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'क्या आमिर खान ने लाइन में लगकर पैसे कैश करवाए?'

निर्मलेंदु साह एग्जिक्यूटिव एडिटर राष्ट्रीय उजाला  ।। क्या आमिर खान ने लाइन में लगकर पैसे कैश करवाए? आ

समाचार4मीडिया ब्यूरो 9 years ago

निर्मलेंदु साह

एग्जिक्यूटिव एडिटर

राष्ट्रीय उजाला  ।।

क्या आमिर खान ने लाइन में लगकर पैसे कैश करवाए?

आमिर खान 39 दिन के बाद जाग गये हैं। नहीं, नींद से नहीं जागे। नोटबंदी के फैसले पर उनकी नींद खुल गई। दरअसल वे अब तक सोच रहे थे कि नोटबंदी पर कुछ कहूं, या नहीं। कहना सही होगा कि नहीं, शायद इसी ऊहापोह में उन्होंने 39 दिन बिता दिये। समझने की कोशिश कर रहे थे कि नोटबंदी का असर क्या है? अचानक उन्हें 39 दिन बाद यह महसूस हुआ कि नोटबंदी अच्छा कदम है, लेकिन उन्हें यह नहीं पता कि नोटबंदी के बाद से देशभर में नगदी की भारी किल्लत है। इस नोटबंदी ने भारी तादाद में लोगों की जिंदगी को प्रभावित किया है। फिर भी भारी तादाद में लोग एक उम्मीद के साथ पीएम मोदी के इस फैसले का सर्मथन कर रहे हैं। इसी कड़ी में नोटबंदी के मुद्दे पर पीएम मोदी को बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्सनिस्ट आमिर खान का भी साथ मिल गया है। वाह क्या बात है? आमिर ने समर्थन कर दिया, तो मोदी जी की छाति 56 इंच की जगह 76 इंच की हो गई होगी। ये दोस्ती नहीं तोड़ेंगे।

आमिर ने कहा कि कुछ परेशानी हो रही है। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या वे जानते हैं कि कुछ परेशानी का मतलब क्या है? 100 से ज्यादा लोगों की अब तक मौत हो चुकी है। मजदूरों की मजदूरी खत्म हो चुकी है। कुछ लोगों के घर में फांके चल रहे हैं। छोटे छोटे दुकानदारों की दुकानदारी 40 पर्सेंट रह गई है। व्यापारियों में त्राही-त्राही मची हुई है। आमिर खुश हैं, क्योंकि पीएम नरेंद्र मोदी उनके दोस्त हैं। अब वे नरेंद्र मोदी जी से दोस्ती निभाएं, या फिर गरीब से? उन्हें क्या लेना देना गरीबों से? मरते रहें, लाइन में लगते रहें, रात भर जागकर पैसे उठायें, या फिर दिन ऑफिस जाएं। उनसे क्या मतलब है?

आमिर ने कहा कि वे अर्थशास्त्री नही हैं। अब देखिए, जब वे जानते हैं कि वे अर्थशास्त्री नहीं हैं, तो इस तरह कैसे अचानक आकर प्रेस कॉन्फ्रेंस करके कह सकते हैं कि मोदी का मैं समर्थन करना चाहता हूं। नोटबंदी के खिलाफ हम भी नहीं हैं, लेकिन झूठ के खिलाफ हैं। झूल बोलना और झूठ सहना हमें नहीं आता। कैश की किल्लत। समयाभाव। मनी बैग में पैसे नहीं। घर में डाल है, तो सब्जी नहीं। आटे की कीमत बढ़ गई है, तो बाजार में कैश नहीं। अब तो पेट्रोल और डीजल की कीमत भी बढ़ गई है। प्याज थोड़ी सी महंगी हो गई है। ऑटो चालकों की रोजी रोटी पर बुरा असर पड़ रहा है। आधी रह गई है आमदनी। लोग एक दूसरे से यही सवाल कर रहे हैं कि कब मिटेंगी समस्याएं? न तो बैंकों से लोग पैसे निकाल पा रहे हैं, न ही एटीएम में नोट हैं। सच तो यही है कि अस्सी प्रतिशत बैंकों में एटीएम काम नहीं कर रहे हैं। सुबह से लाइन में लगने के बाद या तो काउंटर तक पहुंचते पहुंचते कैश खत्म हो जाता है, या फिर साढ़े तीन बजे की घंटी बजने लगती है। कहीं कहीं पर तो ऐसा भी हो रहा है कि एक घंटे में ही कैश खत्म। लोगों की खीझ बढ़ रही है, और इसीलिए वजह से कहीं बैंक पर हमले भी हुए हैं। कहीं कहीं पर खीझ के कारण मारपीट भी हुई है।

हकीकत-ए-एटीएम? मोतिहारी के ज्यादातर गांवों में लोगों ने नहीं देखा एटीएम। सवाल यह है कि क्या इस तरह कैशलेस होगा इंडिया? कैसे मुमकिन है उस देश को कैशलेस बनाना, जहां एक बड़ी आबादी पढ़ना-लिखना ही न जानती हो। बिहार के मोतिहारी का एक गांव ऐसा भी है, जहां के ज्यादातर लोगों को अभी तक एटीएम कार्ड कैसा होता है यह भी नहीं पता है।

सिर्फ पिछले चार दिनों में अलग-अलग शहरों से करीब पौने पांच करोड़ नए नोट बरामद हुए हैं। शर्म की बात तो यह है कि रिजर्व बैंक वाले जो वादे कर रहे हैं, वे जमीनी हकीकत पर गलत साबित हो रहे हैं। नोटबंदी के 39वें दिन भी कैश की किल्लत जारी है। आम लोगों को कुछ हजार रुपयों के लिए घंटों, घंटों तक इंतजार करना पड़ रहा है, लेकिन इसके बावजूद कुछ लोग ऐसे हैं जिनके पास नोटों की कोई कमी नहीं है। करोड़ों हैं नये नोट। नोटबंदी के बाद से लगातार नोटों के जखीरे बरामद हो रहे हैं। चौंकाने वाली बात यह है कि अब जो नोट बरामद हो रहे हैं, उनमें से ज्यादातर नए नोट हैं, वह भी लाखों करोड़ों में। ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्या नए नोटों का काला खेल शुरू हो चुका है? भ्रष्टाचार और बढ़ गया है?

हालांकि नोटबंदी के बाद केंद्र सरकार देश की अर्थव्यवस्था को पूरी तरह से कैशलेस बनाने पर जोर दे रही है। लेकिन ऐसे में एक रिपोर्ट ने सरकार की इस स्कीम पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं। रिपोर्ट के अनुसार, वित्त वर्ष 2015-16 के दौरान ई-लेनदेन से जुड़े साइबर अपराधों के मामले में 73.24 प्रतिशत बढ़ी है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक वित्त वर्ष 2015-16 में ई-लेनदेन में धोखाधड़ी के 16,458 मामले सामने आये, जबकि वित्त वर्ष 2013-14 में 9,500 मामले सामने आये थे।

  • 2015-16 में एटीएम तथा डेबिट कार्ड से जुड़ी धोखाधड़ी के मामले बढ़कर 6,585 दर्ज किए गए। इनमें 31 करोड़ रुपए फंसे।
  • पिछले वित्त वर्ष में 1,307 मामले सामने आए, आठ करोड़ रुपए फंसे थे।
  • क्रेडिट कार्ड में साइबर अपराध के 9,849 मामले सामने आए, जबकि इससे पिछले वित्त वर्ष में 7,890 मामले दर्ज किए गए थे।
  • इंटरनेट बैंकिंग से जुड़ी धोखाधड़ी के मामले में काफी कमी दर्ज की गई। वित्त वर्ष 2013-14 के 303 मामलों की अपेक्षा आलोच्य वित्त वर्ष में 34 मामले दर्ज किये गए।

अगर काले धन के खिलाफ कोई अभियान चल रहा है तो फिर ये कौन लोग हैं सिस्टम का लाभ उठाकर लाखों करोड़ों रुपए का कैश हासिल कर रहे हैं। क्या यह मामला सिर्फ बैंक मैनेजर और किसी के बीच सांठगांठ का है या इसके पीछे बड़ी हस्तियां भी शामिल हैं।

अर्थशास्त्री से लेकर समाज विज्ञानी दंग रह गये थे जब नोटबंदी की घोषणा हुई थी। ऐसा माना जा रहा है कि मीडिया के लिए यह एक महत्वपूर्ण समय है, क्योंकि उसकी टीआरपी बढ़ रही है? टीआरपी की बात चली, तो एक बात बता दें। शुरू के दो दिनों तक चैनल्स यही दिखाने में कि मोदी जी का यह गजब का फैसला है, अभूतर्पूव फैसला है, लेकिन दो तीन दिन बाद इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को यह समझ में आ गया कि यह गलत हो रहा है। तो वे सब ग्राउंड रिपोर्टिंग पर आ गये। लेकिन दुख की बात तो यह है कि सच्चाई वे फिर भी नहीं दिखा सके। लोग मर रहे हैं, आत्महत्या कर रहे हैं, शादी नहीं हो पा रही है ये सभी रिपोर्ट्स तो दिखाई जाती रहीं, लेकिन एक बार दिखाकर उन्हें हटा भी दिया जाता रहा।

अर्थशास्त्री, समाज विज्ञानी और राजनीतिक विचारक केंद्र सरकार के इस अप्रत्याशित कदम के अर्थव्यवस्था पर संभावित असर को लेकर अपने-अपने विचार व्यक्त कर रहे हैं। मीडिया और खासकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के लिए यह एक महत्वपूर्ण समय है, क्योंकि उसकी टीआरपी बढ़ रही है। खबरें ही खबरें हैं। सरकार के सबसे कठोर आलोचकों के जमीनी सर्वेक्षण भी देश के किसी हिस्से में आम आदमी के बीच से कोई प्रतिकूल प्रतिक्रिया सामने नहीं ला सके हैं। लोगों की परेशानियों को दूर करने के साथ ही सरकार को पूरी प्रशासनिक मशीनरी पैसे के इलेक्ट्रॉनिक लेन-देन के लाभों के प्रचार और प्रोत्साहन में लगानी होगी। कुछ टीवी चैनलों ने दिखाया है कि चाय बेचने वाले छोटे दुकानदारों से लेकर ठेले वाले और ढाबा मालिक जैसे लोग भी नकदीरहित लेन-देन के लिए तैयार हैं, लेकिन उन्हें शिक्षा, सहायता और समर्थन की जरूरत है। लोगों को जल्दी से जल्दी उनकी मांग के अनुरूप नकदी उपलब्ध करानी होगी। अगर लोगों को हो रही असुविधा आगे भी बनी रहती है तो एक साहसिक और बड़ा कदम भी अगली कई तिमाही तक अर्थव्यवस्था पर बुरा असर डालता रहेगा।

हमारे देश के बैंक भी अजब हैं। कुछ बैंक वालों ने तो कमाल ही कर दिया। वे साष्टांग प्रणाम के योग्य हैं। उनकी घर घर में आराधना होनी चाहिए। पूजनी हैं। उन्हें नोटबंदी कर्मवीर पुरस्कार देगी सरकार। वे सच्चे लक्ष्मीपुत्र हैं। जनता लाइन में खड़ी होकर परेशान है, और उन्होंने अंदर ही अंदर एक छोटी-सी ऐसी लाइन बना रखी है, जो जनता की आंखों से ओझल है। करोड़ों, अरबों रुपयों का खेल अंदर ही अंदर चल रहा है। जो पकड़े गये, वे चोर हैं, और जो पकड़े नहीं गये, वे साधु हैं।

मैं नोटबंदी के खिलाफ बिल्कुल, बिल्कुल नहीं हूं, लेकिन जिस तरह से देश के लोग लाइन में चार पांच दिनों तक लगकर परेशान हो रहे हैं, इससे मैं परेशान जरूर हूं। मैं पूछना चाहता हूं जो लोग नोटबंदी का स्वागत कर रहे हैं, क्या वे कभी लाइन में लगे हैं। क्या आमिर खान कभी लाइन में लगे हैं। क्या मोदी जी और भाजपा के दूसरे नेता लाइन में लग कर कैश उठाया है? देश में जितने बड़े बड़े आदमी हैं, क्या उन्होंने कभी यह सोचा है कि रात भर जागकर पैसा उठाना कितना कष्टकर काम है? सभी नेता कहते रहते हैं कि कुछ परेशानी है, कुछ परेशानी है या ज्यादा परेशानी है, इस फर्क को भी महसूस करना पड़ेगा। आज तक किसी भी नेता ने यह बयान नहीं दिया कि हां, लोगों को बहुत परेशानी हो रही है। हमें यह जानकर कष्ट हो रहा है। हम आपको साथ हैं। क्या वे नेता खबरें नहीं पढ़ते, टेलिविजन नहीं देखते। लंबी लंबी कतारें नहीं देखते? लोग मर रहे हैं, वह नहीं देखते। बुजुर्ग रो रहे हैं पैसे नहीं मिलने के कारण, वह नहीं देखते। एक बच्छी ने दो दिन पहले दम तोड़ दिया। यह नहीं देखते। या फिर आंख मूंद कर बैठे हैं। स्वान्त सुखाय वाली स्थिति हो गई है।

याद रखें, व्यक्ति अकेले ही पैदा होता है और अकेले ही मरता है। अपने कर्मों के शुभ-अशुभ परिणाम अकेले ही भोगता है। अकेले ही नरक में जाता है या सद्गति प्राप्त करता है। क्या हमारे देश के नेता भी नरक में ही जाना चाहते हैं?

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