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सरहद पर जिन्दगी उसी रफ्तार से चल रही है जैसे सर्जिकल अटैक से पहले थी: पुण्य प्रसून
‘याद कीजिए आजादी के बाद आर्थिक संघर्ष से जूझते भारत की राजनीति जब दुनिया के सामने लड़खड़ा रही थी तब भारत की स्वर्णिम संस्कृति-सभ्यता को सिनेमा ने ही दुनिया के सामने परोसा।’ अपने ब्लॉग (prasunbajpai.itzmyblog.com) के जरिए ये कहना है वरिष्ठ पत्रकार पुण्य
समाचार4मीडिया ब्यूरो 9 years ago
‘याद कीजिए आजादी के बाद आर्थिक संघर्ष से जूझते भारत की राजनीति जब दुनिया के सामने लड़खड़ा रही थी तब भारत की स्वर्णिम संस्कृति-सभ्यता को सिनेमा ने ही दुनिया के सामने परोसा।’ अपने ब्लॉग (prasunbajpai.itzmyblog.com) के जरिए ये कहना है वरिष्ठ पत्रकार पुण्य प्रसून बाजपेयी का। उनका पूरा आलेख आप यहां पढ़ सकते हैं:
राजनीतिक देशभक्ति की अंधेरगर्दी
तो सदा-ए-सरहद यानी दिल्ली-लाहौर के बीच चलने वाली बस से दो सौ ज्यादा पाकिस्तानी उन्हीं 100 दिनों में भारत आये जब से आतंकी बुरहान वानी के एनकाउंटर के बाद से घाटी थमी हुई है। इतना ही 21 दिन पहले 28-29 सितंबर की जिस रात सर्जिकल अटैक हुआ और सेना की तरफ से बकायदा ये कहा गया कि उरी हमले का बदला ले लिया गया है, तो 29 सितंबर को दिल्ली में जिस वक्त ये जानकारी दी जा रही थी उस वक्त उरी में ही अमन सेतु से पाकिसातन के 13 ट्रक भारत में घुस रहे थे। और भारत के भी 26 ट्रक 29 सितंबर को अमन सेतू के जरिये ही पाकिस्तान पहुंचे। यानी सरकार का कोई रुख पाकिस्तान के खिलाफ देशभक्ति की उस हुकांर को लेकर नहीं उभरा जो मुंबई की सड़क पर उभर रहा है। जबकि ढाई हजार ट्रकों के आने से लाभ पाकिस्तान के 303 रजिस्टर्ड व्यापारियों को हुआ।
वीजा लेकर भारत पहुंचे सैकडों पाकिस्तानी ने भारत के अस्पतालों में इलाज कराया और इसी दौर में पाकिस्तान के गुजरांवाला से 86 बरस के मोहम्मद हुयैन भी विभाजन में बंटे अपने परिवार से मिलने 70 बरस बाद पहुंचे और 1947 के बाद पहली बार राजौरी में अपने बंट चुके परिजनों से मिलने नाजिर हुसैन पहुंचे। यानी सरहद पर जिन्दगी उसी रफ्तार से चल रही है जैसे सर्जिकल अटैक से पहले थी या उरी में सेना के हेडक्वाटर पर हमले पहले सी थी। इससे इतर दिल्ली-मुंबई की सड़कों से लेकर राजनेताओं की जुबां और टेलिविजन स्क्रीन पर देशभक्ति सिलवर स्क्रीन से कहीं ज्यादा सिनेमाई हो चली है। तो अगला सवाल ये भी है कि क्या राजनीति करते हुये मौजूदा वक्त में सिस्टम को ही राजनीति हड़प रही है या फिर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता भी राजनीतिक ताकत की इच्छाशक्ति तले जा सिमटी है।
ये सवाल इसलिये क्योंकि याद कीजिए आजादी के बाद आर्थिक संघर्ष से जूझते भारत की राजनीति जब दुनिया के सामने लड़खड़ा रही थी तब भारत की स्वर्णिम संस्कृति-सभ्यता को सिनेमा ने ही दुनिया के सामने परोसा। खासकर मनोज कुमार की फिल्म पूरब और पश्चिम फिल्म ने। और नेहरु के समाजवादी नजरिए से जब समाज में हताशा पनपी तो वामपंथी हो या तब के जनसंघी जो बात राजनीतिक तौर पर ना कह पाये उसे गुरुदत्त ने अपनी 'प्यासा' में- ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है, गीत के जरिये कह दी।
और तो और 9/11 घटना के बाद जब दुनिया सभ्यताओं के संघर्ष में उलझा। अमेरिकी और यूरोपिय समाज में मुस्लिमों को लेकर उलझन पैदा हुई तो बॉलिवुड की फिल्म ने 'माई नेम इज खान' में इस डॉयलग ने ही अमेरिकी समाज तक को राह दिखायी, 'माई नेम इज खान एंड आई एम नाट ए टेररिस्ट'।
इतना ही नहीं याद कीजिये फिल्म 'बंजरगी भाईजान' का आखिरी दृश्य। पाकिस्तान के साथ खट्टे रिश्तों के बीच फिल्म के जरिये ही एलओसी की लकीर सिल्वर स्क्रीन पर बर्लिन की दीवार की तरह गिरती दिखी और फिल्म 'हैदर' के जरिये तो आतंक में उलझे कश्मीर के पीछे की तार -तार होती सियासी बिसात को जिस तरह सिल्वर स्क्रीन पर उकेरा गया, उससे सवाल तो यही उभरे कि सिनेमा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तले उन मुद्दों को उभारने की ताकत रखता है जिन पर राजनीति अकसर खुद उलझ जाती है या जनता को उलझा देती है। तो क्या अभिव्यक्ति के सशक्त और लोकप्रिय माध्यम पर हमला राजनीति साधने का नया नजरिया है।
(साभार: वरिष्ठ पत्रकार पुण्य प्रसून बाजपेयी के ब्लॉग से)
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