एक तरफ टेलीविजन- जो दशकों से भारतीय घरों का केंद्र रहा है। दूसरी तरफ OTT- जो स्मार्टफोन और स्मार्ट TV की स्क्रीन पर तेजी से छा रहा है।
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Vikas Saxena
एक तरफ टेलीविजन- जो दशकों से भारतीय घरों का केंद्र रहा है। दूसरी तरफ OTT- जो स्मार्टफोन और स्मार्ट TV की स्क्रीन पर तेजी से छा रहा है। 2025-26 में एक ऐतिहासिक बदलाव आया है: पहली बार डिजिटल मीडिया ने टेलीविजन को पीछे छोड़ दिया, विज्ञापन बजट उसी दिशा में मुड़ रहे हैं और T20 वर्ल्डकप 2026 ने इस बदलाव पर मुहर लगा दी।
8 मार्च 2026. अहमदाबाद के नरेंद्र मोदी स्टेडियम में T20 World Cup का फाइनल था- भारत बनाम न्यूजीलैंड। स्टेडियम में एक लाख से ज्यादा दर्शक थे, लेकिन असली तमाशा डिजिटल स्क्रीन पर था। JioHotstar पर उस दिन पीक पर 7.25 करोड़ (72.5 million) लोग एक साथ लाइव स्ट्रीम देख रहे थे- यह दुनिया का अब तक का सबसे बड़ा LIVE स्ट्रीमिंग रिकॉर्ड था, किसी भी डिजिटल प्लेटफॉर्म पर, किसी भी इवेंट के लिए। यह सिर्फ एक क्रिकेट रिकॉर्ड नहीं था। यह भारत के बदलते मीडिया परिदृश्य का सबसे बड़ा सबूत था कि अब स्क्रीन बड़ी नहीं, इंटरनेट कनेक्शन बड़ा है।
बड़ी तस्वीर: 2025 में पलट गई बाजी
FICCI-EY की मार्च 2026 में जारी रिपोर्ट 'Stories, Scale and Impact: Unlocking India's Media and Entertainment Economy' ने साफ कर दिया कि भारत की मीडिया इंडस्ट्री एक बड़े संरचनात्मक बदलाव से गुजर रही है, जो अब वापस नहीं होने वाला।
भारत का मीडिया और एंटरटेनमेंट (M&E) सेक्टर 2025 में 9% बढ़कर ₹2,78,000 करोड़ ($32 billion) तक पहुंच गया, जो देश की nominal GDP per capita growth (7.7%) से भी तेज है। सेक्टर अब देश की GDP में 0.8% योगदान देता है और 27.5 लाख लोगों को सीधे रोजगार देता है। लेकिन इस रिपोर्ट की सबसे बड़ी हेडलाइन यह थी: पहली बार डिजिटल मीडिया ने ₹1,00,000 करोड़ का आंकड़ा पार किया और M&E सेक्टर का सबसे बड़ा सेगमेंट बन गया- टेलीविजन को पीछे छोड़ते हुए।
विज्ञापन बाजार: डिजिटल का दबदबा, TV हो रहा कमजोर
FICCI-EY 2026 रिपोर्ट के मुख्य पॉइंट्स:
कुल मिलाकर, साफ है कि विज्ञापन बाजार तेजी से डिजिटल की तरफ शिफ्ट हो रहा है, जबकि TV की पकड़ धीरे-धीरे कमजोर पड़ रही है।
WPP Media TYNY 2026: ₹2 लाख करोड़ की तरफ
18 फरवरी 2026 को WPP Media (पूर्व GroupM) ने अपनी ताजा TYNY (This Year Next Year) रिपोर्ट जारी की। यह 2026 के लिए भारत का सबसे भरोसेमंद और प्रामाणिक विज्ञापन पूर्वानुमान है। इसमें बताया गया है कि 2026 में भारत का कुल विज्ञापन राजस्व 9.7% बढ़कर ₹2,01,891 करोड़ तक पहुंचने का अनुमान है, यानी पहली बार ₹2 लाख करोड़ का आंकड़ा पार होगा।
तब WPP Media में दक्षिण एशिया के CEO प्रशांत कुमार ने कहा था, “डिजिटल अब विज्ञापन खर्च का लगभग 68% हिस्सा संभाल रहा है। अब यह पूरा इकोसिस्टम सिर्फ इम्प्रेशन्स पर नहीं, बल्कि नतीजों (आउटकम्स) पर आधारित है।”
2026 में किस चैनल में कितनी ग्रोथ: WPP Media का अनुमान:
साफ है कि जहां डिजिटल विज्ञापन तेजी से दो अंकों में बढ़ रहा है, वहीं टेलीविजन की ग्रोथ अब एकल अंक में भी मुश्किल से टिक पा रही है।
टीवी की कहानी: खत्म नहीं, बदल रहा है रूप
FICCI-EY रिपोर्ट में एक अहम बात कही गई है- “टेलीविजन खत्म नहीं हो रहा, बल्कि खुद को बदल रहा है।”
2025 में TV के 74.5 करोड़ वीकली व्युअर्स थे। यह आंकड़ा TV की पहुंच (रीच) को दर्शाता है। लेकिन विज्ञापनदाताओं का भरोसा डगमगा रहा है।
TV का संकट दरअसल दो मोर्चों पर है:
पहला- स्पोर्ट्स कंटेंट का OTT पर पलायन: T20 वर्ल्डकप 2026 के सेमीफाइनल में भारत vs इंग्लैंड मैच को 32 करोड़ से ज्यादा लोगों ने टीवी और डिजिटल मिलाकर देखा, लेकिन इसमें से बड़ा हिस्सा OTT पर था। फाइनल में तो JioHotstar पर 7.25 करोड़ concurrent व्युअर्स- यह linear TV के एकल चैनल के लिए कभी संभव नहीं था।
दूसरा- Connected TV का उभार: FICCI-EY रिपोर्ट के अनुसार Connected TV homes 2025 में बढ़कर लगभग 4 करोड़ वीकली होम्स हो गए- 2024 के 3 करोड़ से 33% की बढ़त। यानी TV स्क्रीन जिंदा है, बस उस पर चल OTT रहा है।
JioStar ने BARC India और Nielsen के साथ मिलकर ICC Men's T20 वर्ल्डकप 2026 के दौरान एक बड़ा cross-screen स्टडी किया। इस स्टडी में सामने आया कि TV और डिजिटल (OTT) विज्ञापन कैंपेन में ऑडियंस का overlap यानी एक ही दर्शक दोनों जगह देखने का प्रतिशत 10% से भी कम था। यानी साफ है कि TV देखने वाले और OTT पर कंटेंट देखने वाले लोग काफी हद तक अलग-अलग हैं।
इसका मतलब यह है कि ब्रैंड्स के लिए सिर्फ एक प्लेटफॉर्म पर फोकस करना काफी नहीं है- बेहतर पहुंच के लिए TV और डिजिटल दोनों पर मौजूद रहना जरूरी है।
OTT का उभार: नंबरों में
FICCI-EY 2026 रिपोर्ट: OTT सेक्टर के ताजा आंकड़े
OTT की तेज रफ्तार जारी
कुल मिलाकर, साफ है कि OTT सेक्टर तेजी से बढ़ रहा है और आने वाले समय में मीडिया इंडस्ट्री का सबसे बड़ा ग्रोथ इंजन बन सकता है।
FAST: नया गेम-चेंजर जो TV और OTT के बीच खड़ा है
इस पूरे बदलाव में एक नया किरदार तेजी से उभर रहा है- FAST (Free Ad-Supported Streaming TV)। FAST यानी वह स्ट्रीमिंग टीवी जो बिल्कुल मुफ्त है, लेकिन बीच-बीच में विज्ञापन दिखाता है- ठीक वैसे जैसे पुराना linear TV करता था, बस अब यह इंटरनेट पर है। Samsung TV Plus, JioTV, MX Player- ये सब FAST के उदाहरण हैं।
Statista के अनुसार भारत में FAST (Free Ad-Supported Streaming TV) मार्केट:
यानी साफ है कि FAST सेगमेंट भी OTT के साथ-साथ तेजी से उभर रहा है और आने वाले समय में विज्ञापन आधारित स्ट्रीमिंग का बड़ा प्लेटफॉर्म बन सकता है।
FAST क्यों इतना important है? क्योंकि यह उस दर्शक तक पहुंचता है जो सब्सक्रिप्शन नहीं दे सकता या नहीं देना चाहता, लेकिन विज्ञापन देखने को तैयार है। यह विज्ञापनदाताओं के लिए एक नई, कॉस्ट-इफैक्टिव इनवेंट्री (cost-effective inventory) है।
CTV: जहां TV और OTT मिलते हैं
Connected TV (CTV) यानी स्मार्ट टीवी पर OTT देखना, एक ऐसा प्लेटफॉर्म बन गया है जो विज्ञापनदाताओं को TV की बड़ी स्क्रीन और OTT की सटीक टार्गेटिंग- दोनों का फायदा एक साथ देता है।
WPP Media के अनुसार, साल 2025 में भारत में CTV वाले घरों की संख्या 6.5 करोड़ से ज्यादा हो चुकी है, जो देश के कुल TV घरों का करीब 30% है। यानी अब CTV इतना बड़ा हो गया है कि इसे नजरअंदाज करना किसी भी ब्रैंड के लिए मुश्किल है।
CTV विज्ञापन की खासियतें:
कुल मिलाकर, CTV विज्ञापन TV की रीच और डिजिटल की precision (जहां किसी खास तरह के लोगों को ही टार्गेट किया जाता) दोनों का बेहतरीन कॉम्बिनेशन देता है।
WPP Media TYNY 2026 रिपोर्ट में TV की 3.1% growth की वजह सिर्फ CTV और addressable TV बताई गई है। यानी जो TV बचा हुआ है, वह CTV की बदौलत बचा हुआ है।
T20 World Cup 2026 के दौरान JioHotstar पर CTV viewership में उल्लेखनीय उछाल देखा गया- बड़ी स्क्रीन पर live cricket देखने की आदत तेजी से बन रही है। यह विज्ञापनदाताओं के लिए प्रीमियम इनवेंट्री है।
2026 की नई ताकत: कॉमर्स + AI + OTT
WPP Media की TYNY 2026 रिपोर्ट के अनुसार, अब विज्ञापन का भविष्य सिर्फ डिजिटल नहीं, बल्कि कॉमर्स-आधारित डिजिटल बनता जा रहा है।
कॉमर्स-आधारित विज्ञापन 2026 में सबसे तेज़ बढ़ने वाला सेगमेंट बन गया है, जिसमें करीब 24.2% की ग्रोथ का अनुमान है। इसमें क्विक कॉमर्स (जैसे Blinkit, Zepto, Instamart), रिटेल मीडिया और सोशल कॉमर्स मिलकर एक नया एडवर्टाइजिंग इकोसिस्टम तैयार कर रहे हैं।
WPP Media के COO अश्विन पदम्नाभन का कहना है कि “2026 का विज्ञापन बाजार अब सिर्फ रीच पर नहीं, बल्कि outcome (नतीजे) और intelligence (डेटा की समझ) पर आधारित होगा। क्विक कॉमर्स अब सिर्फ डिलीवरी प्लेटफॉर्म नहीं रहा, बल्कि एक मजबूत मीडिया चैनल बन चुका है।”
इसके साथ ही AI की भूमिका भी तेजी से बढ़ रही है। AI-पावर्ड सर्च, वॉयस और नई तरह की खोज (agentic discovery) मिलकर करीब 8% ग्रोथ दे सकते हैं।
OTT प्लेटफॉर्म्स भी AI का इस्तेमाल कर रहे हैं, जिससे अब दर्शकों को hyper-personalized ads दिखाए जा रहे हैं, यानी सही समय पर, सही व्यक्ति को, सही कंटेंट के बीच में विज्ञापन।
कुल मिलाकर, 2026 में विज्ञापन की दुनिया में कॉमर्स, AI और OTT का कॉम्बिनेशन सबसे बड़ा गेमचेंजर बनकर उभर रहा है।
2028 तक का रोडमैप
FICCI-EY 2026 रिपोर्ट का अनुमान:

WPP Media के अनुसार 2026 में भारत का कुल विज्ञापन बाजर ₹2,01,891 करोड़ का होगा, जिसमें डिजिटल की हिस्सेदारी 68.1% होगी।
चुनौतियां जो अभी बाकी हैं
चुनौतियां: जहां इंडस्ट्री अभी जूझ रही है
मेजरमेंट की समस्या:
अभी तक ऐसा कोई एक कॉमन सिस्टम नहीं है, जो Linear TV और OTT—दोनों को एक साथ सही तरीके से माप सके। TV के लिए BARC India का डेटा है, जबकि OTT प्लेटफॉर्म्स अपने-अपने अलग मेट्रिक्स इस्तेमाल करते हैं। जब तक यह गैप खत्म नहीं होता, मीडिया प्लानिंग अलग-अलग ही बनी रहेगी।
Fragmentation (बिखराव):
भारत में 50 से ज्यादा OTT प्लेटफॉर्म्स हैं। ऐसे में ब्रैंड्स के लिए यह तय करना मुश्किल हो जाता है कि उनकी असली ऑडियंस कहाँ है और बजट कहाँ खर्च करें। इससे विज्ञापन और ज्यादा महंगा और जटिल हो जाता है।
CTV CPMs (महंगी विज्ञापन दरें):
Connected TV पर विज्ञापन की लागत (CPM) अभी काफी ज्यादा है—कभी-कभी IPL जैसे बड़े इवेंट के बराबर। छोटे और मझोले ब्रैंड्स के लिए यह एक बड़ी रुकावट बनती है।
Content की बढ़ती लागत:
OTT प्लेटफॉर्म्स को अच्छा और प्रीमियम कंटेंट बनाने के लिए भारी निवेश करना पड़ता है। JioStar का ₹33,000 करोड़ का कंटेंट बजट इसका बड़ा उदाहरण है। लेकिन इस लागत को सब्सक्रिप्शन और विज्ञापन से निकालना अभी भी चुनौती बना हुआ है।
स्क्रीन वही है, सोच बदल गई है
ICC Men's T20 World Cup 2026 के फाइनल में करीब 7.25 करोड़ लोगों ने एक साथ JioHotstar पर मैच देखा। कुछ अनौपचारिक आंकड़ों के मुताबिक यह संख्या 82 करोड़ तक भी बताई जा रही है। यह सिर्फ क्रिकेट का उत्साह नहीं था, बल्कि OTT की ताकत का बड़ा उदाहरण था।
FICCI-EY रिपोर्ट इसे “point of no return” कहती है, यानी अब वापसी का रास्ता नहीं है। डिजिटल मीडिया ने टीवी को न सिर्फ रेवेन्यू और विज्ञापन में, बल्कि अब एंगेजमेंट में भी पीछे छोड़ दिया है। लेकिन एक अहम सच्चाई यह भी है कि TV खत्म नहीं हुआ है- बस उस पर OTT आ गया है।
CTV का बढ़ता यूज़र बेस, JioStar जैसे प्लेटफॉर्म्स की linear + digital रणनीति, और WPP Media का यह आंकड़ा कि TV और डिजिटल की ऑडियंस में overlap 10% से भी कम है, ये सब दिखाता है कि दोनों प्लेटफॉर्म एक-दूसरे के विकल्प नहीं, बल्कि पूरक हैं।
लिहाजा, ये कहना गलत नहीं होगा कि जो ब्रैंड इस “AND” को समझेगा, यानी TV और OTT, FAST और सब्सक्रिप्शन, मोबाइल और CTV, वही 2026 और आगे के विज्ञापन दौर में असली विजेता बनेगा।
आउटडोर विज्ञापन क्षेत्र की कंपनी Bright Outdoor Media Ltd को अपने शेयरधारकों से बड़ी मंजूरी मिल गई है। कंपनी अब BSE के SME प्लेटफॉर्म से निकलकर BSE के मेन बोर्ड पर सूचीबद्ध (लिस्ट) होगी।
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Vikas Saxena
आउटडोर विज्ञापन क्षेत्र की कंपनी Bright Outdoor Media Ltd को अपने शेयरधारकों से बड़ी मंजूरी मिल गई है। कंपनी अब BSE के SME प्लेटफॉर्म से निकलकर BSE के मेन बोर्ड पर सूचीबद्ध (लिस्ट) होगी। इसके साथ ही कंपनी के शेयर नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) के मेन बोर्ड पर भी सूचीबद्ध किए जाएंगे।
कंपनी ने बताया कि यह मंजूरी पोस्टल बैलेट के जरिए कराई गई वोटिंग में मिली। रिमोट ई-वोटिंग 17 जून 2026 से 16 जुलाई 2026 तक चली और इसके नतीजे 17 जुलाई 2026 को घोषित किए गए। कंपनी का कहना है कि मेन बोर्ड पर लिस्टिंग उसके विकास की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, जिससे उसे बड़े निवेशकों तक पहुंच बनाने और पूंजी बाजार में अपनी स्थिति मजबूत करने में मदद मिलेगी।
कंपनी ने 12 जून 2026 को शेयरधारकों के पास पोस्टल बैलेट नोटिस भेजकर दो प्रस्तावों पर मंजूरी मांगी थी। वोटिंग की पूरी प्रक्रिया Bigshare Services Pvt. Ltd. ने संचालित की, जबकि CS Nikunj Kanabar & Associates ने स्क्रूटिनाइजर के रूप में वोटों की जांच की और पुष्टि की कि पूरी प्रक्रिया सेबी के नियमों के अनुरूप हुई।
मेन बोर्ड पर लिस्टिंग को मिली 100 फीसदी मंजूरी
कंपनी के शेयरों को BSE SME प्लेटफॉर्म से BSE और NSE के मेन बोर्ड पर स्थानांतरित करने के प्रस्ताव को सार्वजनिक (पब्लिक) शेयरधारकों का 100 फीसदी समर्थन मिला। इस प्रस्ताव के पक्ष में कुल 2,11,500 वोट पड़े, जबकि विरोध में एक भी वोट नहीं पड़ा।
सेबी के नियमों के अनुसार इस प्रस्ताव पर प्रमोटर और प्रमोटर ग्रुप ने मतदान में हिस्सा नहीं लिया। आवश्यक बहुमत मिलने के बाद यह प्रस्ताव पारित हो गया।
स्वतंत्र निदेशक की नियुक्ति की भी मंजूरी
शेयरधारकों ने काजल ए. अवलानी को कंपनी का स्वतंत्र निदेशक (Independent Director) नियुक्त करने के प्रस्ताव को भी मंजूरी दे दी।
इस प्रस्ताव के पक्ष में कुल 1,54,66,834 वोट पड़े और इसके विरोध में कोई वोट नहीं आया। प्रमोटर और पब्लिक, दोनों श्रेणियों के सभी वोट इस प्रस्ताव के समर्थन में रहे, जिसके चलते यह भी आवश्यक बहुमत से पारित हो गया।
स्क्रूटिनाइजर की रिपोर्ट में पुष्टि की गई है कि दोनों प्रस्ताव नियमानुसार आवश्यक बहुमत से पारित हुए हैं।
अब कंपनी BSE और NSE के मेन बोर्ड पर लिस्टिंग से जुड़ी सभी औपचारिक प्रक्रियाएं पूरी करेगी। मेन बोर्ड पर सूचीबद्ध होने के बाद कंपनी को अधिक निवेशकों तक पहुंच, बेहतर कारोबारिक पहचान और पूंजी जुटाने के नए अवसर मिलने की उम्मीद है।
प्रसार भारती अब अपनी जमीन और परिसंपत्तियों से कमाई बढ़ाने की दिशा में एक और बड़ा कदम उठा रहा है।
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Samachar4media Bureau
प्रसार भारती अब अपनी जमीन और परिसंपत्तियों से कमाई बढ़ाने की दिशा में एक और बड़ा कदम उठा रहा है। इसी कड़ी में प्रसार भारती ने आकाशवाणी पटना और दूरदर्शन केंद्र श्री विजयापुरम (पोर्ट ब्लेयर) में डिजिटल आउटडोर विज्ञापन ढांचा विकसित करने और उसका संचालन करने के लिए निजी कंपनियों से एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट (EOI) आमंत्रित किए हैं।
इन दोनों परियोजनाओं के तहत चुनी गई निजी एजेंसियां अपनी लागत पर LED यूनीपोल (डिजिटल होर्डिंग) लगाएंगी, उनका संचालन और रखरखाव करेंगी। इसके बदले उन्हें विज्ञापनों से होने वाली आय का एक हिस्सा प्रसार भारती के साथ साझा करना होगा।
प्रसार भारती ने यह भी स्पष्ट किया है कि सभी LED डिस्प्ले पर उपलब्ध कुल विज्ञापन समय का 33 प्रतिशत हिस्सा सरकार और प्रसार भारती के जनहित अभियानों के लिए मुफ्त उपलब्ध कराना होगा।
दोनों परियोजनाओं के लिए आवेदन जमा करने की अंतिम तिथि 22 जुलाई तय की गई है।
आकाशवाणी पटना परियोजना के तहत बिहार के फ्रेजर रोड स्थित परिसर में LED यूनीपोल लगाए जाएंगे। यह समझौता शुरुआत में पांच साल के लिए होगा, जिसे जरूरत पड़ने पर अगले पांच साल तक बढ़ाया जा सकता है। अनुबंध अवधि पूरी होने के बाद पूरे डिजिटल ढांचे का स्वामित्व प्रसार भारती को सौंप दिया जाएगा।
वहीं, पोर्ट ब्लेयर में दूरदर्शन केंद्र श्री विजयापुरम के डेलानीपुर परिसर में भी इसी मॉडल पर LED यूनीपोल लगाए जाएंगे। यहां भी निजी कंपनी विज्ञापनों के जरिए व्यावसायिक उपयोग करेगी और तय शर्तों के अनुसार राजस्व का हिस्सा प्रसार भारती को देगी।
प्रसार भारती के अनुसार, चयनित एजेंसियों को साइट सर्वे, डिजाइन तैयार करना, सभी सरकारी मंजूरियां लेना, बिजली कनेक्शन की व्यवस्था करना, LED स्क्रीन लगाना, विज्ञापनों का संचालन करना और पूरे अनुबंध के दौरान रखरखाव की जिम्मेदारी निभानी होगी।
इसके अलावा कंपनियों को प्रसार भारती की विज्ञापन नीति, स्थानीय निकायों के नियम, ट्रैफिक और हाईवे से जुड़े मानकों, सुरक्षा प्रमाणपत्रों और पर्यावरण संबंधी नियमों का भी पालन करना होगा। प्रसार भारती ने साफ किया है कि अनुबंध अवधि के दौरान यदि होर्डिंग को कोई नुकसान, चोरी या अन्य बाधा होती है तो उसकी जिम्मेदारी प्रसार भारती की नहीं होगी।
तकनीकी मानकों के अनुसार, लगाए जाने वाले LED डिस्प्ले हाई-ब्राइटनेस फुल-कलर स्क्रीन होंगे, जिनकी न्यूनतम सेवा अवधि 1 लाख घंटे होगी। इनमें रिमोट के जरिए विज्ञापन सामग्री को अपडेट और मैनेज करने की सुविधा भी होगी।
यह पहल प्रसार भारती की उस रणनीति का हिस्सा है, जिसके तहत वह पारंपरिक प्रसारण के अलावा नए राजस्व स्रोत विकसित करना चाहता है। पिछले कुछ वर्षों में सार्वजनिक प्रसारक डिजिटल बिलबोर्ड, इंफ्रास्ट्रक्चर साझेदारी और अपनी रियल एस्टेट परिसंपत्तियों के व्यावसायिक उपयोग पर लगातार जोर दे रहा है।
माना जा रहा है कि डिजिटल आउट-ऑफ-होम (DOOH) विज्ञापन बाजार की बढ़ती मांग को देखते हुए प्रसार भारती का यह कदम भविष्य में उसकी आय बढ़ाने के साथ-साथ विज्ञापनदाताओं के लिए भी नए अवसर उपलब्ध कराएगा।
FIFA World Cup 2026 के दौरान पारंपरिक (Linear) टीवी पर विज्ञापनों की संख्या पिछले विश्व कप के मुकाबले कम रही, जबकि Connected TV (CTV) पर विज्ञापन देने वाली कंपनियों और ब्रैंड्स की संख्या बढ़ी।
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Samachar4media Bureau
FIFA World Cup 2026 के दौरान पारंपरिक (Linear) टीवी पर विज्ञापनों की संख्या पिछले विश्व कप के मुकाबले कम रही, जबकि Connected TV (CTV) पर विज्ञापन देने वाली कंपनियों और ब्रैंड्स की संख्या बढ़ी। यह जानकारी TAM Sports की नई रिपोर्ट में सामने आई है, जिसमें टूर्नामेंट के पहले 62 लाइव मैचों के दौरान दिखाए गए विज्ञापनों का विश्लेषण किया गया।
रिपोर्ट के मुताबिक, FIFA World Cup 2022 की तुलना में इस बार Linear TV पर विज्ञापनों की संख्या 14% घट गई। TAM Sports का कहना है कि इसकी एक बड़ी वजह टूर्नामेंट का अमेरिका में आयोजित होना हो सकती है। भारत और अमेरिका के बीच करीब 10 घंटे 30 मिनट का समय अंतर है, जबकि 2022 में मेजबान कतर के साथ यह अंतर केवल करीब ढाई घंटे था। समय का बड़ा अंतर होने के कारण भारत में कई मैच ऐसे समय पर खेले गए, जब दर्शकों की संख्या अपेक्षाकृत कम रहती है, जिसका असर विज्ञापनों पर भी पड़ा।
रिपोर्ट में सात टीवी चैनलों और चार Connected TV भाषा फीड्स पर मैचों के दौरान ब्रेक में दिखाए गए विज्ञापनों का अध्ययन किया गया। इसमें प्री-मैच, हाफ-टाइम विश्लेषण, पोस्ट-मैच कार्यक्रम, प्रोमो और ट्रेलर को शामिल नहीं किया गया।
रिपोर्ट के अनुसार, जहां Linear TV पर विज्ञापन देने वाले सेक्टर और कंपनियां सीमित रहीं, वहीं Connected TV पर कहीं अधिक विविधता देखने को मिली।
CTV पर 10 से ज्यादा विज्ञापन श्रेणियां थीं, जबकि Linear TV पर यह संख्या 5 से कुछ अधिक रही। इसी तरह CTV पर 15 से ज्यादा विज्ञापनदाता और 18 से ज्यादा ब्रैंड्स नजर आए, जबकि Linear TV पर क्रमशः 10 से ज्यादा विज्ञापनदाता और 15 से ज्यादा ब्रैंड्स ही सक्रिय रहे।
Linear TV पर सबसे ज्यादा विज्ञापन शराब से जुड़े ब्रैंड्स के रहे, जिनकी हिस्सेदारी 40% रही। इसके बाद कार कंपनियों का हिस्सा 36% रहा। रिटेल ज्वेलर्स ने 7%, जबकि टूथपेस्ट और परफ्यूम/डियोडोरेंट ब्रैंड्स ने 5-5% हिस्सेदारी दर्ज की।
यानी केवल पांच प्रमुख श्रेणियों ने Linear TV के कुल विज्ञापनों का 93% हिस्सा अपने नाम किया। इससे साफ है कि पारंपरिक टीवी पर विज्ञापन कुछ चुनिंदा सेक्टरों तक ही सीमित रहे।
CTV पर विज्ञापनों में दिखी ज्यादा विविधता
Connected TV पर तस्वीर अलग रही। यहां कार कंपनियां सबसे आगे रहीं और उनकी हिस्सेदारी 25% रही। इसके बाद सॉफ्ट ड्रिंक्स (12%), रिटेल ज्वेलर्स (11%), शराब (5%) और लगेज (4%) का स्थान रहा।
यहां शीर्ष पांच श्रेणियों की कुल हिस्सेदारी 57% रही, जिससे पता चलता है कि CTV पर कई अलग-अलग उद्योगों ने विज्ञापन दिए।
Linear TV पर United Spirits सबसे बड़ा विज्ञापनदाता रहा, जिसकी हिस्सेदारी 40% रही। इसके बाद Mahindra & Mahindra का 31% हिस्सा रहा। Maruti Suzuki India, Kalyan Jewellers India और Vicco Laboratories भी प्रमुख विज्ञापनदाताओं में शामिल रहे।
वहीं Connected TV पर Mahindra & Mahindra पहले स्थान पर रही, जिसकी हिस्सेदारी 23% रही। इसके बाद United Spirits (17%), Kalyan Jewellers India (7%), Pernod Ricard India और Girnar Food & Beverages रहे।
Linear TV पर Black Dog Soda सबसे ज्यादा विज्ञापन देने वाला ब्रैंड रहा। इसके बाद Mahindra Thar Roxx, Mahindra XEV 9E, Johnnie Walker Luxe Blended Water और Mahindra BE 6 का स्थान रहा।
वहीं Connected TV पर Black & White Non-Alcoholic Carbonated Beverages सबसे आगे रहा। इसके बाद Mahindra Thar Roxx, Mahindra XEV 9E, Candere by Kalyan Jewellers और Mahindra BE 6 प्रमुख ब्रैंड्स रहे।
रिपोर्ट की एक खास बात यह भी रही कि Linear TV पर कोई भी ऐसा सेक्टर या विज्ञापनदाता नहीं मिला जो केवल वहीं विज्ञापन दे रहा हो। इसके उलट Connected TV पर पांच नई विज्ञापन श्रेणियां और चार ऐसे विज्ञापनदाता मिले, जिन्होंने केवल CTV पर विज्ञापन दिए।
इनमें सॉफ्ट ड्रिंक्स, लगेज, ई-लर्निंग, विटामिन और हेल्थ सप्लीमेंट्स तथा कॉर्पोरेट ब्रैंड कैंपेन जैसी श्रेणियां शामिल थीं। वहीं Pernod Ricard India, Eduauraa Technologies, Naturell India और Adidas जैसे विज्ञापनदाता केवल CTV पर सक्रिय रहे।
TAM Sports का निष्कर्ष है कि बड़े खेल आयोजनों के दौरान पारंपरिक टीवी अभी भी कुछ बड़े विज्ञापनदाताओं पर काफी हद तक निर्भर है। वहीं Connected TV तेजी से ऐसा मंच बनता जा रहा है, जहां अलग-अलग उद्योगों, कंपनियों और ब्रैंड्स को विज्ञापन देने का बेहतर मौका मिल रहा है। यही वजह है कि CTV पर विज्ञापनदाताओं और ब्रैंड्स की विविधता लगातार बढ़ रही है।
इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री अश्विनी वैष्णव ने कथित तौर पर मंत्रालय के अधिकारियों को Meta के प्रतिनिधियों को तलब करने के निर्देश दिए हैं।
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Samachar4media Bureau
इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री अश्विनी वैष्णव ने कथित तौर पर मंत्रालय के अधिकारियों को Meta के प्रतिनिधियों को तलब करने के निर्देश दिए हैं। यह कदम उन आरोपों के बाद उठाया गया है, जिनमें कहा गया है कि Instagram पर बाल यौन शोषण (Child Sexual Abuse Material) से जुड़े विज्ञापन दिखाए गए।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, सरकार Meta से इस मामले में विस्तृत जवाब मांगेगी। कंपनी से पूछा जाएगा कि ऐसे विज्ञापनों को उसके प्लेटफॉर्म पर कैसे मंजूरी मिली और भविष्य में इस तरह की सामग्री को रोकने के लिए उसने क्या सुरक्षा व्यवस्था की है। Meta, Facebook, Instagram और WhatsApp की मूल कंपनी है।
बताया जा रहा है कि मंत्रालय के अधिकारी Meta से यह भी जानना चाहेंगे कि कंपनी आपत्तिजनक कंटेंट की पहचान करने और उसे हटाने के लिए किन तकनीकों और प्रक्रियाओं का इस्तेमाल करती है। साथ ही कंटेंट मॉडरेशन सिस्टम को और मजबूत बनाने के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं।
यह मामला BBC की एक जांच रिपोर्ट सामने आने के बाद गरमाया है। रिपोर्ट में दावा किया गया कि भारत में Instagram पर ऐसे विज्ञापन दिखाई दिए, जिनमें बाल यौन शोषण से जुड़ी सामग्री का प्रचार किया जा रहा था। रिपोर्ट के अनुसार, इन विज्ञापनों में "rape video" और "child video" जैसे बेहद आपत्तिजनक कैप्शन लिखे थे। इन पर क्लिक करने के बाद यूजर्स को Telegram के ऐसे चैनलों पर भेजा जाता था, जहां कथित तौर पर अवैध सामग्री मात्र 99 रुपये में उपलब्ध कराने का दावा किया जा रहा था।
मामले पर प्रतिक्रिया देते हुए Meta के एक प्रवक्ता ने कहा कि कंपनी की बाल यौन शोषण से जुड़ी किसी भी सामग्री को लेकर "जीरो टॉलरेंस" नीति है। उन्होंने कहा कि Meta उन्नत आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) सिस्टम की मदद से इस तरह की सामग्री की पहचान कर उसे सक्रिय रूप से हटाने का काम करती है। हालांकि, उन्होंने यह भी माना कि दुनिया भर में कुछ लोग लगातार प्लेटफॉर्म की निगरानी व्यवस्था से बचने की कोशिश करते रहते हैं, जिससे ऐसी चुनौतियां बनी रहती हैं।
फिलहाल सरकार Meta के जवाब का इंतजार कर रही है। माना जा रहा है कि इस मामले में कंपनी से जवाब मिलने के बाद आगे की कार्रवाई पर फैसला लिया जाएगा।
भारतीय टेलीविजन इंडस्ट्री इस साल के त्योहारी सीजन से पहले बड़ी अनिश्चितता का सामना कर रही है। इसकी वजह ब्रॉडकास्ट ऑडियंस रिसर्च काउंसिल (BARC) की टीवी रेटिंग्स पर लगी रोक है।
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Samachar4media Bureau
इमरान फजल, असिसटेंट एडिटर, एक्सचेंज4मीडिया ।।
भारतीय टेलीविजन इंडस्ट्री इस साल के त्योहारी सीजन से पहले बड़ी अनिश्चितता का सामना कर रही है। इसकी वजह ब्रॉडकास्ट ऑडियंस रिसर्च काउंसिल (BARC) की टीवी रेटिंग्स पर लगी रोक है। इंडस्ट्री से जुड़े लोगों का मानना है कि इससे मीडिया प्लानिंग पर असर पड़ सकता है, ठीक ऐसे समय जब टीवी चैनल अपने बड़े शो लॉन्च करने की तैयारी में हैं और विज्ञापनदाता त्योहारों के लिए अपने विज्ञापन बजट को अंतिम रूप दे रहे हैं।
सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय (MIB) ने BARC को निर्देश दिया है कि वह नई टेलीविजन रेटिंग एजेंसी नीति के तहत लाइसेंस रिन्यू होने तक किसी भी टीवी रेटिंग का प्रकाशन न करे। इस फैसले के बाद ब्रॉडकास्टर्स, विज्ञापनदाताओं और मीडिया एजेंसियों के पास दर्शकों की संख्या मापने का सबसे बड़ा और भरोसेमंद पैमाना फिलहाल उपलब्ध नहीं है।
इंडस्ट्री के जानकारों का कहना है कि इस फैसले का समय बेहद संवेदनशील है। जुलाई से सितंबर का समय आमतौर पर त्योहारी सीजन की मीडिया प्लानिंग का होता है। इसी दौरान कंपनियां गणेश चतुर्थी, ओणम, नवरात्रि, दुर्गा पूजा, दशहरा, दिवाली और साल के आखिर में होने वाली खरीदारी के सीजन के लिए अपने विज्ञापन बजट तय करती हैं। दूसरी ओर, टीवी नेटवर्क भी इसी समय नए फिक्शन शो, रियलिटी शो और बड़े एंटरटेनमेंट कार्यक्रम लॉन्च करते हैं ताकि त्योहारों के दौरान ज्यादा से ज्यादा दर्शकों को आकर्षित किया जा सके।
इंडस्ट्री का मानना है कि अगर दर्शकों के आंकड़े उपलब्ध नहीं होंगे तो विज्ञापनदाता डिजिटल प्लेटफॉर्म की ओर ज्यादा झुक सकते हैं, क्योंकि वहां उन्हें रियल-टाइम डेटा और कैंपेन की पूरी रिपोर्ट मिलती रहती है।
एक प्रमुख मीडिया एजेंसी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) ने कहा कि त्योहारी तिमाही में टीवी पर सबसे ज्यादा विज्ञापन खर्च होता है, क्योंकि इसी दौरान नए शो और बड़े एंटरटेनमेंट प्रोग्राम शुरू होते हैं। लेकिन विज्ञापनदाता यह भी चाहते हैं कि उनके निवेश का सही आकलन हो सके। अगर यह भरोसा खत्म होता है तो बजट खत्म नहीं होगा, बल्कि ऐसे प्लेटफॉर्म पर चला जाएगा जहां प्रदर्शन को मापा जा सकता है।
टीवी इंडस्ट्री के सबसे बड़े विज्ञापन सीजन पर संकट
त्योहारी सीजन टीवी चैनलों के लिए साल का सबसे महत्वपूर्ण कारोबारी समय माना जाता है। इसी दौरान मनोरंजन, समाचार, फिल्म और क्षेत्रीय चैनलों की आय का बड़ा हिस्सा विज्ञापनों से आता है।
एफएमसीजी कंपनियां, ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म, ऑटोमोबाइल कंपनियां, इलेक्ट्रॉनिक्स और स्मार्टफोन ब्रांड, ज्वेलरी रिटेलर, वित्तीय सेवा कंपनियां और क्विक-कॉमर्स प्लेटफॉर्म इस दौरान बड़े स्तर पर विज्ञापन अभियान चलाते हैं क्योंकि त्योहारों में उपभोक्ताओं की खरीदारी बढ़ जाती है।
इसी समय टीवी चैनल भी अपने सबसे बड़े शो लॉन्च करते हैं। आने वाले हफ्तों में कई जनरल एंटरटेनमेंट चैनल नए फिक्शन शो शुरू करने वाले हैं, जबकि हिंदी और क्षेत्रीय बाजारों में बड़े रियलिटी शो और विशेष त्योहारी कार्यक्रम भी लॉन्च किए जाएंगे।
आमतौर पर BARC की साप्ताहिक रेटिंग्स से चैनलों को तुरंत पता चल जाता है कि नया शो कैसा प्रदर्शन कर रहा है। इसी आधार पर विज्ञापन दरें तय होती हैं और कंपनियां अपने विज्ञापन बजट में बदलाव करती हैं। लेकिन मौजूदा रेटिंग्स फ्रीज के कारण यह पूरी प्रक्रिया प्रभावित हो गई है।
एक बड़ी एफएमसीजी कंपनी के मार्केटिंग अधिकारी का कहना है कि हर नए शो की पहचान उसकी रेटिंग से बनती है। स्वतंत्र ऑडियंस डेटा के बिना यह साबित करना मुश्किल हो जाता है कि शो कितने लोगों तक पहुंच रहा है और उस पर ज्यादा विज्ञापन दर क्यों ली जाए।
विज्ञापनदाता चाहते हैं साफ और मापने योग्य नतीजे
यह रेटिंग्स फ्रीज ऐसे समय आया है जब कंपनियां अपने मार्केटिंग खर्च का स्पष्ट परिणाम देखना चाहती हैं।
डिजिटल प्लेटफॉर्म विज्ञापनदाताओं को तुरंत जानकारी देते हैं कि उनके विज्ञापन कितने लोगों ने देखे, कितने क्लिक मिले, कितने लोगों ने खरीदारी की और विज्ञापन पर खर्च का कितना फायदा हुआ।
मीडिया एजेंसियों का मानना है कि अगर टीवी लंबे समय तक बिना रेटिंग्स के रहा तो डिजिटल प्लेटफॉर्म की बढ़त और मजबूत हो सकती है।
एक वैश्विक मीडिया बाइंग एजेंसी के अधिकारी ने कहा कि मार्केटिंग बजट सीमित होता है। अगर एक माध्यम अपने प्रदर्शन का डेटा नहीं दे पा रहा है और दूसरा लगातार विस्तृत रिपोर्ट दे रहा है तो कंपनियां स्वाभाविक रूप से अपना अतिरिक्त बजट उसी माध्यम में लगाएंगी।
इंडस्ट्री का मानना है कि अगर यह स्थिति लंबी चली तो Meta और Google जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म, कनेक्टेड टीवी, ऑनलाइन वीडियो और रिटेल मीडिया प्लेटफॉर्म को सबसे ज्यादा फायदा हो सकता है। पिछले कुछ वर्षों में भी कई कंपनियां सोशल मीडिया और स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म की बढ़ती लोकप्रियता के कारण डिजिटल विज्ञापनों पर खर्च बढ़ा चुकी हैं।
ब्रॉडकास्टर्स की मोलभाव करने की ताकत होगी कमजोर
टीवी चैनलों के लिए रेटिंग्स सिर्फ साप्ताहिक रिपोर्ट कार्ड नहीं होती, बल्कि विज्ञापन दरें तय करने, स्पॉन्सरशिप, इन्वेंट्री की कीमत और लंबे समय की मीडिया प्लानिंग का आधार भी होती हैं।
नई रेटिंग्स नहीं मिलने से अब विज्ञापन दरें तय करने में पुराने आंकड़ों, चैनलों के अपने डेटा और अनुमान का सहारा लेना पड़ेगा।
एक वरिष्ठ ब्रॉडकास्टर ने कहा कि टेलीविजन हमेशा स्वतंत्र रेटिंग्स के दम पर अपनी विश्वसनीयता साबित करता रहा है। जब यही पैमाना उपलब्ध नहीं होगा तो व्यावसायिक बातचीत पहले से ज्यादा कठिन हो जाएगी।
मीडिया एजेंसियों का कहना है कि फिलहाल पुराने रेटिंग्स डेटा का इस्तेमाल किया जा सकता है, लेकिन नए शो आने के बाद पुराने आंकड़े ज्यादा उपयोगी नहीं रहेंगे।
सबसे ज्यादा परेशानी नए शो को होगी, क्योंकि उनके पास दर्शकों की संख्या साबित करने के लिए कोई ताजा डेटा ही नहीं होगा। एक एजेंसी अधिकारी ने कहा कि नए शो के लिए रेटिंग्स सबसे ज्यादा जरूरी होती हैं, क्योंकि विज्ञापनदाता बड़ा बजट लगाने से पहले उसके प्रदर्शन का प्रमाण चाहते हैं।
मीडिया प्लानिंग भी होगी प्रभावित
कई बड़ी कंपनियां हर सप्ताह रेटिंग्स के आधार पर अपने विज्ञापन अलग-अलग चैनलों और कार्यक्रमों में शिफ्ट करती हैं। लेकिन नए डेटा के बिना ऐसा करना मुश्किल हो जाएगा।
मीडिया प्लानर्स का कहना है कि जब तक स्थिति स्पष्ट नहीं होती, कई विज्ञापनदाता टीवी पर नए विज्ञापन अभियान शुरू करने में सावधानी बरत सकते हैं।
एक मीडिया निवेश विशेषज्ञ ने कहा कि अगर अनिश्चितता लंबे समय तक बनी रही तो कई ब्रांड अपना अतिरिक्त और लचीला बजट डिजिटल प्लेटफॉर्म पर खर्च करना शुरू कर सकते हैं, जहां विज्ञापन अभियान को लगातार बेहतर बनाया जा सकता है।
पूरे टीवी इकोसिस्टम पर पड़ेगा असर
इसका असर सिर्फ टीवी चैनलों तक सीमित नहीं रहेगा। नए शो बनाने वाले प्रोडक्शन हाउस रेटिंग्स के आधार पर अपने कार्यक्रम की सफलता साबित करते हैं और अगला सीजन हासिल करते हैं। डिस्ट्रीब्यूशन कंपनियां चैनलों की प्लेसमेंट तय करने में रेटिंग्स का इस्तेमाल करती हैं। विज्ञापन एजेंसियां अपने अभियान की सफलता मापती हैं और कंपनियां निवेश पर मिलने वाले रिटर्न का आकलन करती हैं।
इंडस्ट्री के विशेषज्ञों का कहना है कि अगर यह स्थिति लंबे समय तक बनी रही तो ऐसे समय में टीवी की प्रतिस्पर्धी स्थिति कमजोर हो सकती है, जब दर्शकों का एक बड़ा वर्ग पहले ही डिजिटल प्लेटफॉर्म की ओर बढ़ रहा है।
हालांकि भारत में लाइव इवेंट, मनोरंजन और क्षेत्रीय कंटेंट के मामले में टीवी की पहुंच अब भी सबसे ज्यादा है, लेकिन बेहतर टारगेटिंग और विस्तृत डेटा के कारण डिजिटल प्लेटफॉर्म लगातार अपनी हिस्सेदारी बढ़ा रहे हैं।
एक वरिष्ठ ब्रॉडकास्ट अधिकारी ने कहा कि टीवी इंडस्ट्री ने वर्षों तक भरोसेमंद रेटिंग्स के दम पर अपनी ताकत साबित की है। अगर देश के सबसे बड़े विज्ञापन सीजन में यही रेटिंग्स उपलब्ध नहीं होंगी तो प्रतिस्पर्धी माध्यमों को स्वाभाविक रूप से फायदा मिलेगा।
त्योहारी सीजन बनेगा पहली बड़ी परीक्षा
आने वाले कुछ हफ्तों में त्योहारी विज्ञापन अभियान तेज होने वाले हैं। ऐसे में टीवी चैनलों को उम्मीद है कि रेटिंग्स पर लगी रोक जल्द हट जाएगी। क्योंकि हर गुजरता सप्ताह विज्ञापन खरीद, मीडिया प्लानिंग और नए कार्यक्रमों की रणनीति को और अधिक अनिश्चित बना रहा है।
विशेषज्ञों का कहना है कि टीवी रातोंरात अपना महत्व नहीं खोएगा, लेकिन फिलहाल सबसे बड़ी चिंता यह है कि अगर पूरे इंडस्ट्री के पास दर्शकों को मापने का साझा और भरोसेमंद पैमाना नहीं होगा तो त्योहारी सीजन के अतिरिक्त विज्ञापन बजट का बड़ा हिस्सा डिजिटल प्लेटफॉर्म की ओर जा सकता है।
यही वजह है कि इस समय टीवी इंडस्ट्री के लिए BARC रेटिंग्स की वापसी सिर्फ साप्ताहिक रैंकिंग का मामला नहीं रह गई है, बल्कि यह देश के सबसे बड़े त्योहारी विज्ञापन बाजार में अपनी हिस्सेदारी बनाए रखने का भी अहम सवाल बन चुकी है।
डिजिटल मीडिया और विज्ञापन क्षेत्र की कंपनी Adcounty Media India Limited के शेयरधारकों ने पोस्टल बैलेट के जरिए रखे गए दोनों विशेष प्रस्तावों (Special Resolutions) को भारी बहुमत से मंजूरी दे दी है।
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Vikas Saxena
डिजिटल मीडिया और विज्ञापन क्षेत्र की कंपनी Adcounty Media India Limited के शेयरधारकों ने पोस्टल बैलेट के जरिए रखे गए दोनों विशेष प्रस्तावों (Special Resolutions) को भारी बहुमत से मंजूरी दे दी है। कंपनी ने 26 जून 2026 को शेयर बाजार को इसकी जानकारी दी।
कंपनी के अनुसार, पहला प्रस्ताव प्रतीक भंसाली को कंपनी का स्वतंत्र निदेशक (Independent Director) नियुक्त करने से जुड़ा था। शेयरधारकों ने इस प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। अब प्रतीक भंसाली अगले 5 वर्षों के लिए कंपनी के स्वतंत्र निदेशक के रूप में कार्य करेंगे।
वहीं, दूसरा प्रस्ताव कुमार सौरव को कंपनी का पूर्णकालिक निदेशक (Whole-time Director) नियुक्त करने, उन्हें Executive Director का पद देने और उनके पारिश्रमिक (Remuneration) को मंजूरी देने से संबंधित था। इस प्रस्ताव को भी शेयरधारकों ने आवश्यक बहुमत के साथ मंजूरी दे दी।
कंपनी ने बताया कि दोनों प्रस्तावों पर मतदान रिमोट ई-वोटिंग के जरिए पोस्टल बैलेट के माध्यम से कराया गया। मतदान में दोनों प्रस्तावों को लगभग सर्वसम्मति से समर्थन मिला।
प्रतीक भंसाली की नियुक्ति वाले प्रस्ताव के पक्ष में 99.99% से अधिक वोट पड़े, जबकि विरोध में केवल 800 वोट दर्ज हुए।
इसी तरह कुमार सौरव की नियुक्ति और पारिश्रमिक से जुड़े प्रस्ताव को भी 99.99% से अधिक वोटों का समर्थन मिला। इस प्रस्ताव पर भी केवल 800 वोट विरोध में पड़े।
कंपनी ने यह भी स्पष्ट किया कि दूसरे प्रस्ताव पर मतदान के दौरान कुमार सौरव, जो स्वयं इस प्रस्ताव से संबंधित थे, उनके द्वारा डाले गए 6,40,400 इक्विटी शेयरों के वोट को मतदान परिणाम में शामिल नहीं किया गया। यह कदम कॉर्पोरेट गवर्नेंस के नियमों और हितों के टकराव (Conflict of Interest) से जुड़े प्रावधानों का पालन करते हुए उठाया गया।
Adcounty Media ने बताया कि पोस्टल बैलेट की वोटिंग का परिणाम और स्क्रूटिनाइज़र की रिपोर्ट कंपनी की आधिकारिक वेबसाइट पर भी उपलब्ध करा दी गई है।
इन दोनों प्रस्तावों के पारित होने के बाद कंपनी के निदेशक मंडल (Board of Directors) को मजबूती मिलने की उम्मीद है। एक ओर स्वतंत्र निदेशक के रूप में प्रतीक भंसाली बोर्ड में शामिल होंगे, वहीं कुमार सौरव कार्यकारी निदेशक के रूप में कंपनी के संचालन और रणनीतिक फैसलों में अहम भूमिका निभाएंगे।
यह मामला Bruhat Bengaluru Mahanagara Palike (BBMP) के साथ किए गए पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (PPP) समझौते से जुड़ा है।
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Vikas Saxena
आउटडोर विज्ञापन और स्मार्ट सिटी इंफ्रास्ट्रक्चर क्षेत्र की कंपनी Signpost India Limited को कर्नाटक हाई कोर्ट से बड़ी राहत मिली है। कंपनी ने शेयर बाजार को दी जानकारी में बताया कि 23 जून 2026 को कर्नाटक हाई कोर्ट ने एक स्पष्टीकरण आदेश (Clarificatory Order) जारी किया है। यह आदेश 2025 में दिए गए फैसले को और स्पष्ट करता है और कंपनी के अनुबंधित अधिकारों की दोबारा पुष्टि करता है।
यह मामला Bruhat Bengaluru Mahanagara Palike (BBMP) के साथ कंपनी के पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (PPP) समझौते से जुड़ा है। इस परियोजना के तहत Signpost India को बेंगलुरु में पुलिस बूथ, ट्रैफिक अंब्रेला और संबंधित ढांचे विकसित करने थे। इसके बदले कंपनी को तय स्थानों पर विज्ञापन डिस्प्ले पैनल लगाने और उनसे राजस्व कमाने का अधिकार दिया गया था। कंपनी और BBMP के बीच यह समझौता मार्च 2019 में हुआ था और इसकी अवधि 20 वर्ष तय की गई थी।
विवाद तब शुरू हुआ जब BBMP ने परियोजना के दौरान कंपनी के कुछ विज्ञापन ढांचे हटाने के निर्देश दिए। BBMP का कहना था कि कुछ डिस्प्ले पैनल समझौते की शर्तों के अनुरूप नहीं हैं। इसके बाद Signpost India ने कर्नाटक हाई कोर्ट का रुख किया और कहा कि विज्ञापन पैनल लगाने का अधिकार उसे PPP समझौते के तहत मिला है, इसलिए उन्हें हटाने का आदेश अनुबंध के खिलाफ है।
20 जून 2025 को कर्नाटक हाई कोर्ट ने कंपनी के पक्ष में फैसला सुनाया। कोर्ट ने BBMP के उन नोटिसों को रद्द कर दिया, जिनमें विज्ञापन ढांचे हटाने को कहा गया था। साथ ही BBMP को कंपनी के साथ हुए PPP समझौते और Joint Memorandum of Compromise का पालन करने का निर्देश दिया।
अब 23 जून 2026 को जारी स्पष्टीकरण आदेश में हाई कोर्ट ने अपने पिछले फैसले को और स्पष्ट करते हुए कहा है कि Signpost India को PPP समझौते के तहत विज्ञापन डिस्प्ले पैनल लगाने और उनका रखरखाव करने का अनुबंधित अधिकार प्राप्त है। इसमें परियोजना के तहत बने पुलिस बूथ या कियोस्क के पास तथा फुटपाथ से सटे स्थानों पर विज्ञापन पैनल लगाने की भी अनुमति शामिल है, बशर्ते सभी जरूरी सुरक्षा मानकों का पालन किया जाए। कोर्ट ने BBMP को एक बार फिर निर्देश दिया है कि वह अनुबंध की शर्तों का सम्मान करे और कंपनी को समझौते के अनुसार काम करने दे।
कंपनी ने अपने एक्सचेंज फाइलिंग में स्पष्ट किया है कि यह कोई नया मुकदमा जीतने का फैसला नहीं है, बल्कि पहले दिए गए फैसले को स्पष्ट करने वाला आदेश है। इससे कंपनी के अनुबंधित अधिकारों को लेकर किसी भी तरह की कानूनी अस्पष्टता दूर हो गई है।
Signpost India ने यह भी कहा है कि इस कोर्ट आदेश का कंपनी की वित्तीय स्थिति पर कोई महत्वपूर्ण प्रभाव नहीं पड़ेगा। हालांकि, यह फैसला बेंगलुरु में चल रही उसकी PPP परियोजना के संचालन के लिए कानूनी रूप से अहम माना जा रहा है।
डिजिटल विज्ञापन तकनीक (AdTech) क्षेत्र की कंपनी Vertoz Limited ने भारत में अपना चौथा पेटेंट आवेदन दाखिल किया है।
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Vikas Saxena
डिजिटल विज्ञापन तकनीक (AdTech) क्षेत्र की कंपनी Vertoz Limited ने भारत में अपना चौथा पेटेंट आवेदन दाखिल किया है। कंपनी ने 24 जून 2026 को शेयर बाजार को इसकी जानकारी देते हुए कहा कि यह कदम उसके बौद्धिक संपदा (Intellectual Property) पोर्टफोलियो को और मजबूत करेगा।
कंपनी ने बताया कि नए पेटेंट का शीर्षक "System and Method for Demand Platform Optimization (DPO) Using Machine Learning-Based DSP Prediction, Ranking, and Real-Time Slot Allotment" है।
Vertoz के मुताबिक, यह नई तकनीक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और मशीन लर्निंग (Machine Learning) की मदद से डिजिटल विज्ञापन प्रक्रिया को अधिक तेज, स्मार्ट और प्रभावी बनाएगी।
आमतौर पर जब किसी वेबसाइट या ऐप पर विज्ञापन दिखाने का मौका मिलता है, तो विज्ञापन अनुरोध (Ad Request) कई अलग-अलग विज्ञापन पार्टनर्स के पास भेजा जाता है। इससे समय भी ज्यादा लगता है और सिस्टम पर अतिरिक्त दबाव भी पड़ता है।
कंपनी की नई तकनीक पहले से ही यह अनुमान लगाएगी कि कौन-से विज्ञापन पार्टनर किसी खास विज्ञापन अवसर पर सबसे अधिक संभावना के साथ प्रतिक्रिया देंगे। इसके बाद सिस्टम उन्हीं पार्टनर्स को प्राथमिकता देगा और गैर-जरूरी अनुरोध भेजने से बचेगा।
Vertoz का कहना है कि इससे डिजिटल विज्ञापन लेनदेन (Ad Transactions) अधिक तेज और कुशल होंगे। साथ ही सर्वर और इंफ्रास्ट्रक्चर पर पड़ने वाला अतिरिक्त बोझ कम होगा, जिससे विज्ञापन तेजी से और बेहतर तरीके से यूजर्स तक पहुंचाए जा सकेंगे।
कंपनी के अनुसार, यह पेटेंट आवेदन उसके रिसर्च और डेवलपमेंट (R&D) पर लगातार किए जा रहे निवेश का हिस्सा है। Vertoz का उद्देश्य डेटा आधारित और स्केलेबल तकनीकों का विकास करना है, जिससे डिजिटल विज्ञापन उद्योग में प्रदर्शन और कार्यक्षमता दोनों को बेहतर बनाया जा सके।
कंपनी ने कहा कि यह नया पेटेंट उसके बढ़ते इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी पोर्टफोलियो में एक और महत्वपूर्ण उपलब्धि है। इसके जरिए Vertoz उन्नत विज्ञापन तकनीकों में अपनी क्षमताओं को मजबूत करने, नए समाधान विकसित करने और लंबे समय में अपने निवेशकों व अन्य हितधारकों के लिए बेहतर मूल्य सृजित करने पर ध्यान दे रही है।
हालांकि, कंपनी ने यह स्पष्ट नहीं किया है कि इस पेटेंट को अंतिम मंजूरी कब तक मिल सकती है। फिलहाल यह केवल पेटेंट आवेदन (Patent Application) के रूप में भारत में दाखिल किया गया है।
भारत में विज्ञापन की दुनिया बीते कुछ वर्षों में जिस तेजी से बदली है, उतनी शायद पिछले दो दशकों में नहीं बदली।
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Vikas Saxena
भारत में विज्ञापन की दुनिया बीते कुछ वर्षों में जिस तेजी से बदली है, उतनी शायद पिछले दो दशकों में नहीं बदली। एक दौर था जब कोई भी बड़ा ब्रैंड अपनी पहचान के लिए किसी बॉलीवुड सुपरस्टार या क्रिकेटर को करोड़ों रुपये देकर ब्रैंड एंबेसडर बनाता था। इनमें से आज कई ब्रैंड अपने मार्केटिंग बजट का बड़ा हिस्सा हजारों छोटे-बड़े कंटेंट क्रिएटर्स के नेटवर्क पर खर्च कर रहे हैं। यह बदलाव सिर्फ एक ट्रेंड नहीं, बल्कि एक स्ट्रक्चरल शिफ्ट है, जिसके पीछे ठोस आंकड़े मौजूद हैं।
इंडस्ट्री का आकार: कितना बड़ा है यह कारोबार?
भारत में इन्फ्लुएंसर मार्केटिंग इंडस्ट्री को लेकर अलग-अलग रिसर्च फर्मों के आंकड़े थोड़े अलग हैं, लेकिन ग्रोथ की दिशा सभी में एक जैसी है। EY और Collective Artists Network की संयुक्त रिपोर्ट "The State of Influencer Marketing in India" के अनुसार, भारत में इन्फ्लुएंसर मार्केटिंग सेक्टर के 2026 तक 3,375 करोड़ रुपये तक पहुंचने का अनुमान है और इसकी सालाना वृद्धि दर (CAGR) 18 प्रतिशत है।
वहीं इन्फ्लुएंसर डेटा प्लेटफॉर्म Kofluence की "Decoding Influence: Annual Research Report 2026"- जो 20 लाख से ज्यादा क्रिएटर्स के डेटा, 1,000 से अधिक सर्वे और 50 से ज्यादा इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स के इंटरव्यू पर आधारित है, के मुताबिक भारत का इन्फ्लुएंसर मार्केटिंग सेक्टर 2025 में 3,000-3,500 करोड़ रुपये के बीच है और 2027 तक 4,500-5,000 करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है, जिसकी सालाना ग्रोथ दर लगभग 22 प्रतिशत बनी हुई है। इस रिपोर्ट के अनुसार भारत के क्रिएटर इकोसिस्टम में अब 40 लाख से 44 लाख तक एक्टिव प्रोफेशनल्स मौजूद हैं, जिनमें से 33-37 लाख क्रिएटर्स इंस्टाग्राम को अपना प्राइमरी प्लेटफॉर्म मानते हैं।
यानी आंकड़ों में अंतर भले हो, लेकिन निष्कर्ष साफ है: यह अब एक छोटा-मोटा प्रयोग नहीं, बल्कि हजारों करोड़ रुपये की संगठित इंडस्ट्री बन चुकी है, जिसमें हर साल 18 से 22 प्रतिशत की दर से बढ़ोतरी हो रही है।
ब्रैंड बजट आखिर शिफ्ट क्यों हो रहा है?
इसकी सबसे बड़ी वजह है रीच और लागत का गणित। पहले के दौर में एक नेशनल टीवी कैंपेन या किसी सुपरस्टार के साथ करार करना ही ब्रैंड अवेयरनेस का सबसे भरोसेमंद तरीका माना जाता था। लेकिन जब किसी ब्रैंड को पूरे देश तक नहीं, बल्कि सिर्फ 18-30 साल की शहरी महिलाओं या किसी खास भौगोलिक क्षेत्र तक पहुंचना हो, तो टारगेटेड इन्फ्लुएंसर कैंपेन कहीं ज्यादा कारगर साबित होता है।
EY की रिपोर्ट इस बदलाव की एक बड़ी वजह भी बताती है। इसके अनुसार मोबाइल पर बिताए जाने वाले समय का 50 प्रतिशत हिस्सा सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर खर्च होता है और इन्फ्लुएंसर मार्केटिंग अब हर चार में से तीन ब्रैंड स्ट्रैटेजी में शामिल किए जाने की उम्मीद है। सीधे शब्दों में कहें तो 75 प्रतिशत ब्रैंड अब अपनी मार्केटिंग योजना में क्रिएटर्स को जगह दे रहे हैं, यह आंकड़ा बताता है कि यह अब "अतिरिक्त" खर्च नहीं, बल्कि मुख्यधारा की रणनीति बन गई है।
माइक्रो बनाम मैक्रो: ब्रैंड किसे चुन रहे हैं?
यहीं से कहानी का सबसे दिलचस्प हिस्सा शुरू होता है। EY-Collective Artists Network रिपोर्ट के मुताबिक 47 प्रतिशत ब्रैंड्स कम लागत में बेहतर पहुंच के लिए माइक्रो और नैनो इन्फ्लुएंसर्स के साथ कैंपेन चलाना पसंद करते हैं और रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि अन्य श्रेणियों के मुकाबले नैनो इन्फ्लुएंसर्स की एंगेजमेंट दर सबसे ज्यादा रही।
लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि बड़े नाम पूरी तरह बाहर हो गए हैं। यही रिपोर्ट यह भी कहती है कि मार्केटर्स मेगा और माइक्रो/नैनो इन्फ्लुएंसर्स का लगभग बराबर इस्तेमाल कर रहे हैं, बड़े नाम अवेयरनेस और ब्रैंड लॉयल्टी के लिए और छोटे क्रिएटर्स एंगेजमेंट बढ़ाने के लिए। असल सवाल "Micro या Macro" का नहीं, बल्कि यह है कि ब्रैंड किस मकसद से कैंपेन चला रहा है, अगर लक्ष्य भरोसा और कनवर्शन है तो माइक्रो क्रिएटर्स आगे हैं, अगर लक्ष्य सिर्फ बड़े पैमाने पर पहचान बनाना है तो बड़े नाम अब भी जरूरी हैं।
| पैरामीटर | Micro/Nano Influencer | Macro/Celebrity Influencer |
| प्राथमिकता | 47% ब्रैंड्स की पहली पसंद | अवेयरनेस-केंद्रित कैंपेन में इस्तेमाल |
| एंगेजमेंट | अपेक्षाकृत ज्यादा (नैनो सबसे ऊंचा) | अपेक्षाकृत कम |
| लागत | प्रति पोस्ट कम | प्रति पोस्ट बहुत ज्यादा |
| भरोसा | भरोसा और कनवर्शन | रीच और ब्रैंड लॉयल्टी |
इन्फ्लुएंसर अर्थव्यवस्था के पीछे की डिजिटल बुनियाद
यह पूरा बदलाव भारत के विशाल डिजिटल यूजर बेस के बिना संभव नहीं था। DataReportal की Digital 2026: India रिपोर्ट के अनुसार अक्टूबर 2025 के अंत तक भारत में 50 करोड़ सोशल मीडिया यूजर पहचान मौजूद थे, जो देश की कुल आबादी का 34.1 प्रतिशत है। इसी रिपोर्ट के मुताबिक 2025 के अंत में मेटा के विज्ञापन टूल्स के आंकड़ों के हिसाब से भारत में इंस्टाग्राम के 48.1 करोड़ यूजर थे, जो देश की कुल आबादी के 32.8 प्रतिशत के बराबर है।
यह विशाल यूजर बेस ही वह बुनियाद है जिस पर क्रिएटर इकोनॉमी टिकी है। जितने ज्यादा लोग किसी प्लेटफॉर्म पर मौजूद होंगे, उतनी ही बारीकी से ब्रैंड अपनी ऑडियंस को टारगेट कर सकते हैं, चाहे वह उम्र, भाषा, शहर या इंटरेस्ट के आधार पर हो। यही सटीकता पारंपरिक टीवी विज्ञापन में संभव नहीं थी, जहां एक ही विज्ञापन करोड़ों दर्शकों तक एक जैसे ही रूप में पहुंचता था।
रीजनल क्रिएटर्स का उभार: मेट्रो से आगे बढ़ता भारत
शायद इस पूरी कहानी का सबसे भारतीय और सबसे कम चर्चित पहलू है रीजनल (Regional) क्रिएटर्स का उभार। Kofluence की 2026 रिपोर्ट के मुताबिक टियर 3 और टियर 4 शहर अब भारत के कुल इन्फ्लुएंसर कैंपेन का 43 से 48 प्रतिशत हिस्सा बन गए हैं और ये मार्केट मेट्रो शहरों के 3-4 प्रतिशत के मुकाबले 4.5 से 5.5 प्रतिशत तक ज्यादा एंगेजमेंट दे रहे हैं।
लागत के मामले में भी यह बदलाव ब्रैंड्स के लिए बेहद आकर्षक है। रिपोर्ट के अनुसार टियर 3 और टियर 4 मार्केट्स में औसत कैंपेन लागत 35,000 से 90,000 रुपये के बीच है, जबकि मेट्रो शहरों में यह 3.8 लाख से 4.5 लाख रुपये तक पहुंच जाती है। यानी कम खर्च में ज्यादा भरोसा और ज्यादा एंगेजमेंट, यही वजह है कि ब्रैंड अब "भारत" को सिर्फ मेट्रो शहरों के विस्तार के रूप में नहीं, बल्कि एक स्वतंत्र मार्केट के रूप में देख रहे हैं।
भाषा के स्तर पर भी बदलाव साफ दिखता है। इसी रिपोर्ट के अनुसार 62 प्रतिशत से ज्यादा क्रिएटर्स का कहना है कि ब्रैंड अब उनसे क्षेत्रीय और स्थानीय भाषा में ज्यादा कंटेंट बनाने को कह रहे हैं, जो दिखाता है कि ब्रैंड ब्रीफ का रुख मेट्रो-केंद्रित आकांक्षा से हटकर क्षेत्रीय जुड़ाव की ओर मुड़ रहा है। तमिल, तेलुगु, मराठी, बंगाली जैसी भाषाओं में बने कंटेंट का असर अब सिर्फ संख्या में नहीं, बल्कि भरोसे और कनेक्शन की गहराई में भी नजर आ रहा है।
क्या क्रिएटर इकोनॉमी में बनने लगा है बबल?
जैसे-जैसे यह इंडस्ट्री बढ़ी है, इसके साथ कुछ गंभीर चुनौतियां भी सामने आई हैं और इनमें सबसे बड़ी है फेक फॉलोअर्स की समस्या। इन्फ्लुएंसर एनालिटिक्स प्लेटफॉर्म KlugKlug के विश्लेषण के अनुसार भारत में लगभग दो-तिहाई (58.5 प्रतिशत) इंस्टाग्राम प्रोफाइल्स में 60 प्रतिशत से ज्यादा संदिग्ध या फर्जी फॉलोअर्स पाए गए हैं और जांचे गए 80 लाख प्रोफाइल्स में से सिर्फ 24.8 लाख ही असली और भरोसेमंद फॉलोअर्स वाले निकले।
इसका सीधा आर्थिक असर भी सामने आया है। रिपोर्ट के सह-संस्थापक कल्याण कुमार के अनुसार ब्रैंड हर कैंपेन में फर्जी फॉलोअर्स की वजह से अपने बजट का 30 से 50 प्रतिशत हिस्सा गंवा देते हैं, और भारत इस समय फर्जी फॉलोअर्स का सबसे बड़ा सप्लायर और खरीदार दोनों है। यह आंकड़ा साफ चेतावनी देता है कि सिर्फ फॉलोअर काउंट देखकर इन्फ्लुएंसर चुनना ब्रैंड्स के लिए जोखिम भरा हो सकता है, इसीलिए अब ज्यादातर एजेंसियां और ब्रैंड एंगेजमेंट क्वालिटी, ऑडियंस की प्रामाणिकता और कन्वर्शन डेटा को फॉलोअर्स की संख्या से ज्यादा अहमियत देने लगे हैं।
भविष्य: क्या यह सिर्फ ट्रेंड है या स्थायी बदलाव?
EY की रिपोर्ट क्रिएटर इकोनॉमी को लेकर भविष्य की दिशा भी साफ करती है। रिपोर्ट के मुताबिक, 77 प्रतिशत ब्रैंड्स को भरोसा है कि उनकी एजेंसियां इन्फ्लुएंसर मार्केटिंग कैंपेन प्रभावी ढंग से चला सकती हैं, और लाइफस्टाइल, फैशन व ब्यूटी जैसी कैटेगरी इस ग्रोथ को आगे बढ़ाने वाली प्रमुख श्रेणियां मानी जा रही हैं। इसके अलावा कंटेंट कंज्म्पशन के मामले में इंस्टाग्राम और YouTube इन्फ्लुएंसर कंटेंट देखने के लिए सबसे पसंदीदा प्लेटफॉर्म बने हुए हैं, हालांकि ब्रैंड खास मकसद के लिए कई दूसरे प्लेटफॉर्म्स का भी इस्तेमाल कर रहे हैं।
यह सारा डेटा मिलाकर एक स्पष्ट तस्वीर बनाता है: यह बदलाव कोई अस्थायी फैशन नहीं है, बल्कि विज्ञापन की बुनियादी संरचना में आया एक स्थायी बदलाव है। पहले एक ब्रैंड के पास एक चेहरा और एक विज्ञापन हुआ करता था; आज उसी ब्रैंड के पास सैकड़ों आवाजें और रोजाना नया कंटेंट है। क्रिएटर अब सिर्फ किसी प्रोडक्ट का एंडोर्सर नहीं, बल्कि खुद एक मीडिया चैनल बन चुका है।
भारत में विज्ञापन की दुनिया एक बड़े बदलाव के दौर से गुजर रही है। 18 से 22 प्रतिशत की सालाना ग्रोथ दर के साथ बढ़ता हजारों करोड़ रुपये का इन्फ्लुएंसर मार्केटिंग सेक्टर, टियर 3-4 शहरों का तेजी से उभरना, और माइक्रो-नैनो क्रिएटर्स की बढ़ती अहमियत, यह सब मिलकर बताते हैं कि ब्रैंड अब सिर्फ किसी सेलिब्रिटी का चेहरा नहीं खरीद रहे, बल्कि ऑडियंस का भरोसा खरीदने की कोशिश कर रहे हैं।
लेकिन यह तस्वीर पूरी तरह गुलाबी भी नहीं है। फर्जी फॉलोअर्स और भरोसे की कमी जैसी चुनौतियां इस इंडस्ट्री के सामने अब भी मौजूद हैं, और जो ब्रैंड डेटा-आधारित फैसले लेना सीख जाएंगे, वही इस बदलाव का सबसे ज्यादा फायदा उठा पाएंगे। कुल मिलाकर, यह सिर्फ "इन्फ्लुएंसर बनाम टीवी सितारे" की लड़ाई नहीं है, यह विज्ञापन की पूरी सोच का पुनर्निर्माण है, जहां एक बड़े चेहरे की जगह अब हजारों भरोसेमंद आवाजें ले रही हैं।
मीडिया और विज्ञापन क्षेत्र की कंपनी क्रेयॉन्स ऐडवर्टाइजिंग (Crayons Advertising Limited) ने अपनी दुबई स्थित पूर्ण स्वामित्व वाली सहायक कंपनी Crayons Global Media LLC को बंद कर दिया है।
by
Vikas Saxena
मीडिया और विज्ञापन क्षेत्र की कंपनी क्रेयॉन्स ऐडवर्टाइजिंग (Crayons Advertising Limited) ने अपनी दुबई स्थित पूर्ण स्वामित्व वाली सहायक कंपनी Crayons Global Media LLC को बंद कर दिया है। कंपनी ने इस संबंध में शेयर बाजार को जानकारी देते हुए बताया कि दुबई के कानूनों और नियामकीय प्रक्रियाओं के तहत इस इकाई को औपचारिक रूप से भंग (Dissolve) कर दिया गया है।
कंपनी के अनुसार, Crayons Global Media LLC का पंजीकृत कार्यालय दुबई के अल-हमरिया क्षेत्र में स्थित था। हालांकि, स्थापना के बाद से इस सहायक कंपनी ने कभी कोई बिजनेस शुरू नहीं किया और न ही किसी तरह की कारोबारी गतिविधि, लेनदेन या संचालन किया।
Crayons Advertising ने स्पष्ट किया है कि यह उसकी कोई महत्वपूर्ण (Material) सहायक कंपनी नहीं थी। चूंकि इस इकाई ने कभी कारोबार शुरू ही नहीं किया, इसलिए वित्त वर्ष 2025-26 में इसका राजस्व, आय, कारोबार और नेटवर्थ शून्य रही।
कंपनी ने यह भी कहा है कि इस सहायक कंपनी को बंद किए जाने से उसके मुख्य कारोबार या राजस्व पर किसी प्रकार का प्रभाव नहीं पड़ेगा। इसका कारण यह है कि स्थापना के बाद से यह इकाई निष्क्रिय रही और किसी भी तरह का व्यावसायिक योगदान नहीं दे रही थी।
शेयर बाजार को दी गई जानकारी के मुताबिक, Crayons Global Media LLC को 11 जून 2026 से प्रभावी रूप से भंग कर दिया गया है। चूंकि यह कोई बिक्री या अधिग्रहण का मामला नहीं है, इसलिए बिक्री मूल्य, खरीदार, संबंधित पक्ष (Related Party Transaction) या अन्य लेनदेन संबंधी प्रावधान यहां लागू नहीं होते।
यह जानकारी कंपनी के प्रबंध निदेशक कुणाल लालानी ने SEBI के लिस्टिंग नियमों के तहत नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) को भेजी है।