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मुलायम सिंह की प्रोफाइल में कौन सा नया तथ्य जुड़ गया, बताया वरिष्ठ पत्रकार हरिशंकर व्यास ने

‘बेसिक बात को न समझना और बेटे को सार्वजनिक- पार्टी स्तर पर जलील करना ही मुलायम सिंह यादव के प्रोफाइल में जुड़ा नया वह तथ्य है जिसमें उनका बुढ़ापा सचमुच बहुत खराब बन रहा है।’ हिंदी दैनिक अखबार नया इंडिया में छपे अपने आलेख के जरिए ये कहना है वरिष्ठ पत्रकार और संपादक हरिशंकर व्यास का। उनका पूरा आलेख आप यहां पढ़ सकते हैं

समाचार4मीडिया ब्यूरो 9 years ago

‘बेसिक बात को न समझना और बेटे को सार्वजनिक- पार्टी स्तर पर जलील करना ही मुलायम सिंह यादव के प्रोफाइल में जुड़ा नया वह तथ्य है जिसमें उनका बुढ़ापा सचमुच बहुत खराब बन रहा है।’ हिंदी दैनिक अखबार नया इंडिया में छपे अपने आलेख के जरिए ये कहना है वरिष्ठ पत्रकार और संपादक हरिशंकर व्यास का। उनका पूरा आलेख आप यहां पढ़ सकते हैं:

मुलायम का बुढ़ापा बिगाड़ना

मुलायम सिंह ने आज वह किया-कहा जो कोई पिता अपने बेटे के आगे नहीं कहेगा। उन्होंने यह भी ध्यान नहीं रखा कि बेटे के आगे बाप को हमेशा अच्छी संगत के लिए कहना चाहिए। उसकी दुहाई देनी चाहिए। हम देखते-सुनते रहे हैं कि बाप कहता है बेटे को कि संगत सुधारों। मगर लखनऊ में आज एक पिता ने कहा कि मेरी संगत अमर सिंह हैं और तुम भी उसकी संगत में रहों। उसका आदर करों। उसका कहा मानों। आम तौर पर बाप अपने बेटे को नालायक कहता है। बेटे की नालायकी में उसकी खराब संगत का उदाहरण दिया करता है पर आज लोगों ने जाना-देखा कि देश के सबसे बड़े सूबे के राजपरिवार में पितृपुरुष ने अपने राजकुमार को उस संगत में ढलने के लिए कहा जिसके दस तरह के किस्से, दस तरह की बदनामियां है।

तभी सोचने वाली बात है कि लायक बेटे के साथ यह कैसा नालायकी वाला व्यवहार है? बुढ़ापे में मुलायम सिंह यादव अपने आपको क्या सिद्ध कर दे रहे हैं? क्या नालायक पिता नहीं? लोग अक्सर बेटे में खोट निकालते हुए उसे नालायक कहते हैं पर यादव परिवार में तो उलटी ही गंगा बह रही है। बेटों-भतीजों का व्यवहार ठीक है मगर पिता-चाचा अपने व्यवहार से अपनी थू थू करा देने पर आमदा हैं। देश में कौन मुलायम सिंह के आज के इस वाक्य की सराहना करेगा कि मेरे भाई है अमर सिंह। अमर सिंह ने हमें कई बार बचाया है। मैं कभी शिवपाल सिंह और अमर सिंह का साथ नहीं छोड़ूगा!

न छोड़ें मगर अखिलेश यादव पर भला उन्हें क्यों थोंपना चाहते हैं? शायद इसलिए कि बुढ़ापा जब जिद्द पकड़ लेता है, बुढ़े कानों में जब कोई बात भर दी जाती है तो फिर वह बेटे को घर से निकलवा कर चैन लेती है। मुलायम सिंह यादव ने शिवपाल सिंह के साथ महाबैठक में आज जो तेंवर दिखाएं वे चक्रव्यूह में फंसे अखिलेश यादव के लिए आखिरी निर्णायक घेरा है। यदि इसमें उन्होंने दम तोड़ा, शिवपाल सिंह- अमर सिंह के आगे मत्था टेंका तो फिर अखिलेश यादव का भविष्य नहीं है। सो बहुत संभव है कि अखिलेश यादव अब फैसला ले कि पिता को शिवपाल, अमर सिंह की उनकी संगत मुबारक। वे उनके साथ रहे। उन्हें तो अपना अलग नया बसेरा बसाना है।

यह कैसे होगा और खुद अपने पिता के घेरे को तोड़ अखिलेश चक्रव्यूह से कैसे बाहर निकलेंगे, यह वक्त बताएगा। आज की तारीख में अखिलेश यादव फिर हीरो हैं। शत्रुध्न सिंहा ने यदि अखिलेश यादव की तारीफ की है, कांग्रेस और नीतीश कुमार यदि अखिलेश यादव के साथ खड़े दिखलाई दे रहे हैं तो यह एक लायक बेटे के जायज स्टैंड पर ठप्पा है। मुलायम सिंह लाख कहें कि शिवपाल यादव बड़े नेता है। शिवपाल ही पार्टी चलाएंगे। अमर सिंह मेरे भाई हैं और तुम्हारी हैसियत क्या है जो उन्हें गाली देते हो। मैं शिवपाल और अमर सिंह के खिलाफ कुछ नहीं सुन सकता। अमर सिंह के मेरे पर कई अहसान है उनका साथ नहीं छोड़ सकता हूं। मगर इन सब बातों से चौतरफा मैसेज अब यही बना है कि अखिलेश यादव ठीक कर रहे हैं जो नेताजी की बात नहीं मान रहे।

अपना मानना था और है कि अखिलेश यादव ने अभी तक अपने पिता की लगभग हर बात मानी। यदि नहीं मानी होती तो अमर सिंह पार्टी में नहीं लौटते और न सांसद बनते। या यह कि बेनीप्रसाद वर्मा, रेवतीरमण सिंह जैसे चुके- फूके कारतूसों की राज्यसभा की टिकट नहीं होने देते या चार साल से चाचा- परिवार वालों ने जो किया वह नहीं करने देते।

जो हो, अब पांच नवंबर को समाजवादी पार्टी के रजत जयंती समारोह से पहले ही बहुत कुछ होता लगता है। कभी भी कुछ भी हो सकता है। अमर सिंह और शिवपाल सिंह की जुगलजोड़ी के लिए नेताजी का अपने आपको कुरबान करना सपा के बहुसंख्यक विधायकों को पसंद नहीं आया होगा। विधायकों का बहुमत अखिलेश यादव के साथ है। फिर अब तो कांग्रेस और अजित सिंह के विधायक भी शक्कि परीक्षण की सूरत में अखिलेश यादव के साथ खड़े होंगे।

सवाल है मुलायम सिंह यादव यदि विधायक दल की बैठक बुलाए, उसमें अखिलेश को हटाने और नए नेता को चुनने का प्रस्ताव रखें तो क्या विधायक उनकी बुलाई बैठक में जाएंगे? उनकी बात मानेंगे? अपना मानना है कि बैठक की सूरत में अखिलेश यादव खुद पहुंच कर अपनी तह विधायकों से हाथ खड़े करवा कर पूछ सकते हैं कि वे उनके नेतृत्व के समर्थक हैं या नहीं? य़दि यह नौबत आई तो विधायकों में बहुसंख्यक सुर यह निकलेगा कि चुनाव सिर पर है और ऐसे समय अखिलेश यादव का युवा नेतृत्व ही पार्टी को चुनाव लड़वाने में समर्थ है। बहुसंख्यक विधायकों का यह प्रस्ताव बन सकता है।

दरअसल शिवपाल सिंह, अमर सिंह और मुलायम सिंह यह नहीं समझ पा रहे हैं कि अखिलेश यादव अब समाजवादी पार्टी के नैसर्गिक लीडर है। यों भी जिसके पास सत्ता होती है वही विधायकों का समर्थन लिए होता है। फिर अब तो चुनाव सिर पर है। कोई विधायक यह नहीं मानेगा कि मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री बने तो उन्हें ज्यादा वोट मिलेंगे। शिवपाल सिंह और मुलायम सिंह यादव किसी भी तरह से अब जनमानस में क्लिक नहीं हो सकते हैं। इसलिए यदि कांग्रेस ने पहल की है या शत्रुध्न सिंहा ने अखिलेश यादव के प्रति सहानुभूति दिखाई है तो वह जनमानस में सोच का प्रतिनिधी पर्याय है। अखिलेश यादव को किसी भी तरह जनता में बतौर औरंगजेब इसलिए नहीं पैंठाया जा सकता है क्योंकि मुलायम सिंह जिनके लिए बवाल किए हुए हैं उनका नाम शिवपाल सिंह और अमर सिंह है।

इस बेसिक बात को न समझना और बेटे को सार्वजनिक- पार्टी स्तर पर जलील करना ही मुलायम सिंह यादव के प्रोफाइल में जुड़ा नया वह तथ्य है जिसमें उनका बुढ़ापा सचमुच बहुत खराब बन रहा है।

(ये लेखक के अपने निजी विचार हैं)

(साभार: नया इंडिया)

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