होम / विचार मंच / 'आज पत्रकारिता से जुड़े इन सवालों का सामूहिक रूप से उत्तर तलाशने की जरूरत है'

'आज पत्रकारिता से जुड़े इन सवालों का सामूहिक रूप से उत्तर तलाशने की जरूरत है'

पत्रकार अगर समस्या के ऊपर लिख देता था तो प्रशासन उस पर कार्रवाई करता था और अगर कार्रवाई नहीं करता था तो सरकार कार्रवाई करने के लिए दबाव डालती थी

संतोष भारतीय 6 years ago

संतोष भारतीय, वरिष्ठ पत्रकार।।

हमारा समाज विकासशील है, परिवर्तनशील है, लेकिन अब तक हम यह मानते थे की दिशाएं परिवर्तनशील नहीं हैं। सूरज हमेशा पूरब से निकलता है और सफेद को सफेद ही कहते हैं और काले को काला। इसी तरह लोकतंत्र, तानाशाही, अमीरी, गरीबी और पत्रकारिता की परिभाषाएं लगभग स्पष्ट हैं, भले ही भाषा कोई भी हो या देश कोई भी हो, लेकिन लगता है अब यह परिभाषाएं भी परिवर्तनशील हो गई हैं। पत्रकारिता कैसी करें, किस विषय पर करें, यह व्यक्तिगत या संस्थान का निर्णय हो सकता है, लेकिन पत्रकारिता क्या है, यह विवाद का विषय कम ही रहा है, लेकिन आज लगता है यह मान्यता भी बदल रही है या बदल गई है।

पत्रकारिता के बारे में यह मान्यता थी, विशेषकर आम लोगों में कि जब कहीं सुनवाई न हो, तब पीड़ित व्यक्ति या व्यक्तियों का समूह अगर पत्रकार के पास पहुंच जाए और पत्रकार उनकी समस्या सुनकर इसका संज्ञान ले ले तो विश्वास था कि उनकी समस्याएं समाधान की तरफ बढ़ जाएंगी। यह विश्वास गलत भी नहीं था और यह हमारे देश में होता भी था। पत्रकार अगर समस्या के ऊपर लिख देता था तो प्रशासन उस पर कार्रवाई करता था और अगर कार्रवाई नहीं करता था तो सरकार कार्रवाई करने के लिए दबाव डालती थी। इस स्थिति के गवाह बहुत सारे पत्रकार अभी हमारे बीच में हैं।

उन दिनों चाहे जिला प्रशासन हो या प्रदेश का शासन, पत्रकारों को अनदेखा नहीं कर पाता था। हर एक को जनता के बीच अपनी छवि खराब होने की आशंका डराती रहती थी। झूठ बोलने या भटकाने वाली कार्रवाई करने वाला व्यक्ति चौकन्ना रहता था कि कहीं उसकी कार्रवाई की खबर पत्रकारों को न मिल जाए। पत्रकार भी दबाव सहते थे, धमकी का सामना करते थे, लेकिन कुछ लोग सही लिखने की हिम्मत रखते थे। कौन पीड़ित है या कौन दबाया हुआ है, उनकी पहली कोशिश इसे तलाशने की रहती थी। उस समय भी कौन अधिकारियों के साथ या मंत्रियों के साथ ज्यादा दिखाई देता है या उनके साथ ज्यादा उठता-बैठता है या कौन सिर्फ प्रशासन या सरकार का पक्ष लेकर लिखता है, पीड़ित व्यक्ति या समूह के खिलाफ अभियान चलाता है, लोगों की नजर में आसानी से आ जाता था। उसकी क्रेडिबिलिटी पर सवाल उठ जाता था।

अब हालात बदल गए हैं। नई परिभाषाएं लिखी जाने लगी है। ऐसे पत्रकारों की संख्या बढ़ने लगी है जो जनता की तरफ से नहीं, बल्कि सत्ता की तरफ से रिपोर्ट करना, सवाल करना, तथ्यों का निर्माण करना ही पत्रकारिता मानते हैं। बात इससे आगे बढ़ गई हैं। न्यूज चैनल्स के अधिकांश एंकर तो सत्ता के ऐसे वकील बन गए हैं जो सत्ता के पक्ष में तर्क तो निर्मित करते ही हैं, बल्कि ऐसे तेवर अपनाते हैं जिससे वे पार्टी के प्रवक्ता के तर्कों को और ज्यादा धार दे सकें। इनकी नजर में जो पार्टी की लाइन है, वही परम सत्य है और जो भी उसका विरोध करता है, वह इनके लिए निशाना बन जाता है।

अद्भुत ज्ञान से भरे यह महान पत्रकार, पत्रकारिता का ऐसा चेहरा बन रहे हैं जो पत्रकार बनने वाले नए पत्रकारों का आदर्श बनते जा रहे हैं। इनके लिए अंग्रेजों के जमाने में वायसराय के पक्ष की पत्रकारिता करने वाले दुर्गा दास जी आदर्श हैं, लेकिन गणेश शंकर विद्यार्थी उनके लिए घृणा के पात्र हैं। इन महान ज्ञानी , आदर्शों की नई परिभाषा करने वाले पत्रकारों को आजादी के बाद प्रभाव डालने वाले और सही रिपोर्ट करने वाले पत्रकारों के नाम भी नहीं मालूम होंगे। यह शायद प्रभाष जोशी और अजीत भट्टाचार्जी जैसे पत्रकारों को गलत मानते होंगे, जिन्होंने आपातकाल लागू होने के बाद संपादकीय स्थान को खाली छोड़ दिया था। यह केवल दिल्ली में नहीं हुआ था, बल्कि देश में कई जगह हुआ था।

कुलदीप नैयर जैसे जेल में जाने वाले पत्रकारों की एक लंबी सूची है, जिसमें बनारस के श्यामाप्रसाद प्रदीप जैसे नाम शामिल हैं। शायद इन्होंने सत्ता का विरोध कर गलत काम किया, कम से कम आज टीवी की पत्रकारिता करने वाले लोग यही मानते होंगे। इन्हें भी आपातकाल का या उस समय की सत्ता का समर्थन करना चाहिए था और सत्ता के समर्थन में तर्क गढ़ने चाहिए थे, कम से कम आज की पत्रकारिता का ट्रेंड तो यही बताता है।

यह बात कही जा रही है कि राजीव गांधी और वीपी सिंह के समय ऐसी पत्रकारिता प्रारंभ हुई, जिसमें पत्रकारों ने एक पक्ष का खासकर वीपी सिंह का साथ देना शुरू किया। जो लोग यह तर्क देते हैं, उनके ज्ञान की प्रशंसा करनी चाहिए। हमें तो यह मालूम है कि जब वीपी सिंह और राजीव गांधी के मतभेद शुरू हुए, तब देश का 90% मीडिया राजीव गांधी का समर्थन कर रहा था। वीपी सिंह को रिपोर्ट करने में लोगों की रुचि नहीं थी, लेकिन जैसे-जैसे पत्रकारों के सामने यह साफ होने लगा कि रक्षा सौदों में कुछ गड़बड़ी हुई है, वीपी सिंह को ज्यादा स्थान मिलने लगा। न राजीव गांधी की तरफ से पत्रकारों पर दबाव था कि उनके पक्ष में लिखा जाए और न ही जब वीपी सिंह प्रधानमंत्री बने, तब उनकी ओर से कहीं दबाव डाला गया कि उनके पक्ष में लिखा जाए।

लेकिन आज ऐसा माहौल बन गया है, जिसे न्यूज चैनल्स ने बना दिया है कि कोई भी पत्रकार विपक्ष को रिपोर्ट करना अपनी नौकरी के लिए खतरा मानने लगा है। सवाल विपक्ष को रिपोर्ट करने का नहीं है। सवाल विषय के दोनों पहलू पाठकों के सामने या दर्शकों के सामने लाने का है तथा लिखने वाला या एंकर किसी का वकील नहीं है, यह भी महत्वपूर्ण है। अंग्रेजी हो या हिंदी, पत्रकारों का बड़ा वर्ग अपने को इस स्थिति में बहुत असहज महसूस कर रहा है। अगर मैं विनोद दुआ, अशोक वानखेड़े, अभय दुबे, उर्मिलेश, सीमा मुस्तफा की बात करूं, या फिर पुण्य प्रसून बाजपेयी, अभिसार या परंजय गुहा ठाकुर्ता की बात करूं तो क्या यह संदर्भ से अलग होगा?

मैं सिर्फ दिल्ली की बात करूं तो अन्याय होगा। लखनऊ में ज्ञानेंद्र शर्मा, रामदत्त त्रिपाठी, दीपक गिडवानी सहित बहुत से पत्रकार देश की स्थिति और मीडिया की स्थिति को लेकर चिंतित हैं। यह चिंता भोपाल, पटना, जयपुर, कोलकाता, नागपुर, पुणे और मुंबई सहित दक्षिण में भी है। राजेश बादल तथा विनोद अग्निहोत्री जैसे पत्रकार बनारस में भी बहुत हैं। मैं कह सकता हूं कि काशी पत्रकार संघ भी पत्रकारिता की स्थिति को लेकर बहुत चिंतित है।

कश्मीर में अरनब गोस्वामी, सुधीर चौधरी, अंजना ओम कश्यप और रोहित सरदाना जैसे महान पत्रकारों को वहां जाकर रिपोर्ट करनी चाहिए। कुछ पत्रकार गए थे, जिन्होंने खाली सड़कें दिखाकर कहा कि कश्मीर में सब सामान्य है। इसके ऊपर अशोक वानखेडे का कमेंट मजेदार है कि स्कूल खुले हैं लेकिन छात्र नहीं हैं, मस्जिद खुली हैं, लेकिन नमाज ही नहीं हैं।  भारत में हम वहां के फुटेज नहीं देख सकते, उन्हें देखने के लिए अल जजीरा या बीबीसी जैसे विदेशी चैनलों को देखना पड़ता है। कश्मीर के पत्रकारों की रिपोर्ट या उनसे बात करना दूभर हो गया है। सिद्धांत हो गया है कि जो सरकार कहे, वह देश प्रेम है, कम से कम न्यूज चैनल देश को यही बता रहे हैं।

इस सारी स्थिति पर बात करना या बहस करना भी क्या आज पत्रकारिता के सिद्धांतों के विपरीत हो गया है? यह सवाल बहुतों के दिमाग में उठ रहा है। इस तरह के सवालों का सामूहिक रूप से उत्तर तलाशने की आवश्यकता है। देखना है कि जो दूसरों के सवालों का उत्तर तलाशने का जिम्मा अपने कंधे पर लिए हुए हैं, वे अपने सवालों का उत्तर तलाश पाते हैं या नहीं?

(यह लेखक के निजी विचार हैं)


टैग्स संतोष भारतीय पत्रकारिता मीडिया की जिम्मेदारी
सम्बंधित खबरें

सामाजिक सरोकारों को छोड़कर पत्रकारिता संभव नहीं: प्रो.संजय द्विवेदी

चिंता तब होती है जब पत्रकार स्वयं पार्टी के प्रवक्ता की तरह व्यवहार करने लगते हैं। पत्रकार की अपनी राजनीतिक समझ होना गलत नहीं है, लेकिन पार्टी लाइन पर चलना पत्रकारिता के लिए खतरनाक है।

1 day ago

LPG का संकट क्यों हो गया? पढ़िए इस सप्ताह का 'हिसाब किताब'

ईरान-इज़राइल युद्ध के बीच Hormuz Strait संकट से वैश्विक तेल बाजार में उथल-पुथल है। भारत में LPG का स्टॉक सिर्फ एक महीने का बचा है जबकि मांग 17-18 करोड़ सिलेंडर प्रतिमाह है।

1 day ago

ओम बिरला की निष्पक्षता पर सवाल: पंकज शर्मा

बिरला से पहले रहे 16 लोकसभा अध्यक्षों में से किसी एक के बारे में भी ऐसी रंग बदलती भूमिका की चर्चा कम ही सुनने को मिली। बिरला आठवें गैर-कांग्रेसी स्पीकर हैं।

1 day ago

स्वाधीनता काल में हिंदी के विरुद्ध राजनीति: अनंत विजय

आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने अपने कालखंड में हिंदी के विरुद्ध मुस्लिम नेताओं के बयानों को जिहाद बताया था। स्वाधीनता पूर्व हिंदी को दुर्बल करने के लिए मुसलमानों ने राजनीति की।

1 day ago

ऊर्जा संकट पर राहुल की बॉक्सिंग और मोदी का सूर्य नमस्कार: आलोक मेहता

राहुल गांधी करीब 22 वर्षों से सांसद हैं जिनमें 10 वर्ष उनकी यानी कांग्रेस नेतृत्व वाली सरकार थी। उन्होंने तबसे अब तक कितनी बार ऊर्जा की नीतियों, कार्यक्रमों पर संसद के अंदर या बाहर बोला?

1 day ago


बड़ी खबरें

‘S4M 40 अंडर 40’: प्रतिष्ठित जूरी ने प्रतिभागियों का किया आकलन

एक्सचेंज4मीडिया समूह की हिंदी वेबसाइट 'समाचार4मीडिया' द्वारा आयोजित ‘समाचार4मीडिया 40 अंडर 40’ के चौथे संस्करण के लिए 14 मार्च 2026 को जूरी मीट का आयोजन किया गया।

4 hours ago

कांग्रेस के मानहानि मामले में दिल्ली हाई कोर्ट ने अर्नब गोस्वामी को भेजा समन

दिल्ली हाई कोर्ट ने कांग्रेस पार्टी की ओर से दायर मानहानि मामले में रिपब्लिक टीवी के एडिटर अर्नब गोस्वामी को समन जारी किया है।

1 hour ago

एम्प्लॉयीज को प्रोत्साहित करने के लिए दैनिक भास्कर ग्रुप ने उठाया ये कदम

दैनिक भास्कर के स्वामित्व वाली कंपनी डीबी कॉर्प लिमिटेड ने अपने एम्प्लॉयीज को बड़ा फायदा देते हुए ESOP स्कीम के तहत नए शेयर जारी किए हैं।

5 hours ago

‘जी मीडिया’ में 2C Lead और नेशनल एडिटर गौरव राज गुप्ता ने दिया इस्तीफा

गौरव राज गुप्ता यहां करीब दो साल से कार्यरत थे। हालांकि, इस इस्तीफे के संबंध में फिलहाल कंपनी की ओर से कोई आधिकारिक घोषणा सामने नहीं आई है।

4 hours ago

इस मामले को लेकर 'डिश टीवी' पर NSE व BSE ने लगाया 9.2 लाख रुपये का जुर्माना

डिश टीवी इंडिया लिमिटेड को स्टॉक एक्सचेंज के नियमों का पालन न करने के चलते जुर्माना भरना पड़ा है।

5 hours ago