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'सच दिखाने पर होती FIR है, यही तो आपातकाल है'

<p style="text-align: justify;">'सवाल यह है कि जिस प्रदेश की प्रशासनिक व्यवस्था एक सप्ताह तक चले सांप्रदायिक दंगे को नहीं रोक पाई, जो व्यवस्था दंगे शुरू होने के बाद चार दिनों तक किसी को हिरासत में नहीं ले पाई, उसी व्यवस्था ने 40 घंटे के अंदर एक राष्ट्रीय चैनल के संपादक, रिपोर्टर और कैमरापर्सन पर वास्तविक स्थिति की रिपोर्टिंग करने के कारण गैर-जमानती

समाचार4मीडिया ब्यूरो 9 years ago

'सवाल यह है कि जिस प्रदेश की प्रशासनिक व्यवस्था एक सप्ताह तक चले सांप्रदायिक दंगे को नहीं रोक पाई, जो व्यवस्था दंगे शुरू होने के बाद चार दिनों तक किसी को हिरासत में नहीं ले पाई, उसी व्यवस्था ने 40 घंटे के अंदर एक राष्ट्रीय चैनल के संपादक, रिपोर्टर और कैमरापर्सन पर वास्तविक स्थिति की रिपोर्टिंग करने के कारण गैर-जमानती धारा में FIR दर्ज कर ली।' डिजिटल न्यूज पोर्टल नवभारत टाइम्स डॉट कॉम (navbharattimes.com) में छपे अपने आर्टिकल के जरिए ये कहना है पत्रकार विश्व गौरव का। उनका पूरा आर्टिकल आप यहां पढ़ सकते हैं:

सच दिखाने पर होती FIR है, यही तो आपातकाल है

टूटते घर और रोता इंसान है,

खबरों को मिलता ‘सेक्सी’ आयाम है,

सच कहने पर होती एफआईआर है,

सही मायनों में यही तो आपातकाल है…

पश्चिम बंगाल… जहां जन्मे एक नरेंद्र ने विश्व पटल पर भारतवर्ष की सनातन परंपरा को प्रतिस्थापित करके भारतवर्ष को उसके वास्तविक गौरव का भान कराया… लेकिन आज परिस्थिति बदल चुकी है। आज वहां की राजनीतिक व्यवस्था तुष्टीकरण की राजनीति करके दो संप्रदायों को लड़वा रही है। यही तो अंग्रेज भी करते थे। ‘तोड़ो और राज करो’ की नीति तो उन्होंने भी अपनाई थी। आखिर क्यों आज मेरे भारत में ऐसी स्थितियां आ गई हैं कि हम जिन्हें चुनकर सत्ता का संचालन करने भेजते हैं वे लोग हमें तोड़ने में ही लगे रहते हैं। और जब उनकी इस तोड़ने वाली नीति पर कोई सवाल उठाता है तो उसपर प्रदेश सरकार अपना सरकारी डंडा चलाते हुए FIR कर देती है।

जी हां, पश्चिम बंगाल के धूलागढ़ में कुछ ऐसा ही हुआ। मिलाद-उन-नबी के अगले दिन यानी 13 दिसंबर से दंगे शुरू हुए। 17 दिसंबर को सबसे पहले ज़ी न्यूज ने वहां के जमीनी हालात दिखाए। इसके बाद भी इक्का-दुक्का मीडिया संस्थानों को छोड़कर किसी ने वहां की खबर को प्रमुखता नहीं दी। हो सकता है कि धूलागढ़ की ग्राउंड रिपोर्ट के बारे में आपको अभी भी पता न हो।  जब लोगों के घर जलाए जा रहे थे पुलिस पीड़ितों की मदद करने के बजाय उन्हें पलायन करने की सलाह दे रही थी। कई लोग जिनके घर जला दिए गए थे, उनके सिर के ऊपर आज भी छत नहीं है। तस्वीरों के जरिए भी आप समझ सकते हैं कि उपद्रवियों ने किस कदर कहर ढाया था।

सवाल यह है कि जिस प्रदेश की प्रशासनिक व्यवस्था एक सप्ताह तक चले सांप्रदायिक दंगे को नहीं रोक पाई, जो व्यवस्था दंगे शुरू होने के बाद चार दिनों तक किसी को हिरासत में नहीं ले पाई, उसी व्यवस्था ने 40 घंटे के अंदर एक राष्ट्रीय चैनल के संपादक, रिपोर्टर और कैमरापर्सन पर वास्तविक स्थिति की रिपोर्टिंग करने के कारण गैर-जमानती धारा में FIR दर्ज कर ली। हो सकता है कि आप ज़ी न्यूज को किसी खास पार्टी या विचारधारा का समर्थक मानते हों, लेकिन जिस विषय को लेकर उसके मीडियाकर्मियों पर एफआईआर हुई है उस रिपोर्ट पर कोई भी राय बनाने से पहले एक बार उस विडियो को देख लीजिए।

क्या आपको भी लगता है कि इस रिपोर्टिंग के लिए पत्रकारों पर केस दर्ज किया जाना चाहिए? क्या आपको एक जगह पर भी ऐसा लगा कि इस रिपोर्ट में दूसरे समुदाय के खिलाफ हिंसा भड़काने की भावना थी? मुझे तो नहीं लगा और निष्पक्ष लोगों का आकलन यही होगा कि दंगे के दौरान मूकदर्शक रहने वाला पुलिस-प्रशासन अब मेसेंजर को ही शूट करने की मुद्रा में आ चुका है। खैर, उनसे तो उम्मीद भी यही थी, लेकिन मेरा सवाल उन लोगों से है जो कल तक कह रहे थे, ‘हम कुछ भी दिखाएं, हम कुछ भी चलाएं, सरकार को हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।’ क्या ‘संपूर्ण स्वतंत्रता’ के पैरोकार इस मामले में अब चुप्पी तोड़ेंगे? पन्ने काले करेंगे या एक-दो घंटे का शो चलाएंगे?

मेरी समझ से बंगाल की राजनीति में एक तरह का अतिवाद काफी समय से है, लेकिन पिछले एक साल से जिस तरह की राजनीति वहां दिख रही है वह काफी हैरान करने वाला है। इससे भी ज्यादा हैरान करने वाली बात यह है कि बुद्धिजीवी तबका और पत्रकार वर्ग इसको लेकर चुप्पी साध लेते हैं। कल्पना कीजिए कि ऐसा ही दंगे गुजरात, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ या राजस्थान जैसे किसी राज्य में होते तो बौद्धिक और पत्रकारिता के प्रतिष्ठानों का रुख क्या होता। इस साल के शुरू में जनवरी में भी मालदा के कालियाचक में भी ऐसी ही हिंसा हुई थी और एक समुदाय विशेष के घरों और संपत्तियों को चुन-चुनकर निशाना बनाया गया था। अक्टूबर में मां दुर्गा की मूर्तियों के विसर्जन तक पर राज्य सरकार की ओर से अंकुश लगाने की कोशिश की गई थी। इसके बाद हाई कोर्ट को हस्तक्षेप करना पड़ा था और ममता सरकार को फटकार लगाते हुए कहा था कि तुष्टीकरण की यह नीति खतरनाक साबित हो सकती है।

मैं यहां किसी पार्टी या दलगत राजनीति की बात नहीं कर रहा हूं। मेरी रुचि इसमें भी नहीं है कि कौन-सी पार्टी सत्ताधारी है या बनेगी। मेरी चिंता इस बात को लेकर है कि देश में वैभव और समरसता रहे। एक बार तो आपको भी सोचना पड़ेगा कि हम जिनको नेता मानते हैं, हम जिन्हें व्यवस्था की जिम्मेदारी सौंपते हैं, वे देश को हाशिए पर रखकर अलग-अलग तरह के तुष्टीकरण में क्यों रम जाते हैं? एक बार तो सवाल आपको भी उन अभिव्यक्ति के पैरोकारों से पूछना पड़ेगा कि सच दिखाकर एफआईआर झेलना क्या मीडिया की आजादी का हनन नहीं है? अंत में यही कहना चाहूंगा कि जो मौन हैं, समय लिखेगा उनका भी अपराध।

(साभार: navbharattimes.com)

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