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राणा यशवंत के निशाने पर BJP, नदीम की खरी-खरी- जब दलबदलू-परिवादवाद न था, तो बहुमत मिला क्या...

बीजेपी ने उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए अपने कैंडिडेट्स की दूसरी लिस्ट भी रविवार को जारी कर दी। इसमें 155 कैंडिडेट्स के नाम हैं। लेकिन नरेंद्र मोदी की अपील थी कि परिवार के लोगों के लिए टिकट नहीं मांगे। इसके बाद भी इस लिस्ट में उनकी यह अपील बेअसर नजर आई। इसमें भाजपा नेताओं के 15 रिश्तेदारों और बाहरी लोगों को तवज्

समाचार4मीडिया ब्यूरो 9 years ago

बीजेपी ने उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए अपने कैंडिडेट्स की दूसरी लिस्ट भी रविवार को जारी कर दी। इसमें 155 कैंडिडेट्स के नाम हैं। लेकिन नरेंद्र मोदी की अपील थी कि परिवार के लोगों के लिए टिकट नहीं मांगे। इसके बाद भी इस लिस्ट में उनकी यह अपील बेअसर नजर आई। इसमें भाजपा नेताओं के 15 रिश्तेदारों और बाहरी लोगों को तवज्जो दी गई है। इसी संदर्भ में ‘इंडिया न्यूज’ के मैनेजिंग एडिटर राणा यशवंत ने अपने फेसबुक वॉल पर लिखा कि-

7 जनवरी को दिल्ली में बीजेपी कार्यकारिणी की बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पार्टी नेताओं से कह रहे थे कि विधानसभा चुनावों में घर-परिवार के लोगों के टिकट के लिए आपलोग हो-हल्ला मत कीजिएगा। इसके बाद ये उम्मीद लाज़िमी थी कि बीजेपी कम से कम दल के नेताओं के बेटे-बेटियों को अगर टिकट देगी भी तो दमखम देख-आज़माकर।

यूं ही पिताजी की ज़िद में कुछ नहीं करेगी। लेकिन यूपी में बीजेपी के उम्मीदवारों की दूसरी लिस्ट से ये साफ हो गया कि पीएम चाहे जो कहें, पालिटिक्स अपने तरीके से चलती है और चलती रहेगी। इस लिस्ट में परिवारवाद का नक्कारा खूब बज रहा है। गृहमंत्री राजनाथ सिंह के बड़े बेटे पंकज सिंह को नोएडा से टिकट दिया गया है। हालांकि पंकज ने नेतागीरी में ख़ून-पसीना खूब बहाया है। कल्याण सिंह ने अपनी बहू प्रेमलता सिंह के लिए अतरौली से टिकट ले लिया है जबकि पोते को अपनी उम्मीदवारी बीजेपी पहली ही लिस्ट में दे चुकी है। बात इतनी ही नहीं है कल्याण सिंह की बेहद करीबी मानी जानेवाली प्रेमलता कटियार की बेटी नीलिमा कटियार को कानपुर की कल्याणपुर सीट पर टिकट पकड़ा दिया गया है।

लालजी टंडन को 2014 के लोकसभा में लोकसभा की सीट राजनाथ सिंह के लिये छोड़ने की भरपाई उनके बेटे गोपाल टंडन को लखनऊ ईस्ट से टिकट देकर की गई है। मुजफ्फरनगर जिले की कैराना जैसी चर्चित सीट पर वहीं के सांसद हुकुम सिंह की बेटी मृगांगिका सिंह को उम्मीदवार बना दिया गया। बृजभूषण शरण सिंह के बेटे प्रतीक शरण को भी मैदान में उतार दिया गया। उत्तराखंड में भी पूर्व मुख्यमंत्री बीसी खंडूरी की बेटी रितु खंडुरी को यमकेश्वर से टिकट दे दिया गया। अब बताइए कि प्रधानमंत्री के कहे और पार्टी के किए में कोई समानता है? राजनीति है साहब। दिखाने के दांत और कहने के और। ऊपर से अभी-अभी आए बाहरियों की भी इज्जतअफजाई टिकट के जरिए कर दी गई। कांग्रेस से आईं रीता बहुगुणा जोशी को लखनऊ कैंट से उतारा तो बीएसपी से आए ब्रजेश पाठक को लखनऊ सेंट्रल से। जेवर सीट से इसी महीने कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में आए धीरेंदर सिंह को और 2014 में गौतमबुद्धनगर लोकसभा सीट पर महेश शर्मा के खिलाफ लड़नेवाले कांग्रेस के ही रमेश तोमर को धोलाना से टिकट दे दिया गया है।

यह सब ठीक वैसे ही जैसे उत्तराखंड में विजय बहुगुणा के बेटे सौरभ बहुगुणा को सितारगंज से, यशपाल आर्य को बाजपुर और उनके बेटे संजीव आर्य को नैनीताल से बीजेपी ने अपना उम्मीदवार बनाया गया है। दोनों बाप-बेटे (यशपाल आर्य और संजीव ) 16 जनवरी की सुबह बीजेपी में शामिल हुए थे और शाम को टिकट मिल गया। दरअसल हरीश रावत के खिलाफ बगावत करने वाले और उसकी रणनीति बनाने वाले कांग्रेसी नेताओं को उत्तराखंड में बीजेपी ने खुश करने की कोशिश की है। हरक सिंह रावत भी इन्हीं में से हैं जिन्हें कोटद्वार से उतारा गया है। लेकिन बाहरी पर मेहरबानी की बीजेपी की नीति को लेकर पार्टी के अंदर काफी असंतोष है। कुल मिलाकर नीति राज करने की एक ही होती है। अब कहने के लिये आप जो कहें।

वहीं नवभारत टाइम्स के पॉलिटिकल एडिटर नदीम ने लिखा- पहले क्षमा याचना। मेरा किसी की भावनाएं आहत करने करने का इरादा नहीं है। लेकिन शाम से सोशल मीडिया पर पढ़ रहा हूँ कि बाहरियों और दलबदलुओं को बीजेपी में जिस तरह से तवज्जो मिली है उससे प्रतिबद्ध कार्यकर्ता बहुत आहत है, चुनाव में बीजेपी झटका खा जायेगी। मैं समझ नही पा रहा हूँ 2007 , 2012 और इस पहले 2002 में जब प्रतिबद्ध कार्यकर्ता आहत नही हुआ था तो क्या उसने बीजेपी को बहुमत दिला था? यह चुनाव बीजेपी के लिए अभी नहीं तो कभी नही वाला है। जो जिताऊ दिखेगा उसे टिकट दिया जाएगा। क्या लोकसभा में यूपी में बाहरी और दलबदलू टिकट नही पाये थे? दर्जनों पाये थे। जगदंबिका पाल को टिकट पहले मिला था सदस्यता बाद में ली थी। तब भी तो कार्यकर्ता बहुत आहत हुआ था लेकिन नतीजा तो सबको पता है।

बीजेपी की दूसरी सूची में परिवारवाद को बढ़ावा दिए जाने पर ‘समाचार प्लस’ के एग्जिक्यूटिव एडिटर प्रवीण साहनी   ने अपनी फेसबुक वाल पर लिखा- कहावत है कि असीम बलशाली को कोई और नहीं हराता बल्कि वो स्वयं अपनी हार का हथियार होता है। आज प्रत्याशियों की सूची देखने के बाद ये बात मुझे बीजेपी पर बिलकुल फिट दिख रही है। आदर्श ताक पर धरे हैं और बेटा-बेटी-पत्नी-बहू-दामाद-परिवार मैदान में उतरे हैं। कर्मठ और ईमानदार अनाथ हो गए। हारे-लंगड़े घोड़े जो कल तक अपनों को लात मार रहे थे वही योद्धा और घुड़सवार हो गए। एक उदाहरण साहिबाबाद का ही देख लो, जहां बीजेपी के नाम पर भी.. जीत जाये वहां से बुरी तरह हारे हुए और देश के गृहमंत्री तक के खिलाफ छद्म युद्ध छेड़ने वाले सुनील शर्मा को टिकट दे दिया जबकि 365 दिन क्षेत्र में जनता के बीच रहने वाले कार्यकर्ता संजीव शर्मा की उम्मीदों को बुरी तरह कुचल दिया। इतना ही कहूंगा कि संजीव शर्मा दिल मत छोटा करना, दिल इतना बड़ा कर लो कि उससे निकली आह में बीजेपी का घमंड और घमंडी सारे समा जाएं।

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