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राहुल गांधी की सिनेमा की बचकानी समझ: अनंत विजय
लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या वास्तव में यह कोई नई प्रवृत्ति है? क्या भारतीय सिनेमा और वेब सीरीज में राजनीतिक विचारों और वैचारिक संदेशों का इस्तेमाल पहले नहीं होता था?
समाचार4मीडिया ब्यूरो ।। 3 hours ago
अनंत विजय, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक।
लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने केरल में कॉलेज छात्रों से बातचीत के दौरान कहा कि फिल्मों, टीवी और मीडिया का उपयोग आज “हथियार” के रूप में किया जा रहा है। उन्होंने फिल्म ‘द केरला स्टोरी 2’ का उदाहरण देते हुए कहा कि ऐसी फिल्में समाज में विभाजन पैदा करने और लोगों को बदनाम करने के उद्देश्य से बनाई जाती हैं। राहुल गांधी के इस बयान से यह संकेत मिलता है कि जैसे फिल्मों और मीडिया का राजनीतिक उपयोग हाल के वर्षों में शुरू हुआ है।
लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या वास्तव में यह कोई नई प्रवृत्ति है? क्या भारतीय सिनेमा और वेब सीरीज में राजनीतिक विचारों और वैचारिक संदेशों का इस्तेमाल पहले नहीं होता था? सिनेमा के इतिहास को देखें तो यह स्पष्ट होता है कि फिल्मों में वैचारिक और राजनीतिक संदेश हमेशा से मौजूद रहे हैं।
सिनेमा और विचारधारा का पुराना संबंध
भारतीय सिनेमा के शुरुआती दौर से ही फिल्मों में सामाजिक और राजनीतिक विचारधाराओं की झलक दिखाई देती रही है। स्वाधीनता के पहले और बाद की कई फिल्मों में उस समय के सामाजिक और राजनीतिक विचारों को परोसा गया। ‘नया दौर’ और ‘मदर इंडिया’ जैसी फिल्मों में उस समय की वैचारिकी को कलात्मक रूप में प्रस्तुत किया गया था। ‘नया दौर’ में महात्मा गांधी के ग्राम स्वराज और जवाहरलाल नेहरू के औद्योगीकरण के दृष्टिकोण के बीच टकराव को भी प्रतीकात्मक रूप में दिखाया गया। कई फिल्म इतिहासकारों ने इस पर विस्तार से लिखा है।
फिल्मकार ख्वाजा अहमद अब्बास जैसे कई रचनाकार खुले तौर पर वामपंथी विचारधारा से प्रभावित थे और उनकी कहानियों में वह दृष्टिकोण दिखाई देता था। नक्सल आंदोलन की पृष्ठभूमि पर बनी फिल्म ‘द नक्सलाइट्स’ भी इसी वैचारिक परंपरा का हिस्सा थी। बाद के वर्षों में भी कई फिल्में और कथानक राजनीतिक मुद्दों से जुड़े रहे। आमिर खान अभिनीत ‘फना’ जैसी फिल्मों में कश्मीर जैसे संवेदनशील मुद्दों को कथानक का हिस्सा बनाया गया। इसी तरह 2002 के गुजरात दंगों की पृष्ठभूमि से प्रेरित बताई गई फिल्म ‘परजानियां’ को लेकर भी उस समय काफी विवाद हुआ था। उस दौर में भी फिल्मों की राजनीतिक व्याख्या होती रही, लेकिन उन्हें लेकर आज जैसी बहस शायद कम दिखाई देती थी।
वेब सीरीज और नई बहस
डिजिटल प्लेटफार्म और ओटीटी के आने के बाद फिल्मों और वेब सीरीज में राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों की अभिव्यक्ति और अधिक खुलकर सामने आने लगी है। चूंकि ओटीटी प्लेटफार्मों पर सेंसर या प्रमाणन की व्यवस्था सीमित है, इसलिए कई बार ऐसी कहानियां और दृश्य सामने आते हैं जिनमें राजनीतिक टिप्पणियां या सामाजिक टकराव के चित्रण स्पष्ट दिखाई देते हैं। कई वेब सीरीज में धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों को कहानी का हिस्सा बनाया गया है।
उदाहरण के तौर पर कुछ चर्चित वेब सीरीज में पुलिस व्यवस्था, राजनीति या समाज के विभिन्न वर्गों के बीच तनाव को दिखाने का प्रयास किया गया है। इन कथानकों को कुछ लोग कलात्मक अभिव्यक्ति मानते हैं, जबकि कुछ लोग इन्हें वैचारिक संदेश देने का प्रयास मानते हैं। यही कारण है कि आज फिल्मों और वेब सीरीज को लेकर बहस और भी तेज हो गई है। यह बहस केवल किसी एक विचारधारा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह इस प्रश्न से भी जुड़ी है कि कला और मनोरंजन के माध्यमों का उद्देश्य केवल मनोरंजन है या सामाजिक और राजनीतिक संदेश देना भी।
दरअसल सिनेमा, साहित्य और कला के अन्य रूपों में संदेश और विचारधारा का समावेश कोई नई बात नहीं है। इतिहास गवाह है कि अलग-अलग समय में अलग-अलग विचारधाराओं ने कला और सिनेमा को अपने दृष्टिकोण को अभिव्यक्त करने के माध्यम के रूप में इस्तेमाल किया है। आज दर्शक पहले की तुलना में अधिक जागरूक और सजग हो चुके हैं।
वे फिल्मों और वेब सीरीज में प्रस्तुत विचारों को समझते हैं और अपनी प्रतिक्रिया भी देते हैं। यही कारण है कि किसी फिल्म या सीरीज को लेकर समर्थन और विरोध दोनों देखने को मिलते हैं। इसलिए फिल्मों और मीडिया को केवल राजनीतिक हथियार के रूप में देखना शायद सिनेमा की जटिल और बहुआयामी प्रकृति को पूरी तरह समझने के लिए पर्याप्त नहीं है।
( यह लेखक के निजी विचार हैं ) साभार - दैनिक जागरण।
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