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कैसे रियो ओलंपिक ने भारत को दिखाया आइना, पढ़ें वरिष्ठ पत्रकार हरिशंकर व्यास का ये लेख
‘रियो ओलंपिक से एक और फर्क मालूम हुआ है। और वह यह कि आर्थिकी-राजनैतिक संकटों के बावजूद ब्राजील ने क्या खूबसूरती से अपनी राजधानी को सजाया। जिसने भी मैराथन दौड़ देखी है उसे रियो की सुंदरता, लैंडस्केप, समुद्र किनारे के म्युजियम ऑफ फ्यूचर के आर्किटेक्ट को देख लगा होगा कि वाह! किस विजन के साथ वहां के नेताओं और व्यवस्था ने
समाचार4मीडिया ब्यूरो 9 years ago
‘रियो ओलंपिक से एक और फर्क मालूम हुआ है। और वह यह कि आर्थिकी-राजनैतिक संकटों के बावजूद ब्राजील ने क्या खूबसूरती से अपनी राजधानी को सजाया। जिसने भी मैराथन दौड़ देखी है उसे रियो की सुंदरता, लैंडस्केप, समुद्र किनारे के म्युजियम ऑफ फ्यूचर के आर्किटेक्ट को देख लगा होगा कि वाह! किस विजन के साथ वहां के नेताओं और व्यवस्था ने अपनी राजधानी को बनाया।’ हिंदी दैनिक अखबार नया इंडिया में छपे अपने आलेख के जरिए ये कहना है वरिष्ठ पत्रकार और संपादक हरिशंकर व्यास का। उनका पूरा आलेख आप यहां पढ़ सकते हैं:
उफ! रियो ने हमें बताया आइना!
सबने कहा, सबने माना कि मोदी सरकार ने भारत की ओलंपिक टीम के लिए हर वह काम किया जो संभव था। भरपूर खर्चा हुआ। नामी प्रशिक्षकों के यहां बहुत पहले से खिलाड़ियों की ट्रेनिंग शुरू हुई। यह भी तथ्य है कि पहली बार सौ से ज्यादा खिलाड़ियों का भारतीय प्रतिनिधिमंडल रियो गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद पूरे प्रतिनिधिमंडल से मिल कर उन्हें विदाई दी। उनकी हौसला अफजाई के लिए जितने कदम उठ सकते थे, उठाए।
सचमुच रियो ओलंपिक में भारत की संभावनाओं पर जिन भी खेल पत्रकारों से मैंने बात की सबने कहा इस दफा पूरी तैयारी के साथ भारत के खिलाड़ी गए है। अच्छा शो होगा। मोदी सरकार की प्रतिष्ठा बनेगी। लेकिन वहीं ढाक के तीन पांत। 207 देशों की प्रतिस्पर्धा में दुनिया में आबादी का नंबर दो देश, सवा अरब आबादी वाला भारत 67वें स्थान पर है। चीन जिससे हम कंपीटिशन मानते हैं। ब्रिक्स जिसमें रूस, ब्राजील, चीन, दक्षिण अफ्रिका के साथ भारत उभरती आर्थिकी अपने को समझता है उन सबके आगे भारत छटांग भी नहीं है। चीन के 70, रूस के 56, ब्राजील के 19 और दक्षिण अफ्रीका के 10 पदकों के आगे भारत का एक-एक चांदी, तांबे का पदक दुनिया में क्या मोल लिए हुए है इसे जानना-समझना हो तो चीन, अमेरिका, ओमान आदि के अखबारों में भारत की दुर्दशा पर हुई टिप्पणीयों से समझा जा सकता है।
तभी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर देश के सभी सुधी जनों के लिए लाख टके का सवाल है कि इतना कुछ किया मगर फिर भी ओलंपिक में भारत के अच्छे दिन क्यों नहीं? ध्यान रहे 2008 के बीजिंग ओलंपिक में गोल्ड मेडल के साथ भारत ने तीन पदक जीते थे। 2012 के लंदन ओलंपिक में 6 पदक थे और अब रियो में हम दो पदक पर अटके। क्यों? सरकार जब प्रो-एक्टिव है। नरेंद्र मोदी ने खेल मंत्रालय को भी चुस्त, चौबीसों घंटे काम करने वाला बनाया हुआ है और पिछले तमाम ओलंपिक के मुकाबले अच्छे इंतजाम थे तब नतीजे क्यों नहीं अच्छे आए?
एक ही जवाब है और वह सभी मामलों पर लागू है। जवाब यह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी या देश का जो राजनैतिक नेतृत्व है वह उस सिस्टम का मारा है जिसमें 70 साल की कोशिशों के बावजूद हर मामले में ढाक के तीन पांत वाले नतीजे निकलते हैं। आप नारे कितने ही लगा लीजिए, आइडिया कितने ही ले आइए, प्रधानमंत्री आठ घंटे काम करें या अट्ठारह घंटे, होगा वही जो भारत राष्ट्र-राज्य के सिस्टम की बनावट है।
ओलंपिक खेलों की वैश्विक प्रतिस्पर्धा की कसौटी हमें बताती है कि हम जहां थे वहीं है। 70 साल के वक्त की गति के धक्के ने हमें आगे जरूर कुछ बढ़ाया है। उसमें सरकारों का, नेता का या सिस्टम का योगदान नहीं रहा है। योगदान होता तो हम चीन की तरह आगे बढ़े हुए होते। चीन की तरह ओलंपिक का अपने यहां भी आयोजन कर चुके होते। ब्रिक्स के रूस, चीन, ब्राजील ओलंपिक आयोजन कर चुके हैं और कहने को हम दुनिया की सर्वाधिक तेज रफ्तार की आर्थिकी होने का दांवा करते हैं लेकिन ओलंपिक के आयोजन की क्या अभी कल्पना हो सकती है? नहीं।
क्यों? इसलिए कि ओलंपिक आयोजन भी वैसा ही होगा जैसा दिल्ली में कॉमनवेल्थ आयोजन हुआ था। उसका आयोजन भारत की सड़ी नौकरशाही करेगी और उसमें वैसी ही बदनामी, वैसे ही विवाद होंगे जैसे कॉमनवेल्थ में हुए थे। रियो ओलंपिक से एक और फर्क मालूम हुआ है। और वह यह कि आर्थिकी-राजनैतिक संकटों के बावजूद ब्राजील ने क्या खूबसूरती से अपनी राजधानी को सजाया। जिसने भी मैराथन दौड़ देखी है उसे रियो की सुंदरता, लैंडस्केप, समुद्र किनारे के म्युजियम ऑफ फ्यूचर के आर्किटेक्ट को देख लगा होगा कि वाह! किस विजन के साथ वहां के नेताओं और व्यवस्था ने अपनी राजधानी को बनाया। हमारी दिल्ली कैसी बनी है या बन रही है? बहरहाल मुद्दा यह है कि शहर हो, आयोजन हो या खेल, हम किसी भी मामले में क्यों नहीं रियो दि जिनेरो, बीजिंग, लंदन या एथेंस आदि के ओलंपिक आयोजनों में छटांग हैसियत भी लिए नजर नहीं आते?
हिसाब से इस सवाल पर सर्वाधिक नरेंद्र मोदी, भाजपा और संघ परिवार को सोचना चाहिए। इसलिए कि ये सब जिस नौकरशाही, व्यवस्था के बूते मेक इन इंडिया, डिजिटल इंडिया, स्मार्ट सिटी, स्वच्छ भारत, स्टार्ट अप इंडिया आदि के ख्वाब देख रहे हैं उनका तीन साल बाद हश्र वहीं होगा जो रियो ओलपिंक में टीम इंडिया का हुआ। तथ्य है कि जो खिलाड़ी हैं वह गोल्ड, सिल्वर लेना चाहेगा, जो भारत का उद्योगपति है वह मेक इन इंडिया चाहेगा, जो भारत का नागरिक है वह स्वच्छ इंडिया चाहेगा लेकिन कहने, चाहने से भारत में हो क्या सकता है, इस हकीकत में ही तथ्य है कि आईआईटी का भारत से निकला नौजवान भारत में नहीं सिलिकोन वैली में जा कर काम करेगा। वह वहां स्टार्ट अप करेगा पर भारत में नहीं। भारत का उद्योगपति चीन में बिजली के प्रॉडक्ट बना कर भारत में अपने ब्रैंड से उन्हें बेचेगा, इसलिए कि भारत के अफसरों, नौकरशाहों ने, व्यवस्था ने एक ऐसा बासी दमघोटू माहौल बनाया हुआ है जिसमें खिलाड़ी भी खिलता नहीं है और उद्योगपति, प्रतिभाशाली नौजवान भी जोश नहीं पाता।
भारत की त्रासदी है कि सिस्टम सबकों मारता है जबकि नेतृत्व उससे बम-बम फूलता है या यों कहे कि वह उससे चांद-सितारे भारत में उतरते देखता है। जैसा मैं पहले लिख चुका है खेल के तपस्वी अपनी हठ में अपना सबकुछ न्यौछावर करते हैं और भारत में हठ से ही खिलाड़ी बनता है। पर सिस्टम की घुटन भरी आबोहवा और कुछ डीएनए की दिक्कत में उसमें वह किलिंग इन्सीट्क्ट नहीं होती जिससे विश्व सिरमौर हुआ जाता है।
(साभार: नया इंडिया)
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