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वरिष्ठ पत्रकार वेद प्रताप वैदिक का आंकलन: नेहरु और पटेल का संगम थीं इंदिराजी

डॉ. वेदप्रताप वैदिक श्रीमती इंदिरा गांधी का शताब्दि-वर्ष आज शुरु हो रहा है। केंद्र में कांग्रेस की

समाचार4मीडिया ब्यूरो 9 years ago

डॉ. वेदप्रताप वैदिक
श्रीमती इंदिरा गांधी का शताब्दि-वर्ष आज शुरु हो रहा है। केंद्र में कांग्रेस की सरकार नहीं है और बड़े नोटों की भगदड़ मची हुई है। ऐसे बदहवासी के माहौल में इस अवसर पर इंदिराजी को पता नहीं कितना याद किया जाएगा लेकिन इसमें शक नहीं है कि वे बेजोड़ प्रधानमंत्री रही हैं। अपने सही कामों के लिए और गलत कामों के लिए भी ! दोनों तरह के कामों के लिए उन्हें याद करना इसलिए जरुरी है कि उनके अनुभव वर्तमान और भावी प्रधानमंत्रियों के लिए तो उपयोगी सिद्ध होंगे ही, भारत के असली मालिकों यानी आम मतदाताओं के लिए भी लाभप्रद होंगे।
   जनवरी 1966 में श्री लालबहादुर शास्त्री के निधन के बाद जब वे प्रधानमंत्री बनीं तो उन्हें ‘गूंगी गुड़िया’ कहा जाता था। मुझे याद है कि एक पत्रकार-संगठन को संबोधित करते हुए जनवरी की कड़क ठंड में उनके चेहरे पर पसीने की बूंदें छलक आई थीं। संसद में ज्यों ही डाॅ. राममनोहर लोहिया और मधु लिमये अपनी सीटों पर जाकर बैठते, प्रधानमंत्री के चेहरे की घबराहट हम दर्शक-दीर्घा से पहचान लेते थे लेकिन इसी इंदिरा गांधी को विरोधी नेताओं ने 1971 में ‘दुर्गा’ कहकर संबोधित किया। जरा सोचिए कि इंदिराजी की जगह अगर कोई अन्य प्रधानमंत्री होता तो क्या बांग्लादेश बन सकता था?
    अमेरिका के राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन और चीनी नेता माओ त्से तुंग की गीदड़ भभकियों के बावजूद इंदिराजी ने बांग्लादेश खड़ा कर दिया। उन्होंने 1971 में पाकिस्तान के तो दो टुकड़े किए ही, उसके दो साल पहले उन्होंने कांग्रेस के भी दो टुकड़े कर दिए थे। तब मैंने कहा था कि अपने देश में दो कांग्रेस हैं- एक कुर्सी कांग्रेस और दूसरी बेकुर्सी कांग्रेस। निजलिंगप्पा और एस के पाटिल की बेकुर्सी कांग्रेस कहां गायब हो गई, पता ही नहीं चला। संजीव रेड्डी ताकते रह गए और वी.वी. गिरी राष्ट्रपति बन गए।
इसी तरह जब सिक्किम के छोग्याल ने आंखें तरेरीं तो इंदिराजी ने सिक्किम का भी भारत में विलय कर लिया। भूतपूर्व राजाओं के प्रिवी-पर्स खत्म करने और बैंकों के राष्ट्रीयकरण जैसे कदम उठाने में उन्होंने जो दृढ़ता दिखाई, वह भी उल्लेखनीय है। कभी-कभी मैं सोचता हूं कि इंदिराजी थीं तो नेहरुजी की बेटी लेकिन उन्होंने अपने व्यक्तित्व में आत्मसात किया था, सरदार वल्लभभाई पटेल के गुणों को भी ! मान लीजिए कि 1947-48 में नेहरुजी की जगह इंदिराजी प्रधानमंत्री होतीं तो क्या होता? पहली बात तो यह कि डर के मारे पाकिस्तान कश्मीर को कब्जाने की कोशिश ही नहीं करता और यदि करता तो शायद अपने पंजाब की भी कुछ जमीन खो देता। मुझे याद है कि 1983 में जब पहली बार मैं पाकिस्तान गया और वहां के नेताओं और विदेश नीति विशेषज्ञों से संवाद हुआ तो इंदिराजी का नाम जुबान पर आते ही उनमें कैसी बौखलाहट पैदा हो जाती थी? इंदिराजी के व्यक्तित्व में नेहरु और पटेल का संगम हो गया था।
    सारी दुनिया के विरोध के बावजूद इंदिराजी ने 1974 में पोखरन में परमाणु अंतःस्फोट किया। अमेरिका से लेकर जापान तक के राष्ट्रों को बुखार चढ़ गया। भारत पर तरह-तरह के प्रतिबंध थोप दिए गए लेकिन इंदिराजी डिगी नहीं। उन्होंने परमाणु अप्रसार-संधि और समग्र परीक्षण प्रतिबंध संधि पर दस्तखत नहीं किए तो नहीं किए। वही नीति आज भी चल रही है। इंदिराजी के उस साहसिक कदम को मैंने ‘भारतीय संप्रभुता का शंखनाद’ कहा था। श्री अटलबिहारी वाजपेयी ने परमाणु-विस्फोट करके इस नीति में ही चार चांद लगाए।
    इंदिराजी जो भी काम करती थीं, धड़ल्ले से करती थीं। कांग्रेस अध्यक्ष बनते ही उन्होंने केरल की कम्युनिस्ट सरकार को कड़ा सबक सिखा दिया। नंबूदिरीपाद की सरकार के विरुद्ध ज्यों ही असंतोष भड़का, कांग्रेस अध्यक्ष के नाते उन्होंने उसे बर्खास्त करवाने में पूरा जोर लगा दिया। प्र.म. नेहरु का रुख नरम था लेकिन कांग्रेस अध्यक्ष के गरम रुख के आगे उन्हें झुकना पड़ा। प्रधानमंत्री बनने के तुरंत बाद इंदिराजी ने देश के कई चुनींदा बौद्धिकों को अपने मंत्रिमंडल में स्थान दिया। रुपए के अवमूल्यन और पीएल-480 समझौता करने पर उन्हें अमेरिकापरस्त होने के आरोप सहने पड़े। शुरु-शुरु में वियतनाम पर उनकी नरमी को भी गुट-निरपेक्षता से भटकना बताया गया लेकिन उन्होंने पी एन हाक्सर, डीपी धर और शारदाप्रसाद जैसे मेधावी और अनुभवी सलाहकारों की मदद से नेहरु की गुट-निरपेक्षता को नई धार प्रदान की।
     उन्होंने 1981 में विश्व गुट-निरपेक्ष सम्मेलन आयेाजित किया, जिसमें क्यूबा के फिदेल कास्त्रो ने भी भाग लिया। 1971 में उन्होंने भारत-सोवियत संधि पर दस्तखत किए लेकिन सोवियत सेनाओं ने अफगानिस्तान पर कब्जा किया तो उन्होंने रुसी नेता लियोनिद ब्रेझनेव को खरी-खरी सुनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। उन्होंने अमेरिका के साथ अच्छे संबंध बनाने की भरपूर कोशिश की लेकिन अमेरिका ने जब भी कोई अनुचित कदम उठाया, इंदिराजी चुप नहीं बैठीं। सरदार स्वर्णसिंह-जैसे कुशल विदेश मंत्री को सक्रिय करके वे चीन और पाकिस्तान-जैसे कठिन पड़ौसियों से भी निपटती रहीं। पड़ौसी देशों के साथ इंदिराजी के दौर में भारत के खट्टे-मीठे संबंध जरुर रहे लेकिन एक बात पक्की है कि उन देशों में यह दहशत बैठ गई थी कि यदि भारत के खिलाफ वे कोई साजिश करते पाए गए तो उन्हें दिल्ली में बैठी दुर्गा मैया का सामना करना पड़ेगा। अमेरिका ने भी मान लिया था कि भारत दक्षिण एशिया की महाशक्ति बन गया है। इसका श्रेय यदि इंदिराजी को नहीं है तो किसको है?
    भारत में दर्जन-भर से भी ज्यादा प्रधानमंत्री हो चुके हैं। लेकिन चार प्रधानमंत्रियों को सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। नेहरु, इंदिरा, नरसिंहराव और अटलबिहारी वाजपेयी। इन चारों में भी इंदिराजी परमप्रतापी हुईं, इसमें शक नहीं लेकिन जिसका सबसे ज्यादा नाम हुआ, वही सबसे ज्यादा बदनाम भी हुआ। आपात्काल ने इंदिरा गांधी और कांग्रेस का जैसा बंटाढार किया, किसी प्रधानमंत्री का नहीं किया। राजनारायणजी ने जेल में रहते हुए ही इंदिराजी को बुरी तरह से हरा दिया। इंदिराजी के कुख्यात बेटे संजय गांधी ने भी मुंह की खाई। उत्तर भारत से कांग्रेस का लगभग सफाया हो गया। भारत की जनता ने बता दिया कि वह किसी परमप्रतापी प्रधानमंत्री को भी एक कागज की पर्ची फेंककर सूखे पत्ते की तरह उड़ा सकती है। यह बात ठीक है कि 12 जून 1975 के इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले के कारण आपात्काल आया। चुनावी धांधली करने का अपराध इंदिरा गांधी पर सिद्ध हुआ। उन्होंने इस्तीफा देने की बजाय अदालतों और संविधान से भी खिलवाड़ किया। उन्होंने आपात्काल ठोक दिया लेकिन हम यह न भूलें कि 1971 के चुनाव में 352 सीटें जीतने और बांग्लादेश का निर्माण होने के बाद से ही इंदिराजी के व्यक्तित्व में तानाशाही के बीज अंकुरित होने लगे थे। मुख्यमंत्रियों को आंख झपकते ही बदल दिया जाता था, कोई भी मंत्री अपना मुंह खोलने से घबराता था, कांग्रेस अध्यक्ष देवकांत बरुआ कहते थे कि ‘इंदिरा इज इंडिया’, युवराज संजय गांधी की मनमानियों के आगे पार्टी बेहाल थी, सरकारी खरीद में कमीशनबाजी का जबर्दस्त दौर शुरु हो गया था, सरकारी भ्रष्टाचार को संस्थागत मान्यता मिल गई थी और यही भ्रष्टाचार सोनिया-मनमोहन सिंह सरकार को भी ले बैठा।
    इंदिराजी को देश जब दुबारा 1980 में ले आया, तब भी उनकी दंबगई कम नहीं हुई। उन्होंने जिन सिख उग्रवादियों को शुरु में शै दी थी, उन्हीं के खिलाफ उन्हें ‘आपरेशन ब्लयू स्टार’ करना पड़ा। वह बड़ी हिम्मत का काम था। वही उनकी शहादत का कारण बना।
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