डिजिटल और सोशल मीडिया के दौर में, जहां क्लिकबेट और वायरल कंटेंट का बोलबाला है, वरिष्ठ पत्रकार प्रभु चावला ने दिखाया है कि मजबूत, विश्वसनीय और गहन कंटेंट की अहमियत आज भी कायम है।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
डिजिटल और सोशल मीडिया के दौर में जहां क्लिकबेट हेडलाइंस, वायरल वीडियो और कुछ सेकंड के कंटेंट की भरमार है, वहीं वरिष्ठ पत्रकार प्रभु चावला ने एक बार फिर यह साबित करने की कोशिश की है कि मजबूत, विश्वसनीय और गहराई वाले कंटेंट की अहमियत आज भी बरकरार है।
प्रभु चावला ने हाल ही में अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर अपनी चर्चित स्टोरी "Awesome Foursome Rattles BJP" को दोबारा साझा करते हुए लिखा, "One million views and still counting. Credible Content is still the King." उन्होंने यह भी बताया कि यह लेख डिजिटल और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर मिलाकर 15 लाख से अधिक व्यूज हासिल कर चुका है।
यह लेख दक्षिण भारत के चार प्रमुख नेताओं- वी. डी. सतीशन, ए. रेवंत रेड्डी, डी. के. शिवकुमार और जोसेफ विजय की राजनीतिक एकजुटता और उसके राष्ट्रीय राजनीति पर संभावित प्रभाव पर आधारित था। लेकिन इस स्टोरी की चर्चा केवल इसके राजनीतिक विश्लेषण के कारण नहीं हुई, बल्कि इसलिए भी हुई क्योंकि इसने दिखाया कि दर्शक आज भी गंभीर और विश्लेषणात्मक कंटेंट पढ़ना चाहते हैं।
क्या कहती है प्रभु चावला की पोस्ट?
प्रभु चावला ने लिखा कि उन्हें यह लेख दोबारा साझा करने के लिए खेद है, लेकिन इसकी पहुंच और लोकप्रियता यह साबित करती है कि अच्छी पत्रकारिता की मांग खत्म नहीं हुई है। उनका संदेश साफ था- विश्वसनीय और रिसर्च आधारित कंटेंट आज भी दर्शकों को आकर्षित कर सकता है।
वायरल दौर में भी गहराई वाले कंटेंट की मांग
पिछले कुछ वर्षों में मीडिया इंडस्ट्री में यह धारणा मजबूत हुई है कि दर्शक केवल छोटे वीडियो, रील्स और त्वरित अपडेट्स देखना चाहते हैं। लेकिन समय-समय पर कुछ ऐसे लेख, इंटरव्यू और विश्लेषण सामने आते हैं जो इस धारणा को चुनौती देते हैं।
प्रभु चावला की यह स्टोरी भी उसी श्रेणी में दिखाई देती है। यह कोई सनसनीखेज खुलासा नहीं था, न ही किसी विवादित बयान पर आधारित खबर थी। इसके बजाय यह भारतीय राजनीति में दक्षिण भारत की बढ़ती भूमिका और संघीय ढांचे पर उसके प्रभाव का विश्लेषण था।
मीडिया इंडस्ट्री के लिए बड़ा संकेत
इस लेख की सफलता मीडिया संगठनों के लिए भी एक महत्वपूर्ण संदेश है। डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर ट्रैफिक और एंगेजमेंट की दौड़ के बीच अक्सर गहन विश्लेषणात्मक लेखों को कम प्राथमिकता दी जाती है। लेकिन जब ऐसा कंटेंट लाखों लोगों तक पहुंचता है, तो यह बताता है कि ऑडियंस का एक बड़ा वर्ग अभी भी गंभीर पत्रकारिता में रुचि रखता है।
विशेषज्ञों की मानें तो डिजिटल मीडिया का भविष्य केवल वायरल कंटेंट पर नहीं, बल्कि विश्वसनीयता और भरोसे पर भी निर्भर करेगा। दर्शक तेजी से ऐसी सामग्री की तलाश कर रहे हैं जो उन्हें सिर्फ सूचना ही नहीं, बल्कि संदर्भ और समझ भी दे।
"Content is King" की बहस फिर चर्चा में
मीडिया जगत में लंबे समय से कहा जाता रहा है कि "Content is King"। हालांकि सोशल मीडिया और एल्गोरिदम के दौर में कई बार यह धारणा कमजोर पड़ती नजर आई। लेकिन प्रभु चावला की पोस्ट ने इस बहस को एक बार फिर जीवित कर दिया है।
उनका दावा है कि अगर कंटेंट मजबूत, विश्वसनीय और प्रासंगिक हो, तो वह आज भी लाखों लोगों तक पहुंच सकता है। यही कारण है कि उन्होंने अपनी पोस्ट में "Credible Content is still the King" लिखकर कंटेंट की गुणवत्ता को सबसे ऊपर रखा।
प्रभु चावली की इस स्टोरी का हिंदी सार आप यहां पढ़ सकते हैं-
केरल के वी. डी. सतीशन, तेलंगाना के ए. रेवंत रेड्डी, कर्नाटक के डी. के. शिवकुमार और तमिलनाडु के जोसेफ विजय एक सामान्य बैठक के लिए साथ पहुंचे थे, लेकिन लौटते समय उन्होंने भारतीय संघीय व्यवस्था की राजनीति को एक नई दिशा दे दी।
पिछले सप्ताह राष्ट्रपति भवन परिसर में नीति आयोग की बैठक आयोजित हुई। आमतौर पर ऐसी बैठकों में केंद्र और राज्यों के बीच औपचारिक बातचीत होती है और राष्ट्रीय एजेंडे पर चर्चा आगे बढ़ती है। लेकिन इस बार कुछ अलग हुआ। दक्षिण भारत के ये चार मुख्यमंत्री किसी अलग-अलग राज्य के प्रतिनिधि के रूप में नहीं, बल्कि एक समन्वित और एकजुट समूह के रूप में दिल्ली पहुंचे।
इन चार राज्यों की ताकत को नजरअंदाज करना आसान नहीं है। लोकसभा में इनके पास कुल 104 सीटें हैं, जो निचले सदन की लगभग पांचवें हिस्से की ताकत के बराबर है। इतना ही नहीं, ये राज्य मिलकर देश की जीडीपी का करीब 26 प्रतिशत हिस्सा पैदा करते हैं और प्रत्यक्ष कर (डायरेक्ट टैक्स) राजस्व में लगभग 30 प्रतिशत योगदान देते हैं।
दिलचस्प बात यह है कि इन चारों राज्यों में केंद्र की सत्तारूढ़ व्यवस्था की सरकार नहीं है। दिल्ली पहुंचकर इन नेताओं ने केवल अपनी शिकायतों की सूची नहीं सौंपी, बल्कि देश की संघीय व्यवस्था से जुड़े गहरे और संरचनात्मक सवाल उठाए। यह केवल विरोध नहीं था, बल्कि राजनीतिक प्रभाव और दबाव बनाने की एक सोची-समझी रणनीति थी।
कई दशकों से भारतीय विपक्षी राजनीति अक्सर शोर-शराबे को ताकत समझने की गलती करती रही है। क्षेत्रीय दलों ने कई बार विरोध प्रदर्शन को ही अंतिम लक्ष्य मान लिया, जबकि उसका उद्देश्य प्रभाव पैदा करना होना चाहिए था। लेकिन दक्षिण भारत के इस चौकड़ी समूह ने इस परंपरा को तोड़ दिया। चार अलग-अलग नेताओं के बजाय एक साझा मंच के रूप में सामने आकर उन्होंने राष्ट्रीय राजनीति में दक्षिणी एकजुटता को एक स्पष्ट पहचान दी।
इन नेताओं ने जो मुद्दा उठाया, वह वास्तविक भी है और संविधान व्यवस्था की एक जटिल चुनौती भी। दक्षिणी राज्यों ने लंबे समय तक जनसंख्या नियंत्रण, शिक्षा, स्वास्थ्य और मानव संसाधन विकास के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रदर्शन किया है। उन्होंने ऐसी अर्थव्यवस्थाएं विकसित की हैं जो निर्यात को बढ़ावा देती हैं और राष्ट्रीय राजस्व में महत्वपूर्ण योगदान देती हैं।
लेकिन आगामी जनगणना के बाद प्रस्तावित परिसीमन (Delimitation) प्रक्रिया में इन्हीं राज्यों को लोकसभा में अपेक्षाकृत कम प्रतिनिधित्व मिलने का डर है। वर्तमान व्यवस्था मुख्य रूप से जनसंख्या के आधार पर सीटों का निर्धारण करती है। दक्षिणी राज्यों का तर्क है कि जिन्होंने जनसंख्या नियंत्रण में सफलता हासिल की, उन्हें अब राजनीतिक प्रतिनिधित्व के मामले में नुकसान उठाना पड़ सकता है। उनके अनुसार, यह स्थिति अच्छी शासन व्यवस्था को दंडित करने और अधिक जनसंख्या वृद्धि को पुरस्कृत करने जैसी है।
तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी ने इस मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर पर सबसे प्रभावशाली ढंग से उठाया है। उन्होंने एक मिश्रित फॉर्मूला सुझाया है, जिसमें आधी सीटें जनसंख्या के आधार पर और आधी राज्यों के आर्थिक योगदान के आधार पर तय की जाएं। यह कोई नया सिद्धांत नहीं है, बल्कि आर्थिक योगदान को राजनीतिक प्रतिनिधित्व से जोड़ने का प्रयास है। इसी वजह से रेवंत रेड्डी परिसीमन बहस का प्रमुख चेहरा बनकर उभरे हैं।
इस समूह के हर नेता की अपनी अलग ताकत है।
62 वर्षीय वी. डी. सतीशन इस समूह के वैचारिक और नैतिक स्तंभ माने जा सकते हैं। पेशे से वकील और छह बार विधायक रह चुके सतीशन ने केरल में कांग्रेस को धैर्य और सिद्धांतों के आधार पर मजबूत किया है। उनकी पहचान साफ-सुथरी राजनीति और संतुलित नेतृत्व की रही है।
64 वर्षीय डी. के. शिवकुमार इस समूह की संगठनात्मक शक्ति हैं। आठ बार विधायक रह चुके शिवकुमार ने कर्नाटक में कांग्रेस को मुश्किल दौर से निकालकर सत्ता तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाई। बूथ स्तर के संगठन, गठबंधन राजनीति और चुनावी गणित पर उनकी पकड़ बेहद मजबूत मानी जाती है। कर्नाटक दक्षिण भारत का राजनीतिक और भौगोलिक प्रवेश द्वार है और शिवकुमार इस दरवाजे के सबसे प्रभावशाली संरक्षकों में से एक हैं।
51 वर्षीय जोसेफ विजय इस समूह के सबसे अलग और प्रभावशाली चेहरे हैं। उन्होंने किसी राजनीतिक परिवार की विरासत के बिना राजनीति में प्रवेश किया। लंबे राजनीतिक प्रशिक्षण या स्थापित वैचारिक ढांचे के बिना उन्होंने अपनी लोकप्रियता को राजनीतिक समर्थन में बदला। आज वे दक्षिण भारत की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था और 39 लोकसभा सीटों वाले तमिलनाडु का नेतृत्व कर रहे हैं। नीति आयोग की बैठक में उनकी मौजूदगी यह भी संकेत देती है कि तमिलनाडु का राष्ट्रीय संस्थाओं के प्रति पारंपरिक संकोच अब बदल रहा है।
इन चारों नेताओं की ताकतें अलग-अलग हैं, लेकिन यही उनकी सबसे बड़ी शक्ति भी है। सतीशन नैतिक विश्वसनीयता देते हैं, रेवंत रेड्डी मुद्दों को राष्ट्रीय विमर्श में लाने की क्षमता रखते हैं, शिवकुमार संगठनात्मक मजबूती प्रदान करते हैं और विजय जनसमर्थन जुटाने की क्षमता रखते हैं।
जब ये चारों एक साथ आते हैं, तो वे भारतीय विपक्षी राजनीति को वह चीज देते हैं जिसकी कमी लंबे समय से महसूस की जा रही थी—दक्षिण भारत की ओर से प्रतिनिधित्व और संसाधनों पर एक स्पष्ट और प्रभावशाली साझा राजनीतिक रुख।
भारतीय जनता पार्टी की दक्षिण भारत में मौजूदगी अभी भी सीमित मानी जाती है। तेलंगाना, तमिलनाडु और केरल में पार्टी की चुनावी संभावनाएं कई संरचनात्मक चुनौतियों से घिरी हैं। कर्नाटक ही ऐसा राज्य है जहां वास्तविक और सीधी राजनीतिक प्रतिस्पर्धा देखने को मिलती है। यही स्थिति इस चौकड़ी को रणनीतिक बढ़त देती है।
हालांकि इन नेताओं की सबसे बड़ी चुनौती बीजेपी नहीं, बल्कि समय और राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं हैं। भारत में क्षेत्रीय गठबंधनों का इतिहास बताता है कि व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाएं, राज्यों के अलग-अलग हित और तात्कालिक राजनीतिक गणनाएं अक्सर ऐसे गठबंधनों को कमजोर कर देती हैं।
फिर भी इस बार परिस्थितियां कुछ अलग दिखाई देती हैं। इन राज्यों की आर्थिक ताकत, लोकसभा में उनका प्रतिनिधित्व और परिसीमन जैसा साझा मुद्दा उन्हें लंबे समय तक एकजुट रखने का आधार बन सकता है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि चारों नेता अभी अपने राजनीतिक करियर के सक्रिय दौर में हैं और आने वाले एक दशक तक इस परियोजना को आगे बढ़ाने की क्षमता रखते हैं।
यदि यह एकजुटता बनी रहती है, तो इसके प्रभाव अगले चुनाव तक सीमित नहीं रहेंगे। दक्षिण भारत का ऐसा राजनीतिक समूह, जिसके पास आर्थिक और संसदीय दोनों ताकत हो, भारतीय संघवाद की शर्तों को नए सिरे से परिभाषित करने की क्षमता रखता है।
तब राष्ट्रीय राजनीति केवल “वन नेशन, वन इलेक्शन” या “वन पार्टी डॉमिनेंस” की बहस तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि केंद्र में सरकार बनाने के लिए विभिन्न क्षेत्रीय और राष्ट्रीय शक्तियों के बीच नए समीकरण बनेंगे। राष्ट्रीय दल बनाम क्षेत्रीय दल की पुरानी बहस की जगह एक अधिक बहुध्रुवीय राजनीतिक व्यवस्था उभर सकती है।
फिलहाल दक्षिण भारत की इस चौकड़ी ने सबसे कठिन पहला कदम उठा लिया है। उन्होंने केंद्र सरकार को यह समझाने में सफलता हासिल की है कि उनका मुद्दा कोई अस्थायी राजनीतिक शिकायत नहीं, बल्कि संघीय ढांचे से जुड़ा एक बुनियादी सवाल है।
यह एकजुटता भारतीय राजनीति में स्थायी बदलाव का आधार बनेगी या केवल कुछ समय की राजनीतिक एकता साबित होगी, इसका फैसला आने वाले वर्षों में होगा। लेकिन इतना तय है कि दक्षिण भारत ने ऐसे नेताओं का एक समूह सामने रखा है जो इस संघर्ष के महत्व को समझते हैं।
भारतीय राजनीति का गुरुत्वाकर्षण केंद्र अब धीरे-धीरे बदलता दिखाई दे रहा है। यह बदलाव जनसंख्या के कारण नहीं, बल्कि सुनियोजित राजनीतिक संगठन और साझा रणनीति की वजह से हो रहा है।
और यदि यह प्रक्रिया जारी रहती है, तो वह पुरानी धारणा कि केवल संख्या बल ही राष्ट्रीय प्रभुत्व तय करता है, भविष्य में चुनौती के घेरे में आ सकती है। बहस शुरू हो चुकी है। अब देखना यह है कि क्या सत्ता का ढांचा भी उसी दिशा में बदलता है।
AI टूल्स के बढ़ते उपयोग ने Amazon, सोशल मीडिया और ईमेल तक AI-जनित कंटेंट की बाढ़ ला दी है। विशेषज्ञों के अनुसार AI सहायक हो सकता है, लेकिन मौलिक सोच और लेखन की जगह नहीं ले सकता।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
मिलिंद खांडेकर, वरिष्ठ पत्रकार।
New York Times की टेक्नोलॉजी रिपोर्टर कश्मीर हिल की बायोग्राफ़ी साल भर से Amazon पर बिक रही थी। उन्हें इसका पता भी नहीं था। 90 पेज की यह किताब उनके बारे में इंटरनेट पर उपलब्ध जानकारी के आधार पर लिखी गई थी। जब किसी परिचित ने उन्हें इस बारे में बताया तो खोजबीन शुरू हुई। यह किताब आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस (AI) से लिखी गई थी। उन्होंने लेखक से संपर्क किया, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला। अब यह किताब ही ग़ायब हो गई है।
यह AI Slop का एक उदाहरण है। हिंदी में इसे AI-जनित कूड़ा-कचरा कह सकते हैं। ChatGPT 2022 में आने के बाद से कुछ भी लिखना आसान हो गया है। न सोचने की ज़रूरत है, न ही रिसर्च की। भाषा आना भी ज़रूरी नहीं है। सिर्फ़ एक Prompt दे दीजिए, AI सब कुछ कर सकता है। इसका नतीजा यह हुआ है कि Amazon पर हर महीने करीब 3 लाख E-books प्रकाशित हो रही हैं। ChatGPT आने से पहले यह आँकड़ा एक लाख के आसपास था।
AI Slop सिर्फ़ किताबों में नहीं दिख रहा है, बल्कि सोशल मीडिया पर आपकी टाइमलाइन पर भी। सोशल मीडिया पर पोस्ट AI लिख रहा है। आपको आने वाले ज़्यादातर ईमेल भी AI ही लिख रहा है। WhatsApp पर AI से बने ग्राफिक्स की बाढ़ आ गई है। AI से लिखा हुआ कंटेंट पकड़ने वाली कंपनी Pangram Lab ने 10 लाख पोस्ट जाँचीं। LinkedIn पर 10 में से 4 लंबे पोस्ट AI ने लिखे थे, जबकि X पर एक-चौथाई। आपकी टाइमलाइन पर AI से लिखे पोस्ट आसानी से पकड़ में आ जाएंगे। भाषा एक जैसी, शैली एक जैसी, शब्दों की लफ़्फ़ाज़ी। ऐसे पोस्ट पढ़ने का मन भी नहीं करता।
मैं AI के इस्तेमाल और उसे सीखने का लगातार समर्थन करता रहा हूँ। सिर्फ़ इतना याद रखिए कि AI से लिखते समय अपना दिमाग़ गिरवी मत रखिए। आइडिया आपका होना चाहिए, भाषा और शैली आपकी होनी चाहिए। AI आपका Assistant हो सकता है। वह आपके लिए रिसर्च कर सकता है। आपकी कॉपी चेक कर सकता है। सारा काम ही उसे सौंप देंगे, तो फिर आप क्या करेंगे? कोई बड़ी बात नहीं होगी कि आने वाले दिनों में आपके लिखे शब्दों की क़ीमत मशीन से ज़्यादा हो जाए।
( यह लेखक के निजी विचार हैं )
अयोध्या राम मंदिर में दान-चढ़ावे की कथित चोरी के बाद मंदिर प्रबंधन पर बहस तेज हो गई है। इतिहास बताता है कि देश के कई बड़े मंदिरों में दान, संपत्ति को लेकर लंबे समय से विवाद होते रहे हैं।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
आलोक मेहता, पद्मश्री, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक।
अयोध्या के श्रीराम मंदिर में दान-चढ़ावे की चोरी पर भारी राजनीतिक बवाल खड़ा हो गया है। निश्चित रूप से इस तरह का गंभीर अपराध पहले नहीं हुआ, क्योंकि इस बार सरकार के सहयोग और विश्व हिन्दू परिषद तथा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े लोग मंदिर की पूरी व्यवस्था चला रहे थे। कुछ आरोपी कर्मचारियों पर कानूनी कार्रवाई शुरू हुई है, लेकिन राजनीतिक और सामाजिक संगठनों के नेता भ्रष्टाचार तथा अपराध की तरह व्यवस्थापकों को भी दंडित करने की आवाज उठा रहे हैं। संसद और सर्वोच्च न्यायालय में यह बहस का मुद्दा बना रहेगा।
अयोध्या के बाद बद्रीनाथ और वैष्णो देवी मंदिरों में भी चोरी के आरोप सार्वजनिक हुए हैं। असल में मंदिरों, मठों, आश्रमों अथवा मस्जिद, दरगाह, गुरुद्वारे और गिरिजाघरों जैसे विभिन्न धार्मिक स्थलों पर पहले भी कई बार विवाद सामने आते रहे हैं और अनेक मुकदमे आज तक अदालतों में चल रहे हैं। जहाँ वार्षिक आय करोड़ों रुपये होती है, वहाँ विवाद अक्सर इन मुद्दों पर होते हैं। चढ़ावे का नियंत्रण, दुकानों का आवंटन, पार्किंग और अन्य सेवा अनुबंध, मंदिर भूमि से आय, ट्रस्ट के निर्णय तथा दान की पारदर्शिता। खासकर दान-चढ़ावे के धन, सोने-चाँदी की संपत्ति और अधिकार को लेकर पहले से कार्यरत लोग ही एक-दूसरे पर आरोप लगाते या भंडाफोड़ करते हैं। अयोध्या मंदिर में भी पुराने कर्मचारी अथवा संगठन के लोगों ने बड़ी चोरी के राज खोलने शुरू किए हैं।
देश के प्रमुख मंदिरों के विवादों का रिकॉर्ड दिलचस्प है। ओडिशा के पुरी स्थित जगन्नाथ मंदिर में सेवायत (पुजारी परिवारों) और मंदिर प्रशासन के बीच अधिकारों को लेकर लंबे समय से विवाद रहे हैं। रथयात्रा, पूजा-पद्धति, चढ़ावे और सेवा-अधिकार पर कई मामले उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय तक पहुँचे। वाराणसी के काशी विश्वनाथ मंदिर के सरकारी प्रबंधन, पुजारियों की भूमिका और पूजा के अधिकार को लेकर समय-समय पर विवाद हुए।
कॉरिडोर परियोजना के दौरान भी कई याचिकाएँ दायर हुईं। वृंदावन के बाँके बिहारी मंदिर में गोस्वामी परिवारों के अधिकार, दर्शन व्यवस्था और मंदिर प्रशासन को लेकर अनेक मुकदमे चले। सर्वोच्च न्यायालय तक कई प्रशासनिक मुद्दे पहुँचे। उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर में भस्म आरती कराने के अधिकार, पुजारियों की नियुक्ति और प्रशासनिक नियंत्रण को लेकर विवाद हुए हैं। मंदिरों में विवाद इन मुद्दों पर होते हैं—वंशानुगत पुजारी बनने का अधिकार, कौन पूजा कराएगा और किस समय, चढ़ावे और दक्षिणा का बँटवारा, मंदिर की दुकानों, ठेकों और अन्य आय का प्रबंधन, सरकारी ट्रस्ट बनाम पारंपरिक पुजारी परिवार तथा सेवायतों की नियुक्ति और हटाना।
आम तौर पर पूजा का अधिकार ठेके पर नहीं दिया जाता। लेकिन कई मंदिरों में प्रसाद की दुकानें, पार्किंग, जूता-घर, कैंटीन, सफाई, सुरक्षा तथा अन्य व्यावसायिक सेवाओं का संचालन टेंडर या ठेके के माध्यम से होता है। मजेदार स्थिति यह है कि इन ठेकों को लेकर भी विवाद और मुकदमे होते हैं। इसी तरह साधुओं के कुछ आश्रमों के अधिकार को लेकर खूनी संघर्ष और मुकदमे तक हुए हैं।
पिछले वर्षों के दौरान देश के अनेक मंदिरों और मठों में महंतों की हत्या, उत्तराधिकार को लेकर गोलीबारी, साधुओं के गुटों में संघर्ष, मंदिर संपत्ति पर कब्ज़े के आरोप तथा दान और भूमि विवादों से जुड़ी आपराधिक घटनाएँ होती रही हैं। इनमें सबसे अधिक मामले उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तराखंड के बड़े मठों, नाथ संप्रदाय के प्रमुख मठों, रामानुज, वैष्णव और अखाड़ों से जुड़े मठों तथा मंदिरों अथवा दक्षिण भारत के पद्मनाभस्वामी मंदिर, सबरीमला मंदिर और तिरुमाला मंदिर से जुड़े रहे हैं। अधिकांश घटनाएँ स्थानीय स्तर की रही हैं, जबकि कुछ मामलों में सीबीआई या एसआईटी जाँच भी हुई।
यदि प्राचीन इतिहास को देखें तो भारतीय उपमहाद्वीप में ईश्वर की उपासना मंदिरों से बहुत पहले से होती थी। सिंधु-सरस्वती सभ्यता (लगभग 2600 से 1900 ईसा पूर्व) में संगठित मंदिरों के स्पष्ट प्रमाण नहीं मिले हैं, हालांकि पूजा और धार्मिक प्रतीकों के साक्ष्य अवश्य मिले हैं। वैदिक काल (1500–600 ईसा पूर्व) में पूजा का मुख्य केंद्र यज्ञ था। उस समय स्थायी मंदिरों की परंपरा नहीं थी। देवताओं की आराधना यज्ञ वेदियों पर होती थी। लगभग तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व से दूसरी शताब्दी ईस्वी के बीच मूर्ति-पूजा और देवालयों का विकास प्रारंभ हुआ।
गुप्त काल (चौथी से छठी शताब्दी ईस्वी) को भारत में पत्थर के स्थायी हिन्दू मंदिरों का स्वर्णकाल माना जाता है। इसी समय देवगढ़, भितरगाँव, उदयगिरि आदि के मंदिर बने। इसके बाद दक्षिण भारत में पल्लव, चोल, चालुक्य, राष्ट्रकूट और होयसाल शासकों ने विशाल मंदिरों का निर्माण कराया। मंदिर केवल पूजा-स्थल नहीं थे। वे समाज के बहुआयामी केंद्र थे। मुख्य रूप से ईश्वर की उपासना, शिक्षा (गुरुकुल एवं वेद पाठ), कला, संगीत और नृत्य का संरक्षण, सामाजिक सभाएँ, दान एवं अन्नक्षेत्र, यात्रियों के विश्राम स्थल तथा स्थानीय अर्थव्यवस्था के केंद्र माने जाते थे।
कई बड़े मंदिरों के पास गाँव, कृषि भूमि, गौशालाएँ और शिल्पकारों का संरक्षण भी होता था। दक्षिण भारत के अनेक मंदिर अपने समय के सबसे बड़े आर्थिक संस्थानों में गिने जाते थे। राजा मंदिर बनवाता था, भूमि दान देता था और सुरक्षा देता था। दूसरी ओर, धार्मिक अनुष्ठान पुरोहितों या मठों के अधीन होते थे। इससे दो प्रकार के अधिकार विकसित हुए—धार्मिक अधिकार: पूजा कौन कराएगा, परंपरा क्या होगी, महंत या पुजारी कौन होगा; तथा प्रशासनिक एवं आर्थिक अधिकार: दान, भूमि, आय और प्रबंधन किसके नियंत्रण में होगा। जब मंदिरों की संपत्ति बढ़ी, तब इन अधिकारों को लेकर विवाद भी बढ़ने लगे।
प्राचीन भारत में भी विवाद होते थे। ऐतिहासिक अभिलेखों और शिलालेखों से पता चलता है कि विभिन्न मठों और संप्रदायों के बीच पूजा-अधिकार को लेकर मतभेद होते थे। राजाओं को कभी-कभी मंदिर प्रशासन में हस्तक्षेप करना पड़ता था। मंदिरों की दान-भूमि और आय के प्रबंधन पर शाही आदेश जारी किए जाते थे। कई शिलालेखों में मंदिर अधिकारियों को हटाने या नए प्रबंधक नियुक्त करने का उल्लेख मिलता है।
हालाँकि आधुनिक अर्थों में अदालतें नहीं थीं, इसलिए अधिकांश विवाद राजा, स्थानीय सभा (सभा/महासभा), ग्राम परिषद या धार्मिक परिषद द्वारा सुलझाए जाते थे। मध्यकाल में बड़े मठों और मंदिरों के पास विशाल संपत्ति हो गई। इससे महंत पद के उत्तराधिकार पर विवाद बढ़े। अलग-अलग धार्मिक संप्रदायों में नियंत्रण की प्रतिस्पर्धा हुई। कुछ स्थानों पर हिंसक संघर्ष भी हुए।
स्थानीय शासकों और धार्मिक संस्थाओं के बीच शक्ति-संतुलन का प्रश्न उत्पन्न हुआ। ब्रिटिश शासन के दौरान सरकार ने देखा कि अनेक मंदिरों और धार्मिक संस्थाओं के पास बड़ी संपत्ति है। 19वीं शताब्दी में विभिन्न प्रांतों में धार्मिक बंदोबस्त और ट्रस्ट संबंधी कानून बनाए गए। धीरे-धीरे सरकार ने प्रत्यक्ष नियंत्रण कम किया और धार्मिक न्यासों तथा ट्रस्टों की व्यवस्था विकसित हुई।
स्वतंत्रता के बाद विभिन्न राज्यों ने मंदिर प्रबंधन के लिए कानून बनाए। इसके बाद विवादों का स्वरूप बदल गया-पारंपरिक पुजारी बनाम सरकारी ट्रस्ट, वंशानुगत अधिकार बनाम आधुनिक प्रशासन, मंदिर की आय और संपत्ति का प्रबंधन तथा श्रद्धालुओं के अधिकार बनाम धार्मिक परंपरा। इसी प्रकार गुरुद्वारों में शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी और स्थानीय प्रबंधन, मस्जिदों में वक्फ बोर्ड और मुतवल्ली, चर्चों में डायोसीज़ और ट्रस्ट तथा कई मठों में महंत के उत्तराधिकार को लेकर भी विवाद हुए।
इतिहासकारों का सामान्य मत है कि मंदिर मूलतः आध्यात्मिक और सामाजिक संस्थाएँ थे, लेकिन जैसे-जैसे उनके पास भूमि, दान, आर्थिक संसाधन और सामाजिक प्रभाव बढ़ा, वैसे-वैसे प्रबंधन, उत्तराधिकार और स्वामित्व के विवाद भी बढ़े। यह प्रवृत्ति केवल हिन्दू मंदिरों तक सीमित नहीं रही; भारत और विश्व के लगभग सभी बड़े धार्मिक संस्थानों में किसी-न-किसी रूप में ऐसे विवाद देखने को मिलते हैं।
( यह लेखक के निजी विचार हैं )
राज नायक की नियुक्ति पर उठे सवालों का डॉ. अनुराग बत्रा ने दिया जवाब, बताया क्यों हैं YAAP के लिए सही विकल्प
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
डॉ. अनुराग बत्रा, चेयरमैन व एडिटर-इन-चीफ, एक्सचेंज4मीडिया ग्रुप ।।
पिछले सप्ताह हम सभी ने बहुत कम उम्र में अतुल हेगड़े को खो दिया। अतुल और उनकी कंपनी YAAP अपने सबसे अच्छे दौर में पहुंचते हुए दिखाई दे रहे थे। कंपनी शेयर बाजार में सूचीबद्ध हो चुकी थी, कारोबार लगातार बढ़ रहा था और हर तरफ सफलता की नई कहानियां लिखी जा रही थीं।
लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। पिछले मंगलवार, 7 जुलाई को अतुल हेगड़े अचानक इस दुनिया को अलविदा कह गए। उनके जाने से उनका परिवार, पत्नी, माता-पिता, बिजनेस पार्टनर और उनसे जुड़े सभी लोग गहरे दुख में डूब गए।
YAAP के पास अनुभवी शेयरहोल्डर्स, इन्वेस्टर्स और सीनियर लीडर्स की एक मजबूत टीम है।
अतुल हेगड़े के साझेदार सुधीर मेनन और सुबोध मेनन हैं। दोनों कंपनी के को-प्रमोटर और इन्वेस्टर हैं। बड़े औद्योगिक रसायन (इंडस्ट्रियल केमिकल्स) कारोबार को खड़ा करने का उनका लंबा अनुभव YAAP के लिए बड़ी ताकत माना जाता है।
इसके अलावा YAAP में कई सीनियर और ऊर्जावान लीडर भी हैं, जिन्होंने कंपनी को आगे बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई है और आज भी कंपनी के अलग-अलग कारोबार की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं।
मन्नन कपूर, जो YAAP के फाउंडिंग पार्टनर हैं, कंपनी की उद्यमशील सोच और विकास के प्रमुख चेहरों में से एक रहे हैं। नए कारोबार लाना, ग्राहकों को बेहतर सेवाएं देना, टीमों का नेतृत्व करना और बिजनेस को आगे बढ़ाना उनकी खास पहचान है। उनकी युवा सोच और ऊर्जा इस डिजिटल इकोसिस्टम में बड़ा फायदा मानी जाती है। उन्होंने सरकारी क्षेत्र के कई बड़े प्रोजेक्ट भी कंपनी को दिलाए हैं और YAAP के सबसे बड़े दफ्तरों का संचालन भी संभालते हैं।
YAAP के सीनियर पार्टनर के रूप में मन्नन कपूर कंपनी की ग्रोथ को आगे बढ़ाने, इंटीग्रेटेड मार्केटिंग पहल का नेतृत्व करने और ग्राहकों के लिए तकनीक आधारित नए समाधान तैयार करने में अहम भूमिका निभा रहे हैं। डिजिटल बदलाव को लेकर उनका विशेष रुझान है और वे ब्रैंड्स के साथ मिलकर प्रभावशाली मार्केटिंग अभियान तैयार करते हैं।
YAAP के पास अन्य अनुभवी और उद्यमी लीडर भी हैं, जिनमें अंजन रॉय, अनूप कुमार और निशांत राडिया शामिल हैं। इन सभी की अपनी स्पष्ट जिम्मेदारियां हैं और कंपनी की तरक्की में इनका महत्वपूर्ण योगदान रहा है।
अंजन रॉय भी YAAP के सीनियर पार्टनर हैं। अगस्त 2016 से वे कंपनी के साथ जुड़े हुए हैं। गुरुग्राम स्थित अंजन रॉय कंपनी की रणनीतिक दिशा तय करने और कारोबार को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वे ब्रैंड्स के साथ मिलकर ब्रैंड रणनीति, मार्केटिंग सलाह, कंटेंट निर्माण और बिजनेस डेवलपमेंट पर काम करते हैं, ताकि कंपनियां तेजी से डिजिटल होती दुनिया में अपनी प्रासंगिकता बनाए रख सकें।
रोहन भंसाली GOZOOP ग्रुप के को-फाउंडर हैं। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत जेपी मॉर्गन में इन्वेस्टमेंट बैंकिंग से की थी। डिजिटल क्षेत्र की संभावनाओं को जल्दी पहचानते हुए उन्होंने 2008 में Raastudios नाम की वेब एप्लिकेशन डेवलपमेंट कंपनी शुरू की। 2010 में GOZOOP द्वारा Raastudios का अधिग्रहण किए जाने के बाद उन्होंने कंपनी को दुबई, सिंगापुर और न्यूयॉर्क जैसे अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंचाने में बड़ी भूमिका निभाई। साथ ही Red Digital और iThink Infotech जैसी कंपनियों के अधिग्रहण का नेतृत्व भी किया। उनके नेतृत्व में GOZOOP ने Dell, Asian Paints, Mashreq Bank, Viacom, Pidilite और Mahindra Lifespaces जैसे बड़े ब्रैंड्स के साथ काम करते हुए वैश्विक मार्केटिंग पार्टनर के रूप में अपनी पहचान बनाई।
निशांत राडिया YAAP में प्लेटफॉर्म्स के हेड हैं। वे कंपनी के सभी प्लेटफॉर्म, प्रोडक्ट्स और टेक्नोलॉजी से जुड़े काम का नेतृत्व करते हैं। वे Vidooly के फाउंडर भी हैं, जो वीडियो एनालिटिक्स और इन्फ्लुएंसर इंटेलिजेंस प्लेटफॉर्म है। प्रोडक्ट इनोवेशन, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), डेटा इंटेलिजेंस और क्रिएटर इकोनॉमी में उनका लंबा अनुभव है। YAAP में वे इन्फ्लुएंसर मार्केटिंग, कंटेंट इंटेलिजेंस, ब्रैंड परफॉर्मेंस एनालिटिक्स और क्रिएटर इकोसिस्टम के लिए तकनीकी प्लेटफॉर्म तैयार करने का काम देखते हैं। साथ ही नोएडा में शुरू किए गए कंपनी के नए टेक हब का नेतृत्व भी कर रहे हैं, जहां प्रोडक्ट इंजीनियरिंग, AI, डेटा साइंस और प्लेटफॉर्म डेवलपमेंट पर काम हो रहा है।
अनूप कुमार YAAP के सीनियर पार्टनर और कंपनी की कोर लीडरशिप टीम के सदस्य हैं। वर्ष 2017 में कंपनी से जुड़ने के बाद उन्होंने YAAP को एक फुर्तीले कंटेंट स्टार्टअप से आगे बढ़ाकर भारत का पहला स्वतंत्र डिजिटल एजेंसी नेटवर्क बनाने में अहम भूमिका निभाई, जिसे NSE Emerge पर सूचीबद्ध किया गया। उन्होंने कंपनी की मीडिया, टेक्नोलॉजी और बिजनेस ग्रोथ रणनीतियों को आगे बढ़ाने के साथ-साथ पूरे नेटवर्क की क्षमताओं को एकजुट कर डेटा आधारित और बड़े स्तर पर काम करने वाली मार्केटिंग सेवाएं विकसित करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
पिछले कुछ वर्षों में अनूप कुमार ने YAAP के विस्तार में भी बड़ी भूमिका निभाई। उन्होंने Oplifi, Crayons Communications और GOZOOP Group जैसी कंपनियों के अधिग्रहण को सफलतापूर्वक कंपनी के साथ जोड़ने में मदद की, जिससे भारत के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भी YAAP की मौजूदगी मजबूत हुई। रचनात्मकता, तकनीक और डेटा को एक साथ जोड़ने की उनकी सोच ने YAAP को उन ब्रैंड्स का भरोसेमंद तकनीक आधारित इंटीग्रेटेड मार्केटिंग पार्टनर बनाया, जो अपने कारोबार के स्पष्ट और मापने योग्य नतीजे चाहते हैं।
सुधीर मेनन YAAP Digital के प्रमोटर और कंपनी के बोर्ड में नॉन-एग्जिक्यूटिव डायरेक्टर हैं। वे कंपनी की रणनीतिक दिशा तय करने, बेहतर कॉरपोरेट गवर्नेंस और लंबे समय की कारोबारी योजना बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। हालांकि वे कंपनी के रोजमर्रा के संचालन में सीधे तौर पर शामिल नहीं रहते।
सुबोध मेनन भी YAAP Digital के प्रमोटर और नॉन-एग्जिक्यूटिव डायरेक्टर हैं। बोर्ड के सदस्य के रूप में वे कंपनी की गवर्नेंस, कारोबारी रणनीति और महत्वपूर्ण फैसलों में अपनी उद्योग विशेषज्ञता के जरिए योगदान देते हैं और कंपनी की दीर्घकालिक विकास यात्रा को दिशा देने में मदद करते हैं।
इस वर्ष की शुरुआत में YAAP ने GOZOOP का भी अधिग्रहण किया। GOZOOP के फाउंडर अहमद आफताब नकवी ने अपनी एजेंसी इसलिए बेची क्योंकि वे अधिग्रहण और निवेश पर अधिक ध्यान देना चाहते थे। साथ ही वे अतुल हेगड़े के साथ काम करते हुए उनसे सीखना भी चाहते थे। वे नई कंपनियों के अधिग्रहण और निवेश के अवसर तलाशने में सक्रिय रूप से जुड़े हुए थे और YAAP के लिए निवेश योग्य कंपनियों की पहचान भी कर रहे थे।
GOZOOP के को-फाउंडर रोहन भंसाली भी इस पूरी टीम का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।
अतुल हेगड़े के निधन के बाद आयोजित प्रार्थना सभा में उनकी पत्नी शोनिमा मौजूद थीं, जिनसे उनकी मुलाकात एक विज्ञापन एजेंसी में काम करने के दौरान हुई थी। इस अवसर पर शोणिमा के पिता भी उपस्थित थे। विज्ञापन और मीडिया उद्योग में काम करने का अनुभव रखने वाली शोणिमा को अतुल की विरासत को आगे बढ़ाने के लिए स्वाभाविक उत्तराधिकारी माना जाता है।
मैं स्वयं प्रार्थना सभा में शामिल नहीं हो सका, लेकिन मेरे मन में अतुल की यादें लगातार बनी रहीं। मुझे बताया गया कि उस सभा में शोणिमा के पिता ने घोषणा की कि अब शोणिमा, अतुल हेगड़े की भूमिका निभाते हुए YAAP का नेतृत्व संभालेंगी।
कंपनी की प्रमुख शेयरहोल्डर्स में शामिल शोणिमा ने एक सोच-समझकर फैसला लिया। उन्होंने कंपनी के संचालन की जिम्मेदारी सुधीर मेनन, सुबोध मेनन और मौजूदा नेतृत्व टीम को सौंपने का निर्णय किया, जो YAAP के सबसे बड़े शेयरहोल्डर्स में भी शामिल हैं। अतुल की कार्यकारी भूमिका को दोहराने की बजाय उन्होंने एक बड़े शेयरधारक, बोर्ड सदस्य और रणनीतिक लीडर के रूप में कंपनी के दीर्घकालिक विकास, बेहतर गवर्नेंस और रणनीतिक निर्णयों पर ध्यान देने का रास्ता चुना।
हालांकि इसके केवल तीन दिन बाद YAAP ने घोषणा की कि कंपनी के सलाहकार और अतुल हेगड़े के करीबी मित्र रहे राज नायक को कंपनी का चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर (CMD) नियुक्त किया गया है। इस नियुक्ति की घोषणा वाले प्रेस रिलीज़ में सुधीर मेनन का बयान भी शामिल था, जिसमें उन्होंने राज नायक को CMD बनाए जाने की जानकारी दी।
राज नायक ने अपनी सहज, संवेदनशील और विनम्र शैली में कहा कि कोई भी अतुल हेगड़े की जगह नहीं ले सकता। उन्होंने कहा कि वे केवल कंपनी की मौजूदा नेतृत्व टीम का सहयोग करने और उसे मजबूत बनाने के उद्देश्य से यह जिम्मेदारी स्वीकार कर रहे हैं।
अनूप कुमार YAAP के सीनियर पार्टनर और कंपनी की कोर लीडरशिप टीम के सदस्य हैं। वर्ष 2017 में कंपनी से जुड़ने के बाद उन्होंने YAAP को एक फुर्तीले कंटेंट स्टार्टअप से आगे बढ़ाकर भारत का पहला स्वतंत्र डिजिटल एजेंसी नेटवर्क बनाने में अहम भूमिका निभाई, जिसे NSE Emerge पर सूचीबद्ध किया गया। उन्होंने कंपनी की मीडिया, टेक्नोलॉजी और बिजनेस ग्रोथ रणनीतियों को आगे बढ़ाने के साथ-साथ पूरे नेटवर्क की क्षमताओं को एकजुट कर डेटा आधारित और बड़े स्तर पर काम करने वाली मार्केटिंग सेवाएं विकसित करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
पिछले कुछ वर्षों में अनूप कुमार ने YAAP के विस्तार में भी बड़ी भूमिका निभाई। उन्होंने Oplifi, Crayons Communications और GOZOOP Group जैसी कंपनियों के अधिग्रहण को सफलतापूर्वक कंपनी के साथ जोड़ने में मदद की, जिससे भारत के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भी YAAP की मौजूदगी मजबूत हुई। रचनात्मकता, तकनीक और डेटा को एक साथ जोड़ने की उनकी सोच ने YAAP को उन ब्रैंड्स का भरोसेमंद तकनीक आधारित इंटीग्रेटेड मार्केटिंग पार्टनर बनाया, जो अपने कारोबार के स्पष्ट और मापने योग्य नतीजे चाहते हैं।
सुधीर मेनन YAAP Digital के प्रमोटर और कंपनी के बोर्ड में नॉन-एग्जिक्यूटिव डायरेक्टर हैं। वे कंपनी की रणनीतिक दिशा तय करने, बेहतर कॉरपोरेट गवर्नेंस और लंबे समय की कारोबारी योजना बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। हालांकि वे कंपनी के रोजमर्रा के संचालन में सीधे तौर पर शामिल नहीं रहते।
सुबोध मेनन भी YAAP Digital के प्रमोटर और नॉन-एग्जिक्यूटिव डायरेक्टर हैं। बोर्ड के सदस्य के रूप में वे कंपनी की गवर्नेंस, कारोबारी रणनीति और महत्वपूर्ण फैसलों में अपनी उद्योग विशेषज्ञता के जरिए योगदान देते हैं और कंपनी की दीर्घकालिक विकास यात्रा को दिशा देने में मदद करते हैं।
इस वर्ष की शुरुआत में YAAP ने GOZOOP का भी अधिग्रहण किया। GOZOOP के फाउंडर अहमद आफताब नकवी ने अपनी एजेंसी इसलिए बेची क्योंकि वे अधिग्रहण और निवेश पर अधिक ध्यान देना चाहते थे। साथ ही वे अतुल हेगड़े के साथ काम करते हुए उनसे सीखना भी चाहते थे। वे नई कंपनियों के अधिग्रहण और निवेश के अवसर तलाशने में सक्रिय रूप से जुड़े हुए थे और YAAP के लिए निवेश योग्य कंपनियों की पहचान भी कर रहे थे।
GOZOOP के को-फाउंडर रोहन भंसाली भी इस पूरी टीम का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।
अतुल हेगड़े के निधन के बाद आयोजित प्रार्थना सभा में उनकी पत्नी शोनिमा मौजूद थीं, जिनसे उनकी मुलाकात एक विज्ञापन एजेंसी में काम करने के दौरान हुई थी। इस अवसर पर शोणिमा के पिता भी उपस्थित थे। विज्ञापन और मीडिया उद्योग में काम करने का अनुभव रखने वाली शोणिमा को अतुल की विरासत को आगे बढ़ाने के लिए स्वाभाविक उत्तराधिकारी माना जाता है।
मैं स्वयं प्रार्थना सभा में शामिल नहीं हो सका, लेकिन मेरे मन में अतुल की यादें लगातार बनी रहीं। मुझे बताया गया कि उस सभा में शोणिमा के पिता ने घोषणा की कि अब शोणिमा, अतुल हेगड़े की भूमिका निभाते हुए YAAP का नेतृत्व संभालेंगी।
कंपनी की प्रमुख शेयरहोल्डर्स में शामिल शोणिमा ने एक सोच-समझकर फैसला लिया। उन्होंने कंपनी के संचालन की जिम्मेदारी सुधीर मेनन, सुबोध मेनन और मौजूदा नेतृत्व टीम को सौंपने का निर्णय किया, जो YAAP के सबसे बड़े शेयरहोल्डर्स में भी शामिल हैं। अतुल की कार्यकारी भूमिका को दोहराने की बजाय उन्होंने एक बड़े शेयरधारक, बोर्ड सदस्य और रणनीतिक लीडर के रूप में कंपनी के दीर्घकालिक विकास, बेहतर गवर्नेंस और रणनीतिक निर्णयों पर ध्यान देने का रास्ता चुना।
हालांकि इसके केवल तीन दिन बाद YAAP ने घोषणा की कि कंपनी के सलाहकार और अतुल हेगड़े के करीबी मित्र रहे राज नायक को कंपनी का चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर (CMD) नियुक्त किया गया है। इस नियुक्ति की घोषणा वाले प्रेस रिलीज़ में सुधीर मेनन का बयान भी शामिल था, जिसमें उन्होंने राज नायक को CMD बनाए जाने की जानकारी दी।
राज नायक ने अपनी सहज, संवेदनशील और विनम्र शैली में कहा कि कोई भी अतुल हेगड़े की जगह नहीं ले सकता। उन्होंने कहा कि वे केवल कंपनी की मौजूदा नेतृत्व टीम का सहयोग करने और उसे मजबूत बनाने के उद्देश्य से यह जिम्मेदारी स्वीकार कर रहे हैं।
जैसे ही हमने राज नायक की नियुक्ति की खबर प्रकाशित की, उद्योग जगत के कई वरिष्ठ लोगों के फोन आने लगे। कुछ लोगों ने सवाल किया कि क्या यह फैसला बहुत जल्दी नहीं लिया गया? आखिर इतनी जल्दबाजी की क्या जरूरत थी?
उस समय मैंने इस विषय पर सुधीर मेनन, राज नायक, मन्नन कपूर, शोणिमा या YAAP के किसी अन्य शेयरधारक और लीडर से कोई बातचीत नहीं की थी। फिर भी मैंने अपनी समझ के आधार पर लोगों को समझाने की कोशिश की कि राज नायक की नियुक्ति कंपनी के लिए सबसे सही फैसला है। इससे न केवल कंपनी को मजबूती मिलेगी बल्कि उद्योग और बाजार में भी सकारात्मक संदेश जाएगा।
कुछ लोगों का यह भी कहना था कि अब नेतृत्व किसी युवा व्यक्ति को मिलना चाहिए। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या राज नायक इस जिम्मेदारी के लिए अधिक उम्र के नहीं हैं? उनका मानना था कि चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर की जिम्मेदारी मन्नन कपूर जैसे मौजूदा युवा लीडर्स को दी जानी चाहिए थी। ऐसे कई सवाल मुझसे पूछे गए, लेकिन उस समय मेरे पास इनका कोई स्पष्ट जवाब नहीं था क्योंकि मैंने इन पहलुओं पर उस दृष्टि से विचार नहीं किया था।
इन्हीं सवालों का जवाब देने के लिए मैं यह लेख लिख रहा हूं। मेरा मानना है कि राज नायक को YAAP का नेतृत्व सौंपना बिल्कुल सही फैसला है। सुधीर मेनन, शोणिमा, कंपनी के अन्य लीडर्स और सभी शेयरहोल्डर्स ने मिलकर कंपनी के हित में सबसे अच्छा निर्णय लिया है।
YAAP एक सूचीबद्ध कंपनी है और मेरा मानना है कि उसकी सबसे बड़ी सफलता अभी आना बाकी है। पिछले तिमाही में कंपनी का प्रदर्शन काफी मजबूत रहा था और उसके शेयरों की कीमत में भी बढ़ोतरी हुई थी। अतुल हेगड़े कंपनी को लेकर बेहद महत्वाकांक्षी योजनाएं बना रहे थे। उनसे हुई बातचीत के आधार पर मुझे उन योजनाओं की कुछ जानकारी भी थी।
ऐसे समय में YAAP के लिए सबसे जरूरी था कि वह अपने शेयरहोल्डर्स और बाजार को यह भरोसा दिलाए कि कंपनी की विकास यात्रा बिना किसी रुकावट के आगे बढ़ती रहेगी। राज नायक इस निरंतरता का सबसे मजबूत चेहरा हैं क्योंकि वे पिछले तीन वर्षों से अधिक समय से कंपनी के सलाहकार रहे हैं। वे अतुल हेगड़े और उनकी योजनाओं को बेहद करीब से जानते थे।
राज नायक कंपनी के युवा नेतृत्व के लिए भी पूरी तरह स्वीकार्य हैं। कंपनी के भीतर और पूरे उद्योग में उनका सम्मान है। वे चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर जरूर बने हैं, लेकिन कंपनी का रोजमर्रा का संचालन आज भी मौजूदा साझेदारों और नेतृत्व टीम के हाथों में है। इनमें मन्नन कपूर सबसे प्रमुख और सक्षम लीडर हैं, जिन्हें अतुल हेगड़े के बाद कंपनी का वास्तविक नंबर दो माना जाता रहा है।
राज नायक के इंडस्ट्री में मजबूत संबंध हैं और वे कंपनी के लिए नए कारोबार भी ला सकते हैं। उनका अनुभव कंपनी के सभी लीडर्स का मार्गदर्शन करने में बेहद उपयोगी साबित होगा।
राज नायक का कंपनी से जुड़ाव केवल पद या आर्थिक लाभ तक सीमित नहीं है। वे यह जिम्मेदारी अपने मित्र अतुल हेगड़े की याद और उनके सपनों को आगे बढ़ाने के लिए निभा रहे हैं।
समय आने पर मन्नन कपूर या कंपनी के अन्य युवा लीडर्स में से कोई भी यह जिम्मेदारी संभाल सकता है। वास्तव में कंपनी में ऐसे कम से कम तीन लीडर मौजूद हैं, जो भविष्य में नेतृत्व की भूमिका निभाने की क्षमता रखते हैं।
आज भारत में लोगों की औसत आयु लगातार बढ़ रही है। अब फाउंडर और चीफ एग्जिक्यूटिव ऑफिसर (CEO) भी 70 से 75 वर्ष की उम्र तक सक्रिय रूप से काम कर रहे हैं।
राज नायक अभी साठ वर्ष की शुरुआती उम्र में हैं और इस पूरे डिजिटल इकोसिस्टम की गहरी समझ और अनुभव रखते हैं।
यह उन युवा फाउंडर्स के लिए भी एक महत्वपूर्ण संदेश है, जो अपनी कंपनियों को शेयर बाजार में सूचीबद्ध कर चुके हैं और अक्सर मुझसे अनुभवी सलाहकारों या बिजनेस लीडर्स की सिफारिश करने के लिए कहते हैं। जब भी मैंने 54–55 वर्ष की उम्र वाले अनुभवी लोगों के नाम सुझाए, तो कई फाउंडर्स ने उन्हें केवल सलाहकार की भूमिका तक सीमित मान लिया, जबकि मेरी राय इससे अलग है। मेरा मानना है कि युवा फाउंडर्स के पास ऊर्जा, नई सोच और कंपनी को शुरू करने, बढ़ाने और सूचीबद्ध कराने की क्षमता होती है, लेकिन उन्हें ऐसी अनुभवी नेतृत्व टीम की भी जरूरत होती है जो मजबूत टीम तैयार करे, नए लीडर्स को विकसित करे और अपने अनुभव, परिपक्वता, समझ तथा संवेदनशीलता से कंपनी को सही दिशा दे सके।
राज नायक का YAAP का नेतृत्व संभालना इसी सोच का सबसे अच्छा उदाहरण है। उनकी नियुक्ति के बाद YAAP के शेयरों में तेजी आई और कंपनी का स्टॉक अपर सर्किट तक पहुंच गया। इससे साफ है कि बाजार ने राज नायक के नेतृत्व, अनुभव और क्षमता पर भरोसा जताया है। राज नायक में उद्यमशील सोच है और यही गुण अतुल हेगड़े के विजन को आगे बढ़ाने में मदद करेगा।
मुझे पूरा विश्वास है कि राज नायक भविष्य में मन्नन कपूर जैसे युवा लीडर्स का मार्गदर्शन करेंगे, उन्हें प्रशिक्षित करेंगे और कंपनी के अगले नेतृत्व को तैयार करेंगे।
इसके साथ ही वे अपने व्यापक उद्योग संबंधों का उपयोग करके YAAP के लिए नए अवसर और अधिक मूल्य भी पैदा करेंगे।
अगर YAAP लगातार अच्छा प्रदर्शन करता है तो इसका फायदा केवल कंपनी को ही नहीं, बल्कि उन सभी डिजिटल एजेंसियों को भी मिलेगा जो शेयर बाजार में सूचीबद्ध हैं या भविष्य में सूचीबद्ध होना चाहती हैं। YAAP की सफलता हम सभी की सफलता है और पूरे डिजिटल मार्केटिंग उद्योग की सफलता भी।
पांच वर्षों से नई IRS रिपोर्ट नहीं आई है, लेकिन प्रिंट विज्ञापन उद्योग ने नए तरीके अपना लिए हैं। मीडिया एजेंसियां अब सर्कुलेशन, बाजार विश्लेषण के आधार पर मीडिया प्लान तैयार कर रही हैं।
by
समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
गणपति विश्वनाथन, कम्युनिकेशन कंसल्टेंट और लेखक।
भारतीय प्रिंट मीडिया उद्योग में इंडियन रीडरशिप सर्वे (IRS) लंबे समय तक विज्ञापन और मीडिया प्लानिंग का सबसे भरोसेमंद आधार रहा। विज्ञापनदाता इसी के आधार पर तय करते थे कि किस अखबार में निवेश करना है, मीडिया एजेंसियां अपनी योजनाएं बनाती थीं और समाचार पत्र अपने पाठक वर्ग की पहुंच साबित करते थे। लेकिन पिछले लगभग पांच वर्षों से नई IRS रिपोर्ट जारी नहीं हुई है। कार्यप्रणाली, फंडिंग और प्रशासनिक मुद्दों पर मतभेदों के कारण इसका संचालन लगातार टलता रहा है। इसके बावजूद प्रिंट विज्ञापन बाजार पूरी तरह नहीं रुका और उद्योग ने नई परिस्थितियों के अनुसार खुद को ढाल लिया।
IRS के अभाव में अब मीडिया एजेंसियां किसी एक मानक पर निर्भर नहीं हैं। वे पुराने IRS आंकड़ों, ऑडिटेड सर्कुलेशन डेटा, प्रकाशकों के स्वयं के शोध, बाजार की जानकारी, पिछले विज्ञापन अभियानों के अनुभव और अपने विश्लेषण का मिश्रण तैयार करके मीडिया प्लान बनाती हैं। कई कंपनियां अपने सेल्स नेटवर्क और बाजार से मिलने वाले फीडबैक को भी निर्णय का आधार बनाती हैं। यानी अब मीडिया प्लानिंग किसी एक रिपोर्ट के बजाय कई स्रोतों की जानकारी पर आधारित हो गई है।
इसी दौरान बड़े समाचार पत्र समूहों ने अपनी फर्स्ट-पार्टी डेटा क्षमता को मजबूत किया है। सब्सक्रिप्शन डेटाबेस, वेबसाइट ट्रैफिक, मोबाइल ऐप, डिजिटल रीडरशिप और सीआरएम सिस्टम के जरिए वे अपने पाठकों के व्यवहार को पहले से बेहतर समझ पा रहे हैं। हालांकि विज्ञापनदाता इस डेटा को पूरी तरह स्वीकार करने से पहले किसी स्वतंत्र सत्यापन की अपेक्षा भी रखते हैं, क्योंकि यह जानकारी स्वयं प्रकाशकों द्वारा तैयार की जाती है।
सर्कुलेशन और रीडरशिप दोनों अलग-अलग बातें हैं। ऑडिटेड सर्कुलेशन यह बताता है कि कितनी प्रतियां छपी और वितरित हुईं, लेकिन इससे यह पता नहीं चलता कि वास्तव में उन्हें कितने लोगों ने पढ़ा और वे किस वर्ग के पाठक थे। यही कारण है कि प्रीमियम, युवा या विशेष उपभोक्ता वर्ग को लक्षित करने वाले ब्रांडों के लिए केवल सर्कुलेशन पर्याप्त नहीं माना जाता।
IRS के अभाव का सबसे अधिक असर छोटे और क्षेत्रीय प्रकाशकों पर पड़ा है। बड़े मीडिया समूह अपनी मजबूत ब्रांड पहचान, विज्ञापनदाताओं से पुराने संबंध और बेहतर डेटा एनालिटिक्स के कारण बाजार में टिके हुए हैं। इसके विपरीत छोटे प्रकाशकों के लिए राष्ट्रीय विज्ञापनदाताओं के सामने अपने पाठक वर्ग की विश्वसनीयता साबित करना कठिन हो गया है। इससे बड़े और छोटे प्रकाशकों के बीच प्रतिस्पर्धा का अंतर और बढ़ने की आशंका है।
डिजिटल विज्ञापन के बढ़ते प्रभाव ने भी मीडिया प्लानिंग का तरीका बदल दिया है। अब विज्ञापनदाता केवल रीडरशिप नहीं, बल्कि अभियान के वास्तविक परिणाम, उपभोक्ता सहभागिता, क्रॉस-प्लेटफॉर्म पहुंच और निवेश पर मिलने वाले लाभ को भी महत्व देते हैं। इसलिए एजेंसियां अब ऐतिहासिक IRS डेटा, सर्कुलेशन, प्रकाशकों के आंकड़ों और अपने अनुभव को मिलाकर निर्णय ले रही हैं।
उद्योग आज भी एक स्वतंत्र और विश्वसनीय रीडरशिप सर्वे की आवश्यकता महसूस करता है, लेकिन भविष्य का IRS केवल पुराने मॉडल की वापसी नहीं होना चाहिए। नई व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए जो प्रिंट के साथ डिजिटल प्लेटफॉर्म पर भी उपभोक्ताओं की मीडिया खपत, सहभागिता और व्यवहार को माप सके। आज का विज्ञापन बाजार केवल पाठक संख्या नहीं, बल्कि वास्तविक व्यावसायिक प्रभाव और भरोसेमंद डेटा चाहता है। इसलिए IRS की वापसी तभी सार्थक होगी, जब वह बदलते मीडिया परिदृश्य और आधुनिक विज्ञापन जरूरतों के अनुरूप खुद को विकसित कर सके।
( यह लेखक के निजी विचार हैं )
फीफा वर्ल्ड कप 2026 अपने अंतिम दौर में पहुंच चुका है। ऐसे में मीडिया इंडस्ट्री में एक बार फिर टीवी रेटिंग, डिजिटल रीच, सब्सक्रिप्शन ग्रोथ और विज्ञापन से होने वाली कमाई को लेकर चर्चा तेज होना तय है।
by
समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
मोहित मेहरा, फाउंडर, MCode वेंचर्स ।।
फीफा वर्ल्ड कप 2026 अपने अंतिम दौर में पहुंच चुका है। ऐसे में मीडिया इंडस्ट्री में एक बार फिर टीवी रेटिंग, डिजिटल रीच, सब्सक्रिप्शन ग्रोथ और विज्ञापन से होने वाली कमाई को लेकर चर्चा तेज होना तय है।
बेशक, ये सभी किसी भी बड़े स्पोर्ट्स इवेंट की सफलता के अहम पैमाने हैं। लेकिन इन सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या कोई वैश्विक खेल आयोजन किसी ब्रॉडकास्टर के लिए एक मजबूत और लंबे समय तक चलने वाला ब्रैंड भी बना सकता है?
इतिहास बताता है कि इसका जवाब 'हां' है।
पिछले 25 वर्षों में भारत में जिस भी ब्रॉडकास्टर ने फीफा वर्ल्ड कप के प्रसारण अधिकार हासिल किए, उसने इस टूर्नामेंट का इस्तेमाल अपने स्पोर्ट्स ब्रैंड को स्थापित करने, मजबूत करने या नई पहचान देने के लिए किया।
2002 में Ten Sports ने खुद को एक मजबूत चुनौती देने वाले स्पोर्ट्स चैनल के रूप में स्थापित किया। 2006 और 2010 के वर्ल्ड कप के जरिए ESPN Star Sports ने अपनी बादशाहत और मजबूत की। 2014 और 2018 में Sony Pictures Networks ने Sony SIX को अंतरराष्ट्रीय खेलों के प्रमुख चैनल के रूप में स्थापित किया। वहीं 2022 में Viacom18 ने फीफा वर्ल्ड कप का इस्तेमाल Sports18 को तेजी से आगे बढ़ाने और JioCinema के जरिए डिजिटल स्पोर्ट्स देखने के तरीके को बदलने के लिए किया।
दिलचस्प बात यह है कि सभी ब्रॉडकास्टर्स के पास एक ही टूर्नामेंट था, लेकिन हर किसी की रणनीति अलग थी। इन सभी की सफलता की असली वजह सिर्फ फुटबॉल नहीं थी। असल वजह थी मजबूत ब्रैंड बनाने की रणनीति।
अब जब अगले फीफा वर्ल्ड कप चक्र के अधिकार Zee के पास हैं, तो उसके सामने सिर्फ शानदार कवरेज देने की चुनौती नहीं है। उसके सामने भारत का अगला बड़ा स्पोर्ट्स ब्रॉडकास्टिंग ब्रैंड तैयार करने का मौका भी है।
सिर्फ अधिकार नहीं, सही रणनीति भी जरूरी
मीडिया अधिकार किसी भी टूर्नामेंट पर लोगों का ध्यान जरूर खींचते हैं। लेकिन किसी ब्रैंड की असली पहचान मजबूत रणनीति से बनती है।
2002 फीफा वर्ल्ड कप के दौरान सबसे बड़ी सीख यह मिली थी कि सिर्फ टीवी प्रमोशन के भरोसे दर्शकों का जुड़ाव नहीं बनाया जा सकता। उस समय मार्केटिंग बजट सीमित था और अंतरराष्ट्रीय फुटबॉल को लेकर लोगों में जागरूकता भी कम थी।
ऐसे में Ten Sports ने अलग सोच अपनाई। उन्होंने खुद से सवाल किया कि अगर मार्केटिंग बजट बढ़ाया नहीं जा सकता तो क्या साझेदारियों के जरिए उसका असर बढ़ाया जा सकता है?
इसी सोच के तहत पब, क्लब, रेस्तरां और शॉपिंग मॉल को सिर्फ विज्ञापन की जगह नहीं, बल्कि रणनीतिक साझेदार बनाया गया। ऐसा मॉडल तैयार किया गया जिसमें सभी की व्यावसायिक हिस्सेदारी जुड़ी हो और सभी टूर्नामेंट की सफलता में भागीदार बनें।
भारत में शायद पहली बार आउटडोर मैच देखने के अनुभव को स्पोर्ट्स मार्केटिंग का हिस्सा बनाया गया। फुटबॉल अब सिर्फ घर पर बैठकर देखने का खेल नहीं रहा। यह लोगों के साथ मिलकर अनुभव करने वाला आयोजन बन गया।
फीफा वर्ल्ड कप फाइनल को सिनेमाघरों तक ले जाया गया। बड़े वीडियो वॉल लगाकर शॉपिंग मॉल को फैन जोन बनाया गया। पब और क्लब मैच देखने के प्रमुख स्थान बन गए। आज जिस 'फैन पार्क' की चर्चा होती है, उस समय उसी तरह के प्रयोग शुरू हो चुके थे।
इसका सबसे बड़ा फायदा व्यावसायिक रूप से मिला। मीडिया खरीदने की बजाय साझेदारियां बनाकर मार्केटिंग बजट का असर कई गुना बढ़ गया। होटल और रेस्तरां में भीड़ बढ़ी, रिटेल पार्टनर्स को ग्राहक मिले और दर्शकों को यादगार अनुभव मिला। यानी सभी को फायदा हुआ।
सबसे सफल मार्केटिंग वही होती है, जिसमें खर्च अकेले न उठाना पड़े।
स्क्रीन से बाहर भी बनता है ब्रॉडकास्ट ब्रैंड
Ten Sports की सोच सिर्फ मैच दिखाने तक सीमित नहीं थी। उसका उद्देश्य था कि दर्शक अपने साथ ब्रैंड की कोई याद भी लेकर जाएं। इसी सोच के तहत ब्रैंडेड टी-शर्ट, घड़ियां, फुटबॉल और अन्य मर्चेंडाइज तैयार किए गए। इन उत्पादों ने दर्शकों को ब्रैंड का एंबेसडर बना दिया।
आज लगभग हर बड़े स्पोर्ट्स इवेंट में मर्चेंडाइज आम बात है। लेकिन उस दौर में यह सोच बिल्कुल नई थी।
संदेश साफ था कि ब्रॉडकास्ट ब्रैंड सिर्फ टीवी स्क्रीन तक सीमित नहीं होना चाहिए। उसे वहां भी मौजूद होना चाहिए, जहां उसके दर्शक हों। लोग विज्ञापन भूल सकते हैं। लेकिन अच्छे अनुभव और उनसे जुड़ा ब्रैंड लंबे समय तक याद रहता है।
Zee के पास नया इतिहास लिखने का मौका
भारत में फीफा वर्ल्ड कप के हर प्रसारणकर्ता ने अपनी अलग रणनीति छोड़ी है। अब Zee के पास अगला अध्याय लिखने का अवसर है। लेकिन यह रणनीति सिर्फ विज्ञापन और सब्सक्रिप्शन तक सीमित नहीं रह सकती। स्पोर्ट्स ब्रॉडकास्टिंग का अगला दौर अनुभव आधारित कमाई पर आधारित होगा।
कल्पना कीजिए कि वर्ल्ड कप के दौरान होटल और हॉस्पिटैलिटी कंपनियां सिर्फ प्रायोजक नहीं बल्कि वितरण साझेदार बनें। शॉपिंग मॉल फैन डेस्टिनेशन बनें। ब्रैंड्स इमर्सिव व्यूइंग एक्सपीरियंस तैयार करें। मर्चेंडाइज सीधे कारोबार का हिस्सा बने। फैन फेस्टिवल हर साल आयोजित होने वाली संपत्ति बन जाएं। रिटेल कंपनियां, कंटेंट क्रिएटर्स, गेमिंग प्लेटफॉर्म, ट्रैवल कंपनियां और टेक्नोलॉजी पार्टनर्स मिलकर एक ऐसा इकोसिस्टम तैयार करें जो मैच प्रसारण से कहीं ज्यादा मूल्य पैदा करे।
अब सवाल यह नहीं होना चाहिए कि प्रसारण से कमाई कैसे बढ़ाई जाए। सवाल यह होना चाहिए कि फैन एक्सपीरियंस से कमाई कैसे बढ़ाई जाए। यही सोच भारत में स्पोर्ट्स ब्रॉडकास्टिंग की अर्थव्यवस्था बदल सकती है।
2030 तक पूरी तरह बदल जाएगी स्पोर्ट्स ब्रॉडकास्टिंग
इस दशक के अंत तक स्पोर्ट्स ब्रॉडकास्टिंग आज से बिल्कुल अलग दिखाई देगी। सिर्फ सबसे ज्यादा प्रसारण अधिकार रखने वाला ब्रॉडकास्टर सफल नहीं होगा। सफल वही होगा जो सबसे मजबूत फैन इकोसिस्टम तैयार करेगा।
मैच का प्रसारण सिर्फ एक हिस्सा होगा। पूरा अनुभव उससे कहीं बड़ा होगा।
कल्पना कीजिए कि कोई दर्शक किसी कंटेंट क्रिएटर के वीडियो से मैच के बारे में जाने, दोस्तों के साथ प्रीमियम व्यूइंग इवेंट बुक करे, वहीं से आधिकारिक मर्चेंडाइज खरीदे, मैच के दौरान प्रिडिक्टिव गेमिंग खेले, स्पॉन्सर्स से लॉयल्टी रिवॉर्ड पाए और भविष्य के स्पोर्ट्स इवेंट्स के लिए व्यक्तिगत ऑफर भी हासिल करे।
यह भविष्य बहुत दूर नहीं है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस दर्शकों के अनुभव को व्यक्तिगत बनाएगा। कॉमर्स सीधे प्रसारण का हिस्सा बन जाएगा। स्पॉन्सरशिप की सफलता सिर्फ इम्प्रेशन से नहीं बल्कि बिक्री और ग्राहकों के लंबे संबंधों से मापी जाएगी।
डेटा की मदद से ब्रॉडकास्टर्स, ब्रैंड्स और दर्शकों के बीच रिश्ते और मजबूत होंगे। भविष्य में सिर्फ दर्शकों की संख्या नहीं, बल्कि मजबूत कम्युनिटी ज्यादा अहम होगी। सबसे सफल स्पोर्ट्स ब्रैंड अपने दर्शकों को सिर्फ व्युअर नहीं बल्कि सदस्य मानेंगे। इससे ब्रॉडकास्टर्स के लिए कमाई के नए रास्ते खुलेंगे।
विज्ञापन के साथ-साथ कॉमर्स, लाइसेंसिंग, हॉस्पिटैलिटी, प्रीमियम मेंबरशिप, गेमिंग, फैन कम्युनिटी, एक्सपीरिएंशियल इवेंट्स और डेटा आधारित स्पॉन्सरशिप भी राजस्व का बड़ा स्रोत बनेंगे।
अब सबसे बड़ा सवाल यह नहीं रहेगा कि रेटिंग कैसे बढ़ाई जाए। असल सवाल होगा कि हर फैन की लाइफटाइम वैल्यू कैसे बढ़ाई जाए। जो ब्रॉडकास्टर इसका जवाब ढूंढ़ लेगा, वही अगले दशक की स्पोर्ट्स मीडिया इंडस्ट्री की दिशा तय करेगा।
सिर्फ फुटबॉल नहीं, हर खेल पर लागू होती है यह सोच
यह सोच सिर्फ फीफा वर्ल्ड कप तक सीमित नहीं है। चाहे आईपीएल हो, इंडियन सुपर लीग, प्रो कबड्डी लीग, अल्टीमेट टेबल टेनिस, बैडमिंटन, मोटरस्पोर्ट्स या कोई नया फ्रेंचाइजी टूर्नामेंट- सभी के सामने चुनौती एक जैसी है।
अब सिर्फ मीडिया अधिकार और स्पॉन्सरशिप से सफलता तय नहीं होगी। भविष्य उनका होगा जो ऐसा इकोसिस्टम बनाएंगे जिसमें ब्रॉडकास्टर्स, ब्रैंड्स, वेन्यू, रिटेल कंपनियां, टेक्नोलॉजी पार्टनर्स, कंटेंट क्रिएटर्स और फैंस सभी मिलकर मूल्य तैयार करें।
अगले दशक में भारतीय खेलों की दिशा यह तय नहीं करेगी कि अधिकार किसके पास हैं, बल्कि यह तय करेगा कि कौन अपने दर्शकों के लिए सबसे बेहतर और यादगार अनुभव तैयार करता है। इसके लिए उपभोक्ताओं की समझ, व्यावसायिक सोच और बेहतरीन क्रियान्वयन- तीनों की जरूरत होगी।
MCode Ventures का भी मानना है कि स्पोर्ट्स मार्केटिंग का भविष्य इसी दिशा में है। कंपनी अधिकार धारकों, ब्रॉडकास्टर्स, लीग्स और ब्रैंड्स के साथ मिलकर ऐसे अवसर तलाशने पर काम करती है जो सिर्फ प्रसारण तक सीमित न हों, बल्कि उपभोक्ता व्यवहार, मीडिया इनोवेशन, साझेदारियों और व्यावसायिक रणनीति को जोड़कर लंबे समय तक टिकाऊ मूल्य तैयार करें।
क्योंकि खेलों की दुनिया में सबसे बड़ा अवसर सिर्फ प्रसारण अधिकार हासिल करना नहीं है, बल्कि उनके आसपास एक मजबूत इकोसिस्टम तैयार करना है। शायद यही वह सबसे बड़ी सीख है, जो पिछले 25 वर्षों में फीफा वर्ल्ड कप ने भारत के मीडिया और स्पोर्ट्स इंडस्ट्री को दी है।
सरकार कहती है कि क्रूड ऑयल का दाम प्रति बैरल $70 से नीचे रहेगा तो Ethanol पेट्रोल से महंगा होगा लेकिन $120-130 की रेंज में रहेगा तो Ethanol सस्ता पड़ता है।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
मिलिंद खांडेकर, वरिष्ठ पत्रकार।
पिछले हफ़्ते मैंने E20 का हिसाब-किताब किया था, तो बहुत सारे लोगों ने सवाल किया कि 20% एथेनॉल (Ethanol) मिला पेट्रोल (E20) सस्ता क्यों नहीं मिल रहा है? आख़िर इसमें 20% पेट्रोल कम है। पिछले हफ़्ते भर में सरकार ने दो बार इस सवाल का जवाब दिया है। जवाब का सार यह है कि E20 पेट्रोल आज की कीमतों पर सामान्य पेट्रोल से महंगा पड़ रहा है।
एथेनॉल को मक्का, गन्ने और खराब चावल से बनाया जाता है। इसका दाम ₹58 से लेकर ₹72 प्रति लीटर है। सरकार ने कहा कि 2021 में एथेनॉल को लेकर नीति आयोग ने रिपोर्ट बनाई थी। उस समय पेट्रोल की तुलना में एथेनॉल सस्ता था, लेकिन अब इसके दाम बढ़ चुके हैं। ये दाम भी सरकार ने ही बढ़ाए हैं, ताकि एथेनॉल का उत्पादन बढ़ाया जा सके और किसानों की आय में वृद्धि हो।
सरकार का कहना है कि यदि क्रूड ऑयल का दाम प्रति बैरल 70 डॉलर से नीचे रहेगा, तो एथेनॉल पेट्रोल से महंगा पड़ेगा। लेकिन यदि इसकी कीमत 120-130 डॉलर प्रति बैरल की रेंज में रहती है, तो एथेनॉल सस्ता साबित होता है, जैसा अमेरिका-ईरान युद्ध के दौरान देखने को मिला।
दुनिया में संकट की स्थिति होने पर एथेनॉल फायदे का सौदा बन जाता है, लेकिन संकट हमेशा नहीं रहता। 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण क्रूड ऑयल महंगा हुआ था और अब ईरान के कारण कीमतों में उतार-चढ़ाव देखने को मिला। सरकार चाहे जितना गणित पेश करे, लेकिन मौजूदा कीमतों के हिसाब से एथेनॉल मिलाने से पेट्रोल महंगा ही पड़ रहा है।
एक बार के लिए मान लेते हैं कि E20 पेट्रोल देशहित में है। इससे क्रूड ऑयल की खपत कम होगी, विदेशी मुद्रा की बचत होगी, ऊर्जा सुरक्षा (Energy Security) मजबूत होगी, 20% कम पेट्रोल खर्च होने से प्रदूषण घटेगा और किसानों की आय भी बढ़ेगी। लेकिन सवाल यह है कि ग्राहकों को इससे क्या फायदा होगा?
सरकार ने E20 लागू करने के लिए नीति आयोग की 2021 की रिपोर्ट को आधार बनाया है। उसी रिपोर्ट में यह भी सिफारिश की गई थी कि E20 पेट्रोल पर सरकार को टैक्स में छूट देनी चाहिए, क्योंकि इसका माइलेज कम होता है। ऐसा लगता है कि सरकार इस महत्वपूर्ण सिफारिश को भूल गई है।
( यह लेखक के निजी विचार हैं )
विदेश मंत्रालय के अनुसार विश्व में 3.5 करोड़ से अधिक भारतीय मूल के लोग और अनिवासी भारतीय रहते हैं। यह दुनिया का सबसे बड़ा प्रवासी समुदाय है।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
आलोक मेहता, पद्मश्री, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक।
भारतीय किसी भी देश में जाकर वहां की संस्कृति में ऐसे घुल-मिल जाते हैं, जैसे "दूध में चीनी"। एक सपना पूरा होता है, तो दूसरा जन्म लेता है। 140 करोड़ लोगों की आकांक्षाओं (Aspiration) से भरे राष्ट्र होने के अलावा हम दुनिया में सबसे तेजी से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने ऑस्ट्रेलिया दौरे के दौरान मेलबर्न के मार्वल स्टेडियम में एक विशाल भारतीय समुदाय के कार्यक्रम में यह बात बड़े मधुर ढंग से कही, लेकिन इसके पीछे गहरे अर्थ हैं।
आजकल इस बात की चर्चा कभी सराहना के रूप में होती है और कभी आलोचना के रूप में कि क्या भारत छोड़कर विदेश जाने वालों की संख्या लगातार बढ़ रही है? यह प्रश्न आज संसद से लेकर विश्वविद्यालयों, उद्योग जगत और आम नागरिकों तक चर्चा का विषय है। पिछले कुछ वर्षों में एक और तथ्य ने इस बहस को तेज किया है—हर वर्ष दो लाख से अधिक भारतीय अपनी नागरिकता त्यागकर अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी तथा अन्य देशों की नागरिकता ग्रहण कर रहे हैं।
लेकिन क्या इसका अर्थ यह है कि भारत से प्रतिभा पलायन (Brain Drain) लगातार बढ़ रहा है, अथवा अवसर, योग्यता और भारत की प्रगति से प्रभावित होकर दुनिया के कई देश भारतीयों के स्वागत के लिए तैयार खड़े हैं? यही नहीं, विदेश में काम करने और रहने वाले भारतीय अपनी आय और बचत का बड़ा हिस्सा अपने परिवारों अथवा भारत में निवेश के लिए भेजते हैं। इसलिए इस प्रश्न का उत्तर केवल भावनाओं से नहीं, बल्कि तथ्यों, आँकड़ों और बदलती वैश्विक अर्थव्यवस्था के परिप्रेक्ष्य में खोजा जाना चाहिए।
विदेश मंत्रालय द्वारा संसद में प्रस्तुत आँकड़ों के अनुसार, वर्ष 2011 से 2024 के बीच 20.6 लाख से अधिक भारतीयों ने भारतीय नागरिकता का त्याग किया। केवल 2022, 2023 और 2024 में ही यह संख्या लगातार प्रति वर्ष दो लाख से अधिक रही। 2024 में 2,06,378 भारतीयों ने नागरिकता छोड़ी, जबकि 2023 में यह संख्या 2,16,219 और 2022 में 2,25,620 थी।
लगभग 140 करोड़ की आबादी वाले देश की दृष्टि से यह बहुत बड़ी संख्या नहीं है। हालाँकि, इन आँकड़ों को समझते समय एक महत्वपूर्ण तथ्य याद रखना चाहिए—इनमें अधिकांश वे लोग हैं, जो कई वर्ष पहले छात्र, इंजीनियर, डॉक्टर, शोधकर्ता, उद्यमी या पेशेवर के रूप में विदेश गए थे और वहाँ स्थायी निवास के बाद नागरिकता प्राप्त करने के पात्र बने। इसलिए नागरिकता त्याग का आँकड़ा उसी वर्ष भारत छोड़कर जाने वालों की संख्या नहीं दर्शाता।
भारत सरकार के देशवार आँकड़ों और विभिन्न देशों के आधिकारिक रिकॉर्ड से स्पष्ट है कि भारतीय मुख्यतः इन देशों की नागरिकता ग्रहण कर रहे हैं—अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी, न्यूज़ीलैंड, सिंगापुर, नीदरलैंड, फ्रांस और इटली। इन देशों में भारतीय समुदाय पहले से स्थापित है और उच्च शिक्षा, चिकित्सा, सूचना प्रौद्योगिकी, वित्त, अनुसंधान तथा इंजीनियरिंग में व्यापक अवसर उपलब्ध हैं।
लोकप्रिय धारणा है कि लोग केवल शक्तिशाली पासपोर्ट पाने के लिए भारतीय नागरिकता छोड़ते हैं। यह पूरी सच्चाई नहीं है। दरअसल, इसके अनेक कारण हैं। पहला, स्थायी जीवन और रोजगार की सुरक्षा। वर्षों तक वर्क परमिट पर रहने के बाद अधिकांश लोग नागरिकता इसलिए लेते हैं, ताकि उन्हें बार-बार वीज़ा या कार्य अनुमति न बढ़ानी पड़े। दूसरा, बच्चों का भविष्य।
विदेशी नागरिक बनने पर बच्चों को स्थानीय विश्वविद्यालयों में कम शुल्क, छात्रवृत्ति और रोजगार के बेहतर अवसर मिलते हैं। तीसरा, सामाजिक सुरक्षा। विकसित देशों में पेंशन, स्वास्थ्य बीमा, बेरोज़गारी सहायता और वृद्धावस्था सुरक्षा की बेहतर व्यवस्था है। चौथा, वैश्विक रोजगार। बहुराष्ट्रीय कंपनियों में कार्यरत पेशेवरों के लिए विदेशी नागरिकता अनेक देशों में कार्य करने और स्थानांतरण को आसान बनाती है।
साथ ही, उन देशों के पासपोर्ट से यात्रा करना भी अधिक सुविधाजनक हो जाता है। ब्रिटेन, जर्मनी, फ्रांस, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों के पासपोर्ट से अनेक देशों में बिना वीज़ा या सरल प्रवेश की सुविधा मिलती है। यह विशेष रूप से अंतरराष्ट्रीय व्यापार, शोध और कॉर्पोरेट क्षेत्र के लोगों के लिए महत्वपूर्ण है।
भारत पूर्ण दोहरी नागरिकता की अनुमति नहीं देता। इसलिए जब कोई भारतीय किसी दूसरे देश की नागरिकता ग्रहण करता है, तो उसे भारतीय नागरिकता त्यागनी पड़ती है। यही कारण है कि बड़ी संख्या में भारतीय विदेशी नागरिक बनने के बाद भी ओवरसीज़ सिटिजन ऑफ इंडिया (Overseas Citizen of India - OCI) कार्ड लेकर भारत से अपना संबंध बनाए रखते हैं। उन्हें भारत में दीर्घकालिक यात्रा और निवास जैसी सुविधाएँ मिलती हैं, लेकिन मतदान, चुनाव लड़ने या संवैधानिक पद धारण करने का अधिकार नहीं मिलता। सच बात यह है कि परदेस में रहकर उन्हें अपने घर, परिवार, समाज और देश से भावनात्मक लगाव और अधिक बढ़ जाता है।
विदेश मंत्रालय के अनुसार, विश्व में 3.5 करोड़ से अधिक भारतीय मूल के लोग और अनिवासी भारतीय रहते हैं। यह दुनिया का सबसे बड़ा प्रवासी समुदाय है। यह समुदाय केवल रेमिटेंस ही नहीं भेजता, बल्कि निवेश, तकनीक, व्यापार, शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यटन और भारत की वैश्विक छवि को भी मजबूत करता है। इनकी उल्लेखनीय उपस्थिति अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब, कतर, कुवैत, सिंगापुर, मलेशिया, दक्षिण अफ्रीका, मॉरीशस, फिजी और यूरोप के अनेक देशों में है।
विश्व बैंक के अनुसार, भारत कई वर्षों से दुनिया का सबसे बड़ा रेमिटेंस प्राप्त करने वाला देश बना हुआ है। विदेशों में रहने वाले भारतीय हर वर्ष 100 अरब डॉलर से अधिक की धनराशि भारत भेजते हैं। यह राशि अनेक वर्षों में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) के बराबर या उससे भी अधिक रही है। यह धन केवल परिवारों के खर्च तक सीमित नहीं रहता। इसका उपयोग शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास, कृषि, छोटे उद्योग, सेवाओं और स्थानीय अर्थव्यवस्था में निवेश के रूप में भी होता है। अनेक राज्यों—विशेषकर केरल, पंजाब, गुजरात, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना—की अर्थव्यवस्था में इसका विशेष महत्व है।
भारत "ब्रेन ड्रेन" की पुरानी बहस से आगे बढ़कर "ब्रेन गेन" और "ब्रेन नेटवर्क" का वैश्विक उदाहरण बन सकता है। भारतीय नागरिकता त्यागने वालों की बढ़ती संख्या चिंता का विषय अवश्य कही जाती है, लेकिन इसे केवल नकारात्मक दृष्टि से देखना उचित नहीं होगा। वैश्वीकरण के इस दौर में प्रतिभा सीमाओं में बँधी नहीं रहती। आज भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने युवाओं को रोकना भर नहीं, बल्कि दुनिया भर में फैली भारतीय प्रतिभा को राष्ट्र निर्माण से जोड़ना है।
यदि विकसित भारत का सपना 2047 तक साकार करना है, तो विदेशों में बसे भारतीयों को "खोई हुई प्रतिभा" नहीं, बल्कि "वैश्विक भारतीय शक्ति" के रूप में देखना होगा। यही दृष्टिकोण भारत को ज्ञान, पूँजी, नवाचार और वैश्विक प्रभाव—चारों क्षेत्रों में नई ऊँचाइयों तक पहुँचा सकता है।
बीसवीं शताब्दी में जब भारतीय वैज्ञानिक, डॉक्टर और इंजीनियर स्थायी रूप से विदेश बस जाते थे, तब इसे "ब्रेन ड्रेन" कहा जाता था। आज स्थिति अलग है। अमेरिका की सिलिकॉन वैली, लंदन, सिंगापुर, टोरंटो, सिडनी और बर्लिन में बसे भारतीय केवल विदेशी अर्थव्यवस्थाओं का हिस्सा नहीं हैं। वे भारत में निवेश कर रहे हैं, स्टार्टअप शुरू कर रहे हैं, विश्वविद्यालयों के साथ शोध सहयोग कर रहे हैं, भारतीय कंपनियों को वैश्विक बाजारों से जोड़ रहे हैं और हर वर्ष बड़ी मात्रा में धन भारत भेज रहे हैं।
विश्व बैंक के अनुसार, भारत लगातार दुनिया का सबसे बड़ा रेमिटेंस प्राप्त करने वाला देश बना हुआ है। 2024 में भारत को लगभग 135 अरब अमेरिकी डॉलर का रेमिटेंस प्राप्त हुआ। यह धन करोड़ों भारतीय परिवारों, शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास और छोटे व्यवसायों के लिए महत्वपूर्ण आधार है।
बदलते दौर में एक नई स्थिति पर भी ध्यान देने की जरूरत है। अमेरिका, यूरोप, अफ्रीका और कई एशियाई देशों से भारतीय वापस लौटकर भारत में नए उद्यम और व्यापार शुरू कर रहे हैं। यहाँ उन्हें परिवार के साथ आधुनिक सुविधाएँ, बेहतर जीवनशैली, आधुनिक हवाई अड्डे, रेलगाड़ियाँ, सड़कें, कारें और विश्वस्तरीय इमारतें मिल रही हैं। पिछले दो वर्षों में ब्रिटेन, कनाडा और कुछ अन्य देशों में आव्रजन नियम कड़े हुए हैं।
ब्रिटेन में छात्र वीज़ा नियमों में बदलाव, आश्रितों पर प्रतिबंध, रोजगार बाजार में मंदी और जीवन-यापन की बढ़ती लागत के कारण बड़ी संख्या में भारतीय छात्र और पेशेवर ब्रिटेन से बाहर गए। इसी प्रकार कनाडा ने भी अस्थायी निवास और छात्र वीज़ा पर नियंत्रण कड़ा किया।
यह भी उतना ही सत्य है कि भारत की अर्थव्यवस्था पिछले दशक में तेजी से बदली है। आज भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा स्टार्टअप इकोसिस्टम है, ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर (GCC) का प्रमुख केंद्र बन चुका है, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), सेमीकंडक्टर, रक्षा उत्पादन और अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी में बड़े निवेश आकर्षित कर रहा है तथा डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना (UPI, आधार, ONDC आदि) के कारण वैश्विक नवाचार का उदाहरण बन रहा है। इसी कारण विदेशों में कार्यरत अनेक भारतीय विशेषज्ञ भारत में निवेश कर रहे हैं या परियोजना आधारित कार्यों के लिए लौट रहे हैं। यद्यपि इसकी आधिकारिक संख्या उपलब्ध नहीं है, पर उद्योग जगत में "ब्रेन सर्कुलेशन" अर्थात प्रतिभा के वैश्विक आवागमन की चर्चा बढ़ी है।
भारत आज विश्व का तीसरा सबसे बड़ा स्टार्टअप इकोसिस्टम है। हजारों तकनीकी कंपनियाँ कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), फिनटेक, हेल्थटेक, डीप-टेक, रक्षा तकनीक और अंतरिक्ष क्षेत्र में कार्य कर रही हैं। विदेशों में अनुभव प्राप्त भारतीय पेशेवर इन कंपनियों का नेतृत्व कर रहे हैं। गूगल, माइक्रोसॉफ्ट, अमेज़न, एप्पल, जेपी मॉर्गन, गोल्डमैन सैक्स, डेलॉइट, एरिक्सन, बोइंग, एयरबस, मर्सिडीज़-बेंज और बीएमडब्ल्यू जैसी अनेक वैश्विक कंपनियों ने भारत में अपने ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर स्थापित किए हैं।
आज बेंगलुरु, हैदराबाद, पुणे, गुरुग्राम, नोएडा और चेन्नई विश्वस्तरीय अनुसंधान एवं इंजीनियरिंग केंद्र बन चुके हैं। इन केंद्रों में विदेशों में कार्य कर चुके भारतीयों की मांग लगातार बढ़ रही है। भारत में सेमीकंडक्टर निर्माण, इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पादन और चिप डिजाइन में बड़े निवेश शुरू हुए हैं। इन क्षेत्रों में ताइवान, अमेरिका और यूरोप में कार्यरत भारतीय विशेषज्ञों को भारत में आकर्षक अवसर मिलने लगे हैं।
रक्षा उत्पादन, ड्रोन, मिसाइल, उपग्रह, अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी और निजी अंतरिक्ष उद्योग के विस्तार ने उच्च कौशल वाले भारतीय इंजीनियरों के लिए नए अवसर पैदा किए हैं। यूपीआई, आधार, डिजिटल भुगतान, ई-गवर्नेंस, ONDC और डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना ने भारत को विश्व का एक अनूठा डिजिटल बाजार बना दिया है। विदेशी कंपनियाँ अब भारत को केवल "आउटसोर्सिंग सेंटर" नहीं, बल्कि "नवाचार केंद्र" के रूप में देखने लगी हैं।
कुछ विशेषज्ञ इसे "रिवर्स ब्रेन ड्रेन" कहते हैं, लेकिन अधिक उपयुक्त शब्द है-"ब्रेन सर्कुलेशन", अर्थात प्रतिभा का वैश्विक आवागमन। आज एक भारतीय अमेरिका या ब्रिटेन में पढ़ सकता है, जर्मनी में शोध कर सकता है, सिंगापुर या भारत में काम कर सकता है अथवा भारत में स्टार्टअप शुरू कर सकता है। भारतीय प्रतिभा अब एक ही देश तक सीमित नहीं रही। अब आकाश से सात समुंदर पार तक भारत की चमक दिखाई दे रही है।
( यह लेखक के निजी विचार हैं )
आपके जीवन में आनंद के ऐसे पल कब और कहां आ पाते हैं। इससे बेहतर और क्या हो सकता है कि सम्पा के लोकार्पण ने मुझे साथियों के आसपास होने का अहसास कराया।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
कोई-कोई दिन ऐसा होता है जब आपको समझ नहीं आता कि जो हो रहा है वो सच है। जब वो हो जाता है तो हम मौन हो जाते हैं। कुछ कह ही नहीं पाते। सम्पा के लोकार्पण समारोह के साथ ऐसा ही हुआ। पांचवी किताब से पहले जो भी किताब रिलीज़ हुईं वो किसी ना किसी साहित्य समारोह में हुईं। जहां मुझे कुछ नहीं सोचना था। ये पहला आयोजन था जहां मुख्य अतिथि से लेकर आम अतिथि तक सब हमें ही सोचना था।
वेस्टलैंड ने कहा कि सौ लोगों के बैठने की सीटिंग होगी हॉल में। उसी हिसाब से लोग आमंत्रित करने हैं। मैं असमंजस में पड़ गया सौ लोग कहां से आयेंगे। मेरे बुलाने से तो दस लोग ना आयें। यही सोच कर मैं चिंता में डूबा रहा। सबसे पहले मुख्य अतिथि राजदीप सरदेसाई सर से बात की। उनकी तारीख मिलना आसान नहीं होता। वो दुनिया भर में ट्रैवल करते हैं। सबसे पहले उनकी तारीख ही चाहिये थी। उन्होंने सिर्फ इतना पूछा कि तुम्हारी किताब है। मैने कहा जी। ओके टाईगर। करते है।
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फिर विशिष्ट अतिथि सुप्रिय प्रसाद के पास गया। उनको बताया। तो वो बोले अरे राजदीप सर हो गये ना तो फिर क्या करना है। मैने कहा नहीं, आपकी ज़रूरत है। आपको होना चाहिये। बोले अच्छा ठीक है। चलो कर लते हैं। अब बारी थी हमारी मॉडरेटर ऋचा अनिरद्ध की। वो भी लगातार शूट पर आती जाती रहती हैं। उनसे पूछा तो वो फौरन तैयार गयीं। उन्होंने कहा कि आपकी किताब के लिय तो ना करने का सवाल ही नहीं है।
इस तरह अतिथि तय हुए। आईआईसी बुक हुआ। सम्पा और मीनाक्षी चौधरी को सूचित किया गया। दोनो को बाहर से आना था। सम्पा को रोहतक से तो मीनाक्षी को भटिंडा से। अब बारी थी दर्शक या श्रोताओं की। सबको सूचित करना। ये एक काम मेरे लिये बेहद मुश्किल रहा है। अपने लिये कुछ मांगना या कहना। घबराते हुए दोस्त और परिचितों को मैसेज करने शुरू किये। फिर रिमाइंडर डाला। मुझे हमेशा ये लगता है कि कोई मेरे कहने पर मुझे सुनने क्यों आयेगा। वो भी मेरी किताब पर।
साहित्यिक कार्यक्रमों को बहुत बोरिंग औऱ पांच सात लोगों के बीच भी होते देख है। कई बार तो वक्ता ज़्यादा होते हैं श्रोता कम। तो दिल घबराता है। कही मेरा कार्यक्रम बोरिंग हुआ तो। ये आशंका हमेशा मेरे दिमाग में चलती रहती है। एक एक दिन करके सात तारीख आ गयी।
और वही हुआ जिसका डर था। दोपहर में झमाझम बारिश शुरू हो गयी। मेरी घबराहट और बढ़ गयी। अब तो और भी लोग नहीं आयेंगे। हॉल खाली ही रह जायेगा। सौ लोग भी नही होंगे। कुर्सियां खाली रह जायेंगी। साढ़े चार बजे ऑफिस से निकला तो चार पांच मैसेज आ चुके थे। बारिश के वजह से ट्रैफिक जाम और जल भराव की वजह से मित्र ना आ पाने के लिये क्षमापार्थी थे। अब क्या ही कहता। दिल्ली का ट्रफिक बारिश में बेहद खतरनाक हो जाता है। ये सच है। ऐसे में घंटो ट्रैफिक में फंसना दुखदायी ही होता है।
मैं आईआईसी पहुंचा। घड़ी ने साढे पांच बजाये। लोग आने लगे। मुख्य अतिथि और विशिष्ठ अतिथि आ गये। मॉडरेटर भी आ गयीं। ठीक छह बजे हमारा कार्यक्रम शुरू हो गया। और हॉल खचाखच भर गया। मुझे देख कर तसल्ली मिली की बारिश के बावजूद दोस्त और साथी आये।
शुरुआत में ही राजदीप और सुप्रिय के बीच हुए संवाद ने मूड सैट कर दिया। ये तय हो गया कि कार्यक्रम कुछ भी हो बोर नही होगा। फिर ऋचा के सवाल और मीनाक्षी और सम्पा की बातों ने कार्यक्रम को बेहद सराहनीय बना दिया। ये लोग इस कार्यक्रम के स्टार रहे।
मेरी आशंका निर्मूल साबित हुई। मेरे दिल कृतज्ञता से भरा हुआ है। सिर फख्र से ऊंचा है कि मेरे पास ऐसे दोस्त हैं। ऐसे साथी हैं जो बारिश और ट्रफिक से बेपरवाह होकर मेरे लिये, मेरी किताब के लिये, मुझे सुनने आ सकते है।
आपके जीवन में आनंद के ऐसे पल कब और कहां आ पाते हैं। इससे बेहतर और क्या हो सकता है कि सम्पा मेरे जीवन में एक नया अध्याय लेकर आयी। मुझे साथियों के आसपास होने का अहसास कराया। आपने सबने मेरे साथ वो कर दिया जिसकी कल्पना मैं कर ही नहीं सकता था। मुझे बताया कि कुर्सियां कम पड़ गयी। काफी लोगों को हॉल बाहर खड़ा हाना पड़ा।
किताबें साइन करते हुए मेरा हाथ दर्द कर गया। ये दर्द कितना मीठा है, क्या ही बताऊं। साईन करने में इतना वक्त निकल गया कि ठीक से मुलाकात भी नही कर सका। मिल ही नही सका। तीन लोगों के वक्त पर नाम ही याद नहीं आये। ये अलग शर्मिंदगी की बात रही।
आभार और धन्यवाद कहना बहुत छोटा होगा। मेरे मन में जो घुमड़ रहा है उस अहसास को शब्दों में बयान कर पाना मुश्किल है। आप सबने कमाल किया है। अभिभूत हूं। ये लिखने में मुझे 24 घंटे लग गये। कल के आयोजन को आपकी उपस्थिति ने जो गरिमा प्रदान की, उसका उत्तर आभार और कृतज्ञता नहीं, बल्कि एक मान और याद हैं, जो आजीवन मेरे साथ रहेंगी।
वेस्टलैंड की टीम को धन्यवाद किये बगैर बात खत्म नही हो सकती। अमृता तलवार, पल्लवी सिंह, मीनाक्षी ठाकुर और उनकी टीम ने कमाल का काम किया। प्रकाशन में ये लोग लाजवाब है। इतनी दरियादिल टीम होना बेहद मुश्किल है।
(वरिष्ठ पत्रकार और लेखक संजीव पालीवाल की फेसबुक वॉल से साभार)
अतुल हेगड़े, मेरे दोस्त... मैं तुम्हें बहुत याद करूंगा। तुम्हारे अधूरे सपने, तुम्हारा अपनापन और तुम्हारा विश्वास हमेशा मेरे साथ रहेगा। मैं हमेशा कामना करूंगा कि तुम्हारी विरासत और आगे बढ़े।
by
समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
डॉ. अनुराग बत्रा, चेयरमैन व एडिटर-इन-चीफ, एक्सचेंज4मीडिया ग्रुप ।।
मंगलवार, 7 जुलाई को मैं एक दोस्त की बेटी की शादी में शामिल होने के लिए जोधपुर में था। सुबह करीब 10 बजे मैंने उम्मेद भवन पैलेस से चेकआउट किया, कार में बैठा और अपनी पत्नी नीति को फोन किया। हमारी बातचीत अतुल हेगड़े को लेकर हुई। अतुल ने हमारे लिए एक काम करने का वादा किया था। नीति ने पूछा कि मैं उनसे कब बात करूंगा। मैंने कहा कि 10-15 मिनट में, जैसे ही जोधपुर एयरपोर्ट पहुंचूंगा और दिल्ली की फ्लाइट पकड़ने से पहले उन्हें फोन कर लूंगा।
इसी बीच मैंने YAAP के को-फाउंडर और अतुल के पार्टनर मनन कपूर को एक दूसरे काम के सिलसिले में मैसेज किया था। सुबह करीब 10:30 बजे मनन का फोन आया। मुझे लगा कि वह उसी काम के बारे में बात करेंगे, लेकिन जैसे ही मैंने कॉल उठाई, उन्होंने कहा कि अतुल अब इस दुनिया में नहीं रहे। यह सुनकर मेरे मुंह से सिर्फ एक शब्द निकला- "क्या?" मुझे यकीन ही नहीं हुआ कि मनन क्या कह रहे हैं। ऐसा लगा जैसे मैं कोई बुरा सपना देख रहा हूं। मैंने खुद को संभाला, फिर मनन को दोबारा फोन किया और वही बात फिर से पूछी।
मनन ने बताया कि अतुल पिछले दो दिनों से बुखार और थकान महसूस कर रहे थे। मंगलवार सुबह करीब 8 बजे उन्हें हार्ट अटैक आया और उनका निधन हो गया। यह खबर सुनकर मैं पूरी तरह स्तब्ध रह गया। मनन ने यह भी बताया कि उन्होंने अतुल को सलाह दी थी कि तबीयत ठीक नहीं है, इसलिए मीटिंग्स रद्द कर घर पर आराम करें, लेकिन किसे पता था कि हालात इतने गंभीर हो जाएंगे।
जब मैंने धीरे-धीरे इस सच्चाई को स्वीकार किया और इसे भगवान की इच्छा मान लिया, तब अतुल की मुस्कान, उनकी आवाज और उनके साथ बिताए गए तमाम पल मेरी आंखों के सामने घूमने लगे।
पिछले 24 साल से मैं अतुल को करीब से जानता था। 'एक्सचेंज4मीडिया' की शुरुआत के बाद से और उनके करीब 31 साल लंबे करियर के दौरान हम महीने में कम से कम एक-दो बार जरूर मिलते थे। कभी दिल्ली के ओबेरॉय होटल में तो कभी मुंबई के सोहो हाउस में। अतुल हमेशा गर्मजोशी से मिलते थे। चाहे कितने भी व्यस्त हों, मेरे लिए समय निकालते थे, शानदार मेजबानी करते थे और हर मुलाकात को खास बना देते थे।
अतुल को मुझ पर, मेरे विचारों और मेरी सलाह पर पूरा भरोसा था। वह अपने बिजनेस प्लान पहले से मेरे साथ साझा करते थे। कंपनी के विस्तार को लेकर उनकी सोच बेहद स्पष्ट थी। कई बार उन्होंने मुझे प्रतिभाशाली लोगों और संभावित कंपनियों की पहचान करने की जिम्मेदारी भी दी। एक बड़ी कंपनी के अधिग्रहण में मैंने उनकी मदद की थी और कुछ बड़े अधिग्रहणों पर भी काम चल रहा था।
जब भी मुझे किसी मदद की जरूरत होती, अतुल हमेशा साथ खड़े रहते थे। हाल ही में एक व्यक्ति से जुड़ा एक विवाद था, जिसे मैंने ही अतुल से मिलवाया था। पिछले हफ्ते अतुल ने मुझसे वादा किया था कि वह इस मामले को समझदारी से सुलझा देंगे और उस व्यक्ति को निष्पक्षता और सही बात का महत्व समझाएंगे।
पिछले साल मैंने अतुल की मुलाकात अपने एक ऐसे दोस्त से कराई थी, जो एक बेहद सफल नई विज्ञापन एजेंसी चलाता है। वह YAAP के लिए एक शानदार अधिग्रहण साबित हो सकता था। लेकिन अतुल ने अपने फायदे के बजाय उसे सलाह दी कि वह अपनी कंपनी का IPO लेकर आए। यही अतुल की खासियत थी। वह हमेशा निस्वार्थ सोचते थे। उन्हें यह भी साफ पता होता था कि उन्हें क्या नहीं करना है।
हर 15 दिन में हमारी दो से तीन घंटे लंबी बातचीत होती थी। उन चर्चाओं में उनके मजबूत विचार, स्पष्ट सोच और दूरदृष्टि साफ दिखाई देती थी। उनका सपना सिर्फ अपनी कंपनी को बड़ा बनाना नहीं था, बल्कि नए उद्यमी तैयार करना भी था। वह सहयोग में विश्वास रखते थे और हर व्यक्ति की ताकत को पहचानकर उसके साथ काम करते थे। एक बार मैंने उन्हें एक एजेंसी के संस्थापक से मिलवाया। बाद में उसने अपनी एजेंसी YAAP को बेच दी। शुरुआत में वह कंपनी छोड़ना चाहता था, लेकिन कुछ समय बाद उसने कहा कि वह अतुल के साथ काम करना चाहता है, उनसे सीखना चाहता है। यही अतुल का व्यक्तित्व और आकर्षण था।
मेरी अतुल से पहली मुलाकात 2000 या 2001 के आसपास वी. रमानी के साथ हुई थी। लेकिन 2002 से हमारी बातचीत बढ़ी और 2003 के बाद यह रिश्ता और गहरा हो गया। 2012 में वी. रमानी के निधन के बाद पिछले 14 वर्षों में हम लगातार विचार, अनुभव और लोगों की कहानियां साझा करते रहे। अतुल हमेशा दूसरों की भावनाओं का सम्मान करते थे। बड़े-बड़े लोगों के साथ भी वह सहजता से काम कर लेते थे। उन्होंने अपने दोस्त राज नायक को भी सलाहकार के रूप में जोड़ा।
अतुल अपने माता-पिता से बेहद प्यार करते थे। मुझे दो बार उनके माता-पिता से मिलने का अवसर मिला और उन्होंने मुझे अपने बेटे जैसा अपनापन दिया। उनके पुराने दोस्त और सहयोगी वर्षों तक उनके साथ जुड़े रहे। इससे पता चलता था कि वह भरोसेमंद और रिश्तों को निभाने वाले इंसान थे।
पिछले साल मेरी पत्नी नीति और बेटा प्रसन्न मुंबई गए थे। प्रसन्न अपने पॉडकास्ट "What Founders Think?" के लिए अतुल का इंटरव्यू करना चाहता था। अतुल ने रविवार के दिन भी समय निकाला और प्रसन्न को बेहद सहज महसूस कराया। बाद में दोनों के बीच अच्छी दोस्ती हो गई। वे परफ्यूम, स्नीकर्स और घड़ियों पर लंबी बातें किया करते थे।
25 फरवरी 2026 को जब YAAP का IPO लॉन्च हुआ और कंपनी ने स्टॉक एक्सचेंज में घंटी बजाई, तब मैं खास तौर पर मुंबई गया था। अतुल ने मुझे मंच पर बुलाया, सम्मान दिया और बाद में अपने परिवार के साथ डिनर पर भी आमंत्रित किया। उनका मिलनसार स्वभाव और भरोसेमंद व्यक्तित्व उनकी सबसे बड़ी ताकत थी। उन्होंने काम हो या निजी जिंदगी, मुझसे किया हर छोटा-बड़ा वादा हमेशा निभाया। उनकी सबसे बड़ी विरासत उनके सपने थे और उन सपनों को सच करने की उनकी क्षमता थी।
मैंने अतुल की मुलाकात अपने दोस्त निलय वर्मा से कराई थी, जिन्होंने Primus की शुरुआत की थी। बाद में दोनों के बीच भी अच्छा रिश्ता बन गया। अतुल हमेशा लोगों का ख्याल रखते थे। हमारे साझा मित्र राज नायक भी इस बात की गवाही देंगे। मैंने भी उनसे बहुत कुछ सीखा।
हाल ही में e4m Goa Business Leaders Retreat में अतुल ने मुझे और नवल आहूजा को e4m को अगले स्तर तक ले जाने के लिए कई सुझाव दिए थे। 26 मई को आयोजित e4m Impact Top 50 Women कार्यक्रम में भी अतुल मौजूद थे। उन्होंने मुझसे कहा था, "अनुराग, यह तुम्हारे सबसे बेहतरीन दो आयोजनों में से एक है। मैं इसे हर साल स्पॉन्सर करना चाहता हूं। मुझे तुम्हारा Impact 30 Under 30 इवेंट भी बहुत पसंद है। ये दोनों कार्यक्रम बहुत बड़े और शानदार हैं। YAAP हर साल इनका प्रायोजन करेगा।" अतुल हमेशा खुलकर तारीफ करते थे और निजी तौर पर यह भी बताते थे कि हम किन बातों में और बेहतर कर सकते हैं।
BW Businessworld के काम की भी उन्होंने हमेशा सराहना की और अपने मित्र व बैंकर प्रितेश जैन से मेरी मुलाकात कराई। अतुल ने हमेशा यह साबित किया कि दोस्ती और अपनापन कारोबार से कहीं बड़ा होता है। उनका मानना था कि अंदर और बाहर, दोनों जगह सहयोग से ही कुछ बड़ा बनाया जा सकता है। अब मैं तुम्हें हर दिन याद करूंगा और हर दिन तुम्हारी कमी महसूस करूंगा। अब शायद मुझे सोहो हाउस की सदस्यता लेनी पड़े या फिर राज नायक जी से कहना पड़े कि वे मुझे वहां लेकर चलें। अतुल अक्सर अपने दोस्त सुधीर के बारे में बड़े प्यार से बात करते थे और कहते थे, "अनुराग, तुम्हें सुधीर पर एक बड़ी स्टोरी करनी चाहिए।"
अतुल हेगड़े, मेरे दोस्त... मैं तुम्हें बहुत याद करूंगा। तुम्हारे अधूरे सपने, तुम्हारा अपनापन और तुम्हारा विश्वास हमेशा मेरे साथ रहेगा। मैं हमेशा कामना करूंगा कि तुम्हारी विरासत और आगे बढ़े। तुम्हारी यादें हमेशा मेरे चेहरे पर मुस्कान लेकर आएंगी।
मेरी यही प्रार्थना है कि पूरी इंडस्ट्री का प्यार, सम्मान और शुभकामनाएं उनकी पत्नी शोनिमा और पूरे परिवार तक पहुंचें। अतुल हेगड़े भले ही इस दुनिया से चले गए हों, लेकिन उनके विचार, उनका व्यक्तित्व और उनके साथ बिताए गए पल हमेशा जिंदा रहेंगे।
अंत में मैं उनकी याद में महान गायक और गीतकार बॉब डिलन के मशहूर गीत "Blowin' in the Wind" को उन्हें समर्पित करूंगा। यह गीत जीवन, इंसानियत, शांति और समय के कठिन सवालों की बात करता है और यही संदेश देता है कि कई जवाब हवा में बिखरे होते हैं, जिन्हें समझने के लिए इंसान को संवेदनशील होना पड़ता है।
भारत की पब्लिक रिलेशंस (PR) इंडस्ट्री को लंबे समय तक देश की अर्थव्यवस्था में एक ऐसे क्षेत्र के रूप में देखा गया, जो चुपचाप अपना काम करता है।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
गणपति विश्वनाथन, स्वतंत्र कम्युनिकेशन कंसल्टेंट ।।
भारत की पब्लिक रिलेशंस (PR) इंडस्ट्री को लंबे समय तक देश की अर्थव्यवस्था में एक ऐसे क्षेत्र के रूप में देखा गया, जो चुपचाप अपना काम करता है। विज्ञापन की तरह यह लोगों को सीधे दिखाई नहीं देता और मार्केटिंग की तरह इसकी सफलता तुरंत बिक्री के आंकड़ों में भी नहीं दिखती। लेकिन पर्दे के पीछे रहकर यही इंडस्ट्री कंपनियों की साख बनाने, संकट के समय उनकी छवि संभालने, लोगों की राय प्रभावित करने और अलग-अलग हितधारकों का भरोसा मजबूत करने का काम करती रही है। अब यह भूमिका तेजी से बदल रही है। PRCAI SPRINT 2026 रिपोर्ट बताती है कि पब्लिक रिलेशंस अब सिर्फ बिजनेस की सहायक गतिविधि नहीं रह गई है, बल्कि बिजनेस रणनीति का अहम हिस्सा बनती जा रही है।
रिपोर्ट के मुताबिक, वित्त वर्ष 2026 में करीब 3,230 करोड़ रुपये की भारतीय PR इंडस्ट्री 2030 तक बढ़कर लगभग 4,500 करोड़ रुपये तक पहुंच सकती है। हालांकि इस रिपोर्ट की सबसे बड़ी बात सिर्फ बाजार का बढ़ना नहीं है। किसी भी इंडस्ट्री की असली पहचान केवल उसके आकार से नहीं होती, बल्कि इस बात से होती है कि वह कितनी प्रासंगिक है। इस नजरिए से देखें तो भारतीय पब्लिक रिलेशंस इंडस्ट्री आज पहले से कहीं ज्यादा मजबूत स्थिति में दिखाई दे रही है।
खुद को नए दौर के हिसाब से बदला
एक समय था जब PR में सफलता का मतलब सिर्फ मीडिया में खबरें छपवाना, प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित करना और पत्रकारों से अच्छे रिश्ते बनाए रखना माना जाता था। आज भी ये काम महत्वपूर्ण हैं, लेकिन अब सिर्फ इन्हीं तक PR की भूमिका सीमित नहीं है।
आज कंपनियां अपने कम्युनिकेशन सलाहकारों से उम्मीद करती हैं कि वे बिजनेस रणनीति को समझें, कंपनी की साख पर आने वाले संभावित खतरों का पहले से आकलन करें, लोगों की सोच और भावनाओं को समझें और निवेशकों, कर्मचारियों, नीति निर्माताओं, स्थानीय समुदायों और समाज के अलग-अलग वर्गों से प्रभावी संवाद स्थापित करें। कई कंपनियों के बोर्डरूम में अब कम्युनिकेशन को बिजनेस प्लानिंग का हिस्सा माना जाने लगा है, न कि बाद में जोड़ने वाली गतिविधि।
आज के दौर में किसी भी कंपनी की प्रतिष्ठा हर दिन बनती भी है और हर घंटे उसकी परीक्षा भी होती है। सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म की वजह से कंपनियों के हर फैसले पर तुरंत प्रतिक्रिया आती है। लोगों की अपेक्षाएं पहले से कहीं ज्यादा बढ़ गई हैं और भरोसा किसी भी कंपनी की सबसे बड़ी पूंजी बन चुका है। ऐसे माहौल में PR प्रोफेशनल्स की भूमिका सिर्फ फैसलों की जानकारी देने तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि वे कई बार फैसले लेने की प्रक्रिया का भी हिस्सा बन रहे हैं।
स्टार्टअप और सरकार बने नए बड़े ग्राहक
PRCAI रिपोर्ट का एक अहम निष्कर्ष यह भी है कि अब इस इंडस्ट्री के ग्राहकों का दायरा लगातार बढ़ रहा है। खासतौर पर स्टार्टअप कंपनियां तेजी से PR सेवाओं का इस्तेमाल कर रही हैं। नई पीढ़ी के उद्यमी यह समझ चुके हैं कि सिर्फ अच्छा प्रोडक्ट बनाना काफी नहीं है, बल्कि कंपनी की विश्वसनीय छवि बनाना भी उतना ही जरूरी है। निवेशक, ग्राहक और कर्मचारी अब केवल उत्पाद या सेवाओं को नहीं देखते, बल्कि कंपनी का उद्देश्य, उसके मूल्य और नेतृत्व को भी महत्व देते हैं।
सरकारी संस्थानों की बढ़ती भागीदारी भी एक बड़ा बदलाव है। जैसे-जैसे सरकारी योजनाएं बड़ी होती जा रही हैं और नागरिकों की भागीदारी बढ़ रही है, वैसे-वैसे रणनीतिक संचार की जरूरत भी बढ़ी है। सरकारें चाहती हैं कि उनकी नीतियों को लोग सही तरीके से समझें और उन पर भरोसा बनाए रखें।
इस बदलाव से PR एजेंसियों को हेल्थकेयर, मैन्युफैक्चरिंग, टेक्नोलॉजी, इंफ्रास्ट्रक्चर, फाइनेंशियल सर्विसेज, सस्टेनेबिलिटी और पब्लिक अफेयर्स जैसे कई क्षेत्रों में विशेषज्ञता विकसित करने का मौका मिल रहा है। साथ ही, किसी एक सेक्टर पर निर्भरता कम होने से पूरी इंडस्ट्री भी ज्यादा मजबूत और संतुलित बन रही है।
भारत की अर्थव्यवस्था जितनी तेजी से आगे बढ़ रही है, उसी गति से कम्युनिकेशन इंडस्ट्री के पास भी विस्तार करने का अवसर है। अब लक्ष्य सिर्फ नए ग्राहक जोड़ना नहीं, बल्कि उन्हें ज्यादा रणनीतिक और प्रभावी सेवाएं देना है।
नई तकनीक आई, लेकिन सबसे अहम अब भी अच्छे आइडिया
कम्युनिकेशन इंडस्ट्री में हर कुछ वर्षों में कोई नई तकनीक आती है और यह दावा किया जाता है कि वह पूरे कारोबार को बदल देगी। तकनीक निश्चित रूप से काम करने के तरीके बदलती है, लेकिन उसने अब तक पब्लिक रिलेशंस के मूल उद्देश्य को नहीं बदला है।
इस पेशे की सबसे बड़ी ताकत हमेशा अच्छे विचार यानी आइडिया रहे हैं। लोगों को समझना, सही अवसर पहचानना, संभावित जोखिमों का अनुमान लगाना और प्रभावशाली कहानियां तैयार करना आज भी एक सफल PR प्रोफेशनल की सबसे बड़ी पहचान है। किसी भी कंपनी की मजबूत साख केवल तकनीक के दम पर नहीं बनती, बल्कि लगातार भरोसा कायम रखने और ईमानदार संवाद से बनती है।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) जैसी नई तकनीकें अब एजेंसियों को रिसर्च बेहतर तरीके से करने, बड़ी मात्रा में डेटा का विश्लेषण करने और रोजमर्रा के कई कामों को ऑटोमेट करने में मदद कर रही हैं। इससे प्रोफेशनल्स के पास रणनीतिक सोच और क्लाइंट को बेहतर सलाह देने के लिए ज्यादा समय मिल रहा है। लेकिन तकनीक केवल एक साधन है। यह फैसले लेने में मदद कर सकती है, लेकिन अनुभव, समझ और मानवीय सोच की जगह नहीं ले सकती।
आने वाले समय में वही एजेंसियां सबसे ज्यादा सफल होंगी जिनके पास सिर्फ आधुनिक तकनीक नहीं, बल्कि ऐसे मजबूत आइडिया होंगे जो लोगों की सोच बदल सकें, बिजनेस की समस्याओं का समाधान दे सकें और भरोसा मजबूत कर सकें।
उत्कृष्ट काम ही लाएगा नई प्रतिभाएं
हर पेशे को आगे बढ़ाने के लिए ऐसे मानकों की जरूरत होती है जो लोगों को बेहतर काम करने के लिए प्रेरित करें। पब्लिक रिलेशंस इंडस्ट्री में राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार लंबे समय से यही भूमिका निभाते रहे हैं।
भारतीय PR एजेंसियां कई बार ऐसा काम कर चुकी हैं जिसे दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित मंचों पर भी सराहा गया है। इनमें Cannes Lions International Festival of Creativity जैसे बड़े पुरस्कार भी शामिल हैं। हालांकि इस साल PR से जुड़े अभियानों को उतनी बड़ी अंतरराष्ट्रीय सफलता नहीं मिली, लेकिन इसे निराशा की बजाय रचनात्मकता को और आगे ले जाने के अवसर के रूप में देखा जाना चाहिए।
पुरस्कार केवल एजेंसियों की प्रतिष्ठा नहीं बढ़ाते, बल्कि पूरे इंडस्ट्री में नए प्रयोगों और नवाचार को बढ़ावा देते हैं। वे प्रोफेशनल्स को अलग सोचने और बेहतर काम करने के लिए प्रेरित करते हैं। यही वजह है कि युवा भी ऐसे पेशों की ओर आकर्षित होते हैं जहां अच्छे विचारों और उत्कृष्ट काम को सम्मान मिलता है। जो इंडस्ट्री लगातार विश्वस्तरीय काम पेश करती है, वह हमेशा बेहतर प्रतिभाओं को आकर्षित करने में सफल रहती है।
अब समय है साझा विजन का
भारतीय PR इंडस्ट्री अब उस मुकाम पर पहुंच चुकी है जहां उसे सिर्फ हर साल की ग्रोथ या मार्केट शेयर से आगे सोचने की जरूरत है। अगले दशक के लिए यह तय करना होगा कि इस पेशे की दिशा क्या होगी।
यहीं पर Public Relations Consultants Association of India (PRCAI) की भूमिका और महत्वपूर्ण हो सकती है। इंडस्ट्री के लिए एक Vision 2030 दस्तावेज तैयार किया जा सकता है, जो भविष्य की साझा रूपरेखा बने। इसका उद्देश्य किसी पर नियम थोपना नहीं, बल्कि पूरे इंडस्ट्री के लिए एक साझा लक्ष्य तय करना होगा।
ऐसे विजन के जरिए PR एजेंसियां, कॉरपोरेट कम्युनिकेशन टीम, शैक्षणिक संस्थान और नीति निर्माता मिलकर भविष्य के लिए तैयार प्रतिभाएं विकसित करने, नैतिक मानकों को मजबूत करने, रिसर्च को बढ़ावा देने, बेहतर मापन प्रणाली विकसित करने, नवाचार को प्रोत्साहित करने और वैश्विक कम्युनिकेशन इंडस्ट्री में भारत की स्थिति मजबूत करने जैसे विषयों पर साथ काम कर सकते हैं।
हर परिपक्व इंडस्ट्री को ऐसी साझा सोच की जरूरत होती है और भारतीय PR इंडस्ट्री अब उस स्तर पर पहुंच चुकी है जहां वह इस दिशा में गंभीरता से कदम बढ़ा सकती है।
आगे का रास्ता
PRCAI SPRINT 2026 रिपोर्ट केवल बाजार के बढ़ने की संभावना नहीं दिखाती, बल्कि यह उस भरोसे को भी दर्शाती है जो इस इंडस्ट्री ने पिछले कुछ वर्षों में हासिल किया है। PR ने लगातार अपना प्रभाव बढ़ाया है, नई विशेषज्ञता विकसित की है और आधुनिक बिजनेस में अपनी उपयोगिता साबित की है।
भारतीय पब्लिक रिलेशंस का अगला दौर केवल बाजार के आकार से तय नहीं होगा। इसे वे एजेंसियां आगे बढ़ाएंगी जो लोगों पर निवेश करेंगी, वे कंपनियां जो रणनीतिक सलाह को महत्व देंगी, वे शैक्षणिक संस्थान जो भविष्य के कम्युनिकेशन प्रोफेशनल तैयार करेंगे और वे इंडस्ट्री लीडर जो पूरे सेक्टर के विकास के लिए मिलकर काम करेंगे।
दशकों तक दूसरों की प्रतिष्ठा बनाने का काम करने वाली यह इंडस्ट्री अब अपनी खुद की पहचान और भविष्य तय करने के मोड़ पर खड़ी है।
आने वाले वर्षों का लक्ष्य सिर्फ एक बड़ी इंडस्ट्री बनना नहीं होना चाहिए, बल्कि ऐसी इंडस्ट्री बनना होना चाहिए जो ज्यादा भरोसेमंद, ज्यादा नवाचारी, ज्यादा प्रभावशाली और भारत ही नहीं बल्कि दुनिया भर में ज्यादा सम्मानित हो।
अगर पिछले तीन दशकों ने यह साबित किया कि पब्लिक रिलेशंस किसी भी बिजनेस के लिए कितना महत्वपूर्ण है, तो अगला दशक इसे नेतृत्व की भूमिका में स्थापित कर सकता है। यही वह लक्ष्य है जिसकी ओर भारतीय PR इंडस्ट्री अब तेजी से बढ़ती हुई दिखाई दे रही है।
(गणपति विश्वनाथन 'मास्टरिंग द मैसेज' पुस्तक के लेखक हैं और यह उनके निजी विचार हैं।)