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नहीं रहे जाने-माने वरिष्ठ पत्रकार अनुपम मिश्र, राजेश बादल ने कुछ यूं किया याद...
समाचार4मीडिया ब्यूरो ।। जाने-माने वरिष्ठ पत्रकार, गांधीवादी, पर्यावरणविद् और जल संरक्षणवादी अनुपम मिश्र नहीं रहे। सोमवार तड़के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में अंतिम सांस ली। वह 68 वर्ष के थे। खबरों के मुताबिक, पिछले
समाचार4मीडिया ब्यूरो 9 years ago
समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
जाने-माने वरिष्ठ पत्रकार, गांधीवादी, पर्यावरणविद् और जल संरक्षणवादी अनुपम मिश्र नहीं रहे। सोमवार तड़के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में अंतिम सांस ली। वह 68 वर्ष के थे।
खबरों के मुताबिक, पिछले एक साल से वह कैंसर से लड़ रहे थे। अनुपम मिश्र के शव को दोपहर 11 बजे गांधी शांति फाउंडेशन लाया गया। यहीं से उनकी शवयात्रा शुरू की गई। उनका अंतिम संस्कार दोपहर 1.30 बजे निगम बोध घाट में किया गया।
अनुपम मिश्र गांधी शांति प्रतिष्ठान के ट्रस्टी एवं राष्ट्रीय गांधी स्मारक निधि के उपाध्यक्ष भी थे। उन्होंने पर्यावरण के साथ भाषा पर बहुत काम किया। उनका अपना कोई घर नहीं था। वह गांधी शांति फाउंडेशन के परिसर में ही रहते थे। उनके पिता भवानी प्रसाद मिश्र प्रख्यात कवि थे। मिश्र के परिवार में उनकी पत्नी, एक बेटा, बड़े भाई और दो बहनें हैं।
मिश्र को इंदिरा गांधी राष्ट्रीय पर्यावरण पुरस्कार, जमना लाल बजाज पुरस्कार सहित कई पुरस्कारों से नवाजा जा गया। जल संरक्षण पर लिखी गई उनकी किताब 'आज भी खरे हैं तालाब' काफी चर्चित हुई और देशी-विदेशी कई भाषाओं में उसका अनुवाद हुआ। पुस्तक की लाखों प्रतियां बिक चुकी हैं।
उनकी अन्य चर्चित किताबों में 'राजस्थान की रजत बूंदें' और 'हमारा पर्यावरण' है। 'हमारा पर्यावरण' देश में पर्यावरण पर लिखी गई एकमात्र किताब है।
अनुपम मिश्र ऐसे पहले व्यक्ति हैं जिन्होंने देश में पर्यावरण पर काम शुरू किया। उस समय सरकार में पर्यावरण का कोई विभाग तक नहीं था। उन्होंने गांधी शांति प्रतिष्ठान में पर्यावरण कक्ष की स्थापना की। अनुपम मिश्र, जयप्रकाश नारायण के साथ दस्यु उन्मूलन आंदोलन में भी सक्रिय रहे।
उनके निधन पर वरिष्ठ पत्रकार व राज्यसभा टीवी के एग्जिक्यूटिव डायरेक्टर राजेश बादल ने अपने फेसबुक वॉल पर उन्हें कुछ इस तरह से याद किया-
अलविदा! अनुपम भाई
कोई साढ़े चार महीने पहले मैंने इसी स्थान पर भाई अनुपम मिश्र को सलाम किया था। उनकी अदभुत कृति- आज भी खरे हैं तालाब के लिए। आज सुबह अनुपम भाई हम सबको छोड़ कर अपनी उस यात्रा पर चले गए, जहां से लौट कर कोई नहीं आता। उन्नीस सौ पचहत्तर के आस पास अनुपम भाई से मुलाक़ात हुई थी और तब से एक बड़े भाई जैसा स्नेह उनसे मिलता रहा। उस समय उनकी पर्यावरण वाली किताबें नहीं आईं थीं।
उन दिनों चंबल घाटी डाकुओं के खौफ से थर्राती थी। डाकू मोहर सिंह और डाकू माधो सिंह जैसे गिरोह राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश की सरकारों के लिए मुसीबत बन गए थे। तब लोगों को विनोबा भावे के डाकू समर्पण अभियान की याद आई थी और लोकनायक जयप्रकाश नारायण दूसरे डाकू आत्मसमर्पण अभियान के सूत्रधार बने थे। लेकिन इसकी तैयारियां तो महीनों पहले शुरू हो गई थीं। चंबल के खुंखार डाकू गिरोहों से संपर्क करने और उन्हें हथियार डालने के लिए तीन लोगों ने परदे के पीछे बड़ी भूमिका निभाई थी।
ये थे - प्रभाष जोशी, अनुपम मिश्र और श्रवण कुमार गर्ग। इन लोगों ने महीनों तक बीहड़ों की खाक़ छानी, बिना किसी सुरक्षा के डाकू गिरोहों की मांद में पहुंचे और उन्हें समर्पण के लिए मनाया। यह समर्पण अभियान आज भी चंबल घाटी का सबसे क़ामयाब अभियान माना जाता है। इसके बाद इन तीनों ने एक किताब लिखी- चंबल की बंदूकें गांधी के चरणों में। यह इस अभियान का इकलौता प्रामाणिक दस्तावेज़ है। इसी के कुछ समय बाद मेरी उनसे मुलाक़ात हुई। तबसे अनुपम भाई ने मुझे अपना स्नेहभाजन बना लिया।
अनुपम भाई हमेशा खामोशी से अपना काम करते रहे। कभी प्रचार की भूख उनके अंदर नहीं जगी। सर्वोदयी और गांधीवादी अनुपम भाई के जाने से इस देश ने एक बेजोड़ चिंतक, विचारक, लेखक और पर्यावरण विद खो दिया है। सलाम और अलविदा अनुपम भाई।
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