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जानिए, किस तरह संघर्षों में बीता है NDTV समूह के इस बड़े अधिकारी का बचपन...
समाचार4मीडिया ब्यूरो ।। ‘एनडीटीवी ग्रुप’ (NDTV Group) के एग्जिक्यूटिव वाइस चेयरपर्सन केवीएल नारायण राव के बारे में शायद यह बात बहुत ही कम लोगों को पता होगी कि वह पूर्व सेना प्रमुख जनरल केवी कृष्ण राव के बेटे हैं। पूर्व स
समाचार4मीडिया ब्यूरो 9 years ago
समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
‘एनडीटीवी ग्रुप’ (NDTV Group) के एग्जिक्यूटिव वाइस चेयरपर्सन केवीएल नारायण राव के बारे में शायद यह बात बहुत ही कम लोगों को पता होगी कि वह पूर्व सेना प्रमुख जनरल केवी कृष्ण राव के बेटे हैं। पूर्व सेना प्रमुख के अलावा जनरल केवी कृष्ण राव जम्मू-कश्मीर, मणिपुर, नागालैंड और त्रिपुरा के राज्यपाल भी रह चुके हैं। पिछले साल जनवरी में 92 साल की उम्र में जनरल केवी कृष्ण राव का दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया था।
हाल ही में केवीएल नारायण राव ने एक आर्टिकल लिखा है। इसमें उन्होंने बताया है कि एक सैन्य अधिकारी के बेटे के रूप में किस प्रकार उनकी परवरिश हुई। इसके अलावा उन्होंने इस आर्टिकल में उस घटना का भी जिक्र किया है, जब जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल पद पर रहते हुए उनके पिता पर आत्मघाती हमला हुआ था।
जब मैं छोटा था तो अंबाला, ऊधमपुर और जम्मू-कश्मीर जैसे शहरों में रहना हमारे लिए काफी मुश्किल भरा था। हम सभी परिवार के लोग साथ रहते थे। हालांकि जब मेरे पिता की पोस्टिंग ‘फील्ड’ एरिया में हुई तब चीजें काफी बदल गईं क्योंकि परिवार को वहां ले जाने की अनुमति नहीं थी और हमें अलग रहना पड़ा।
1965 में जब मेरी उम्र 11 साल की थी, मेरी बहन आठ साल की थी और मां की उम्र तकरीबन 32 वर्ष रही होगी, उस समय मेरे पिता लद्दाख में पोस्टेड थे और चीन के सामने उनके पास एक बिग्रेड की कमांड थी। वह करीब 17000 फीट की ऊंचाई पर तैनात थे जहां का तापमान (-40) डिग्री सेल्सियस था। उनकी टुकड़ी 22000 फीट की ऊंचाई तक फैली हुई थी। तब हम चेन्नई में रहते थे और अपने पिता से वर्ष भर में दो बार सिर्फ तभी मिल पाते थे जब वह छुट्टियों में घर आते थे। उस समय मोबाइल की तो बात ही दूर, वहां टेलीफोन लाइन भी नहीं थी। उस समय बातचीत का सिर्फ एक साधन पत्र (letters) होता था जो पहुंचने में करीब एक महीना ले लेता था।
1970 में मेरे पिता मेजर जनरल बन गए और उन्हें नागालैंड के जखामा में तैनाती मिली। उस समय नागालैंड में विद्रोह चरम पर था और मेरे पिता पर बहुत बड़ी जिम्मेदारी थी। उस समय उनकी निजी सुरक्षा भी हमेशा खतरे में रहती थी। हमारा परिवार फिर एक बार अलग हो गया और हम उस दौरान सिकंदराबाद में रहने लगे। उस समय भी हम अपने पिता को लेटर लिखते थे। हालांकि अब हमारे घर पर टेलिफोन था और करीब 15 दिनों में एक बार पिताजी ट्रंक कॉल (trunk call) करते थे और मेरी मां से उनकी करीब तीन मिनट बात हो पाती थी। जब वे छुट्टी पर होते थे तो प्रत्येक शाम को एक डिस्पैच राइडर (dispatch rider) घर आता था और SITREP (Situation Report) देकर जाता था, जिससे उन्हें नागालैंड के हालात के बारे में पता रहता था। उस समय परिस्थितियां काफी खराब थीं और हमारे पिता हमारे साथ नहीं थे।
यह मई 1971 की बात है, जब मैं अपने एक दोस्त के साथ ट्रेन से कोयंबटूर जा रहा था और उस समय हमारे पास रिजर्वेशन नहीं था। हम बिना रिजर्वेशन वाले डिब्बे में खुले हुए गेट के पास बैठे हुए थे। हमारे पैर डिब्बे से नीचे लटके हुए थे। तभी अचानक ट्रेन एक स्टेशन के पास से तेजी से गुजरी और हम ट्रेन व प्लेटफार्म के बीच फंस गए और घिसटते हुए चले गए। हमें गंभीर चोट लगी थी और हमें तुरंत अस्पताल जाना था। हमारे दो अन्य दोस्तों ने भी वहां हमारी मदद की और हमें कोयंबटूर के एयरफोर्स हॉस्पिटल में ले जाया गया। मुझे काफी गंभीर चोट लगी थीं और मुझे कुछ समय तक कोयंबटूर के अस्पताल में रखने के बाद ऊटी के पास वेलिंगटन भेज दिया गया। पुणे के कमांड हॉस्पिटल में मेरी सर्जरी होनी थी। इस बीच मेरी पिता की डिवीजन को खास जिम्मेदारी सौंपी गई थी और वे उसी की तैयारियों में लगे थे। जिससे न तो पिता नागालैंड से और न ही मां सिकंदराबाद से मुझे देखने आ सके। उस समय इतनी गंभीर चोटों के बावजूद मुझे अपने पैरेंट्स के बिना ही अस्पताल में रहना पड़ा।
मुझे याद है कि शुरुआत में मैंने इस बात का विरोध किया था लेकिन जल्द ही स्थितियों को समझ गया था। मेरे पिता के पास काफी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी थी और मेरी मां को बहन का ध्यान रखना था। जब मुझे अस्पताल से छुट्टी मिल गई और मैंने कॉलेज शुरू किया, तब भी पिता इसी वजह से नहीं आ सके। मुझे याद है कि जब पिता को PVSM (Param Vishisht Seva Medal) मिला था तो मुझे काफी गर्व महसूस हुआ था। इसके अलावा भी मेरी जिंदगी में ऐसे कई वाकये हुए, जब मुझे अपने परिवार की काफी याद आई।
26 जनवरी 1995 को जब मेरे पिता जम्मू-कश्मीर के गवर्नर थे, उस समय जम्मू में गणतंत्र दिवस की परेड के दौरान एक जनसभा को संबोधित करते समय उनके ऊपर एक हमला हुआ था। उस दौरान तीन बम विस्फोट हुए लेकिन गनीमत रही कि पिता बाल-बाल बच गए हालांकि उस हमले में कई लोगों की मौत भी हो गई थी। मेरी मां ने फोन कर मुझे इस बात की जानकारी दी और बताया कि वे घर आ गए हैं। मां ने मुझसे यह भी कहा कि इन बारे में न्यूज रिपोर्ट को देखकर मैं परेशान न होऊं और वे लोग ठीक हैं।
वर्ष 2007 में मेरी मां की मौत हो गई और जनवरी 2016 में पिता का भी देहावसान हो गया। इस घटना के कुछ दिनों बद जब मैं सिकंदराबाद वाले घर में एक अलमारी को देख रहा था तो मुझे अपनी मां की एक साड़ी मिली जो उन्होंने 26 जनवरी 1995 को पहनी हुई थी। इसमें काफी छेद थे और विस्फोट के कारण एसिड गिरने के कारण इस पर जलने के काफी निशान थे। दरअसल, जब मेरी मां कार्यक्रम स्थल पर बैठी हुई थीं, उस दौरान कुछ टुकड़े उनके ऊपर भी आकर गिरे थे। लेकिन उन्होंने मुझे बताया था कि वे सब ठीक हैं लेकिन असलियत में ऐसा नहीं था।
केवीएल नारायण राव के मूल तौर पर अंग्रेजी में लिखे इस पूरे आर्टिकल को आप नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं।
http://www.ndtv.com/blog/how-my-family-coped-with-my-fathers-assassination-attempt-and-more-1469586समाचार4मीडिया देश के प्रतिष्ठित और नं.1 मीडियापोर्टल exchange4media.com की हिंदी वेबसाइट है। समाचार4मीडिया.कॉम में हम आपकी राय और सुझावों की कद्र करते हैं। आप अपनी राय, सुझाव और ख़बरें हमें mail2s4m@gmail.com पर भेज सकते हैं या 01204007700 पर संपर्क कर सकते हैं। आप हमें हमारे फेसबुक पेज पर भी फॉलो कर सकते हैं।
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