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दैनिक जागरण के प्रधान संपादक संजय गुप्त का 2017 को लेकर नजरिया पढ़ें यहां...
‘नि:संदेह डिजिटल भुगतान प्रणाली को बढ़ावा देना एक अच्छा विचार है, लेकिन इसके लिए अभी जरूरी बुनियादी ढांचा नहीं बन सका है। इसकी भी अनदेखी नहीं की जा सकती कि लेन-देन के लिए नकदी का इस्तेमाल भारतीयों की एक आदत है।’ इसी संदर्भ में ‘दैनिक जागरण’ में इसी अखबार के प्रधान संपादक संजय गुप्त का एक आलेख प्रकाशित हुआ है, जिसे आप
समाचार4मीडिया ब्यूरो 9 years ago
‘नि:संदेह डिजिटल भुगतान प्रणाली को बढ़ावा देना एक अच्छा विचार है, लेकिन इसके लिए अभी जरूरी बुनियादी ढांचा नहीं बन सका है। इसकी भी अनदेखी नहीं की जा सकती कि लेन-देन के लिए नकदी का इस्तेमाल भारतीयों की एक आदत है।’ इसी संदर्भ में ‘दैनिक जागरण’ में इसी अखबार के प्रधान संपादक संजय गुप्त का एक आलेख प्रकाशित हुआ है, जिसे आप यहां पढ़ सकते हैं:
सुधार की उम्मीदों का साल
नव वर्ष नूतन अभिलाषा लेकर आता है, लेकिन उस पर अतीत की छाया भी होती है। इससे कोई इनकार नहीं कर सकता कि बीते साल के आखिर में नोटबंदी का जो फैसला लिया गया उसने अर्थव्यवस्था पर गहरा असर डाला और उस असर से यह नया वर्ष भी अछूता नहीं रहने वाला। इस फैसले ने तमाम उम्मीदें भी बढ़ा दी हैं। मोदी सरकार पर इन्हें पूरा करने की चुनौती है। उसके सामने एक अन्य चुनौती वस्तु एवं सेवा कर यानी जीएसटी के अमल की भी है। उम्मीद है कि नया साल जीएसटी के इंतजार को खत्म करने के साथ सरकार के विकास के एजेंडे को और आसान करेगा। इसके बावजूद अर्थव्यवस्था के लिए समक्ष चुनौतियां बनी रहने वाली हैं। एक तो नोटबंदी के असर की वजह से और दूसरे वैश्विक स्थितियों के कारण।
जब प्रधानमंत्री ने बड़े नोटों का चलन बंद करने की घोषणा की थी तब यह उम्मीद जगी थी कि इससे काले धन की समानांतर अर्थव्यवस्था नष्ट हो जाएगी। आज यह कहना कठिन है कि यह उद्देश्य कितना पूरा हुआ। आम तौर पर जनता नोटबंदी के फैसले के साथ है, लेकिन इसके राजनीतिक असर का निर्धारण तो उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब समेत पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में ही होगा। इस वर्ष का एक बड़ा बदलाव वित्तीय मामलों में प्रशासनिक सहूलियत के लिए बजट का अपने पारंपरिक समय से कुछ दिन पूर्व आना है। पूरा देश इस पर निगाह लगाए होगा कि नोटबंदी के बाद आर्थिक-व्यापारिक गतिविधियों को गति और नकदी के संकट से प्रभावित जनता को राहत देने के लिए बजट में क्या उपाय किए जाते हैं। नि:संदेह डिजिटल भुगतान प्रणाली को बढ़ावा देना एक अच्छा विचार है, लेकिन इसके लिए अभी जरूरी बुनियादी ढांचा नहीं बन सका है। इसकी भी अनदेखी नहीं की जा सकती कि लेन-देन के लिए नकदी का इस्तेमाल भारतीयों की एक आदत है। जिस तरह काले धन पर अंकुश लगाने के लिए कुछ और कदम उठाए जाने की आवश्यकता है उसी तरह डिजिटल लेन-देन को बढ़ावा देने के लिए भी सरकार को अतिरिक्त प्रयास करने होंगे।
मोदी सरकार के लिए 2017 का वर्ष इसलिए और महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसी वर्ष मई में उसके कार्यकाल के तीन साल पूरे हो जाएंगे। इसी के साथ उसे अगले आम चुनाव की तैयारी शुरू करनी होगी। इस तैयारी के तहत सरकार को स्मार्ट सिटी, स्वच्छता अभियान, सांसद आदर्श ग्राम योजना सरीखी कई महत्वाकांक्षी योजनाओं की समीक्षा करनी होगी। इन योजनाओं की सफलता-असफलता से ही सरकार का भविष्य निर्धारित होगा। सरकार को यह देखना होगा कि उसने इन योजनाओं के संदर्भ में जो घोषणाएं की थीं वे कितना खरी उतरीं? जहां जन-धन योजना ने गरीबों को बैंकों से जोड़ने का काम सफलता से किया और गरीब परिवारों को रसोई गैस देने की उज्ज्वला योजना भी कामयाब दिख रही वहीं स्वच्छता अभियान लक्ष्य से दूर है। इस अभियान के तहत एक उपकर तो लगा दिया गया, लेकिन हालात अभी बदले नहीं हैं। अभी तक इसका भी कोई ठोस आंकलन नहीं हो पाया है कि देश को स्वच्छ रखने के लिए कितने मानव बल और धन की आवश्यकता है? इस अभियान की एक बाधा साफ-सफाई की प्रवृत्ति का आम भारतीयों की जीवनशैली में शामिल न हो पाना भी है। इस अभियान को लेकर राज्यों के रुख से यही लगता है कि वे इसे केंद्र सरकार का एजेंडा मानते हैं। राज्यों का कुछ ऐसा ही रुख स्मार्ट सिटी योजना के प्रति भी है। स्मार्ट सिटी के रूप में तमाम शहरों का चयन होने के बावजूद धरातल पर करीब-करीब सब कुछ पहले जैसा ही है। यह योजना कागजों पर ही अधिक है। यह तब है जब शहरों को संवारने की तत्काल जरूरत है। हमारे शहर आबादी के बोझ से दबे जा रहे और उनका ढांचा चरमरा रहा है। चूंकि गांवों से शहरों की ओर पलायन जारी है इसलिए शहरों की समस्याएं और ज्यादा बढ़ती जा रही हैं।
गांवों से शहरों की ओर पलायन की रफ्तार को कम किया जा सकता था, यदि सांसद आदर्श ग्राम योजना सफल होती। यह निराशाजनक है कि खुद सत्तारूढ़ दल के तमाम सांसदों ने गोद लिए गांवों को संवारने में रुचि नहीं दिखाई। चंद सांसदों ने ही उल्लेखनीय काम कर दिखाया है। चूंकि अब यह स्पष्ट हो गया है कि गांव आदर्श कैसे बन सकते हैं इसलिए सरकार को कुछ ऐसा करना चाहिए जिससे ज्यादा से ज्यादा गांव आदर्श रूप लेते दिखाई दें। मोदी सरकार का एक अन्य महत्वाकांक्षी लक्ष्य 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने का है। किसानों को आर्थिक रूप से सबल बनाने के लिए कई उपाय अवश्य किए गए हैं, लेकिन किसानों को यह भरोसा नहीं हो पा रहा कि सरकारी नीतियां खेती-किसानी का कायाकल्प करने और उन्हें बदहाली से उबारने वाली हैं। जहां तक बुनियादी ढांचे का सवाल है तो विकास की रीढ़ माने जाने वाले इस क्षेत्र में बड़े पैमाने पर निवेश तो हो रहा है, लेकिन इसका कोई प्रत्यक्ष लाभ आम जनता को मिलता नहीं दिख रहा है। आधारभूत ढांचे से जुड़ी ऐसी कोई योजना सामने नहीं आई जो अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप हो और पूरी भी हो गई हो। स्थिति यह है कि महत्वपूर्ण माने जाने वाले कई राजमार्गों में भी यातायात सुगम नहीं हो पाया है। दिल्ली-जयपुर राजमार्ग पहले जैसा ही नजर आता है। यह भी चिंताजनक है कि आधारभूत ढांचे संबंधी कई योजनाएं अटकी दिख रही हैं, जैसे कि राष्ट्रीय राजमार्ग-24 में कोई प्रगति नहीं दिख रही। ध्यान रहे कि खुद प्रधानमंत्री ने इस योजना का उद्घाटन करीब एक वर्ष पहले किया था।
यह साफ है कि केंद्र सरकार की योजनाओं के प्रति न तो राज्य सरकारों का रुख बहुत उत्साहजनक है और न ही प्रशासनिक मशीनरी का। यह ठीक है कि विकास योजनाओं पर अमल की बुनियादी जिम्मेदारी राज्यों पर होती है, लेकिन अगर वे केंद्र की योजनाओं पर अमल के प्रति गंभीर नहीं होते तो फिर कुछ हाथ नहीं लगने वाला। अगर भाजपा को लगता है कि विरोधी दल की राज्य सरकारें केंद्र की महत्वाकांक्षी योजनाओं के क्रियान्वयन में रुचि नहीं दिखा रही हैं तो उसे अपने दल के शासन वाले राज्यों में इन योजनाओं को सही से लागू करके दिखाना चाहिए। इस नए वर्ष जब मोदी सरकार अपने कार्यकाल के तीन वर्ष पूरा करेगी तब आम जनता भी यह देखेगी कि सरकार ने जो वादे किए थे उनका जमीन पर कितना असर पड़ा?
नि:संदेह इस वर्ष इस बात पर भी गहन निगाह होगी कि सत्तापक्ष और विपक्ष के रिश्ते सुधरते हैं या नहीं? सत्तापक्ष-विपक्ष के बीच तनातनी के कारण संसद का शीतकालीन सत्र जिस तरह हंगामे की भेंट चढ़ गया वह शुभ संकेत नहीं। बजट सत्र में हालात बेहतर हों, इसके लिए सरकार को ज्यादा सक्रियता दिखाने की आवश्यकता है। योजनाएं बनाना और विकास की दिशा तय करना केंद्र सरकार का अधिकार है, लेकिन यदि वह इन योजनाओं और विकास के अपने दृष्टिकोण से विपक्ष को सहमत नहीं कर पाती और इसके चलते संसद सही ढंग से नहीं चल पाती और उसके कारण जरूरी विधेयक कानून का रूप नहीं ले पाते तो इससे केंद्रीय सत्ता की मुश्किलें बढ़ेंगी ही। बेहतर हो कि नए वर्ष में केंद्र सरकार का लक्ष्य अपनी और साथ ही जनता की भी मुश्किलें आसान करना हो।
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