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बालेन्दु दाधीच ने वरिष्ठ पत्रकार अनुपम मिश्र को कुछ यूं किया याद...
बालेन्दु शर्मा दाधीच वरिष्ठ पत्रकार ।। अप्रतिम, अतुलनीय, विलक्षण, अनुपम जी!
समाचार4मीडिया ब्यूरो 9 years ago
बालेन्दु शर्मा दाधीच
वरिष्ठ पत्रकार ।।
अप्रतिम, अतुलनीय, विलक्षण, अनुपम जी!
शब्द ही नहीं हैं। अनुपम (मिश्र) जी अपने नाम की सार्थकता स्वयं थे। मुझे भी उनका स्नेह यदा-कदा मिला और कितना कुछ सीखा उनसे! कई वर्षों से उनसे भेंट नहीं हो सकी। फोन पर खूब बात होती और हर बार उलाहना देते कि आ जाओ किसी दिन! कौन अनुमान लगा सकता था कि यह देरी इतनी बड़ी देरी बन जाएगी। बीकानेर के रेगिस्तान में भी उनके साथ कुओं- बावड़ियों की तलाश में थोड़ा बहुत घूमने का सुख मिला था। वह मीठी बानी, शब्दों से टपकता स्नेह, कामकाज का अतुलनीय अनुशासन और और मजबूत संकल्प कभी नहीं भुलाया जा सकता।
कुछ समय पहले फोन पर बातचीत में उन्होंने कहा था कि 'आज भी खरे हैं तालाब' और 'राजस्थान की रजत बूंदें' में कॉपीराइट का कोई झमेला नहीं रखा उन्होंने और इसीलिए न जाने कितने प्रकाशकों ने इनके कितने ही संस्करण प्रकाशित किए हैं। पर्यावरण और समाज के प्रति वह निःस्वार्थ समर्पण कहां मिलेगा? सौभाग्यशाली रहा कि एक बार विश्व खाद्य संगठन की तरफ से पर्यावरणीय लेखन पर उनकी मौजूदगी में पुरस्कार पाने का अवसर मिला। पर्यावरण पर उनके जैसे आइकन के सामने पुरस्कार लेने खड़े होते समय टांगें जवाब दे रही थीं। लेकिन उनका वही स्नेह, वही आश्वस्तिकारक ध्वनि सुनी तो मनोबल बढ़ गया। छोटे से छोटे इंसान को सम्मान की दृष्टि से देखना और हौसला बढ़ाना अनुपम जी के स्वभाव का स्वाभाविक हिस्सा था।
उनकी भाषा की बात किए बिना बात अधूरी रह जाएगी। सहज, देशज शब्दों का अद्भुत प्रयोग करते थे वे। गांधी मार्ग पर भी उनकी भाषा की कितनी अमिट छाप रही! एक पन्ने की बात को एक पैरा में कैसे लिखा जाए कि कुछ भी अनभिव्यक्त न रहे और कोई भी जटिलता न रहे, इस तरह की बातें सीखने का मौखिक विश्वविद्यालय थे वे। उनकी किताब पढ़िए, आप पाएंगे कि भाषा को सहज बनाने के लिए न तो उसमें अंग्रेज़ी के शब्द डालने की ज़रूरत है और न ही उर्दू के। न ही क्लिष्ट शब्दों की ज़रूरत है।
मुझे नहीं लगता कि आज के दौर में उनके जैसे तीक्ष्ण-गहन मेधा और अनेक क्षेत्रों में अद्वितीय कौशल रखने वाले लोग इतने सहज-सरल-स्नेहिल हो सकते हैं। खबर पढ़कर दिल बैठ ही गया। अनुपम जी हैं नहीं, बल्कि थे, यह लिखना अपार कष्ट दे रहा है। उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि। अनुपम जी, आप जा नहीं सकते। आप हम सबके भीतर हैं थोड़े-थोड़े और रहेंगे हमेशा। आप तो पर्यावरण का हिस्सा हैं हमारे। नदियों-तालों-कूपों-बावड़ियों में बसी हैं आपकी यादें। कैसे कहीं जा सकते हैं आप!
(माइक्रोसॉफ़्ट में भारतीय भाषाओं के प्रभारी)
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