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अरसे से मीडिया पर छाई मुर्दनी तो टूटी, बड़े दिनों बाद एक पत्थर तो तबियत से उछला
लोकतंत्र सुरक्षित है तो पत्रकारिता अपने सरोकारों के साथ ही चलेगी
समाचार4मीडिया ब्यूरो 6 years ago
राजेश बादल
वरिष्ठ पत्रकार।।
नया चैनल है। उसके तेवर और साहस मौजूदा पत्रकारिता में ताज़ी हवा के झौंके की तरह हैं। सांसदों की शर्मनाक करतूतें। क़बूलते भी हैं तो जैसे कोई बहादुरी का काम कर बैठे हों। सियासी पार्टियां कोई कार्रवाई करें या न करें, लेकिन पत्रकारिता जो काम कर सकती है, उसने कर दिया। अलबत्ता, न्यायपालिका अपनी ओर से कोई संज्ञान लेती तो क्या हमारे लोकतंत्र का चेहरा तनिक उजला नहीं हो जाता? पर अरसे से मीडिया पर छाई मुर्दनी तो टूटी। बड़े दिनों बाद एक पत्थर तो तबियत से उछला। पहले भी एक बार सांसदों को सवाल पूछने के लिए पैसे लेते हुए एक स्टिंग ऑपरेशन हुआ था। उन्हें संसद से बाहर का दरवाजा दिखाया गया था। वह भी मीडिया का ही कारनामा था।
इसी चैनल के कुछ चेहरे प्रधानमंत्री को पसंद नहीं हैं। उनका आरोप है कि वे उन्हें हरदम गाली देते रहते हैं। उन्होंने तो बाक़ायदा उलाहना भी दे डाला। विडंबना है कि राजनीतिक लोग अब अपनी आलोचना भी स्वीकार नहीं करते। आलोचना में अगर वे तर्क देखें और उस पर सकारात्मक नज़रिया रखें तो उनका ही भला होगा। एक पत्रकार को मुल्क़ के प्रधानमंत्री से भला क्या रंजिश हो सकती है? हां यह ज़रूर है कि आलोचना स्वीकार करने के लिए खुले दिल और दिमाग़ से काम लेना होता है।
एक उदाहरण याद आता है। जब देश में आपातकाल लगा तो हिंदी के एक अग्रणी अख़बार ‘नई दुनिया’ के प्रधान संपादक राजेन्द्र माथुर ने सेंसरशिप के विरोध में संपादकीय स्थान को ख़ाली छोड़ने का साहस दिखाया। इंदिरागांधी ग़ुस्से में थीं। उनकी नाराज़गी सूचना प्रसारण मंत्री विद्याचरण शुक्ल ने अख़बार के मैनेजमेंट तक पहुंचाई। अख़बार ने उन्हें टका सा उत्तर दे दिया कि पत्रकारिता के मान्य सिद्धांतों की रक्षा के लिए उसका फ़ैसला सही था। विद्याचरण जी उदास लौट आए। जब आपातकाल समाप्त हुआ और चुनाव का ऐलान हुआ तो राजेंद्र माथुर ने सात मुद्दों को लेकर एक श्रृंखला लिखी। यह श्रृंखला झकझोरने वाली थी। आज भी यह श्रृंखला भारतीय पत्रकारिता का एक दुर्लभ दस्तावेज़ है। इसमें व्यवस्था पर इतना तीखा और तथ्यपरक विश्लेषण था कि किसी भी प्रधानमंत्री या सत्ता प्रतिष्ठान के लिए मंज़ूर करना आसान नहीं था। पर प्रधानमंत्री इंदिराजी ने राजेंद्र माथुर को स्वयं फ़ोन किया और कहा, ‘ काश! मुझे अपने संगठन, सरकार,मीडिया और लोकतंत्र के बारे में इस कोण से व्याख्या पहले मिल जाती। मुझे फीडबैक पहले मिलता तो मैं अपने विचार और सोचने के नज़रिये में बदलाव भी करती।‘ बहरहाल! इस घटना के बाद इंदिरा गांधी ने माथुर जी के हर आलेख को पढ़ना शुरू कर दिया। यह सिलसिला 1984 तक चलता रहा।
बात यहीं समाप्त नहीं होती। सतहत्तर में हारने के बाद जब इंदिराजी दोबारा प्रधानमंत्री बनी तो उन्होंने दूसरे प्रेस आयोग के गठन का ऐलान किया। उसमें राजेंद्र माथुर को सदस्य बनाया। यह सूचना उन्होंने ख़ुद पत्रकारों को दी। इसका संदेश यह नहीं था कि वे अपनी आलोचना करने वाले को प्रसन्न करना चाहती थीं। बल्कि इसका मक़सद यह था कि प्रेस आयोग निष्पक्षता और निर्भीक रहते हुए अपनी रिपोर्ट दे। हुआ भी यही, आज पत्रकारों को इस रिपोर्ट को ज़रूर पढ़ना चाहिए। लब्बोलुआब यह कि जब तक हिंदुस्तान है, तब तक लोकतंत्र को कोई आँच नहीं आ सकती। लोकतंत्र सुरक्षित है तो पत्रकारिता अपने सरोकारों के साथ ही चलेगी। अस्थाई दौर आते-जाते रहते हैं। अधिनायक इतिहास में कभी भी हीरो की तरह याद नहीं किए जाते। उन्हें विलेन ही माना जाता है। यह बात याद रखिए मिस्टर मीडिया!
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