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प्रवक्ता, अहंकार और संवाद की संवेदनहीनता का सबक: नीरज बधवार

चूंकि समाज के अवचेतन में अंग्रेज़ी को लेकर एक हीन भावना मौजूद है, इसलिए जो व्यक्ति अंग्रेज़ी में प्रभावशाली ढंग से बोल लेता है, वह अक्सर खुद को विद्वान भी मान बैठता है।

समाचार4मीडिया ब्यूरो ।। 20 hours ago

नीरज बधवार, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक।

गलगोटिया मामले में यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर नेहा सिंह का व्यवहार हर बड़ी संस्था के प्रवक्ता के लिए एक सबक होना चाहिए। होता यह है कि हमारी संस्थाओं में ऐसे पदों पर भर्ती के समय यह देखा जाता है कि सामने वाला कितनी तेज़तर्रार अंग्रेज़ी बोल पा रहा है और उसके बोलने में कितना आत्मविश्वास है। ऊपर से अगर उसका चेहरा-मोहरा भी प्रभावशाली है, तो फिर उसे योग्य मान लिया जाता है।

चूंकि समाज के अवचेतन में अंग्रेज़ी को लेकर एक हीन भावना मौजूद है, इसलिए जो व्यक्ति अंग्रेज़ी में प्रभावशाली ढंग से बोल लेता है, वह अक्सर खुद को विद्वान भी मान बैठता है। इसके बाद वह कुछ मनोवैज्ञानिक तरीके सीख लेता है, जिससे सार्वजनिक संवाद में सामने वाले पर प्रभाव या दबाव बनाया जा सके।

भारतीय कॉरपोरेट क्षेत्र में ऐसे लोग बड़ी संख्या में हैं, जिनकी प्रमुख योग्यता केवल प्रभावशाली अंग्रेज़ी बोलना होती है। लेकिन यह केवल संवाद का बाहरी रूप है। असली योग्यता यह है कि व्यक्ति को पता हो कि कब, कितना और कैसे बोलना है। उसके शब्दों का चयन संतुलित हो, उसमें भावनात्मक समझ हो और वह अपने शब्दों के प्रभाव को समझता हो।

माइक्रोसॉफ्ट के मुख्य कार्यकारी अधिकारी सत्या नडेला का एक उदाहरण इस संदर्भ में महत्वपूर्ण है। उन्होंने बताया था कि उनके साक्षात्कार में उनसे पूछा गया कि यदि सड़क पर कोई बच्चा रोता हुआ दिखे तो क्या करेंगे। उन्होंने कहा कि वह आपातकालीन सेवा को कॉल करेंगे। तब साक्षात्कारकर्ता ने कहा कि सबसे पहले बच्चे को सांत्वना देना जरूरी है। यही भावनात्मक समझ नेतृत्व की सबसे बड़ी ताकत होती है।

यदि नेहा सिंह से कोई गलती हुई थी, तो संस्थान के प्रबंधन को स्थिति को समझदारी से संभालना चाहिए था। लेकिन उन्हें दोबारा मीडिया के सामने लाकर प्रबंधन ने संकट प्रबंधन की कमी को उजागर कर दिया। विनम्रता दिखाने और गलती स्वीकार करने के बजाय, सफाई देने की कोशिश ने विवाद को और बढ़ा दिया।

यह मामला केवल एक प्रवक्ता की गलती नहीं है, बल्कि यह हमारे शिक्षा और संस्थागत संवाद की संवेदनशीलता की कमी को भी दर्शाता है। सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि यदि एक विश्वविद्यालय स्वयं संकट का सही तरीके से सामना नहीं कर सकता, तो वह अपने छात्रों को जीवन की चुनौतियों के लिए कैसे तैयार करेगा।

( यह लेखक के निजी विचार हैं )


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