रिवॉर्ड्स से रिलेशनशिप तक: बदलती दुनिया में लॉयल्टी प्रोग्राम्स का नया दौर

अब सिर्फ पॉइंट्स नहीं, अनुभव और जुड़ाव से बन रही कंज्युमर्स की प्रतिबद्धता, ब्रैंड्स अपना रहे हैं भावनात्मक जुड़ाव की स्ट्रैटेजी

Last Modified:
Tuesday, 09 June, 2026
Ganapathy Viswanathan..


गणपति विश्वनाथन, कम्युनिकेशन कंसल्टेंट और लेखक।।

आज से कुछ साल पहले तक लॉयल्टी प्रोग्राम्स का मतलब कंज्युमर्स को रिवॉर्ड पॉइंट्स, डिस्काउंट या विशेष सुविधाएं देना होता था। तमाम एयरलाइंस, होटल और रिटेल कंपनियां कंज्युमर्स को अपने साथ बनाए रखने के लिए इसी मॉडल पर काम करती थीं। लेकिन अब बाजार और कंज्युमर्स की सोच दोनों तेजी से बदल रहे हैं। ऐसे में ब्रैंड्स भी पारंपरिक रिवॉर्ड आधारित लॉयल्टी मॉडल से आगे बढ़कर ग्राहकों के साथ भावनात्मक रिश्ते बनाने पर जोर दे रहे हैं।

मार्केटिंग विशेषज्ञ गणपति विश्वनाथन के अनुसार, आज के कंज्युमर्स के पास पहले की तुलना में कहीं अधिक विकल्प मौजूद हैं। होटल बुकिंग, फ्लाइट टिकट, रेस्टोरेंट या शॉपिंग—लगभग हर सेवा की तुलना कुछ ही मिनटों में ऑनलाइन की जा सकती है। ग्राहक लगातार विभिन्न प्लेटफॉर्म्स के बीच स्विच कर रहे हैं, रिव्यू पढ़ रहे हैं और बेहतर अनुभवों की तलाश में रहते हैं। ऐसे माहौल में केवल रिवॉर्ड पॉइंट्स के जरिए लंबे समय तक ग्राहक की निष्ठा बनाए रखना मुश्किल होता जा रहा है।

लेन-देन से आगे बढ़कर अनुभवों की मांग

ब्रैंड्स यह महसूस कर रहे हैं कि खासतौर पर युवा उपभोक्ता अब केवल डिस्काउंट या कैशबैक से संतुष्ट नहीं हैं। वे बेहतर अनुभव, विशेष पहुंच और ब्रैंड्स के साथ व्यक्तिगत जुड़ाव चाहते हैं। यही कारण है कि कई कंपनियां अब अपने ग्राहकों को केवल उत्पाद या सेवाएं बेचने के बजाय उन्हें यादगार अनुभव देने पर ध्यान केंद्रित कर रही हैं।

हॉस्पिटैलिटी सेक्टर में यह बदलाव सबसे स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है। होटल अब केवल कमरे और लग्जरी सुविधाएं बेचने तक सीमित नहीं हैं। वे म्यूजिक कार्यक्रमों, विशेष डाइनिंग अनुभवों, वेलनेस रिट्रीट्स, खेल आयोजनों और एक्सक्लूसिव इवेंट्स के जरिए ग्राहकों के साथ गहरा संबंध बनाने की कोशिश कर रहे हैं।

वैश्विक ब्रैंड्स ने बदली स्ट्रैटेजी

दुनिया के कई बड़े ब्रैंड्स पहले ही इस बदलाव को अपना चुके हैं। स्टारबक्स ने ऐसा इकोसिस्टम तैयार किया है, जहां लॉयल्टी प्रोग्राम पारंपरिक पॉइंट्स सिस्टम से आगे बढ़कर एक व्यक्तिगत सदस्यता अनुभव जैसा महसूस होता है। वहीं एमेजॉन प्राइम ने शॉपिंग के साथ मनोरंजन, संगीत और स्ट्रीमिंग सेवाओं को जोड़कर ग्राहकों की अपेक्षाओं को नई दिशा दी है।

इसी तरह नाइकी ने केवल उत्पाद बेचने के बजाय फिटनेस और लाइफस्टाइल से जुड़ी कम्युनिटीज बनाने पर जोर दिया है। भारत में भी टाटा न्यू जैसे प्लेटफॉर्म यात्रा, रिटेल, ग्रोसरी, इलेक्ट्रॉनिक्स और हॉस्पिटैलिटी सेवाओं को एक साझा रिवॉर्ड ढांचे के तहत जोड़ने की दिशा में काम कर रहे हैं।

मैरियट का नया दृष्टिकोण

हॉस्पिटैलिटी सेक्टर में मैरियट इंटरनेशनल उन कंपनियों में शामिल है, जो लॉयल्टी की परिभाषा को नए तरीके से गढ़ रही हैं। पारंपरिक रूप से होटल कंपनियां अपनी सेवा, लग्जरी और प्रॉपर्टी की गुणवत्ता के आधार पर खुद को प्रस्तुत करती रही हैं, लेकिन अब मैरियट इससे आगे बढ़कर सांस्कृतिक और भावनात्मक जुड़ाव पर ध्यान दे रही है।

कंपनी अपने लॉयल्टी प्लेटफॉर्म ‘मैरियट बॉनवॉय’ के माध्यम से खेल, संगीत, भोजन और मनोरंजन से जुड़े अनुभवों को ग्राहकों तक पहुंचा रही है। इसका उद्देश्य ब्रैंड को केवल यात्रा के दौरान ही नहीं, बल्कि ग्राहकों की रोजमर्रा की रुचियों और आकांक्षाओं का भी हिस्सा बनाना है।

यह स्ट्रैटेजी खासतौर पर जेनजी (Gen Z) उपभोक्ताओं को ध्यान में रखकर बनाई गई है। यह वर्ग पारंपरिक लग्जरी विज्ञापनों से अधिक प्रामाणिक अनुभवों, संस्कृति और अपनी पहचान से मेल खाने वाले ब्रैंड्स की ओर आकर्षित होता है।

लॉयल्टी प्रोग्राम्स का भविष्य

विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में लॉयल्टी प्रोग्राम्स पारंपरिक पॉइंट्स आधारित मॉडल से और दूर जाएंगे। कंपनियां ग्राहकों को व्यक्तिगत अनुभव देने के लिए डेटा और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का अधिक उपयोग करेंगी। भविष्य में रिवॉर्ड्स का केंद्र बिंदु पॉइंट्स नहीं, बल्कि विशेष पहुंच, विशिष्ट अनुभव और निजीकरण हो सकता है। साथ ही ‘इकोसिस्टम लॉयल्टी’ का महत्व भी बढ़ेगा। उपभोक्ता अब अलग-अलग श्रेणियों में बंटे ब्रैंड्स के बजाय ऐसे प्लेटफॉर्म्स को पसंद कर रहे हैं, जहां यात्रा, शॉपिंग, मनोरंजन, भुगतान और अन्य सेवाएं एक साथ उपलब्ध हों।

विशेषज्ञों के अनुसार, लॉयल्टी प्रोग्राम्स अब केवल ग्राहकों को खरीदारी के लिए प्रोत्साहित करने का माध्यम नहीं रह गए हैं। वे धीरे-धीरे ऐसे प्लेटफॉर्म्स में बदल रहे हैं, जिनका उद्देश्य ग्राहकों और ब्रैंड्स के बीच मजबूत और दीर्घकालिक रिश्ते बनाना है। ऐसे दौर में, जब प्रतिस्पर्धा लगातार बढ़ रही है और उपभोक्ताओं का ध्यान आकर्षित करना पहले से अधिक चुनौतीपूर्ण हो गया है, भावनात्मक जुड़ाव ही ब्रैंड्स की सबसे बड़ी ताकत बन सकता है।

(यह लेखक के निजी विचार हैं।)

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घटती जन्मदर बदल रही बाजार की तस्वीर, ब्रैंड्स को समझनी होगी कंज्यूमर्स की बदलती सोच

विशेषज्ञों का मानना है कि एक बच्चे वाला परिवार और तीन-चार बच्चों वाला परिवार खर्च करने के तरीके में काफी अलग होता है।

Last Modified:
Tuesday, 09 June, 2026
Prabhakar Mundkur..

प्रभाकर मुंदकुर, वरिष्ठ विज्ञापन विशेषज्ञ ।।

भारत की कुल जन्म दर (Total Fertility Rate-TFR) अब 1.9 पर पहुंच गई है, जो जनसंख्या को स्थिर बनाए रखने के लिए आवश्यक 2.1 के प्रतिस्थापन स्तर (Replacement Level) से नीचे है। आमतौर पर इस तरह के आंकड़ों को जनसंख्या, रोजगार और सरकारी नीतियों के नजरिए से देखा जाता है, लेकिन मार्केटिंग विशेषज्ञों का मानना है कि इसका असर भारतीय उपभोक्ताओं की सोच और खरीदारी के व्यवहार पर भी गहराई से पड़ेगा।

वरिष्ठ विज्ञापन विशेषज्ञ प्रभाकर मुंदकुर के अनुसार, लंबे समय तक भारतीय कारोबार इस धारणा पर आधारित रहा कि भविष्य में उपभोक्ताओं की संख्या लगातार बढ़ती रहेगी। बढ़ती आबादी का मतलब अधिक परिवार, अधिक बच्चे, अधिक नए खरीदार और लगभग हर श्रेणी के उत्पादों के लिए बढ़ता हुआ बाजार था। लेकिन अब यह धारणा बदलती दिखाई दे रही है।

दक्षिण भारत के राज्य-तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश, इस बदलाव की झलक पहले ही दिखा चुके हैं। इन राज्यों में जन्म दर काफी पहले घटने लगी थी। इसके साथ ही साक्षरता में वृद्धि, महिलाओं की कार्यबल में बढ़ती भागीदारी, बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं और आय में बढ़ोतरी भी देखने को मिली। अब भारत के अन्य हिस्से भी इसी दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।

इस बदलाव के पीछे महिला शिक्षा को एक महत्वपूर्ण कारण माना जा रहा है। दुनिया भर की तरह भारत में भी यह देखा गया है कि जैसे-जैसे महिलाओं की शिक्षा का स्तर बढ़ता है, विवाह की उम्र बढ़ती है, करियर को प्राथमिकता मिलती है और परिवार नियोजन को लेकर जागरूकता बढ़ती है। इसका सीधा असर परिवार के आकार पर पड़ता है।

छोटे परिवार, बदलता खर्च

विशेषज्ञों का मानना है कि एक बच्चे वाला परिवार और तीन-चार बच्चों वाला परिवार खर्च करने के तरीके में काफी अलग होता है। छोटे परिवार अपने बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य, सह-पाठ्यक्रम गतिविधियों, यात्रा, तकनीक और बेहतर जीवन अनुभवों पर अधिक खर्च करते हैं। ऐसे परिवारों में खर्च की प्राथमिकता संख्या से हटकर गुणवत्ता की ओर बढ़ जाती है। बच्चे पर अधिक निवेश किया जाता है और परिवार की आर्थिक योजना भी उसी के अनुसार तय होती है।

बड़े बाजार से प्रीमियम बाजार की ओर बढ़ता रुझान

घटती जन्म दर का सबसे बड़ा प्रभाव उपभोक्ता बाजार की प्रकृति पर पड़ सकता है। अब तक भारत की आर्थिक वृद्धि का बड़ा आधार बड़ी आबादी और बढ़ती मांग रही है। कंपनियां ऐसे उत्पाद बनाने पर जोर देती थीं जो अधिक से अधिक लोगों की पहुंच में हों।

लेकिन जब परिवारों में बच्चों की संख्या कम होती है तो प्रति व्यक्ति उपलब्ध आय बढ़ती है। इससे लोग शिक्षा, पोषण, स्वास्थ्य, यात्रा और व्यक्तिगत विकास जैसी जरूरतों पर ज्यादा खर्च करने लगते हैं। उपभोक्ता केवल सस्ते विकल्प नहीं, बल्कि बेहतर गुणवत्ता और बेहतर अनुभव देने वाले उत्पादों की तलाश करने लगते हैं।

यही प्रवृत्ति प्रीमियमाइजेशन (Premiumisation) को बढ़ावा देती है। इसका असर स्मार्टफोन, ऑटोमोबाइल, यात्रा, आतिथ्य, शिक्षा, वित्तीय सेवाओं और खाद्य-पेय पदार्थों जैसे कई क्षेत्रों में पहले से दिखाई देने लगा है। लोग सिर्फ अधिक खरीदारी नहीं कर रहे, बल्कि बेहतर खरीदारी कर रहे हैं।

बढ़ रही है महिला उपभोक्ताओं की ताकत

जन्म दर में कमी का एक और महत्वपूर्ण परिणाम महिलाओं का बढ़ता आर्थिक प्रभाव है। शिक्षा और रोजगार के अवसर बढ़ने के साथ महिलाएं न केवल कार्यबल में अधिक संख्या में शामिल हो रही हैं, बल्कि परिवार के आर्थिक और खरीद संबंधी फैसलों में भी बड़ी भूमिका निभा रही हैं।

ऐसे में कई क्षेत्रों में महिलाएं अब केवल एक लक्षित उपभोक्ता वर्ग नहीं रह गई हैं, बल्कि प्रमुख निर्णयकर्ता के रूप में उभर रही हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि जो ब्रांड आज भी पुराने नजरिए से बाजार को देखते हैं, वे भविष्य में अपनी प्रासंगिकता खो सकते हैं।

वरिष्ठ नागरिकों के लिए बढ़ेंगे अवसर

हालांकि भारत अभी भी दुनिया के सबसे युवा देशों में शामिल है, लेकिन जनसांख्यिकीय रुझान बताते हैं कि आने वाले वर्षों में वरिष्ठ नागरिकों की संख्या बढ़ेगी। जन्मदर में लगातार गिरावट के कारण आबादी में बुजुर्गों का अनुपात बढ़ने की संभावना है। इससे स्वास्थ्य सेवाओं, वेलनेस, निवारक चिकित्सा, वित्तीय योजना, रिटायरमेंट सेवाओं और वरिष्ठ नागरिकों के अनुकूल उत्पादों व सेवाओं के लिए नए अवसर पैदा होंगे।

मार्केटिंग के लिए क्या है संदेश?

विशेषज्ञों के अनुसार, पिछले कई दशकों से भारत में मार्केटिंग का केंद्र अधिक से अधिक लोगों तक पहुंच बनाना, वितरण नेटवर्क मजबूत करना और बड़े पैमाने पर बिक्री करना रहा है। लेकिन आने वाले वर्षों में सफलता का आधार उपभोक्ताओं को अधिक मूल्य, बेहतर अनुभव और बेहतर गुणवत्ता प्रदान करना हो सकता है। अब कंपनियों के सामने सबसे बड़ा सवाल यह नहीं होगा कि वे कितने नए उपभोक्ताओं तक पहुंचती हैं, बल्कि यह होगा कि वे प्रत्येक उपभोक्ता के लिए कितना अधिक मूल्य तैयार कर पाती हैं।

देश की घटती जन्म दर केवल एक जनसंख्या संबंधी आंकड़ा नहीं है। यह संकेत है कि भारतीय उपभोक्ता अधिक शिक्षित, अधिक समृद्ध, अधिक महत्वाकांक्षी और अधिक अपेक्षाएं रखने वाला बन रहा है। ऐसे में बाजार और मार्केटिंग की रणनीतियों को भी उसी के अनुरूप बदलना होगा।

(यह लेखक के निजी विचार हैं।)

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₹15 लाख करोड़ की गड़बड़ी? पढ़िए इस सप्ताह का 'हिसाब किताब'

राजेश एक्सपोर्ट के मालिक राजेश मेहता कहते हैं कि सेबी ने आँकड़े समझने में गलती कर दी है। उनका कहना है कि 'Valcambi' कच्चा सोना खरीदती है और फिर दुनिया भर में रिफाइन सोना बेचती है।

Last Modified:
Monday, 08 June, 2026
milindkhandekar

मिलिंद खांडेकर, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक।

राजेश एक्सपोर्ट्स बिक्री के हिसाब से देश की चौथी सबसे बड़ी कंपनी है। सिर्फ रिलायंस, एलआईसी और इंडियन ऑयल की बिक्री उससे ज़्यादा है। इतना ही नहीं, वह बिक्री के मामले में स्टेट बैंक और टीसीएस से भी आगे है। इतनी बिक्री के बावजूद कंपनी मुनाफ़े के मामले में पहली 500 कंपनियों में भी शामिल नहीं है।

पिछले वित्त वर्ष 2025-26 में कंपनी ने ₹7.79 लाख करोड़ की बिक्री दिखाई, जबकि मुनाफ़ा मात्र ₹112 करोड़ रहा। यानी अगर ₹100 की बिक्री है तो मुनाफ़ा 1 पैसे से भी कम। बाज़ार में यह एक स्मॉल कैप कंपनी मानी जाती है। यही विरोधाभास शेयर बाज़ार के नियामक सेबी (SEBI) की नज़र में आया है।

गैरेज से स्विट्जरलैंड तक-

राजेश मेहता ने अपने भाई प्रशांत के साथ मिलकर करीब 35 साल पहले बेंगलुरु के एक गैरेज से सोने के ज़ेवर बनाना शुरू किया था। ये ज़ेवर दूसरे देशों में बेचे जाते थे। 1995 में यह कंपनी शेयर बाज़ार में सूचीबद्ध (लिस्टेड) भी हो गई थी।

सोने के गहनों का निर्यात करने के साथ-साथ उन्होंने भारत में भी बिक्री शुरू की। ‘शुभ ज्वेलर्स’ उनके ब्रांड का नाम है। राजेश सिर्फ गहने बनाने तक नहीं रुके। उन्होंने 2015 में स्विट्जरलैंड की ‘Valcambi’ नामक गोल्ड रिफाइनरी भी खरीद ली।

खदान से निकाले गए सोने को रिफाइनरी में शुद्ध किया जाता है। इसके बाद उससे गहने या सोने की ईंटें बनाई जाती हैं। यह रिफाइनरी साल में जितना सोना रिफाइन करती है, वह भारत की कुल खपत का लगभग दोगुना है। यही कंपनी अब विवादों के केंद्र में है।

ना बही, ना खाता-

सेबी ने पाया कि राजेश एक्सपोर्ट्स का पिछले पाँच वर्षों का टर्नओवर ₹15.18 लाख करोड़ है, लेकिन बही-खातों की जाँच में ₹15.15 लाख करोड़ की बिक्री का कोई रिकॉर्ड नहीं मिला। राजेश एक्सपोर्ट्स यह बिक्री अपनी कंपनी Valcambi के खातों में दिखाता रहा है। जब सेबी ने Valcambi के खाते जाँचे तो वहाँ भी इतनी बिक्री का रिकॉर्ड नहीं मिला।

प्रथम दृष्टया ऐसा लगता है कि Valcambi जितनी क़ीमत का सोना रिफाइन करती थी, राजेश एक्सपोर्ट्स उसे अपनी बिक्री में जोड़ देता था। यह कुछ वैसा ही है जैसे कोई कंपनी टोल प्लाज़ा चलाती हो और वह टोल से गुजरने वाली गाड़ियों की कुल कीमत को अपनी बिक्री में जोड़ दे, जबकि उसकी वास्तविक आय केवल उतनी हो जितना टोल टैक्स वह वसूलती है। राजेश एक्सपोर्ट्स पर इसी तरह का आरोप है।

राजेश एक्सपोर्ट्स के मालिक राजेश मेहता का कहना है कि सेबी ने आँकड़ों को समझने में गलती की है। उनके मुताबिक Valcambi कच्चा सोना खरीदती है और फिर उसे रिफाइन कर दुनिया भर में बेचती है। बड़े-बड़े बैंक भी उससे सोना खरीदते हैं। वे यह भी कहते हैं कि सेबी ने उनकी बिक्री के आँकड़ों पर सवाल उठाए हैं, मुनाफ़े पर नहीं। सेबी को जवाब देने के लिए उनके पास 21 दिन का समय है।

हालाँकि, बाज़ार मानो पहले ही अपना फ़ैसला सुना चुका है। राजेश एक्सपोर्ट्स का मार्केट कैप तीन साल पहले लगभग ₹30 हज़ार करोड़ था, जो अब घटकर करीब ₹3 हज़ार करोड़ रह गया है। यानी जो कंपनी कभी लार्ज कैप बनने की ओर बढ़ रही थी, वह अब स्मॉल कैप कंपनी बनकर रह गई है।

( यह लेखक के निजी विचार हैं )

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जिमखाना ही नहीं राष्ट्रपति भवन खाली करने के प्रस्ताव भी रहे: आलोक मेहता

मार्च 1978 में मैंने साप्ताहिक हिंदुस्तान (हिंदुस्तान टाइम्स प्रकाशन) के राजनीतिक संवाददाता के रुप में तीन पेज की लम्बी विशेष रिपोर्ट ' राष्ट्रपति भवन : बिगुल बजे या न बजे !' शीर्षक से लिखी थी।

Last Modified:
Monday, 08 June, 2026
aalokmehta

आलोक मेहता, वरिष्ठ पत्रकार, पद्मश्री, लेखक।

राजधानी के विशिष्ट संपन्न लोगों के जिमखाना क्लब खाली करने के नोटिस पर इन दिनों कुछ नामी लोगों ने बचाव में उसकी तुलना राष्ट्रपति भवन की ऐतिहासिक हेरिटेज महत्ता से कर दी। तो मुझे ध्यान आया कि सचमुच वर्षों पहले राष्ट्रपति भवन को खाली करने का प्रस्ताव भी शहरी विकास मंत्रालय और प्रधानमंत्री कार्यालय के बीच चलता रहा है। चौंकिए नहीं, तथ्यों की पुष्टि सरकारी दस्तावेजों से हो सकती है।

हाँ, यह प्रस्ताव प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार के कार्यकाल में नहीं आया था। ऐसा प्रस्ताव किसी कम्युनिस्ट नेता या किसी आंदोलनकारी संगठन ने भी नहीं रखा था। देश के सर्वोच्च पद पर बैठे महामहिम राष्ट्रपति ने स्वयं यह प्रस्ताव किया था। उनका तर्क था कि लोकतांत्रिक गांधीवादी राष्ट्र भारत के राष्ट्रपति को ब्रिटिश राज वाले बड़े भारी भवन में नहीं रहना चाहिए। वे किसी अन्य बड़े बंगले में रह सकते हैं।

यह बात इसलिए मुझे ध्यान में आई, क्योंकि मार्च 1978 में मैंने साप्ताहिक हिंदुस्तान (हिंदुस्तान टाइम्स प्रकाशन) के राजनीतिक संवाददाता के रूप में तत्कालीन राष्ट्रपति के इस प्रस्ताव पर करीब तीन पेज की लंबी विशेष रिपोर्ट ‘राष्ट्रपति भवन : बिगुल बजे या न बजे!’ शीर्षक से लिखी थी। प्रकाशित लेख की प्रति आज भी मेरी फाइलों में है। भारत का राष्ट्रपति भवन केवल एक सरकारी निवास नहीं, बल्कि भारतीय गणराज्य का सबसे बड़ा प्रतीक माना जाता है।

बहुत कम लोगों को पता है कि 1977–78 में ऐसा समय भी आया जब राष्ट्रपति को राष्ट्रपति भवन से हटाकर किसी छोटे भवन में स्थानांतरित करने के प्रस्ताव पर राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, गृह मंत्री और शहरी विकास मंत्री के बीच फाइल घूमती रही।

1977 का वर्ष भारतीय राजनीति में बड़े बदलाव का वर्ष था। आपातकाल समाप्त हुआ, सत्ता बदली और पहली बार गैर-कांग्रेसी सरकार बनी। इस नए राजनीतिक वातावरण में बड़े सरकारी खर्च, औपनिवेशिक विरासत और सत्ता के प्रतीकों पर सवाल उठने लगे। इसी माहौल में यह प्रश्न उठा कि क्या दुनिया के सबसे बड़े सरकारी आवासों में गिने जाने वाले राष्ट्रपति भवन में राष्ट्रपति का रहना उचित है?

राष्ट्रपति भवन मूल रूप से ब्रिटिश वायसराय के निवास के रूप में बनाया गया था। इसमें लगभग 340 कमरे हैं और यह विशाल परिसर में फैला हुआ है। इसे औपनिवेशिक शक्ति-प्रदर्शन के प्रतीक के रूप में भी देखा जाता रहा है। इतने विशाल परिसर के रखरखाव पर भारी सरकारी खर्च होता था। सादगी और मितव्ययिता की राजनीति करने वाले वरिष्ठ नेताओं ने सवाल उठाया कि क्या यह खर्च उचित है?

कुछ नेताओं का मानना था कि स्वतंत्र भारत को ब्रिटिश साम्राज्य की विरासत वाले भव्य प्रतीकों से दूरी बनानी चाहिए। कुछ विचार यह भी सामने आए कि इतनी विशाल इमारत को संग्रहालय, राष्ट्रीय संस्थान, सार्वजनिक उपयोग या अन्य सरकारी कार्यों के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है।

जनता पार्टी की सरकार लोकनायक जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में भारी जन समर्थन से सत्ता में आई थी। राष्ट्रपति नीलम संजीव रेड्डी, प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई, गृह मंत्री चौधरी चरण सिंह और रक्षा मंत्री जगजीवन राम सभी गांधीवादी आदर्शों की बातें कर रहे थे। सबसे पहले मेरा ध्यान इस बात पर गया कि संसद के संयुक्त अधिवेशन के उद्घाटन के लिए अभिभाषण देने राष्ट्रपति नीलम संजीव रेड्डी बग्घी में आने की पुरानी परंपरा त्यागकर छह दरवाजों वाली पुरानी कार से संसद पहुँचे।

इस तथ्य के साथ मैंने अपनी रिपोर्ट में लिखा कि संसद के केंद्रीय कक्ष में राष्ट्रपति के आगमन के समय तुमुलनाद नहीं किया गया। मैं 1972 से संसद की रिपोर्टिंग करता रहा था, इसलिए जानता था कि परंपरा के अनुसार राष्ट्रपति के प्रवेश के ठीक पहले सेंट्रल हॉल के ऊपर की गैलरी से दो बिगुलवादक बिगुल बजाकर उनके आने की सूचना देते हैं। लेकिन पता चला कि यह बिगुलवादन बंद कराने का आदेश स्वयं राष्ट्रपति ने दिया था। तभी मैंने रिपोर्ट का शीर्षक ‘बिगुल बजे या न बजे’ दिया।

इसी कड़ी में यह बात सामने आई कि राष्ट्रपति नीलम संजीव रेड्डी ने स्वयं यह प्रस्ताव आगे बढ़वाया कि इस भव्य भवन के बजाय भारत के राष्ट्रपति किसी छोटे बंगले में रह सकते हैं। गांधीवादी मोरारजी देसाई ने भी पहले इस बात को उचित मानकर पसंद किया। तब विभिन्न संबंधित मंत्रालयों के बीच यह फाइल चली कि राष्ट्रपति किस बंगले में रह सकते हैं। कई विकल्पों में इंडिया गेट के पास हैदराबाद हाउस का भी नाम था।

इस प्रस्ताव पर अंदरूनी जानकारी लेने के प्रयास में मुझे पता चला कि असल में आजादी से ठीक पहले 28 जुलाई 1947 को महात्मा गांधी ने पंडित जवाहरलाल नेहरू और वायसराय लॉर्ड लुइस माउंटबेटन को पत्र लिखकर यह आग्रह किया था कि “स्वाधीन भारत का राष्ट्राध्यक्ष छोटे भवन में रहना चाहिए।” लेकिन पंडित नेहरू और माउंटबेटन ने इस सलाह पर अपनी असहमति व्यक्त कर दी। मामला टल गया।

1977 के चुनाव भी एक तरह से जनतांत्रिक क्रांति और बदलाव के थे, इसलिए इस प्रस्ताव पर फिर विचार होने लगा। लेकिन सबसे बड़ी कठिनाई सुरक्षा व्यवस्था तथा विदेशी राष्ट्राध्यक्षों के साथ होने वाले समारोहों और बैठकों को बताया गया। नतीजा यह हुआ कि प्रस्ताव क्रियान्वित नहीं हो सका।

बहरहाल, वर्तमान संदर्भ में तो सुरक्षा कारणों से राष्ट्रपति भवन केवल संग्रहालय नहीं बन सकता। लेकिन यदि देश के सर्वोच्च पद पर बैठे नेता अपने कार्यालय बदलने को तैयार हो सकते थे, तो उसी परंपरा वाले सरकारी सेवाओं और सेना में रह चुके अपने को महान समझने वाले अधिकारी तथा देश के प्रभावशाली संपन्न लोग क्या अपने क्लब के खेल-मनोरंजन केंद्र, शराबखाने (बार), लंच-डिनर की यादगार कुर्सियाँ-टेबलें (यदि अन्य बड़े क्लबों की तरह बेड आदि हों) किसी अन्य बिल्डिंग में नहीं ले जा सकते हैं?

वैसे अब यह विवाद शायद सम्मानित सर्वोच्च अदालत से ही सुलझेगा। हाँ, इसी संदर्भ में 1978 की रिपोर्ट के एक अन्य तथ्य की याद दिलाना उचित लगता है। इस रिपोर्ट में मैंने पंडित नेहरू के निधन के बाद प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री द्वारा तीनमूर्ति भवन को नेहरू संग्रहालय बनवाने और स्वयं अपने लिए पहले से मिले हुए 10 जनपथ वाले छोटे बंगले में रहने के निर्णय का उल्लेख किया था।

10 जनपथ नई दिल्ली के लुटियंस ज़ोन का एक सरकारी बंगला है। यह ब्रिटिश काल में बने सरकारी बंगलों की श्रृंखला का हिस्सा था, जिनका निर्माण मुख्य रूप से 1920–30 के दशक में हुआ। दिलचस्प बात यह है कि 1964 से अब तक 10 जनपथ सत्ता के गलियारों में सबसे महत्वपूर्ण और चर्चित रहा है।

विडंबना यह है कि शास्त्रीजी के बहुत जल्द असामयिक निधन के बाद उनका परिवार कुछ वर्ष इस बंगले में रहा और बाद में कांग्रेस नेतृत्व के करीबी मंत्रियों और अधिकारियों ने इस बंगले के एक हिस्से को अलग कर 1 मोतीलाल नेहरू मार्ग बनाकर उसे लाल बहादुर शास्त्री स्मृति संग्रहालय का नाम दे दिया।

मुख्य बंगले में प्रधानमंत्री पद से हटने के बाद राजीव गांधी और फिर सोनिया गांधी तथा उनका परिवार रहने लगा। सांसद बनने से पहले राहुल गांधी भी 10 जनपथ में रहे। सत्ता का केंद्र रहने के कारण ही कांग्रेस राज में 24 अकबर रोड और उससे जुड़ा बंगला कांग्रेस पार्टी मुख्यालय की तरह उपयोग में आता रहा।

एक दिलचस्प बात यह है कि सरकारी रिकॉर्ड्स के अनुसार वर्ष 2020 तक 10 जनपथ बंगले का किराया मात्र 4,610 रुपये प्रतिमाह रहा है। फिर भी कुछ वर्षों तक इसका किराया न चुकाए जाने के विवाद मंत्रालयों और मीडिया में आते रहे। जिमखाना की जमीन का किराया समय पर न देने और करोड़ों रुपये के बकाए का विवाद भी चलता रह सकता है।

( यह लेखक के निजी विचार हैं )

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वैभव सूर्यवंशी के रूप में क्या भारतीय क्रिकेट को मिल गया नया सचिन : डॉ. संदीप गोयल

वैभव सूर्यवंशी भारतीय क्रिकेट का सबसे बड़ा युवा चेहरा बनकर उभरे हैं। सचिन तेंदुलकर और नाओमी ओसाका से तुलना के बीच जानिए कैसे वैभव नई पीढ़ी के स्पोर्ट्स सुपरस्टार बनते दिख रहे हैं।

Last Modified:
Wednesday, 03 June, 2026
drsandipgoyal

डॉ. संदीप गोयल, ‘रेडिफ्यूज़न’ और ‘एवरेस्ट’ के चेयरमैन।

आईपीएल 2026 खत्म हो चुका है, लेकिन उसका सबसे बड़ा सुपरस्टार वैभव सूर्यवंशी अभी बस शुरुआत कर रहा है। राजस्थान रॉयल्स के इस 15 वर्षीय ओपनर ने ऐसा रिकॉर्डतोड़ प्रदर्शन किया है, जिसने भारतीय क्रिकेट में एक नई बहस छेड़ दी है। वैभव आईपीएल इतिहास के पहले खिलाड़ी बन गए, जिन्होंने एक ही सीज़न में पांच बड़े व्यक्तिगत पुरस्कार अपने नाम किए। उन्होंने 16 पारियों में 776 रन बनाए और उनका स्ट्राइक रेट 237.31 रहा। उन्हें ऑरेंज कैप, मोस्ट वैल्यूएबल प्लेयर, इमर्जिंग प्लेयर ऑफ द सीज़न, सुपर स्ट्राइकर और सुपर सिक्सेस ऑफ द सीज़न जैसे सम्मान मिले।

वैभव ने सिर्फ रन नहीं बनाए, बल्कि रिकॉर्ड्स की पूरी किताब बदल दी। वह आईपीएल इतिहास के सबसे युवा ऑरेंज कैप विजेता बने। उन्होंने एक सीज़न में 72 छक्के लगाकर क्रिस गेल का 14 साल पुराना रिकॉर्ड तोड़ दिया। सिर्फ 440 गेंदों में 1000 आईपीएल रन पूरे करके उन्होंने आंद्रे रसेल का रिकॉर्ड भी पीछे छोड़ दिया। पावरप्ले में 521 रन बनाकर उन्होंने नई मिसाल कायम की। इतना ही नहीं, वह आईपीएल इतिहास के पहले अनकैप्ड खिलाड़ी बने, जिसने एक सीज़न में 700 से अधिक रन बनाए।

भारतीय खेल इतिहास में इतनी कम उम्र में इतना बड़ा प्रभाव शायद आखिरी बार सचिन तेंदुलकर ने डाला था। लेकिन सचिन और वैभव की यात्रा बिल्कुल अलग दौरों की कहानी है। सचिन ने अपनी पहचान टेस्ट क्रिकेट में दुनिया के सबसे खतरनाक गेंदबाजों के सामने टिककर बनाई थी। उनका पहला टेस्ट शतक 189 गेंदों में आया था, जो उनके धैर्य, तकनीक और मानसिक मजबूती का प्रतीक था। दूसरी ओर वैभव टी20 युग के खिलाड़ी हैं, जहां आक्रमण ही अस्तित्व का सबसे बड़ा हथियार है। उन्होंने सिर्फ 38 गेंदों में शतक लगाकर दुनिया को दिखा दिया कि यह नई पीढ़ी का क्रिकेट है।

ब्रांड वैल्यू के स्तर पर भी वैभव ने बेहद कम समय में विस्फोटक उछाल देखा है। उनकी एंडोर्समेंट डील्स में कथित तौर पर 24 गुना तक वृद्धि हुई है। आज स्टेडियमों में लोग सिर्फ उन्हें देखने पहुंच रहे हैं। सचिन का दौर अलग था, जब स्टारडम धीरे-धीरे बनता था। 1990 के दशक में सोशल मीडिया नहीं था, टी20 लीग नहीं थीं और ब्रांडिंग की दुनिया सीमित थी। सचिन ने वर्षों की मेहनत से खुद को “भारत की उम्मीद” बनाया, जबकि वैभव की लोकप्रियता इंस्टेंट और विस्फोटक है।

खास बात यह है कि खुद “क्रिकेट के भगवान” सचिन तेंदुलकर भी वैभव की तारीफ कर चुके हैं। उन्होंने वैभव के बैट स्विंग को “शानदार” बताया। कई पूर्व क्रिकेटर मानते हैं कि वैभव में जेनरेशन बदलने वाला एक्स-फैक्टर है। हालांकि वे यह भी कहते हैं कि दूसरा सचिन बनना लगभग असंभव है।

यहीं से तुलना एक और एशियाई सुपरस्टार से जुड़ती है- टेनिस खिलाड़ी नाओमी ओसाका। नाओमी पारंपरिक जूनियर प्रोडिजी नहीं थीं। उन्होंने 20 साल की उम्र में 2018 यूएस ओपन जीतकर दुनिया को चौंका दिया। उन्होंने चार ग्रैंड स्लैम खिताब जीते और दुनिया की नंबर-1 खिलाड़ी बनीं। उनका खेल पावर, आक्रामकता और मानसिक मजबूती का मिश्रण था।

वैभव और नाओमी की तुलना दिलचस्प इसलिए है क्योंकि दोनों ने बहुत कम उम्र में अपने खेल की रफ्तार बदल दी। लेकिन दोनों का मानसिक ढांचा एकदम अलग है। वैभव आज “ज़ेन स्टेट” वाले खिलाड़ी दिखाई देते हैं। आईपीएल 2026 के एलिमिनेटर में 29 गेंदों पर 97 रन बनाने के बाद भी उन्होंने उस पारी को स्कूल नेट प्रैक्टिस जैसा बताया। वह व्यक्तिगत रिकॉर्ड्स की जगह सिर्फ टीम के लिए छक्के लगाने की बात करते हैं। ऐसा लगता है कि मीडिया का शोर उनके खेल तक पहुंच ही नहीं पाता।

इसके उलट नाओमी ओसाका मीडिया दबाव और मानसिक तनाव से गहराई से प्रभावित हुईं। 2018 यूएस ओपन जीतने के बाद उन्होंने जिस भावनात्मक दबाव का सामना किया, उसने बाद में उन्हें मानसिक स्वास्थ्य पर खुलकर बात करने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने खेल से ब्रेक लेकर दुनिया को बताया कि सुपरस्टार खिलाड़ियों के भीतर भी इंसानी कमजोरियां होती हैं।

दोनों खिलाड़ियों में एक समानता जरूर है -उनका आक्रामक खेल। वैभव अपनी विशाल बैकलिफ्ट और निडर शॉट्स से दुनिया के सर्वश्रेष्ठ गेंदबाजों को निशाना बनाते हैं। उन्होंने पावरप्ले बल्लेबाजी की परिभाषा बदल दी है। वहीं नाओमी ओसाका ने अपनी 120 मील प्रति घंटे की सर्विस और ताकतवर ग्राउंडस्ट्रोक्स से महिला टेनिस में नई आक्रामकता जोड़ी।

वैभव सूर्यवंशी, सचिन तेंदुलकर और नाओमी ओसाका तीन अलग-अलग दौर और खेलों के नाम हैं, लेकिन तीनों में एक समान बात है -इन सभी ने अपने खेल की दिशा बदल दी। सचिन भारतीय क्रिकेट की बुनियाद बने, नाओमी ने टेनिस में एशियाई पहचान को नई ऊंचाई दी और वैभव आज भारतीय क्रिकेट के नए विस्फोटक युग का चेहरा बनते दिख रहे हैं।

अब सबसे बड़ा सवाल यही है -क्या वैभव आने वाले वर्षों में सिर्फ रिकॉर्ड मशीन बनकर रहेंगे या सचिन की तरह पीढ़ियों की उम्मीद बनेंगे? क्या वह नाओमी ओसाका की तरह दबाव और स्टारडम के बोझ से जूझेंगे, या अपनी मासूम बेफिक्री को लंबे समय तक बचाकर रख पाएंगे? इसका जवाब भविष्य देगा। लेकिन फिलहाल इतना तय है कि भारतीय क्रिकेट को एक ऐसा किशोर सितारा मिल चुका है, जिसने दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है।

( यह लेखक के निजी विचार हैं )

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दुनिया को जोड़ने वाला सबसे बड़ा खेल उत्सव 'FIFA वर्ल्ड कप'

FIFA वर्ल्ड कप की असली ताकत सिर्फ खेल या मनोरंजन में नहीं, बल्कि उसके पीछे छिपे विचार में है।

Last Modified:
Wednesday, 03 June, 2026
Fifa896

शुभ्रांसु सिंह, सीएमओ, टाटा मोटर्स ।।

दुनिया इस समय ऐसे दौर से गुजर रही है जहां इंसानों को जोड़ने वाली चीजें धीरे-धीरे कमजोर पड़ रही हैं। देशों की सीमाएं और सख्त की जा रही हैं या बदली जा रही हैं। व्यापार को भी राजनीतिक और रणनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है। देशों के बीच दोस्ती और गठबंधन अब सिद्धांतों के बजाय फायदे-नुकसान के आधार पर तय हो रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय संबंधों की भाषा अब सहयोग से ज्यादा स्वार्थ, दबाव और धमकी तक सीमित होती जा रही है। ऐसे माहौल में FIFA वर्ल्ड कप 2026 का आयोजन हो रहा है।

इसे केवल दुनिया की समस्याओं से कुछ समय के लिए ध्यान हटाने वाले आयोजन के रूप में नहीं देखना चाहिए। बल्कि वर्ल्ड कप उन विभाजनकारी प्रवृत्तियों के खिलाफ एक मजबूत संदेश है, जो दुनिया को बांट रही हैं।

आमतौर पर वर्ल्ड कप की महानता उसकी विशालता और भव्यता से जोड़ी जाती है। यह दुनिया का सबसे बड़ा खेल आयोजन है, जिसे देखने के लिए मानव इतिहास की सबसे बड़ी टीवी ऑडियंस जुटती है। यह बात सही और प्रभावशाली है, लेकिन लेखक के अनुसार वर्ल्ड कप की असली अहमियत सिर्फ इतनी नहीं है। इसकी वास्तविक ताकत इससे कहीं ज्यादा गहरी और अर्थपूर्ण है।

FIFA वर्ल्ड कप की असली ताकत सिर्फ खेल या मनोरंजन में नहीं, बल्कि उसके पीछे छिपे विचार में है।

असल में वर्ल्ड कप एक ऐसा मंच है जहां आर्थिक, सैन्य या कूटनीतिक ताकत के आधार पर देशों की रैंकिंग मायने नहीं रखती। यहां सभी देशों के लिए नियम एक जैसे होते हैं। यहां सेनेगल इंग्लैंड को हरा सकता है, मोरक्को किसी यूरोपीय दिग्गज को मात दे सकता है और दक्षिण कोरिया जर्मनी जैसी मजबूत टीम को पराजित कर सकता है।

दुनिया में आम तौर पर देशों की ताकत उनकी आर्थिक शक्ति, सैन्य ताकत और राजनीतिक प्रभाव से तय होती है। अमीर और शक्तिशाली देशों की बात ज्यादा सुनी जाती है, जबकि छोटे या गरीब देशों का प्रभाव कम होता है, लेकिन वर्ल्डकप में यह पूरी व्यवस्था कुछ समय के लिए बदल जाती है।

फुटबॉल के मैदान पर सभी देशों के लिए नियम एक जैसे होते हैं। वहां यह मायने नहीं रखता कि किस देश की अर्थव्यवस्था बड़ी है, किसके पास ज्यादा सेना है या कौन ज्यादा शक्तिशाली है। इसीलिए, सेनेगल इंग्लैंड को हरा सकता है। मोरक्को किसी बड़े यूरोपीय देश को मात दे सकता है। दक्षिण कोरिया जर्मनी जैसी फुटबॉल महाशक्ति को हराने में सक्षम हो सकता है। 

दुनिया का कोई व्यापार समझौता, कोई अंतरराष्ट्रीय संगठन या कोई राजनीतिक मंच ऐसी बराबरी नहीं ला सकता। यह काम सिर्फ फुटबॉल का मैदान कर सकता है। यही वर्ल्डकप की असली लोकतांत्रिक (Democratic) शक्ति है।

वर्ल्डकप की ताकत सिर्फ इस बात में नहीं है कि अलग-अलग देशों के लोग एक-दूसरे को गले लगाते हैं या खुशी मनाते हैं। उसकी असली ताकत इस बात में है कि एक गरीब या छोटा देश भी किसी अमीर और शक्तिशाली देश को हरा सकता है। फुटबॉल का मैदान यह याद नहीं रखता कि किस देश की GDP ज्यादा है। वहां सिर्फ प्रदर्शन, प्रतिभा और मेहनत मायने रखती है।

भारत इस पूरी स्थिति को एक अलग और सीख देने वाले नजरिए से देखता है।

भारत और FIFA वर्ल्डकप का रिश्ता बहुत खास है। भारत दुनिया का सबसे ज्यादा आबादी वाला देश है और यहां खेलों के प्रति लोगों का जुनून भी बहुत गहरा है। इसके बावजूद भारत कभी FIFA वर्ल्डकप के लिए क्वालिफाई नहीं कर पाया। इसलिए वर्ल्डकप से हमारा रिश्ता एक ऐसे समर्पित दर्शक का है, जो दिल और भावनाओं से पूरी तरह जुड़ा हुआ है, लेकिन मैदान पर मौजूद नहीं है।

प्रतियोगिता से बाहर बैठकर देखने का भी एक फायदा है। जब आपकी अपनी टीम नहीं खेल रही होती, तो अहंकार और पक्षपात खत्म हो जाता है। तब आप खेल को उसके सबसे शुद्ध रूप में देखते हैं। आप सिर्फ मैच, उसका रोमांच और उन खिलाड़ियों की कहानी देखते हैं, जिन्होंने दुनिया की नजरों के सामने खेले जाने वाले 90 मिनट के लिए वर्षों तक मेहनत की है।

भारत के गांवों, कस्बों और शहरों में फुटबॉल के प्रति प्रेम हर जगह दिखाई देता है। चाहे उत्तर भारत के मोहल्लों के मैदान हों, बंगाल के पाड़ा ग्राउंड, केरल के धान के खेतों के पास बने मैदान हों या पूर्वोत्तर भारत के खूबसूरत स्टेडियम- भारतीय फुटबॉल प्रेमी टूटी सड़कों पर नंगे पैर खेले जाने वाले फुटबॉल का भी उतना ही सम्मान करते हैं।

वर्ल्ड कप को केवल ‘एस्केपिज्म’ यानी वास्तविकता से कुछ समय के लिए भागना नहीं कहा जा सकता। असली फर्क यह है कि वर्ल्डकप हमें यह अनुभव कराता है कि देशों के बीच शांतिपूर्ण प्रतिस्पर्धा कैसी दिखती है।

यहां मुकाबला होता है, लेकिन नफरत नहीं। यहां देशभक्ति होती है, लेकिन दूसरे देशों पर कब्जा करने की इच्छा नहीं।

यहां गर्व होता है, लेकिन ताकत या हिंसा से नहीं, बल्कि प्रतिभा और कौशल से।

वर्ल्डकप के दौरान कुछ समय के लिए दुनिया का ध्यान युद्ध, सेना और सीमा विवादों से हटकर खेल के मैदान पर आ जाता है। लोग मिसाइलों और संघर्षों की जगह खिलाड़ियों, गोलों और पेनल्टी बॉक्स की चर्चा करने लगते हैं। खेल कई बार वह काम कर देता है जो हथियार नहीं कर सकते। खेल तनाव को प्रतिस्पर्धा में बदल देता है, जबकि युद्ध उसे विनाश में बदल देता है।

इंसानों को सिर्फ युद्ध की तैयारी ही नहीं, बल्कि शांति का अभ्यास भी करना चाहिए। लोगों को ऐसे अवसरों की जरूरत होती है जो सामूहिक डर नहीं, बल्कि सामूहिक खुशी पैदा करें। उन्हें समय-समय पर यह महसूस करने की जरूरत होती है कि दुनिया अभी भी साझा अनुभवों के जरिए एक साथ आ सकती है।

इसी वजह से FIFA वर्ल्डकप को "दुनिया का सबसे बड़ा शो" कहा जाता है। यह सिर्फ एक खेल प्रतियोगिता नहीं, बल्कि ऐसा आयोजन है जो कुछ समय के लिए पूरी मानवता को एक साझा अनुभव में जोड़ देता है।

FIFA वर्ल्डकप को "दुनिया का सबसे बड़ा शो" कहा जाता है और यह बात बिल्कुल सही है। लेकिन यह सिर्फ ऐसा कार्यक्रम नहीं है जिसे आप टीवी पर बैठकर देखते हैं। यह एक ऐसा अनुभव है जिसमें लोग भावनात्मक रूप से पूरी तरह शामिल हो जाते हैं।

हर चार साल में कुछ हफ्तों के लिए अरबों लोग ऐसे देशों के बारे में सोचने लगते हैं जहां वे कभी नहीं गए। वे ऐसे खिलाड़ियों का समर्थन करने लगते हैं जिनसे वे कभी नहीं मिले। कई लोग रात में अलार्म लगाकर अलग-अलग टाइम ज़ोन में खेले जा रहे मैच देखते हैं।

वर्ल्डकप कुछ समय के लिए ऐसे समुदाय बना देता है जिनकी कोई कानूनी पहचान नहीं होती, कोई सीमा नहीं होती और कोई औपचारिक इतिहास नहीं होता। फिर भी उस समय वे लोगों को बेहद वास्तविक और अपने लगते हैं।

आज की दुनिया में लोगों को जाति, धर्म, राष्ट्र, विचारधारा और राजनीतिक समूहों के आधार पर लगातार बांटा जा रहा है। ऐसे माहौल में जब लाखों-करोड़ों लोग बिना किसी मजबूरी के एक साथ खुशी मनाते हैं, तो यह सिर्फ भावुकता नहीं बल्कि एक शक्तिशाली सामाजिक घटना है। यही वजह है कि FIFA वर्ल्डकप आज भी इतना महत्वपूर्ण है। इसकी अहमियत सिर्फ बड़े स्टेडियमों या अरबों डॉलर के प्रसारण सौदों में नहीं है।

इसकी सबसे बड़ी ताकत यह है कि यह दुनिया के लोगों को, भले ही कुछ समय के लिए, यह एहसास करा देता है कि वे सभी एक ही मानव जाति का हिस्सा हैं और यही उनके बीच सबसे बड़ा साझा संबंध है।

यह भी एक दिलचस्प संयोग है कि यह टूर्नामेंट ऐसे चैनल पर दिखाया जा रहा है जिसका नाम 'Unite8' है, क्योंकि वर्ल्डकप का असली संदेश भी लोगों को जोड़ना और एकजुट करना है।

(यह लेखक के निजी विचार हैं)  

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ईरान युद्ध ने बढ़ाई महंगाई की चिंता: पढ़िए इस सप्ताह का 'हिसाब किताब'

बारिश कम होने का सीधा असर फसलों पर पड़ता है। अब भी हमारी आधी फसल बारिश पर निर्भर है। कम बारिश से उत्पादन कम होने की आशंका बढ़ जाती है।

Last Modified:
Monday, 01 June, 2026
hisabkitabmilind

मिलिंद खांडेकर, वरिष्ठ पत्रकार।

शुक्रवार को शेयर बाज़ार सुबह से ऊपर चढ़ रहा था। अमेरिका और ईरान के बीच डील की खबरें आ रही थीं। क्रूड ऑयल की क़ीमतें गिर रही थीं। लेकिन एक खबर ने बाज़ार का मूड बिगाड़ दिया। मौसम विभाग का अनुमान आया कि इस साल मानसून बारिश सामान्य के मुक़ाबले 90% होने की आशंका है। हम ईरान युद्ध के कारण महंगाई से जूझ रहे हैं और अब बारिश कम होने की आशंका महंगाई की आग में घी डालने का काम कर सकती है।

मौसम विभाग का अनुमान क्या है?

मौसम विभाग हर साल अप्रैल और मई में मॉनसून का पूर्वानुमान जारी करता है। अप्रैल में कहा था कि इस साल सामान्य से 92% बारिश होगी, लेकिन शुक्रवार को इसे घटाकर 90% कर दिया। इतनी कम बारिश की आशंका पिछले दस साल में पहली बार लगाई गई है। मौसम विभाग पिछले 50 साल की मॉनसून बारिश का औसत निकालता है। यह औसत करीब 87 सेंटीमीटर है। फिर बताता है कि औसत से कम बारिश होगी या ज़्यादा। बारिश कम होने की आशंका का कारण है El Niño।

अब ये El Niño क्या है?

भारत से हज़ारों किलोमीटर दूर प्रशांत महासागर (Pacific Ocean) में मॉनसून का रिमोट कंट्रोल है। वहाँ तेज हवा चलती है, तो समुद्र के गर्म पानी को हमारी तरफ़ (हिंद-प्रशांत) धकेलती है। गर्म पानी से बादल बनते हैं, जमकर बारिश होती है। El Niño के साल में हवा नहीं चलती है, तो गर्म पानी हमारी तरफ़ नहीं आता है। बादल कम बनते हैं। बारिश कम होती है। इस साल यही होने की आशंका है।

महंगाई बढ़ने की आशंका

बारिश कम होने का सीधा असर फसलों पर पड़ता है। अब भी हमारी आधी फसल बारिश पर निर्भर है। कम बारिश से उत्पादन कम होने की आशंका बढ़ जाती है। कम उत्पादन का मतलब महंगाई बढ़ने की आशंका रहती है। राहत की बात यह है कि हमारे पास अभी अनाज और पानी का पर्याप्त भंडार है। फिर भी कम बारिश होने से ग्रामीण क्षेत्रों में खपत कम होती है। अब भी हमारे देश की 45% आबादी खेतों में काम करती है। उनकी आमदनी पर भी असर पड़ता है। इससे FMCG, ऑटो और सीमेंट कंपनियों के माल की खपत कम हो सकती है। यही कारण है कि शुक्रवार को शेयर बाज़ार में गिरावट आ गई।

ग़रीबी में आटा गीला

हम अमेरिका-ईरान युद्ध के कारण पहले से परेशान हैं। युद्ध खत्म होने की ख़बरें तो रोज़ आती हैं, लेकिन बात तब बनेगी जब Strait of Hormuz खुलेगा। ईरान और ओमान के बीच यह संकरा जलमार्ग तीन महीनों से बंद है। दुनिया का 20% क्रूड ऑयल यहीं से गुज़रता है। यही वजह है कि पेट्रोल और डीज़ल के भाव बढ़े हैं। युद्ध खत्म होने पर भी सप्लाई सामान्य होने में कुछ महीने लगेंगे। इस पर बारिश के पूर्वानुमान ने ग़रीबी में हमारा आटा गीला कर दिया है।

( यह लेखक के निजी विचार हैं )

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वंदेमातरम् के साथ क्या ‘जय हिन्द’ भी विवाद में आएगा: आलोक मेहता

वंदे मातरम् का इतिहास केवल एक गीत का इतिहास नहीं बल्कि भारत की राजनीति, राष्ट्रवाद और लोकतांत्रिक समझौतों का इतिहास भी है। एक पक्ष इसे राष्ट्रीय गौरव और स्वतंत्रता संघर्ष की आत्मा मानता है।

Last Modified:
Monday, 01 June, 2026
aalokmehta

आलोक मेहता, पद्मश्री, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक।

केरल में सत्ता में आने के बाद राहुल गांधी और सतीशन की कांग्रेस सरकार ने विधानसभा के उद्घाटन सत्र में ही राष्ट्रगीत ‘वंदेमातरम्’ के पूरे 6 अंश को राज्यपाल के लिए तय प्रोटोकॉल नियमानुसार नहीं बजने दिया और इस गीत को आरएसएस का बताए जाने पर कई आपत्तियों के साथ सवाल भी खड़े हुए हैं। एक महत्वपूर्ण सवाल यह भी उठा है कि अब अन्य राज्यों और 2029 में केंद्र में सत्ता के लिए ‘जय हिन्द’ और ‘हिंदुस्तान जिंदाबाद’ के नारों को भी राहुल गांधी की टीम सार्वजनिक कार्यक्रमों पर बंद करवा देगी?

आखिर इनमें तो सीधे हिन्द और हिन्दू शब्दों का उपयोग है। और यह आशंका आज मेरी ही नहीं है, बल्कि जनवरी 1946 में महात्मा गांधी ने गुवाहाटी के एक भाषण में व्यक्त की थी। महात्मा गांधी ने कहा था कि “कांग्रेस की स्थापना के समय से ही वंदेमातरम् गाया जा रहा है। जो लोग इसका विरोध कर त्याग करने को कह रहे हैं, वे एक दिन जय हिन्द को भी त्याग देंगे। वंदेमातरम् का बहिष्कार नहीं होना चाहिए।”

केरल विधानसभा में राज्यपाल के अभिभाषण से पहले पुलिस बैंड द्वारा ‘वंदे मातरम्’ को पूरा न बजाकर केवल शुरुआती दो छंद (पुराना/संक्षिप्त हिस्सा) बजाने पर विवाद छिड़ा है। राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ आर्लेकर ने इस बात पर नाराजगी जताई कि जब वह संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा (यूडीएफ) सरकार के नीतिगत अभिभाषण के लिए विधानसभा में मौजूद थे, तब ‘वंदे मातरम्’ पूरा नहीं गाया गया।

उन्होंने कहा कि “जब राज्यपाल ऐसे कार्यक्रमों में उपस्थित हों, तब उचित प्रोटोकॉल का पालन किया जाना चाहिए।” राज्यपाल ने विधानसभा से लौटने के बाद लोक भवन में पत्रकारों से कहा कि यह पहले से तय था कि जब भी राज्यपाल सदन में मौजूद हों, तब ‘वंदे मातरम्’ पूरा गाया जाना चाहिए। नीतिगत अभिभाषण से पहले और बाद में एक बैंड दल ने ‘वंदे मातरम्’ के शुरुआती अंतरे प्रस्तुत किए। गौरतलब है कि केंद्र सरकार ने इस वर्ष के प्रारंभ में ही सरकार के सभी संस्थानों और राज्य सरकारों के लिए दिशा-निर्देश जारी कर आधिकारिक कार्यक्रमों में राष्ट्रगीत वंदे मातरम् के पूरे छह अंश बजाना अनिवार्य कर दिया है।

केरल के नए मुख्यमंत्री सतीशन ने इस मामले में संवाददाताओं के सवालों का जवाब देते हुए कहा कि कांग्रेस और उसका यूडीएफ गठबंधन एक राजनीतिक विचारधारा के ढाँचे के भीतर काम करते हैं और वे पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व के फैसलों के अनुसार संचालित होते हैं। उन्होंने कहा कि इस मुद्दे पर पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व का स्पष्ट रुख है और वही गठबंधन पर भी लागू होता है। मुख्यमंत्री ने यह भी कहा कि ‘वंदे मातरम्’ को पूरा गाना अनिवार्य नहीं है, क्योंकि संसद ने इस संबंध में कोई कानून पारित नहीं किया है।

सवाल यह है कि क्या कांग्रेस पार्टी राष्ट्रगीत, राष्ट्रीय चिन्ह अथवा भारत सरकार द्वारा निर्धारित दिशा-निर्देशों का विरोध इस हद तक करेगी और सरकार की संरक्षक बनी मुस्लिम लीग के निर्देशों का पालन करेगी? मुस्लिम लीग तो आजादी से पहले भी वंदेमातरम् का विरोध और मुस्लिम नागरिकों के लिए केवल मुस्लिम उम्मीदवार को वोट देने के अधिकार की मांग कर रही थी। संविधान निर्माताओं ने इसे ठुकरा दिया था।

शायद राहुल गांधी और उनकी सलाहकार मंडली इस बात को भी याद नहीं रखना चाहती कि बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा लिखित गीत ‘वन्देमातरम्’ 1896 में कांग्रेस अधिवेशन में ही पहली बार गाया गया। रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने पहली बार इसे कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में गाया। इसके बाद यह पूरे देश में प्रसिद्ध हो गया। उन्हीं टैगोर के शांति निकेतन में कुछ समय इंदिरा गांधी ने शिक्षा भी ली।

1905 के बंगाल विभाजन आंदोलन के समय ‘वंदे मातरम्’ ब्रिटिश शासन के विरोध का प्रमुख नारा बन गया। कांग्रेस कार्यकर्ता इसका प्रयोग करते थे। ब्रिटिश सरकार कई जगह इसके सार्वजनिक प्रयोग पर रोक लगाती थी। कांग्रेस अधिवेशनों के अलावा आजादी के आंदोलन के दौरान इस गीत के प्रयोग के काफी उदाहरण मौजूद हैं। लाला लाजपत राय ने लाहौर से जिस ‘जर्नल’ का प्रकाशन शुरू किया था, उसका नाम ‘वन्दे मातरम्’ रखा। अंग्रेजों की गोली का शिकार बनकर दम तोड़ने वाली आजादी की दीवानी मातंगिनी हाजरा की जिह्वा पर आखिरी शब्द “वन्दे मातरम्” ही थे।

सन् 1907 में भीकाजी कामा ने जब जर्मनी के स्टुटगार्ट में तिरंगा फहराया, तो उसके मध्य में “वन्दे मातरम्” ही लिखा हुआ था। आर्य प्रिंटिंग प्रेस, लाहौर तथा भारतीय प्रेस, देहरादून से सन् 1929 में प्रकाशित काकोरी के शहीद राम प्रसाद बिस्मिल की प्रतिबंधित पुस्तक ‘क्रांति गीतांजलि’ में पहला गीत ‘मातृ-वन्दना’ वन्दे मातरम् ही था।

‘वंदे मातरम्’ केवल एक गीत नहीं, बल्कि भारत के राष्ट्रवादी आंदोलन का एक प्रमुख प्रतीक रहा है। इसके समर्थन और विरोध का इतिहास भारत की राजनीति, सांप्रदायिक संबंधों, स्वतंत्रता आंदोलन और आधुनिक राजनीतिक विमर्श से गहराई से जुड़ा हुआ है। यह गीत जहाँ एक ओर लाखों स्वतंत्रता सेनानियों के लिए प्रेरणा बना, वहीं कुछ मुस्लिम नेताओं और मुस्लिम लीग ने राष्ट्रगीत की कुछ पंक्तियों पर आपत्ति जताई, क्योंकि उनमें भारत माता को देवी स्वरूप में प्रस्तुत किया गया था। फिर भी आजादी के बाद 1950 में इसे राष्ट्रीय गीत का दर्जा मिला।

डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने संविधान सभा को संबोधित करते हुए कहा— “शब्दों व संगीत की वह रचना, जिसे जन गण मन से संबोधित किया जाता है, भारत का राष्ट्रगान है; बदलाव के ऐसे विषय, अवसर आने पर सरकार अधिकृत करे और वन्दे मातरम् गान, जिसने कि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में ऐतिहासिक भूमिका निभाई है, को जन गण मन के समकक्ष सम्मान व पद मिले। मैं आशा करता हूँ कि यह सदस्यों को संतुष्ट करेगा।” (भारतीय संविधान परिषद, खंड 12, 24 जनवरी 1950) शुरुआती दौर में कांग्रेस पार्टी ने वंदे मातरम् को व्यापक रूप से अपनाया।

कुछ मुस्लिम नेताओं और संगठनों ने इस पर आपत्ति जतानी शुरू की। उनकी मुख्य आपत्तियाँ थीं कि गीत में भारत माता को देवी स्वरूप में दिखाया गया और कुछ पंक्तियों में देवी-पूजा जैसी व्याख्या संभव थी। इसी कारण कांग्रेस नेतृत्व ने समझौता करने की कोशिश की। यानी कांग्रेस ने समर्थन और राजनीतिक समझौते दोनों किए।

दूसरी तरफ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने प्रारंभ से वंदे मातरम् को सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का प्रमुख प्रतीक माना। संघ के दृष्टिकोण में यह राष्ट्रीय एकता का गीत है। इसका विरोध तुष्टीकरण की राजनीति का परिणाम माना गया। इसे व्यापक राष्ट्रवादी पहचान से जोड़ा गया। संघ से जुड़े संगठनों ने स्कूलों, शाखाओं और कार्यक्रमों में इसका उपयोग जारी रखा। उसकी भारतीय जनसंघ पार्टी ने वंदे मातरम् को अनिवार्य राष्ट्रीय प्रतीक के रूप में समर्थन दिया।

फिर भारतीय जनता पार्टी ने वंदे मातरम् को लगातार राष्ट्रीय पहचान से जोड़ा। नेताओं ने कई बार कहा कि वंदे मातरम् राष्ट्रभक्ति का प्रतीक है। इसका विरोध राजनीतिक तुष्टीकरण है। इसे स्कूलों और सरकारी कार्यक्रमों में बढ़ावा मिलना चाहिए। यह प्रतीकात्मक मातृभूमि की स्तुति है।

वंदे मातरम् का इतिहास केवल एक गीत का इतिहास नहीं, बल्कि भारत की राजनीति, राष्ट्रवाद, सांप्रदायिक संबंधों और लोकतांत्रिक समझौतों का इतिहास भी है। एक पक्ष इसे राष्ट्रीय गौरव और स्वतंत्रता संघर्ष की आत्मा मानता है। दूसरा पक्ष कहता है कि राष्ट्रवाद को किसी एक सांस्कृतिक प्रतीक तक सीमित नहीं किया जाना चाहिए।

अब 26 अक्टूबर 2025 को ‘मन की बात’ कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘वंदेमातरम्’ गीत के इतिहास की देशवासियों को फिर से याद दिलाई और राष्ट्रीय गीत ‘वंदेमातरम्’ के 150 वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष्य में 7 नवंबर से भारत सरकार की ओर से एक वर्ष तक अलग-अलग कार्यक्रमों का आयोजन करने का निर्णय लिया। इन आयोजनों के माध्यम से देश भर में ‘वंदे मातरम्’ का पूर्ण गान आयोजित हो रहा है, जिससे देश की युवा पीढ़ी ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ के विचार को आत्मसात कर पाए। संसद में वन्दे मातरम् पर लगभग 10 घंटे की चर्चा हुई, जिसमें प्रधानमंत्री एवं अन्य सदस्यों ने भाग लिया।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि “वंदे मातरम् हजारों वर्ष की सांस्कृतिक ऊर्जा भी थी। उसमें आजादी का जज्बा भी था और आजाद भारत का विजन भी था। बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने उस समय समाज के एक वर्ग की हीन भावना को भी झकझोरने के लिए और सामर्थ्य का परिचय कराने के लिए वंदे मातरम् में भारत के सामर्थ्यशाली रूप को प्रकट करते हुए लिखा था कि भारत माता ज्ञान और समृद्धि की देवी भी हैं और दुश्मनों के सामने अस्त्र-शस्त्र धारण करने वाली चंडी भी हैं। वंदे मातरम् सिर्फ गीत या भावगीत नहीं, यह हमारे लिए प्रेरणा है, राष्ट्र के प्रति कर्तव्यों के लिए हमें झकझोरने वाला काम है और इसलिए हमें निरंतर इसको करते रहना होगा।

हम आत्मनिर्भर भारत का सपना लेकर चल रहे हैं, उसको पूरा करना है। वंदे मातरम् हमारी प्रेरणा है। हम स्वदेशी आंदोलन को ताकत देना चाहते हैं। समय बदला होगा, रूप बदले होंगे, लेकिन महात्मा गांधी ने जो भाव व्यक्त किया था, उस भाव की ताकत आज भी मौजूद है और वंदे मातरम् हमें जोड़ता है। देश के महापुरुषों का सपना था स्वतंत्र भारत का, देश की आज की पीढ़ी का सपना है समृद्ध भारत का। आजाद भारत के सपने को सींचा था वंदे मातरम् की भावना ने और समृद्ध भारत के सपने को भी वही भावना सींचेगी।”

प्रधानमंत्री ने संकल्प के रूप में कहा कि वंदे मातरम् की भावनाओं को लेकर हमें आगे चलना है। हमें आत्मनिर्भर भारत बनाना है और 2047 में देश विकसित भारत बनकर रहे। अगर आजादी के 50 साल पहले कोई आजाद भारत का सपना देख सकता था, तो 25 साल पहले हम भी समृद्ध भारत और विकसित भारत का सपना देख सकते हैं और इस सपने के लिए अपने आप को खपा भी सकते हैं। इसी मंत्र और इसी संकल्प के साथ वंदे मातरम् हमें प्रेरणा देता रहे। वंदे मातरम् का हम ऋण स्वीकार करें, वंदे मातरम् की भावनाओं को लेकर चलें, देशवासियों को साथ लेकर चलें, हम सब मिलकर चलें और इस सपने को पूरा करें।

( यह लेखक के निजी विचार हैं )

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हिंदी पत्रकारिता दिवस: मीडिया के महासागर में सागर मंथन का दौर

30 मई हिंदी पत्रकारिता दिवस हमें उस गौरवशाली परंपरा की याद दिलाता है, जिसने स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर आज के डिजिटल युग तक भारतीय समाज और लोकतंत्र को दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

Last Modified:
Saturday, 30 May, 2026
Vinod Agnihotri Hindi Journalism Day

विनोद अग्निहोत्री, सलाहकार संपादक, अमर उजाला समूह

30 मई हिंदी पत्रकारिता दिवस केवल एक स्मृति दिवस नहीं है, बल्कि हिंदी पत्रकारिता की उस गौरवशाली परंपरा को याद करने का अवसर है, जिसने स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर डिजिटल युग तक भारतीय समाज, लोकतंत्र और जनचेतना को दिशा देने का काम किया है। समय के साथ पत्रकारिता के स्वरूप, माध्यम और चुनौतियां बदली हैं, लेकिन उसका मूल उद्देश्य जनता के सरोकारों को आवाज देना और सत्ता से सवाल पूछना ही रहा है।

एक दौर था जब पत्रकारिता का अर्थ केवल अखबारों और पत्रिकाओं तक सीमित था। इलेक्ट्रॉनिक पत्रकारिता के नाम पर रेडियो और बाद में दूरदर्शन के लिए समाचार संकलित करने वाले संवाददाता भी इसमें शामिल हो गए, लेकिन पत्रकारिता का केंद्र प्रिंट मीडिया ही था। आजादी से पहले पत्रकारिता मुख्य रूप से दो धाराओं में विभाजित थी—अंग्रेजी पत्रकारिता, जो आमतौर पर सत्ता के करीब मानी जाती थी, और हिंदी व अन्य भारतीय भाषाओं की पत्रकारिता, जिसका बड़ा हिस्सा स्वतंत्रता आंदोलन और जनता के बुनियादी सवालों से जुड़ा हुआ था।

उस दौर में पत्रकारिता जोखिम भरा काम थी। पत्रकार, संपादक, लेखक और स्वतंत्रता सेनानी अक्सर एक ही भूमिका में दिखाई देते थे। महात्मा गांधी सहित अनेक राष्ट्रीय नेताओं ने अखबारों और पत्रिकाओं को जनजागरण का माध्यम बनाया। अंग्रेज सरकार ने कई बार समाचार पत्रों पर प्रतिबंध लगाए, अंक जब्त किए और पत्रकारों को जेल तक भेजा, लेकिन इसके बावजूद पत्रकारिता जनता की आवाज बनी रही।

आजादी के बाद पत्रकारिता की भूमिका बदली। राष्ट्र निर्माण के दौर में लोकतांत्रिक मूल्यों और संविधान की भावना को समाज तक पहुंचाने की जिम्मेदारी राजनीति के साथ-साथ पत्रकारिता ने भी निभाई। शुरुआती दशकों में पत्रकारिता सरकारों की कमियों को सामने लाने के साथ-साथ विकास और जनहित के मुद्दों को भी प्रमुखता देती रही। जनता के बीच उसकी विश्वसनीयता इतनी मजबूत थी कि सत्ता प्रतिष्ठान उसके नैतिक दबाव को महसूस करता था।

धीरे-धीरे पत्रकारिता लोकतंत्र के उस चौथे स्तंभ के रूप में स्थापित हुई, जिस पर जनता को सबसे अधिक भरोसा होने लगा। साठ और सत्तर के दशक में किसानों, मजदूरों और छात्रों के आंदोलनों, गैर-कांग्रेसी राजनीति के उभार, जेपी आंदोलन और फिर आपातकाल ने पत्रकारिता को नई दिशा दी। आपातकाल के दौरान प्रेस पर सेंसरशिप लगाई गई, कई पत्रकारों को जेल जाना पड़ा और अनेक प्रकाशनों को कठिन दौर से गुजरना पड़ा। लेकिन इसी संघर्ष ने प्रेस की स्वतंत्रता के महत्व को और अधिक मजबूत किया।

आपातकाल के बाद खोजी पत्रकारिता और मैदानी रिपोर्टिंग का दौर आया। पत्रकारिता महानगरों से निकलकर कस्बों और गांवों तक पहुंची। हिंदी पत्रकारिता ने इसी दौर में अपने प्रभाव का व्यापक विस्तार किया। जनसत्ता, नवभारत टाइम्स, हिंदुस्तान, नई दुनिया, अमर उजाला, दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर और राजस्थान पत्रिका जैसे समाचार पत्रों ने हिंदी पत्रकारिता को नई पहचान दी। जनसरोकारों से जुड़े मुद्दों, खोजी रिपोर्टिंग और सामाजिक हस्तक्षेप ने पाठकों का भरोसा मजबूत किया। कई पत्रकारों ने सत्ताधीशों, माफियाओं और प्रभावशाली समूहों के खिलाफ लिखने की कीमत भी चुकाई, लेकिन पत्रकारिता की साख लगातार बढ़ती रही।

हालांकि 1980 और 1990 के दशक का सामाजिक-राजनीतिक उथल-पुथल भरा दौर पत्रकारिता को भी प्रभावित किए बिना नहीं रहा। मंडल और मंदिर की राजनीति, वैचारिक ध्रुवीकरण और बदलते राजनीतिक समीकरणों का असर मीडिया पर भी दिखाई देने लगा। इसी दौरान आर्थिक उदारीकरण आया और पत्रकारिता के सामने एक नई चुनौती खड़ी हो गई। मीडिया संस्थान धीरे-धीरे उद्योग और व्यवसाय में बदलने लगे। समाचारों की प्रस्तुति, प्राथमिकताओं और कार्य संस्कृति में बदलाव आने लगा। पत्रकारिता का मिशन धीरे-धीरे पेशेवर मीडिया उद्योग में परिवर्तित होने लगा।

निजी समाचार चैनलों के आगमन ने मीडिया की पहुंच और प्रभाव को अभूतपूर्व रूप से बढ़ाया। लोगों की रुचि पढ़ने से ज्यादा देखने और सुनने की ओर बढ़ी। लेकिन इसके साथ टीआरपी, विज्ञापन और प्रतिस्पर्धा का दबाव भी बढ़ा। कई बार खबरों की गंभीरता की जगह सनसनी और तात्कालिकता को अधिक महत्व मिलने लगा। इससे पत्रकारिता की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठने शुरू हुए।

इक्कीसवीं सदी में इंटरनेट और सोशल मीडिया ने मीडिया जगत को पूरी तरह बदल दिया। वेबसाइट, यूट्यूब, फेसबुक, एक्स, इंस्टाग्राम और व्हाट्सऐप जैसे मंचों ने सूचना के प्रसार को लोकतांत्रिक बना दिया। अब आम नागरिक भी सूचना और विचारों के प्रसार में भागीदारी करने लगा। इससे पारंपरिक मीडिया का एकाधिकार टूटा और अनेक स्वतंत्र पत्रकारों तथा वैकल्पिक मंचों को नई जगह मिली।

लेकिन इस परिवर्तन के साथ नई चुनौतियां भी सामने आईं। फेक न्यूज, दुष्प्रचार, आधी-अधूरी सूचनाएं और वैचारिक ध्रुवीकरण ने मीडिया की विश्वसनीयता को प्रभावित किया। पिछले वर्षों में राजनीतिक और सामाजिक ध्रुवीकरण का असर न्यूज रूम तक दिखाई देने लगा। पत्रकारों और मीडिया संस्थानों को वैचारिक खेमों में बांटकर देखा जाने लगा। ऐसे माहौल में निष्पक्षता, तथ्यपरकता और संतुलन की कसौटी पहले से अधिक महत्वपूर्ण हो गई है।

अब कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) ने मीडिया के सामने नई संभावनाएं और नई चुनौतियां दोनों खड़ी कर दी हैं। समाचार लेखन, अनुवाद, वीडियो निर्माण और कंटेंट वितरण में AI का उपयोग बढ़ रहा है। वहीं डीपफेक, फर्जी सामग्री और सूचना की प्रामाणिकता से जुड़े सवाल भी सामने आ रहे हैं। ऐसे समय में पत्रकारिता की विश्वसनीयता का आधार तकनीक नहीं, बल्कि संपादकीय विवेक, तथ्य जांच और जनहित के प्रति प्रतिबद्धता ही रहेंगे।

आज हिंदी पत्रकारिता ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां उसके सामने अवसर भी हैं और चुनौतियां भी। तकनीक ने उसकी पहुंच को पहले से कहीं अधिक व्यापक बनाया है, लेकिन विश्वसनीयता की कसौटी भी उतनी ही कठोर हो गई है। मीडिया के महासागर में यह सचमुच सागर मंथन का दौर है। इस मंथन में विष भी है और अमृत भी। यह पत्रकारिता और पत्रकारों पर निर्भर करेगा कि वे किस दिशा का चयन करते हैं।

हिंदी पत्रकारिता दिवस पर यह स्मरण करना जरूरी है कि माध्यम बदल सकते हैं, तकनीक बदल सकती है, लेकिन पत्रकारिता का मूल धर्म नहीं बदलता। सत्य, जनसरोकार, निष्पक्षता और लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता ही उसकी सबसे बड़ी शक्ति है। आने वाले समय में हिंदी पत्रकारिता की प्रासंगिकता और प्रतिष्ठा भी इन्हीं मूल्यों से तय होगी।

(यह लेखक के निजी विचार हैं।)
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सरकारी उपेक्षा से हिंदी पत्रकारिता की गिरती साख

किसान, मजदूर और आम आदमी का एक सशक्त हथियार रही हिंदी पत्रकारिता आज बाजारीकरण, आर्थिक संकट और घटती विश्वसनीयता जैसे दौर से गुजर रही है।

Last Modified:
Saturday, 30 May, 2026
Jitendra Bachchan Hindi Journalism Day

जितेन्द्र बच्चन, वरिष्ठ पत्रकार।।

देश में सबसे अधिक हिंदी भाषा में ही समाचार पत्र-पत्रिकाएं प्रकाशित होते हैं और समाचार चैनल भी सबसे ज्यादा हैं। हिंदी पत्रकारिता के बलबूते ही पत्र-पत्रिकाएं व चैनल लाखों-करोड़ों का कारोबार करते हैं। इसके बावजूद उसकी वह धाक नहीं बन पाई जो अंग्रेजी अखबारों या मैग्जींस की है।

किसान, मजदूर और आम आदमी का एक सशक्त हथियार रही हिंदी पत्रकारिता आज सरकारी उपेक्षा और बाजारीकरण, आर्थिक संकट व घटती विश्वसनीयता जैसे दौर से गुजर रही है। अपने ही देश में हिंदी पत्रकारिता दोयम दर्जे की बनी हुई है और अब तो दिन-प्रतिदिन इसकी साख गिरती जा रही है।

हिंदी पत्रकारिता करने वाले 30 मई को हिंदी पत्रकारिता दिवस पर दूसरी भाषाओं को खूब कोसते हैं, लेकिन यही कोसने वाले लोग हिंदी के पत्रकारों को नौकरी नहीं देना चाहते। हिंदी पत्रकारिता के नाम पर पत्रकार एवं सरकार बड़े-बड़े आयोजन तो करते हैं, लेकिन शोहरत अंग्रेजी में छोटे-मोटे कार्यक्रम करने वाले एडिटर के खाते में जाती है।

राज्य और केंद्र सरकारों द्वारा जारी किए जाने वाले विज्ञापनों में अक्सर अंग्रेजी के बड़े अखबारों को प्राथमिकता दी जाती है। क्षेत्रीय और हिंदी के छोटे समाचार पत्रों को कम विज्ञापन या कम दरें मिलती हैं, जिससे उनका आर्थिक ढांचा चरमरा जाता है। किसी सार्वजनिक बड़े मंच पर जब किसी पत्रकार को स्थान देना होगा या संवाद में हिस्सा लेना होता है तो अंग्रेजी वाले साहब को अहमियत दी जाती है। मान्यता देने के मामले में भी हिंदी के पत्रकारों की अनदेखी की जाती है। इसी उपेक्षा के चलते आज हिंदी पत्रकारिता दोयम दर्जे की बन चुकी है।

यही कारण है कि सरकारी न्यूज चैनल या पत्र-पत्रिकाओं में संवाददाता नियुक्त करते समय या संपादकीय विभाग में कोई नौकरी देते वक्त उसे साक्षात्कार अंग्रेजी में देना पड़ता है। कितनी अजीब बात है कि काम हिंदी में करना है लेकिन सरकार हिंदी को महत्व न देकर अंग्रेजी को महत्व देती है। क्यों, यह एक बड़ा सवाल है।

बहुत से ऐसे पत्रकार हैं जिन्हें हिंदी भाषा का अच्छा ज्ञान है। उनका अनुभव बोलता है लेकिन अंग्रेजी में कमजोर होने के नाते सरकारी अधिकारी उन्हें हेय दृष्टि से देखते हैं। उनको महत्व देने के बजाय उनका माखौल उड़ाया जाता है। हिंदी पत्रकारिता करने वालों को दलाल और चापलूस बताया जाता है।

कितनी अजीब विडंबना है कि अपने ही देश में हिंदी पत्रकारिता आज अनाथ जैसी हालत में है। इसकी वकालत करने वाले को कम पढ़ा-लिखा समझा जाता है। नतीजतन हिंदी भाषा बहुल्य देश होते हुए भी आज 195 राष्ट्रों की सूची में हिंदी पत्रकारिता काफी निचले स्थान पर है।

हिंदी पत्रकारिता करने वाले पत्रकारों और प्रकाशनों की बहुत ही दयनीय स्थिति है। हैरानी की बात तो यह है कि इन्हीं हिंदी चैनलों और समाचार पत्र–पत्रिकाओं की बदौलत जो राजनेता, व्यापारी और अभिनेता आसमान छू रहे हैं और ताकतवर बने हुए हैं, वही वक्त आने पर हिंदी पत्रकारों को भूलकर अंग्रेजी के चैनलों व अखबारों को ज्यादा पूछते हैं। इससे अधिक उपेक्षा और क्या होगी।

और अब तो हिंदी पत्रकारिता के सामने विश्वसनीयता का संकट भी खड़ा हो चुका है। सोशल मीडिया के इस दौर में अफवाहों और फर्जी खबरों की बाढ़-सी आ गई है। अंग्रेजी वाली ब्रेकिंग न्यूज (सबसे पहले खबर) की बराबरी करने की अंधी दौड़ में ‘सच’ पीछे छूट जाता है। सनसनीखेज बनाने की होड़ में तथ्यों की पुष्टि किए बिना ही खबरें परोसी जा रही हैं, जिससे हिंदी पत्रकारिता के सिद्धांतों और उसकी साख को लगातार नुकसान पहुंच रहा है।

व्यावसायिक दबावों और संपादकीय स्वतंत्रता के बीच संतुलन बनाना आज हिंदी पत्रकारिता के सामने एक बड़ी चुनौती बन चुकी है। कुछ मीडिया घरानों ने इसे एक लाभ कमाने वाला व्यवसाय बना दिया है। राजनीतिक हित साधने लगे हैं। टीआरपी और ज्यादा क्लिक्स पाने के लिए गंभीर मुद्दों को दरकिनार कर अंग्रेजी वालों की तरह सनसनीखेज और सतही खबरों को अधिक महत्व देने लगे हैं। इसके चलते कई बार खबरें निष्पक्ष नहीं लगती।

सोशल मीडिया, यूट्यूब और एआई आधारित प्लेटफॉर्म्स ने समाचारों के उपयोग का तरीका पूरी तरह बदल दिया है। वेब पत्रकारिता की भाषा व्याकरण, वर्तनी और हिंदी के मूल स्वरूप को नष्ट करने लगी है। ऐसे में जहां हिंदी पत्रकारिता को मौजूदा नई चुनौतियों का विश्लेषण करने की जरूरत है, वही सरकार को भी हिंदी के पत्रकारों को पूर्ण अहमियत देनी होगी। तभी हिंदी पत्रकारिता को वह स्थान मिलेगा, जो उसकी जरूरत ही नहीं अधिकार भी है

(यह लेखक के निजी विचार हैं।)

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बदलते दौर में हिंदी पत्रकारिता: चुनौतियां, बाजार और विश्वसनीयता का संकट

पहले खबरों की पुष्टि और तथ्यों की जांच के बाद प्रकाशन होता था, अब पहले खबर चलाने की होड़ अधिक दिखाई देती है। इसी जल्दबाज़ी में कई बार अधूरी या गलत सूचनाएं भी लोगों तक पहुंच जाती हैं।

Last Modified:
Saturday, 30 May, 2026
Rahul Mahajan Hindi Journalism Day

राहुल महाजन, हेड ऑफ कॉरपोरेट अफेयर्स, बेनेट कोलमैन एंड कंपनी लिमिटेड।।

हिंदी पत्रकारिता का इतिहास देश की सामाजिक और राजनीतिक चेतना से जुड़ा रहा है। कभी यह जनसरोकारों की आवाज मानी जाती थी। अखबार केवल खबरें नहीं छापते थे, बल्कि समाज में बहस खड़ी करते थे, सत्ता से सवाल पूछते थे और आम लोगों की समस्याओं को सामने लाते थे। आज तस्वीर बदल चुकी है। तकनीक, बाजार और राजनीति के दबाव ने पत्रकारिता के स्वरूप को काफी हद तक बदल दिया है।

डिजिटल दौर ने खबरों की दुनिया को पूरी तरह बदल दिया है। अब सूचना का प्रवाह इतना तेज हो गया है कि हर व्यक्ति अपने मोबाइल पर हर समय नई खबर देखना चाहता है। सोशल मीडिया, यूट्यूब और डिजिटल प्लेटफॉर्म ने पारंपरिक मीडिया को पीछे छोड़ने की चुनौती खड़ी कर दी है। पहले खबरों की पुष्टि और तथ्यों की जांच के बाद प्रकाशन होता था, अब पहले खबर चलाने की होड़ अधिक दिखाई देती है। इसी जल्दबाज़ी में कई बार अधूरी या गलत सूचनाएं भी लोगों तक पहुंच जाती हैं।

फेक न्यूज आज पत्रकारिता के सामने सबसे बड़ी समस्या बन चुकी है। सोशल मीडिया पर अफवाहें और भ्रामक सूचनाएं इतनी तेजी से फैलती हैं कि कई बार सच पीछे छूट जाता है। इससे मीडिया की विश्वसनीयता पर भी असर पड़ा है। लोगों के मन में यह सवाल लगातार गहराता जा रहा है कि किस खबर पर भरोसा किया जाए और किस पर नहीं।

एक बड़ा बदलाव पत्रकारिता की कार्यशैली में भी आया है। पहले पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता था क्योंकि उसका काम सत्ता से जवाब मांगना और जनता की आवाज को मजबूती देना था। लेकिन अब यह धारणा मजबूत हुई है कि मीडिया का एक हिस्सा सरकार से असहज सवाल पूछने से बचता है। कई पत्रकार और मीडिया संस्थान खुलकर राजनीतिक विचारधाराओं के साथ खड़े दिखाई देते हैं। इससे पत्रकारिता की निष्पक्षता पर सवाल उठने लगे हैं।

आज दर्शक भी खबरों को अक्सर चैनलों और अखबारों की राजनीतिक छवि के आधार पर देखने लगे हैं। बहसें कई बार तथ्यों से ज्यादा आरोप-प्रत्यारोप और शोर तक सीमित रह जाती हैं। इसका असर लोकतांत्रिक संवाद पर भी पड़ रहा है। जब मीडिया का ध्यान जनहित से हटकर राजनीतिक खेमेबंदी पर केंद्रित होने लगे, तब आम लोगों के वास्तविक मुद्दे पीछे छूट जाते हैं।

दूसरी ओर मीडिया संस्थानों के सामने आर्थिक संकट भी गहराता जा रहा है। प्रिंट मीडिया की आय पहले बड़े पैमाने पर विज्ञापनों पर निर्भर थी, लेकिन अब विज्ञापन का बड़ा हिस्सा डिजिटल कंपनियों की ओर चला गया है। ऐसे में कई संस्थानों के सामने कम खर्च में काम चलाने की मजबूरी है।

खर्च घटाने की इस दौड़ का असर न्यूजरूम पर साफ दिखाई देता है। कर्मचारियों की संख्या कम की जा रही है, छोटे शहरों के दफ्तर बंद हो रहे हैं और एक पत्रकार से कई तरह का काम लिया जा रहा है। रिपोर्टिंग के साथ वीडियो बनाना, संपादन करना और सोशल मीडिया संभालना अब सामान्य बात हो गई है। इससे पत्रकारों पर दबाव बढ़ा है और खबरों की गहराई कम हुई है।

खोजी पत्रकारिता और जमीनी रिपोर्टिंग सबसे अधिक प्रभावित हुई है। गांव, किसान, मजदूर और छोटे शहरों की समस्याएं पहले की तुलना में कम दिखाई देती हैं क्योंकि ऐसी रिपोर्टिंग में समय और संसाधन दोनों अधिक लगते हैं। इसके बजाय त्वरित, सनसनीखेज और ज्यादा क्लिक पाने वाली खबरों को प्राथमिकता मिल रही है।

इसके बावजूद हिंदी पत्रकारिता की संभावनाएं खत्म नहीं हुई हैं। हिंदी भाषी पाठकों और डिजिटल दर्शकों की संख्या लगातार बढ़ रही है। छोटे शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों में इंटरनेट की पहुंच ने नए पाठक तैयार किए हैं। स्वतंत्र डिजिटल प्लेटफॉर्म और वैकल्पिक पत्रकारिता के नए प्रयोग भी सामने आ रहे हैं, जो गंभीर और तथ्य आधारित रिपोर्टिंग करने की कोशिश कर रहे हैं।

पत्रकारिता का मूल उद्देश्य आज भी वही है-जनता तक सही और संतुलित जानकारी पहुंचाना। तकनीक और बाजार के इस दौर में सबसे बड़ी चुनौती यही है कि पत्रकारिता अपनी विश्वसनीयता और स्वतंत्रता को कैसे बचाए रखे। मीडिया यदि सत्ता, बाज़ार और राजनीतिक खेमेबंदी से ऊपर उठकर जनता के सवालों को केंद्र में रखे, तभी उसका लोकतांत्रिक महत्व बना रहेगा।

(यह लेखक के निजी विचार हैं।)

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