हो रही है, सिंथेटिक ड्रग्स बढ़ रही हैं, कॉलेज और शहरी युवा अधिक प्रभावित हो रहे हैं तथा मानसिक स्वास्थ्य समस्याएँ और नशा एक-दूसरे से जुड़ रहे हैं।

इसलिए स्कूल स्तर से जागरूकता, कॉलेजों में काउंसलिंग, परिवारों की भागीदारी, नशामुक्ति केंद्रों का विस्तार और तस्करी नेटवर्क पर कठोर कार्रवाई अत्यंत आवश्यक मानी जा रही है।

भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल ड्रग्स की तस्करी नहीं, बल्कि नई पीढ़ी को नशे की गिरफ्त में जाने से बचाना है। यदि स्कूल, कॉलेज, परिवार, समाज और कानून-प्रवर्तन एजेंसियाँ मिलकर समय रहते कार्रवाई करें, तो भारत उस बड़े सामाजिक संकट से बच सकता है जिसका सामना कई पश्चिमी देशों ने पिछले दशकों में किया है।

( यह लेखक के निजी विचार हैं )

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सोशल मीडिया के शोर में भी चमकी गंभीर पत्रकारिता, प्रभु चावला की स्टोरी बनी मिसाल

डिजिटल और सोशल मीडिया के दौर में, जहां क्लिकबेट और वायरल कंटेंट का बोलबाला है, वरिष्ठ पत्रकार प्रभु चावला ने दिखाया है कि मजबूत, विश्वसनीय और गहन कंटेंट की अहमियत आज भी कायम है।

Last Modified:
Monday, 15 June, 2026
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डिजिटल और सोशल मीडिया के दौर में जहां क्लिकबेट हेडलाइंस, वायरल वीडियो और कुछ सेकंड के कंटेंट की भरमार है, वहीं वरिष्ठ पत्रकार प्रभु चावला ने एक बार फिर यह साबित करने की कोशिश की है कि मजबूत, विश्वसनीय और गहराई वाले कंटेंट की अहमियत आज भी बरकरार है।

प्रभु चावला ने हाल ही में अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर अपनी चर्चित स्टोरी "Awesome Foursome Rattles BJP" को दोबारा साझा करते हुए लिखा, "One million views and still counting. Credible Content is still the King." उन्होंने यह भी बताया कि यह लेख डिजिटल और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर मिलाकर 15 लाख से अधिक व्यूज हासिल कर चुका है।

यह लेख दक्षिण भारत के चार प्रमुख नेताओं- वी. डी. सतीशन, ए. रेवंत रेड्डी, डी. के. शिवकुमार और जोसेफ विजय की राजनीतिक एकजुटता और उसके राष्ट्रीय राजनीति पर संभावित प्रभाव पर आधारित था। लेकिन इस स्टोरी की चर्चा केवल इसके राजनीतिक विश्लेषण के कारण नहीं हुई, बल्कि इसलिए भी हुई क्योंकि इसने दिखाया कि दर्शक आज भी गंभीर और विश्लेषणात्मक कंटेंट पढ़ना चाहते हैं।

क्या कहती है प्रभु चावला की पोस्ट?

प्रभु चावला ने लिखा कि उन्हें यह लेख दोबारा साझा करने के लिए खेद है, लेकिन इसकी पहुंच और लोकप्रियता यह साबित करती है कि अच्छी पत्रकारिता की मांग खत्म नहीं हुई है। उनका संदेश साफ था- विश्वसनीय और रिसर्च आधारित कंटेंट आज भी दर्शकों को आकर्षित कर सकता है।

वायरल दौर में भी गहराई वाले कंटेंट की मांग

पिछले कुछ वर्षों में मीडिया इंडस्ट्री में यह धारणा मजबूत हुई है कि दर्शक केवल छोटे वीडियो, रील्स और त्वरित अपडेट्स देखना चाहते हैं। लेकिन समय-समय पर कुछ ऐसे लेख, इंटरव्यू और विश्लेषण सामने आते हैं जो इस धारणा को चुनौती देते हैं।

प्रभु चावला की यह स्टोरी भी उसी श्रेणी में दिखाई देती है। यह कोई सनसनीखेज खुलासा नहीं था, न ही किसी विवादित बयान पर आधारित खबर थी। इसके बजाय यह भारतीय राजनीति में दक्षिण भारत की बढ़ती भूमिका और संघीय ढांचे पर उसके प्रभाव का विश्लेषण था।

मीडिया इंडस्ट्री के लिए बड़ा संकेत

इस लेख की सफलता मीडिया संगठनों के लिए भी एक महत्वपूर्ण संदेश है। डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर ट्रैफिक और एंगेजमेंट की दौड़ के बीच अक्सर गहन विश्लेषणात्मक लेखों को कम प्राथमिकता दी जाती है। लेकिन जब ऐसा कंटेंट लाखों लोगों तक पहुंचता है, तो यह बताता है कि ऑडियंस का एक बड़ा वर्ग अभी भी गंभीर पत्रकारिता में रुचि रखता है।

विशेषज्ञों की मानें तो डिजिटल मीडिया का भविष्य केवल वायरल कंटेंट पर नहीं, बल्कि विश्वसनीयता और भरोसे पर भी निर्भर करेगा। दर्शक तेजी से ऐसी सामग्री की तलाश कर रहे हैं जो उन्हें सिर्फ सूचना ही नहीं, बल्कि संदर्भ और समझ भी दे।

"Content is King" की बहस फिर चर्चा में

मीडिया जगत में लंबे समय से कहा जाता रहा है कि "Content is King"। हालांकि सोशल मीडिया और एल्गोरिदम के दौर में कई बार यह धारणा कमजोर पड़ती नजर आई। लेकिन प्रभु चावला की पोस्ट ने इस बहस को एक बार फिर जीवित कर दिया है।

उनका दावा है कि अगर कंटेंट मजबूत, विश्वसनीय और प्रासंगिक हो, तो वह आज भी लाखों लोगों तक पहुंच सकता है। यही कारण है कि उन्होंने अपनी पोस्ट में "Credible Content is still the King" लिखकर कंटेंट की गुणवत्ता को सबसे ऊपर रखा।

प्रभु चावली की इस स्टोरी का हिंदी सार आप यहां पढ़ सकते हैं-

केरल के वी. डी. सतीशन, तेलंगाना के ए. रेवंत रेड्डी, कर्नाटक के डी. के. शिवकुमार और तमिलनाडु के जोसेफ विजय एक सामान्य बैठक के लिए साथ पहुंचे थे, लेकिन लौटते समय उन्होंने भारतीय संघीय व्यवस्था की राजनीति को एक नई दिशा दे दी।

पिछले सप्ताह राष्ट्रपति भवन परिसर में नीति आयोग की बैठक आयोजित हुई। आमतौर पर ऐसी बैठकों में केंद्र और राज्यों के बीच औपचारिक बातचीत होती है और राष्ट्रीय एजेंडे पर चर्चा आगे बढ़ती है। लेकिन इस बार कुछ अलग हुआ। दक्षिण भारत के ये चार मुख्यमंत्री किसी अलग-अलग राज्य के प्रतिनिधि के रूप में नहीं, बल्कि एक समन्वित और एकजुट समूह के रूप में दिल्ली पहुंचे।

इन चार राज्यों की ताकत को नजरअंदाज करना आसान नहीं है। लोकसभा में इनके पास कुल 104 सीटें हैं, जो निचले सदन की लगभग पांचवें हिस्से की ताकत के बराबर है। इतना ही नहीं, ये राज्य मिलकर देश की जीडीपी का करीब 26 प्रतिशत हिस्सा पैदा करते हैं और प्रत्यक्ष कर (डायरेक्ट टैक्स) राजस्व में लगभग 30 प्रतिशत योगदान देते हैं।

दिलचस्प बात यह है कि इन चारों राज्यों में केंद्र की सत्तारूढ़ व्यवस्था की सरकार नहीं है। दिल्ली पहुंचकर इन नेताओं ने केवल अपनी शिकायतों की सूची नहीं सौंपी, बल्कि देश की संघीय व्यवस्था से जुड़े गहरे और संरचनात्मक सवाल उठाए। यह केवल विरोध नहीं था, बल्कि राजनीतिक प्रभाव और दबाव बनाने की एक सोची-समझी रणनीति थी।

कई दशकों से भारतीय विपक्षी राजनीति अक्सर शोर-शराबे को ताकत समझने की गलती करती रही है। क्षेत्रीय दलों ने कई बार विरोध प्रदर्शन को ही अंतिम लक्ष्य मान लिया, जबकि उसका उद्देश्य प्रभाव पैदा करना होना चाहिए था। लेकिन दक्षिण भारत के इस चौकड़ी समूह ने इस परंपरा को तोड़ दिया। चार अलग-अलग नेताओं के बजाय एक साझा मंच के रूप में सामने आकर उन्होंने राष्ट्रीय राजनीति में दक्षिणी एकजुटता को एक स्पष्ट पहचान दी।

इन नेताओं ने जो मुद्दा उठाया, वह वास्तविक भी है और संविधान व्यवस्था की एक जटिल चुनौती भी। दक्षिणी राज्यों ने लंबे समय तक जनसंख्या नियंत्रण, शिक्षा, स्वास्थ्य और मानव संसाधन विकास के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रदर्शन किया है। उन्होंने ऐसी अर्थव्यवस्थाएं विकसित की हैं जो निर्यात को बढ़ावा देती हैं और राष्ट्रीय राजस्व में महत्वपूर्ण योगदान देती हैं।

लेकिन आगामी जनगणना के बाद प्रस्तावित परिसीमन (Delimitation) प्रक्रिया में इन्हीं राज्यों को लोकसभा में अपेक्षाकृत कम प्रतिनिधित्व मिलने का डर है। वर्तमान व्यवस्था मुख्य रूप से जनसंख्या के आधार पर सीटों का निर्धारण करती है। दक्षिणी राज्यों का तर्क है कि जिन्होंने जनसंख्या नियंत्रण में सफलता हासिल की, उन्हें अब राजनीतिक प्रतिनिधित्व के मामले में नुकसान उठाना पड़ सकता है। उनके अनुसार, यह स्थिति अच्छी शासन व्यवस्था को दंडित करने और अधिक जनसंख्या वृद्धि को पुरस्कृत करने जैसी है।

तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी ने इस मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर पर सबसे प्रभावशाली ढंग से उठाया है। उन्होंने एक मिश्रित फॉर्मूला सुझाया है, जिसमें आधी सीटें जनसंख्या के आधार पर और आधी राज्यों के आर्थिक योगदान के आधार पर तय की जाएं। यह कोई नया सिद्धांत नहीं है, बल्कि आर्थिक योगदान को राजनीतिक प्रतिनिधित्व से जोड़ने का प्रयास है। इसी वजह से रेवंत रेड्डी परिसीमन बहस का प्रमुख चेहरा बनकर उभरे हैं।

इस समूह के हर नेता की अपनी अलग ताकत है।

62 वर्षीय वी. डी. सतीशन इस समूह के वैचारिक और नैतिक स्तंभ माने जा सकते हैं। पेशे से वकील और छह बार विधायक रह चुके सतीशन ने केरल में कांग्रेस को धैर्य और सिद्धांतों के आधार पर मजबूत किया है। उनकी पहचान साफ-सुथरी राजनीति और संतुलित नेतृत्व की रही है।

64 वर्षीय डी. के. शिवकुमार इस समूह की संगठनात्मक शक्ति हैं। आठ बार विधायक रह चुके शिवकुमार ने कर्नाटक में कांग्रेस को मुश्किल दौर से निकालकर सत्ता तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाई। बूथ स्तर के संगठन, गठबंधन राजनीति और चुनावी गणित पर उनकी पकड़ बेहद मजबूत मानी जाती है। कर्नाटक दक्षिण भारत का राजनीतिक और भौगोलिक प्रवेश द्वार है और शिवकुमार इस दरवाजे के सबसे प्रभावशाली संरक्षकों में से एक हैं।

51 वर्षीय जोसेफ विजय इस समूह के सबसे अलग और प्रभावशाली चेहरे हैं। उन्होंने किसी राजनीतिक परिवार की विरासत के बिना राजनीति में प्रवेश किया। लंबे राजनीतिक प्रशिक्षण या स्थापित वैचारिक ढांचे के बिना उन्होंने अपनी लोकप्रियता को राजनीतिक समर्थन में बदला। आज वे दक्षिण भारत की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था और 39 लोकसभा सीटों वाले तमिलनाडु का नेतृत्व कर रहे हैं। नीति आयोग की बैठक में उनकी मौजूदगी यह भी संकेत देती है कि तमिलनाडु का राष्ट्रीय संस्थाओं के प्रति पारंपरिक संकोच अब बदल रहा है।

इन चारों नेताओं की ताकतें अलग-अलग हैं, लेकिन यही उनकी सबसे बड़ी शक्ति भी है। सतीशन नैतिक विश्वसनीयता देते हैं, रेवंत रेड्डी मुद्दों को राष्ट्रीय विमर्श में लाने की क्षमता रखते हैं, शिवकुमार संगठनात्मक मजबूती प्रदान करते हैं और विजय जनसमर्थन जुटाने की क्षमता रखते हैं।

जब ये चारों एक साथ आते हैं, तो वे भारतीय विपक्षी राजनीति को वह चीज देते हैं जिसकी कमी लंबे समय से महसूस की जा रही थी—दक्षिण भारत की ओर से प्रतिनिधित्व और संसाधनों पर एक स्पष्ट और प्रभावशाली साझा राजनीतिक रुख।

भारतीय जनता पार्टी की दक्षिण भारत में मौजूदगी अभी भी सीमित मानी जाती है। तेलंगाना, तमिलनाडु और केरल में पार्टी की चुनावी संभावनाएं कई संरचनात्मक चुनौतियों से घिरी हैं। कर्नाटक ही ऐसा राज्य है जहां वास्तविक और सीधी राजनीतिक प्रतिस्पर्धा देखने को मिलती है। यही स्थिति इस चौकड़ी को रणनीतिक बढ़त देती है।

हालांकि इन नेताओं की सबसे बड़ी चुनौती बीजेपी नहीं, बल्कि समय और राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं हैं। भारत में क्षेत्रीय गठबंधनों का इतिहास बताता है कि व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाएं, राज्यों के अलग-अलग हित और तात्कालिक राजनीतिक गणनाएं अक्सर ऐसे गठबंधनों को कमजोर कर देती हैं।

फिर भी इस बार परिस्थितियां कुछ अलग दिखाई देती हैं। इन राज्यों की आर्थिक ताकत, लोकसभा में उनका प्रतिनिधित्व और परिसीमन जैसा साझा मुद्दा उन्हें लंबे समय तक एकजुट रखने का आधार बन सकता है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि चारों नेता अभी अपने राजनीतिक करियर के सक्रिय दौर में हैं और आने वाले एक दशक तक इस परियोजना को आगे बढ़ाने की क्षमता रखते हैं।

यदि यह एकजुटता बनी रहती है, तो इसके प्रभाव अगले चुनाव तक सीमित नहीं रहेंगे। दक्षिण भारत का ऐसा राजनीतिक समूह, जिसके पास आर्थिक और संसदीय दोनों ताकत हो, भारतीय संघवाद की शर्तों को नए सिरे से परिभाषित करने की क्षमता रखता है।

तब राष्ट्रीय राजनीति केवल “वन नेशन, वन इलेक्शन” या “वन पार्टी डॉमिनेंस” की बहस तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि केंद्र में सरकार बनाने के लिए विभिन्न क्षेत्रीय और राष्ट्रीय शक्तियों के बीच नए समीकरण बनेंगे। राष्ट्रीय दल बनाम क्षेत्रीय दल की पुरानी बहस की जगह एक अधिक बहुध्रुवीय राजनीतिक व्यवस्था उभर सकती है।

फिलहाल दक्षिण भारत की इस चौकड़ी ने सबसे कठिन पहला कदम उठा लिया है। उन्होंने केंद्र सरकार को यह समझाने में सफलता हासिल की है कि उनका मुद्दा कोई अस्थायी राजनीतिक शिकायत नहीं, बल्कि संघीय ढांचे से जुड़ा एक बुनियादी सवाल है।

यह एकजुटता भारतीय राजनीति में स्थायी बदलाव का आधार बनेगी या केवल कुछ समय की राजनीतिक एकता साबित होगी, इसका फैसला आने वाले वर्षों में होगा। लेकिन इतना तय है कि दक्षिण भारत ने ऐसे नेताओं का एक समूह सामने रखा है जो इस संघर्ष के महत्व को समझते हैं।

भारतीय राजनीति का गुरुत्वाकर्षण केंद्र अब धीरे-धीरे बदलता दिखाई दे रहा है। यह बदलाव जनसंख्या के कारण नहीं, बल्कि सुनियोजित राजनीतिक संगठन और साझा रणनीति की वजह से हो रहा है।

और यदि यह प्रक्रिया जारी रहती है, तो वह पुरानी धारणा कि केवल संख्या बल ही राष्ट्रीय प्रभुत्व तय करता है, भविष्य में चुनौती के घेरे में आ सकती है। बहस शुरू हो चुकी है। अब देखना यह है कि क्या सत्ता का ढांचा भी उसी दिशा में बदलता है।

 

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अर्बन नक्सलवाद और नई न्याय संहिता की चुनौतियां: आलोक मेहता

सरकार का विश्वास रहा है कि नए आपराधिक कानून आतंकवाद, संगठित अपराध, साइबर अपराध तथा विदेशी समर्थन प्राप्त अवैध गतिविधियों के विरुद्ध अधिक प्रभावी कार्रवाई का आधार प्रदान करेंगे।

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Monday, 15 June, 2026
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आलोक मेहता, पद्मश्री, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सत्ता में निरंतर बने रहने के 12 वर्ष और 4399 दिन के ऐतिहासिक रिकॉर्ड पर अनेक उपलब्धियों की चर्चा हुई। लेकिन भारतीय न्याय व्यवस्था में क्रांतिकारी बदलाव के लिए बनी न्याय संहिता का उल्लेख नहीं दिखाई दिया। जबकि इसके दो वर्ष के प्रारंभिक चरण में ही ब्रिटिश राज वाले कानूनों में हुए बड़े परिवर्तन का असर दिखने लगा है। नक्सल समस्या के आतंक से मुक्ति का लक्ष्य मार्च 2026 में बहुत हद तक पूरा हो गया।

लेकिन अर्बन नक्सल का नासूर और विदेशी फंडिंग से भारत-विरोधी गतिविधियों तथा प्रचार पर नियंत्रण के लिए अभी कानूनों में और भी संशोधनों एवं परिवर्तनों की चुनौतियां हैं। हाल ही में कुछ ऐसे ही गंभीर आपराधिक मामलों में उच्च न्यायालयों के फैसलों से कानूनी कमियों की बातें सामने आई हैं। यह अवश्य है कि ईडी (प्रवर्तन निदेशालय) या सीबीआई सुप्रीम कोर्ट में अपील कर अधिकाधिक प्रमाण प्रस्तुत करके दोषियों को दंडित करवाने के प्रयास कर रही है।

याद रहे, 1 जुलाई 2024 से ब्रिटिश काल से चले आ रहे तीन प्रमुख कानून—भारतीय दंड संहिता (IPC), दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) और भारतीय साक्ष्य अधिनियम (Indian Evidence Act)—की जगह क्रमशः भारतीय न्याय संहिता (BNS), भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) और भारतीय साक्ष्य अधिनियम (BSA) ने ले ली। ब्रिटिश शासन के 1500 से अधिक पुराने कानूनों को समाप्त कर दिया गया है।

1947 में भारत ने राजनीतिक स्वतंत्रता प्राप्त की थी; 2024 के बाद यह मुद्दा उठने लगा कि क्या भारत अपनी न्यायिक और विधिक संरचना को भी पूरी तरह औपनिवेशिक विरासत से मुक्त कर पाएगा? भारतीय न्याय संहिता इस यात्रा का अंत नहीं, बल्कि प्रारंभ है। इसी संदर्भ में पिछले दिनों एक प्रकरण में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, ऑनलाइन मीडिया में विदेशी पूंजी के दुरुपयोग से भारत-विरोधी गतिविधियों को अप्रत्यक्ष रूप से बढ़ाने के गंभीर आरोपों के बावजूद दिल्ली हाई कोर्ट से राहत मिलना चिंता का विषय बना है।

ईडी अब इस निर्णय को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने वाला है, लेकिन यह प्रमाण है कि न्याय संहिता के लिए अभी जांच एजेंसियों, पुलिस आदि को अधिक कानूनी अधिकार और संसाधन जुटाने की आवश्यकता होगी।

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने न्याय संहिता को संसद में पारित करने पर इन कानूनों को स्वतंत्र भारत के सबसे बड़े आपराधिक न्याय सुधारों में से एक बताते हुए कहा था कि आने वाले वर्षों में भारत की आपराधिक न्याय प्रणाली दुनिया की सबसे आधुनिक प्रणाली बन सकती है। पुलिस, फॉरेंसिक विज्ञान, अभियोजन और न्यायालयों को डिजिटल माध्यम से जोड़कर न्याय को तेज और पारदर्शी बनाया जा रहा है।

दशकों तक ऐसे कानून थे, जिनकी मूल संरचना औपनिवेशिक शासन की आवश्यकताओं के अनुरूप विकसित हुई थी। उनका मुख्य उद्देश्य शासन व्यवस्था बनाए रखना था, जबकि आधुनिक लोकतंत्र में कानून का उद्देश्य नागरिक अधिकारों की रक्षा और त्वरित न्याय उपलब्ध कराना है। साइबर अपराध, डिजिटल साक्ष्य, संगठित अपराध, आतंकवाद, वित्तीय अपराध और अंतरराष्ट्रीय अपराध नेटवर्क जैसी चुनौतियों से निपटने के लिए पुराने कानून पर्याप्त नहीं थे। इसलिए व्यापक संशोधन किए गए हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने औपनिवेशिक काल के पुराने कानूनों को समाप्त कर स्वदेशी भारतीय न्याय संहिता (BNS), भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) और भारतीय साक्ष्य अधिनियम (BSA) लागू करने को ऐतिहासिक कदम बताया है। उनका कहना है कि इन कानूनों का मूल उद्देश्य केवल ‘दंड देना’ नहीं, बल्कि ‘न्याय सुनिश्चित करना’ है, जो नागरिक अधिकारों और सामाजिक न्याय के सिद्धांतों पर आधारित हैं।

भारतीय न्याय संहिता और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के संपूर्ण स्वरूप का आधार भारतीय संविधान की भावना है। भारतीय संविधान से प्रेरित भारतीय न्याय संहिता का लागू होना गौरवशाली है, क्योंकि राष्ट्र एक महत्वपूर्ण मोड़ पर है, जहाँ वह विकसित भारत के संकल्प की दिशा में आगे बढ़ रहा है।

प्रधानमंत्री ने इस बात पर भी ध्यान दिलाया कि देश की नई न्याय संहिता बनाने की प्रक्रिया उतनी ही व्यापक रही है, जितनी कि स्वयं संहिता। इसमें देश के कई प्रसिद्ध संविधान और कानूनी विशेषज्ञों का परिश्रम शामिल है। सर्वोच्च न्यायालय के कई मुख्य न्यायाधीशों के सुझावों के साथ-साथ देश के अनेक उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों और अन्य सामाजिक-राजनीतिक संगठनों ने भी महत्वपूर्ण सुझाव दिए थे।

भारतीय न्याय संहिता और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता में हर पीड़ित के प्रति संवेदनशीलता है। न्याय संहिता यह सुनिश्चित करती है कि कानून पीड़ित के साथ खड़ा रहे। “नागरिक सर्वोपरि, न्याय संहिता का मूल मंत्र है।” ये कानून नागरिक अधिकारों के रक्षक और न्याय की सुगमता का आधार बन रहे हैं। पहले एफआईआर दर्ज कराना बेहद मुश्किल था। अब जीरो एफआईआर वैध हो गई है और कहीं से भी मामला दर्ज किया जा सकता है।

नई न्याय संहिता के अन्य महत्वपूर्ण पहलुओं के रूप में मानवता और संवेदनशीलता पर प्रकाश डालते हुए श्री मोदी ने कहा कि अब आरोपी को बिना सजा के लंबे समय तक जेल में नहीं रखा जा सकेगा और अब तीन वर्ष से कम सजा वाले अपराधों के मामले में गिरफ्तारी केवल उच्च अधिकारी की सहमति से ही की जा सकती है। छोटे अपराधों के लिए अनिवार्य जमानत का प्रावधान भी किया गया है।

न्याय संहिता में प्रत्येक मामले के प्रत्येक चरण को पूरा करने के लिए समय-सीमा निर्धारित करके आरोपपत्र दाखिल करने और फैसले जल्दी सुनाने को प्राथमिकता दी गई है। इसमें कोई शक नहीं कि प्रत्येक विभाग, प्रत्येक एजेंसी, प्रत्येक अधिकारी और प्रत्येक पुलिसकर्मी को न्याय संहिता के नए प्रावधानों को जानने और उनके सार को समझने की आवश्यकता है। राज्य सरकारों की भी जिम्मेदारी है कि वे न्याय संहिता के प्रभावी कार्यान्वयन को सुनिश्चित करें। न्याय संहिता को जितना अधिक प्रभावी ढंग से लागू किया जाएगा, देश का भविष्य उतना ही बेहतर और उज्ज्वल होगा।

सरकार का विश्वास रहा है कि नए आपराधिक कानून आतंकवाद, संगठित अपराध, साइबर अपराध तथा विदेशी समर्थन प्राप्त अवैध गतिविधियों के विरुद्ध अधिक प्रभावी कार्रवाई का आधार प्रदान करेंगे। वहीं विधि विशेषज्ञ इस बात पर बल देते हैं कि राष्ट्रीय सुरक्षा और नागरिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन बनाए रखना लोकतांत्रिक व्यवस्था की अनिवार्य आवश्यकता है। कुछ कानूनी विशेषज्ञों ने न्याय संहिता पर पुस्तकें लिखीं अथवा सार्वजनिक मंचों पर विचार व्यक्त किए।

सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता और लेखक अश्विनी दुबे ने सबसे पहले इस विषय पर बहुत अच्छी पुस्तक *‘एंड ऑफ कॉलोनियल लॉज़’* लिखी, जिसे सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीशों ने महत्वपूर्ण बताया। यह पुस्तक केवल नए आपराधिक कानूनों की चर्चा नहीं करती, बल्कि उस व्यापक सोच को रेखांकित करती है, जिसके तहत स्वतंत्र भारत की विधिक व्यवस्था को औपनिवेशिक विरासत से मुक्त करने का प्रयास किया जा रहा है। अश्विनी दुबे तर्क देते हैं कि भारत अब केवल कानूनों के नाम बदलने की प्रक्रिया में नहीं है, बल्कि शासन, न्याय और नागरिक अधिकारों के पूरे ढाँचे को भारतीय आवश्यकताओं के अनुरूप पुनर्परिभाषित करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।

इसी तरह सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता और भाजपा नेता अमन सिन्हा ने भारतीय न्याय संहिता (BNS) को भारत की न्याय प्रणाली को औपनिवेशिक काल से मुक्त करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण बदलाव के रूप में विभिन्न मंचों पर प्रस्तुत किया है। उनके प्रमुख कानूनी विश्लेषण और राजनीतिक रुख आपराधिक कानून के आधुनिकीकरण, औपनिवेशिक काल के पूर्वाग्रहों को समाप्त करने और त्वरित, नागरिक-केंद्रित न्याय सुनिश्चित करने पर केंद्रित हैं।

सिन्हा BNS (BNSS और BSA के साथ) को एक परिवर्तनकारी छलांग के रूप में देखते हैं, जो ब्रिटिशों द्वारा उपनिवेशवादियों की रक्षा के लिए बनाए गए कानूनों को भारतीय नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए बनाई गई प्रणाली से बदल देती है। एक वरिष्ठ कानूनी विशेषज्ञ के रूप में, सिन्हा अक्सर इस बात पर जोर देते हैं कि संहिता के अद्यतन संरचनात्मक ढाँचे ने पुरातन जटिलताओं को कम कर दिया है, जिससे समय पर न्याय दिलाने के लिए कानूनी कार्यवाही में काफी तेजी आई है। पुराने औपनिवेशिक कानूनों पर सरकार के रुख का बचाव करते हुए, वे औपनिवेशिक दंडात्मक मानसिकता के बजाय भारतीय सामाजिक-कानूनी वास्तविकताओं पर लक्षित सुधारों की वकालत करते हैं।

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश यू.यू. ललित ने इन नए कानूनों के प्रति अधिक सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाया। उन्होंने कहा है कि “यद्यपि औपनिवेशिक विरासत और मानसिकता से पूरी तरह मुक्त होना आसान नहीं है, फिर भी भारतीय न्याय संहिता कानून को आधुनिक समय की आवश्यकताओं के अनुरूप ढालने में सफल रही है।” उन्होंने विशेष रूप से सामुदायिक सेवा को दंड के एक वैकल्पिक स्वरूप के रूप में शामिल किए जाने की सराहना की।

साथ ही उनका मानना है कि देशद्रोह से जुड़े प्रश्न का पुनर्गठन इस प्रकार किया गया है कि वह सर्वोच्च न्यायालय के पहले दिए गए निर्णय द्वारा निर्धारित संवैधानिक सिद्धांतों और कानूनी ढाँचे के अनुरूप हो सके। फिर भी अधिकांश कानूनी विशेषज्ञों और देश के व्यापक हितों तथा सुरक्षा तंत्र से जुड़े पूर्व अधिकारियों का मानना है कि न्याय संहिता के लिए अभी पुलिस व्यवस्था में सुधार, न्यायपालिका के लिए आधुनिक सुविधाएँ, अधिक न्यायाधीशों की नियुक्तियाँ और राष्ट्र-विरोधी आर्थिक अपराधों से निपटने के लिए कानूनी संशोधनों की आवश्यकता है।

( यह लेखक के निजी विचार हैं )

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‘मेड इन इंडिया: द टाइटन स्टोरी’ ने ताजा कर दीं चार दशक पुरानी यादें

मेरे लिए टाइटन सिर्फ एक सफल ब्रैंड नहीं है। यह मेरे प्रोफेशनल जीवन के सबसे महत्वपूर्ण सीखने वाले अनुभवों में से एक रहा है।

Last Modified:
Thursday, 11 June, 2026
Titan

गणपति विश्ववनाथन, स्वतंत्र कम्युनिकेशन कंसल्टेंट व ‘मास्टरिंग द मैसेज’ के लेखक ।।

हाल ही में मैंने Made in India: The Titan Story के सभी एपिसोड देखे। जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती गई, मैं लगभग चार दशक पीछे उस दौर में लौटता चला गया, जब टाइटन कोई बड़ा और लोकप्रिय ब्रैंड नहीं था, बल्कि एक ऐसा सपना था जिसे साकार किया जाना बाकी था।

मेरे लिए टाइटन सिर्फ एक सफल ब्रैंड नहीं है। यह मेरे प्रोफेशनल जीवन के सबसे महत्वपूर्ण सीखने वाले अनुभवों में से एक रहा है। विज्ञापन और मार्केटिंग की मेरी कई बुनियादी सीखें टाइटन के शुरुआती दौर में उसके साथ काम करते हुए मिलीं। करीब तीन वर्षों तक मुझे टाइटन से जुड़ने का मौका मिला और मैं उसके कम्युनिकेशन से जुड़े कई महत्वपूर्ण कार्यों का हिस्सा रहा। इनमें टाइटन के प्रतिष्ठित "T" सिंबल का निर्माण भी शामिल था, जो आज भी घड़ियों के डायल पर दिखाई देता है, हालांकि अब वह अधिक आधुनिक रूप में मौजूद है।

जब शुरू हुआ एक सपना

आज ज्यादातर लोग टाइटन को उसकी खूबसूरत घड़ियों और यादगार संगीत के लिए जानते हैं। लेकिन इसकी कहानी इससे काफी पहले शुरू हो गई थी।

घड़ियां बाजार में आने से पहले कंपनी को पूंजी जुटानी थी। टाइटन की कहानी का पहला बड़ा अध्याय उसका IPO अभियान था। यह टाटा समूह की शुरुआती कंपनियों में से एक थी, जिसने बिना किसी प्रीमियम के आम जनता को शेयर खरीदने का मौका दिया था।

उस समय जारी किए गए विज्ञापन की हेडलाइन थी: "How to Buy a Share of a Tata Company at Par?" 

उस दौर में ही यह महसूस होने लगा था कि कुछ खास बनने जा रहा है।

एक नए दौर की शुरुआत

टाइटन का आधिकारिक लॉन्च 14 अप्रैल 1987 को बैसाखी के दिन मुंबई के ताज प्रेसिडेंट होटल में हुआ था। लॉन्च अभियान की सबसे बड़ी खासियत थी एक साफ और मजबूत संदेश- भारतीय ग्राहकों को अंतरराष्ट्रीय स्तर की गुणवत्ता वाली घड़ियां उपलब्ध कराना, जिनकी डिजाइन और वैरायटी भारत ने पहले कभी नहीं देखी थी।

आज भी मुझे उस लॉन्च को लेकर लोगों के बीच मौजूद उत्साह याद है। कम्युनिकेशन का हर पहलू आत्मविश्वास, महत्वाकांक्षा और विश्वस्तरीय सोच को दर्शाता था। हम सिर्फ एक नई घड़ी लॉन्च नहीं कर रहे थे, बल्कि भारतीय उपभोक्ताओं के लिए एक बिल्कुल नया अनुभव पेश कर रहे थे।

इसके बाद आई वह विज्ञापन श्रृंखला जिसने सब कुछ बदल दिया। टेलीविजन विज्ञापनों में बेहद खूबसूरत घड़ियां दिखाई गईं। कहानी बहुत कम थी, लेकिन उनका प्रभाव बेहद गहरा था। इसकी सबसे बड़ी वजह थी मोजार्ट का वह यादगार संगीत, जिसने भारतीय विज्ञापन जगत में इतिहास रच दिया। आज भी वह धुन सुनते ही लोगों के मन में सबसे पहले टाइटन का नाम आता है।

जब स्क्रीन पर जीवंत हुई पुरानी यादें

जब मैंने Made in India: The Titan Story देखी, तो पुरानी यादें एक बार फिर ताजा हो गईं।

यह सीरीज टाइटन के संस्थापक नेतृत्वकर्ता ज़ेरक्सिस देसाई के विजन और भारत में विश्वस्तरीय घड़ी ब्रैंड बनाने के दौरान आई चुनौतियों को बेहद प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करती है। हालांकि कहानी में कुछ काल्पनिक तत्व भी शामिल हैं, लेकिन इसके मूल भाव और यात्रा की सच्चाई बरकरार रहती है।

सीरीज का एक दृश्य मुझे विशेष रूप से प्रभावित कर गया। इसमें बोर्ड के सामने घड़ी पेश करने से पहले उसकी गुणवत्ता पर विशेष जोर दिया जाता है। यह ज़ेरक्सिस देसाई की उस परफेक्शनिस्ट सोच को दर्शाता है, जिसके लिए वे जाने जाते थे। उनके साथ काम करने वाले लोग जानते थे कि उनके लिए उत्कृष्टता कोई विकल्प नहीं, बल्कि अनिवार्य शर्त थी।

सीरीज का एक और मजबूत पक्ष है लगातार आने वाली चुनौतियों और असफलताओं से संघर्ष को दिखाना। कई ऐसे पल आते हैं जब समय सीमा असंभव लगती है, संसाधन कम पड़ते नजर आते हैं और आत्मविश्वास की परीक्षा होती है। लेकिन टीम हार नहीं मानती और आगे बढ़ती रहती है।

इन दृश्यों को देखकर मुझे टाइटन के शुरुआती वर्षों का वही जुनून और दृढ़ संकल्प याद आ गया।

ब्रैंड के पीछे का नेतृत्व

यह सीरीज एक महत्वपूर्ण सच भी सामने लाती है कि महान ब्रैंड सिर्फ उत्पादों के दम पर नहीं बनते।

ज़ेरक्सिस देसाई का नेतृत्व इस विश्वास पर आधारित था कि भारत दुनिया के सर्वश्रेष्ठ उत्पादों के बराबरी वाले उत्पाद बना सकता है। उन्होंने पारंपरिक सोच को चुनौती दी और लोगों को ऐसे मानक हासिल करने के लिए प्रेरित किया, जो उस समय लगभग असंभव लगते थे।

मुझे सबसे ज्यादा प्रभावित इस बात ने किया कि उन्होंने साधारण लोगों को असाधारण परिणाम हासिल करने के लिए प्रेरित किया।

सीरीज में इंजीनियर, डिजाइनर, मार्केटिंग टीम और फैक्ट्री के कर्मचारी सभी एक साझा लक्ष्य के लिए काम करते दिखाई देते हैं। इसी सामूहिक प्रयास ने एक महत्वाकांक्षी विचार को भारत के सबसे प्रतिष्ठित ब्रैंडों में बदल दिया।

टाइटन ने मुझे क्या सिखाया

पीछे मुड़कर देखने पर महसूस होता है कि टाइटन के साथ काम करने का अनुभव मुझे जीवन भर याद रहने वाली सीख दे गया। मैंने सीखा कि ब्रैंड सिर्फ विज्ञापनों से नहीं बनते। वे स्पष्ट विजन, लगातार बेहतर क्रियान्वयन, बारीकियों पर ध्यान और गुणवत्ता के प्रति अटूट प्रतिबद्धता से बनते हैं।

मैंने यह भी सीखा कि नेतृत्व का असली मतलब तब लोगों में विश्वास जगाना होता है, जब सफलता अभी दूर दिखाई दे रही हो और यह भी सीखा कि हर महान ब्रैंड के पीछे ऐसे लोग होते हैं, जो असफलताओं से घबराते नहीं, गलतियों से सीखते हैं और लगातार आगे बढ़ते रहते हैं।

सिर्फ घड़ी का ब्रैंड नहीं

लॉन्च के लगभग चार दशक बाद भी टाइटन आज भारत के सबसे सम्मानित और भरोसेमंद ब्रैंडों में शामिल है। यह नवाचार, विश्वास, बेहतरीन डिजाइन और भारतीय उद्यमिता का प्रतीक बन चुका है। लाखों लोगों के लिए टाइटन सिर्फ एक घड़ी का ब्रैंड है।

लेकिन मेरे लिए यह एक खूबसूरत याद, सीखने का शानदार मंच और उस सपने की याद है, जिसे मैंने करीब से बनते हुए देखा और जिसे आकार देने में छोटी-सी भूमिका निभाने का अवसर मिला।

इसी वजह से Made in India: The Titan Story देखना सिर्फ पुरानी यादों में खो जाना नहीं था। यह इस बात की याद दिलाने वाला अनुभव भी था कि जब दूरदर्शी नेता और समर्पित टीमें असंभव दिखने वाले लक्ष्य को हासिल करने का साहस करती हैं, तभी महान ब्रैंड जन्म लेते हैं।

टाइटन ने सिर्फ घड़ियां नहीं बनाईं, बल्कि भारतीय ब्रैंडिंग, मार्केटिंग, डिजाइन और नेतृत्व के लिए एक नया मानदंड स्थापित किया और यही वजह है कि उसकी कहानी आज भी लोगों को प्रेरित करती है।

 

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डॉ. सुभाष चंद्रा और पुनीत गोयनका का बड़ा दांव, क्या FIFA लिखेगा Z की ग्रोथ की नई कहानी?

खेल कारोबार को आगे बढ़ाने के लिए कंपनी ने Unite8 Sports पोर्टफोलियो के तहत चार नए स्पोर्ट्स चैनल भी लॉन्च किए हैं, जिनमें दो हिंदी और दो अंग्रेजी चैनल शामिल हैं।

Last Modified:
Thursday, 11 June, 2026
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कंचन श्रीवास्तव, एक्सचेंज4मीडिया।।

फीफा वर्ल्ड कप (FIFA World Cup 2026) के आगाज के साथ ही मीडिया एवं एंटरटेनमेंट कंपनी जी एंटरटेनमेंट एंटरप्राइजेज लिमिटेड (Z) अपने स्पोर्ट्स बिजनेस को नई दिशा देने की कोशिश में जुटी है। कंपनी ने हाल ही में भारत के जिम्बाब्वे दौरे के विशेष प्रसारण अधिकार हासिल किए हैं। इससे पहले FIFA World Cup 2026 के प्रसारण अधिकार हासिल कर चुकी कंपनी अब फुटबॉल और क्रिकेट दोनों के जरिए अपने स्पोर्ट्स पोर्टफोलियो को मजबूत करने की स्ट्रैटेजी पर काम कर रही है।

डॉ. सुभाष चंद्रा और कंपनी के प्रबंध निदेशक एवं चीफ एग्जिक्यूटिव ऑफिसर पुनीत गोयनका के लिए यह केवल एक खेल प्रसारण नहीं, बल्कि कंपनी की नई कारोबारी स्ट्रैटेजी की महत्वपूर्ण परीक्षा भी माना जा रहा है। कंपनी यह देखना चाहती है कि क्या लाइव स्पोर्ट्स के जरिए वह विज्ञापनदाताओं को आकर्षित कर सकती है, बाजार का भरोसा मजबूत कर सकती है और अपने डिजिटल प्लेटफॉर्म की स्थिति को और बेहतर बना सकती है।

कंपनी का FIFA World Cup 2026 का अधिकार समझौता पहले से ही उसके सबसे बड़े कंटेंट निवेशों में गिना जा रहा था। अब भारत के जिम्बाब्वे दौरे के प्रसारण अधिकार हासिल करने के बाद यह संकेत मिल रहा है कि कंपनी केवल एक वैश्विक फुटबॉल इवेंट तक सीमित नहीं रहना चाहती, बल्कि खेल प्रसारण के क्षेत्र में व्यापक उपस्थिति दर्ज कराने की तैयारी कर रही है।

जिम्बाब्वे क्रिकेट के साथ हुई साझेदारी ने कंपनी के खेल पोर्टफोलियो को और मजबूत किया है। इसके साथ FIFA World Cup 2026 और ILT20 जैसी संपत्तियां भी कंपनी के पास हैं। इससे फुटबॉल और क्रिकेट दोनों में उसकी मौजूदगी बढ़ी है, जो भारत के खेल विज्ञापन बाजार के दो महत्वपूर्ण क्षेत्र माने जाते हैं।

फुटबॉल के जरिए कंपनी युवा, शहरी और प्रीमियम दर्शकों तक पहुंच बनाने की कोशिश कर रही है, जबकि क्रिकेट उसे बड़े दर्शक वर्ग और विज्ञापनदाताओं का भरोसा दिलाने में मदद कर सकता है। उद्योग विशेषज्ञों का मानना है कि यह संयोजन कंपनी को टीवी और डिजिटल दोनों प्लेटफॉर्म पर अधिक संतुलित खेल पेशकश तैयार करने में मदद कर सकता है।

FIFA World Cup 2026 के अधिकार कंपनी ने टूर्नामेंट शुरू होने से केवल 10 दिन पहले अंतिम रूप से हासिल किए थे। लागत को लेकर लंबे समय तक चली बातचीत और भारत में देर रात होने वाले मैचों के कारण कई प्रसारक इस सौदे को लेकर सतर्क थे। इसके बावजूद कंपनी एक दर्जन से अधिक ब्रांड्स को अपने साथ जोड़ने में सफल रही है।

महिंद्रा टूर्नामेंट का को-प्रेजेंटिंग स्पॉन्सर बना है, जबकि डियाजियो को- पावर्ड स्पॉन्सर के रूप में जुड़ा है। इसके अलावा एप्पल, पर्नोड रिकार्ड और मोंडेलेज जैसे प्रमुख ब्रांड भी विभिन्न प्लेटफॉर्म पर इस आयोजन से जुड़े हैं।

खेल कारोबार को आगे बढ़ाने के लिए कंपनी ने Unite8 Sports पोर्टफोलियो के तहत चार नए स्पोर्ट्स चैनल भी लॉन्च किए हैं, जिनमें दो हिंदी और दो अंग्रेजी चैनल शामिल हैं। माना जा रहा है कि FIFA World Cup 2026 इन चैनलों के लिए प्रमुख आकर्षण साबित हो सकता है, जबकि भारत-जिम्बाब्वे सीरीज दर्शकों को क्रिकेट से जुड़ी परिचित सामग्री उपलब्ध कराएगी।

जी एंटरटेनमेंट एंटरप्राइजेज लिमिटेड के चीफ ऑपरेटिंग ऑफिसर (विज्ञापन राजस्व) संदीप मेहरोत्रा ने कहा कि कंपनी को विश्वास है कि FIFA World Cup 2026 देश में खेलों के मुद्रीकरण के नए मानक स्थापित करेगा। उन्होंने कहा कि कंपनी ने अपने लीनियर और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स की क्षमताओं का उपयोग करते हुए विज्ञापनदाताओं के लिए व्यापक अवसर तैयार किए हैं।

हालांकि इंडस्ट्री से जुड़े कई विशेषज्ञों का मानना है कि FIFA से कंपनी को ब्रैंड विजिबिलिटी और प्रीमियम विज्ञापनदाताओं की रुचि तो मिलेगी, लेकिन निकट भविष्य में राजस्व वृद्धि सीमित रह सकती है। उनका कहना है कि भारत में फुटबॉल की लोकप्रियता बढ़ रही है, लेकिन यह अभी भी क्रिकेट के स्तर तक नहीं पहुंची है। कुछ विशेषज्ञों का अनुमान है कि टूर्नामेंट से लगभग 30 से 40 करोड़ रुपये का विज्ञापन राजस्व प्राप्त हो सकता है, हालांकि यह आंकड़ा कंपनी की स्पॉन्सरशिप रणनीति और डिजिटल विस्तार पर भी निर्भर करेगा।

विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि FIFA जैसे बड़े टूर्नामेंटों में सेमीफाइनल और फाइनल मुकाबलों के दौरान विज्ञापनदाताओं की रुचि और निवेश बढ़ता है। इसलिए इस प्रॉपर्टी की वास्तविक व्यावसायिक सफलता का आकलन टूर्नामेंट समाप्त होने के बाद ही किया जा सकेगा।

कंपनी के सामने एक चुनौती यह भी है कि उसे केवल लाइव मैचों पर निर्भर नहीं रहना होगा। प्री-मैच कार्यक्रम, हाइलाइट्स, क्षेत्रीय भाषाओं में प्रसारण, कनेक्टेड टीवी पैकेज, सोशल मीडिया विस्तार और ब्रांड इंटीग्रेशन जैसे क्षेत्रों में भी मजबूत उपस्थिति बनानी होगी।

यह पूरा प्रयास ऐसे समय में हो रहा है जब कंपनी हाल ही में एक चुनौतीपूर्ण वित्तीय तिमाही से गुजरी है। वित्त वर्ष 2025-26 की चौथी तिमाही में कंपनी को 102 करोड़ रुपये का समेकित शुद्ध घाटा हुआ, जबकि पिछले वर्ष की समान अवधि में उसे 188 करोड़ रुपये का लाभ हुआ था। संचालन से प्राप्त राजस्व में भी 7.3 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई और यह 2,024 करोड़ रुपये रहा।

वित्तीय परिणामों के बाद कंपनी के शेयरों में भी गिरावट देखने को मिली। कई विश्लेषकों ने विज्ञापन राजस्व में कमजोरी, बढ़ती प्रतिस्पर्धा और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स की ओर विज्ञापन बजट के बढ़ते झुकाव को प्रमुख कारण बताया।

ऐसे में खेल प्रसारण कंपनी के लिए महत्वपूर्ण अवसर के रूप में देखा जा रहा है। FIFA World Cup 2026, ILT20 और भारत के जिम्बाब्वे दौरे जैसे अधिकार कंपनी को एक मजबूत स्पोर्ट्स पोर्टफोलियो बनाने का अवसर प्रदान कर रहे हैं। हालांकि यह रणनीति कंपनी की चुनौतियों का तत्काल समाधान नहीं है, लेकिन इससे उसे नए दर्शकों, विज्ञापनदाताओं और डिजिटल अवसरों तक पहुंच बनाने का मौका जरूर मिल सकता है।

FIFA World Cup 2026 के साथ Z के सामने अब यह अवसर है कि वह प्रसारण अधिकारों को दर्शकों तक पहुंच, दर्शकों को राजस्व और खेलों को अपनी नई विकास रणनीति का महत्वपूर्ण आधार बना सके।

(यह लेखिका के निजी विचार हैं। मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी कॉपी को आप यहां क्लिक कर पढ़ सकते हैं।)

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