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'दैनिक जागरण के रिपोर्टर की ये खबर प्रधानमंत्री के इस झूठ का रोशनदान खोलती है'

बृजेंद्र एस. पटेल एडिटर, ‘कैम्पसपोस्ट डॉट इन’ (Campuspost.in) ।। नोटबंदी : झूठ का रोशनदान

समाचार4मीडिया ब्यूरो 9 years ago

बृजेंद्र एस. पटेल

एडिटर, ‘कैम्पसपोस्ट डॉट इन’ (Campuspost.in) ।।

नोटबंदी : झूठ का रोशनदान

भारत गणराज्य की जनता अपने प्रधानमंत्री को गर्व और सम्मान की दृष्टि से देखती है। लोकतंत्र में प्रधानमंत्री के नेतृत्व में शासन व्यवस्था संचालित होती है। जनता ऐसे में प्रधानमंत्री से तमाम तरह की उम्मीदें करती है। मसलन, जब भी देश पर संकट आएगा तो प्रधानमंत्री अच्छी तरह से निपटेंगे। देश में कानून व्यवस्था से लेकर विकास तक की जिम्मेदारी प्रधानमंत्री की होती है। कह सकते हैं, प्रधानमंत्री भगवान नहीं होता है, पर जनता के लिए भगवान से कम भी नहीं होता है। इतना भरोसा करने वाली जनता को जब लगने लगे कि प्रधानमंत्री झूठ बोलते हैं? बहुत दुखद होगा।

नोटबंदी के मामले में प्रधानमंत्री ने एक अच्छे काम को इतने गलत तरीके से अंजाम दिया कि उनकी विश्वसनीयता पर सवाल उठने लगा है। भारत के 10 हजार साल के इतिहास में कई बार अकाल पड़ा। विदेशी हमले हुए। शासक बदले। साथ-साथ मुद्रा भी बदलती गई। पर ऐसा कभी नहीं हुआ कि पृथ्वीराज की मुद्रा गुलाम वंश ने चलने से रोक दी हो। या फिर लोदी काल की मुद्रा को मुगलों ने चलन से रोका हो या फिर मुगलों के शासन की मुद्रा को ईस्ट इंडिया कंपनी ने चलन से रोका। और न ही 15 अगस्त 1947 के बाद ब्रिटिश शासनकाल के नोटों का चलन रातों रात बंद हुआ। भारत में नोट बंदी की ऐसी आपदा न तो गजनबी के आक्रमण से हुई और न ही गौरी के। देश में राज बदले पर जनता की जेब पर डाका किसी भी शासक ने नहीं डाला।

प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जिस नोटबंदी को गोपनीय बता रहे हैं। दैनिक जागरण अखबार उनके इस झूठ का रोशनदान खोलता है। मैं इस अखबार के रिपोर्टर बृजेश दुबे को जानता हूं। आगरा में अमर उजाला में काम करते देखा है। मैं खुद भी दैनिक जागरण में रहा हूं। कोई रिपोर्टर किसी खबर पर जब तक खुद खबर सही होने की अपने मन की मुहर नहीं लगा लेता तब तक उस पर बाइलाइन लगाकर आगे नहीं बढ़ाता। अर्थात अपना नाम नहीं लिखता। खबर पर बाइलाइन संपादक तय करते हैं। मैं दैनिक जागरण कानपुर के समाचार संपादक श्री आनंद शर्मा को जानता हूं। आगरा दैनिक जागरण में उनके साथ रिपोर्टिंग की है। बाद में हम दोनों क्राइम बीट पर पांच साल साथ-साथ अलग अलग अखबारों से रिपोर्टर रहे। श्री आनंद शर्मा ने भी इस खबर पर बाइलाइन देने से पहले बृजेश दुबे से पूछताछ की होगी। यही नहीं दैनिक जागरण कानपुर में जागरण समूह के आधा दर्जन निदेशक बैठते हैं। बेशक आनंद भाई ने इसकी जानकरी जागरण के निदेशकों से लेकर नोएडा में समूह संपादक श्री संजय गुप्ता जी को भी दी होगी।

अमर उजाला या दैनिक जागरण में संपादकीय प्रभारियों की हर बाइलाइन पर पूरी नजर होती है। बाइलाइन की खबर यदि गलत निकल जाए तो उस दिन उस अखबार में किसी ओपनर बल्लेबाज का पहली ही गेंद पर बोल्ड होने जैसा माहौल होता है।

मैं इस बात का उल्लेख इसलिए कर रहा हूं, क्योंकि जब किसी दैनिक अखबार में कोई एक्सक्लूसिव न्यूज किसी रिपोर्टर की बाइलाइन यानी उस रिपोर्टर के नाम के साथ छपती है तो उसके प्रतिद्वंदी अखबारों के संबंधित बीट के रिपोर्टर को लगता है, मानो उनके गाल पर सुबह-सुबह किसी ने करारा तमाचा जड़ दिया। मैं इस दौर से 12 साल गुजरा हूं। अखबार के दफ्तर पहुंचने पर सिटी इंचार्ज या संपादक बाद में पूछेगा। खबर छूटने की दिल में इतनी तकलीफ होती है कि खुद को सुबह की चाय अच्छी नहीं लगती है। यही नहीं, जिस रिपार्टर से खबर छूटती है, वो दूसरे दिन बीट पर जाकर खबर खंगालता है। कितनी सच-कितनी झूठ? कई बार बड़ी खबर छप जाने पर संबंधित विभाग के लोग पर्दा डालने के लिए झूठ बोल देते हैं। अरे हां, मैं इस पर एक बाकया सुनाता हूं….

मैं 2001 में अमर उजाला आगरा दफ्तर में रिपोर्टर था। टेलिकॉम मेरी बीट थी। तब लैंड लाइन के न्यूनतम बिल 275 रुपये आते थे। मैं एक दिन बीट पर रुटीन में दूर संचार विभाग के महाप्रबंधक कार्यालय गया। बता दूं, BSNL बनने से पहले इसका यही नाम था। महाप्रबंधक शैलेंद्र बहादुर खरे की मेज पर संचार मंत्रालय के लिफाफे पर मेरी नजर पड़ी। मैंने बातों-बातों में लिफाफा उठाकर खोल लिया। तभी महाप्रबंधक के बजर देने पर महाप्रबंधक के पीए पीके अग्रवाल अंदर आ गए। वे दोनों आपस में किसी फाइल के संबंध में बात करने लगे। मैंने लिफाफे में रखा एक आदेश देखा। उसमें लिखा था, अब एक फरबरी से टेलिफोन के न्यूनतम बिल 275 रुपये से बढ़कर 525 रुपये हो जाएंगे। ये आदेश टेलिकॉम रेवेन्यू जिलों में लागू होगा। जहां एक लाख से ज्यादा कनेक्शन हैं।

चूंकि तब फिरोजाबाद भी टेलिकॉम राजस्व जनपद आगरा के अधीन था। तब टेलिकॉम राजस्व जनपद आगरा में कुल कनेक्शन एक लाख से ज्यादा थे। ये बात मुझे पहले से पता थी, इसलिए ये खबर आगरा के लिए महत्वपूर्ण थी। मैंने पत्र पढ़कर उसी लिफाफे में ज्यों का त्यों रख दिया। महाप्रबंधक से इस बाबत कोई चर्चा भी नहीं की। वे समझ भी नहीं पाए कि मैंने खबर पकड़ ली है। चूंकि ये सूचना आदेश लागू होने की तय तारीख से तकरीबन एक महीने पहले संचार मंत्रालय ने गोपनीय तरीके से महाप्रबंधकों और मुख्य महाप्रबंधकों को भेजी थी, इसलिए मीडिया में इसकी जानकारी नहीं थी।

न ही ये खबर देश के किसी भी अखबार या टीवी चैनल पर तब तक दिखी थी।मैं शाम को अमर उजाला के दफ्तर पहुंचा। मेरा सबसे पहले संपादक श्री अजय अग्रवाल से सामना हो गया। मैंने खबर बताई। वे सुनकर चौंके। तब टेलिफोन के बिल अचानक दोगुने होने का मतलब बड़ी बात थीं। यानी कोहराम मचना तय। उन्होंने कहा कि ये खबर समाचार संपादक सुभाष राय को बताओ और आल एडिशन तुम्हारी बाइलाइन लगेगी।

मैंने खबर लिखी तो सिटी इंचार्ज श्री एसपी सिंह ने मुझसे पूछा, पटेल खबर पक्की है? मैंने कहा, हां। बोले, कितनी पक्की? जवाब दिया, एक्सक्लूसिव। वे जानते थे, मैं उन दिनों टेलिफोन विभाग की खबरों का मास्टर खिलाड़ी था। अमर उजाला में सबने मेरी बात पर यकीन कर लिया। मेरी बाइलाइन खबर छप गई।

दूसरे दिन हंगामा हो गया। महाप्रबंधक का सुबह 8 बजे मेरे घर के लैंड लाइन पर फोन। पूछने लगे, पटेल, किसने खबर बताई? मैंने कहा आपकी मेज पर रखा संचार मंत्रालय का गोपनीय पत्र कल आपके सामने बैठा था, पढ़ा था। दूसरे छोर से करीब 3 सेकेंड बाद रिसीवर रखने की आवाज आई। उन्होंने मेरी बात सुनकर फोन काट दिया था।

शाम को अमर उजाला दफ्तर पहुंचा तो मालूम पड़ा, संपादक जी के पास टेलिफोन विभाग से फोन करके कहा गया कि बृजेंद्र पटेल की बाइलाइन छपी खबर झूठी है। संपादक जी ने गजेंद्र यादव को मेरी बीट पर इस खबर की तहकीकात करने के लिए टेलिफोन दफ्तर भेजा था। गजेंद्र यादव मेरी खबर का खंडन महाप्रबंधक के साक्षात्कार के तौर पर लिख रहे थे। यही नहीं टेलिफोन विभाग से 40 सेंटीमीटर का कमर्शियल विज्ञापन जारी कर खबर का खंडन किया गया। मेरे पास कोई सबूत नहीं था। हां, आत्मविश्वास था। मैं अपनी बात पर अड़ा रहा। मुझे संपादक श्री अजय अग्रवाल जी और एसपी सिंह जी ने बुलाकर कहा, पटेल टेलिफोन विभाग ने तो तुम्हारी खबर के खंडन का इतना बड़ा विज्ञापन भेज दिया है? ये विज्ञापन अन्य सभी दैनिक समाचार पत्रों के लिए भी जारी किया गया है।

दोस्तो, यहां पत्रकारिता का एक अजीब रंग आप भी देखिए... उन दिनों दैनिक जागरण में टेलिकॉम बीट के रिपोर्टर राजेश मिश्र थे। विज्ञापन जारी होने पर दैनिक जागरण में राजेश मिश्र ने मेरी खबर का 6 कालम में खंडन छापा। मैंने तो सोचा भी नहीं था। दैनिक जागरण में मेरी खबर और मेरी बाइलाइन को मजाकिया लहजे में लिखकर मखौल उड़ाया गया। मेरे अपने अमर उजाला अखबार में ही खबर का खंडन छपा तो मैं दूसरे अखबारों पर क्या आपत्ति कर सकता था? मैं फिर भी सबसे कहता रहा, मैंने ये आदेश अपनी आंखों से खुद देखा है।

मेरे सहपाठी रहे अवधेश माहेश्वरी का दैनिक जागरण से फोन आया, पटेल ये कैसे हो गया? मैंने उसे भी वही बताया। दैनिक जागरण मेरी इस खबर का 5 दिन तक खंडन छापता रहा। दैनिक जागरण के टेलिकॉम बीट के रिपोर्टर राजेश मिश्र ने अपनी काबिलियत के प्रदर्शन में कलम तोड़ दी। मैं रेफरी के गलत निर्णय से हारे हुए खिलाड़ी की तरह पीछे हट गया।

मुझे इस खबर के खंडन से कई दिन तक बुरा लगा। इसके बावजूद अखबार के दफ्तर में दर्जनभर से ज्यादा विज्ञप्तियां आईं। पर उन्हें अपेक्षित स्थान नहीं दिया गया। टेलिकॉम के विज्ञापन के बोझ तले मेरी खबर की नवजात शिशु की तरह हत्या कर दी गई। दरअसल टेलिफोन विभाग ने अपने उपभोक्ताओं का त्वरित विरोध और कनेक्शन कटने के भय से ऐसा किया। इस खबर का भूचाल थमा, तब मैं अमर उजाला से नोएडा में सहारा टीवी में MITM (Mass Com.) कोर्स के 4th सेमिस्टर की प्रोजेक्ट रिपोर्ट तैयार करने के लिए तीन महीने के लिए चला गया था। उधर मेरे जाने के बाद टेलिफोन उपभोक्ताओं के फरवरी माह के बिल 275 से बढ़ाकर 525 के हिसाब से जारी हो गए। मुझे अमर उजाला से साथी रिपोर्टर रामकुमार और भानु प्रताप सिंह ने फोन करके बताया, पटेल तुम्हारी खबर सही निकली। दैनिक जागरण झूठा…।

बृजेश दुबे, आप भगवान का धन्यवाद दो, जो RBI ने तुम्हारी खबर के खिलाफ विज्ञापन नहीं छापा और कानपुर में कोई रिपोर्टर राजेश मिश्र नहीं निकला…..। यदि ऐसा हो जाता तो तुम्हारा आठ नवंबर तक खाना हराम हो जाता। बिना सबूत के सूत्रों के हवाले से सही खबर छापना कितना भारी होता है, इसकी जलालत मैं झेल चुका हूं। गैर तो दूर अपने भी भरोसा नहीं करते।

भाई बृजेश दुबे, आगरा में रहते तुमसे मेरे कभी विचार नहीं मिले, पर मैं तुम्हारी इस खबर का हृदय से अभिनंदन करता हूं। सच में तुम्हारी ये खबर कालजयी है….। साल 2016 में देश की सबसे बड़ी खबर….। इस खबर पर मीडिया जगत को तुम्हारा सार्वजनिक अभिनंदन करना चाहिए और खोजी पत्रकारिता का नेशनल अवॉर्ड मिलना चाहिए। तुम इसके लिए डिजर्व करते हो। सच में। दिल से।

अब मैं भारत गणराज्य के प्रधानमंत्री से पूछना चाहता हूं कि रिजर्ब बैंक के जिन सूत्रों ने किसी रिपोर्टर को ये 26 अक्टूबर को खबर दी है तो आप देश को कैसे भरोसा देते हो कि ये बात गुप्त थी। जिस सूत्र ने कोई जानकारी किसी पत्रकार से साझा की, बेशक से बात उसे पहले पता होगी और इसकी कोई गारंटी नहीं कि उसने ये बात किसी और से साझा नहीं की होगी।

जो कालाधन के जमाखोर हैं, वे इस खबर से जरुर सचेत हुए होंगें। कानपुर उत्तर भारत का सबसे बड़े कारोबारी शहरों में से एक है। यूपी का सबसे बड़ा महानगर है। मैं कतई नहीं मानता, कानपुर में सबसे विश्वसनीय दैनिक जागरण मे किसी रिपोर्टर की बाइलाइन खबर छपे और उससे संबंधित वर्ग में हलचल न हो। चूंकि काला धन के जमाखोर टेलिफोन उपभोक्ताओं की तरह आम आदमी नहीं थे, जो बिल दूना होने पर तुरंत हंगामा कर देते। निश्चित तौर पर इस खबर को पढ़कर कालाधन के जमाखोर नोट बदलने के खेल में जुटे होंगे।

ये जानकरी बृजेश दूबे को 26 अक्टूबर को हुई थी, जिसने बृजेश दुबे को जानकारी दी, उसे तो ये बात और पहले से पता होगी। यानी ये बात पहले से लीक थी। जो खबर कानपुर या आगरा से लीक होती है, यानी उसकी जानकारी दिल्ली के अलावा और भी शहरों में होती है। कम से कम नोटबंदी की बात उन शहरों में तो जरुर लीक हुई होगी, जहां रिजर्व बैंक के दफ्तर और नोट छापने के केंद्र हैं।

देश के विरोधी दल भी इसे नहीं पकड़ रहे हैं। हम बैंक के बाहर लाइन में नोट बदलने के लिए धक्के खाते हैं। सोचते हैं कि प्रधानमंत्री का कदम अच्छा है। कालाधन जमा करने वालों को पकड़ेंगे। उन्होंने नोटबंदी की बात किसी को पता नहीं होने दी। अब मजा आएगा। धन्नासेठों की काली कमाई कागज के टुकड़े हो गए। हकीकत में हुआ उल्टा। नोटबंदी की खबर आम जनता को बाद में पता पड़ी, धन्ना सेठों को पहले। हम अखबार में खबर छपने पर भी नहीं जागे और जब प्रधानमंत्री का टीवी पर भाषण सुनकर जाने। तब तक एटीएम खाली हो चुके थे। प्रधानमंत्री नोटबंदी के 8 नवबंर के ऐलान को भले गोपनीय बताएं। पर दैनिक जागरण कानपुर के रिपोर्टर बृजेश दुबे की ये खबर प्रधानमंत्री के इस झूठ का रोशनदान खोलती है।

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