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जब पूर्व CM सुंदर लाल पटवा वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल के घर माफी मांगने पहुंच गए...
( ये लेख वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल ने अपनी फेसबुक पोस्ट में लिखा है। इसकी हेडलाइन हमने बदली है, बाकी लेख हूबहू हम पेश कर रहे हैं।) एक शिखर पुरुष के बिना भारतीय जनता पार्टी राजेश बादल
समाचार4मीडिया ब्यूरो 9 years ago
( ये लेख वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल ने अपनी फेसबुक पोस्ट में लिखा है। इसकी हेडलाइन हमने बदली है, बाकी लेख हूबहू हम पेश कर रहे हैं।)
एक शिखर पुरुष के बिना भारतीय जनता पार्टी
राजेश बादल
एग्जिक्यूटिव डायरेक्टर
राज्यसभा टीवी।।
सुंदर लाल पटवा चले गए। शान से। पूरी बान्नवे साल की पारी खेल कर। जो ठसक, दबंगई और सिद्धान्तों को लेकर समर्पण सुंदरलाल पटवा में था, वैसा आज के किसी बीजेपी नेता में नहीं दिखाई देता। मध्यप्रदेश में तो ख़ैर बीजेपी की कहानी बिना सुंदरलाल पटवा के नहीं लिखी जा सकती। विजयाराजे सिंधिया और कुशाभाऊ ठाकरे के बाद, पटवाजी की विदाई के बाद राज्य में पार्टी शिखर का सूनापन देख रही है।
पटवाजी से मेरी मुलाक़ात 28 फ़रवरी 1981 को पहली बार हुई थी। एक ज़िला कलेक्टर हम पत्रकारों का उत्पीड़न कर रहा था और एक ख़बर का स्रोत बताने के लिए बाध्य कर रहा था। हम नौजवान पत्रकार विरोध में डटे रहे। नतीज़तन जान से मारने की धमकियां मिलने लगीं। हम सारे पत्रकार भोपाल पहुंचे। अर्जुन सिंह मुख्यमंत्री थे और सुंदरलाल पटवा प्रतिपक्ष के नेता। अर्जुन सिंह को उनकी सरकारी मशीनरी ने हमारे बारे में पहले ही पूर्वाग्रही बना दिया था, लेकिन पटवाजी ने हमें दो घंटे ध्यान से सुना। उसके बाद तो छह मार्च 1981 को विधानसभा का पूरा एक दिन हमारे नाम था। पटवाजी ने सात घंटे की धुआंधार बहस में सरकार की धज्जियां बिखेर दीं। मजबूरी में अर्जुन सिंह को पत्रकारों के उत्पीड़न की न्यायिक जांच कराने की घोषणा करनी पड़ी।
हिन्दुस्तान की आज़ादी के बाद से पत्रकारों के उत्पीड़न का यह पहला मामला था, जिसकी न्यायिक जांच हुई। जांच आयोग ने हमारे आरोप सच पाए। इसके अलावा प्रेस काउंसिल ने भी इस मामले की सुओ मोटो जांच कराई। उसमें भी हम जीते। आमतौर पर किसी मामले की दो न्यायिक या अर्ध न्यायिक जांचें नहीं होतीं, पर यह मामला अपवाद है। हम सारे पत्रकार पटवाजी के आभारी रहे। इसके बाद मैं मिलता रहा पटवा जी से-कृतज्ञ भाव से। कुछ साल बीते। मैं 1991 में दैनिक नई दुनिया भोपाल में समाचार संपादक के रूप में काम करने नवभारत टाइम्स छोड़ कर भोपाल पहुंचा। एक बार फिर पटवाजी से मुलाक़ातें शुरू हो गईं। तब वे मुख्यमंत्री थे।
एक और याद आती है। पटवाजी कुछ चुने हुए पत्रकारों को अपने क़स्बे कुकड़ेश्वर और नीमच ले गए। तब पार्टी की ओर से प्रभात झा जनसंपर्क का काम देखते थे। कुछ ऐसा हुआ कि मुझे लगा कि यहां आकर ठीक नहीं किया। स्वाभिमान पर चोट लगी थी। मैंने लौट कर प्रभात झा से विरोध दर्ज़ कराया। अगले दिन सुबह सुबह पटवाजी का फ़ोन। बोले, 'राजेश! तुम्हारे घर आना है। मैं चौंका। प्रभात ने शायद उन तक यह बात पहुंचा दी थी। मैंने कहा, क्या हुआ? आप क्यों आएंगे? मैं आ जाता हूं। बोले, नहीं! ग़लती मेरी ओर से हुई है। मुझे आकर माफी मांगना चाहिए। मैंने कहा, नहीं! आप बुजुर्ग हैं। मैं आ जाता हूं। उन्होंने कहा, नहीं। मैं ही आऊंगा।
शाम चार- साढ़े चार बजे होंगे। प्रभात झा का फ़ोन आया- 'राजेश जी! आप घर पर हैं? हम बाहर खड़े हैं। मैं दरवाज़े पर आया। देखा, प्रभात झा पटवाजी को लेकर टाटा सियारा से उतर रहे थे। बड़ी झेंप लगी। सोचा, प्रभात से यह बात क्यों कही? बहरहाल! पटवाजी बैठे और डेढ़ घंटे बैठे। चर्चा में कम से कम तीन बार माफी मांगी। गपशप हुई। मीता (मेरी पत्नी) ने चाय बनाकर दी तो उनसे बोले तुम्हारे पति से क्षमा मांगने आया हूं। मैं पटवाजी का यह व्यवहार देखकर हैरान था। मध्यप्रदेश का सबसे ज़िद्दी, ग़ुस्सैल और ताक़तवर राजनेता इतना नरम और संवेदनशील हो सकता है- मेरे लिए अचंभा था।
एक पत्रकार के रूप में मैंने उनसे खूब रार ठानी। तीखे आलेख लिखे, लेकिन उन्होंने कभी शिक़ायत नहीं की। यहां कुछ आलेखों की कतरन देख सकते हैं। पुराने दौर की ठंडक देने वाली राजनीति के प्रतीक थे पटवा जी। मेरी श्रद्धांजलि।
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