मार्च 1978 में मैंने साप्ताहिक हिंदुस्तान (हिंदुस्तान टाइम्स प्रकाशन) के राजनीतिक संवाददाता के रुप में तीन पेज की लम्बी विशेष रिपोर्ट ' राष्ट्रपति भवन : बिगुल बजे या न बजे !' शीर्षक से लिखी थी।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
आलोक मेहता, वरिष्ठ पत्रकार, पद्मश्री, लेखक।
राजधानी के विशिष्ट संपन्न लोगों के जिमखाना क्लब खाली करने के नोटिस पर इन दिनों कुछ नामी लोगों ने बचाव में उसकी तुलना राष्ट्रपति भवन की ऐतिहासिक हेरिटेज महत्ता से कर दी। तो मुझे ध्यान आया कि सचमुच वर्षों पहले राष्ट्रपति भवन को खाली करने का प्रस्ताव भी शहरी विकास मंत्रालय और प्रधानमंत्री कार्यालय के बीच चलता रहा है। चौंकिए नहीं, तथ्यों की पुष्टि सरकारी दस्तावेजों से हो सकती है।
हाँ, यह प्रस्ताव प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार के कार्यकाल में नहीं आया था। ऐसा प्रस्ताव किसी कम्युनिस्ट नेता या किसी आंदोलनकारी संगठन ने भी नहीं रखा था। देश के सर्वोच्च पद पर बैठे महामहिम राष्ट्रपति ने स्वयं यह प्रस्ताव किया था। उनका तर्क था कि लोकतांत्रिक गांधीवादी राष्ट्र भारत के राष्ट्रपति को ब्रिटिश राज वाले बड़े भारी भवन में नहीं रहना चाहिए। वे किसी अन्य बड़े बंगले में रह सकते हैं।
यह बात इसलिए मुझे ध्यान में आई, क्योंकि मार्च 1978 में मैंने साप्ताहिक हिंदुस्तान (हिंदुस्तान टाइम्स प्रकाशन) के राजनीतिक संवाददाता के रूप में तत्कालीन राष्ट्रपति के इस प्रस्ताव पर करीब तीन पेज की लंबी विशेष रिपोर्ट ‘राष्ट्रपति भवन : बिगुल बजे या न बजे!’ शीर्षक से लिखी थी। प्रकाशित लेख की प्रति आज भी मेरी फाइलों में है। भारत का राष्ट्रपति भवन केवल एक सरकारी निवास नहीं, बल्कि भारतीय गणराज्य का सबसे बड़ा प्रतीक माना जाता है।
बहुत कम लोगों को पता है कि 1977–78 में ऐसा समय भी आया जब राष्ट्रपति को राष्ट्रपति भवन से हटाकर किसी छोटे भवन में स्थानांतरित करने के प्रस्ताव पर राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, गृह मंत्री और शहरी विकास मंत्री के बीच फाइल घूमती रही।
1977 का वर्ष भारतीय राजनीति में बड़े बदलाव का वर्ष था। आपातकाल समाप्त हुआ, सत्ता बदली और पहली बार गैर-कांग्रेसी सरकार बनी। इस नए राजनीतिक वातावरण में बड़े सरकारी खर्च, औपनिवेशिक विरासत और सत्ता के प्रतीकों पर सवाल उठने लगे। इसी माहौल में यह प्रश्न उठा कि क्या दुनिया के सबसे बड़े सरकारी आवासों में गिने जाने वाले राष्ट्रपति भवन में राष्ट्रपति का रहना उचित है?
राष्ट्रपति भवन मूल रूप से ब्रिटिश वायसराय के निवास के रूप में बनाया गया था। इसमें लगभग 340 कमरे हैं और यह विशाल परिसर में फैला हुआ है। इसे औपनिवेशिक शक्ति-प्रदर्शन के प्रतीक के रूप में भी देखा जाता रहा है। इतने विशाल परिसर के रखरखाव पर भारी सरकारी खर्च होता था। सादगी और मितव्ययिता की राजनीति करने वाले वरिष्ठ नेताओं ने सवाल उठाया कि क्या यह खर्च उचित है?
कुछ नेताओं का मानना था कि स्वतंत्र भारत को ब्रिटिश साम्राज्य की विरासत वाले भव्य प्रतीकों से दूरी बनानी चाहिए। कुछ विचार यह भी सामने आए कि इतनी विशाल इमारत को संग्रहालय, राष्ट्रीय संस्थान, सार्वजनिक उपयोग या अन्य सरकारी कार्यों के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है।
जनता पार्टी की सरकार लोकनायक जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में भारी जन समर्थन से सत्ता में आई थी। राष्ट्रपति नीलम संजीव रेड्डी, प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई, गृह मंत्री चौधरी चरण सिंह और रक्षा मंत्री जगजीवन राम सभी गांधीवादी आदर्शों की बातें कर रहे थे। सबसे पहले मेरा ध्यान इस बात पर गया कि संसद के संयुक्त अधिवेशन के उद्घाटन के लिए अभिभाषण देने राष्ट्रपति नीलम संजीव रेड्डी बग्घी में आने की पुरानी परंपरा त्यागकर छह दरवाजों वाली पुरानी कार से संसद पहुँचे।
इस तथ्य के साथ मैंने अपनी रिपोर्ट में लिखा कि संसद के केंद्रीय कक्ष में राष्ट्रपति के आगमन के समय तुमुलनाद नहीं किया गया। मैं 1972 से संसद की रिपोर्टिंग करता रहा था, इसलिए जानता था कि परंपरा के अनुसार राष्ट्रपति के प्रवेश के ठीक पहले सेंट्रल हॉल के ऊपर की गैलरी से दो बिगुलवादक बिगुल बजाकर उनके आने की सूचना देते हैं। लेकिन पता चला कि यह बिगुलवादन बंद कराने का आदेश स्वयं राष्ट्रपति ने दिया था। तभी मैंने रिपोर्ट का शीर्षक ‘बिगुल बजे या न बजे’ दिया।
इसी कड़ी में यह बात सामने आई कि राष्ट्रपति नीलम संजीव रेड्डी ने स्वयं यह प्रस्ताव आगे बढ़वाया कि इस भव्य भवन के बजाय भारत के राष्ट्रपति किसी छोटे बंगले में रह सकते हैं। गांधीवादी मोरारजी देसाई ने भी पहले इस बात को उचित मानकर पसंद किया। तब विभिन्न संबंधित मंत्रालयों के बीच यह फाइल चली कि राष्ट्रपति किस बंगले में रह सकते हैं। कई विकल्पों में इंडिया गेट के पास हैदराबाद हाउस का भी नाम था।
इस प्रस्ताव पर अंदरूनी जानकारी लेने के प्रयास में मुझे पता चला कि असल में आजादी से ठीक पहले 28 जुलाई 1947 को महात्मा गांधी ने पंडित जवाहरलाल नेहरू और वायसराय लॉर्ड लुइस माउंटबेटन को पत्र लिखकर यह आग्रह किया था कि “स्वाधीन भारत का राष्ट्राध्यक्ष छोटे भवन में रहना चाहिए।” लेकिन पंडित नेहरू और माउंटबेटन ने इस सलाह पर अपनी असहमति व्यक्त कर दी। मामला टल गया।
1977 के चुनाव भी एक तरह से जनतांत्रिक क्रांति और बदलाव के थे, इसलिए इस प्रस्ताव पर फिर विचार होने लगा। लेकिन सबसे बड़ी कठिनाई सुरक्षा व्यवस्था तथा विदेशी राष्ट्राध्यक्षों के साथ होने वाले समारोहों और बैठकों को बताया गया। नतीजा यह हुआ कि प्रस्ताव क्रियान्वित नहीं हो सका।
बहरहाल, वर्तमान संदर्भ में तो सुरक्षा कारणों से राष्ट्रपति भवन केवल संग्रहालय नहीं बन सकता। लेकिन यदि देश के सर्वोच्च पद पर बैठे नेता अपने कार्यालय बदलने को तैयार हो सकते थे, तो उसी परंपरा वाले सरकारी सेवाओं और सेना में रह चुके अपने को महान समझने वाले अधिकारी तथा देश के प्रभावशाली संपन्न लोग क्या अपने क्लब के खेल-मनोरंजन केंद्र, शराबखाने (बार), लंच-डिनर की यादगार कुर्सियाँ-टेबलें (यदि अन्य बड़े क्लबों की तरह बेड आदि हों) किसी अन्य बिल्डिंग में नहीं ले जा सकते हैं?
वैसे अब यह विवाद शायद सम्मानित सर्वोच्च अदालत से ही सुलझेगा। हाँ, इसी संदर्भ में 1978 की रिपोर्ट के एक अन्य तथ्य की याद दिलाना उचित लगता है। इस रिपोर्ट में मैंने पंडित नेहरू के निधन के बाद प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री द्वारा तीनमूर्ति भवन को नेहरू संग्रहालय बनवाने और स्वयं अपने लिए पहले से मिले हुए 10 जनपथ वाले छोटे बंगले में रहने के निर्णय का उल्लेख किया था।
10 जनपथ नई दिल्ली के लुटियंस ज़ोन का एक सरकारी बंगला है। यह ब्रिटिश काल में बने सरकारी बंगलों की श्रृंखला का हिस्सा था, जिनका निर्माण मुख्य रूप से 1920–30 के दशक में हुआ। दिलचस्प बात यह है कि 1964 से अब तक 10 जनपथ सत्ता के गलियारों में सबसे महत्वपूर्ण और चर्चित रहा है।
विडंबना यह है कि शास्त्रीजी के बहुत जल्द असामयिक निधन के बाद उनका परिवार कुछ वर्ष इस बंगले में रहा और बाद में कांग्रेस नेतृत्व के करीबी मंत्रियों और अधिकारियों ने इस बंगले के एक हिस्से को अलग कर 1 मोतीलाल नेहरू मार्ग बनाकर उसे लाल बहादुर शास्त्री स्मृति संग्रहालय का नाम दे दिया।
मुख्य बंगले में प्रधानमंत्री पद से हटने के बाद राजीव गांधी और फिर सोनिया गांधी तथा उनका परिवार रहने लगा। सांसद बनने से पहले राहुल गांधी भी 10 जनपथ में रहे। सत्ता का केंद्र रहने के कारण ही कांग्रेस राज में 24 अकबर रोड और उससे जुड़ा बंगला कांग्रेस पार्टी मुख्यालय की तरह उपयोग में आता रहा।
एक दिलचस्प बात यह है कि सरकारी रिकॉर्ड्स के अनुसार वर्ष 2020 तक 10 जनपथ बंगले का किराया मात्र 4,610 रुपये प्रतिमाह रहा है। फिर भी कुछ वर्षों तक इसका किराया न चुकाए जाने के विवाद मंत्रालयों और मीडिया में आते रहे। जिमखाना की जमीन का किराया समय पर न देने और करोड़ों रुपये के बकाए का विवाद भी चलता रह सकता है।
( यह लेखक के निजी विचार हैं )
राजेश एक्सपोर्ट के मालिक राजेश मेहता कहते हैं कि सेबी ने आँकड़े समझने में गलती कर दी है। उनका कहना है कि 'Valcambi' कच्चा सोना खरीदती है और फिर दुनिया भर में रिफाइन सोना बेचती है।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
मिलिंद खांडेकर, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक।
राजेश एक्सपोर्ट्स बिक्री के हिसाब से देश की चौथी सबसे बड़ी कंपनी है। सिर्फ रिलायंस, एलआईसी और इंडियन ऑयल की बिक्री उससे ज़्यादा है। इतना ही नहीं, वह बिक्री के मामले में स्टेट बैंक और टीसीएस से भी आगे है। इतनी बिक्री के बावजूद कंपनी मुनाफ़े के मामले में पहली 500 कंपनियों में भी शामिल नहीं है।
पिछले वित्त वर्ष 2025-26 में कंपनी ने ₹7.79 लाख करोड़ की बिक्री दिखाई, जबकि मुनाफ़ा मात्र ₹112 करोड़ रहा। यानी अगर ₹100 की बिक्री है तो मुनाफ़ा 1 पैसे से भी कम। बाज़ार में यह एक स्मॉल कैप कंपनी मानी जाती है। यही विरोधाभास शेयर बाज़ार के नियामक सेबी (SEBI) की नज़र में आया है।
गैरेज से स्विट्जरलैंड तक-
राजेश मेहता ने अपने भाई प्रशांत के साथ मिलकर करीब 35 साल पहले बेंगलुरु के एक गैरेज से सोने के ज़ेवर बनाना शुरू किया था। ये ज़ेवर दूसरे देशों में बेचे जाते थे। 1995 में यह कंपनी शेयर बाज़ार में सूचीबद्ध (लिस्टेड) भी हो गई थी।
सोने के गहनों का निर्यात करने के साथ-साथ उन्होंने भारत में भी बिक्री शुरू की। ‘शुभ ज्वेलर्स’ उनके ब्रांड का नाम है। राजेश सिर्फ गहने बनाने तक नहीं रुके। उन्होंने 2015 में स्विट्जरलैंड की ‘Valcambi’ नामक गोल्ड रिफाइनरी भी खरीद ली।
खदान से निकाले गए सोने को रिफाइनरी में शुद्ध किया जाता है। इसके बाद उससे गहने या सोने की ईंटें बनाई जाती हैं। यह रिफाइनरी साल में जितना सोना रिफाइन करती है, वह भारत की कुल खपत का लगभग दोगुना है। यही कंपनी अब विवादों के केंद्र में है।
ना बही, ना खाता-
सेबी ने पाया कि राजेश एक्सपोर्ट्स का पिछले पाँच वर्षों का टर्नओवर ₹15.18 लाख करोड़ है, लेकिन बही-खातों की जाँच में ₹15.15 लाख करोड़ की बिक्री का कोई रिकॉर्ड नहीं मिला। राजेश एक्सपोर्ट्स यह बिक्री अपनी कंपनी Valcambi के खातों में दिखाता रहा है। जब सेबी ने Valcambi के खाते जाँचे तो वहाँ भी इतनी बिक्री का रिकॉर्ड नहीं मिला।
प्रथम दृष्टया ऐसा लगता है कि Valcambi जितनी क़ीमत का सोना रिफाइन करती थी, राजेश एक्सपोर्ट्स उसे अपनी बिक्री में जोड़ देता था। यह कुछ वैसा ही है जैसे कोई कंपनी टोल प्लाज़ा चलाती हो और वह टोल से गुजरने वाली गाड़ियों की कुल कीमत को अपनी बिक्री में जोड़ दे, जबकि उसकी वास्तविक आय केवल उतनी हो जितना टोल टैक्स वह वसूलती है। राजेश एक्सपोर्ट्स पर इसी तरह का आरोप है।
राजेश एक्सपोर्ट्स के मालिक राजेश मेहता का कहना है कि सेबी ने आँकड़ों को समझने में गलती की है। उनके मुताबिक Valcambi कच्चा सोना खरीदती है और फिर उसे रिफाइन कर दुनिया भर में बेचती है। बड़े-बड़े बैंक भी उससे सोना खरीदते हैं। वे यह भी कहते हैं कि सेबी ने उनकी बिक्री के आँकड़ों पर सवाल उठाए हैं, मुनाफ़े पर नहीं। सेबी को जवाब देने के लिए उनके पास 21 दिन का समय है।
हालाँकि, बाज़ार मानो पहले ही अपना फ़ैसला सुना चुका है। राजेश एक्सपोर्ट्स का मार्केट कैप तीन साल पहले लगभग ₹30 हज़ार करोड़ था, जो अब घटकर करीब ₹3 हज़ार करोड़ रह गया है। यानी जो कंपनी कभी लार्ज कैप बनने की ओर बढ़ रही थी, वह अब स्मॉल कैप कंपनी बनकर रह गई है।
( यह लेखक के निजी विचार हैं )
वैभव सूर्यवंशी भारतीय क्रिकेट का सबसे बड़ा युवा चेहरा बनकर उभरे हैं। सचिन तेंदुलकर और नाओमी ओसाका से तुलना के बीच जानिए कैसे वैभव नई पीढ़ी के स्पोर्ट्स सुपरस्टार बनते दिख रहे हैं।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
डॉ. संदीप गोयल, ‘रेडिफ्यूज़न’ और ‘एवरेस्ट’ के चेयरमैन।
आईपीएल 2026 खत्म हो चुका है, लेकिन उसका सबसे बड़ा सुपरस्टार वैभव सूर्यवंशी अभी बस शुरुआत कर रहा है। राजस्थान रॉयल्स के इस 15 वर्षीय ओपनर ने ऐसा रिकॉर्डतोड़ प्रदर्शन किया है, जिसने भारतीय क्रिकेट में एक नई बहस छेड़ दी है। वैभव आईपीएल इतिहास के पहले खिलाड़ी बन गए, जिन्होंने एक ही सीज़न में पांच बड़े व्यक्तिगत पुरस्कार अपने नाम किए। उन्होंने 16 पारियों में 776 रन बनाए और उनका स्ट्राइक रेट 237.31 रहा। उन्हें ऑरेंज कैप, मोस्ट वैल्यूएबल प्लेयर, इमर्जिंग प्लेयर ऑफ द सीज़न, सुपर स्ट्राइकर और सुपर सिक्सेस ऑफ द सीज़न जैसे सम्मान मिले।
वैभव ने सिर्फ रन नहीं बनाए, बल्कि रिकॉर्ड्स की पूरी किताब बदल दी। वह आईपीएल इतिहास के सबसे युवा ऑरेंज कैप विजेता बने। उन्होंने एक सीज़न में 72 छक्के लगाकर क्रिस गेल का 14 साल पुराना रिकॉर्ड तोड़ दिया। सिर्फ 440 गेंदों में 1000 आईपीएल रन पूरे करके उन्होंने आंद्रे रसेल का रिकॉर्ड भी पीछे छोड़ दिया। पावरप्ले में 521 रन बनाकर उन्होंने नई मिसाल कायम की। इतना ही नहीं, वह आईपीएल इतिहास के पहले अनकैप्ड खिलाड़ी बने, जिसने एक सीज़न में 700 से अधिक रन बनाए।
भारतीय खेल इतिहास में इतनी कम उम्र में इतना बड़ा प्रभाव शायद आखिरी बार सचिन तेंदुलकर ने डाला था। लेकिन सचिन और वैभव की यात्रा बिल्कुल अलग दौरों की कहानी है। सचिन ने अपनी पहचान टेस्ट क्रिकेट में दुनिया के सबसे खतरनाक गेंदबाजों के सामने टिककर बनाई थी। उनका पहला टेस्ट शतक 189 गेंदों में आया था, जो उनके धैर्य, तकनीक और मानसिक मजबूती का प्रतीक था। दूसरी ओर वैभव टी20 युग के खिलाड़ी हैं, जहां आक्रमण ही अस्तित्व का सबसे बड़ा हथियार है। उन्होंने सिर्फ 38 गेंदों में शतक लगाकर दुनिया को दिखा दिया कि यह नई पीढ़ी का क्रिकेट है।
ब्रांड वैल्यू के स्तर पर भी वैभव ने बेहद कम समय में विस्फोटक उछाल देखा है। उनकी एंडोर्समेंट डील्स में कथित तौर पर 24 गुना तक वृद्धि हुई है। आज स्टेडियमों में लोग सिर्फ उन्हें देखने पहुंच रहे हैं। सचिन का दौर अलग था, जब स्टारडम धीरे-धीरे बनता था। 1990 के दशक में सोशल मीडिया नहीं था, टी20 लीग नहीं थीं और ब्रांडिंग की दुनिया सीमित थी। सचिन ने वर्षों की मेहनत से खुद को “भारत की उम्मीद” बनाया, जबकि वैभव की लोकप्रियता इंस्टेंट और विस्फोटक है।
खास बात यह है कि खुद “क्रिकेट के भगवान” सचिन तेंदुलकर भी वैभव की तारीफ कर चुके हैं। उन्होंने वैभव के बैट स्विंग को “शानदार” बताया। कई पूर्व क्रिकेटर मानते हैं कि वैभव में जेनरेशन बदलने वाला एक्स-फैक्टर है। हालांकि वे यह भी कहते हैं कि दूसरा सचिन बनना लगभग असंभव है।
यहीं से तुलना एक और एशियाई सुपरस्टार से जुड़ती है- टेनिस खिलाड़ी नाओमी ओसाका। नाओमी पारंपरिक जूनियर प्रोडिजी नहीं थीं। उन्होंने 20 साल की उम्र में 2018 यूएस ओपन जीतकर दुनिया को चौंका दिया। उन्होंने चार ग्रैंड स्लैम खिताब जीते और दुनिया की नंबर-1 खिलाड़ी बनीं। उनका खेल पावर, आक्रामकता और मानसिक मजबूती का मिश्रण था।
वैभव और नाओमी की तुलना दिलचस्प इसलिए है क्योंकि दोनों ने बहुत कम उम्र में अपने खेल की रफ्तार बदल दी। लेकिन दोनों का मानसिक ढांचा एकदम अलग है। वैभव आज “ज़ेन स्टेट” वाले खिलाड़ी दिखाई देते हैं। आईपीएल 2026 के एलिमिनेटर में 29 गेंदों पर 97 रन बनाने के बाद भी उन्होंने उस पारी को स्कूल नेट प्रैक्टिस जैसा बताया। वह व्यक्तिगत रिकॉर्ड्स की जगह सिर्फ टीम के लिए छक्के लगाने की बात करते हैं। ऐसा लगता है कि मीडिया का शोर उनके खेल तक पहुंच ही नहीं पाता।
इसके उलट नाओमी ओसाका मीडिया दबाव और मानसिक तनाव से गहराई से प्रभावित हुईं। 2018 यूएस ओपन जीतने के बाद उन्होंने जिस भावनात्मक दबाव का सामना किया, उसने बाद में उन्हें मानसिक स्वास्थ्य पर खुलकर बात करने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने खेल से ब्रेक लेकर दुनिया को बताया कि सुपरस्टार खिलाड़ियों के भीतर भी इंसानी कमजोरियां होती हैं।
दोनों खिलाड़ियों में एक समानता जरूर है -उनका आक्रामक खेल। वैभव अपनी विशाल बैकलिफ्ट और निडर शॉट्स से दुनिया के सर्वश्रेष्ठ गेंदबाजों को निशाना बनाते हैं। उन्होंने पावरप्ले बल्लेबाजी की परिभाषा बदल दी है। वहीं नाओमी ओसाका ने अपनी 120 मील प्रति घंटे की सर्विस और ताकतवर ग्राउंडस्ट्रोक्स से महिला टेनिस में नई आक्रामकता जोड़ी।
वैभव सूर्यवंशी, सचिन तेंदुलकर और नाओमी ओसाका तीन अलग-अलग दौर और खेलों के नाम हैं, लेकिन तीनों में एक समान बात है -इन सभी ने अपने खेल की दिशा बदल दी। सचिन भारतीय क्रिकेट की बुनियाद बने, नाओमी ने टेनिस में एशियाई पहचान को नई ऊंचाई दी और वैभव आज भारतीय क्रिकेट के नए विस्फोटक युग का चेहरा बनते दिख रहे हैं।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है -क्या वैभव आने वाले वर्षों में सिर्फ रिकॉर्ड मशीन बनकर रहेंगे या सचिन की तरह पीढ़ियों की उम्मीद बनेंगे? क्या वह नाओमी ओसाका की तरह दबाव और स्टारडम के बोझ से जूझेंगे, या अपनी मासूम बेफिक्री को लंबे समय तक बचाकर रख पाएंगे? इसका जवाब भविष्य देगा। लेकिन फिलहाल इतना तय है कि भारतीय क्रिकेट को एक ऐसा किशोर सितारा मिल चुका है, जिसने दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है।
( यह लेखक के निजी विचार हैं )
FIFA वर्ल्ड कप की असली ताकत सिर्फ खेल या मनोरंजन में नहीं, बल्कि उसके पीछे छिपे विचार में है।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
शुभ्रांसु सिंह, सीएमओ, टाटा मोटर्स ।।
दुनिया इस समय ऐसे दौर से गुजर रही है जहां इंसानों को जोड़ने वाली चीजें धीरे-धीरे कमजोर पड़ रही हैं। देशों की सीमाएं और सख्त की जा रही हैं या बदली जा रही हैं। व्यापार को भी राजनीतिक और रणनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है। देशों के बीच दोस्ती और गठबंधन अब सिद्धांतों के बजाय फायदे-नुकसान के आधार पर तय हो रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय संबंधों की भाषा अब सहयोग से ज्यादा स्वार्थ, दबाव और धमकी तक सीमित होती जा रही है। ऐसे माहौल में FIFA वर्ल्ड कप 2026 का आयोजन हो रहा है।
इसे केवल दुनिया की समस्याओं से कुछ समय के लिए ध्यान हटाने वाले आयोजन के रूप में नहीं देखना चाहिए। बल्कि वर्ल्ड कप उन विभाजनकारी प्रवृत्तियों के खिलाफ एक मजबूत संदेश है, जो दुनिया को बांट रही हैं।
आमतौर पर वर्ल्ड कप की महानता उसकी विशालता और भव्यता से जोड़ी जाती है। यह दुनिया का सबसे बड़ा खेल आयोजन है, जिसे देखने के लिए मानव इतिहास की सबसे बड़ी टीवी ऑडियंस जुटती है। यह बात सही और प्रभावशाली है, लेकिन लेखक के अनुसार वर्ल्ड कप की असली अहमियत सिर्फ इतनी नहीं है। इसकी वास्तविक ताकत इससे कहीं ज्यादा गहरी और अर्थपूर्ण है।
FIFA वर्ल्ड कप की असली ताकत सिर्फ खेल या मनोरंजन में नहीं, बल्कि उसके पीछे छिपे विचार में है।
असल में वर्ल्ड कप एक ऐसा मंच है जहां आर्थिक, सैन्य या कूटनीतिक ताकत के आधार पर देशों की रैंकिंग मायने नहीं रखती। यहां सभी देशों के लिए नियम एक जैसे होते हैं। यहां सेनेगल इंग्लैंड को हरा सकता है, मोरक्को किसी यूरोपीय दिग्गज को मात दे सकता है और दक्षिण कोरिया जर्मनी जैसी मजबूत टीम को पराजित कर सकता है।
दुनिया में आम तौर पर देशों की ताकत उनकी आर्थिक शक्ति, सैन्य ताकत और राजनीतिक प्रभाव से तय होती है। अमीर और शक्तिशाली देशों की बात ज्यादा सुनी जाती है, जबकि छोटे या गरीब देशों का प्रभाव कम होता है, लेकिन वर्ल्डकप में यह पूरी व्यवस्था कुछ समय के लिए बदल जाती है।
फुटबॉल के मैदान पर सभी देशों के लिए नियम एक जैसे होते हैं। वहां यह मायने नहीं रखता कि किस देश की अर्थव्यवस्था बड़ी है, किसके पास ज्यादा सेना है या कौन ज्यादा शक्तिशाली है। इसीलिए, सेनेगल इंग्लैंड को हरा सकता है। मोरक्को किसी बड़े यूरोपीय देश को मात दे सकता है। दक्षिण कोरिया जर्मनी जैसी फुटबॉल महाशक्ति को हराने में सक्षम हो सकता है।
दुनिया का कोई व्यापार समझौता, कोई अंतरराष्ट्रीय संगठन या कोई राजनीतिक मंच ऐसी बराबरी नहीं ला सकता। यह काम सिर्फ फुटबॉल का मैदान कर सकता है। यही वर्ल्डकप की असली लोकतांत्रिक (Democratic) शक्ति है।
वर्ल्डकप की ताकत सिर्फ इस बात में नहीं है कि अलग-अलग देशों के लोग एक-दूसरे को गले लगाते हैं या खुशी मनाते हैं। उसकी असली ताकत इस बात में है कि एक गरीब या छोटा देश भी किसी अमीर और शक्तिशाली देश को हरा सकता है। फुटबॉल का मैदान यह याद नहीं रखता कि किस देश की GDP ज्यादा है। वहां सिर्फ प्रदर्शन, प्रतिभा और मेहनत मायने रखती है।
भारत इस पूरी स्थिति को एक अलग और सीख देने वाले नजरिए से देखता है।
भारत और FIFA वर्ल्डकप का रिश्ता बहुत खास है। भारत दुनिया का सबसे ज्यादा आबादी वाला देश है और यहां खेलों के प्रति लोगों का जुनून भी बहुत गहरा है। इसके बावजूद भारत कभी FIFA वर्ल्डकप के लिए क्वालिफाई नहीं कर पाया। इसलिए वर्ल्डकप से हमारा रिश्ता एक ऐसे समर्पित दर्शक का है, जो दिल और भावनाओं से पूरी तरह जुड़ा हुआ है, लेकिन मैदान पर मौजूद नहीं है।
प्रतियोगिता से बाहर बैठकर देखने का भी एक फायदा है। जब आपकी अपनी टीम नहीं खेल रही होती, तो अहंकार और पक्षपात खत्म हो जाता है। तब आप खेल को उसके सबसे शुद्ध रूप में देखते हैं। आप सिर्फ मैच, उसका रोमांच और उन खिलाड़ियों की कहानी देखते हैं, जिन्होंने दुनिया की नजरों के सामने खेले जाने वाले 90 मिनट के लिए वर्षों तक मेहनत की है।
भारत के गांवों, कस्बों और शहरों में फुटबॉल के प्रति प्रेम हर जगह दिखाई देता है। चाहे उत्तर भारत के मोहल्लों के मैदान हों, बंगाल के पाड़ा ग्राउंड, केरल के धान के खेतों के पास बने मैदान हों या पूर्वोत्तर भारत के खूबसूरत स्टेडियम- भारतीय फुटबॉल प्रेमी टूटी सड़कों पर नंगे पैर खेले जाने वाले फुटबॉल का भी उतना ही सम्मान करते हैं।
वर्ल्ड कप को केवल ‘एस्केपिज्म’ यानी वास्तविकता से कुछ समय के लिए भागना नहीं कहा जा सकता। असली फर्क यह है कि वर्ल्डकप हमें यह अनुभव कराता है कि देशों के बीच शांतिपूर्ण प्रतिस्पर्धा कैसी दिखती है।
यहां मुकाबला होता है, लेकिन नफरत नहीं। यहां देशभक्ति होती है, लेकिन दूसरे देशों पर कब्जा करने की इच्छा नहीं।
यहां गर्व होता है, लेकिन ताकत या हिंसा से नहीं, बल्कि प्रतिभा और कौशल से।
वर्ल्डकप के दौरान कुछ समय के लिए दुनिया का ध्यान युद्ध, सेना और सीमा विवादों से हटकर खेल के मैदान पर आ जाता है। लोग मिसाइलों और संघर्षों की जगह खिलाड़ियों, गोलों और पेनल्टी बॉक्स की चर्चा करने लगते हैं। खेल कई बार वह काम कर देता है जो हथियार नहीं कर सकते। खेल तनाव को प्रतिस्पर्धा में बदल देता है, जबकि युद्ध उसे विनाश में बदल देता है।
इंसानों को सिर्फ युद्ध की तैयारी ही नहीं, बल्कि शांति का अभ्यास भी करना चाहिए। लोगों को ऐसे अवसरों की जरूरत होती है जो सामूहिक डर नहीं, बल्कि सामूहिक खुशी पैदा करें। उन्हें समय-समय पर यह महसूस करने की जरूरत होती है कि दुनिया अभी भी साझा अनुभवों के जरिए एक साथ आ सकती है।
इसी वजह से FIFA वर्ल्डकप को "दुनिया का सबसे बड़ा शो" कहा जाता है। यह सिर्फ एक खेल प्रतियोगिता नहीं, बल्कि ऐसा आयोजन है जो कुछ समय के लिए पूरी मानवता को एक साझा अनुभव में जोड़ देता है।
FIFA वर्ल्डकप को "दुनिया का सबसे बड़ा शो" कहा जाता है और यह बात बिल्कुल सही है। लेकिन यह सिर्फ ऐसा कार्यक्रम नहीं है जिसे आप टीवी पर बैठकर देखते हैं। यह एक ऐसा अनुभव है जिसमें लोग भावनात्मक रूप से पूरी तरह शामिल हो जाते हैं।
हर चार साल में कुछ हफ्तों के लिए अरबों लोग ऐसे देशों के बारे में सोचने लगते हैं जहां वे कभी नहीं गए। वे ऐसे खिलाड़ियों का समर्थन करने लगते हैं जिनसे वे कभी नहीं मिले। कई लोग रात में अलार्म लगाकर अलग-अलग टाइम ज़ोन में खेले जा रहे मैच देखते हैं।
वर्ल्डकप कुछ समय के लिए ऐसे समुदाय बना देता है जिनकी कोई कानूनी पहचान नहीं होती, कोई सीमा नहीं होती और कोई औपचारिक इतिहास नहीं होता। फिर भी उस समय वे लोगों को बेहद वास्तविक और अपने लगते हैं।
आज की दुनिया में लोगों को जाति, धर्म, राष्ट्र, विचारधारा और राजनीतिक समूहों के आधार पर लगातार बांटा जा रहा है। ऐसे माहौल में जब लाखों-करोड़ों लोग बिना किसी मजबूरी के एक साथ खुशी मनाते हैं, तो यह सिर्फ भावुकता नहीं बल्कि एक शक्तिशाली सामाजिक घटना है। यही वजह है कि FIFA वर्ल्डकप आज भी इतना महत्वपूर्ण है। इसकी अहमियत सिर्फ बड़े स्टेडियमों या अरबों डॉलर के प्रसारण सौदों में नहीं है।
इसकी सबसे बड़ी ताकत यह है कि यह दुनिया के लोगों को, भले ही कुछ समय के लिए, यह एहसास करा देता है कि वे सभी एक ही मानव जाति का हिस्सा हैं और यही उनके बीच सबसे बड़ा साझा संबंध है।
यह भी एक दिलचस्प संयोग है कि यह टूर्नामेंट ऐसे चैनल पर दिखाया जा रहा है जिसका नाम 'Unite8' है, क्योंकि वर्ल्डकप का असली संदेश भी लोगों को जोड़ना और एकजुट करना है।
(यह लेखक के निजी विचार हैं)
बारिश कम होने का सीधा असर फसलों पर पड़ता है। अब भी हमारी आधी फसल बारिश पर निर्भर है। कम बारिश से उत्पादन कम होने की आशंका बढ़ जाती है।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
मिलिंद खांडेकर, वरिष्ठ पत्रकार।
शुक्रवार को शेयर बाज़ार सुबह से ऊपर चढ़ रहा था। अमेरिका और ईरान के बीच डील की खबरें आ रही थीं। क्रूड ऑयल की क़ीमतें गिर रही थीं। लेकिन एक खबर ने बाज़ार का मूड बिगाड़ दिया। मौसम विभाग का अनुमान आया कि इस साल मानसून बारिश सामान्य के मुक़ाबले 90% होने की आशंका है। हम ईरान युद्ध के कारण महंगाई से जूझ रहे हैं और अब बारिश कम होने की आशंका महंगाई की आग में घी डालने का काम कर सकती है।
मौसम विभाग का अनुमान क्या है?
मौसम विभाग हर साल अप्रैल और मई में मॉनसून का पूर्वानुमान जारी करता है। अप्रैल में कहा था कि इस साल सामान्य से 92% बारिश होगी, लेकिन शुक्रवार को इसे घटाकर 90% कर दिया। इतनी कम बारिश की आशंका पिछले दस साल में पहली बार लगाई गई है। मौसम विभाग पिछले 50 साल की मॉनसून बारिश का औसत निकालता है। यह औसत करीब 87 सेंटीमीटर है। फिर बताता है कि औसत से कम बारिश होगी या ज़्यादा। बारिश कम होने की आशंका का कारण है El Niño।
अब ये El Niño क्या है?
भारत से हज़ारों किलोमीटर दूर प्रशांत महासागर (Pacific Ocean) में मॉनसून का रिमोट कंट्रोल है। वहाँ तेज हवा चलती है, तो समुद्र के गर्म पानी को हमारी तरफ़ (हिंद-प्रशांत) धकेलती है। गर्म पानी से बादल बनते हैं, जमकर बारिश होती है। El Niño के साल में हवा नहीं चलती है, तो गर्म पानी हमारी तरफ़ नहीं आता है। बादल कम बनते हैं। बारिश कम होती है। इस साल यही होने की आशंका है।
महंगाई बढ़ने की आशंका
बारिश कम होने का सीधा असर फसलों पर पड़ता है। अब भी हमारी आधी फसल बारिश पर निर्भर है। कम बारिश से उत्पादन कम होने की आशंका बढ़ जाती है। कम उत्पादन का मतलब महंगाई बढ़ने की आशंका रहती है। राहत की बात यह है कि हमारे पास अभी अनाज और पानी का पर्याप्त भंडार है। फिर भी कम बारिश होने से ग्रामीण क्षेत्रों में खपत कम होती है। अब भी हमारे देश की 45% आबादी खेतों में काम करती है। उनकी आमदनी पर भी असर पड़ता है। इससे FMCG, ऑटो और सीमेंट कंपनियों के माल की खपत कम हो सकती है। यही कारण है कि शुक्रवार को शेयर बाज़ार में गिरावट आ गई।
ग़रीबी में आटा गीला
हम अमेरिका-ईरान युद्ध के कारण पहले से परेशान हैं। युद्ध खत्म होने की ख़बरें तो रोज़ आती हैं, लेकिन बात तब बनेगी जब Strait of Hormuz खुलेगा। ईरान और ओमान के बीच यह संकरा जलमार्ग तीन महीनों से बंद है। दुनिया का 20% क्रूड ऑयल यहीं से गुज़रता है। यही वजह है कि पेट्रोल और डीज़ल के भाव बढ़े हैं। युद्ध खत्म होने पर भी सप्लाई सामान्य होने में कुछ महीने लगेंगे। इस पर बारिश के पूर्वानुमान ने ग़रीबी में हमारा आटा गीला कर दिया है।
( यह लेखक के निजी विचार हैं )
वंदे मातरम् का इतिहास केवल एक गीत का इतिहास नहीं बल्कि भारत की राजनीति, राष्ट्रवाद और लोकतांत्रिक समझौतों का इतिहास भी है। एक पक्ष इसे राष्ट्रीय गौरव और स्वतंत्रता संघर्ष की आत्मा मानता है।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
आलोक मेहता, पद्मश्री, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक।
केरल में सत्ता में आने के बाद राहुल गांधी और सतीशन की कांग्रेस सरकार ने विधानसभा के उद्घाटन सत्र में ही राष्ट्रगीत ‘वंदेमातरम्’ के पूरे 6 अंश को राज्यपाल के लिए तय प्रोटोकॉल नियमानुसार नहीं बजने दिया और इस गीत को आरएसएस का बताए जाने पर कई आपत्तियों के साथ सवाल भी खड़े हुए हैं। एक महत्वपूर्ण सवाल यह भी उठा है कि अब अन्य राज्यों और 2029 में केंद्र में सत्ता के लिए ‘जय हिन्द’ और ‘हिंदुस्तान जिंदाबाद’ के नारों को भी राहुल गांधी की टीम सार्वजनिक कार्यक्रमों पर बंद करवा देगी?
आखिर इनमें तो सीधे हिन्द और हिन्दू शब्दों का उपयोग है। और यह आशंका आज मेरी ही नहीं है, बल्कि जनवरी 1946 में महात्मा गांधी ने गुवाहाटी के एक भाषण में व्यक्त की थी। महात्मा गांधी ने कहा था कि “कांग्रेस की स्थापना के समय से ही वंदेमातरम् गाया जा रहा है। जो लोग इसका विरोध कर त्याग करने को कह रहे हैं, वे एक दिन जय हिन्द को भी त्याग देंगे। वंदेमातरम् का बहिष्कार नहीं होना चाहिए।”
केरल विधानसभा में राज्यपाल के अभिभाषण से पहले पुलिस बैंड द्वारा ‘वंदे मातरम्’ को पूरा न बजाकर केवल शुरुआती दो छंद (पुराना/संक्षिप्त हिस्सा) बजाने पर विवाद छिड़ा है। राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ आर्लेकर ने इस बात पर नाराजगी जताई कि जब वह संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा (यूडीएफ) सरकार के नीतिगत अभिभाषण के लिए विधानसभा में मौजूद थे, तब ‘वंदे मातरम्’ पूरा नहीं गाया गया।
उन्होंने कहा कि “जब राज्यपाल ऐसे कार्यक्रमों में उपस्थित हों, तब उचित प्रोटोकॉल का पालन किया जाना चाहिए।” राज्यपाल ने विधानसभा से लौटने के बाद लोक भवन में पत्रकारों से कहा कि यह पहले से तय था कि जब भी राज्यपाल सदन में मौजूद हों, तब ‘वंदे मातरम्’ पूरा गाया जाना चाहिए। नीतिगत अभिभाषण से पहले और बाद में एक बैंड दल ने ‘वंदे मातरम्’ के शुरुआती अंतरे प्रस्तुत किए। गौरतलब है कि केंद्र सरकार ने इस वर्ष के प्रारंभ में ही सरकार के सभी संस्थानों और राज्य सरकारों के लिए दिशा-निर्देश जारी कर आधिकारिक कार्यक्रमों में राष्ट्रगीत वंदे मातरम् के पूरे छह अंश बजाना अनिवार्य कर दिया है।
केरल के नए मुख्यमंत्री सतीशन ने इस मामले में संवाददाताओं के सवालों का जवाब देते हुए कहा कि कांग्रेस और उसका यूडीएफ गठबंधन एक राजनीतिक विचारधारा के ढाँचे के भीतर काम करते हैं और वे पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व के फैसलों के अनुसार संचालित होते हैं। उन्होंने कहा कि इस मुद्दे पर पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व का स्पष्ट रुख है और वही गठबंधन पर भी लागू होता है। मुख्यमंत्री ने यह भी कहा कि ‘वंदे मातरम्’ को पूरा गाना अनिवार्य नहीं है, क्योंकि संसद ने इस संबंध में कोई कानून पारित नहीं किया है।
सवाल यह है कि क्या कांग्रेस पार्टी राष्ट्रगीत, राष्ट्रीय चिन्ह अथवा भारत सरकार द्वारा निर्धारित दिशा-निर्देशों का विरोध इस हद तक करेगी और सरकार की संरक्षक बनी मुस्लिम लीग के निर्देशों का पालन करेगी? मुस्लिम लीग तो आजादी से पहले भी वंदेमातरम् का विरोध और मुस्लिम नागरिकों के लिए केवल मुस्लिम उम्मीदवार को वोट देने के अधिकार की मांग कर रही थी। संविधान निर्माताओं ने इसे ठुकरा दिया था।
शायद राहुल गांधी और उनकी सलाहकार मंडली इस बात को भी याद नहीं रखना चाहती कि बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा लिखित गीत ‘वन्देमातरम्’ 1896 में कांग्रेस अधिवेशन में ही पहली बार गाया गया। रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने पहली बार इसे कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में गाया। इसके बाद यह पूरे देश में प्रसिद्ध हो गया। उन्हीं टैगोर के शांति निकेतन में कुछ समय इंदिरा गांधी ने शिक्षा भी ली।
1905 के बंगाल विभाजन आंदोलन के समय ‘वंदे मातरम्’ ब्रिटिश शासन के विरोध का प्रमुख नारा बन गया। कांग्रेस कार्यकर्ता इसका प्रयोग करते थे। ब्रिटिश सरकार कई जगह इसके सार्वजनिक प्रयोग पर रोक लगाती थी। कांग्रेस अधिवेशनों के अलावा आजादी के आंदोलन के दौरान इस गीत के प्रयोग के काफी उदाहरण मौजूद हैं। लाला लाजपत राय ने लाहौर से जिस ‘जर्नल’ का प्रकाशन शुरू किया था, उसका नाम ‘वन्दे मातरम्’ रखा। अंग्रेजों की गोली का शिकार बनकर दम तोड़ने वाली आजादी की दीवानी मातंगिनी हाजरा की जिह्वा पर आखिरी शब्द “वन्दे मातरम्” ही थे।
सन् 1907 में भीकाजी कामा ने जब जर्मनी के स्टुटगार्ट में तिरंगा फहराया, तो उसके मध्य में “वन्दे मातरम्” ही लिखा हुआ था। आर्य प्रिंटिंग प्रेस, लाहौर तथा भारतीय प्रेस, देहरादून से सन् 1929 में प्रकाशित काकोरी के शहीद राम प्रसाद बिस्मिल की प्रतिबंधित पुस्तक ‘क्रांति गीतांजलि’ में पहला गीत ‘मातृ-वन्दना’ वन्दे मातरम् ही था।
‘वंदे मातरम्’ केवल एक गीत नहीं, बल्कि भारत के राष्ट्रवादी आंदोलन का एक प्रमुख प्रतीक रहा है। इसके समर्थन और विरोध का इतिहास भारत की राजनीति, सांप्रदायिक संबंधों, स्वतंत्रता आंदोलन और आधुनिक राजनीतिक विमर्श से गहराई से जुड़ा हुआ है। यह गीत जहाँ एक ओर लाखों स्वतंत्रता सेनानियों के लिए प्रेरणा बना, वहीं कुछ मुस्लिम नेताओं और मुस्लिम लीग ने राष्ट्रगीत की कुछ पंक्तियों पर आपत्ति जताई, क्योंकि उनमें भारत माता को देवी स्वरूप में प्रस्तुत किया गया था। फिर भी आजादी के बाद 1950 में इसे राष्ट्रीय गीत का दर्जा मिला।
डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने संविधान सभा को संबोधित करते हुए कहा— “शब्दों व संगीत की वह रचना, जिसे जन गण मन से संबोधित किया जाता है, भारत का राष्ट्रगान है; बदलाव के ऐसे विषय, अवसर आने पर सरकार अधिकृत करे और वन्दे मातरम् गान, जिसने कि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में ऐतिहासिक भूमिका निभाई है, को जन गण मन के समकक्ष सम्मान व पद मिले। मैं आशा करता हूँ कि यह सदस्यों को संतुष्ट करेगा।” (भारतीय संविधान परिषद, खंड 12, 24 जनवरी 1950) शुरुआती दौर में कांग्रेस पार्टी ने वंदे मातरम् को व्यापक रूप से अपनाया।
कुछ मुस्लिम नेताओं और संगठनों ने इस पर आपत्ति जतानी शुरू की। उनकी मुख्य आपत्तियाँ थीं कि गीत में भारत माता को देवी स्वरूप में दिखाया गया और कुछ पंक्तियों में देवी-पूजा जैसी व्याख्या संभव थी। इसी कारण कांग्रेस नेतृत्व ने समझौता करने की कोशिश की। यानी कांग्रेस ने समर्थन और राजनीतिक समझौते दोनों किए।
दूसरी तरफ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने प्रारंभ से वंदे मातरम् को सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का प्रमुख प्रतीक माना। संघ के दृष्टिकोण में यह राष्ट्रीय एकता का गीत है। इसका विरोध तुष्टीकरण की राजनीति का परिणाम माना गया। इसे व्यापक राष्ट्रवादी पहचान से जोड़ा गया। संघ से जुड़े संगठनों ने स्कूलों, शाखाओं और कार्यक्रमों में इसका उपयोग जारी रखा। उसकी भारतीय जनसंघ पार्टी ने वंदे मातरम् को अनिवार्य राष्ट्रीय प्रतीक के रूप में समर्थन दिया।
फिर भारतीय जनता पार्टी ने वंदे मातरम् को लगातार राष्ट्रीय पहचान से जोड़ा। नेताओं ने कई बार कहा कि वंदे मातरम् राष्ट्रभक्ति का प्रतीक है। इसका विरोध राजनीतिक तुष्टीकरण है। इसे स्कूलों और सरकारी कार्यक्रमों में बढ़ावा मिलना चाहिए। यह प्रतीकात्मक मातृभूमि की स्तुति है।
वंदे मातरम् का इतिहास केवल एक गीत का इतिहास नहीं, बल्कि भारत की राजनीति, राष्ट्रवाद, सांप्रदायिक संबंधों और लोकतांत्रिक समझौतों का इतिहास भी है। एक पक्ष इसे राष्ट्रीय गौरव और स्वतंत्रता संघर्ष की आत्मा मानता है। दूसरा पक्ष कहता है कि राष्ट्रवाद को किसी एक सांस्कृतिक प्रतीक तक सीमित नहीं किया जाना चाहिए।
अब 26 अक्टूबर 2025 को ‘मन की बात’ कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘वंदेमातरम्’ गीत के इतिहास की देशवासियों को फिर से याद दिलाई और राष्ट्रीय गीत ‘वंदेमातरम्’ के 150 वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष्य में 7 नवंबर से भारत सरकार की ओर से एक वर्ष तक अलग-अलग कार्यक्रमों का आयोजन करने का निर्णय लिया। इन आयोजनों के माध्यम से देश भर में ‘वंदे मातरम्’ का पूर्ण गान आयोजित हो रहा है, जिससे देश की युवा पीढ़ी ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ के विचार को आत्मसात कर पाए। संसद में वन्दे मातरम् पर लगभग 10 घंटे की चर्चा हुई, जिसमें प्रधानमंत्री एवं अन्य सदस्यों ने भाग लिया।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि “वंदे मातरम् हजारों वर्ष की सांस्कृतिक ऊर्जा भी थी। उसमें आजादी का जज्बा भी था और आजाद भारत का विजन भी था। बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने उस समय समाज के एक वर्ग की हीन भावना को भी झकझोरने के लिए और सामर्थ्य का परिचय कराने के लिए वंदे मातरम् में भारत के सामर्थ्यशाली रूप को प्रकट करते हुए लिखा था कि भारत माता ज्ञान और समृद्धि की देवी भी हैं और दुश्मनों के सामने अस्त्र-शस्त्र धारण करने वाली चंडी भी हैं। वंदे मातरम् सिर्फ गीत या भावगीत नहीं, यह हमारे लिए प्रेरणा है, राष्ट्र के प्रति कर्तव्यों के लिए हमें झकझोरने वाला काम है और इसलिए हमें निरंतर इसको करते रहना होगा।
हम आत्मनिर्भर भारत का सपना लेकर चल रहे हैं, उसको पूरा करना है। वंदे मातरम् हमारी प्रेरणा है। हम स्वदेशी आंदोलन को ताकत देना चाहते हैं। समय बदला होगा, रूप बदले होंगे, लेकिन महात्मा गांधी ने जो भाव व्यक्त किया था, उस भाव की ताकत आज भी मौजूद है और वंदे मातरम् हमें जोड़ता है। देश के महापुरुषों का सपना था स्वतंत्र भारत का, देश की आज की पीढ़ी का सपना है समृद्ध भारत का। आजाद भारत के सपने को सींचा था वंदे मातरम् की भावना ने और समृद्ध भारत के सपने को भी वही भावना सींचेगी।”
प्रधानमंत्री ने संकल्प के रूप में कहा कि वंदे मातरम् की भावनाओं को लेकर हमें आगे चलना है। हमें आत्मनिर्भर भारत बनाना है और 2047 में देश विकसित भारत बनकर रहे। अगर आजादी के 50 साल पहले कोई आजाद भारत का सपना देख सकता था, तो 25 साल पहले हम भी समृद्ध भारत और विकसित भारत का सपना देख सकते हैं और इस सपने के लिए अपने आप को खपा भी सकते हैं। इसी मंत्र और इसी संकल्प के साथ वंदे मातरम् हमें प्रेरणा देता रहे। वंदे मातरम् का हम ऋण स्वीकार करें, वंदे मातरम् की भावनाओं को लेकर चलें, देशवासियों को साथ लेकर चलें, हम सब मिलकर चलें और इस सपने को पूरा करें।
( यह लेखक के निजी विचार हैं )
30 मई हिंदी पत्रकारिता दिवस हमें उस गौरवशाली परंपरा की याद दिलाता है, जिसने स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर आज के डिजिटल युग तक भारतीय समाज और लोकतंत्र को दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
विनोद अग्निहोत्री, सलाहकार संपादक, अमर उजाला समूह
किसान, मजदूर और आम आदमी का एक सशक्त हथियार रही हिंदी पत्रकारिता आज बाजारीकरण, आर्थिक संकट और घटती विश्वसनीयता जैसे दौर से गुजर रही है।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
जितेन्द्र बच्चन, वरिष्ठ पत्रकार।।
देश में सबसे अधिक हिंदी भाषा में ही समाचार पत्र-पत्रिकाएं प्रकाशित होते हैं और समाचार चैनल भी सबसे ज्यादा हैं। हिंदी पत्रकारिता के बलबूते ही पत्र-पत्रिकाएं व चैनल लाखों-करोड़ों का कारोबार करते हैं। इसके बावजूद उसकी वह धाक नहीं बन पाई जो अंग्रेजी अखबारों या मैग्जींस की है।
किसान, मजदूर और आम आदमी का एक सशक्त हथियार रही हिंदी पत्रकारिता आज सरकारी उपेक्षा और बाजारीकरण, आर्थिक संकट व घटती विश्वसनीयता जैसे दौर से गुजर रही है। अपने ही देश में हिंदी पत्रकारिता दोयम दर्जे की बनी हुई है और अब तो दिन-प्रतिदिन इसकी साख गिरती जा रही है।
हिंदी पत्रकारिता करने वाले 30 मई को हिंदी पत्रकारिता दिवस पर दूसरी भाषाओं को खूब कोसते हैं, लेकिन यही कोसने वाले लोग हिंदी के पत्रकारों को नौकरी नहीं देना चाहते। हिंदी पत्रकारिता के नाम पर पत्रकार एवं सरकार बड़े-बड़े आयोजन तो करते हैं, लेकिन शोहरत अंग्रेजी में छोटे-मोटे कार्यक्रम करने वाले एडिटर के खाते में जाती है।
राज्य और केंद्र सरकारों द्वारा जारी किए जाने वाले विज्ञापनों में अक्सर अंग्रेजी के बड़े अखबारों को प्राथमिकता दी जाती है। क्षेत्रीय और हिंदी के छोटे समाचार पत्रों को कम विज्ञापन या कम दरें मिलती हैं, जिससे उनका आर्थिक ढांचा चरमरा जाता है। किसी सार्वजनिक बड़े मंच पर जब किसी पत्रकार को स्थान देना होगा या संवाद में हिस्सा लेना होता है तो अंग्रेजी वाले साहब को अहमियत दी जाती है। मान्यता देने के मामले में भी हिंदी के पत्रकारों की अनदेखी की जाती है। इसी उपेक्षा के चलते आज हिंदी पत्रकारिता दोयम दर्जे की बन चुकी है।
यही कारण है कि सरकारी न्यूज चैनल या पत्र-पत्रिकाओं में संवाददाता नियुक्त करते समय या संपादकीय विभाग में कोई नौकरी देते वक्त उसे साक्षात्कार अंग्रेजी में देना पड़ता है। कितनी अजीब बात है कि काम हिंदी में करना है लेकिन सरकार हिंदी को महत्व न देकर अंग्रेजी को महत्व देती है। क्यों, यह एक बड़ा सवाल है।
बहुत से ऐसे पत्रकार हैं जिन्हें हिंदी भाषा का अच्छा ज्ञान है। उनका अनुभव बोलता है लेकिन अंग्रेजी में कमजोर होने के नाते सरकारी अधिकारी उन्हें हेय दृष्टि से देखते हैं। उनको महत्व देने के बजाय उनका माखौल उड़ाया जाता है। हिंदी पत्रकारिता करने वालों को दलाल और चापलूस बताया जाता है।
कितनी अजीब विडंबना है कि अपने ही देश में हिंदी पत्रकारिता आज अनाथ जैसी हालत में है। इसकी वकालत करने वाले को कम पढ़ा-लिखा समझा जाता है। नतीजतन हिंदी भाषा बहुल्य देश होते हुए भी आज 195 राष्ट्रों की सूची में हिंदी पत्रकारिता काफी निचले स्थान पर है।
हिंदी पत्रकारिता करने वाले पत्रकारों और प्रकाशनों की बहुत ही दयनीय स्थिति है। हैरानी की बात तो यह है कि इन्हीं हिंदी चैनलों और समाचार पत्र–पत्रिकाओं की बदौलत जो राजनेता, व्यापारी और अभिनेता आसमान छू रहे हैं और ताकतवर बने हुए हैं, वही वक्त आने पर हिंदी पत्रकारों को भूलकर अंग्रेजी के चैनलों व अखबारों को ज्यादा पूछते हैं। इससे अधिक उपेक्षा और क्या होगी।
और अब तो हिंदी पत्रकारिता के सामने विश्वसनीयता का संकट भी खड़ा हो चुका है। सोशल मीडिया के इस दौर में अफवाहों और फर्जी खबरों की बाढ़-सी आ गई है। अंग्रेजी वाली ब्रेकिंग न्यूज (सबसे पहले खबर) की बराबरी करने की अंधी दौड़ में ‘सच’ पीछे छूट जाता है। सनसनीखेज बनाने की होड़ में तथ्यों की पुष्टि किए बिना ही खबरें परोसी जा रही हैं, जिससे हिंदी पत्रकारिता के सिद्धांतों और उसकी साख को लगातार नुकसान पहुंच रहा है।
व्यावसायिक दबावों और संपादकीय स्वतंत्रता के बीच संतुलन बनाना आज हिंदी पत्रकारिता के सामने एक बड़ी चुनौती बन चुकी है। कुछ मीडिया घरानों ने इसे एक लाभ कमाने वाला व्यवसाय बना दिया है। राजनीतिक हित साधने लगे हैं। टीआरपी और ज्यादा क्लिक्स पाने के लिए गंभीर मुद्दों को दरकिनार कर अंग्रेजी वालों की तरह सनसनीखेज और सतही खबरों को अधिक महत्व देने लगे हैं। इसके चलते कई बार खबरें निष्पक्ष नहीं लगती।
सोशल मीडिया, यूट्यूब और एआई आधारित प्लेटफॉर्म्स ने समाचारों के उपयोग का तरीका पूरी तरह बदल दिया है। वेब पत्रकारिता की भाषा व्याकरण, वर्तनी और हिंदी के मूल स्वरूप को नष्ट करने लगी है। ऐसे में जहां हिंदी पत्रकारिता को मौजूदा नई चुनौतियों का विश्लेषण करने की जरूरत है, वही सरकार को भी हिंदी के पत्रकारों को पूर्ण अहमियत देनी होगी। तभी हिंदी पत्रकारिता को वह स्थान मिलेगा, जो उसकी जरूरत ही नहीं अधिकार भी है।
(यह लेखक के निजी विचार हैं।)
पहले खबरों की पुष्टि और तथ्यों की जांच के बाद प्रकाशन होता था, अब पहले खबर चलाने की होड़ अधिक दिखाई देती है। इसी जल्दबाज़ी में कई बार अधूरी या गलत सूचनाएं भी लोगों तक पहुंच जाती हैं।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
राहुल महाजन, हेड ऑफ कॉरपोरेट अफेयर्स, बेनेट कोलमैन एंड कंपनी लिमिटेड।।
हिंदी पत्रकारिता का इतिहास देश की सामाजिक और राजनीतिक चेतना से जुड़ा रहा है। कभी यह जनसरोकारों की आवाज मानी जाती थी। अखबार केवल खबरें नहीं छापते थे, बल्कि समाज में बहस खड़ी करते थे, सत्ता से सवाल पूछते थे और आम लोगों की समस्याओं को सामने लाते थे। आज तस्वीर बदल चुकी है। तकनीक, बाजार और राजनीति के दबाव ने पत्रकारिता के स्वरूप को काफी हद तक बदल दिया है।
डिजिटल दौर ने खबरों की दुनिया को पूरी तरह बदल दिया है। अब सूचना का प्रवाह इतना तेज हो गया है कि हर व्यक्ति अपने मोबाइल पर हर समय नई खबर देखना चाहता है। सोशल मीडिया, यूट्यूब और डिजिटल प्लेटफॉर्म ने पारंपरिक मीडिया को पीछे छोड़ने की चुनौती खड़ी कर दी है। पहले खबरों की पुष्टि और तथ्यों की जांच के बाद प्रकाशन होता था, अब पहले खबर चलाने की होड़ अधिक दिखाई देती है। इसी जल्दबाज़ी में कई बार अधूरी या गलत सूचनाएं भी लोगों तक पहुंच जाती हैं।
फेक न्यूज आज पत्रकारिता के सामने सबसे बड़ी समस्या बन चुकी है। सोशल मीडिया पर अफवाहें और भ्रामक सूचनाएं इतनी तेजी से फैलती हैं कि कई बार सच पीछे छूट जाता है। इससे मीडिया की विश्वसनीयता पर भी असर पड़ा है। लोगों के मन में यह सवाल लगातार गहराता जा रहा है कि किस खबर पर भरोसा किया जाए और किस पर नहीं।
एक बड़ा बदलाव पत्रकारिता की कार्यशैली में भी आया है। पहले पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता था क्योंकि उसका काम सत्ता से जवाब मांगना और जनता की आवाज को मजबूती देना था। लेकिन अब यह धारणा मजबूत हुई है कि मीडिया का एक हिस्सा सरकार से असहज सवाल पूछने से बचता है। कई पत्रकार और मीडिया संस्थान खुलकर राजनीतिक विचारधाराओं के साथ खड़े दिखाई देते हैं। इससे पत्रकारिता की निष्पक्षता पर सवाल उठने लगे हैं।
आज दर्शक भी खबरों को अक्सर चैनलों और अखबारों की राजनीतिक छवि के आधार पर देखने लगे हैं। बहसें कई बार तथ्यों से ज्यादा आरोप-प्रत्यारोप और शोर तक सीमित रह जाती हैं। इसका असर लोकतांत्रिक संवाद पर भी पड़ रहा है। जब मीडिया का ध्यान जनहित से हटकर राजनीतिक खेमेबंदी पर केंद्रित होने लगे, तब आम लोगों के वास्तविक मुद्दे पीछे छूट जाते हैं।
दूसरी ओर मीडिया संस्थानों के सामने आर्थिक संकट भी गहराता जा रहा है। प्रिंट मीडिया की आय पहले बड़े पैमाने पर विज्ञापनों पर निर्भर थी, लेकिन अब विज्ञापन का बड़ा हिस्सा डिजिटल कंपनियों की ओर चला गया है। ऐसे में कई संस्थानों के सामने कम खर्च में काम चलाने की मजबूरी है।
खर्च घटाने की इस दौड़ का असर न्यूजरूम पर साफ दिखाई देता है। कर्मचारियों की संख्या कम की जा रही है, छोटे शहरों के दफ्तर बंद हो रहे हैं और एक पत्रकार से कई तरह का काम लिया जा रहा है। रिपोर्टिंग के साथ वीडियो बनाना, संपादन करना और सोशल मीडिया संभालना अब सामान्य बात हो गई है। इससे पत्रकारों पर दबाव बढ़ा है और खबरों की गहराई कम हुई है।
खोजी पत्रकारिता और जमीनी रिपोर्टिंग सबसे अधिक प्रभावित हुई है। गांव, किसान, मजदूर और छोटे शहरों की समस्याएं पहले की तुलना में कम दिखाई देती हैं क्योंकि ऐसी रिपोर्टिंग में समय और संसाधन दोनों अधिक लगते हैं। इसके बजाय त्वरित, सनसनीखेज और ज्यादा क्लिक पाने वाली खबरों को प्राथमिकता मिल रही है।
इसके बावजूद हिंदी पत्रकारिता की संभावनाएं खत्म नहीं हुई हैं। हिंदी भाषी पाठकों और डिजिटल दर्शकों की संख्या लगातार बढ़ रही है। छोटे शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों में इंटरनेट की पहुंच ने नए पाठक तैयार किए हैं। स्वतंत्र डिजिटल प्लेटफॉर्म और वैकल्पिक पत्रकारिता के नए प्रयोग भी सामने आ रहे हैं, जो गंभीर और तथ्य आधारित रिपोर्टिंग करने की कोशिश कर रहे हैं।
पत्रकारिता का मूल उद्देश्य आज भी वही है-जनता तक सही और संतुलित जानकारी पहुंचाना। तकनीक और बाजार के इस दौर में सबसे बड़ी चुनौती यही है कि पत्रकारिता अपनी विश्वसनीयता और स्वतंत्रता को कैसे बचाए रखे। मीडिया यदि सत्ता, बाज़ार और राजनीतिक खेमेबंदी से ऊपर उठकर जनता के सवालों को केंद्र में रखे, तभी उसका लोकतांत्रिक महत्व बना रहेगा।
(यह लेखक के निजी विचार हैं।)
यह पहली बार नहीं है जब हिंदी पत्रकारिता किसी चुनौती के दौर से गुजर रही है और न ही यह आखिरी बार होगा। समय के साथ पत्रकारिता ने हर चुनौती का सामना किया है और आगे भी करेगी।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
प्रो. मनोज कुमार।।
दो सौ वर्षों की हिंदी पत्रकारिता का स्मरण करते हुए जब हम पंडित युगल किशोर शुक्ल और ‘उदंत मार्तण्ड’ को याद करते हैं, तो स्वाभाविक रूप से गर्व की अनुभूति होती है। लेकिन जब आज की पत्रकारिता का स्वरूप देखते हैं, तो वह गर्व कहीं न कहीं चिंता में बदलता दिखाई देता है। इन दो सौ वर्षों में हिंदी पत्रकारिता ने समाज, राष्ट्र और लोकतंत्र के लिए बहुत कुछ किया, लेकिन समय के साथ उसने बहुत कुछ खोया भी है। कभी हिंदी पत्रकारिता अंग्रेजी शासन के खिलाफ संघर्ष का माध्यम थी, आज वह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और अपनी विश्वसनीयता बचाने की चुनौती से जूझ रही है।
हर दौर में सत्ता के लिए पत्रकारिता एक चेतावनी की तरह रही है और आगे भी रहेगी। यह संतोष की बात है कि तमाम बदलावों और गिरावट के बावजूद आज भी प्रतिष्ठा बचाने के लिए लोग पत्रकारिता की ताकत से डरते हैं। यही हिंदी पत्रकारिता की सबसे बड़ी पूंजी है।
हालांकि इन दो सौ वर्षों में पत्रकारिता का स्वरूप तेजी से बदला है। पत्रकारिता की तकनीक अब केंद्र में है और हम तकनीक-प्रधान पत्रकारिता के दौर में प्रवेश कर चुके हैं। यह हिंदी पत्रकारिता का संक्रमण काल है, जिसे नई और पुरानी दोनों पीढ़ियों को स्वीकार करना होगा। आज सबसे बड़ी चर्चा इस बात की है कि हिंदी पत्रकारिता ‘एआई’ (AI) और ‘चैटजीपीटी’ (ChatGPT) जैसी तकनीकों के साथ कैसे तालमेल बैठाए। संकट बड़ा है, लेकिन इसका समाधान भी हमें ही तलाशना होगा। यह पहली बार नहीं है जब हिंदी पत्रकारिता किसी चुनौती के दौर से गुजर रही है और न ही यह आखिरी बार होगा। समय के साथ पत्रकारिता ने हर चुनौती का सामना किया है और आगे भी करेगी।
भारत की स्वतंत्रता के संघर्ष में हिंदी पत्रकारिता की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही। अनेक संकटों और कठिन परिस्थितियों के बीच हिंदी पत्रकारिता ने अंग्रेजों को लोहे के चने चबवाए। स्वतंत्रता के बाद नवभारत निर्माण में भी पत्रकारिता ने एक सजग प्रहरी की भूमिका निभाई। उस दौर में देश विकास और नवाचार की ओर बढ़ रहा था और संसाधनों के वितरण को लेकर सवाल भी उठ रहे थे। तब भी हिंदी पत्रकारिता ने जिम्मेदारी निभाते हुए अनेक घोटालों और विसंगतियों को उजागर किया। समाज ने उसकी सराहना की, लेकिन सत्ता का असहज होना स्वाभाविक था।
दरअसल सत्ता और पत्रकारिता का संबंध नदी के दो किनारों की तरह है- साथ-साथ चलते हैं, लेकिन कभी मिलते नहीं। वर्ष 1947 से 1975 तक का दौर लोकतंत्र और पत्रकारिता दोनों के लिए महत्वपूर्ण रहा। 1975 का आपातकाल हिंदी पत्रकारिता की परीक्षा का समय था। उस दौर में प्रेस पर पहरे बैठा दिए गए और शब्द-शब्द सरकारी निगरानी में आने लगा। तमाम प्रतिबंधों के बावजूद पत्रकारिता ने हार नहीं मानी। विरोधस्वरूप कई समाचार पत्रों ने संपादकीय पृष्ठ खाली छोड़ दिए और विभिन्न तरीकों से प्रतिरोध दर्ज कराया। पत्रकारिता का वही स्वाभिमान आज भी उसकी सबसे बड़ी ताकत है।
हालांकि यह भी सच है कि समय के साथ पत्रकारिता का स्वरूप बदलने लगा। पत्रकारिता धीरे-धीरे मीडिया और फिर उद्योग का रूप लेने लगी। मिशन के रूप में शुरू हुई पत्रकारिता रोजगार और व्यवसाय के बड़े क्षेत्र में बदल गई। पेशेवर पत्रकार तैयार करने के लिए मीडिया शिक्षा संस्थानों की संख्या तेजी से बढ़ी। हर संस्थान अपने दावे और विशेषताओं के साथ सामने आया।
तकनीक के बढ़ते प्रभाव ने पत्रकारिता की कार्यशैली को भी बदल दिया। अब पत्रकारिता में संवेदनशीलता और सामाजिक सरोकारों के साथ-साथ तकनीकी दक्षता को अधिक महत्व दिया जाने लगा है। कभी पत्रकारिता को समाज की पीड़ा को समझने और न्याय दिलाने का माध्यम माना जाता था, लेकिन आज तकनीक के सहारे प्रस्तुति और गति को अधिक अहमियत मिल रही है।
मेरे गुरुजनों ने सिखाया कि पत्रकारिता दिल से होती है, लेकिन नई पीढ़ी के लिए पत्रकारिता अधिक व्यावसायिक और तकनीक-आधारित होती जा रही है। एआई और चैटजीपीटी जैसी तकनीकों ने इस बदलाव को और तेज कर दिया है। आज मोबाइल पर कुछ निर्देश देते ही मनचाहा कंटेंट कुछ ही क्षणों में तैयार हो जाता है। यह तकनीकी सुविधा जितनी उपयोगी है, उतनी ही चुनौतीपूर्ण भी।
अब हमारे सामने दो ही रास्ते हैं- या तो हम खुद को तकनीक के अनुरूप ढालें या फिर समय से पीछे छूट जाएं। जैसे कभी फोटोटाइपसेटर और फिर कंप्यूटर के आने पर पत्रकारिता की कार्यप्रणाली बदली थी, वैसे ही आज एआई का दौर पत्रकारिता के सामने नई चुनौतियां लेकर आया है। जो लोग बदलाव के साथ चले, वे आगे बढ़े और जो पीछे रह गए, वे धीरे-धीरे हाशिये पर चले गए।
स्थिति यह है कि कभी समाज यह कहकर खबर पर भरोसा करता था कि ‘यह अखबार में छपा है’, जबकि आज लोग कहते हैं-‘एक बार खबर की पुष्टि कर लेना।’ यह बदलाव पत्रकारिता की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े करता है। फिर भी उम्मीद बाकी है। तमाम चुनौतियों और अंधेरों के बीच हिंदी पत्रकारिता का दीप अभी बुझा नहीं है। ऐसे समय में बालकवि बैरागी की ये पंक्तियां बरबस याद आती हैं-
“माना कि अंधेरा घना है, पर एक दीया जलाना कहां मना है!”
(यह लेखक के निजी विचार हैं। लेखक मीडिया शिक्षा से संबद्ध हैं तथा शोध पत्रिका ‘समागम’ के संपादक हैं।)
भारतीय पत्रकारिता में हर युग में चुनौतियां और उपलब्धियां रही हैं। यह धारणा गलत है कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया आने से हिंदी की पत्रकारिता के लिए गंभीर चुनौतियां और समस्याएं आई हैं।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
आलोक मेहता।।
भारतीय पत्रकारिता में हर युग में चुनौतियां और उपलब्धियां रही हैं। यह धारणा गलत है कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया आने से हिंदी की पत्रकारिता के लिए गंभीर चुनौतियां और समस्याएं आई हैं। सच तो यह है कि मीडिया के विभिन्न माध्यम एकदूसरे के पूरक भी हैं। हिंदी और भारतीय भाषाओं के बाहुल्य वाले भारतीय शहरों से लेकर गांव तक सूचना, समाचार, विचार पढ़ने, सुनने और देखने की भूख कम होने के बजाय बढ़ती गई है।
इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ही क्यों, अब तो सोशल मीडिया भी बड़े पैमाने पर लोगों के बीच लोकप्रिय हुआ है। यह अवश्य कहा जा सकता है कि समय के साथ हिंदी पत्रकारिता में भी कई तरह के बदलाव आए हैं। तिलक और गणेश शंकर विद्यार्थी युग वाली पत्रकारिता की अपेक्षा वर्तमान परिप्रेक्ष्य में नहीं की जा सकती। लेकिन आधुनिक हिंदी पत्रकारिता की दृष्टि से 70 के दशक से संपादकों और पत्रकारों ने सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक जागरूकता लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय, मनोहर श्याम जोशी, राजेन्द्र माथुर, प्रभाष जोशी और हरिवंश जैसे संपादकों ने हिंदी के अखबारों के पाठकों के साथ संपूर्ण सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था को प्रभावित किया। नवभारत टाइम्स, हिंदुस्तान, नई दुनिया, जनसत्ता, दैनिक भास्कर, राजस्थान पत्रिका और प्रभात खबर जैसे प्रमुख दैनिक अखबार राजधानी दिल्ली से आगे बढ़कर विभिन्न हिंदीभाषी प्रदेशों में भी निरंतर अपनी छाप छोड़ते रहे। राजेन्द्र माथुर जब 1982 में नवभारत टाइम्स के संपादक बनकर दिल्ली आए तो उन्होंने कुछ ही सप्ताह बाद एक समारोह में कहा था कि हिंदी का कोई अखबार केवल दिल्ली या मुंबई से प्रकाशित होने से राष्ट्रीय नहीं कहा जा सकता। वह तभी राष्ट्रीय कहला सकता है जब देश के विभिन्न राज्यों में उसके संस्करण हों।
यों अज्ञेय ने भी 1977 में नवभारत टाइम्स के संपादक बनने पर दिल्ली, मुंबई के अलावा बिहार की राजधानी पटना से अखबार का संस्करण निकालने की इच्छा व्यक्त की थी। लेकिन दो वर्ष के संक्षिप्त कार्यकाल के कारण वह सपना पूरा नहीं हुआ। माथुर साहब के आने के बाद लखनऊ, जयपुर, पटना के संस्करण निकले। इसी तरह जब मुझे दैनिक हिंदुस्तान का संपादक बनने का अवसर मिला, पटना के अलावा लखनऊ यानी उत्तर प्रदेश के संस्करण निकालने के लिए प्रबंधन तैयार हुआ।
इसी तरह हरिवंशजी ने प्रभात खबर संभालने के बाद इसे झारखंड और बिहार में प्रतिष्ठित अखबार बना दिया। जनसत्ता दिल्ली के अलावा मुंबई और कोलकाता से प्रकाशित हुआ। दिलचस्प बात यह भी रही कि राजस्थान पत्रिका जैसे जयपुर के अखबार ने कोलकाता के अलावा दक्षिण भारत में हैदराबाद और बेंगलुरु जैसे शहरों में हिंदी पाठकों के लिए संस्करण निकाले। इस दृष्टि से हिंदी पत्रकारिता ने अपनी गुणवत्ता से व्यापक स्तर पर पाठकों में अपनी पहचान बनाई। इसलिए इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से पहले हिंदी अखबारों की प्रगति को उपलब्धि की श्रेणी में रखा जा सकता है।
इलेक्ट्रॉनिक मीडिया यानी टेलीविजन के समाचार चैनल आने से हिंदी अखबारों की प्रसार संख्या कम नहीं हुई बल्कि आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार भी इनके पाठक बढ़ते गए। मेरा यह मानना है कि रेडियो या टेलीविजन पर कोई खबर देखने के बाद सामान्य जनता इन्हें विस्तार से देखने, पढ़ने और उस पर होने वाली टिप्पणियों के लिए अखबार या पत्रिका पढ़ती है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के आने से पहले भी दैनिक अखबारों में रंगीन फोटो तथा आधुनिक डिजाइन के आकर्षक प्रस्तुतिकरण के प्रयास होने लगे थे। अन्यथा 70 के दशक के पहले भारत ही नहीं, ब्रिटेन जैसे पश्चिमी देश में भी अखबारों में रंगीन फोटो नहीं छपते थे।
इसलिए यह कहा जा सकता है कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया आने पर हिंदी अखबारों की डिजाइन और परिशिष्ट में रंगीन फोटो छपने लगे। रविवारीय संस्करण कुछ हद तक पत्रिका की कमी भी पूरी करने लगे। असली समस्या यह है कि आधुनिक तकनीक, प्रिंटिंग का खर्च और न्यूजप्रिंट के मूल्य लगातार बढ़ने से बड़े प्रभावशाली कहे जाने वाले अखबार के प्रबंधन घाटे और मुनाफे पर अधिक ध्यान देने लगे। कुछ हद तक राजनीतिक सत्ता का प्रभाव भी इन अखबारों पर पड़ा। इस संदर्भ में देश के सबसे बड़े प्रकाशन समूह टाइम्स ग्रुप द्वारा मुनाफे को ही सर्वाधिक महत्व देने और अखबार को चटपटा, मसालेदार तथा अंग्रेजी में उपलब्ध सामग्री के अनुवाद को प्रोत्साहित करने की नीति अपनाई जिसका असर अन्य हिंदी अखबारों पर भी पड़ा। लेकिन प्रादेशिक और स्थानीय कम प्रसार संख्या वाले अखबार बहुत हद तक व्यावसायिक नहीं हुए और पाठकों के बीच स्थानीय समाचारों और उपयोगी सामग्री के जरिए अपना स्थान बनाए हुए हैं।
यह कहा जा सकता है कि महानगरों का एक बड़ा वर्ग और युवा पीढ़ी इलेक्ट्रॉनिक और सोशल मीडिया के आने के बाद अखबारों में कम दिलचस्पी ले रही है। लेकिन छोटे कस्बों और गांवों में आज भी अखबार पढ़ने की रुचि बनी हुई है। ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में साक्षरता बढ़ने से अखबारों के लिए अब भी संभावनाएं दिखाई देती हैं। सरकारों खासकर नौकरशाहों ने यह गलत धारणा बना रखी है कि अब लोग अखबार, पत्रिका या पुस्तकें नहीं पढ़ना चाहते हैं। वह भूल जाते हैं कि अमेरिका या जापान जैसे आधुनिक संपन्न देशों में भी अखबारों की प्रसार संख्या अच्छी-खासी है।
वास्तव में प्रकाशकों और संपादकों पर यह निर्भर है कि वे बाजार से प्रभावित न होकर ऐसी सामग्री पाठकों को उपलब्ध कराएं जो सामान्यतः टेलीविजन पर भी नहीं मिल सकती। पश्चिमी देशों की तरह भारत में अलग से टैब्लॉयड अखबार भी निकले लेकिन दुर्भाग्य से कई अखबार सनसनीखेज सामग्री और फोटो आदि से टैब्लॉयड की तरह अखबार का स्तर गिराने लगे, वहीं मशीन, प्रिंटिंग और प्रसार व्यवस्था पर अधिकाधिक धन खर्च किया जा रहा है लेकिन समाचारों के संकलन और समर्पित पत्रकारों पर खर्च कम से कम करने की प्रवृत्ति बढ़ती गई है। इसका असर गुणवत्ता पर पड़ रहा है।
इन दिनों मीडिया की शक्ति और स्वायत्तता को लेकर भी निरंतर सवाल उठ रहे हैं। जहां तक शक्ति का सवाल है, प्रिंट या इलेक्ट्रॉनिक मीडिया अथवा सोशल मीडिया की बात है, उसके व्यापक असर के कारण ही हजारों करोड़ की पूंजी लग रही है और कोई भी सरकार हो उसका यथासंभव उपयोग करने का प्रयास भी करती है। यही नहीं, विदेशी शक्तियां भी भारतीय मीडिया को प्रभावित करने के लिए प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से पूंजी लगा रही हैं। बड़े कार्पोरेट घरानों के प्रभाव को लेकर बहुत शोर मचता है लेकिन हम भूल जाते हैं कि 80 के दशक तक दिल्ली, मुंबई, कोलकाता तक मीडिया संस्थानों पर बिड़ला, डालमिया, टाटा के प्रभाव की चर्चा शक्तिशाली प्रधानमंत्री करते थे। इसे ‘जूट प्रेस’ कहा जाता था। सत्ता के दबाव तब भी थे।
मैंने पत्रकारिता पर अपनी पुस्तकों पावर, प्रेस एंड पॉलिटिक्स, कलम के सेनापति, भारत में पत्रकारिता, इंडियन जर्नलिज्मः कीपिंग इट्स क्लीन में इस मुद्दे पर प्रामाणिक तथ्यों के साथ विवरण दिया है। सत्ता की राजनीति ने पत्रकारिता को पहले भी प्रभावित किया था और आज भी कर रही है। इसलिए मुद्दा यह भी है कि सरकारों को बनाने या हटाने की भूमिका जो अखबार या मीडिया निभाता है उसका असर विश्वसनीयता पर पड़ता है। यदि लक्ष्य केवल प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या दल विशेष रहेगा तो स्वायत्तता कहां होगी अन्यथा प्रामाणिक तथ्यों के साथ सरकार की गड़बड़ियों या जनता की समस्याओं को प्रकाशित या प्रसारित करने पर दबाव नहीं पड़ सकता है।
खोजी रिपोर्ट के लिए संस्थानों को अधिक खर्च भी करना पड़ेगा। नई पीढ़ी को जोड़ने के लिए मीडिया संस्थानों की वेबसाइट और प्रकाशित सामग्री के सोशल मीडिया पर उपलब्ध किए जाने के प्रयास किए जा सकते हैं और कुछ हद तक हो भी रहे हैं। इस दृष्टि से ग्रामीण क्षेत्रों में हिंदी और भारतीय भाषाओं के अखबारों की संभावना बनी रहेगी। यही बात वैकल्पिक मीडिया यानी सोशल मीडिया पर लागू होती है। जो अच्छी सामग्री उपलब्ध कराएगा उसका भविष्य भी सुरक्षित रहेगा।
(लेखक पद्मश्री से सम्मानित और एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया के पूर्व अध्यक्ष हैं)