मिस्टर मीडियाः धंधा तो है पर क्या वाकई गन्दा है?

चोरी न करें, झूठ न बोलें तो क्या करें? चूल्हे पे क्या उसूल पकाएंगे शाम को...

राजेश बादल by राजेश बादल
Published - Wednesday, 23 January, 2019
Last Modified:
Wednesday, 23 January, 2019
Rajesh Badal

राजेश बादल
वरिष्ठ पत्रकार।।

चोरी न करें, झूठ न बोलें तो क्या करें? चूल्हे पे क्या उसूल पकाएंगे शाम को।
कुछ साल पुरानी बात है। एक दिन एक फोन आया। एक प्रदेश की राजधानी से। वो जनाब ख़ुद को पत्रकार बता रहे थे। बोले-एक चैनल दिला दीजिए। ऊपर वाले की मेहरबानी से पैसे का संकट नहीं है। इसलिए पैसे नहीं चाहिए। केवल चैनल का लोगो वाला माइक चाहिए। जो भी इसकी क़ीमत होगी, दे दूंगा।

यह भी पढ़ेंः मिस्टर मीडियाः परदा बदलने से भौंडी नक़ल जायज़ नहीं हो जाती


मैंने कहा, ‘भई! ऐसा कहीं होता है? चैनल वाले बेचते नहीं हैं। आपको तो रिपोर्टिंग का पैसा देंगे चैनल वाले। आपसे पैसा क्यों लेंगे’? बोले, ‘सर! अब इलाक़े के कई चैनल ऐसे ही चल रहे हैं। माइक आईडी मिलती है। ज़िले वाले को उसका मंथली देना होता है प्रदेश वाले हेड को। प्रदेश वाले ने फ्रेंचाइजी ली है। वह ऊपर देता है। जिसके पास लाइसेंस है उसको। हर महीने ऊपर वाला तकाज़ा करता है प्रदेश वाले को। प्रदेश वाला पब्लिक रिलेशन डिपार्टमेंट से मांगता है। मलाई वाले विभागों के अफसरों से मांगता है। पुलिस वालों से मांगता है। रिपोर्टरों से मांगता है। रिपोर्टर खबर के पैसे मांगता है। फिर कोटा पूरा होता है।‘ मैंने सुनकर हाथ जोड़ लिए। बात आई गई हो गई।

यह भी पढ़ेंः मिस्टर मीडियाः न्यूज अगर प्रोडक्ट है तो उसे वैसा बनाकर दिखाइए


अब एक बार फिर से ख़बरें मिलने लगी हैं। फ्रेंचाइजी धंधा ज़ोरों पर है। लोगो-धंधा ज़ोरों पर है। नए नवेले छोटे-छोटे चैनल कैसे चलेंगे? विधानसभा चुनाव में रैलियों का कवरेज सरकारी ख़र्चे पर हुआ। एक-एक मिनट जोड़कर बिल लगे। भुगतान हुआ। कई छोटे चैनलों के भी बिल कटे। भुगतान नहीं हुआ। पार्टी हार गई। अब शायद होगा भी नहीं। इसलिए अब ख़र्च निकालने के लिए चैनलों के सामने संकट है। इसलिए लोगो बेचने का धंधा फिर ज़ोरों पर है। तक़लीफ़ यह है कि  गेहूं के साथ घुन भी पिस रहा है। अच्छे चैनल भी हैं और पत्रकार भी हैं। मगर चंद मछलियां सारे तालाब को गंदा करने में लगी हुई हैं। लोग यही समझने लगते हैं कि सारे पत्रकार ऐसा करते हैं या पत्रकारिता ऐसी ही होती है। हर खबर बिकने लगी है-यह धारणा बनती जा रही है।

यह भी पढ़ेंः मिस्टर मीडिया: बालिग़ तो हुए, ज़िम्मेदार कब बनेंगे?


और बेचारे स्ट्रिंगर्स क्या करें? उनकी तो और भी मुसीबत है। चैनलों में गलाकाट प्रतिस्पर्धा है। खबर न भेजो तो एक झटके में बाहर। अगर भेजो तो हर समाचार के लिए कैमरामैन, कैमरा,  कवरेज स्थल तक जाने -आने का डीज़ल/पेट्रोल खर्च हो जाता है। दिन भर का कवरेज या आधा दिन का कवरेज हो तो चाय-पानी या भोजन का खर्च अलग से। लौटकर एफटीपी के लिए कम्प्यूटर, इंटरनेट और बिजली का बोझ भी उठाना पड़ता है। चैनल की मेहरबानी से खबर लग गई तो उसका भुगतान हो जाता है। नहीं लगी तो जयहिन्द। दिन भर की मेहनत पानी में। और मिलता भी है तो एक खबर का कहीं 500, कहीं 800, कहीं 1000 तो कहीं 1200 रुपए। वह भी चार से छह महीने बाद। इतने में क्या किसी पत्रकार का घर चलता है? फिर रोज़ तो ख़बर लगती नहीं। महीने में बमुश्किल दस-पंद्रह खबरें हो पाती हैं। स्ट्रिंगर दूसरा धंधा न करे तो क्या करे-मैंने अदब से हाथ उठाया सलाम को/समझा उन्होंने, इससे है ख़तरा निज़ाम को/चोरी न करे, झूठ न बोले तो क्या करे?चूल्हे पे क्या उसूल पकाएंगे शाम को/माइक आईडी किराए पर देकर या बेचकर, स्ट्रिंगर्स का शोषण करके पत्रकारिता का भला नहीं कर रहे हैं हम मिस्टर मीडिया!

न्यूजलेटर पाने के लिए यहां सब्सक्राइब कीजिए

फिल्मों में गाली दिखाने वाले अनुराग कश्यप खुद को गाली पड़ने पर क्यों भाग गए?

अगर ड्रग एडिक्ट, सीरियल किलर,अंडरवर्ल्ड डॉन समाज का हिस्सा हैं तो असहमति पर गाली देने वाले लोग भी उसी समाज का हिस्सा हैं

Last Modified:
Tuesday, 20 August, 2019
Anurag Kashyap

अनुराग कश्यप से जब भी ये सवाल किया जाता है कि उनकी फिल्मों में किरदार इतनी गाली क्यों देते हैं?  तो उनका जवाब होता है कि मैं वही दिखा रहा हूं जो समाज में है, लेकिन वही अनुराग कश्यप अब ये कहकर ट्विटर छोड़कर चले गए हैं कि लोग उन्हें गालियां बहुत देते हैं!

सवाल ये है कि जिस तरह के गाली-गलौज वाले किरदार दिखाकर अब तक वे लोगों का मनोरंजन कर रहे थे, उसी तरह के किरदारों से असल जिंदगी में पाला पड़ने पर वो इतना बौखला क्यों गए हैं? अगर ड्रग एडिक्ट, सीरियल किलर, अंडरवर्ल्ड डॉन समाज का हिस्सा हैं तो असहमति पर गाली देने वाले लोग भी उसी समाज का हिस्सा हैं। लेकिन असल जिंदगी में ऐसे लोगों से डील करने के वक्त आप ‘पूरे माहौल’ को ही खराब बताकर वहां से भाग जाते हैं। कुछ समय पहले रवीश कुमार भी ऐसी ही दलील देकर ट्विटर से विदा ले गए थे।

अनुराग कश्यप हों या रवीश कुमार, इन लोगों के ट्विटर छोड़ने के पीछे कारण ये नहीं है कि लोग वहां गालियां देते हैं या कोई उनके परिवार को धमकी देता है। मैं पहले भी कह चुका हूं कि जब भी आप किसी विचार के साथ या उसके खिलाफ खुलकर खड़े होते हैं तो उस पर आने वाली प्रतिक्रिया भी एक्सट्रीम (Extreme) होगी।

जो लोग आपसे सहमत होंगे वो आपके भक्त बन जाएंगे और जो आपके खिलाफ होंगे वो आपका विरोध करेंगे। चूंकि समाज में हर तरह के लोग हैं, इसलिए आप ये तय नहीं कर सकते कि विरोध जताने वाले लोगों की भाषा कैसी होगी? आपको अगर किसी की भाषा पसंद नहीं आ रही  तो आप उसे ब्लॉक भी कर सकते हैं। कोई धमकी दे रहा है तो पुलिस में उसकी शिकायत कर दें, लेकिन ऐसा न कर आप वहां से भाग जाते हैं।

दरअसल समस्या गाली या धमकी की नहीं है। रवीश कुमार और अनुराग कश्यप जैसे लोगों के साथ दिक्कत ये है कि जब आपको सारी जिंदगी अपने ही जैसे लोगों के साथ बंद कमरों में अपने ही विचार को सही मानते हुए उस पर चर्चा करने की आदत पड़ चुकी हो तो आप ट्वटिर पर सरेआम अपने विचार की धज्जियां उड़ते नहीं देख सकते।

अपनी जिस सोच को आप अपने दोस्तों में गाकर खुद को सही मानने का मुगालता पाले बैठे हों, ट्विटर पर आपके उसी विचार की जब कोई तथ्य के साथ धज्जियां उड़ा देता है तो आप बर्दाश्त नहीं कर पाते। हजारों लोगों के सामने अपने तर्क को परास्त होता देख आप बौखला जाते हैं। आपका चेहरा गुस्से से तमतमाने लगता है। विरोधियों के हाथों हुई फजीहत आपको सोने नहीं देती। एक से ज्यादा बार ऐसा होने पर आप परेशान हो जाते हैं।

और जब ये समझ आ जाता है कि सामने वाले के तर्क का कोई जवाब नहीं तो आप स्थिति से बचने का बहाना ढूंढ रहे होते हैं। और फिर एक रोज ‘परिवार या मुझे गाली दे रहे हैं’, ‘मैं और बर्दाश्त नहीं कर सकता’ जैसी बात करके वहां से रफूचक्कर हो जाते हैं।

बेशक परिवार को गालियां मिलना या आपको खुद को गालियां पड़ना बर्दाश्त से बाहर होता है, लेकिन ये सब किस के साथ नहीं होता। जिन पत्रकारों और विचारकों को आप बीजेपी का हमदर्द मानते हैं, क्या उनके परिवारों को गालियां नहीं पड़तीं? क्या उनके परिवार के लोगों को धमकियां नहीं दी गईं। आप गालियां की बात करते हैं। बंगाल और केरल जैसे राज्यों में तो एक विचार के साथ खड़े होने पर लोग (बीजेपी के कई कार्यकर्ता) कत्ल तक कर दिए गए। तो क्या उनके परिवार वहां से भाग गए? या बीजेपी ने वहां राजनीति करनी छोड़ दी?

गाली, दुष्प्रचार, हत्या ये सब तो विचार के साथ खड़े होने की कीमत है,जो हर वैचारिक इंसान को उठानी पड़ती है। अगर आपको अपना विचार प्रिय है तो इसे बर्दाश्त कीजिए। नहीं कर सकते तो गाली गलौच बहुत है, का ड्रामा बंद कीजिए। राजनीतिक विचारधारा की लड़ाई में अपने अधपके तर्कों के साथ मत कूदिए। जब आप समाज से अपने फिल्मों की गाली गलौच को समाज की हकीकत मानने की अपेक्षा रखते हैं तो उसी समाज में खुद को गाली पड़ने पर तड़प क्यों जाते हैं। क्या आपका हीरो भी ऐसे लोगों के आगे हार जाता है या उन लोगों से निपटते हुए अपने विचार के लिए लड़ता है?

फिर दोहराता हूं दिक्कत गाली नहीं। आपके विचार का खोखलापन है जो सोशल मीडिया पर उधेड़ दिया जाता है और गाली की बात करके आप और रवीश कुमार जैसे लोग खुद को वैसे ही बचाते हैं, जैसे सेक्रेड गेम्स का कोई सुस्त संवाद गाली की आड़ लेकर लेखन के खोखलेपन की लाज बचाता है।

(पत्रकार नीरज बधवार की फेसबुक वॉल से)

आप अपनी राय, सुझाव और खबरें हमें mail2s4m@gmail.com पर भेज सकते हैं या 01204007700 पर संपर्क कर सकते हैं। (हमें फेसबुक, ट्विटर, लिंक्डइन और यूट्यूब पर फॉलो करें)

न्यूजलेटर पाने के लिए यहां सब्सक्राइब कीजिए

विश्व मच्छर दिवस पर विशेष: देश की GDP में यूं बढ़ोतरी करते हैं मच्छर :)

मच्छर शब्द कमजोरी का प्रतीक बन गया है। हम दुनिया को बताना चाहते हैं कि कृपया मच्छर समाज को मच्छर न समझें

Last Modified:
Tuesday, 20 August, 2019
Piyush Pandey

पीयूष पांडे, व्यंग्यकार व वरिष्ठ पत्रकार।।

आज है। इस खास अवसर पर मच्छरों के एक नेता से मैंने एक्सक्लूसिव बात की। मच्छरों के ये नेता डेंगू फैलाने का जिम्मा अपने कंधे पर लिए हैं और जिस बेतकल्लुफी से इन्होंने बात की, उसके बाद कहा जा सकता है कि उन्होंने अपने मन की बात खोलकर रख दी।

आप महामारी क्यों फैला रहे है? आपका प्रकोप बढ़ता जा रहा है।

जिसे आप प्रकोप कह रहे हैं, वो हमारी लोकप्रियता है। आज उत्तर प्रदेश से लेकर मध्य प्रदेश और हरियाणा से दिल्ली तक हर शख्स डेंगू-डेंगू कर रहा है। हमारी लोकप्रियता का सेंसेक्स स्टॉक मार्केट से भी ऊपर है।

लेकिन आप बीमारी फैला रहे हैं। ये अच्छी बात नहीं है।

तुम इंसानों के यहां अभी भी स्कूलों में गीता पढ़ाने को लेकर विवाद है। लेकिन हमने पैदा होते ही गीता सार समझ लिया। यानी कर्म कर, फल की चिंता मत कर। तो हमारा पूरा समाज कर्म कर रहा है।

 आप गरीबों को ज्यादा सताते हैं?

ये निराधार आरोप है। डेंगू मच्छर धर्म निरपेक्ष, शर्म निरपेक्ष और शिकार निरपेक्ष हैं। हम न धर्म के आधार पर भेद करते हैं और न अमीर-गरीब देखकर डंक मारते हैं।

क्या ये सच नहीं है कि कुछ लोग सॉफ्ट टारगेट हैं, जिन्हें आप पहला निशाना बनाते हैं?

बिलकुल नहीं। सॉफ्ट टारगेट तो हमारे लिए सनी लियोनी है। वस्त्र मुक्त अभियान की प्रणेता सनी लियोनी को हम कभी भी अपना शिकार बना सकते हैं, लेकिन हम ऐसा नहीं करते। ये हमारी ईमानदारी भी है और आपके आरोप का जवाब भी।

डेंगू मच्छर इंसानों को मौत के मुंह में ले जा रहे हैं। आखिर आप साबित क्या करना चाहते हैं?

मच्छर एक गाली हो गई है। मच्छर शब्द कमजोरी का प्रतीक बन गया है। हम दुनिया को बताना चाहते हैं कि कृपया मच्छर समाज को मच्छर न समझें। दुनिया में हर साल साढ़े सात लाख लोगों को मच्छर कम्युनिटी ऊपर पहुंचाकर बता रही है कि उन्हें सीरियसली लिया जाए। भारत में डेंगू मच्छर इस दिशा में सार्थक प्रयास कर रहे हैं और उन्हें खासी कामयाबी भी मिली है।

लेकिन जान लेकर ही क्यों?

देखिए हमारा पहला मकसद लोगों को अस्पताल पहुंचाना ही होता है। हम दरअसल राष्ट्र की समृद्धि में योगदान भी देना चाहते हैं। क्योंकि पीड़ितों की वजह से अस्पतालों का, डॉक्टरों का, पैथोलोज़ी लैब का, दवाइयों की दुकानों का टर्नओवर बढ़ता है और इससे देश की जीडीपी में बढ़ोतरी होती है। लेकिन कुछ लोग चल बसते हैं तो उनकी अपनी गलती की वजह से। वक्त पर अस्पताल न पहुंचकर, खुद डॉक्टर बनकर और सुनी सुनाई बातों पर यकीन कर वे खुद अपनी जान लेते हैं। हमारा कोई दोष नहीं।

आपने कहा कि आप अमीर-गरीब में फर्क नहीं करते। लेकिन डेंगू मच्छर कभी नेताओं को नहीं डसता। उन्हें कभी अस्पताल नहीं पहुंचाता?

मैं शर्मिन्दा हूं। निश्चय ही आपका यह आरोप सही है कि हम नेताओं को नहीं काटते। दरअसल, बीते कई वर्षों से हमारी कोर कमेटी इस बात पर बहस कर रही है लेकिन हर बार यही तय होता है कि राजनेताओं को काटने से हमें खुद डेंगू जैसी गंभीर बीमारी हो सकती है। हो सकता है कि ऐसी कोई बीमारी हो जाए,जिसका इलाज ही न हो। मैं सिर झुकाकर यह आरोप स्वीकार करता हूं।

आखिरी सवाल, आपका प्रकोप 20 साल पहले तक नहीं था। कोई नहीं जानता था डेंगू को। अचानक कैसे आपका उदय हो गया?

इंसान जब मच्छर जैसी हरकत करने लगा। गंदगी खुद फैलाए और नाम हमारा धरने लगा तो हमें भी लगा कि इंसानों को उनकी औकात बता दी जाए।

आप अपनी राय, सुझाव और खबरें हमें mail2s4m@gmail.com पर भेज सकते हैं या 01204007700 पर संपर्क कर सकते हैं। (हमें फेसबुक, ट्विटर, लिंक्डइन और यूट्यूब पर फॉलो करें)

न्यूजलेटर पाने के लिए यहां सब्सक्राइब कीजिए

'हमारी तरफ से नीलम शर्मा को यही होगी सच्ची श्रद्धांजलि'

आज नीलम शर्मा कैंसर की गिरफ्त में आ गईं, अगर हम नहीं सुधरे तो कल हम में कोई और इसकी गिरफ्त में आ जाएगा

समाचार4मीडिया ब्यूरो by समाचार4मीडिया ब्यूरो
Published - Saturday, 17 August, 2019
Last Modified:
Saturday, 17 August, 2019
Neelum sharma

कैंसर एक सजा है, महिला हो या पुरुष हर किसी को अपनी चपेट में लिए हुए है। लोग कहते हैं कि यह बीमारी जीवन शैली से जुड़ी हुई है फिर Breast Cancer का इससे क्या लेना? दूरदर्शन न्यूज में वर्षों से कार्यरत एक वर्सटाईल एंकर नीलम शर्मा हमारे बीच नहीं रहीं, वो Breast Cancer से पीड़ित थीं और जिंदगी की जंग में कैंसर से हार गई। मेरी कभी उनसे मुलाकात नहीं हुई, लेकिन हम दोनों एक-दूसरे को जानते थे। एकाध बार हम दोनों की फोन पर बात भी हुई है और उन्होंने मेरे से कहा था कि- Cancer is Curable !!!. लेकिन आज एहसास हुआ कि शायद वो गलत बोल रहीं थी या फिर मैने गलत सुन लिया था, लेकिन इतना जरूर कह सकता हूं कि -Cancer is partially Curable !!

The most common cancer in India is breast cancer !! The rate of incidence was found to be 25.8 in 100,000 women and the mortality rate is 12.7 per 100,000 women। डाक्टरों की अगर मानें तो इसे रोका जा सकता है, लेकिन इसके लिए जरूरी है कि 26 वर्ष की आयु के बाद लड़कियों को डाक्टर से मिलकर इसकी जांच करा लेनी चाहिए। बीमारी है, किसी से पता पूछकर तो लगेगी नहीं, बेहतर होगा कि हम खुद डाक्टर का पता पूछकर उनसे मिल लें। क्या पता लाईफ स्टाइल में सुधार करने से यह बीमारी कभी हो ही नहीं।

ब्रेस्ट कैंसर के सबसे प्रमुख लक्षणों में-Change in the look or feel of the breast OR A change in the look or feel of the nipple OR Nipple discharge आदि प्रमुख हैं लेकिन अगर आप डाक्टर से हर छह महीने में मिलती रहेंगी तो इस बीमारी को जानलेवा होने से रोका जा सकता है।

एक अपील है दोस्तों से, जानने वाले लोगों से कि अगर आप DD News की Anchor नीलम शर्मा को वास्तव में सच्ची श्रद्धांजलि देना चाहते हैं तो कैंसर को चुनौती देना अपने घर से शुरू कीजिए और डाक्टर से मिलने में जरा भी मत हिचकिचाइए आज नीलम कैंसर की गिरफ्त में आ गईं, अगर हम नहीं सुधरे तो कल हम में कोई और इसकी गिरफ्त में आ जाएगा।

(वरिष्ठ पत्रकार केएम शर्मा की फेसबुक वॉल से)

आप अपनी राय, सुझाव और खबरें हमें mail2s4m@gmail.com पर भेज सकते हैं या 01204007700 पर संपर्क कर सकते हैं। (हमें फेसबुक, ट्विटर, लिंक्डइन और यूट्यूब पर फॉलो करें)

न्यूजलेटर पाने के लिए यहां सब्सक्राइब कीजिए

मिस्टर मीडिया: यह कार्यशैली दिखाती है पत्रकारों का अधकचरापन

वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल ने उठाया सवाल, एक ही संस्थान में एक समाचार प्रसारण के कितने पैमाने हो सकते हैं?

राजेश बादल by राजेश बादल
Published - Wednesday, 14 August, 2019
Last Modified:
Wednesday, 14 August, 2019
Rajesh Badal

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार।।  

कभी-कभी हम लोग भारतीय मीडिया के गैर जिम्मेदाराना व्यवहार पर क्षोभ प्रकट करते हैं। कहते हैं कि उसे और परिपक्व होना चाहिए, लेकिन भारत में काम कर रहा अंतर्राष्ट्रीय मीडिया भी शिकायतों का भरपूर अवसर देता है। बेहद संवेदनशील मामले पर भी जब उसके पत्रकार चलताऊ अंदाज में काम करते हैं तो स्पष्ट होता है कि उनके अपने देश में भी पत्रकारिता की कोई परिष्कृत प्रशिक्षण प्रणाली नहीं है।

इधर भारतीय मीडिया भी एक अपराध बोध से ग्रस्त हो जाता है, जब वह देखता है कि परदेसी पत्रकार तो धड़ल्ले से बिना कोई आत्म अनुशासन दिखाए अपनी रिपोर्टिंग कर रहे हैं। यह कार्यशैली अभिव्यक्ति की आजादी या निष्पक्षता नहीं, बल्कि उन पत्रकारों का अधकचरापन प्रदर्शित करती है।

इस सप्ताह कश्मीर से अनुच्छेद 370 की विदाई के बाद कुछ हलकों में नाराजगी स्वाभाविक थी। भारत सरकार ने इसके लिए अपने एहतियाती उपाय भी किए थे। लेकिन शुक्रवार को जुमे की नमाज के बाद परदेसी माध्यमों में जिस तरह से खबरें प्रसारित की गईं, वे चिंता में डालने वाली हैं। सबसे पहले मुस्लिम जगत से संबद्ध एक अंतर्राष्ट्रीय चैनल अल जजीरा ने कश्मीर में विरोध जुलूस की खबरें दिखाईं। इन खबरों में तटस्थता नदारद थी। इसके बाद विश्व के सर्वाधिक प्रतिष्ठित मीडिया संगठन ब्रिटिश ब्रॉडकास्टिंग कार्पोरेशन (बीबीसी) ने इन समाचारों को स्थान दिया।

विडंबना यह कि इस संस्थान के दक्षिण एशिया ब्यूरो ने तो यह समाचार प्रसारित कर दिया, लेकिन हिंदी सेवा ने इस सच की पड़ताल करने के लिए खबर का प्रसारण रोक लिया और इसी संस्थान के वर्ल्ड टेलिविजन ने बिना वक्त गंवाए यह सूचना दिखा दी। एक ही संस्थान में एक समाचार प्रसारण के कितने पैमाने हो सकते हैं? यह भी अटपटा लगता है कि दक्षिण एशिया ब्यूरो ने इस पर प्रो एक्टिव कॉल लिया और ट्वीट की दुनिया में भी विस्तार दे दिया।

इस ब्यूरो की वरिष्ठ सदस्य ब्राजील मूल से हैं और हाल ही में भारत आई हैं। पाकिस्तान से भी उनका कुछ रिश्ता बताया जाता है। भारत विरोधी खबरें देना उनका स्थाई भाव माना जाता है। इसी प्रतिष्ठित प्रसारण समूह ने बाद में पाकिस्तान के स्वतंत्र पत्रकार वुसतउल्ला खान की साप्ताहिक रेडियो डायरी पर भारत में पाबंदी लगा दी। यह पत्रकार महोदय डायरी में रिपोर्टिंग न करते हुए पाकिस्तान की ओर से हिन्दुस्तान को सख्त संदेश दे रहे थे। मेरी जानकारी में तो पाकिस्तान में इसका प्रसारण किया गया। इसके अलावा अनेक यूरोपीय चैनलों, रॉयटर्स और डॉन ने भी इस तरह की खबरें प्रसारित कीं। अंतर्राष्ट्रीय मीडिया संस्थानों की मुख्य धारा की नीतियां क्षेत्रीय नीतियों से अलग कैसे हो सकती हैं। यह कौन सी पत्रकारिता है?

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के इस काम में किसी सूचना को क्रॉस चेक करना पहला धर्म होता है। अगर क्रॉस चेक के बाद भी कोई संवाददाता अपनी रिपोर्ट पर कायम है तो फिर अगला कर्तव्य यह है कि दूसरे पक्ष से उसकी टिप्पणी ली जाए। कश्मीर के मामले में क्या इस ज़िम्मेदार परदेसी मीडिया ने भारत सरकार, कश्मीर सरकार या किसी अन्य सरकारी एजेंसी का पक्ष जानने का प्रयास किया? शायद नहीं। भारत सरकार ने भी अपनी ब्रीफ़िंग में सुस्ती दिखाई। परिणाम यह कि सरकार को विदेशी संवाददाताओं के बारे में निर्देश जारी करने पड़े।

बेशक इस पर बहस की जा सकती है कि क्या सरकार को अंतर्राष्ट्रीय समाचार माध्यमों पर कार्रवाई का अधिकार है, पर यह तो देखना ही होगा कि क्या विदेशों से आए पत्रकार भारत को पूरी तरह समझते हैं? अथवा यह कि भारत के लिए अत्यंत नाजुक मसले उनके लिए कितने गंभीर हैं। परदेसी पत्रकारिता संस्थानों को अपने पत्रकारों की किसी देश में तैनाती से पहले उनके ओरियंटेशन या उस देश के बारे में प्रशिक्षण की व्यवस्था करनी ही चाहिए।

याद नहीं आता कि अंतर्राष्ट्रीय संवाद समिति प्रेस ट्रस्ट ऑफ इण्डिया के विदेशों में जो संवाददाता हैं, वे उन मुल्कों के संवेदनशील मामलों पर कितने खिलाफ़ जाते हैं। हम मीडिया की आजादी के पक्षधर हैं, लेकिन किसी देश के विखंडन को प्रोत्साहित करने वाली खबरों से यक़ीनन बचेंगे। इस मत से असहमत होने के आपके  अधिकार का भी मैं सम्मान करता हूं। लब्बोलुआब यह कि हिन्दुस्तान में बसे विदेशी संवाददाताओं को पत्रकारिता का न्यूनतम कर्तव्य तो निभाना ही चाहिए मिस्टर मीडिया!

वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल की 'मिस्टर मीडिया' सीरीज के अन्य कॉलम्स आप नीचे दी गई हेडलाइन्स पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं-

मिस्टर मीडिया: अनुच्छेद 370: मीडिया कवरेज से दिल बाग-बाग नहीं हुआ

मिस्टर मीडिया: एक बार फिर इसी सत्याग्रह की जरूरत है

संपादक की दुविधा हम समझते हैं, पर कोई समाधान निकालिए मिस्टर मीडिया!

मिस्टर मीडिया: ऐसे में क्या खाक निष्पक्ष और निर्भीक पत्रकारिता की उम्मीद करेंगे?

आप अपनी राय, सुझाव और खबरें हमें mail2s4m@gmail.com पर भेज सकते हैं या 01204007700 पर संपर्क कर सकते हैं। (हमें फेसबुक, ट्विटर, लिंक्डइन और यूट्यूब पर फॉलो करें)

न्यूजलेटर पाने के लिए यहां सब्सक्राइब कीजिए

श्रद्धांजलि: इस नामुमकिन को मुमकिन कर दिखाया था शकुंतला काजमी ने

मैंने पूछा तो उन्होंने बताया कि बिटिया की स्कूली पढ़ाई पूरी हो गयी, जिसके बाद उन्होंने मीडिया में करियर बनाने के बारे में सोचा है

समाचार4मीडिया ब्यूरो by समाचार4मीडिया ब्यूरो
Published - Wednesday, 14 August, 2019
Last Modified:
Wednesday, 14 August, 2019
Shakuntala Kazmi

करीब 20 साल पहले की बात है। आंखों देखी के न्यूज-रूम में पहुंचा तो एक छोटे कद की गोरी सी महिला इंटर्नशिप करने वालों के साथ बैठी थी। क्योंकि मैं न्यूज-रूम का इंचार्ज था, इसलिये उन्हें मुझसे मिलवाया गया, ये कहते हुए कि ये कैमरा विभाग में इंटर्नशिप करने आयी हैं। मैं चौंक गया। एक तो कैमरा पारंपरिक तौर पर पुरुष वर्चस्व वाला क्षेत्र और उन दिनों सौ में एक-दो ही कैमरापर्सन महिलाएं दिखती थीं। दूसरी चौंकाने वाली बात थी उनकी उम्र। अमूमन इंटर्नशिप करने नये ग्रेजुएट या स्टूडेंट्स आते हैं, लेकिन उनकी उम्र लगभग मेरी जितनी थी।

मैंने पूछा तो उन्होंने बताया कि बिटिया की स्कूली पढ़ाई पूरी हो गयी, जिसके बाद उन्होंने मीडिया में करियर बनाने के बारे में सोचा है। तीसरी बार तब चौंका, जब उन्होंने अपना नाम 'शकुन काजमी' बताते हुए खुद को बिहार से जुड़ा बताया। हिन्दू-मुस्लिम मिक्स नाम और खड़ी हरियाणवी बोली वाली बिहारन?

मेरे चेहरे के भावों को पढ़ते हुए हमारे कैमरापर्सन Aijaz उर्फ जॉर्ज ने हंसते हुए राज खोला, ‘ये शकुंतला जी हैं तो मूल रूप से हरियाणा की, लेकिन अपने NDTV वाले नदीम भाई की पत्नी हैं।’ नदीम भाई उर्फ नदीम काजमी से प्रेस क्लब में Manoranjan जी के साथ कुछ मुलाकातें हुई थीं। मैंने हाथ जोड़कर नमस्कार किया तो हंसते हुए बोलीं, ‘यहां तो मैं सिर्फ ट्रेनी कैमरापर्सन हूं।’

बाद में मेरी पुरानी मित्र Anju Grover ने बताया कि शकुन सोशल एक्टिविस्ट भी रह चुकी हैं और कई आंदोलनों में प्रमुख भूमिका निभा चुकी हैं। बेहद डाउन टू अर्थ और बिंदास स्वभाव। वे जब तक हमारे यहां रहीं, दिन भर बड़े लगन से टीवी कैमरा ऑपरेट करने के साथ उसकी बारीकियों को सीखा। वे बेहद ऊर्जावान और एक्टिव थीं। कभी बाहर भी मुलाकात हुई तो उनके बेबाक और मिलनसार स्वभाव ने काफी प्रभावित किया। समाज और राजनीति पर भी चर्चा होती।

फिर वे कुछ महीनों बाद इंटर्नशिप पूरा कर वापस चली गयीं, लेकिन मिलना-जुलना होता रहा। अक्सर प्रेस क्लब या वूमेन प्रेस क्लब में। जब नोएडा शिफ्ट हुआ तो दिल्ली जाने का सिलसिला कम होता चला गया। वैसे भी मैं फील्ड रिपोर्टिंग में था नहीं, तो कभी-कभी ही बाहर जाना होता था। कुछ सालों बाद पता चला कि वे बिहार चली गयी हैं। कल रात अचानक अंजू का संक्षिप्त सा वॉट्सऐप मैसेज मिला जिसमें लिखा था, ‘शकुन नहीं रही।‘ एक मित्र, हमदर्द और अच्छी इंसान का अचानक सदा के लिये चले जाना वाकई दुःखद होता है।

नदीम काजमी जी के होम टाउन दरभंगा के उनके गांव में वे मुखिया बन गयी थीं। हाल ही में बाढ़ राहत की उनकी तस्वीरें देखीं तो समझ में आया कि वे कितनी मेहनती और दरियादिल थीं। हालांकि समझौता न करने वाले उनके तेवर बरकरार रहे। बिहार के एक पिछड़े से गांव की मुस्लिम महिला टी शर्ट व पेंट में दिखे, जन समर्थन भी पाये, वह भी तब, जबकि उनकी भाषा हरियाणवी हो, ये सारी बातें असंभव लगती हैं... लेकिन इस नामुमकिन को मुमकिन कर दिखाया था शकुंतला काजमी ने।

हालांकि वे प्रगतिशील विचारों वाली सुशिक्षित महिला थीं, लेकिन पिछड़ी हुई व्यवस्था और स्वार्थी डॉक्टरों की चालबाज साजिशों का शिकार बन गयीं। कुछ सालों से दरभंगा के डॉक्टर उन्हें किडनी की बीमारी की दवाइयां दे रहे थे, जबकि मर्ज उनके दिल में था। पता तब चला, जब अचानक हार्ट अटैक आने पर उन्हें पटना ले जाया गया। दिल्ली आना चाहती थीं, लेकिन अचानक वेंटिलेटर पर शिफ्ट होना पड़ गया।

फिर कल रात खबर आयी कि वे जीते जी नहीं आ पायी, लेकिन नदीम काजमी उनके शव को दिल्ली लाकर यहीं अंतिम संस्कार करवाने की कोशिश में हैं।

(वरिष्ठ पत्रकार धीरज कुमार की फेसबुक वॉल से)

आप अपनी राय, सुझाव और खबरें हमें mail2s4m@gmail.com पर भेज सकते हैं या 01204007700 पर संपर्क कर सकते हैं। (हमें फेसबुक, ट्विटर, लिंक्डइन और यूट्यूब पर फॉलो करें)

न्यूजलेटर पाने के लिए यहां सब्सक्राइब कीजिए

370 के हटने के बाद वरिष्ठ पत्रकार दिनेश पाठक ने कुछ यूं जानी इमरान खान के ‘मन की बात’

मैं कंफ्यूज था। समझ नहीं आ रहा था कि कश्मीर को लेकर जो हम हिंदुस्तानी सोच रहे थे, वह सही है या यह जो मैं देख रहा हूं

Last Modified:
Monday, 12 August, 2019
IMRAN KHAN

मेरी पाकिस्तान यात्रा और इमरान से मुलाकात

दिनेश पाठक, वरिष्ठ पत्रकार

कश्मीर से अनुच्छेद 370 की रवानगी के बाद मन में आया कि पाकिस्तान हो आया जाए। सो,मैं चला गया। लाहौर-कराची घूमने के बाद अपने पाकिस्तानी दोस्त प्रधानमंत्री जनाब इमरान खान साहब से मुलाकात करने की दिली तमन्ना जागी। उनसे अपनी एक बार की मुलाकात थी। वे पहले विदेशी क्रिकेटर रहे, जिनसे पत्रकारिता में आने के बाद मेरी मुलाकात हुई थी दिल्ली में। खैर, समय तय हुआ। मैं पहुंच गया। स्वागत बहुत जोरदार हुआ।

मैं कंफ्यूज था। समझ नहीं आ रहा था कि कश्मीर को लेकर जो हम हिंदुस्तानी सोच रहे थे, वह सही है या यह जो मैं देख रहा हूं। अब मैं इमरान साहब के सामने था। खैर-मकदम के बाद उन्होंने कुछ देर क्रिकेट, भारत-पाकिस्तान की बातें कीं। फिर मैंने पूछा-जम्मू-कश्मीर से 370 हटने के बाद पाकिस्तानी चैनल्स बड़े चिंतित हैं। चीख रहे हैं भारत की अवाम के खिलाफ, हमारी सरकार के खिलाफ।

हिंदुस्तान में तो यह भी चर्चा है कि आप भी काफी खफ़ा हैं मोदी सरकार के इस कदम से। इमरान बोले-हां, ख़फ़ा तो हूं, लेकिन कर क्या सकता हूं। मोदी जी ने तो मोटा भाई को लगा दिया है मेरी बैंड बजाने के लिए। वह बजा रहा है। देश अलग नहीं जीने दे रहा है। सेना भी सुबह-शाम पानी भर रही है। वह बाजवा, जब न तब धमकी देता रहता है। आतंकवादी भाई तो चौके-छक्के वाली बाल की तरह उछल रहे हैं।

पुराने दोस्त हो, इसलिए दिल का हाल बता रहा हूं। मोदी जी ने जो मेरी लंका लगाई है न, अब तक किसी ने नहीं लगाई। सब कुछ सुकून से चल रहा था। अब उन्होंने लगा दी है तो सब पीछे पड़े हैं। मुझे तो अपना भविष्य अंधकार में दिख रहा है लेकिन क्या करूं। जनता का हित देखते हुए चुप हूं। हमारी इंटेलिजेंस भी अब काम नहीं कर पा रही है। भारत से सूचनाएं लाने में इनके पसीने छूट रहे हैं। पूरी दुनिया हमारी ओर ही आंख तरेरे जा रही है। इतना बड़ा काण्ड हो गया, कहीं से किसी ने समर्थन नहीं किया। कोई हमारे साथ खड़ा नहीं हुआ। अब तुम्हीं बताओ। मैं क्या करूं?

मैंने कहा, ‘मोदी जी से बात करके उन्हें मना क्यों नहीं लेते। पीओके, बलूचिस्तान जैसे इलाके ऑफर कर दीजिए।’ ‘अब तुम मजे ले रहे हो’, इमरान साहब ने कहा। मैंने कहा, ‘मैं तो दोनों देशों के बीच शांति चाहता हूं और मेरी नजर में यह समस्या हल भी हो सकती है। आप अपने आतंकी दोस्तों को शांत कर लो, चाहे गोली से या बातों से और सेना से कहो कि रोज-रोज सीज फायर का उल्लंघन न करे। क्योंकि अब मोटा भाई के हाथ में इंडिया की आंतरिक सुरक्षा का जिम्मा है। उस बंदे के पास डोवाल भी हैं। ये दोनों मिलकर वैसे ही घुस जाएंगे, जैसे पटेल जी ने हैदराबाद में निजाम के विरोध के बाद भी सेना भेज दी थी। मोटा भाई तो मोदी जी को यह काम करके ही बताएंगे। इन्हें हल्के में नहीं लेना।‘

मैंने कहा, ‘एक दिन मेरी बात हो रही थी मोटा भाई से। उनका बहुत बड़ा सपना है इंडिया को लेकर। वे वृहत्तर भारत का सपना लेकर चल रहे हैं। बैंड बजाने को तैयार हैं। आपके सावधान रहने का वक्त है। दोस्ती में ही बता रहा हूं|’ इस पर इमरान खान बोले, ‘सही कह रहे हो। मैं क्रिकेटर ही अच्छा था। पूरी दुनिया में सम्मान था। प्रधानमंत्री होने के बाद घर के अंदर से लेकर बाहर तक बैंड बजी हुई है। सब हमें केवल और केवल राय देते हैं। क्या दिन थे, जब हम एक क्रिकेटर के रूप में इंडिया घूमते थे। आज जाने पर ही लफड़ा है।‘

इमरान का कहना था, ‘राजनयिक सम्बंध खत्म करने का दबाव था। कर दिया। फिर सबने कहा-व्यापारिक सम्बंध भी खत्म कर दो। वो भी कर दिया। इन्हें इतने से ही संतोष नहीं हुआ। समझौता एक्सप्रेस बंद करवा दिया। अब तो मेरा ये हाल है कि न घर में चल रही है और न ही देश में। मन में आ रहा है कि मैं भी कहीं चला जाऊं। या अल्लाह! किस मनहूस घड़ी में मैंने यह मुई कुर्सी संभाली थी। अब नहीं हो रहा मुझसे। ये आजवा-बाजवा किसी भी दिन मुझे लटका देंगे। मोदी जी और मोटा भाई भी नहीं सुनने को तैयार हैं। देश भी नहीं सुनने को तैयार हैं। सेना तो सुनती ही नहीं और आतंकी लफंगे तो अलग ही सरकार चला रहे हैं।’ मैं क्या करूं? यह कहते हुए इमरान साहब लिपट गए। बड़े असहज दिख रहे थे और मजबूर भी। मुझे तो बड़ी दया भी आ रही थी, लेकिन जब तक मैं कुछ करता, ससुरी आंख खुल गई।

नोट-यह मौजूदा व्यवस्था पर व्यंग्य है| इसे दिल पर न लें| पढ़ें। अच्छा लगे तो लेखक का उत्साहवर्द्धन करें, नहीं तो पढ़ने के बाद शान्ति से पतली गली से मुस्कुराते हुए निकल लें|

 

आप अपनी राय, सुझाव और खबरें हमें mail2s4m@gmail.com पर भेज सकते हैं या 01204007700 पर संपर्क कर सकते हैं। (हमें फेसबुक, ट्विटर, लिंक्डइन और यूट्यूब पर फॉलो करें)

न्यूजलेटर पाने के लिए यहां सब्सक्राइब कीजिए

अनुच्छेद 370: मीडिया कवरेज से दिल बाग-बाग नहीं हुआ

अनुच्छेद 370 की विदाई कोई आसान काम नहीं था। कमोबेश हर दल इसके पक्ष में था, लेकिन सत्ता में रहते हुए उसे हटाने का साहस कोई नहीं कर पाया

राजेश बादल by राजेश बादल
Published - Wednesday, 07 August, 2019
Last Modified:
Wednesday, 07 August, 2019
Rajesh Badal

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार।।

इस आलेख को शुरू करने से पहले दो ऐसी शख्सियतों को नमन करना आवश्यक है,जिनका भारतीय पत्रकारिता में बड़ा योगदान है। पहले सुषमा स्वराज की याद। अस्वस्थ्य थीं, लेकिन अचानक विदा ले लेंगी, यह अंदाजा नहीं था। अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल में सूचना प्रसारण मंत्री रहते हुए उन्होंने निजी सैटेलाइट चैनलों के लिए भारत में द्वार खोले।

उससे पहले भारतीय जमीन से यह स्वतंत्रता निजी मीडिया समूहों को नहीं थी। इसी फैसले का नतीजा है कि आज भारत में दुनिया की सबसे बड़ी और तेज गति से बढ़ी टीवी इंडस्ट्री कायम है। भारतीय खबरिया चैनल उद्योग इसके लिए सुषमा जी का हमेशा ऋणी रहेगा।

दूसरी शख्सियत भारत के महान हिंदी संपादक राजेन्द्र माथुर हैं। आज उनका जन्मदिवस है। अपने धारदार और निष्पक्ष लेखन के लिए उनको सदैव याद किया जाएगा। राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय विषयों पर उन्होंने अद्भुत प्रामाणिक लेखन किया। सरोकारों वाली पत्रकारिता करने के लिए उन्होंने अनेक पीढ़ियां तैयार कीं।

और अब बात मिस्टर मीडिया की। यह सप्ताह निस्संदेह आजादी के बाद भारत के इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय है। अनुच्छेद 370 की विदाई कोई आसान काम नहीं था। कमोबेश हर दल इसके पक्ष में था, लेकिन सत्ता में रहते हुए उसे हटाने का साहस कोई नहीं कर पाया। भारतीय जनता पार्टी ने जोखिम मोल लिया है। इसके लिए उसे अवाम का समर्थन भी मिला है। इस अवसर पर यह पड़ताल भी जरूरी है कि पत्रकारों-संपादकों ने इस ऐतिहासिक फैसले की कवरेज किस तरह की।

अगर मुझे इस कवरेज का निर्णायक चुना जाए तो भरोसे से कह सकता हूं कि इससे दिल बाग-बाग नहीं हुआ। हम इससे कई गुना बेहतर कर सकते थे, लेकिन नहीं कर सके। समूचे करियर में एक पत्रकार को इतिहास के अनमोल पलों का साक्षी होने के अनेक अवसर नहीं मिलते। आज के भारत में कितने पत्रकार ऐसे होंगे, जिन्होंने भारत की आजादी, बंटवारा, महात्मा गांधी की हत्या, बासठ,पैंसठ और इकहत्तर के युद्धों की कवरेज की होगी।

आपातकाल, जनता पार्टी की सरकार, गुट निरपेक्ष देशों का सम्मेलन, इंदिरा गांधी की शहादत, कारगिल बचाव और अंतरिक्ष अभियानों को कवर करने जैसा ही एक मौका सोमवार को इस देश के पत्रकारों ने पाया था। लेकिन हम उत्साह,आवेग और भावना पर काबू न रख सके। खांटी खबर, तथ्यात्मक विश्लेषण, अंतर्राष्ट्रीय असर और दूरगामी परिणामों के मद्देनजर अपनी रिपोर्टिंग में हम गहराई नहीं ला सके।

इसके दो कारण समझ में आते हैं। एक तो इस तरह के मामलों में हम पाकिस्तान फोबिया से ग्रस्त हो जाते हैं। यह पड़ोसी हमारे अवचेतन पर इस तरह हावी हो जाता है कि हर कदम हमें ब्रह्मास्त्र लगने लगता है। मानो हिन्दुस्तान अभी पलक झपकते ही पाकिस्तान को राख कर देगा। दूसरा कारण मुझे लगता है कि हम खबर आते ही पुराने दस्तावेजों, किताबों, प्रामाणिक संदर्भों की खोजबीन नहीं करते। अपनी सहूलियत के मुताबिक विशेषज्ञों का चुनाव करते हैं और हल्के फुल्के सतही ज्ञान का अंबार लगा देते हैं। एक दर्शक आठ घंटे तक उस बहस को देखता रहे तो भी संतोष नहीं होता और अगर सार्थक चर्चा हो तो एक घंटे में ही डकार आ जाती है। अब इसका क्या किया जाए मिस्टर मीडिया?

वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल की 'मिस्टर मीडिया' सीरीज के अन्य कॉलम्स आप नीचे दी गई हेडलाइन्स पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं-

मिस्टर मीडिया: एक बार फिर इसी सत्याग्रह की जरूरत है

संपादक की दुविधा हम समझते हैं, पर कोई समाधान निकालिए मिस्टर मीडिया!

मिस्टर मीडिया: ऐसे में क्या खाक निष्पक्ष और निर्भीक पत्रकारिता की उम्मीद करेंगे?

मिस्टर मीडिया: क्या हमारे मीडिया संस्थानों के मालिक-संपादक इन जरूरी तथ्यों से अनजान हैं?

आप अपनी राय, सुझाव और खबरें हमें mail2s4m@gmail.com पर भेज सकते हैं या 01204007700 पर संपर्क कर सकते हैं। (हमें फेसबुक, ट्विटर, लिंक्डइन और यूट्यूब पर फॉलो करें)

न्यूजलेटर पाने के लिए यहां सब्सक्राइब कीजिए

कश्मीरी पत्रकार ने कश्मीरी पंडितों पर की 'तीखी' टिप्पणी, बोलीं-अलविदा कश्मीरियत!

इतने वर्षों से हमारी अपनी जमीन पर हमारी अलग पहचान बनी हुई थी, लेकिन अब जब पूरे देश से यहां लोग आकर बसेंगे तो आप सब लोग दिल्ली की किसी कॉलोनी के हिस्से की तरह नजर आएंगे

समाचार4मीडिया ब्यूरो by समाचार4मीडिया ब्यूरो
Published - Wednesday, 07 August, 2019
Last Modified:
Wednesday, 07 August, 2019
Kashmiri Pandit

सागरिका किस्सू, पत्रकार।।  

मैं सिडनी में रह रही हूं और जहां हूं, वहां खुश हूं। कश्मीरी पंडित होने के नाते मेरा भी इस मामले में कुछ कहना है। मेरी अपनी राय है और उसे कहने का मुझे पूरा हक है। कश्मीरी पंडित बेशक बहुत शांत और दयालु माने जाते हों, लेकिन उनकी मतलबपरस्ती और घमंडीपन भी कम नहीं है। कश्मीर में पंडितों की तादाद भले ही अल्पसंख्यक हो, लेकिन शिक्षा के मामले में बहुसंख्यक हैं। सरकारी नौकरियों में महत्वपूर्ण पदों पर उनका कब्जा है। कश्मीरी पंडितों के बच्चों के बस तीन ही सपने होते हैं-डॉक्टर, इंजीनियर और बैंक अफसर (ज्यादतर प्रोबेशनरी अफसर)।

कश्मीरी पंडितों ने मुसलमानों को हमेशा दूसरे दर्जे का नागरिक माना है। दफ्तरों में उनकी संख्या ज्यादा होने के बावजूद अल्पसंख्यक पंडित उन पर अपनी हुकूमत चलाते हैं। कश्मीरी पंडित शेष भारत के लोगों का जिस तरह मजाक उड़ाते हैं, वह अजीबोगरीब है। हर तरह के लोगों की हैसियत तय करने का उनका अपना पैमाना है।

चाहे वो डोगरा हों, दक्षिण भारतीय हों या सिख हों, कश्मीरी पंडित उनका मजाक किसी न किसी बहाने उड़ाते रहते हैं जो सुनने में नस्लवादी फिकरे होते हैं। चूंकि पूरा जम्मू कश्मीर राज्य भारत और पाकिस्तान समर्थकों में बंटा हुआ है तो कश्मीरी पंडित मौका पाते ही कह देते हैं-तो पाकिस्तान चले जाओ।

मैं किसी भी तरह के सशस्त्र संघर्ष का समर्थन नहीं करती, लेकिन सोचती हूं कि जो गालियां और अत्याचार हम दूसरों पर करते हैं, वो हमेशा वापस लौटकर मिलता है। मुझे ऐसा क्यों महसूस हो रहा है कि जो कश्मीरी पंडित आज डांस कर रहे हैं, उन्हें जल्द ही अपनी गलती का पछतावा होगा।

इतने वर्षों से हमारी अपनी जमीन पर हमारी अलग पहचान बनी हुई थी, लेकिन अब जब पूरे देश से यहां लोग आकर बसेंगे तो आप सब लोग दिल्ली की किसी कॉलोनी के हिस्से की तरह नजर आएंगे। आपकी कोई अलग पहचान नहीं होगी। अब तुम्हें मुसलमानों से भी ज्यादा ऐसी चीजें बर्दाश्त करना पड़ेंगी, जो पक्का तुम्हारे लिए नाकाबिले बर्दाश्त होंगी।

कश्मीरी पंडितों की एक पूरी पीढ़ी घाटी के बाहर पैदा हुई और बड़ी हुई है, जिनका सपना अपने वतन (कश्मीर) लौटना था, लेकिन अब की पीढ़ी शायद ही वतन लौटना चाहे। अनुच्छेद 370 और 35ए भले ही भारत को कश्मीर (जमीन से जमीन) के करीब लाया हो, लेकिन यह कश्मीरियत को मिटाने की कीमत के नाम पर किया गया है।

कश्मीरियत का मतलब ऐसे कश्मीरियों के अस्तित्व से है, जो विभिन्न धर्मों और समुदायों से हैं और जो एक-दूसरे से नफरत किए बिना साथ-साथ रहते हों। जब राज्य में कश्मीरियों की अलग तादाद ही बाहर से आने वाले बाकी लोगों के मुक़ाबले महत्वहीन हो जाएगी तो कश्मीरियत भी उसी के साथ खत्म हो जाएगी। एक केंद्र शासित कश्मीर में भले ही इन्फ़्रास्ट्रक्चर का जाल खड़ा हो जाएगा, लेकिन कश्मीर की आबोहवा (पर्यावरण) बर्बाद हो जाएगी।

यहां विभिन्न समुदायों के लोग तो होंगे, लेकिन यहां का अपना मूल कल्चर खत्म हो जाएगा। सफलता की लंबी सूची बन जाएगी, लेकिन जिस बूते कश्मीर कश्मीरियत खड़ी थी, वह खत्म हो जाएगी। अलविदा कश्मीरियत।।

(सागरिका किस्सू के कजिन यूसुफ किरमानी की फेसबुक वॉल से साभार)

आप अपनी राय, सुझाव और खबरें हमें mail2s4m@gmail.com पर भेज सकते हैं या 01204007700 पर संपर्क कर सकते हैं। (हमें फेसबुक, ट्विटर, लिंक्डइन और यूट्यूब पर फॉलो करें)

न्यूजलेटर पाने के लिए यहां सब्सक्राइब कीजिए

पत्रकारों के एक वर्ग के लिए सुकून भरा मनोरंजन होती हैं इस तरह की 'हरकतें'

वरिष्ठ पत्रकार संतोष भारतीय ने उठाया बड़ा सवाल, क्या हमने कश्मीर के पत्रकारों को भी देश विरोधी और पाकिस्तान समर्थक मान लिया है?

संतोष भारतीय by संतोष भारतीय
Published - Wednesday, 07 August, 2019
Last Modified:
Wednesday, 07 August, 2019
Santosh Bhartiya

संतोष भारतीय, वरिष्ठ पत्रकार।।

सुषमा स्वराज जी के निधन और उनके अंतिम संस्कार से पहले मैं यह पंक्तियां लिख रहा हूं। वैसे तो कभी कोई राजनेता पत्रकारों से दूरी नहीं बनाता, पर उनसे मन के संबंध भी नहीं बनाता। भारतीय जनता पार्टी में सिर्फ दो नेता ऐसे रहे, जिन्होंने पत्रकारों से कभी दूरी नहीं बनाई और उनके साथ जब भी बात की, अच्छे माहौल में बात की। इनमें पहली सुषमा स्वराज हैं और दूसरे अरुण जेटली हैं।

सुषमा जी अब हमारे बीच में नहीं हैं, लेकिन अरुण जेटली हैं। दोनों ने जिन पत्रकारों को नहीं पसंद किया, उन्हें भी कभी यह अहसास नहीं होने दिया कि वह उन्हें पसंद नहीं करते हैं। जब भी दोनों सेंट्रल हॉल में आते थे तो पत्रकार उनके आसपास आ जाते थे। हंसी-ठिठोली के साथ वे जितनी देर पत्रकारों के साथ रहते, माहौल को खुशनुमा बनाए रखते। अब सुषमा जी कभी सेंट्रल हॉल नहीं आएंगी, लेकिन अरुण जेटली के संसद के सेंट्रल हॉल में आने की संभावना बनी हुई है और उनका इंतजार भी पत्रकार वहां कर रहे हैं।

इन दिनों अरुण जेटली का स्वास्थ्य भी बहुत अच्छा नहीं है, लेकिन इसे समय की या राजनीति की विडंबना ही कहेंगे कि जो व्यक्ति हमेशा सक्रिय रहा, भारतीय जनता पार्टी की राजनीति के दिशा निर्देशकों में रहा, आज उसका नाम न तो भारतीय जनता पार्टी के लोग लेते हैं और न ही उन्हें सेंट्रल हॉल में याद किया जाता है। शायद यही जिंदगी है और यही दुनिया की रीति है, जो बहुत ही बेरहम है।

इन दिनों पत्रकारिता की नई परिभाषा लिखी जा रही है। एंकर अब पत्रकार और संपादक हो गए हैं, जिनकी पत्रकारिता सिर्फ यहां तक सीमित है जो पूछते हैं कि यह श्रीमान यह कह रहे हैं, आपका क्या कहना है? आज तक हमने कभी उनके मुंह से भारतीय राजनीति के अंतर्विरोध, भारतीय राजनीति के विकास, भारतीय राजनीति के पतन और भारतीय राजनीति के खूबसूरत चेहरे के बारे में एक शब्द नहीं सुना।

देखने में तो यह आ रहा है कि सभी पत्रकार की जगह एक विशेष राजनीतिक पार्टी के विशेष प्रधान प्रवक्ता बन गए हैं। इनमें से किसी को यह देखकर नहीं लगता यह पत्रकार हैं और इन्हें दोनों पक्षों की जानकारी है। हालत अब यहां तक पहुंच गए हैं कि एक पत्रकार अपनी बात कहने की जगह दूसरे पत्रकार का मजाक उड़ाने लगा है।

यह मजाक सिर्फ खिल्ली उड़ाने वाला नहीं है, बल्कि अपमान करने वाला है और यह बताता है कि पत्रकार भी भारतीय राजनीति की उसी बीमारी का शिकार हो गए हैं, जो बीमारी कहती है कि जो हमारे साथ नहीं है, वह देशद्रोही है और देशप्रेमी सिर्फ हम ही हैं। यानी पत्रकार सिर्फ हम ही हैं, आप तो सारी जिंदगी पत्रकार बन ही नहीं पाए। मैंने एक बार और कहा था यह भी विडंबना है कि इनमें से 90 प्रतिशत की जिंदगी में कोई भी एक रिपोर्ट ऐसी नहीं है, जिसे हम रिपोर्ट कह सकते हैं।

टेलिविजन पत्रकारिता के उदाहरण में एक खास पहलू यह है कि रिपोर्ट तो पत्रकार करता है या जिले का अंशकालिक संवाददाता करता है, उसका फायदा या उसका श्रेय एंकर उठाता है। जिसने रिपोर्ट की है, वह उसका नाम ही नहीं लेता। उसे पर्दे पर ही नहीं आने देता, बल्कि इस तरह प्रस्तुत करता है कि मानो यह उसका कमाल हो। यह नई पत्रकारिता की नई परिभाषा लिखने की शुरुआत हो चुकी है।

टेलिविजन की पत्रकारिता और सोशल मीडिया की पत्रकारिता लगभग एक खाने में आती दिखाई दे रही हैं। वायरल सच के नाम पर दूसरे को झूठा साबित करना और खुद उस चैनल ने अपने दर्शकों को कितना झूठ परोसा है, इसकी वास्तविकता न बताना ही आज असली पत्रकारिता है।

आज की इसी पत्रकारिता ने हमें यह भी बताया है रवीश कुमार, जिन्हें मैगसायसाय पुरस्कार मिला, दरअसल वे विदेशी एजेंट हैं और उन्हें 2014 में यह काम सौंपा गया था कि वे 2014 के बाद बनी सरकार के वादों का पर्दाफाश करते रहें। इसके लिए किन-किन देशों की किन-किन ताकतों ने उन्हें धन मुहैया कराया?

रवीश कुमार को देशद्रोही पत्रकार घोषित करने में सोशल मीडिया पर प्रतिस्पर्धा शुरू हो गई और दूसरी तरफ भारत के टेलिविजन चैनलों के कुछ अपवादों को छोड़कर किसी ने इसे पत्रकारों के लिए गर्व का विषय नहीं माना। यही कारण रहा कि जो हमारे साथ है, वही सही पत्रकार है, बाकी सब देश विरोधी हैं।

बहुत सारी घटनाओं की तरह कश्मीर के सवाल पर कश्मीर के पत्रकारों की जगह दिल्ली के पत्रकारों की राय देश के सामने आई। कश्मीर के जर्नलिस्ट क्या बोलते हैं, उनकी राय क्यों प्रमुखता से सामने नहीं आई। क्या हमने कश्मीर के पत्रकारों को भी देश विरोधी और पाकिस्तान समर्थक मान लिया है? यह स्थिति क्या स्वस्थ समाज का लक्षण है?

एक और विलक्षण स्थिति है। अगर विनोद दुआ, अभिसार शर्मा, पुण्य प्रसून बाजपेयी, रवीश कुमार, अशोक वानखेडे, बरखा दत्त, उर्मिलेश जैसे पत्रकारों को सोशल मीडिया पर गालियां दी जाएं, उनके ट्विटर, वॉट्सऐप या मैसेज पर भद्दी-भद्दी धमकियां दी जाएं तो पत्रकारों के एक वर्ग के लिए बहुत सुकून भरा मनोरंजन हो जाता है जो उन्हें मानसिक संतुष्टि देता है। राजनीतिक विचारधाराएं पहले भी होती थी, लेकिन वह रिपोर्ट के तथ्यात्मक हिस्से में नहीं झलकती थीं।

आज तो एंकर जैसे ही स्क्रीन पर आया, एक साधारण आदमी भी अंदाजा लगा लेता है कि क्या बोलने वाला है और कैसे सवाल पूछने वाला है? पहले ऐसे नेता होते थे, जो स्वयं अपने खिलाफ छद्म नाम से एडिट पेज पर आर्टिकल लिखते थे। ऐसे पत्रकार होते थे, जो अपने घनिष्ठ राजनीतिक मित्र के विरुद्ध भी बेहिचक रिपोर्ट करते थे और अपनी दोस्ती भी नहीं तोड़ते थे।

अंग्रेजों जमाने में भी दो तरह के पत्रकार होते थे। एक वो जो गवर्नर जनरल या लाट साहब के यहां चाय पीना अपने लिए गर्व की बात मानते थे, दूसरे वह जो देश के लिए और देश की जनता के लिए पत्रकारिता करते थे। आज भी ऐसे लोग हैं और ऐसे लोग बेशर्मी से पत्रकारिता की नई परिभाषा लिख रहे हैं। आइए और इस नई परिभाषा को समझिए और मुस्कुराइए।

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

आप अपनी राय, सुझाव और खबरें हमें mail2s4m@gmail.com पर भेज सकते हैं या 01204007700 पर संपर्क कर सकते हैं। (हमें फेसबुक, ट्विटर, लिंक्डइन और यूट्यूब पर फॉलो करें)

न्यूजलेटर पाने के लिए यहां सब्सक्राइब कीजिए

राजेंद्र माथुर जी के उस दिन दफ्तर आने पर मैं बेहद घबरा गया था: विनोद अग्निहोत्री

यह जानने के बाद कि मैं जेएनयू के स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज में एमफिल कर रहा हूं तो उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों पर तमाम सवाल पूछे

समाचार4मीडिया ब्यूरो by समाचार4मीडिया ब्यूरो
Published - Wednesday, 07 August, 2019
Last Modified:
Wednesday, 07 August, 2019
Vinod agnihotri

विनोद अग्निहोत्री, कंसल्टिंग एडिटर, अमर उजाला।।

आज पत्रकारिता में 34 वर्षों के लंबे अंतराल के बावजूद मुझे वह दिन बहुत अच्छी तरह याद है, जब मैं दिल्ली के बहादुरशाह जफर मार्ग स्थित टाइम्स हाउस की चौथी मंजिल पर नवभारत टाइम्स के लिए साक्षात्कार देने गया था। राजेंद्र माथुर जी से मेरी यह पहली मुलाकात थी। मैंने उनका नाम भी सुन रखा था और उनका लिखा पढ़ता भी था। उन दिनों मैं जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में एम.फिल कर रहा था और किसी ऐसी नौकरी की तलाश में था, जिसमें मैं अपनी पढ़ाई भी बेरोकटोक जारी रख सकूं।

जब नवभारत टाइम्स में पत्रकारों की जगह निकली तो मैंने भी आवेदन किया। लिखित परीक्षा पास करने के बाद इंटरव्यू देने आया था। इंटरव्यू के दौरान सबसे ज्यादा सवाल राजेंद्र माथुर जी ने ही पूछे। यह जानने के बाद कि मैं जेएनयू के स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज में एमफिल कर रहा हूं तो उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों पर तमाम सवाल पूछे।

इंटरव्यू के लिए आए तमाम दूसरे अभ्यर्थियों को देखकर मुझे नहीं लग रहा था कि मेरा चयन होगा, क्योंकि मुझे तब पत्रकारिता का कोई अनुभव नहीं था, जबकि अन्य अभ्यर्थी पांच से दस साल तक का अनुभव लेकर आए थे। लेकिन नवभारत टाइम्स में मेरा चयन हुआ और मुझे लखनऊ संस्करण भेज दिया गया। जहां से एक साल बाद मुझे फिर दिल्ली बुला लिया गया और तब मुझे माथुर जी के साथ सीधे काम करने का मौका मिला।

ये वो दौर था जब अंग्रेजी अखबारों और पत्रिकाओं का बोलबाला था। राजनीति के गलियारों से लेकर सरकारी अफसरों तक के यहां अंग्रेजी वालों की तूती बोलती थी। लेकिन इसी दौर में राजेंद्र माथुर के संपादन में निकलने वाले नवभारत टाइम्स, जिसमें कुछ समय बाद सुरेंद्र प्रताप सिंह कार्यकारी संपादक के रूप में आ गए, ने हिंदी पत्रकारिता को जो तेवर और धार दी, जिससे अंग्रेजी वाले भी उसका लोहा मानने लगे।

राजेंद्र माथुर जी के साथ मेरे कई निजी अनुभव भी हैं, जिनमें कुछ मैं यहां साझा कर रहा हूं। माथुर जी बेहद सहज और सरल व्यक्तित्व के इंसान थे। असहमति को सम्मान देना कोई उनसे सीखे। उनकी लेखनी और उसकी व्यंजना अद्भुत थी। उनके संपादकीय और लेख समय के दस्तावेज हैं। पंजाब में आतंकवाद के दौरान जब उनके प्रखर लेखन से खफा आतंकवादियों ने उन्हें जान से मारने की धमकी दी और सरकार ने उन्हें सुरक्षा मुहैया करानी चाही तो माथुर जी ने यह कहते हुए साफ मना कर दिया कि जिस दिन लेखक और पत्रकार पुलिस की सुरक्षा में चलेंगे उस दिन कलम मर जाएगी। जरा तुलना कीजिए, आज उन पत्रकारों और संपादकों से जो पुलिस की सुरक्षा पाने के लिए मंत्रियों और मुख्यमंत्रियों के आगे किस तरह नतमस्तक होते हैं।

नए और युवा पत्रकारों की रुचियों और प्रतिभा की पहचान करके उन्हें आगे बढ़ने का मौका देना राजेंद्र माथुर जी की प्रकृति थी। मेरे जैसे और मुझसे वरिष्ठ न जाने कितने पत्रकार आज जहां भी हैं, उसके पीछे माथुर जी का संरक्षण और प्रोत्साहन ही बुनियाद है। उन दिनों जब मैं और मेरे ही हमउम्र कई संपादकीय साथी जो डेस्क पर थे, नभाटा के संपादकीय पृष्ठ पर तमाम राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और समसामयिक विषयों पर पहला लेख लिखते थे और छपते थे।

अगर कभी लेख लिखने में ढिलाई हो जाए तो माथुर साहब खुद टोक देते थे कि क्या बात है, लिखना बंद कर दिया क्या। माथुर साहब की परिकल्पना थी कि अखबार एक गुलदस्ते की तरह होता है, जिसमें हर रंग हर किस्म और हर महक के फूल होने चाहिए। इसीलिए राजेंद्र माथुर की टीम में एस पी सिंह, विष्णु खरे, आलोक मेहता, मधुसूदन आनंद, राजकिशोर, विष्णु नागर, सूर्यकांत बाली, प्रयाग शुक्ल, रामबहादुर राय जैसे दिग्गज और हर विचारधारा के पत्रकार थे। उन दिनों नभाटा के संपादकीय पेज पर किसी भी धारा के लेख छपने की आजादी थी।

एक बेहद दिलचस्प वाक्या। राजेंद्र यादव के संपादन में निकलने वाली हंस पत्रिका में जनवादी पत्रकार आनंदस्वरूप वर्मा ने एक लेख लिखकर राजेंद्र माथुर के लेखन पर आलोचनात्मक टिप्पणी की। माथुर साहब ने उस लिख को इनलार्ज कराकर नोटिस बोर्ड पर लगवाया और अपनी आलोचना को हाईलाइटर से रेखांकित करके टिप्पणी लिखी कि सभी संपादकीय साथी इसे अवश्य पढ़ें। खुद आनंदस्वरूप वर्मा बताते हैं कि लेख लिखने के बाद उन्होंने संकोचवश माथुर साहब से मिलना बंद कर दिया, जबकि पहले खूब मिलते थे। इसी दौरान वर्मा को दक्षिण अफ्रीका के पहले आम चुनाव में वहां जाने का मौका मिला.। यह बात जब माथुर साहब को पता चली तो उन्होंने वर्मा को बुलाया और पहले तो कहा कि मिलना क्यों बंद कर दिया। फिर बोले कि सुना है दक्षिण अफ्रीका जा रहे हो, वहां से नभाटा के लिए लिखिए। आनंद स्वरूप वर्मा ने लिखा और राजेंद्र माथुर ने छापा। कल्पना कीजिए आज के दौर में क्या यह मुमकिन है।

और भी बहुत सारे अनुभव हैं राजेंद्र माथुर जी के साथ मेरे और तमाम साथियों के। उन दिनों बहादुरशाह जफर मार्ग में टाइम्स और एक्सप्रेस के दफ्तरों में काम करने वाले पत्रकारों का आपस में खूब आना-जाना होता था। नवभारत टाइम्स में राजेंद्र माथुर और जनसत्ता में प्रभाष जोशी हिंदी के दो शिखर संपादक यहीं बैठते थे। अखबारों के दफ्तर आज के दौर की तरह कार्पोरेट कार्यालय नहीं थे। तब न्यूज रूम जीवंत होते थे और खबरों पर राजनीति पर मुद्दों पर गरमा गरम बहस होती थी। कई बार हम युवा पत्रकार किसी मुद्दे पर बहस करते थे तो अचानक पता चलता था कि बगल में चुपचाप माथुर साहब खड़े सुन रहे हैं। हम लोग उन्हें देखकर झेंप जाते थे तो वह कहते थे आप लोग बातचीत करते रहिए और मुझे सुनने दीजिए।

उन दिनों नभाटा में लेख और रिपोर्ट लिखने की होड़ होती थी। मुझे डेस्क से जब रिपोर्टिंग के लिए पश्चिमी उत्तर प्रदेश संवाददाता बनाकर मेरठ भेजा गया तो एक बार राजेंद्र माथुर जी को मेरठ में एक कार्यक्रम में बतौर मुख्य अतिथि आना था। लेकिन उसी दिन मुझे अचानक एक रिपोर्टिंग के सिलसिले में मुजफ्फरनगर के दूर दराज देहात में जाना पड़ गया। जब लौटा तो रात के नौ बज चुके थे। मेरठ आफ्रिस आने पर पता चला कि माथुर साहब कार्यक्रम के बाद कुछ देर के लिए दफ्तर भी आए थे। मैं बेहद घबरा गया कि प्रधान संपादक आए और मैं नहीं मिला। मैंने रात में ही उन्हें टेलीप्रिंटर से संदेश भेजकर बताया कि मैं एक बड़ी खबर के सिलसिले में गया था, लेकिन लौटने में देर हो गई,इसलिए आपसे नहीं मिल सका। आशा है कि आप इसे अन्यथा नहीं लेंगे।

अगले दिन सुबह साढ़े ग्यारह बजे मेरी मेज पर माथुर साहब का जवाब टेलीप्रिंटर संदेश रखा था, जिसमें लिखा था कि मेरी खातिरदारी से ज्यादा जरूरी है खबर पर काम करना। मैं इसे बिल्कुल अन्यथा नहीं लूंगा लेकिन अगर तुम खबर छोडकर मेरे लिए रुकते तो जरूर अन्यथा लेता। ऐसे थे राजेंद्र माथुर, जिन्हें मैं हिंदी पत्रकारिता के स्वर्णकाल का महानायक मानता हूं। उनकी स्मृतियां हमेशा मेरे जैसे तमाम उन पत्रकारों के साथ रहेंगी, जिनकी पत्रकारिता की बुनियाद में राजेंद्र माथुर की शिक्षा दीक्षा है।

(आज स्व. राजेंद्र माथुर जी की 84वीं जयंती है)

आप अपनी राय, सुझाव और खबरें हमें mail2s4m@gmail.com पर भेज सकते हैं या 01204007700 पर संपर्क कर सकते हैं। (हमें फेसबुक, ट्विटर, लिंक्डइन और यूट्यूब पर फॉलो करें)

न्यूजलेटर पाने के लिए यहां सब्सक्राइब कीजिए