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वरिष्ठ पत्रकार संतोष भारतीय बोले, पत्रकारिता पर भी लागू होता है युद्ध का ये नियम

अब संपादक होने के लिए सबसे बड़ी योग्यता स्वयं अखबार या पत्रिका का मालिक होना हो गया है

संतोष भारतीय 6 years ago

आजकल हिंदी पत्रकारिता में संपादक शब्द का अर्थ बदल गया है। अब संपादक होने के लिए सबसे बड़ी योग्यता स्वयं अखबार या पत्रिका का मालिक होना हो गया है। कुछ ही अखबारों में या पत्रिकाओं में संपादक नाम का प्राणी मरणासन्न होने के बावजूद सांस ले रहा है, बाकी जगहों पर अगर वह जनसंपर्क में माहिर है, तब वह स्थापित है और अगर वह पीआर जर्नलिज्म में माहिर नहीं है, तब उसका आना और जाना कोई खबर नहीं है।

जैसे अंग्रेजी में कहते हैं वन्स अपऑन ए टाइम, यानी एक समय की बात है, वैसे ही मैं अपनी बात शुरू करता हूं कि कभी अपने महान देश में युद्ध का नियम पत्रकारिता पर लागू होता था। सेना यदि युद्ध जीतती है तो उसमें कई लोगों का योगदान होता है। एक सिपाही गोली चलाता है तो एक सिपाही खाना बनाता है। एक सिपाही कपड़े धोता है तो एक सिपाही चिट्ठियां लाता-ले जाता है। इसी तरह की कई जिम्मेदारियां जब वे सभी सही ढंग से निभाते हैं, तभी गोली चलाने वाला सिपाही सही निशाना लगाता है और विजय हासिल करता है।

कमांडर-इन-चीफ का नाम इसलिए होता है, क्योंकि वह सारी योजना बनाता है। वही तय करता है कि कौन सी ब्रिगेड किस मोर्चे पर लड़ेगी तथा कहां से आगे बढ़ना है और कहां से पीछे हटना है। वह अपने उन जनरल का भी चुनाव करता है कि किसे कौन सी जिम्मेदारी देनी है। बड़े हमलों से लेकर सप्लाई लाइन तक का नक्शा उसके दिमाग में साफ होता है। दुनिया में बहुत सारे युद्ध हुए हैं, जिनमें कोई जीता है तो कोई हारा है। जनरल भी बहुत सारे हुए हैं, पर दुनिया कम ही लोगों के नाम जानती है। देश भी ज्यादा लोगों को नहीं जानता। लोग केवल उन्हें याद करते हैं, जिन्होंने अनोखे तरीके से जीत हासिल की होती है।

यही हाल पत्रकारिता का है, पर पत्रकारिता में एक विशेष स्थिति और है। यहां हर रोज एक युद्ध लड़ना पड़ता है। देश में बड़ी संख्या में अखबार, पत्रिकाएं और टेलिविजन न्यूज चैनल हैं।  न जाने कितने लोग संपादक की जगह आए और चले गए, पर कुछ ही हैं जो पाठकों के मानस में चमक रहे हैं। क्यों ऐसा होता है कि कुछ लोग भीड़ से अलग दिखाई देने लगते हैं। क्या इसके लिए किसी खास ट्रेनिंग की जरूरत होती हैं? इसका कोई विशेष फार्मूला है? सभी लोग काम करते हैं, पर क्यों कुछ का काम ज्यादा पसंद किया जाने लगता है और क्यों कोई उदाहरण बन जाता है?

हर संपादक को लगता है कि वह विलक्षण है, अलग है और अद्भुत है, पर सवाल है कि उनके बारे में और लोगों की भी यही राय है या नहीं। संपादकों की भीड़ से अलग दिखते संपादक में नेतृत्व की कितनी क्षमता है, यह उसका पहला पैमाना है। नेतृत्व क्षमता में दक्षता ही किसी को संपादकों की भीड़ में से अलग स्टार या सुपरस्टार संपादक बनाती है। उसके साथी उसे संपादक की कुर्सी पर बैठा होने के भाग्य के कारण इज्जत देते हैं या उसके गुणों से प्रभावित होकर जी जान लगाकर काम करते हैं।

लेख छांटना, लेआउट बनाना, अनुवाद की जांच, इंट्रो लिखना तथा हेडिंग लगाना, ऐसे बुनियादी काम हैं, जिन्हें संपादक को स्वयं करना चाहिए, पर इससे आगे की बात यह है कि संपादक अपनी टीम को किस तरह की और कितनी आजादी देता है, यह महत्वपूर्ण है। अपनी टीम को आजादी दोनों देते हैं। कमजोर संपादक भी और ऊर्जावान संपादक भी, लेकिन दोनों की आजादी में फर्क होता है। कमजोर संपादक की टीम आजाद होकर संपादकीय अराजकता पैदा कर देती है जो कि अखबार, पत्रिका या चैनल को दिशाहीन कर देती है। वहीं ऊर्जावान संपादक की दी हुई आजादी अखबार, पत्रिका अथवा चैनल को नई ऊंचाइयों की यात्रा कराती है। इसलिए हम जब संपादक की बात करते हैं तो ऊर्जावान संपादक की बात करते हैं। यहां भी एक छुपा हुआ तत्व है, जिसकी चर्चा हम आखिर में करेंगे।

संवाददाता को प्रेरित करने वाला व्यक्तित्व भी संपादक का होना चाहिए। संवाददाता तभी अपनी संपूर्ण शक्ति रिपोर्ट करने में लगाता है, जब उसकी संपादक के प्रति श्रद्धा होती है इसके लिए संपादक को ऐसा वातावरण तैयार करना चाहिए कि जब संवाददाता पर कोई भी परेशानी आएगी, तो वह उसके साथ खड़ा होगा। अगर संपादक यह विश्वास संवाददाता को दिला दें तो ऐसी रिपोर्ट मिलेगी, जो उसे उसके अखबार, पत्रिका या चैनल को प्रथम श्रेणी में लाकर खड़ा कर देगी। अन्यथा संवाददाता सामान्य से थोड़ी बेहतर रिपोर्ट ही लाएगा, पर असामान्य, असाधारण या देश को हिला देने वाली नहीं।

संपादक कितना सतर्क या कुशल है, यह इस बात से पता चल जाता है कि उसका सूचना तंत्र क्या है। ज्यादा से ज्यादा अखबार व पत्रिकाएं पढ़ने के साथ उसका संबंध उनसे भी होना चाहिए, जो शासन चलाते हैं। इसमें पुलिस व प्रशासन के अधिकारी, राजनीतिज्ञ  शामिल हैं। उसे जो भी चीज मिले, पढ़नी चाहिए। दरअसल यह सूचना तंत्र ही संपादक की नेतृत्व क्षमता को बढ़ाता है, क्योंकि एक संपादक के पास जानकारी ही उसकी सबसे बड़ी ताकत है। जानकारी का यह खजाना ही, उसे अपने संवाददाताओं और संपादकीय टीम से अलग करता है। अन्यथा यदि वह भी उसी स्तर पर रहेगा तो नेतृत्व दे ही नहीं सकता।

संपादक में न्यूजसेंस कितना है, यह भी उसका कद डिसाइड करता है। जानकारी आ रही हो, वह संपर्क भी रख रहा हो, पर यह तय न कर पाए कि इसमें से खबर क्या निकालनी है तो उसके पास की जानकारी व्यर्थ है। वहां रेफरेंस या कंप्यूटर में एकत्र जानकारी का पर्याय बनकर रह जाएगा। कौन सी खबर कब काम आ सकती है तथा किस खबर को कितना महत्व देना है, इसका ज्ञान एक संपादक को होना ही चाहिए। खबरों की दुनिया में समय का बढ़ा महत्व है। समय के पहले जो खबर दे देता है, वह सफल संपादक माना जाता है। खबरें हमेशा आसपास बिखरी रहती हैं पर उनमें से चुनकर जो संपादक देश को कुछ अलग दे देता है, वह याद रह जाता है। बाकी संपादकों की भीड़ में एक संपादक भर बनकर रह जाते हैं।


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