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कुमार पंकज के कीबोर्ड से: मुलायम ने चला दांव, ब्रैंड अखिलेश में ‘पाल बंधु’ का तड़का...

कुमार पंकज  वरिष्ठ पत्रकार

समाचार4मीडिया ब्यूरो 9 years ago

कुमार पंकज 
वरिष्ठ पत्रकार
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव एक बार फिर सुर्खियों में हैं।  उनकी सुर्खियां जिन भी वजहों से है लेकिन इसके पीछे 'पाल बंधु' यानी रामगोपाल और शिवपाल की भूमिका महत्वपूर्ण है। भले ही समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ताओं की दृश्टि से 'पाल बंधु' खलनायक की स्थिति में हो लेकिन अखिलेश की ब्रैंडिग करने में इनकी महत्वपूर्ण भूमिका है।
समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव राजनीति के मजे हुए खिलाड़ी हैं और उन्होने जो भी दांव खेला है वह काफी सोच-समझकर खेला है। सियासत की अपनी मजबूरियां होती हैं और सत्ता को हस्तांतरण करने की अपनी मजबूरी। मुलायम सिंह यादव के सामने यह दोनों मजबूरियां आज खुलकर सामने आ गई हैं। सियासत में लंबे समय से संघर्ष के साथी रहे नेताओं को साधना मुलायम की मजबूरी है तो सत्ता हस्तांतरण में भी बड़े बेटे अखिलेश को मजबूत बनाना पिता का दायित्व। मुलायम ने भले ही शिवपाल के कहने पर बेटे को पार्टी से निकाल दिया लेकिन दूसरी चाल उन्होने यह भी चली कि रामगोपाल को भी पार्टी से निकाल दिया। इसमें कोई दो राय नहीं है कि मुलायम दोनों ही भाइयों की सियासी चाल से वाकिफ न हो। दोनों तरफ से ही वह इस चीज को समझ रहे हैं कि अगर शिवपाल या रामगोपाल कोई भी अखिलेश के साथ जुड़ा रहा तो दोनों ही नुकसान कर सकते हैं, क्योंकि शिवपाल की स्वयं की महत्वाकांक्षा है तो रामगोपाल की अपने बेटे को युवा चेहरे के रुप में उभारने की महत्वाकांक्षा।
शिवपाल और रामगोपाल की चाल को मुलायम भी भली भांति समझते हैं लेकिन इन सबके बावजूद अखिलेश की ब्रैंडिंग करने में कोई कसर नहीं छोड़ते हैं। यही कारण है कि जबसे अखिलेश ने सत्ता संभाली है, बीच-बीच में मुलायम नसीहत देकर अखिलेश की ब्रैंडिंग करते रहे हैं। समाजवादी पार्टी की सियासत को नजदीक से जानने वाले समझ सकते हैं कि हिंदी पट्टी का नये हीरो अखिलेश यादव की सोच दूरदर्शी है और वे अगले 20-25 साल तक देश और प्रदेश की सियासत में महत्वपूर्ण दखल रखने वाले हैं।
पिछले दो दिनों के घटनाक्रम में अखिलेश यादव की जो छवि उभरकर सामने आई है वह दक्षिण के नेताओं की तरह है। इससे पहले उत्तर भारत की सियासत में कभी भी अपने नेता को चाहने वाले इस तरह से विरोध-प्रदर्शन करते नजर नहीं आए।
मीडिया ने भी अखिलेश की ब्रैंडिंग करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। नोटबंदी से उपजे हालात और नए साल के जश्‍न की तैयारियों के बीच अखिलेश यादव साल 2016 के अंत में सबसे ज्यादा टीवी पर दिखाई देने वाला चेहरा बन गए। वजह पूरा देश जानता है। विरोधियों की नजर में पिता के लायक पुत्र को नालायक की दृष्ठि से जरुर देखा जा सकता है लेकिन पुत्र के फैसले को पिता दिल से स्वीकार भी कर रहे हैं। कुछ ऐसे दृश्य जिसकी झलक न तो आम जनता को मिली है और न ही मीडिया वालों को इसलिए उन दृश्यों पर भी गौर करने की जरुरत है। मुलायम सिंह यादव पुत्र को मजबूत करने के लिए उन सलाहकारों से भी दूरी बनाने की दिशा में अग्रसर हैं जिन्होने अखिलेश को कमजोर करने के लिए पूरी ताकत लगा दी। अखिलेश मुख्यमंत्री रहते हुए भी कई फैसले ले नहीं पाते थे क्योंकि कुछ फैसलों पर रामगोपाल का कब्जा था तो कुछ पर शिवपाल का। इसलिए विरोधी प्रदेश में कई मुख्यमंत्री होने की बात करते रहे। इसलिए पिता का दायित्व निभाते हुए मुलायम ने पुत्र के लिए वो रास्ता तैयार कर दिया है जिसमें अब किसी की छत्रछाया न हो। यानी की अखिलेश हर फैसला लेने के लिए स्वतंत्र हों। आज अखिलेश  ने जो फैसला लिया है वह उसी की एक बानगी है।
समाजवादी पार्टी टूटे या बिखरे एक बात साफ हो गई है कि अखिलेश अब एक ब्रैंड बन गए और मीडिया भी इस ब्रैंड को हाथों-हाथ ले रहा है। टीम अखिलेश के लिए यह फक्र की बात हो सकती है कि आज दो महत्वपूर्ण लोग जो कि अखिलेश की बराबरी में खड़ा होने का दंभ भरते थे वे रामगोपाल और शिवपाल अब टीम अखिलेश के लिए महज एक कार्यकर्ता भर रह गए हैं। पाल बंधुओं ने अखिलेश की ब्रैंडिंग में ऐसा तड़का लगा दिया है कि अब यह ब्रैंड जल्दी कमजोर होने वाला नहीं है। बाकी तो रही सही मजबूती मीडिया समय-समय पूरा ही करता रहता है।


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