क्या होती है संपादक की जिम्मेदारियां, कैसा होना चाहिए संपादक, हो इसका अब विश्लेषण

पहले जो संपादक होते थे, वे एक अच्छे शिक्षक भी होते थे। वे अपने संवाददाताओं को और डेस्क के लोगों को सिखाते रहते थे

संतोष भारतीय by संतोष भारतीय
Published - Wednesday, 31 July, 2019
Last Modified:
Wednesday, 31 July, 2019
Santosh Bhartiya

संतोष भारतीय, वरिष्ठ पत्रकार।।

पहले जो संपादक होते थे, वे एक अच्छे शिक्षक भी होते थे। अपने संवाददाताओं को और डेस्क के लोगों को सिखाते रहते थे। कुछ मीडिया संस्थानों को छोड़ दें, तो बाकी का हाल बहुत ही मजेदार है। वहां पत्रकारिता के छात्रों को नहीं पता होता कि रिपोर्ट, स्टोरी, न्यूज ब्रेक और स्कूप में कोई फर्क है भी या नहीं।। आजकल तो अक्सर देखते हैं कई टेलिविजन न्यूज चैनल एक साथ सुबह से शाम तक ब्रेकिंग न्यूज लिखकर खबर चलाते रहते हैं। इन शब्दों का अर्थ आज के ‘महान संपादकों’ ने समाप्त कर दिया है।

रिपोर्ट, स्टोरी, न्यूज ब्रेक और स्कूप का अर्थ संपादक को तो कम से कम पता होना चाहिए। शायद बहुतों को पता होता भी होगा, पर वे इसे याद नहीं रखते और न इसका इस्तेमाल करते हैं। रिपोर्ट वह होती है, जिसे सभी करते हैं और अक्सर एक ही तरह से करते हैं। घटना घट जाती है और सभी संवाददाता उसे कवर करते हैं, इसमें भाषा के बदलाव के अलावा कुछ अलग नहीं होता।

स्टोरी वह होती है, जिसे दबाने की कोशिश की जाती है, लेकिन संवाददाता खोज कर दबाए जाने वाले विषय को ऊपर ले आता है। प्रशासन, राजनेता आदि दबाने वाले तत्व होते हैं, पर संपादक का यह कर्तव्य होता है कि वह उसे दबने न दे। और यही दबी हुई चीज स्टोरी होती है। अक्सर रिपोर्ट और स्टोरी को एक समझने की गलती हो जाती है, जो नहीं होनी चाहिए।

न्यूज ब्रेक वह है, जो घटना घटने के बाद सबसे पहले पाठकों या दर्शकों तक पहुंचाई जाए। आजकल देखा गया है कि एक ही घटना को कई चैनल एक साथ ब्रेकिंग न्यूज के रूप में दिखाते हैं और दिखाते ही चले जाते हैं। जो सबसे पहले दिखाए, उसे ही न्यूज ब्रेक कहने का अधिकार है, बाकी को नहीं। यही समय के खिलाफ दौड़ ( रेस अगेंस्ट टाइम) है।

चौथा शब्द स्कूप है, यह आजकल गायब हो गया है। स्कूप उसे कहते हैं जो केवल एक संपादक की टीम के पास होता है, जिसे वह छापता या दिखाता है। बाकी लोग उसका फॉलो अप करते हैं। लेकिन आजकल फॉलोअप की परंपरा समाप्त हो गई है और स्कूप दिखाने वाले लोग भी स्वयं स्टोरी का फॉलोअप नहीं करते। स्कूप किसी भी तरह का हो सकता है, पर होता वह चौंकाने वाला है।

संपादक का न्यूजसेंस भी संवाददाता को प्रेरित कर सकता है, पर स्कूप के लिए आवश्यक है कि संपादक सावधान रहे, अन्यथा खंडन आने की स्थिति में उसकी साख को धक्का लग सकता है। अब यह बहुत महत्वपूर्ण शायद नहीं रह गया है, क्योंकि समाचार चैनलों में भूल सुधार की या गलती की माफी मांगने की परंपरा समाप्त हो गई है। बहुत सारे चैनल धड़ल्ले से गलत खबर दिखाते हैं और उसके ऊपर उन्हें कोई संकोच भी नहीं होता।

पहले संपादक इस बात के लिए हमेशा सावधान रहते थे कि कहीं उनके अखबार, पत्रिका या चैनल का इस्तेमाल कोई निहित स्वार्थ तो नहीं कर रहा है? कोई स्टोरी या रिपोर्ट प्लांट तू नहीं करा रहा? असावधानीवश कभी-कभी ऐसा हो जाए तो उसकी पूरी जिम्मेदारी संपादक की होनी चाहिए। खबरों के संसार में रहने वालों को अक्सर इस बात का ध्यान नहीं रहता कि किसी के बारे में गलत छप जाने से उस व्यक्ति का सामाजिक अपमान हो जाता है और उसकी प्रतिष्ठा पर चोट आती है, जो बाद में खंडन के छपने के बाद भी नहीं आती। संपादक का कर्तव्य है कि ऐसी रिपोर्ट, जिसमें व्यक्तिगत आरोप हों, उसकी छानबीन के लिए संवाददाता से अवश्य कह दे। सही बात रुकनी नहीं चाहिए और गलत बात जानी नहीं चाहिए। यह संपादक का एसिड टेस्ट है। मैं इसे एसिड टेस्ट इसलिए कह रहा हूं, क्योंकि हो सकता है संवाददाता गफलत में इसे भूल जाए पर अगर संपादक भी भूल जाए तो यह बहुत बड़ा अन्याय होगा।

संवाददाता रिपोर्ट भेजता है, पर हो सकता है वह रिपोर्ट बिल्कुल सपाट हो, उस रिपोर्ट को एंगल देना संपादक का काम है। रिपोर्ट को चुनते वक्त तथा उसे एंगल देते वक्त संपादक को देखना चाहिए कि रिपोर्ट का मानवीय पक्ष कहीं छूट तो नहीं रहा है है। उसे यह भी देखना चाहिए जो रिपोर्ट की जा रही है, उसके पीछे कोई उद्देश्य तो नहीं है? अच्छे संपादक का बुनियादी कर्तव्य है कि किसी व्यक्ति विशेष को दुख पहुंचाने के लिए किसी या किसी समुदाय की प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचाने के लिए खबर न जाने दे। इसका पूरा ध्यान रखें कि यह किसी हालत में न हो।

अच्छे संपादक या ऊर्जावान संपादक को स्वयं में भी स्पष्ट होना पड़ता है। उसे अपनी स्वयं की महत्वाकांक्षा स्पष्ट रूप से पहचाननी चाहिए। क्या वह सचमुच अच्छा या बड़ा संपादक बनना चाहता है या उसके अवचेतन मन में कुछ और चल रहा है। यदि वह अपने मन का विश्लेषण नहीं करता तो हमेशा भ्रमित रहेगा। एक तरह के लोग होते हैं जो समाज और राजनीति को केवल प्रभावित करना चाहते हैं। ऐसे लोग हमेशा पत्रकारिता से जुड़े रहते हैं। कुछ ऐसे होते हैं जो पत्रकारिता का सहारा लेकर राजनीति में हिस्सा लेने की आकांक्षा पाले रहते हैं। तीसरे ऐसे होते हैं जिनका लक्ष्य ही राज्यसभा होता है। ऐसे लोग ज्यादा खतरनाक होते हैं। क्योंकि यह समाचारों को एक विशेष विचारधारा के चश्मे से देखने लगते हैं। चाहे लेख लिखें, चाहे समाचार को एंगल दें या फिर चैनल पर खबर पढ़ें अथवा किसी का साक्षात्कार लें, यह सब विशेष उद्देश्य के लिए ही होता है। जब यह राज्यसभा में पहुंचते हैं, तभी वे अपने असली रूप में होते हैं और तब पता चलता है कि इनकी सारी पत्रकारिता एक दल विशेष की विचारधारा का प्रोपेगेंडा भर थी।

ऐसे लोगों की प्राथमिकता पत्रकारिता नहीं होती। अच्छे संपादक की प्राथमिकता पत्रकारिता ही होनी चाहिए, क्योंकि सच का चेहरा बदलने की कोशिश करना पत्रकारिता के पेशे के साथ विश्वासघात करना है। सच के पक्ष में खड़े रहने का अधिकार किसी भी संपादक को है, चाहे वह किसी जिले से निकलने वाला अखबार हो या राजधानी से निकलने वाला अखबार हो। सच के कई पक्ष नहीं होते, सच का केवल एक पक्ष होता है और वह खुद सच है। सच के पक्ष में खड़ी पत्रकारिता ही संपादक की पहली प्राथमिकता होनी चाहिए।

संपादक के ऊपर ही निर्भर करता है कि वह अपने अखबार, पत्रिका या चैनल की कितनी साख बनाता है। साख बनाने की क्षमता उसकी परीक्षा है। यदि उसकी टीम द्वारा लाई गई रिपोर्ट का खंडन अक्सर हो, तो साख बन ही नहीं सकती। संपादक को हमेशा ध्यान रखना चाहिए कि यदि किसी क्षेत्र के बारे में गलत रिपोर्ट आती है तो भले ही दूसरे क्षेत्र के लोग सच्चाई न जानें, पर जिस क्षेत्र की रिपोर्ट छपी है, वहां तो साख पर सवालिया निशान लग जाता है। साख बनाना और बनी साख  की रक्षा करना संपादक का बुनियादी दायित्व है।

संपादक और मैनेजर का फर्क स्वयं संपादक नाम की संस्था के लिए आवश्यक है। संपादक मैनेजर के रूप में तब्दील न हो जाए, इसके लिए संपादक को ही सचेत रहना होगा। संपादक यदि अपनी टीम की केवल सुख सुविधा का ध्यान रखे तो उसे मैनेजर के रूप में बदलने में ज्यादा देर नहीं लगती पर यदि वह अपनी टीम का नेतृत्व करे, तभी वह संपादक के नाते इज्जत पा सकेगा। दरअसल, आज बाजार के युग में अच्छी पैकेजिंग वाले संपादक ज्यादा नजर आ रहे हैं जो कि अपने संगठन को संपादकीय नेतृत्व कम, बल्कि बाजार को समझने वाले व्यक्ति के रूप में ज्यादा पेश कर रहे हैं। इसलिए जब चैनल, अखबार या पत्रिका में जब संपादकीय विषय वस्तु में प्रतिस्पर्धा करनी पड़ती है, तब परेशानी आ जाती है। बाजार को समझना एक चीज है और बाजार का ही संपादक बनाना बिलकुल दूसरी। संपादक का काम अलग है और मैनेजर का अलग। यह अलग ही रहे, तभी पत्रकारिता अपने मूल रूप में लोगों की सेवा कर सकती है।

संपादक का किरदार प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक में एक ही है। उसके गुण भी एक ही हैं, लेकिन इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में एक नई चुनौती आ गई है। यहां सारी खबरें बाइट बेस हो गई हैं। टीवी पर किसी खबर का शुरुआत और अंत का ही पता नहीं चलता। यहां संपादक का सबसे बड़ा काम अधूरी बाइट बेस स्टोरी कर दर्शक को अधर में छोड़ना नहीं है। न्यूज चैनल में कुछ का हाल तो यह है कि अपनी ही रिपोर्ट को कुछ घंटों बाद ही बदल देते हैं और गैर जिम्मेदारी की हद यह है कि दर्शक को यह नहीं बताते दोनों में सच कौन है।

हमारे देश में न्यूज चैनलों की बाढ़ आ गई है। उसने संपादकों की नई सेना तो खड़ी कर दी, जिन्होंने ग्लैमर तो अपनाया पर जिम्मेदारी नहीं समझी। एक ने कभी तो दूसरे ने कभी, गलती अवश्य की। अगर संपादक अपनी जिम्मेदारी समझे तो यह स्थिति सुधर सकती है। केवल एक बात संपादक की समझ में आनी आवश्यक है, उसक पहला कर्तव्य जनता या दर्शक के प्रति है, इसलिए उससे कोई भी बेईमानी नहीं होनी चाहिए।

संपादक को दूसरों को भी श्रेय देने की उदारता अपने अंदर पैदा करनी चाहिए। अगर वह अपनी टीम के सदस्यों को उनके द्वारा की गई मेहनत का श्रेय देता है तो इससे न केवल उसका बड़प्पन जाहिर होता है, बल्कि वह अपनी टीम को और ज्यादा मेहनत से काम करने का वातावरण भी देता है। संपादक जितना ज्यादा श्रेय दूसरों को देगा, उसे उतना ही ज्यादा सम्मान मिलेगा। संपादक अपनी टीम का कप्तान होता है। संपादक अगर हट जाए तो अखबार, पत्रिका या चैनल की हालत पर फर्क पड़ता है। एक सोच यह है कि संपादक अगर टीम को सही रूप में खड़ा करे तो उसके हटने से बहुत फर्क नहीं पड़ता। संस्थान वैसे ही चलता रहता है लेकिन देखने में ऐसा नहीं आता।

संपादक के स्थान पर बैठा व्यक्ति केवल एक आदमी के नाते काम नहीं करता, बल्कि वह कल्पनाशील संस्था की तरह काम करता है। संपादक के हटने के कई उदाहरण हैं। सुरेंद्र प्रताप सिंह के रहते 'रविवार' निकलता था, उनके जाने के बाद भी निकला।  ज्यादातर लोग वही थे, पर रविवार की धार बदल गई। ठीक यही जब 'संडे' से एमजे अकबर चले गए, तब हुआ। अकबर के जाने के बाद संडे के सर्कुलेशन की कभी बात हुई ही नहीं,  उसकी क्रेडिबिलिटी की ही बात हुई। 'आजतक' इसका दूसरा उदाहरण है, जहां सुरेंद्र जी के रहते हिंदी ने पहली बार टीवी जर्नलिज्म में इतिहास बना दिया। पर सुरेंद्र जी के जाने के बाद आज तक उनकी बनाई संपादकीय नीति पर चलता रहा। उसे विज्ञापनों के जरिए अपनी संपादकीय महत्ता दिखाने की नहीं पड़ी, लगभग हर अखबार में ऐसे उदाहरण मिल जाएंगे। विनोद मेहता के समय का 'संडे ऑब्जर्वर' आज भी लोगों के मानस पर है तथा 'आउटलुक' विनोद मेहता की वजह से ही पाठकों के बीच इतना लोकप्रिय हो पाया।। अरुण शौरी के समय का 'इंडियन एक्सप्रेस' आज भी याद किया जाता है।

दूसरा संपादक जब आता है, तब वह अपनी छाप डालता है। वह पहले से अच्छी या बुरी हो सकती है पर वैसी कभी नहीं होती। संपादक हटे और वहां संस्थान अपना नियंत्रण कायम रखने के लिए अपना आदमी बैठा ले तो यह संस्थान के लिए भी बुरा होता है और पत्रकारिता के लिए भी। अक्सर प्रबंधन को डर लगने लगता है कि संपादक की छवि यदि प्रबंधन से बड़ी हो जाएगी तो अच्छा नहीं रहेगा। यहीं प्रबंधन बहुत बड़ी गलती कर बैठता है। संपादक जहां संपादकीय टीम का नेता होता है, वहीं वह बाजार में प्रबंधन का चेहरा भी होता है। अच्छे संपादक के साथ काम करने के लिए अच्छे पत्रकार हमेशा तैयार रहते हैं जो सामान्य संपादक के आते ही इतना काम नहीं करते। आज के सभी न्यूज चैनल इसके अलग-अलग उदाहरण है। प्रबंधन इस सलाह को कितना मानेगा, पता नहीं पर वह अच्छे संपादकों को लाए और उन्हें अपमानित या नियंत्रित करने की जगह काम करने का स्वतंत्र मौका दे तो इससे जितना पत्रकारिता का फायदा होगा, उतना ही प्रबंधन का।

मैं यह सारी बातें इस आशा से लिख रहा हूं कि कम से कम प्रतिक्रिया मिले और विश्लेषण भी हो, तथा आज के संपादक कसौटी पर कसे भी जाएं। अगर यह सारी बातें गलत हैं तो अब संपादक को कैसा होना चाहिए, इसकी भी परिभाषा बनाई जाए। क्या संपादक नाम की संस्था के ऊपर कोई परिभाषा सार्थक हो सकती है?

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मिस्टर मीडिया: दंड तो यही बनता था, लेकिन क्या ये 'एनकाउंटर' है?

जब न्याय विलंब से मिलता है या चांदी के सिक्कों में खरीदा-बेचा जाता है तो समाज सड़कों पर अपने तरीके से मुजरिम को सजा देता है

राजेश बादल by राजेश बादल
Published - Friday, 06 December, 2019
Last Modified:
Friday, 06 December, 2019
Rajesh Badal

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार।।

हैदराबाद की डॉक्टर बेटी के साथ जो कुछ हुआ, वह हमें शर्मसार करता है। हमारे अनपढ़ पूर्वजों के भी अपने कुछ संस्कार थे, मगर जैसे-जैसे हम सभ्य होते जा रहे हैं, वैसे-वैसे कुछ अधिक क्रूर,जंगली,वहशी और उन्मादी नहीं हो रहे हैं? संयुक्त परिवार के बिखराव का दर्द लिए हम रेडियो और टीवी पर विज्ञापनों में अपनी बेटियों को समझाइश देते हैं  कि घर में करीबी पुरुष संबंधियों से बचो। उनके गुड टच और बैड टच में फर्क करना सीखो। यह कैसा समाज हम बना रहे हैं। हैदराबाद की नृशंस घटना इसका उदाहरण है।

अव्वल तो यह घटना ही हमारे माथे पर कलंक है। पुलिस ने अपराधियों को टपका दिया। पीड़ित परिवार और हम सबने कलेजे में ठंडक महसूस की। काश! हमारी अदालतें इतनी जल्दी न्याय करने लग जाएं। जब न्याय विलंब से मिलता है या चांदी के सिक्कों में खरीदा या बेचा जाता है तो समाज सड़कों पर अपने तरीके से मुजरिम को सजा देता है ।

एक मीडियाकर्मी होने के नाते जहां अपराधियों के साथ इस सुलूक पर संतोष हो रहा है तो दूसरी तरफ कुछ गंभीर सवाल भी खड़े होते हैं। मीडिया में हम इसे मुठभेड़ कह रहे हैं। तकनीकी तौर पर यह मुठभेड़ कैसे है? भले ही वे मुजरिम थे, लेकिन दोष सिद्ध होने तक वे आरोपित थे। तो आरोपितों को रात तीन बजे चोरों की तरह पुलिस वारदात स्थल पर क्यों ले गई?

जाहिर है कि वे पुलिस हिरासत में थे तो हथकड़ी लगी थी। नाट्य रूपांतरण के लिए हथकड़ी खोली गई होंगी। यानी वे निहत्थे थे। मुठभेड़ तो तब होती है, जब दोनों ओर से गोलीबारी हो। अपराधी भी पुलिस पर फायरिंग कर रहे हों। निहत्थे आरोपित भाग भी रहे थे तो उन पर गोलीचालन मुठभेड़ नहीं कहा जाता। दूसरी बात, कानूनन भागते मुजरिमों पर सबसे पहले गोली पैरों पर मारी जाती है, ताकि वे भाग न सकें और पकड़ लिए जाएं। उनकी जान लेने का इरादा या अधिकार पुलिस को नहीं होता। यह कैसा अचूक निशाना था कि चारों मारे गए। कोई गंभीर रूप से घायल भी नहीं हुआ।

स्पष्ट है कि पुलिस, प्रशासन और सरकार पर इस शर्मनाक घटना का इतना सामाजिक दबाव था कि इस मामले में समूची पटकथा कानून के नजरिये से लचर ढंग से लिखी गई। जनभावना के मुताबिक काम करना एक बात है और कानून हाथ में लेना दूसरी बात। क्या अदालतों और भारतीय दण्ड संहिता का इस मामले में मखौल नहीं उड़ाया गया? अपनी भावनाएं परदे पर या अखबार के पन्नों पर प्रकट करने से पहले हमें वैधानिक स्वरूप का भी अध्ययन करना चाहिए मिस्टर मीडिया!

(यह लेखक के निजी विचार हैं।)

वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल की 'मिस्टर मीडिया' सीरीज के अन्य कॉलम्स आप नीचे दी गई हेडलाइन्स पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं-

मिस्टर मीडिया: इसलिए उचित और जायज है मीडिया ट्रायल

मिस्टर मीडिया: महाराष्ट्र में क्यों चूके मीडिया के महारथी?

स्टर मीडिया: आर्थिक मंदी के दौर में मीडिया कवरेज के लिए निकला है यह अनोखा ‘फॉर्मूला’

मिस्टर मीडिया: अगर इस तरह की खबरें सच हैं तो यह शुभ संकेत नहीं है

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वरिष्ठ पत्रकार वेद प्रताप वैदिक की नजर से: चीनी मुसलमानों का बुरा हाल

यहां के मुसलमानों पर हो रहे अत्याचारों पर भारत, पाकिस्तान और रूस की भी बोलती बंद है, सिर्फ अमेरिका बोलता रहता है

डॉ. वेद प्रताप वैदिक by डॉ. वेद प्रताप वैदिक
Published - Friday, 29 November, 2019
Last Modified:
Friday, 29 November, 2019
DR Ved Pratap

डॉ. वेदप्रताप वैदिक, वरिष्ठ पत्रकार।।

चीन के सिंक्यांग (शिन्च्यांग) नामक प्रांत में जो लोग रहते हैं, उनका नाम उइगर है। ये लोग मुसलमान हैं। वहां चीन की हान जाति के लोग पहले बहुत कम थे, लेकिन अब लगभग ढाई करोड़ की आबादी में वे डेढ़ करोड़ हैं। अपने ही प्रांत में उइगर मुसलमान लगभग एक करोड़ ही रह गए हैं। ये मुसलमान न तो वहां खुलेआम नमाज पढ़ सकते हैं, न मस्जिद में भीड़ लगा सकते हैं, न रमजान में रोजा रख सकते हैं, न सलवार-कमीज और तुर्की टोपी पहन सकते हैं और न ही दाढ़ी रख सकते हैं। बुर्के पर रोक है। देखने में ये चीनियों जैसे भी नहीं लगते हैं। ये लोग तुर्की और मध्य एशिया के मुसलमानों की तरह दिखते हैं। इनकी भाषा भी चीनी नहीं है। वह तुर्की और फारसी जैसी है। सिंक्यांग में कई लोग मुझसे फारसी में बात किया करते थे। मेरी चीनी अनुवादिका भौचक रह जाती थी।

मैं जब करीब 25 साल पहले सिंक्यांग के कुछ शहरों और गांवों में गया तो मुझे देखने और मिलने के लिए उइगरों की भीड़ लग जाती थी, क्योंकि चीनी सरकार विदेशियों को सिंक्यांग नहीं जाने देती थी। आजकल तो विदेशियों के लिए सख्त प्रतिबंध लगा हुआ है। यों भी सौ-सवा सौ साल पहले तक सिंक्यांग चीन का हिस्सा नहीं था। अब भी चीन अपने इस सबसे बड़े प्रांत को स्वायत्त-क्षेत्र कहता है। इस स्वायत्त-क्षेत्र की हालत किसी गुलाम देश भी बदतर है। यह इलाका चीन के एकदम पश्चिम में है। इसकी सीमाएं आठ देशों को छूती हैं, जिनमें भारत, पाकिस्तान और रूस भी हैं। लेकिन इन तीनों देशों की भी बोलती बंद है। ये उइगरों पर हो रहे अत्याचारों पर आंख मींचे रहते हैं। सिर्फ अमेरिका बोलता रहता है।

इस समय लगभग दस लाख उइगर ‘शिक्षा-शिविरों’ में बंद हैं। उन्हें सभ्य बनाया जा रहा है। उन्हें मंडारिन भाषा सिखाई जा रही है। उन्हें मार-मारकर अपने रीति-रिवाजों से छुटकारा पाना सिखाया जा रहा है। उन्हें शारीरिक काम-धंधों का प्रशिक्षण दिया जा रहा है, चाहे वे डॉक्टर, इंजीनियर या प्रोफेसर ही क्यों न हों? चीनी सरकार का कहना है कि वे अपनी उइगर जनता को देशभक्ति का पाठ पढ़ा रहे हैं। उन्हें सभ्य और उन्नत नागरिक बना रहे हैं। उन्हें आतंकवाद से दूर रहना सिखा रहे हैं। चीनी सरकार ऐसा सब कुछ पांच-दस साल में इसलिए करने लगी है कि 2009 में एक दंगे के दौरान उइगरों ने 200 चीनियों की हत्या कर दी थी। 2014 में जब राष्ट्रपति शी चिन फिंग उरुमची गए थे, उइगरों ने एक रेलवे स्टेशन पर बम लगा दिया था।

इस तरह की दर्जनों छोटी-मोटी घटनाएं अक्सर होती रहती हैं। मुझे 15-20 साल पहले एक बौद्धिक संवाद के दौरान पेइचिंग और शंघाई के कई चीनी नेताओं ने उइगर उग्रवादियों के बारे में काफी विस्तार से सावधान किया था। उन्हें शंका थी कि उनके चीनी उइगर मुसलमान, अफगान, तालिबान और पाकिस्तान के मुजाहिद्दीन से भी जुड़े हुए हैं। जहां तक भारत, पाक और अफगानिस्तान का सवाल है, इन देशों के अल्पसंख्यकों का हाल चीनी अल्पसंख्यकों के मुकाबले बहुत ज्यादा अच्छा है।

(यह लेखक के निजी विचार हैं।)

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‘विश्वविद्यालयों में एक्टिविज्म को लेकर हमें समझनी होगी ये अहम बात’

प्रधानमंत्री नरेंद्र भाई मोदी का यह मंत्र देश के राजनेताओं के साथ-साथ हर सियासतदान को ध्यान में रखना होगा। यही मंत्र देश की उन्नति का पहिया होगा

डॉ. सिराज कुरैशी by डॉ. सिराज कुरैशी
Published - Wednesday, 27 November, 2019
Last Modified:
Wednesday, 27 November, 2019
Dr. Siraj Qureshi

डॉ. सिराज कुरैशी, वरिष्ठ पत्रकार।।

आगरा के अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के राष्ट्रीय अधिवेशन में आए उत्तर प्रदेश के उप मुख्यमंत्री डॉ. दिनेश शर्मा ने बीएचयू में होने वाले आंदोलन पर कटाक्ष करते हुए स्पष्ट शब्दों में कहा कि भाषा को जाति-वर्ग से दूर रखते हुये समझा जाये कि विश्वविद्यालय-कॉलेज और स्कूल ही राष्ट्रीय निर्माण की प्रयोगशाला होते हैं। इन संस्थानों में भाषा और जाति-वर्ग को लेकर जो विद्यार्थी आंदोलन करते हैं, उन्हें यह समझना चाहिये।

इसी तरह की बात एक सीनियर सिटीजन ने छात्रों से कही। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय का तात्पर्य केवल एक निश्चित भूभाग में स्थित किसी भौतिक अवसंरचना से नहीं होता और न ही हम इसका मूल्यांकन वहां मिलने वाली आर्थिक सुविधाओं से कर सकते हैं, जैसा कि वर्तमान में दिखाई देता है। यह सौ प्रतिशत सच है कि जब किसी विश्वविद्यालय में सस्ती शिक्षा की वकालत की जाती है तो उसका अर्थ किसी चैरिटी को संचालित करना नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण की परियोजना के सबसे महत्वपूर्ण उपकरण को धार देने के समान कहा जा सकता है। अगर बीएचयू या एएमयू की गतिविधियों पर विशेष गौर किया जाये तो यह इस तरह के शिक्षा संस्थान कहे जा सकते हैं, जहां पढ़ाई कम तथा ‘एक्टिविज्म’ पर अधिक ध्यान देते हैं। हमें ऐसे विश्वविद्यालयों की गतिविधियों को देखने के बाद समझना होगा कि जिसको हम ‘एक्टिविज्म’ कहकर उपहास उड़ाते हैं, वह दरअसल शिक्षा का ही रूप होता है, जो अपनी परिस्थितियों के विरुद्ध संघर्ष के रूप में व्यक्त होता है।

ऐसी परिस्थिति से अनुमान लगाया जाता है कि इस तरह की ‘एक्टिविज्म’ परिस्थितियां सुधार की वाहक न होकर कहीं पूर्व निर्धारित राजनीतिक विचारों की पुनरावृत्ति बनकर न रह जाएं। दिल्ली स्थित जेएनयू की गतिविधियों को उदाहरण के रूप में कहा जा सकता है। यह कहने में कतई संकोच नहीं है कि बीएचयू, एएमयू, जेएनयू आदि विश्वविद्यालयों को जो सुविधायें मिल रही हैं और उनके बदले मिलने वाले अनुदान का संतुलन बिगड़ा हुआ है। ऐसे विश्वविद्यालयों के उद्देश्यों का एक बार अवश्य स्मरण करना चाहिये।

एक समाजशास्त्री ने जब मुझसे कहा कि एक विश्वविद्यालय, चाहे वह कितना भी उपयोगितावादी क्यों न हो, यदि वह अपने आदर्श, मौलिक सच, सौंदर्य और मानव मस्तिष्क को सुसंस्कृत करने के लिये अपनी खोज को छोड़ देता है, तो उसे विश्वविद्यालय ही नहीं कहा जा सकता। अगर इसी को सरल रूप में कहें तो रोजगार उत्पन्न करना, विश्वविद्यालय नहीं रह जाता, जबकि व्यावहारिकता का निषेध नहीं बल्कि इसे परिष्कार के उदात्त स्तर पर ले जाना ही एक विश्वविद्यालय की विशेषता होनी चाहिये। इसी को कह सकते हैं कि हम विश्वविद्यालय कैम्पस को सिर्फ रोजगार की आस से ही नहीं देखें, बल्कि उसके सभ्यतागत विकास की शक्ति को भी चिन्हित करें।

यह भी पूरी तरह सच है कि हम किसी भी तर्क से एक गरीब देश में महंगी उच्च शिक्षा का पक्ष-पोषण नहीं कर सकते, वर्तमान शिक्षा ही वह सीढ़ी है, जिसके सहारे आसानी से ऊपर चढ़ा जा सकता है, इसलिये राज्यों की भी जिम्मेदारी है कि देश के गरीब एवं वंचित नागरिकों की पहुंच इस पीढ़ी तक सुनिश्चित कराएं। उच्च शिक्षा केवल मुट्ठी भर लोगों की जागीर नहीं है, बल्कि समावेशी विकास का एक टूल है, इसका स्वरूप बने रहना ही बेहतर होगा।

प्रधानमंत्री नरेंद्र भाई मोदी का यह मंत्र देश के राजनेताओं के साथ-साथ हर सियासतदान को ध्यान में रखना होगा कि ‘सबका साथ, सबका विश्वास और सबका विकास।‘  यही मंत्र देश की उन्नति का पहिया होगा। अगर व्यक्ति ने उच्च शिक्षा ग्रहण कर ली और अच्छी नौकरी भी पा ली, परन्तु मोदीजी का मंत्र दिमाग में नहीं रखा तो मेरा विश्वास है कि न ही वह व्यक्ति उन्नति नहीं कर सकता और न ही देश-प्रदेश एवं अपने जिले को आगे बढ़ा सकता है। यही वजह है कि स्वयं मेादीजी इस मंत्र को ही लेकर देश को विश्व पटल की प्रथम पंक्ति में ला रहे हैं।

(यह लेखक के निजी विचार हैं।)

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कार्टूनिस्ट सुधीर धर: दुनिया को ‘बदसूरत’ बनाने वाला इंसान

उनके निधन की इतनी बड़ी खबर को शायद हमारे इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने टीआरपी लायक नहीं समझा

समाचार4मीडिया ब्यूरो by समाचार4मीडिया ब्यूरो
Published - Wednesday, 27 November, 2019
Last Modified:
Wednesday, 27 November, 2019
Sudhir Dhar Irfan Khan

इरफान खान, मशहूर कार्टूनिस्ट।।

कार्टून जगत के सुपरस्टार सुधीर धर का दुनिया से विदा होना ऐसे समय हुआ, जब कार्टून जगत को मजबूती और संबल की सख्त जरूरत है। उनके निधन की इतनी बड़ी खबर को शायद हमारे इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने टीआरपी लायक नहीं समझा। सुधीर धर साहब से मेरी पहली मुलाकात 1989 में हुई थी। उन दिनों मेरी कार्टून प्रदर्शनी श्रीधरणी गैलरी में लगी थी, मुझे पता चला कि ‘हिन्दुस्तान टाइम्स’ के प्रख्यात कार्टूनिस्ट सुधीर धर रोजाना लंच करने त्रिवेणी में आते हैं। यह सुनकर मेरी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। अगले ही दिन मैंने उन्हें त्रिवेणी के गेट पर रोका। अपना परिचय दिया।

मैंने उनसे अपनी कार्टून प्रदर्शनी देखने का आग्रह किया, वह फौरन तैयार हो गए। सभी कार्टून देखकर मुझ कस्बाई कार्टूनिस्ट को प्रोत्साहन दिया। यह मेरे लिए तब बहुत बड़ी बात थी। बड़े-बड़ो का 'कार्टून' बनाने वाले वह देखने में बेहद खूबसूरत, ऊंची कद-काठी के कश्मीरी ब्राह्मण थे। मजाक-मजाक में कई बार हम दोस्त कह ही देते हैं कि खूबसूरत चेहरों को 'बदसूरत' बना देते हैं कार्टूनिस्ट। वे अंग्रेजी फर्राटे से बोलते थे। शायद अपने स्टारडम की वजह से ही उन्हें एक बार फेमिना मिस इंडिया की जूरी का मेंबर बनाया गया था, ऐसा सुना है। 

अपने साफ-सुथरे और फनी सोशल कार्टूनों से उन्होंने घर-घर में अपनी जगह बना ली थी। ‘हिन्दुस्तान टाइम्स’ उस समय दिल्ली का सबसे ज्यादा बिकने वाला अंग्रेजी अखबार था, वहां 20 साल उनका एकछत्र राज कायम रहा। उनकी कलम कई बार कार्टून के जरिए ऐसा तीखा प्रहार करती थी कि बड़े बड़े खूबसूरत चेहरे 'बदसूरत' नजर आने लगते थे भारत में जब भी कभी कार्टूनिस्टों का जिक्र होता था, तो लोग छूटते ही कहते थे कि ‘एक तो लक्ष्मण हैं और एक सुधीर धर  कार्टूनिस्ट हैं।’

सुधीर धर और लक्ष्मण में वही फर्क है, जो लता मंगेशकर और आशा भोसले में है। अगर आशा भी लता की तरह गाना गातीं तो शायद उन्हें वो मुकाम नहीं मिलता, जिसकी वो हकदार थीं। इसलिए उन्होंने गाने की अपनी एक अलग शैली ईजाद की। उसी तरह चूंकि राजनीतिक कार्टूनों में उस वक्त लक्ष्मण का बोलबाला था, उन्होंने अपने कार्टूनों का माध्यम सोशल खबरें चुना। यकीनन इसमें उनकी महारत थी। चाहे वह दिल्ली की बसों में अव्यवस्था हो, सड़कों के गड्ढे, बिजली-पानी की किल्लत हो अथवा अन्य समस्याएं।

ऐसे तमाम मुद्दे थे, जिनसे लोग आज भी रोजमर्रा तौर पर दो-चार होते हैं। वह रोजाना इन मुद्दों पर कार्टून बनाते थे। एक कार्टून जो मुझे हमेशा याद रहता है, एक ऑफिस में नेताजी के सामने कई अफसर खड़े हैं। नेताजी अपने सहायक से पूछते हैं, ‘क्या तुम्हें लगता है कि यह सब ‘फ्री एंड फेयर इलेक्शन’ करवा पाएंगे?’ सहायक बोला-जी, बिलकुल। नेताजी बोले, तो इन सबका तबादला कर दो।

मुझे एक बार उनका साक्षात्कार करने का मौका मिला, जिसमें उन्होंने बताया, ‘मैं मर्लिन मुनरो का बहुत बड़ा फैन हूं और शुरुआत में रेडियो में था। मैं अपनी आवाज के जरिये उन्हीं की तरह मशहूर होना चाहता था।‘

वह राजनैतिक डिस्प्ले (बड़े बॉक्स नुमा) कार्टून कम ही बनाते थे। उनके कार्टून के ऊपर कोने में खबर लिखना पाठक को कार्टून से जुड़ने में आसानी देता था। बाद में बहुत से कार्टूनिस्टों ने इस शैली को अपनाया।  उनकी स्केचिंग ऐसी थी कि कोई भी नया कार्टूनिस्ट उसे देखकर आसानी से कार्टून बनाना सीख सकता है। हाल ही में कई नामी कार्टूनिस्टों अबू, रंगा, लक्ष्मण, राजिंधरपुरी, सुधीर तैलंग के बाद अब सुधीर धर के भी जाने से कार्टून जगत में कार्टूनिस्टों की कमी का अहसास और गहरा हो गया है, जो कभी नहीं भर सकता।

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मिस्टर मीडिया: इसलिए उचित और जायज है मीडिया ट्रायल

सिर्फ अपने गाल बजाने के लिए अपने आप को हम चौथा स्तंभ कहते हैं, अन्यथा कोई भी संवैधानिक प्रावधान हमें चौथे खंभे के रूप में संरक्षण नहीं देता

राजेश बादल by राजेश बादल
Published - Wednesday, 27 November, 2019
Last Modified:
Wednesday, 27 November, 2019
Mister Media

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार।।

महाराष्ट्र का सियासी प्रहसन अभी जारी है। जितनी होड़ पक्ष और प्रतिपक्षी गठबंधनों में है, उससे अधिक टेलिविजन चैनलों में इस सप्ताह दिखाई दी। कुर्सी के लिए घमासान का एक केंद्र प्रदेश की राजधानी मुंबई, दूसरा देश की राजधानी दिल्ली, तीसरा भारत का सर्वोच्च न्याय मंदिर सुप्रीम कोर्ट और चौथा टीवी का परदा रहा। जितने तर्क, कुतर्क, वितर्क, नियम,कायदे,कानून सुप्रीम कोर्ट में पेश किए जा रहे थे, चैनलों में उससे ज्यादा ही परोसे जा रहे थे। यहां तक कि अनेक हलकों में कहा गया कि इतना मीडिया ट्रायल भी ठीक नहीं है। मीडिया अदालत नहीं है। इसलिए छोटे परदे पर हो रहे शास्त्रार्थ सर्वोच्च अदालत का ध्यान भटका सकते हैं।

देखा जाए तो एक नजरिये से बात ठीक लगती है। सिर्फ अपने गाल बजाने के लिए अपने आप को हम चौथा स्तंभ कहते हैं, अन्यथा कोई भी संवैधानिक प्रावधान हमें चौथे खंभे के रूप में संरक्षण नहीं देता। दूसरी ओर अगर कार्यपालिका और विधायिका की गाड़ी पटरी से उतर गई हो तो क्या मीडिया को हाथ पर हाथ धरे बैठे रहना चाहिए? हमारे राजनेता संवैधानिक और लोकतांत्रिक मर्यादाएं भूलकर सड़कों पर गैरजिम्मेदारी का प्रदर्शन करें तो माफ कीजिए, मीडिया को एक बार नहीं, सौ बार मीडिया ट्रायल का अधिकार है। आज की पत्रकारिता के विकृत चेहरे के बावजूद समाज का बड़ा वर्ग इस पेशे के प्रति अच्छी धारणा रखता है। इसलिए कम से कम मैं तो मीडिया ट्रायल को उचित और जायज मानता हूं। इससे सत्ता प्रतिष्ठान अथवा प्रतिपक्ष खफा हो तो सौ बार हो जाए। अपनी बला से। हम तो मीडिया ट्रायल करते रहेंगे। राजनेताओं को ध्यान रखना चाहिए कि वर्तमान में वे नायक नहीं खलनायक के तौर पर देखे जाने लगे हैं।

 लेकिन, मैं हमारे उन साथियों, पत्रकारों और एंकरों का कतई समर्थन नहीं करूंगा, जो बीते दिनों महाराष्ट्र के घटनाक्रम को लेकर अपने-अपने दिल की जबान से बोल रहे थे। वे एंकर कम पार्टी प्रवक्ता अधिक लग रहे थे। उनके इस विधवा विलाप का क्या अर्थ निकला? उनके कुतर्क से न किसी को बहुमत मिला और न किसी का छीना गया। फिर हमारे पत्रकार साथी अपनी दुर्गति अपने ही हाथों क्यों कर बैठते हैं। उन्हें समझना होगा कि जब वे अपने गढ़े गए तर्कों के साथ परदे पर बहस करते हैं तो माफ़ कीजिए,पत्रकार या एंकर कम, पार्टी के अभिभाषक अधिक लगते हैं। उन्हें यह भ्रम कतई नहीं होना चाहिए कि वे बैलगाड़ी के नीचे चल रहे हैं, इसलिए गाड़ी भी वही खींच रहे हैं। पत्रकारों के किसी दल के पक्ष या विपक्ष में बोलने से राजनीति की नाव उस दिशा में नहीं मुड़ जाती। यह भी सच है कि बहस का चरित्र निरपेक्ष और तटस्थ रखने के लिए उन्हें किसी डॉक्टर की पर्ची नहीं चाहिए। समझदार को इतना इशारा ही काफी है।

एक और अजीब-बेतुकी पत्रकारिता दो-चार दिनों में दिखी। दो-तीन समाचार चैनल ऐसे भी थे, जो महाराष्ट्र के इस शिखर घटनाक्रम के दिनों में भी उसके कवरेज से दर्शक को वंचित कर रहे थे। जब एक-एक मिनट दर्शक सांस साधे महाराष्ट्र के सियासी ड्रामे को देख रहा था, तो ये चैनल चीन की चाल, पाक की मिसाइल या ऐसा ही कोई रिकॉर्ड किया हुआ मनोरंजन का कार्यक्रम दिखा रहे थे। ऐसा एकाध घंटे नहीं, पूरे तीन-चार दिन करते रहे। मैं आगाह करना चाहता हूं कि प्रतिष्ठा कमाने में बरसों लग जाते हैं और एक भी गलत फैसला धड़ाम से नीचे पटक देता है। दूसरी बात यह कि न्यूज चैनल ऑन एयर होने के बाद किसी की निजी संपत्ति नहीं रह जाता। वह दर्शक का हो जाता है। ठीक वैसे ही, जैसे कोई अखबार छपने के बाद पाठकों का हो जाता है।

गनीमत है कि अच्छी सड़क, बिजली या पानी मांगने के लिए जिस तरह लोग सड़कों पर आ जाते हैं, उस तरह अखबारों और चैनलों से अच्छी खबरें मांगने के लिए सड़कों पर नहीं आते। जिस दिन उन्हें लगा कि पत्रकारिता के जरिये परोसी जा रही खबरें किसी सड़ी ब्रेड की तरह बदबूदार और पक्षपाती हैं, तो वे भी आपके खिलाफ आंदोलन पर उतर आएंगे। अपने उपभोक्ता अधिकार के लिए भी सड़कों पर लड़ने का उनका हक अभी जिंदा है मिस्टर मीडिया।

(यह लेखक के निजी विचार हैं।)

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‘राष्ट्रीय सहारा' की परीक्षा में सुप्रिय का असफल होना, उस युग की एक दस्तक थी’

सुप्रिय की उपलब्धियां जानने के लिए कोई सर्च इंजन तलाशने की जरूरत नहीं, बल्कि फिलवक्त ‘आजतक’ जो भी है, उसमें सुप्रिय की निष्ठा, ईमानदारी और कर्मठता है

समाचार4मीडिया ब्यूरो by समाचार4मीडिया ब्यूरो
Published - Monday, 25 November, 2019
Last Modified:
Monday, 25 November, 2019
Supriya-Prasad-Aajtak

संस्थान के संगियों में एक और नाम है सुप्रिय प्रसाद। जिंदगी में ऐसे बहुत कम मौके आते हैं, जब मेरी भाषा और शैली, मेरी सोच, संवेदना और सृजनशीलता के सामने जवाब देने लगती है। आज अपने संस्थान के इस संगी सुप्रिय प्रसाद के बारे में लिखते हुए सालों बाद मेरी शब्द सम्पदा और शैली खुद को कमजोर महसूस कर रही है। मतलब सुप्रिय की उपलब्धि मेरी सोच, शैली और शब्द से बहुत आगे है।

आज हम सोचने को जरूर मजबूर हैं कि कार्यशैली के किस गुर ने सुप्रिय को इतना सफल और नामवर बनाया। एक प्रसंग याद करता हूं कि 1995 में दैनिक 'राष्ट्रीय सहारा' के उप संपादक (प्रशिक्षु) पद की जांच परीक्षा में सुप्रिय का असफल होना हम सहपाठियों के लिए खबर थी। मगर वह उसकी असफलता नहीं थी और न ही योग्यता, बल्कि जो भी हुआ, वह उस युग की एक दस्तक थी, जो युग सुप्रिय के नाम लिखा जाना था।

यह विचित्र संयोग है कि झारखण्ड से आईं दो हस्तियां लोकमानस में अपना विशिष्ट स्थान बनाकर देश-दुनिया और समाज को अपनी सेवाएं दे रहे हैं। पहला-रांची के महेंद्र सिंह धोनी और दूसरा-दुमका शहर के सुप्रिय प्रसाद। आईआईएमसी से पत्रकारिता करने के बाद सुप्रिय प्रसाद ने कमर वहीद नकवी के अधीन एक ट्रेनी के तौर पर ‘आजतक’ जॉइन किया था। तब ‘आजतक’ एसपी सिंह के निर्देशन में ‘दूरदर्शन’ पर प्रसारित होने वाला एक बुलेटिन भर था। आज की तारीख में ‘टीवी टुडे’ ग्रुप के चारों चैनलों-‘आजतक’, ‘तेज’, ‘हेडलाइंस टुडे’ और ‘दिल्ली आजतक’ की जिम्‍मेदारी सुप्रिय के कंधों पर है। इसे कहते हैं सफलता।

करीब 25 साल पहले झारखंड के एक कस्बानुमा शहर दुमका के टीन बाजार से बतौर स्ट्रिंगर पत्रकारिता का अपना सफर शुरू करने वाले सुप्रिय आज हिंदी टीवी पत्रकारिता के उन चार संपादकों (आशुतोष, दीपक चौरसिया और अजीत अंजुम) में शुमार हैं, जिनके नाम से चैनल का रुतबा है। तभी तो टीवी की दुनिया में कहा जाता है कि सुपिय्र केवल टीआरपी मास्‍टर ही नहीं, बल्कि तकनीक के भी जानकार हैं। अपनी टीम से कैसे काम लिया जाता है, इसको भी वे भली-भांति जानते हैं। इससे आगे यह भी कहना ज्यादा मुनासिब होगा कि सुप्रिय की उपलब्धियां जानने के लिए कोई सर्च इंजन तलाशने की जरूरत नहीं, बल्कि फिलवक्त ‘आजतक’ जो भी है, उसमें सुप्रिय की निष्ठा, ईमानदारी और कर्मठता है। ‘आजतक’ का इतिहास सुप्रिय का इतिहास है।

जनसंचार संस्थान की एक घटना याद आती है। ‘दूरदर्शन’ के वरिष्ठ अधिकारी मयंक अग्रवाल आये थे-खोजी पत्रकारिता पढ़ाने और अभ्यास करवाने। विषय था ‘विमान खरीद सौदे में दलाली’। हमें उस दलाली का पर्दाफाश करना था। उस अभ्यास में जो टीम अव्वल रही, उसकी अगुआई सुप्रिय कर रहे थे।

सुप्रिय खबरों को जानने वाला और उनकी अहमियत समझने वाला इंसान है। इसी वजह से वह हिंदी टीवी पत्रकारिता का सबसे सफल और सिद्ध संपादक है। वह खबरों को जीवन मानता है, उनके लिए शिल्प सजाता है, जो शिल्प आपके जीवन का कोई हिस्सा है, अनदेखा हिस्सा। समय के साथ खबरें कैसे अपना रंग बदलती हैं, ढंग बदलती हैं और अपना तर्ज बदलती हैं, कोई सुप्रिय से पूछे। उसके लिए खबरों का ट्रीटमेंट पूजा है, इबादत है।

इसके बावजूद सुप्रिय की पत्रकारिता से जुडी कई ख्वाहिशें हैं, ढेरों मन्नतें हैं, जिन्हें वह पूरा करना चाहते हैं। हम मित्रों की दुआ है कि वे तमाम ख्वाहिशें सुप्रिय के कदम चूमें और मन्नतें उसका सिर चूमें।

(वरिष्ठ पत्रकार अमरेंद्र किशोर की फेसबुक वॉल से साभार)

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मिस्टर मीडिया: महाराष्ट्र में क्यों चूके मीडिया के महारथी?

राजनीति में किसी भी घटना के अनेक पहलू होते हैं। पत्रकार के रूप में काम करते हुए हर कदम पर इन पहलुओं का ध्यान रखना पड़ता है

राजेश बादल by राजेश बादल
Published - Saturday, 23 November, 2019
Last Modified:
Saturday, 23 November, 2019
Rajesh Badal

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार।।

महाराष्ट्र की राजनीति बारह घंटे में उलट गई। त्रिकोणीय गठबंधन को शरद पवार के भतीजे ने पटखनी दे दी। बीते एक सप्ताह से अजित पवार अपनी खिचड़ी पका रहे थे। उनके वाद्य यंत्रों से अलग सुर निकल रहे थे। लेकिन मीडिया के तमाम अवतार मंच पर होने वाले नाटक और उसके अभिनेताओं की भूमिका पर ही नज़र बनाए हुए थे। परदे के पीछे चल रहे घटनाक्रम की वे उपेक्षा करते रहे। आमतौर पर हर छोटी-बड़ी कवरेज में ड्रेस से लेकर बॉडी लैंग्वेज तक के बारीक तार निकालने वाले मीडिया महारथी इस बार कुछ भी नहीं भांप सके।

राजनीति में किसी भी घटना के अनेक पहलू होते हैं। पत्रकार के रूप में काम करते हुए हर कदम पर इन पहलुओं का ध्यान रखना पड़ता है। महाराष्ट्र के मामले में साफ कहा जा सकता है कि अखबार और टेलिविजन के संवाददाता चूक गए। सवाल यह खड़ा होता है कि पत्रकारिता में यह लड़खड़ाहट क्या एक दिन में आई है अथवा विश्लेषण या आकलन का अभ्यास धीरे-धीरे चटकता जा रहा है। यदि हां, तो इस चटकन का कारण क्या है?

इतने घंटे बीत जाने के बाद भी महाराष्ट्र के राजनीतिक ड्रामे की पटकथा के अनेक पन्ने मीडिया के मंचों पर फड़फड़ा रहे हैं, लेकिन उसमें लिखे संवाद किसी भी चैनल में अब तक नहीं आए हैं। रातों रात इस नाटकीय परिवर्तन के पीछे कुछ सवाल भी उभरते हैं। इन सारे प्रश्नों को अभी तक छोटे परदे पर स्थान नहीं मिला है। अजित पवार कुछ समय से अपने अलग रंग में थे। खोजी राजनीतिक पत्रकार इन रंगों को नहीं देख सके।

जब सरकार ही अस्तित्व में नहीं है  तो किसानों के नाम पर शरद पवार की करीब घंटे भर प्रधानमंत्री से गोपनीय बैठक का कोई और कारण क्यों नहीं हो सकता? इसे किसी ने नहीं पढ़ा। आमतौर पर बेहद आक्रामक और बयान युद्ध में बाजी मारने वाली भारतीय जनता पार्टी  ने चंद रोज से अप्रत्याशित खामोशी क्यों ओढ़ ली थी? क्या किसी ने इसकी पड़ताल करने की कोशिश की? यह भी कि शांति से चल रहे राष्ट्रपति शासन पर ऐसा क्या आपातकाल आ पड़ा कि राजभवन और राष्ट्रपति भवन को अपने प्रोटोकॉल व परंपरा से हटना पड़ा।

अंधेरी काली रात में किसी ने बहुमत का दावा किया। आधी रात को राज्यपाल को जगाकर उन्हें समर्थन देने वाले राजनेता मिलते हैं। राज्यपाल रात में ही राष्ट्रपति भवन को खबर देते हैं। तड़के ही राष्ट्रपति भवन का सचिवालय हरकत में आता है। राष्ट्रपति शासन हटा लिया जाता है। नोटिफिकेशन हो जाता है। नए मुख्यमंत्री की शपथ भी हो जाती है।

राजनीतिक शिष्टाचार का पालन नहीं करते हुए सन्नाटे में शपथ का यह अनूठा नमूना है। राजभवन इससे अपने आपको सवालों के घेरे में लाया है। मीडिया के कितने मंचों पर इस बारे में खुलकर चर्चा हुई? अजित पवार को तो त्रिकोणीय गठबंधन में भी उप मुख्यमंत्री पद मिलना था। उसके पीछे की कहानी क्या है? अभी भी एनसीपी के 54 विधायकों के हस्ताक्षर, देवेंद्र फडणवीस को बहुमत, उनकी संवैधानिक स्थिति और दलबदल कानून के अनेक पृष्ठों को पलटने की आवश्यकता है।   

दरअसल बीते एक दशक में पत्रकारिता धर्म निभाने में वैचारिक और संपादकीय पक्ष कमजोर पड़ता दिखाई दिया है। सिर्फ सूचना प्रधान पत्रकारिता ही अस्तित्व में रही है। मैनेजमेंट भी अपने रोल पर काम कर रहे पत्रकारों से यही चाहता रहा है कि वह जिस राजनीतिक दिशा में जा रहा है, वे सब उसका पालन करें। पत्रकारों और संपादकों की अपनी योग्यता तथा सियासी समीक्षा इससे अत्यंत दुर्बल होती गई। बीट पर काम कर रहे संवाददाता भी यह सोचकर खबर छोड़ देते हैं कि उनकी जानकारी को समाचारपत्र या समाचार चैनल में जगह नहीं मिलेगी।

इसका नुकसान यह हुआ कि जमीनी सूचनाओं, विश्लेषणों व निष्कर्षों के लिए दरवाज़ा बंद हो गया। दोनों ही स्थितियों में क्षति पत्रकारिता को हुई और राजनीति ने इसका फायदा उठाया। एक तरह से किसी राजनीतिक दल को कवर करने वाले पत्रकार के लिए उस पार्टी को पसंद आने वाली खबरों को परोसना ही कर्तव्य हो गया। उसे अपनी बीट वाले दल के भीतर चल रही उठापटक और खींचतान से आंखें मूंदना पड़ा। अपने इस गंभीर आंतरिक संकट को समझने का प्रयास कीजिए मिस्टर मीडिया!

(यह लेखक के निजी विचार हैं।)

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मिस्टर मीडिया: आर्थिक मंदी के दौर में मीडिया कवरेज के लिए निकला है यह अनोखा ‘फॉर्मूला’

मिस्टर मीडिया: अगर इस तरह की खबरें सच हैं तो यह शुभ संकेत नहीं है

मिस्टर मीडिया: किसी पत्रकार को कवरेज का ऐसा दिन देखने का मौका न मिले तो अच्छा

मिस्टर मीडिया: यह विचार की जालसाजी अथवा धोखाधड़ी नहीं तो और क्या है?

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'यह संपादक छपने से पहले अपने चपरासी को संपादकीय पढ़ाते थे'

पिछले 27 साल से मराठी दैनिक अखबार 'नवाकाल' के संपादक की जिम्मेदारी निभा रहे थे

समाचार4मीडिया ब्यूरो by समाचार4मीडिया ब्यूरो
Published - Friday, 22 November, 2019
Last Modified:
Friday, 22 November, 2019
Nilkanth Khadilkar

वरिष्ठ मराठी पत्रकार नीलकंठ खाडिलकर का शुक्रवार तड़के निधन हो गया। 85 वर्षीय खाडिलकर कुछ समय से बीमार थे। उन्होंने मुंबई के उपनगर बांद्रा स्थित एक निजी अस्पताल में आखिरी सांस ली। खाडिलकर पिछले 27 साल से मराठी दैनिक अखबार 'नवाकाल' के संपादक की जिम्मेदारी निभा रहे थे।   

खाडिलकर के निधन पर 'एनडीटीवी इंडिया' में कार्यरत पत्रकार सुनील सिंह ने उन्हें अपनी श्रध्दांजलि देते हुए लिखा है, 'नीलकंठ खाडिलकरजी से (जिनका आज देहांत हो गया) ‘नवाकाल’ के दफ्तर में एक-दो बार मिलने का मौका मिला था। अक्सर वह अपना संपादकीय लिखकर छपने से पहले अपने चपरासी मधु (मुझे यही नाम याद है) और आर्टिस्ट को पढ़ने के लिए देते थे, उनकी राय लेते थे। फिर छापते थे। ऐसा वह आम आदमी की रुचि जानने के लिए करते थे।'

सुनील सिंह के अनुसार, 'शायद यही वजह थी कि उन दिनों उनका संपादकीय आम जनमानस में बेहद लोकप्रिय था। सिर्फ संपादकीय के बल पर अखबार सर्कुलेशन में नंबर 1 पर था। इसलिए उन्हें अग्रलेख का बादशाह कहा जाता था। ऐसे अनोखे संपादक को शत-शत नमन। ईश्वर उनकी आत्मा को शांति दे।'

बता दें कि नीलकंठ खाडिलकर ने ‘प्रैक्टिकल सोशलिज्म: म्यूजिंग्स फ्रॉम ए टूर ऑफ रशिया’ समेत कुछ किताबें भी लिखीं हैं।

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मिस्टर मीडिया: आर्थिक मंदी के दौर में मीडिया कवरेज के लिए निकला है यह अनोखा ‘फॉर्मूला’

इसमें न किसी बदनामी का खतरा है और न इसे आप पीत पत्रकारिता कह सकते हैं। ऐसी स्थिति में पुरानी पीढ़ी के अनेक पत्रकारों में नई चिंता देखी गई है

राजेश बादल by राजेश बादल
Published - Friday, 15 November, 2019
Last Modified:
Friday, 15 November, 2019
Rajesh Badal

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार।।

इन दिनों मीडिया संस्थानों और मीडिया घरानों की ओर से इवेंट्स कराना आम होता जा रहा है। इसके संस्थान को दो लाभ हैं। वह खबर का उत्पादन करता है और धन भी कमाता है। आर्थिक मंदी के इस दौर में यह एक अनोखा फॉर्मूला निकला है। खबर की फसल पैदा करने का फायदा यह है कि वह उस संस्थान की अपनी संपत्ति होती है इसलिए एक्सक्लूसिव की मोहर लग जाती है। मीडिया समूह इवेंट के कंटेंट को कई दिन तक थोड़ा-बहुत फेरबदल करके पाठकों और दर्शकों तक पहुंचाता रहता है। नए-नए मुद्दे पक्ष और प्रतिपक्ष के राजनेताओं से सवालों के आधार पर उगते रहते हैं। चैनल समझते हैं कि इससे टीआरपी बढ़ती है।

इसके अलावा इवेंट को प्रायोजित करने वाले घरानों को धन देने के बदले में सामाजिक और राजनीतिक पहचान भी मिलती है। इसमें न किसी बदनामी का खतरा है और न इसे आप पीत पत्रकारिता कह सकते हैं। ऐसी स्थिति में पुरानी पीढ़ी के अनेक पत्रकारों में नई चिंता देखी गई है। बीते दिनों लगातार हो रहे मीडिया सेमिनारों में यह बात गंभीरता से उभरकर आई कि विज्ञापन के आवरण में समाचार का उत्पादन कितना जायज है?

मीडिया संस्थान जब ऐसा करते हैं तो वह एक तरह से विज्ञापन जैसी ही कोई श्रेणी होती है। विज्ञापन में अखबार/टेलिविजन चैनल/डिजिटल मीडिया संस्थानों का विज्ञापन के कंटेंट पर सीधा नियंत्रण नहीं होता, लेकिन उसका अपने इवेंट के कंटेंट पर पूरा नियंत्रण होता है। यानी इवेंट भी, विज्ञापन भी, विज्ञापन का कंटेंट भी और उसके बाद उससे निकली खबर पर भी सौ फीसदी एक्सक्लूसिव कंट्रोल। मीडिया संस्थान हेडलाइन भी बनाते हैं और राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय खबरों के समकक्ष अपने विज्ञापननुमा इवेंट से उपजी खबरें बिठाते हैं। सवाल यह है क्या यह अपने बैनर या ब्रैंड का अनुचित इस्तेमाल है?

यह भी एक पहलू है कि अगर यह सिलसिला जिला और तहसील स्तर तक फैल गया तो हर छोटा और मंझोला मीडिया संस्थान धन कमाने के लिए अपने-अपने आयोजन करेगा और अपनी अपनी सुर्खियां रचेगा तो देश की मिट्टी से निकलने वाली वास्तविक खबरें कहां जाएंगी और गढ़ी तथा पकाई गई खबरें क्या पाठकों तथा दर्शकों के साथ अन्याय नहीं होंगी? मेरे जेहन में यह प्रश्न भी है।

एक सेमिनार में सुझाव आया कि मीडिया संस्थान को अपने इवेंट या कॉन्क्लेव दिखाते समय या अखबार के पन्नों पर परोसते समय उसे एडवर्टोरियल या इंपेक्ट फीचर लिखना चाहिए। इससे कोई नैतिक सवाल नहीं पनपेगा और अपने-अपने खबर लोक रचने का अवसर भी नहीं मिलेगा।

मैं स्वीकार करता हूं कि आजकल मीडिया संस्थान अत्यंत आर्थिक दबाव में हैं। अब उनके लिए विज्ञापन का बाजार पहले की तरह नहीं खुला है, लेकिन एक इवेंट से चार महीने चैनल या अखबार का खर्च निकालना और उसकी खबर खपाना कितना ठीक है। इवेंट के सह आयोजक ढूंढ़ना, उनसे धन लेना फिर उन्हीं के आला अफसरों या मैनेजमेंट से जुड़े व्यक्तियों को सम्मान या अवार्ड देना और उनके समाचार दिखाना या प्रकाशित करना क्या दूध में पानी मिला देने की तरह नहीं  है।

प्रादेशिक अखबारों में भी इस तरह की प्रवृति शुरू हो गई है। बीते दिनों  ग्वालियर में विकास संवाद और आईटीएम विश्वविद्यालय में एक विशेषज्ञ ने इंदौर का उदाहरण दिया कि किसी कार्यक्रम के लिए यदि आयोजक एक ही अखबार में विज्ञापन देता है तो अन्य सारे समाचारपत्र उस कार्यक्रम की खबर का बहिष्कार कर देते हैं। शहर को पता ही नहीं चलता कि ऐसा कोई आयोजन भी शहर में हुआ है। यह कौन सी पत्रकारिता है मिस्टर मीडिया?

(यह लेखक के निजी विचार हैं।)

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‘बाहर पड़ी यह लाश वशिष्ठ बाबू की नहीं, सिस्टम की लाश है’

यकीन मानिए कि समाज में बहुत सारे आदर्श दोबारा जन्म लेंगे, लेकिन वशिष्ठ बाबू जैसा शख्स सदियों में कभी कभार ही धरती पर आता है

समाचार4मीडिया ब्यूरो by समाचार4मीडिया ब्यूरो
Published - Thursday, 14 November, 2019
Last Modified:
Thursday, 14 November, 2019
Anuranjan Jha

अनुरंजन झा, वरिष्ठ पत्रकार।।

सुबह-सुबह सूचना मिली कि वशिष्ठ बाबू नहीं रहे। जो नहीं जानते, उनके लिए एक गणितज्ञ। जो जानते हैं, उनके लिए दूसरे रामानुजन और हमारे लिए ‘बिहार विभूति’ सर। यह भी गजब इत्तेफाक है कि कल ही यह सूचना आई कि उनके जीवन पर फिल्म बनाने के लिए जिन दो निर्माताओं के बीच कॉपीराइट को लेकर कानूनी विवाद फंसा हुआ था, उसे एक्सेल इंटरटेनमेंट ने जीत लिया है। रात ही हमने इनके मुद्दे पर कई लोगों से काफी बात की और थोड़ा सुकून था कि चलो इस विवाद के बाद अब सिनेमा पर काम शुरू होगा तो वशिष्ठ बाबू को दुनिया और ठीक से जान पाएगी।

दुनिया जान पाएगी कि चाणक्य की धरती बिहार में हाल के दिनों तक विश्व को गुरुमंत्र देने वाले लोग पैदा होते रहे हैँ। सोशल मीडिया का सूचना के मामले में जबरदस्त लाभ हुआ है। खबर सोशल मीडिया पर अगले एक घंटे में तैरने लगी। अपनी-अपनी सूचना और जानकारी के हिसाब से लोग उनको श्रद्धांजलि भी देने लगे। हम जितनी बार वशिष्ठ बाबू से मिले,  निश्चित तौर पर उनको कुछ भी याद नहीं रहा होगा, क्योंकि जबसे हमने होश संभाला है, तब से वो सिजोफ्रेनिया के शिकार हैँ, लेकिन हर मुलाकात हमें उत्साह और उर्जा से भर देती थी। निश्चित तौर पर हमारे लिए उनका जाना एक व्यक्तिगत क्षति है।

डिजिटल माध्यम पर उनके निधन की तैरती खबरों के बीच एक ऐसी खबर पर हमारी नजर पड़ी, जिसने हमें कुछ देर के लिए सुन्न कर दिया। उतने मर्माहत तो हम यह खबर सुनकर भी नहीं हुए कि वो नहीं रहे। एक रिपोर्ट देखी, जिसमें साफ-साफ दिखा कि पटना में निधन के बाद उनकी लाश अस्पताल से बाहर तकरीबन फेंक दी गई। उसे घर ले जाने के लिए एक अदद एंबुलेंस की व्यवस्था भी प्रशासन नहीं कर पाया।

आनन-फानन में सरकार ने सरकारी सम्मान से अंतिम संस्कार की घोषणा तो कर दी, लेकिन जिस तरीके का व्यवहार अस्पताल प्रशासन ने किया, वो वाकई शर्मसार करने वाला है। अस्पताल में अंतिम दिनों में कुछ राजनेता मिलने भी गए, क्योंकि उनको अपना फोटो कराना था। नहीं तो उनके जीवन से इन राजनेताओं का कोई लेना-देना नहीं रहा। क्यूंकि अगर रहा होता तो न तो वशिष्ठ बाबू की यह हालत होती और न ही वो गुमनामी की जिंदगी जीते हुए मरते।

जिस तरीके से वशिष्ठ बाबू की लाश बाहर रखी थी और समाज और राजनीति का कोई व्यक्ति नहीं पहुंचा था, उसे देखकर यही लगा कि यह लाश वशिष्ठ बाबू की नहीं, हमारे गौरव की लाश है। जिस शख्स ने 19 साल की उम्र में कैलिफोर्निया से पीएचडी करके एक वक्त में सबसे कम उम्र में यह डिग्री पाने का गौरव हासिल किया हो, यह उस गौरव की लाश है। जिस शख्स ने आइंस्टाइन जैसे वैज्ञानिक के सिद्धांतों तो चुनौती दी हो, यह उस चुनौती की लाश है। जो बीमार होने के बाद भी 40 से ज्यादा सालों तक हर दीवार पर गणित के फार्मूले लिखता रहा हो, यह उस फार्मूले की लाश है। जिसने आत्मसम्मान से समझौता नहीं करने की शर्त पर नासा को ठुकरा कर देश के IIT में पढ़ाना पसंद किया हो, यह उस आत्मसम्मान की लाश है।

फिल्मकार नितिन चंद्रा ने ठीक ही तो कहा कि यह ये वशिष्ठ नारायण की लाश नहीं है, ये बिहारियों की बिहार के प्रति संवेदनशीलता की लाश है। यकीन मानिए समाज में बहुत सारे आदर्श दोबारा जन्म लेंगे, लेकिन वशिष्ठ बाबू जैसा शख्स सदियों में कभी कभार ही धरती पर आता है।

चूंकि मैं आशावादी हूं, इसलिए फिर कहता हूं कि अब भी समय है, चेत जाइए, सिस्टम बदलने का प्रयास कीजिए। अब भी अपने को बचाने की कोशिश कीजिए, धरोहरों का सम्मान कीजिए। भविष्य तभी ठीक होगा,  नहीं तो कभी दाना मांझी अपनों की लाश कंधों पर ढोकर घर ले जाएगा और कभी ये सिस्टम वशिष्ठ बाबू की लाश को झटके में सड़क पर पटक देगा।  वशिष्ठ बाबू को भावभीनी श्रद्धांजलि।

(यह लेखक के निजी विचार हैं।)

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