बनारसीदास चतुर्वेदी की पुण्यतिथि पर उनका स्मरण और श्रद्धांजलि। आज अनेक नौजवान पूछते हैं कि बनारसीदास चतुर्वेदी कौन थे। ऐसे में यह हमारी नैतिक जिम्मेदारी है कि युवाओं को उनके योगदान से अवगत कराएं।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
आशुतोष चतुर्वेदी, केंद्रीय सूचना आयुक्त।।
आज अनेक नौजवान पूछते हैं कि बनारसीदास चतुर्वेदी कौन थे। ऐसे में यह हमारी नैतिक जिम्मेदारी है कि युवाओं को उनके योगदान से अवगत कराएं। यदि एक पंक्ति में बनारसीदास चतुर्वेदी का परिचय देना हो, तो कहा जाना चाहिए कि गिरमिटिया भारतीयों के दर्द को विश्व पटल पर लाने वाला और शहीदों की स्मृति को सामने लाने वाला उनके जैसा देश में कोई और नहीं हुआ।
वे सादगी, समर्पण और कलम की ताकत के जीवंत प्रतीक थे। एक सच्चे ऋषि तुल्य व्यक्तित्व थे। बनारसीदास चतुर्वेदी (24 दिसंबर, 1892 – 2 मई,1985) उत्तर प्रदेश के फिरोजाबाद जिले में एक साधारण परिवार में जन्मे। वे 1921 के असहयोग आंदोलन में सक्रिय रूप से शामिल हुए और जेल गए। महात्मा गांधी के खादी प्रचार, सविनय अवज्ञा आंदोलन और हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने के अभियान में उन्होंने कंधे से कंधा मिलाकर काम किया। गुरुदेव रवींद्र नाथ टैगोर का सानिध्य उन्हें मिला।
शुरुआती दौर में बनारसीदास जी की मुलाकात तोताराम सनाढ्य नामक एक गिरमिटिया मजदूर से हुई। तोताराम जी फिजी से 21 वर्ष की अमानवीय यातनाएं झेलकर लौटे थे। उनकी आंखों में शोषण, मजबूरी, भूख और गुलामी की पीड़ा साफ झलकती थी। बनारसीदास जी दिन रात एक कर उनकी पूरी कहानी सुनी और वे उसे लिखते रहे। उन्होंने इसे पुस्तक का रूप दिया- फिजी द्वीप में मेरे 21 वर्ष। यह पुस्तक तोताराम सनाढ्य के नाम से प्रकाशित हुई। यह पुस्तक देश आग की तरह फैली और इसके अनेक संस्करण प्रकाशित हुए। इसका गुजराती, मराठी, उर्दू और अन्य अनके भारतीय भाषाओं में अनुवाद हुआ।
अंग्रेजी अनुवाद गांधी जी के अनुयायी भारत भक्त सीएफ एंड्रयूज ने किया। इसके आधार पर नाटक लिखे गए जिसे ब्रिटिश सरकार ने प्रतिबंधित कर दिया था। पुस्तक के महात्मा गांधी अन्य नेताओं तक पहुंचने के बाद पूरे देश में गिरमिट प्रथा के खिलाफ गहरा आक्रोश उठा। अंततः 1 जनवरी 1920 को ब्रिटिश सरकार को मजबूरन गिरमिट प्रथा समाप्त करनी पड़ी। वे जीवन पर्यंत प्रवासी भारतीयों की समस्याओं को लगातार उठाते रहे। उन्होंने अनेक किताबें लिखीं- फिजी की समस्या, फिजी में भारतीय, रेखाचित्र, साहित्य और जीवन, हमारे आराध्य, प्रेरक साधक, सेतुबंध, पत्र-लेखन कला, एक क्रांतिकारी के संस्मरण, महापुरुषों की खोज आदि।
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद बनारसीदास जी शहीदों की स्मृति रक्षा के लिए लगातार सक्रिय रहे। उन्होंने शहीदों की स्मृति रक्षा के लिए शहीदों का श्राद्ध नाम से एक साहित्यिक आंदोलन छेड़ा था। शहीदों की स्मृति रक्षा के लिए उन्होंने जैसे प्रयत्न किए, शायद ही किसी और हिंदी संपादक ने किए हों। उन्होंने राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाकुल्ला खान, चंद्रशेखर आजाद, जतिंद्रनाथ दास जैसे क्रांतिकारियों के संस्मरणों को संग्रहित कर प्रकाशित कराया। उन्होंने शहीदों के श्राद्ध जैसे कार्यक्रमों का आयोजन किया और बार-बार याद दिलाया कि हमें आजादी की बड़ी कीमत चुकानी पड़ी है। अनेक लोगों को फांसी की सजा हुई, लाखों लोग जेल गए और अनगिनत लोगों ने अपने प्राणों की आहुति दी।
वे जीवन पर्यंत हिंदी भाषा आंदोलनों, जनपदीय हिंदी के संरक्षण और राष्ट्रीय चेतना के प्रसार में सक्रिय बने रहे। जनवरी 1928 में मॉडर्न रिव्यू और प्रवासी के संचालक-संपादक रामानंद चट्टोपाध्याय ने विशाल भारत का प्रकाशन शुरू किया और उसका संपादक बनारसीदास चतुर्वेदी को बनाया गया। सन् 1937 तक बनारसीदास जी ने कोलकाता में बैठकर इसका संपादन किया। बनारसी दास चतुर्वेदी के कार्यकाल में विशाल भारत अपने समय का सबसे हिंदी का सबसे प्रतिष्ठित और प्रभावशाली पत्र बन गया था। विशाल भारत ने तीन बड़े आंदोलन चलाए। एक था- घासलेटी साहित्य विरोधी आंदोलन।
इसका असर यह हुआ कि गोरखपुर के हिंदी साहित्य सम्मेलन में घासलेटी साहित्य की निंदा करते हुए एक प्रस्ताव भी पारित हुआ था। एक और आंदोलन था- कस्मै देवाय यानी हम किसके लिए लिखें। दूसरी ओर विशाल भारत ने आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी, अज्ञेय, दिनकर, प्रेमचंद, बालकृष्ण शर्मा नवीन, सियाराम शरण गुप्त, गोपाल सिंह नेपाली, गुरुभक्त सिंह, श्रीमती कमला चौधरी, श्रीमती सत्यवती मलिक, वृंदावन लाल वर्मा, चंद्रगुप्त विद्यालंकार, हरिवंशराय बच्चन, सोहन लाल द्विवेदी, शिवमंगल सिंह सुमन आदि श्रेष्ठ रचनाकारों को हिंदी के पाठकों तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
विशाल भारत की एक और देन थी, इसकी अंतरराष्ट्रीय दृष्टि। शेक्सपियर, मिल्टन, वुड्सवर्थ के बारे में तो हिंदी पाठकों को जानकारी थी। लेकिन अमेरिकी विचारक एमर्सन और थोरो से पाठकों का परिचय विशाल भारत ने ही कराया था। विशाल भारत के माध्यम से मैक्सिम गोर्की, आंतोन चेखव आदि अनेक रूसी लेखकों की रचनाएं हिंदी पाठकों को पढ़ने के लिए मिलीं। प्रसिद्ध क्रांतिकारी प्रिंस क्रोपाटिकिन व मैल्टेस्टा जैसे अराजकवादियों के विचार विशाल भारत के माध्यम से ही हिंदी पाठकों तक पहुंचे थे। ऑस्ट्रेलियाई कथाकार स्टीफन ज्वाइग, जापानी लेखक कागावा और अमेरिकी लेखिका पर्ल बक का परिचय विशाल भारत ने हिंदी पाठकों से कराया था। यह भी बनारसीदास चतुर्वेदी की अपनी दृष्टि थी कि उन्होंने अहिंदीभाषी क्षेत्रों खासकर दक्षिण के राज्यों में हिंदी के प्रचार कार्य से भी हिंदी पाठकों को परिचित कराया।
ओरछा नरेश वीर सिंह जू देव के प्रस्ताव पर बनारसीदास चतुर्वेदी ने टीकमगढ़ से मधुकर का प्रकाशन प्रारंभ किया। यहां उन्होंने जनपदीय आंदोलन का सूत्रपात किया। यह पत्र जनपदीय समस्याओं पर अपने पाठकों का ध्यान आकर्षित करता था। इसका प्रकाशन छह वर्षों तक चला। मधुकर ने अनेक जनपदीय आंदोलनों को जन्म दिया। इसी दौर में मथुरा में ब्रज साहित्य मंडल की स्थापना हुई। इसी प्रकार की चेतना विभिन्न जनपदों में प्रारंभ हुई और कई पत्र पत्रिकाओं ने इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने अपने जीवनकाल में हजारों लोगों को पत्र लिखे। उनका पत्र लेखन असाधारण रूप से व्यापक था। वह उनकी दिनचर्या का एक हिस्सा ही बन गया था। उनके द्वारा लिखे गये पत्रों की संख्या एक लाख से अधिक है। इसे उन्होंने एक विधा के रूप में विकसित किया।
शायद कम ही लोगों को इस बात की जानकारी है कि श्रमजीवी पत्रकारों के पक्ष में वे सबसे पहले आगे आये थे। अखिल भारतीय हिंदी पत्रकार संघ का पहला अधिवेशन दिसंबर, 1945 में मथुरा में हुआ था और बनारसीदास चतुर्वेदी उसके निर्विरोध अध्यक्ष चुने गए थे। इसके पहले 22 फरवरी, 1942 को कानपुर में बनारसीदास चतुर्वेदी की अध्यक्षता में संयुक्त प्रांतीय हिंदी पत्रकार सम्मेलन का अधिवेशन हुआ था। इसमें कोई पत्र संचालक शामिल नहीं किया गया था। इसके एक सप्ताह बाद दिल्ली में अखिल भारतीय हिंदी पत्रकार संघ का अधिवेशन हुआ था। इस सम्मेलन में एक प्रस्ताव किया गया कि हिंदी पत्रकारों का न्यूनतम वेतन 40 रुपए मासिक होना चाहिए। आजादी के बाद बनारसीदास जी 12 वर्ष तक राज्यसभा के सदस्य रहे। संसद सदस्य होने के बावजूद उनका रहन-सहन पहले जैसा साधारण और निष्काम बना रहा। सन् 1973 में उन्हें पद्मभूषण से सम्मानित किया गया। बनारसी दास चतुर्वेदी एक सामान्य साहित्यकार-पत्रकार नहीं थे। वह एक चिंतक, वैचारिक संघर्ष और संस्कृति के जीवंत वाहक थे।
(यह लेखक के निजी विचार हैं)
करीब 25 वर्षों तक एनडीटीवी इंडिया से जुड़े रहे प्रियदर्शन को याद करते हुए रवीश रंजन शुक्ला ने उनके साथ बिताए अनुभवों, मार्गदर्शन और कार्यशैली का जिक्र किया है।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
वरिष्ठ पत्रकार और ‘एनडीटीवी इंडिया’ (NDTV India) में एसोसिएट एडिटर रवीश रंजन शुक्ला ने वरिष्ठ पत्रकार प्रियदर्शन के संस्थान से सेवानिवृत्त होने पर एक भावुक फेसबुक पोस्ट साझा की है। करीब 25 वर्षों तक एनडीटीवी इंडिया से जुड़े रहे प्रियदर्शन को याद करते हुए रवीश रंजन शुक्ला ने उनके साथ बिताए अनुभवों, मार्गदर्शन और कार्यशैली का जिक्र किया है। उन्होंने लिखा कि प्रियदर्शन न सिर्फ बेहतरीन पत्रकार और साहित्यकार रहे, बल्कि अपनी सादगी, शालीनता और तथ्यपरक पत्रकारिता के लिए भी हमेशा सम्मानित रहे। अपनी पोस्ट में उन्होंने प्रियदर्शन के साथ जुड़े कई संस्मरण साझा किए हैं।
मैच खत्म होने के बाद स्टेडियम की सफाई करते जापानी प्रशंसकों की तस्वीरें और वीडियो अक्सर सोशल मीडिया पर वायरल हो जाती हैं।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
डॉ. संदीप गोयल, फाउंडर व चेयरमैन,
मैच खत्म होने के बाद स्टेडियम की सफाई करते जापानी प्रशंसकों की तस्वीरें और वीडियो अक्सर सोशल मीडिया पर वायरल हो जाती हैं। दुनिया भर के लोग इसे देखकर हैरान होते हैं, लेकिन जापान में यह कोई असाधारण बात नहीं है। वहां के लोगों के लिए यह एक सामान्य सामाजिक जिम्मेदारी है, जो "Osoji" नाम की एक सांस्कृतिक सोच से जुड़ी हुई है।
Osoji का शाब्दिक अर्थ है "बड़ी सफाई"। पारंपरिक रूप से यह नए साल के स्वागत से पहले घरों और कार्यस्थलों की गहरी सफाई करने की परंपरा है, लेकिन इसकी भावना सिर्फ सालाना सफाई तक सीमित नहीं है। यह जापानी जीवनशैली का हिस्सा है और तीन प्रमुख सिद्धांतों पर आधारित है।
Shared Responsibility (साझी जिम्मेदारी) : सार्वजनिक जगहों जैसे स्टेडियम, पार्क, सड़क या रेलवे स्टेशन को साफ रखना केवल सफाई कर्मचारियों की जिम्मेदारी नहीं है। वहां आने वाले हर व्यक्ति की भी यह जिम्मेदारी है कि वह जगह को साफ-सुथरा रखे।
Atarimae (अतारिमाए – बिल्कुल स्वाभाविक बात) : जब जापानी लोगों से पूछा जाता है कि वे सफाई क्यों करते हैं, तो उनका जवाब होता है कि यह तो एक सामान्य और स्वाभाविक काम है। यानी सफाई करना उनके लिए कोई खास उपलब्धि या दिखावा नहीं, बल्कि रोजमर्रा की जिम्मेदारी है।
Leaving No Trace (कोई निशान या गंदगी पीछे न छोड़ना) : यह एक जापानी कहावत पर आधारित है, जिसका अर्थ है कि जब आप किसी जगह से जाएं तो उसे गंदा छोड़कर न जाएं। कोशिश करें कि वह जगह आपको जैसी मिली थी, उससे भी ज्यादा साफ हालत में छोड़ें।
कहां से आती है यह आदत
जापान में सफाई और जिम्मेदारी की आदत सिर्फ दिखावे या कैमरे के लिए नहीं होती, बल्कि यह बचपन से सिखाई जाने वाली एक गहरी संस्कृति है। वहां बच्चों को बहुत छोटी उम्र से यह सिखाया जाता है कि स्कूलों में खुद ही अपनी कक्षा, गलियारे और यहां तक कि बाथरूम तक साफ करना उनकी जिम्मेदारी है। इसके लिए अलग से सफाई कर्मचारी नहीं रखे जाते। ऐसा इसलिए किया जाता है ताकि बच्चों में यह भावना विकसित हो कि हर कोई बराबर है, किसी काम को छोटा या बड़ा नहीं समझना चाहिए और अपने आसपास की चीजों का सम्मान करना चाहिए। यह आदत उन्हें विनम्र बनाती है और उनके भीतर अनुशासन और जिम्मेदारी की भावना पैदा करती है। इसके पीछे जापान की धार्मिक सोच भी जुड़ी हुई है, खासकर शिंटो धर्म की परंपराएं, जिनमें सफाई को पवित्रता माना जाता है, और जेन बौद्ध धर्म की वह सीख जिसमें शारीरिक काम को ध्यान और आत्म-अनुशासन का हिस्सा माना जाता है।
स्टेडियम में सफाई की परंपरा
जापानी लोगों की यही आदत अंतरराष्ट्रीय खेलों में भी दिखाई देती है, खासकर वर्ल्ड कप जैसे बड़े आयोजनों में। दुनिया ने पहली बार यह दृश्य 1998 के फ्रांस वर्ल्ड कप में देखा था और तब से हर बड़े टूर्नामेंट में यह देखने को मिलता है। जापानी फैंस मैच देखने आते हैं और साथ में बड़े नीले प्लास्टिक बैग लाते हैं, जिन्हें वे मैच के दौरान हवा भरकर उत्साह दिखाने के लिए इस्तेमाल करते हैं। लेकिन मैच खत्म होने के बाद वही बैग वे कचरा इकट्ठा करने के लिए इस्तेमाल करते हैं और स्टेडियम पूरी तरह साफ कर देते हैं।
खास बात यह है कि वे यह काम सिर्फ अपनी टीम के लिए नहीं करते। चाहे जापान जीते या हारे, या उनका मैच हो या किसी और टीम का, वे हमेशा स्टैंड्स को साफ करके ही जाते हैं। उदाहरण के तौर पर 2026 वर्ल्ड कप में नीदरलैंड्स के साथ 2-2 ड्रॉ के बाद जापानी फैंस ने डलास स्टेडियम के अपने पूरे हिस्से को साफ कर दिया, और यह घटना सोशल मीडिया पर काफी वायरल हुई।
यह आदत सिर्फ जापानी फैंस तक सीमित नहीं है, बल्कि खिलाड़ी भी इसी सोच को अपनाते हैं। जापान की राष्ट्रीय फुटबॉल टीम, जिसे “समुराई ब्लू” कहा जाता है, मैच या टूर्नामेंट खत्म होने के बाद अपने ड्रेसिंग रूम को पूरी तरह साफ करके छोड़ती है। वे अपने कपड़े अच्छे से तह करके रखते हैं और कई बार आयोजकों के लिए हाथ से लिखा धन्यवाद संदेश और ओरिगामी (कागज से बनी क्रेन) भी छोड़ जाते हैं। इसका मतलब यह है कि जापान में अनुशासन और साफ-सफाई की संस्कृति सिर्फ दिखावे की चीज नहीं, बल्कि हर व्यक्ति की आदत का हिस्सा है, चाहे वह खिलाड़ी हो या आम नागरिक।
जब उसने कई सालों तक जापान का दौरा किया, तो उसे यह बात बहुत खास लगी कि वहां लोगों की यह नागरिक जिम्मेदारी वाली आदत सिर्फ किसी बड़े अवसर या साल में एक बार होने वाली सफाई (ओसोजी) तक सीमित नहीं है। यह आदत उनकी रोजमर्रा की जिंदगी में शामिल है। यह सोच जापान के शिंटो धर्म और बौद्ध धर्म से जुड़ी हुई है, जहां “पवित्रता” और “साफ-सफाई” को बहुत महत्व दिया जाता है। इन आदतों के जरिए लोगों को यह सिखाया जाता है कि हर व्यक्ति की जिम्मेदारी है, दूसरों का ध्यान रखना जरूरी है और अपने काम को पूरी जागरूकता (mindfulness) के साथ करना चाहिए।
अलग-अलग आदतों का मतलब:
Sōji (स्कूल की सफाई की जिम्मेदारी) : जापान में स्कूलों में बच्चे खुद अपनी कक्षा, गलियारे और टॉयलेट साफ करते हैं। सफाई के लिए अलग से कर्मचारी नहीं होते। इससे बच्चों में विनम्रता, टीमवर्क और अपनी जगह की जिम्मेदारी सीखने को मिलती है।
Gomi Hiroi (कचरा अपने साथ ले जाना) : जापान में लोग अक्सर सार्वजनिक जगहों पर कचरा नहीं छोड़ते, बल्कि उसे अपने साथ घर ले जाते हैं। इसलिए स्टेडियम में भी लोग मैच के बाद अपना कचरा खुद उठाते हैं और साफ करके जाते हैं।
Mottainai (चीजों की बर्बादी न करना) : यह सोच कहती है कि किसी भी चीज़ को बेकार नहीं करना चाहिए। हर संसाधन का पूरा उपयोग करना चाहिए और कचरे को सही तरीके से अलग-अलग करके रीसायकल करना चाहिए।
Meiwaku wo Kakenai (दूसरों को परेशानी न देना) : इसका मतलब है कि ऐसा कोई काम नहीं करना जिससे दूसरों को असुविधा हो। इसलिए जापान में लोग शांति से रहते हैं, पब्लिक ट्रांसपोर्ट में शोर नहीं करते और जगहें साफ-सुथरी रहती हैं।
अंत में 5S सिस्टम का मतलब : इन सभी आदतों को मिलाकर एक तरीका बनता है जिसे 5S कहा जाता है। इसमें काम और जीवन को इस तरह व्यवस्थित किया जाता है कि जगह साफ, सुरक्षित और अच्छी बनी रहे।
इन सभी आदतों का प्रभाव जापान की प्रसिद्ध 5S कार्यप्रणाली में भी दिखाई देता है, जिसमें चीजों को व्यवस्थित रखना, सफाई बनाए रखना और अच्छी आदतों को लगातार जारी रखना शामिल है।
खेल के मैदान से परे, जापानी प्रशंसकों और खिलाड़ियों का व्यवहार दुनिया को यह संदेश देता है कि खेल सिर्फ जीत और हार का नाम नहीं है। यह सम्मान, अनुशासन, कृतज्ञता और अच्छे नागरिक होने का भी प्रतीक है।
जापानी प्रशंसकों की इस पहल से अन्य देशों के समर्थक भी प्रेरित हुए हैं। मोरक्को, सऊदी अरब और फ्रांस जैसे देशों के प्रशंसक भी अब मैचों के बाद अपने स्टैंड्स की सफाई करते दिखाई देते हैं। उम्मीद की जा रही है कि भविष्य में भारत में भी ऐसी संस्कृति को बढ़ावा मिलेगा और शायद एक दिन आईपीएल मैचों के बाद भी दर्शक स्टेडियम साफ करते नजर आएं।
जापान की यह परंपरा दुनिया को बताती है कि बदलाव के लिए बड़े अभियानों की नहीं, बल्कि छोटी-छोटी जिम्मेदार आदतों की जरूरत होती है।
(यह लेखक के निजी विचार हैं।)
लंबे समय तक सॉफ़्टवेयर इंजीनियरिंग की पढ़ाई के बाद हर साल करीब एक लाख युवाओं को इन कंपनियों में नौकरी मिल जाती थी। लेकिन पिछले दो वर्षों से भर्ती लगभग रुकी हुई है।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
मिलिंद खांडेकर, वरिष्ठ पत्रकार।
केंद्र सरकार के चीफ इकोनॉमिक एडवाइज़र वी. अनंत नागेश्वरन की ट्रोलिंग हो रही है। उन्होंने ANI को दिए एक इंटरव्यू में कहा कि सॉफ़्टवेयर और MBA डिग्री के आधार पर आसानी से नौकरी मिलने के दिन अब ढल रहे हैं। आने वाले समय में वेल्डिंग, प्लंबिंग और इलेक्ट्रिकल कार्यों से जुड़े कुशल लोगों की मांग बढ़ने वाली है। उनकी आलोचना इस आधार पर की जा रही है कि सरकार अब बेरोज़गार युवाओं को वेल्डिंग और प्लंबिंग करने की सलाह दे रही है। लेकिन यह आलोचना सही नहीं है। अगर हम आंकड़ों और बदलती अर्थव्यवस्था को देखें तो समझ सकते हैं कि नौकरियों का स्वरूप किस तरह बदल रहा है।
भारत की पांच बड़ी आईटी कंपनियों में 15 लाख से अधिक कर्मचारी कार्यरत हैं। लंबे समय तक सॉफ़्टवेयर इंजीनियरिंग की पढ़ाई के बाद हर साल करीब एक लाख युवाओं को इन कंपनियों में नौकरी मिल जाती थी। लेकिन पिछले दो वर्षों से भर्ती लगभग रुकी हुई है। इसकी सबसे बड़ी वजह आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस (AI) है। सॉफ़्टवेयर कोडिंग जैसे कई कार्य अब AI पहले से बेहतर और तेज़ी से कर रहा है, जिससे बड़ी संख्या में कर्मचारियों की आवश्यकता कम होती जा रही है।
टीसीएस और इंफोसिस जैसी कंपनियां वर्षों से दूसरी कंपनियों के सॉफ़्टवेयर और कंप्यूटर सिस्टम की देखरेख करके कमाई करती रही हैं। लेकिन AI के बढ़ते उपयोग के कारण ऐसे ऑर्डर्स में कमी आने लगी है। दुनिया की प्रमुख आईटी सेवा कंपनी Accenture ने भी आने वाले महीनों के लिए अपने बिक्री अनुमान को घटा दिया है। इसके बाद न्यूयॉर्क स्टॉक एक्सचेंज (NYSE) में उसके शेयरों में 18 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। इसका असर भारतीय आईटी कंपनियों पर भी पड़ा और निफ्टी आईटी इंडेक्स तीन वर्षों के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया।
चीफ इकोनॉमिक एडवाइज़र की बातों को शेयर बाज़ार भी अप्रत्यक्ष रूप से सही ठहराता दिखाई देता है कि आईटी कंपनियों के सामने चुनौतियां बढ़ रही हैं। हालांकि इसका अर्थ यह नहीं है कि आईटी कंपनियां बंद हो जाएंगी, बल्कि उनके काम का स्वरूप बदल सकता है और कर्मचारियों की आवश्यकता कम हो सकती है।
टीसीएस के चेयरमैन एन. चंद्रशेखरन ने हाल ही में कहा है कि अगले तीन वर्षों में कंपनी में कर्मचारियों के बराबर AI एजेंट काम कर सकते हैं। उनके अनुसार, टीसीएस में लगभग 5 लाख AI एजेंट कार्य करेंगे, जबकि वर्तमान में कंपनी में करीब 5.4 लाख कर्मचारी हैं।
AI को लेकर यह धारणा बन रही है कि कंप्यूटर के सामने बैठकर किए जाने वाले अधिकांश कार्य AI कर सकता है, लेकिन हाथों से किए जाने वाले तकनीकी और व्यावहारिक कार्य फिलहाल उसकी पहुंच से बाहर हैं। भारतीय समाज में लंबे समय से हाथ से किए जाने वाले कामों को अपेक्षाकृत कम महत्व दिया जाता रहा है, जबकि आज इलेक्ट्रिशियन, एसी टेक्नीशियन और अन्य तकनीकी पेशों से जुड़े लोग कई व्हाइट-कॉलर एंट्री-लेवल नौकरियों से अधिक आय अर्जित कर रहे हैं।
Randstad India की एक रिपोर्ट के अनुसार, डेटा एंट्री ऑपरेटर या जूनियर अकाउंटेंट जैसी एंट्री-लेवल व्हाइट-कॉलर नौकरियों में औसतन ढाई लाख रुपये सालाना वेतन मिलता है, जबकि एसी टेक्नीशियन तीन लाख रुपये से अधिक सालाना कमाते हैं। दूसरी ओर, टीसीएस और इंफोसिस जैसी कंपनियों में एंट्री-लेवल कर्मचारियों का वेतन पिछले लगभग 20 वर्षों से तीन से साढ़े तीन लाख रुपये वार्षिक के आसपास ही बना हुआ है। महंगाई को ध्यान में रखें तो वास्तविक रूप से यह आय पहले की तुलना में काफी कम हो चुकी है।
स्पष्ट है कि AI के कारण व्हाइट-कॉलर नौकरियों के सामने नई चुनौतियां खड़ी हो रही हैं। लेकिन इस चुनौती का समाधान ट्रोलिंग नहीं, बल्कि नई तकनीकों को अपनाने और AI जैसी उभरती तकनीकों को सीखने में है।
( यह लेखक के निजी विचार हैं )
गृह मंत्री और अमेरिकी राजदूत के बीच हुई बैठक का महत्व इसलिए भी है क्योंकि भारत पंजाब, राजस्थान, गुजरात और समुद्री मार्गों के माध्यम से होने वाली ड्रग्स तस्करी की चुनौती का सामना कर रहा है।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
आलोक मेहता, पद्मश्री, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक।
सीमा पर आतंकी गतिविधियों पर नियंत्रण और माओवादी नक्सल प्रभावित क्षेत्रों को मुक्त करने के बाद भारत सरकार अब मादक पदार्थों (नारकोटिक्स) की तस्करी तथा उसके ज़हर को समाज में फैलने से रोकने के लिए व्यापक अभियान चला रही है। पिछले दिनों एक अनौपचारिक बातचीत में मैंने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से इसी संबंध में सवाल किया तो उन्होंने दृढ़ता के साथ कहा कि, “हम पिछले वर्षों से इस समस्या से निपटने के लिए कदम उठा रहे हैं और अब नारकोटिक्स पर नियंत्रण के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रयास करेंगे। यह आतंकवाद की तरह पूरी दुनिया के लिए और खासकर भावी नई पीढ़ी को सुरक्षित करने के लिए प्राथमिकता का मुद्दा है।”
इसी लक्ष्य से गृह मंत्री अमित शाह ने इस सप्ताह भारत में अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर से मुलाकात की। इस बैठक में आतंकवाद-रोधी सहयोग, सीमा सुरक्षा तथा मादक पदार्थों (नारकोटिक्स) की तस्करी के विरुद्ध संयुक्त प्रयासों पर विशेष चर्चा हुई। दोनों देशों ने इस बात पर ज़ोर दिया कि नशीले पदार्थों का अवैध व्यापार अब केवल कानून-व्यवस्था का विषय नहीं रह गया है, बल्कि यह राष्ट्रीय सुरक्षा, सामाजिक स्थिरता और युवाओं के भविष्य से जुड़ा गंभीर प्रश्न बन चुका है।
अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर और गृह मंत्री अमित शाह की इस सप्ताह की बैठक केवल एक सामान्य कूटनीतिक मुलाकात नहीं थी। यह उस बढ़ती वैश्विक चिंता का प्रतीक है, जिसमें ड्रग्स तस्करी, संगठित अपराध और आतंकवाद एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हाल के वर्षों में विभिन्न देशों के राष्ट्राध्यक्षों और प्रधानमंत्रियों के साथ हुई बैठकों में आतंकवाद के साथ नारकोटिक्स के मुद्दे की गंभीरता पर चर्चा करते रहे हैं। अमेरिका के साथ आर्थिक और व्यापार के नए समझौते पर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प से भी निर्णायक बातचीत हो चुकी है।
गृह मंत्री अमित शाह और अमेरिकी राजदूत के बीच हुई बैठक का महत्व इसलिए भी है क्योंकि भारत पंजाब, राजस्थान, गुजरात और समुद्री मार्गों के माध्यम से होने वाली ड्रग्स तस्करी की चुनौती का सामना कर रहा है। गृह मंत्री अमित शाह पहले भी कई मंचों पर चेतावनी दे चुके हैं कि “मादक पदार्थों का व्यापार और नार्को-टेररिज्म भारत के लिए दीर्घकालिक सुरक्षा खतरा बन सकता है।”
इस वर्ष जनवरी 2026 में भारत और अमेरिका ने संयुक्त ड्रग नीति कार्य समूह की बैठक भी आयोजित की थी, जिसमें दोनों देशों ने मादक पदार्थों और उनके उत्पादन में प्रयुक्त रसायनों की तस्करी रोकने के लिए सहयोग बढ़ाने का संकल्प लिया था।
भारत आज एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। एक ओर वह दुनिया की सबसे युवा आबादी वाला देश है, दूसरी ओर यही युवा वर्ग ड्रग्स माफिया का सबसे बड़ा लक्ष्य भी है। पंजाब सीमा से होने वाली तस्करी, ड्रोन के जरिए भेजे जा रहे नशीले पदार्थ, अंतरराष्ट्रीय अपराध सिंडिकेट और नार्को-टेरर नेटवर्क भारत के सामने गंभीर चुनौती प्रस्तुत करते हैं।
अमित शाह ने पिछले महीने भी एक बैठक में कहा था कि ड्रग्स का खतरा सीमाहीन है और इसके खिलाफ वैश्विक गठबंधन आवश्यक है। उन्होंने देशों के बीच वास्तविक समय की खुफिया साझेदारी और समन्वित कानूनी ढांचे की आवश्यकता पर ज़ोर दिया। भारत का मानना है कि अकेला कोई देश ड्रग्स माफिया को समाप्त नहीं कर सकता। इसलिए आवश्यक है संयुक्त राष्ट्र स्तर पर सहयोग, साझा खुफिया नेटवर्क, वित्तीय निगरानी, समुद्री सुरक्षा और सीमा प्रबंधन।
पिछले वर्षों (2020–2024) के दौरान भारत की विभिन्न एजेंसियों—विशेषकर नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (NCB), डीआरआई, बीएसएफ, कोस्ट गार्ड तथा राज्यों की पुलिस—ने सीमा क्षेत्रों, बंदरगाहों और समुद्री मार्गों के खिलाफ बड़े पैमाने पर कार्रवाई की है। यदि 2020–2024 में भारत की चुनौती मुख्यतः पंजाब सीमा और बंदरगाहों तक सीमित दिखाई देती थी, तो 2025 ने दिखाया कि समुद्री मार्ग राष्ट्रीय सुरक्षा का प्रमुख मोर्चा बन चुका है।
2025 में गुजरात तट के पास 1,800 करोड़ रुपये मूल्य की मेथामफेटामाइन पकड़ी गई। 33 करोड़ रुपये का हशीश ऑयल जहाज़ से बरामद हुआ। भारतीय नौसेना ने पश्चिमी हिंद महासागर में 2.5 टन से अधिक मादक पदार्थ जब्त किए। इससे यह संकेत स्पष्ट रूप से मिलता है कि ड्रग्स तस्कर भूमि सीमाओं के साथ-साथ समुद्री मार्गों का भी बड़े पैमाने पर उपयोग कर रहे हैं और सुरक्षा एजेंसियों को अब “नार्को-टेरर” के खिलाफ समुद्र में भी उतनी ही बड़ी लड़ाई लड़नी पड़ रही है।
ड्रग्स की समस्या केवल सीमावर्ती राज्यों या अपराध जगत तक सीमित नहीं रह गई है। पिछले कुछ वर्षों में स्कूलों, कॉलेजों, विश्वविद्यालयों, हॉस्टलों, पब, बार, रिसॉर्ट, होटल और नाइटलाइफ़ से जुड़े इलाकों में भी नशीले पदार्थों की पहुँच बढ़ने को लेकर चिंता व्यक्त की जा रही है।
विभिन्न अध्ययनों और सरकारी अभियानों से संकेत मिलता है कि ड्रग्स का प्रयोग कम उम्र में शुरू हो रहा है और युवाओं को प्रभावित कर रहा है। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) द्वारा 10 शहरों में किए गए एक अध्ययन में पाया गया कि कुछ बच्चों में नशीले पदार्थों के प्रयोग की शुरुआत औसतन 12.9–13 वर्ष की आयु के आसपास हो रही है, जबकि कुछ मामलों में शुरुआत 11 वर्ष की आयु तक देखी गई। अध्ययन में लगभग 15 प्रतिशत विद्यार्थियों द्वारा किसी न किसी मनःप्रभावी पदार्थ को आज़माने की बात सामने आई।
प्रकाशित एक अन्य सर्वेक्षण में कक्षा 8 से 12 तक के छात्रों में 10 प्रतिशत से अधिक द्वारा पिछले वर्ष किसी न किसी प्रकार के पदार्थ सेवन की जानकारी सामने आई थी। विशेषज्ञों के अनुसार इसके प्रमुख कारण हैं—साथियों का दबाव, सोशल मीडिया और डिजिटल प्रभाव, परिवार में तनाव, मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याएँ, जिज्ञासा और प्रयोग करने की प्रवृत्ति तथा आसान उपलब्धता।
कॉलेजों में स्थिति और अधिक जटिल हो जाती है क्योंकि छात्रों को अधिक स्वतंत्रता, हॉस्टल जीवन और नाइटलाइफ़ का संपर्क मिलता है। पुलिस और जनप्रतिनिधियों ने कॉलेज परिसरों के आसपास नशे की उपलब्धता को लेकर चिंता व्यक्त की है। नागपुर में स्थानीय प्रशासन ने कॉलेजों से निगरानी बढ़ाने की अपील की और छात्र समुदाय में बढ़ती नशे की प्रवृत्ति पर चिंता जताई। कर्नाटक के बेलगावी में पुलिस ने कॉलेज परिसरों के आसपास विशेष अभियान चलाया और बड़ी संख्या में युवाओं के नशीले पदार्थों के संपर्क में होने की बात सामने आई।
सामुदायिक चर्चाओं और छात्र अनुभवों में भी यह चिंता दिखाई देती है कि कुछ हॉस्टलों और विश्वविद्यालय क्षेत्रों में गांजा, सिंथेटिक ड्रग्स और अन्य पदार्थों की उपलब्धता पहले की तुलना में अधिक दिखाई दे रही है। बड़े महानगरों—जैसे दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु, गोवा, पुणे और हैदराबाद—में पुलिस समय-समय पर होटल, पब, फार्महाउस पार्टियों और निजी आयोजनों पर छापे मारती रही है।
विशेषज्ञों के अनुसार अब केवल हेरोइन या अफीम ही समस्या नहीं हैं। शहरी क्षेत्रों में एमडीएमए, एलएसडी, मेफेड्रोन, मेथम्फेटामिन और पार्टी ड्रग्स का खतरा बढ़ा है। इनका उपयोग अक्सर पार्टी संस्कृति, नाइट क्लब, निजी पार्टियों और कुछ मामलों में कॉलेज नेटवर्क से जुड़ा पाया जाता है।
2025–26 के दौरान पंजाब के नशामुक्ति कार्यक्रमों में 90,000 से अधिक लोगों का उपचार किया गया। यह बताता है कि समस्या कितनी व्यापक हो चुकी है। कश्मीर के स्थानीय अध्ययनों में युवाओं के बीच नशे की बढ़ती प्रवृत्ति को गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती बताया गया है। गोवा लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय पर्यटकों और नाइटलाइफ़ के कारण ड्रग्स नियंत्रण एजेंसियों की विशेष निगरानी में रहा है। स्थानीय समुदायों ने भी स्कूलों और युवाओं तक ड्रग्स पहुँचने पर चिंता व्यक्त की है।
युवाओं में ड्रग्स की लत केवल स्वास्थ्य समस्या नहीं है। इसके कारण पढ़ाई में गिरावट, स्कूल छोड़ना, मानसिक अवसाद, चिंता विकार, हिंसक व्यवहार, सड़क दुर्घटनाएँ, अपराध में शामिल होना और पारिवारिक संबंधों के टूटने जैसी स्थितियाँ बन रही हैं। एम्स और अन्य स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि यदि शुरुआती हस्तक्षेप न किया जाए तो ड्रग्स का प्रयोग धीरे-धीरे निर्भरता और फिर लत में बदल जाता है।
बहरहाल, भारत अभी अमेरिका या कनाडा जैसी ओपिऑयड महामारी की स्थिति में नहीं है, लेकिन कई विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि शुरुआत की आयु कम हो रही है, सिंथेटिक ड्रग्स बढ़ रही हैं, कॉलेज और शहरी युवा अधिक प्रभावित हो रहे हैं तथा मानसिक स्वास्थ्य समस्याएँ और नशा एक-दूसरे से जुड़ रहे हैं।
इसलिए स्कूल स्तर से जागरूकता, कॉलेजों में काउंसलिंग, परिवारों की भागीदारी, नशामुक्ति केंद्रों का विस्तार और तस्करी नेटवर्क पर कठोर कार्रवाई अत्यंत आवश्यक मानी जा रही है।
भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल ड्रग्स की तस्करी नहीं, बल्कि नई पीढ़ी को नशे की गिरफ्त में जाने से बचाना है। यदि स्कूल, कॉलेज, परिवार, समाज और कानून-प्रवर्तन एजेंसियाँ मिलकर समय रहते कार्रवाई करें, तो भारत उस बड़े सामाजिक संकट से बच सकता है जिसका सामना कई पश्चिमी देशों ने पिछले दशकों में किया है।
( यह लेखक के निजी विचार हैं )
डिजिटल और सोशल मीडिया के दौर में, जहां क्लिकबेट और वायरल कंटेंट का बोलबाला है, वरिष्ठ पत्रकार प्रभु चावला ने दिखाया है कि मजबूत, विश्वसनीय और गहन कंटेंट की अहमियत आज भी कायम है।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
डिजिटल और सोशल मीडिया के दौर में जहां क्लिकबेट हेडलाइंस, वायरल वीडियो और कुछ सेकंड के कंटेंट की भरमार है, वहीं वरिष्ठ पत्रकार प्रभु चावला ने एक बार फिर यह साबित करने की कोशिश की है कि मजबूत, विश्वसनीय और गहराई वाले कंटेंट की अहमियत आज भी बरकरार है।
प्रभु चावला ने हाल ही में अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर अपनी चर्चित स्टोरी "Awesome Foursome Rattles BJP" को दोबारा साझा करते हुए लिखा, "One million views and still counting. Credible Content is still the King." उन्होंने यह भी बताया कि यह लेख डिजिटल और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर मिलाकर 15 लाख से अधिक व्यूज हासिल कर चुका है।
यह लेख दक्षिण भारत के चार प्रमुख नेताओं- वी. डी. सतीशन, ए. रेवंत रेड्डी, डी. के. शिवकुमार और जोसेफ विजय की राजनीतिक एकजुटता और उसके राष्ट्रीय राजनीति पर संभावित प्रभाव पर आधारित था। लेकिन इस स्टोरी की चर्चा केवल इसके राजनीतिक विश्लेषण के कारण नहीं हुई, बल्कि इसलिए भी हुई क्योंकि इसने दिखाया कि दर्शक आज भी गंभीर और विश्लेषणात्मक कंटेंट पढ़ना चाहते हैं।
क्या कहती है प्रभु चावला की पोस्ट?
प्रभु चावला ने लिखा कि उन्हें यह लेख दोबारा साझा करने के लिए खेद है, लेकिन इसकी पहुंच और लोकप्रियता यह साबित करती है कि अच्छी पत्रकारिता की मांग खत्म नहीं हुई है। उनका संदेश साफ था- विश्वसनीय और रिसर्च आधारित कंटेंट आज भी दर्शकों को आकर्षित कर सकता है।
वायरल दौर में भी गहराई वाले कंटेंट की मांग
पिछले कुछ वर्षों में मीडिया इंडस्ट्री में यह धारणा मजबूत हुई है कि दर्शक केवल छोटे वीडियो, रील्स और त्वरित अपडेट्स देखना चाहते हैं। लेकिन समय-समय पर कुछ ऐसे लेख, इंटरव्यू और विश्लेषण सामने आते हैं जो इस धारणा को चुनौती देते हैं।
प्रभु चावला की यह स्टोरी भी उसी श्रेणी में दिखाई देती है। यह कोई सनसनीखेज खुलासा नहीं था, न ही किसी विवादित बयान पर आधारित खबर थी। इसके बजाय यह भारतीय राजनीति में दक्षिण भारत की बढ़ती भूमिका और संघीय ढांचे पर उसके प्रभाव का विश्लेषण था।
मीडिया इंडस्ट्री के लिए बड़ा संकेत
इस लेख की सफलता मीडिया संगठनों के लिए भी एक महत्वपूर्ण संदेश है। डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर ट्रैफिक और एंगेजमेंट की दौड़ के बीच अक्सर गहन विश्लेषणात्मक लेखों को कम प्राथमिकता दी जाती है। लेकिन जब ऐसा कंटेंट लाखों लोगों तक पहुंचता है, तो यह बताता है कि ऑडियंस का एक बड़ा वर्ग अभी भी गंभीर पत्रकारिता में रुचि रखता है।
विशेषज्ञों की मानें तो डिजिटल मीडिया का भविष्य केवल वायरल कंटेंट पर नहीं, बल्कि विश्वसनीयता और भरोसे पर भी निर्भर करेगा। दर्शक तेजी से ऐसी सामग्री की तलाश कर रहे हैं जो उन्हें सिर्फ सूचना ही नहीं, बल्कि संदर्भ और समझ भी दे।
"Content is King" की बहस फिर चर्चा में
मीडिया जगत में लंबे समय से कहा जाता रहा है कि "Content is King"। हालांकि सोशल मीडिया और एल्गोरिदम के दौर में कई बार यह धारणा कमजोर पड़ती नजर आई। लेकिन प्रभु चावला की पोस्ट ने इस बहस को एक बार फिर जीवित कर दिया है।
उनका दावा है कि अगर कंटेंट मजबूत, विश्वसनीय और प्रासंगिक हो, तो वह आज भी लाखों लोगों तक पहुंच सकता है। यही कारण है कि उन्होंने अपनी पोस्ट में "Credible Content is still the King" लिखकर कंटेंट की गुणवत्ता को सबसे ऊपर रखा।
प्रभु चावली की इस स्टोरी का हिंदी सार आप यहां पढ़ सकते हैं-
केरल के वी. डी. सतीशन, तेलंगाना के ए. रेवंत रेड्डी, कर्नाटक के डी. के. शिवकुमार और तमिलनाडु के जोसेफ विजय एक सामान्य बैठक के लिए साथ पहुंचे थे, लेकिन लौटते समय उन्होंने भारतीय संघीय व्यवस्था की राजनीति को एक नई दिशा दे दी।
पिछले सप्ताह राष्ट्रपति भवन परिसर में नीति आयोग की बैठक आयोजित हुई। आमतौर पर ऐसी बैठकों में केंद्र और राज्यों के बीच औपचारिक बातचीत होती है और राष्ट्रीय एजेंडे पर चर्चा आगे बढ़ती है। लेकिन इस बार कुछ अलग हुआ। दक्षिण भारत के ये चार मुख्यमंत्री किसी अलग-अलग राज्य के प्रतिनिधि के रूप में नहीं, बल्कि एक समन्वित और एकजुट समूह के रूप में दिल्ली पहुंचे।
इन चार राज्यों की ताकत को नजरअंदाज करना आसान नहीं है। लोकसभा में इनके पास कुल 104 सीटें हैं, जो निचले सदन की लगभग पांचवें हिस्से की ताकत के बराबर है। इतना ही नहीं, ये राज्य मिलकर देश की जीडीपी का करीब 26 प्रतिशत हिस्सा पैदा करते हैं और प्रत्यक्ष कर (डायरेक्ट टैक्स) राजस्व में लगभग 30 प्रतिशत योगदान देते हैं।
दिलचस्प बात यह है कि इन चारों राज्यों में केंद्र की सत्तारूढ़ व्यवस्था की सरकार नहीं है। दिल्ली पहुंचकर इन नेताओं ने केवल अपनी शिकायतों की सूची नहीं सौंपी, बल्कि देश की संघीय व्यवस्था से जुड़े गहरे और संरचनात्मक सवाल उठाए। यह केवल विरोध नहीं था, बल्कि राजनीतिक प्रभाव और दबाव बनाने की एक सोची-समझी रणनीति थी।
कई दशकों से भारतीय विपक्षी राजनीति अक्सर शोर-शराबे को ताकत समझने की गलती करती रही है। क्षेत्रीय दलों ने कई बार विरोध प्रदर्शन को ही अंतिम लक्ष्य मान लिया, जबकि उसका उद्देश्य प्रभाव पैदा करना होना चाहिए था। लेकिन दक्षिण भारत के इस चौकड़ी समूह ने इस परंपरा को तोड़ दिया। चार अलग-अलग नेताओं के बजाय एक साझा मंच के रूप में सामने आकर उन्होंने राष्ट्रीय राजनीति में दक्षिणी एकजुटता को एक स्पष्ट पहचान दी।
इन नेताओं ने जो मुद्दा उठाया, वह वास्तविक भी है और संविधान व्यवस्था की एक जटिल चुनौती भी। दक्षिणी राज्यों ने लंबे समय तक जनसंख्या नियंत्रण, शिक्षा, स्वास्थ्य और मानव संसाधन विकास के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रदर्शन किया है। उन्होंने ऐसी अर्थव्यवस्थाएं विकसित की हैं जो निर्यात को बढ़ावा देती हैं और राष्ट्रीय राजस्व में महत्वपूर्ण योगदान देती हैं।
लेकिन आगामी जनगणना के बाद प्रस्तावित परिसीमन (Delimitation) प्रक्रिया में इन्हीं राज्यों को लोकसभा में अपेक्षाकृत कम प्रतिनिधित्व मिलने का डर है। वर्तमान व्यवस्था मुख्य रूप से जनसंख्या के आधार पर सीटों का निर्धारण करती है। दक्षिणी राज्यों का तर्क है कि जिन्होंने जनसंख्या नियंत्रण में सफलता हासिल की, उन्हें अब राजनीतिक प्रतिनिधित्व के मामले में नुकसान उठाना पड़ सकता है। उनके अनुसार, यह स्थिति अच्छी शासन व्यवस्था को दंडित करने और अधिक जनसंख्या वृद्धि को पुरस्कृत करने जैसी है।
तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी ने इस मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर पर सबसे प्रभावशाली ढंग से उठाया है। उन्होंने एक मिश्रित फॉर्मूला सुझाया है, जिसमें आधी सीटें जनसंख्या के आधार पर और आधी राज्यों के आर्थिक योगदान के आधार पर तय की जाएं। यह कोई नया सिद्धांत नहीं है, बल्कि आर्थिक योगदान को राजनीतिक प्रतिनिधित्व से जोड़ने का प्रयास है। इसी वजह से रेवंत रेड्डी परिसीमन बहस का प्रमुख चेहरा बनकर उभरे हैं।
इस समूह के हर नेता की अपनी अलग ताकत है।
62 वर्षीय वी. डी. सतीशन इस समूह के वैचारिक और नैतिक स्तंभ माने जा सकते हैं। पेशे से वकील और छह बार विधायक रह चुके सतीशन ने केरल में कांग्रेस को धैर्य और सिद्धांतों के आधार पर मजबूत किया है। उनकी पहचान साफ-सुथरी राजनीति और संतुलित नेतृत्व की रही है।
64 वर्षीय डी. के. शिवकुमार इस समूह की संगठनात्मक शक्ति हैं। आठ बार विधायक रह चुके शिवकुमार ने कर्नाटक में कांग्रेस को मुश्किल दौर से निकालकर सत्ता तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाई। बूथ स्तर के संगठन, गठबंधन राजनीति और चुनावी गणित पर उनकी पकड़ बेहद मजबूत मानी जाती है। कर्नाटक दक्षिण भारत का राजनीतिक और भौगोलिक प्रवेश द्वार है और शिवकुमार इस दरवाजे के सबसे प्रभावशाली संरक्षकों में से एक हैं।
51 वर्षीय जोसेफ विजय इस समूह के सबसे अलग और प्रभावशाली चेहरे हैं। उन्होंने किसी राजनीतिक परिवार की विरासत के बिना राजनीति में प्रवेश किया। लंबे राजनीतिक प्रशिक्षण या स्थापित वैचारिक ढांचे के बिना उन्होंने अपनी लोकप्रियता को राजनीतिक समर्थन में बदला। आज वे दक्षिण भारत की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था और 39 लोकसभा सीटों वाले तमिलनाडु का नेतृत्व कर रहे हैं। नीति आयोग की बैठक में उनकी मौजूदगी यह भी संकेत देती है कि तमिलनाडु का राष्ट्रीय संस्थाओं के प्रति पारंपरिक संकोच अब बदल रहा है।
इन चारों नेताओं की ताकतें अलग-अलग हैं, लेकिन यही उनकी सबसे बड़ी शक्ति भी है। सतीशन नैतिक विश्वसनीयता देते हैं, रेवंत रेड्डी मुद्दों को राष्ट्रीय विमर्श में लाने की क्षमता रखते हैं, शिवकुमार संगठनात्मक मजबूती प्रदान करते हैं और विजय जनसमर्थन जुटाने की क्षमता रखते हैं।
जब ये चारों एक साथ आते हैं, तो वे भारतीय विपक्षी राजनीति को वह चीज देते हैं जिसकी कमी लंबे समय से महसूस की जा रही थी—दक्षिण भारत की ओर से प्रतिनिधित्व और संसाधनों पर एक स्पष्ट और प्रभावशाली साझा राजनीतिक रुख।
भारतीय जनता पार्टी की दक्षिण भारत में मौजूदगी अभी भी सीमित मानी जाती है। तेलंगाना, तमिलनाडु और केरल में पार्टी की चुनावी संभावनाएं कई संरचनात्मक चुनौतियों से घिरी हैं। कर्नाटक ही ऐसा राज्य है जहां वास्तविक और सीधी राजनीतिक प्रतिस्पर्धा देखने को मिलती है। यही स्थिति इस चौकड़ी को रणनीतिक बढ़त देती है।
हालांकि इन नेताओं की सबसे बड़ी चुनौती बीजेपी नहीं, बल्कि समय और राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं हैं। भारत में क्षेत्रीय गठबंधनों का इतिहास बताता है कि व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाएं, राज्यों के अलग-अलग हित और तात्कालिक राजनीतिक गणनाएं अक्सर ऐसे गठबंधनों को कमजोर कर देती हैं।
फिर भी इस बार परिस्थितियां कुछ अलग दिखाई देती हैं। इन राज्यों की आर्थिक ताकत, लोकसभा में उनका प्रतिनिधित्व और परिसीमन जैसा साझा मुद्दा उन्हें लंबे समय तक एकजुट रखने का आधार बन सकता है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि चारों नेता अभी अपने राजनीतिक करियर के सक्रिय दौर में हैं और आने वाले एक दशक तक इस परियोजना को आगे बढ़ाने की क्षमता रखते हैं।
यदि यह एकजुटता बनी रहती है, तो इसके प्रभाव अगले चुनाव तक सीमित नहीं रहेंगे। दक्षिण भारत का ऐसा राजनीतिक समूह, जिसके पास आर्थिक और संसदीय दोनों ताकत हो, भारतीय संघवाद की शर्तों को नए सिरे से परिभाषित करने की क्षमता रखता है।
तब राष्ट्रीय राजनीति केवल “वन नेशन, वन इलेक्शन” या “वन पार्टी डॉमिनेंस” की बहस तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि केंद्र में सरकार बनाने के लिए विभिन्न क्षेत्रीय और राष्ट्रीय शक्तियों के बीच नए समीकरण बनेंगे। राष्ट्रीय दल बनाम क्षेत्रीय दल की पुरानी बहस की जगह एक अधिक बहुध्रुवीय राजनीतिक व्यवस्था उभर सकती है।
फिलहाल दक्षिण भारत की इस चौकड़ी ने सबसे कठिन पहला कदम उठा लिया है। उन्होंने केंद्र सरकार को यह समझाने में सफलता हासिल की है कि उनका मुद्दा कोई अस्थायी राजनीतिक शिकायत नहीं, बल्कि संघीय ढांचे से जुड़ा एक बुनियादी सवाल है।
यह एकजुटता भारतीय राजनीति में स्थायी बदलाव का आधार बनेगी या केवल कुछ समय की राजनीतिक एकता साबित होगी, इसका फैसला आने वाले वर्षों में होगा। लेकिन इतना तय है कि दक्षिण भारत ने ऐसे नेताओं का एक समूह सामने रखा है जो इस संघर्ष के महत्व को समझते हैं।
भारतीय राजनीति का गुरुत्वाकर्षण केंद्र अब धीरे-धीरे बदलता दिखाई दे रहा है। यह बदलाव जनसंख्या के कारण नहीं, बल्कि सुनियोजित राजनीतिक संगठन और साझा रणनीति की वजह से हो रहा है।
और यदि यह प्रक्रिया जारी रहती है, तो वह पुरानी धारणा कि केवल संख्या बल ही राष्ट्रीय प्रभुत्व तय करता है, भविष्य में चुनौती के घेरे में आ सकती है। बहस शुरू हो चुकी है। अब देखना यह है कि क्या सत्ता का ढांचा भी उसी दिशा में बदलता है।
सरकार का विश्वास रहा है कि नए आपराधिक कानून आतंकवाद, संगठित अपराध, साइबर अपराध तथा विदेशी समर्थन प्राप्त अवैध गतिविधियों के विरुद्ध अधिक प्रभावी कार्रवाई का आधार प्रदान करेंगे।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
आलोक मेहता, पद्मश्री, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सत्ता में निरंतर बने रहने के 12 वर्ष और 4399 दिन के ऐतिहासिक रिकॉर्ड पर अनेक उपलब्धियों की चर्चा हुई। लेकिन भारतीय न्याय व्यवस्था में क्रांतिकारी बदलाव के लिए बनी न्याय संहिता का उल्लेख नहीं दिखाई दिया। जबकि इसके दो वर्ष के प्रारंभिक चरण में ही ब्रिटिश राज वाले कानूनों में हुए बड़े परिवर्तन का असर दिखने लगा है। नक्सल समस्या के आतंक से मुक्ति का लक्ष्य मार्च 2026 में बहुत हद तक पूरा हो गया।
लेकिन अर्बन नक्सल का नासूर और विदेशी फंडिंग से भारत-विरोधी गतिविधियों तथा प्रचार पर नियंत्रण के लिए अभी कानूनों में और भी संशोधनों एवं परिवर्तनों की चुनौतियां हैं। हाल ही में कुछ ऐसे ही गंभीर आपराधिक मामलों में उच्च न्यायालयों के फैसलों से कानूनी कमियों की बातें सामने आई हैं। यह अवश्य है कि ईडी (प्रवर्तन निदेशालय) या सीबीआई सुप्रीम कोर्ट में अपील कर अधिकाधिक प्रमाण प्रस्तुत करके दोषियों को दंडित करवाने के प्रयास कर रही है।
याद रहे, 1 जुलाई 2024 से ब्रिटिश काल से चले आ रहे तीन प्रमुख कानून—भारतीय दंड संहिता (IPC), दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) और भारतीय साक्ष्य अधिनियम (Indian Evidence Act)—की जगह क्रमशः भारतीय न्याय संहिता (BNS), भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) और भारतीय साक्ष्य अधिनियम (BSA) ने ले ली। ब्रिटिश शासन के 1500 से अधिक पुराने कानूनों को समाप्त कर दिया गया है।
1947 में भारत ने राजनीतिक स्वतंत्रता प्राप्त की थी; 2024 के बाद यह मुद्दा उठने लगा कि क्या भारत अपनी न्यायिक और विधिक संरचना को भी पूरी तरह औपनिवेशिक विरासत से मुक्त कर पाएगा? भारतीय न्याय संहिता इस यात्रा का अंत नहीं, बल्कि प्रारंभ है। इसी संदर्भ में पिछले दिनों एक प्रकरण में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, ऑनलाइन मीडिया में विदेशी पूंजी के दुरुपयोग से भारत-विरोधी गतिविधियों को अप्रत्यक्ष रूप से बढ़ाने के गंभीर आरोपों के बावजूद दिल्ली हाई कोर्ट से राहत मिलना चिंता का विषय बना है।
ईडी अब इस निर्णय को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने वाला है, लेकिन यह प्रमाण है कि न्याय संहिता के लिए अभी जांच एजेंसियों, पुलिस आदि को अधिक कानूनी अधिकार और संसाधन जुटाने की आवश्यकता होगी।
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने न्याय संहिता को संसद में पारित करने पर इन कानूनों को स्वतंत्र भारत के सबसे बड़े आपराधिक न्याय सुधारों में से एक बताते हुए कहा था कि आने वाले वर्षों में भारत की आपराधिक न्याय प्रणाली दुनिया की सबसे आधुनिक प्रणाली बन सकती है। पुलिस, फॉरेंसिक विज्ञान, अभियोजन और न्यायालयों को डिजिटल माध्यम से जोड़कर न्याय को तेज और पारदर्शी बनाया जा रहा है।
दशकों तक ऐसे कानून थे, जिनकी मूल संरचना औपनिवेशिक शासन की आवश्यकताओं के अनुरूप विकसित हुई थी। उनका मुख्य उद्देश्य शासन व्यवस्था बनाए रखना था, जबकि आधुनिक लोकतंत्र में कानून का उद्देश्य नागरिक अधिकारों की रक्षा और त्वरित न्याय उपलब्ध कराना है। साइबर अपराध, डिजिटल साक्ष्य, संगठित अपराध, आतंकवाद, वित्तीय अपराध और अंतरराष्ट्रीय अपराध नेटवर्क जैसी चुनौतियों से निपटने के लिए पुराने कानून पर्याप्त नहीं थे। इसलिए व्यापक संशोधन किए गए हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने औपनिवेशिक काल के पुराने कानूनों को समाप्त कर स्वदेशी भारतीय न्याय संहिता (BNS), भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) और भारतीय साक्ष्य अधिनियम (BSA) लागू करने को ऐतिहासिक कदम बताया है। उनका कहना है कि इन कानूनों का मूल उद्देश्य केवल ‘दंड देना’ नहीं, बल्कि ‘न्याय सुनिश्चित करना’ है, जो नागरिक अधिकारों और सामाजिक न्याय के सिद्धांतों पर आधारित हैं।
भारतीय न्याय संहिता और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के संपूर्ण स्वरूप का आधार भारतीय संविधान की भावना है। भारतीय संविधान से प्रेरित भारतीय न्याय संहिता का लागू होना गौरवशाली है, क्योंकि राष्ट्र एक महत्वपूर्ण मोड़ पर है, जहाँ वह विकसित भारत के संकल्प की दिशा में आगे बढ़ रहा है।
प्रधानमंत्री ने इस बात पर भी ध्यान दिलाया कि देश की नई न्याय संहिता बनाने की प्रक्रिया उतनी ही व्यापक रही है, जितनी कि स्वयं संहिता। इसमें देश के कई प्रसिद्ध संविधान और कानूनी विशेषज्ञों का परिश्रम शामिल है। सर्वोच्च न्यायालय के कई मुख्य न्यायाधीशों के सुझावों के साथ-साथ देश के अनेक उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों और अन्य सामाजिक-राजनीतिक संगठनों ने भी महत्वपूर्ण सुझाव दिए थे।
भारतीय न्याय संहिता और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता में हर पीड़ित के प्रति संवेदनशीलता है। न्याय संहिता यह सुनिश्चित करती है कि कानून पीड़ित के साथ खड़ा रहे। “नागरिक सर्वोपरि, न्याय संहिता का मूल मंत्र है।” ये कानून नागरिक अधिकारों के रक्षक और न्याय की सुगमता का आधार बन रहे हैं। पहले एफआईआर दर्ज कराना बेहद मुश्किल था। अब जीरो एफआईआर वैध हो गई है और कहीं से भी मामला दर्ज किया जा सकता है।
नई न्याय संहिता के अन्य महत्वपूर्ण पहलुओं के रूप में मानवता और संवेदनशीलता पर प्रकाश डालते हुए श्री मोदी ने कहा कि अब आरोपी को बिना सजा के लंबे समय तक जेल में नहीं रखा जा सकेगा और अब तीन वर्ष से कम सजा वाले अपराधों के मामले में गिरफ्तारी केवल उच्च अधिकारी की सहमति से ही की जा सकती है। छोटे अपराधों के लिए अनिवार्य जमानत का प्रावधान भी किया गया है।
न्याय संहिता में प्रत्येक मामले के प्रत्येक चरण को पूरा करने के लिए समय-सीमा निर्धारित करके आरोपपत्र दाखिल करने और फैसले जल्दी सुनाने को प्राथमिकता दी गई है। इसमें कोई शक नहीं कि प्रत्येक विभाग, प्रत्येक एजेंसी, प्रत्येक अधिकारी और प्रत्येक पुलिसकर्मी को न्याय संहिता के नए प्रावधानों को जानने और उनके सार को समझने की आवश्यकता है। राज्य सरकारों की भी जिम्मेदारी है कि वे न्याय संहिता के प्रभावी कार्यान्वयन को सुनिश्चित करें। न्याय संहिता को जितना अधिक प्रभावी ढंग से लागू किया जाएगा, देश का भविष्य उतना ही बेहतर और उज्ज्वल होगा।
सरकार का विश्वास रहा है कि नए आपराधिक कानून आतंकवाद, संगठित अपराध, साइबर अपराध तथा विदेशी समर्थन प्राप्त अवैध गतिविधियों के विरुद्ध अधिक प्रभावी कार्रवाई का आधार प्रदान करेंगे। वहीं विधि विशेषज्ञ इस बात पर बल देते हैं कि राष्ट्रीय सुरक्षा और नागरिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन बनाए रखना लोकतांत्रिक व्यवस्था की अनिवार्य आवश्यकता है। कुछ कानूनी विशेषज्ञों ने न्याय संहिता पर पुस्तकें लिखीं अथवा सार्वजनिक मंचों पर विचार व्यक्त किए।
सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता और लेखक अश्विनी दुबे ने सबसे पहले इस विषय पर बहुत अच्छी पुस्तक *‘एंड ऑफ कॉलोनियल लॉज़’* लिखी, जिसे सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीशों ने महत्वपूर्ण बताया। यह पुस्तक केवल नए आपराधिक कानूनों की चर्चा नहीं करती, बल्कि उस व्यापक सोच को रेखांकित करती है, जिसके तहत स्वतंत्र भारत की विधिक व्यवस्था को औपनिवेशिक विरासत से मुक्त करने का प्रयास किया जा रहा है। अश्विनी दुबे तर्क देते हैं कि भारत अब केवल कानूनों के नाम बदलने की प्रक्रिया में नहीं है, बल्कि शासन, न्याय और नागरिक अधिकारों के पूरे ढाँचे को भारतीय आवश्यकताओं के अनुरूप पुनर्परिभाषित करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।
इसी तरह सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता और भाजपा नेता अमन सिन्हा ने भारतीय न्याय संहिता (BNS) को भारत की न्याय प्रणाली को औपनिवेशिक काल से मुक्त करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण बदलाव के रूप में विभिन्न मंचों पर प्रस्तुत किया है। उनके प्रमुख कानूनी विश्लेषण और राजनीतिक रुख आपराधिक कानून के आधुनिकीकरण, औपनिवेशिक काल के पूर्वाग्रहों को समाप्त करने और त्वरित, नागरिक-केंद्रित न्याय सुनिश्चित करने पर केंद्रित हैं।
सिन्हा BNS (BNSS और BSA के साथ) को एक परिवर्तनकारी छलांग के रूप में देखते हैं, जो ब्रिटिशों द्वारा उपनिवेशवादियों की रक्षा के लिए बनाए गए कानूनों को भारतीय नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए बनाई गई प्रणाली से बदल देती है। एक वरिष्ठ कानूनी विशेषज्ञ के रूप में, सिन्हा अक्सर इस बात पर जोर देते हैं कि संहिता के अद्यतन संरचनात्मक ढाँचे ने पुरातन जटिलताओं को कम कर दिया है, जिससे समय पर न्याय दिलाने के लिए कानूनी कार्यवाही में काफी तेजी आई है। पुराने औपनिवेशिक कानूनों पर सरकार के रुख का बचाव करते हुए, वे औपनिवेशिक दंडात्मक मानसिकता के बजाय भारतीय सामाजिक-कानूनी वास्तविकताओं पर लक्षित सुधारों की वकालत करते हैं।
सुप्रीम कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश यू.यू. ललित ने इन नए कानूनों के प्रति अधिक सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाया। उन्होंने कहा है कि “यद्यपि औपनिवेशिक विरासत और मानसिकता से पूरी तरह मुक्त होना आसान नहीं है, फिर भी भारतीय न्याय संहिता कानून को आधुनिक समय की आवश्यकताओं के अनुरूप ढालने में सफल रही है।” उन्होंने विशेष रूप से सामुदायिक सेवा को दंड के एक वैकल्पिक स्वरूप के रूप में शामिल किए जाने की सराहना की।
साथ ही उनका मानना है कि देशद्रोह से जुड़े प्रश्न का पुनर्गठन इस प्रकार किया गया है कि वह सर्वोच्च न्यायालय के पहले दिए गए निर्णय द्वारा निर्धारित संवैधानिक सिद्धांतों और कानूनी ढाँचे के अनुरूप हो सके। फिर भी अधिकांश कानूनी विशेषज्ञों और देश के व्यापक हितों तथा सुरक्षा तंत्र से जुड़े पूर्व अधिकारियों का मानना है कि न्याय संहिता के लिए अभी पुलिस व्यवस्था में सुधार, न्यायपालिका के लिए आधुनिक सुविधाएँ, अधिक न्यायाधीशों की नियुक्तियाँ और राष्ट्र-विरोधी आर्थिक अपराधों से निपटने के लिए कानूनी संशोधनों की आवश्यकता है।
( यह लेखक के निजी विचार हैं )
मेरे लिए टाइटन सिर्फ एक सफल ब्रैंड नहीं है। यह मेरे प्रोफेशनल जीवन के सबसे महत्वपूर्ण सीखने वाले अनुभवों में से एक रहा है।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
गणपति विश्ववनाथन, स्वतंत्र कम्युनिकेशन कंसल्टेंट व ‘मास्टरिंग द मैसेज’ के लेखक ।।
हाल ही में मैंने Made in India: The Titan Story के सभी एपिसोड देखे। जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती गई, मैं लगभग चार दशक पीछे उस दौर में लौटता चला गया, जब टाइटन कोई बड़ा और लोकप्रिय ब्रैंड नहीं था, बल्कि एक ऐसा सपना था जिसे साकार किया जाना बाकी था।
मेरे लिए टाइटन सिर्फ एक सफल ब्रैंड नहीं है। यह मेरे प्रोफेशनल जीवन के सबसे महत्वपूर्ण सीखने वाले अनुभवों में से एक रहा है। विज्ञापन और मार्केटिंग की मेरी कई बुनियादी सीखें टाइटन के शुरुआती दौर में उसके साथ काम करते हुए मिलीं। करीब तीन वर्षों तक मुझे टाइटन से जुड़ने का मौका मिला और मैं उसके कम्युनिकेशन से जुड़े कई महत्वपूर्ण कार्यों का हिस्सा रहा। इनमें टाइटन के प्रतिष्ठित "T" सिंबल का निर्माण भी शामिल था, जो आज भी घड़ियों के डायल पर दिखाई देता है, हालांकि अब वह अधिक आधुनिक रूप में मौजूद है।
जब शुरू हुआ एक सपना
आज ज्यादातर लोग टाइटन को उसकी खूबसूरत घड़ियों और यादगार संगीत के लिए जानते हैं। लेकिन इसकी कहानी इससे काफी पहले शुरू हो गई थी।
घड़ियां बाजार में आने से पहले कंपनी को पूंजी जुटानी थी। टाइटन की कहानी का पहला बड़ा अध्याय उसका IPO अभियान था। यह टाटा समूह की शुरुआती कंपनियों में से एक थी, जिसने बिना किसी प्रीमियम के आम जनता को शेयर खरीदने का मौका दिया था।
उस समय जारी किए गए विज्ञापन की हेडलाइन थी: "How to Buy a Share of a Tata Company at Par?"
उस दौर में ही यह महसूस होने लगा था कि कुछ खास बनने जा रहा है।
एक नए दौर की शुरुआत
टाइटन का आधिकारिक लॉन्च 14 अप्रैल 1987 को बैसाखी के दिन मुंबई के ताज प्रेसिडेंट होटल में हुआ था। लॉन्च अभियान की सबसे बड़ी खासियत थी एक साफ और मजबूत संदेश- भारतीय ग्राहकों को अंतरराष्ट्रीय स्तर की गुणवत्ता वाली घड़ियां उपलब्ध कराना, जिनकी डिजाइन और वैरायटी भारत ने पहले कभी नहीं देखी थी।
आज भी मुझे उस लॉन्च को लेकर लोगों के बीच मौजूद उत्साह याद है। कम्युनिकेशन का हर पहलू आत्मविश्वास, महत्वाकांक्षा और विश्वस्तरीय सोच को दर्शाता था। हम सिर्फ एक नई घड़ी लॉन्च नहीं कर रहे थे, बल्कि भारतीय उपभोक्ताओं के लिए एक बिल्कुल नया अनुभव पेश कर रहे थे।
इसके बाद आई वह विज्ञापन श्रृंखला जिसने सब कुछ बदल दिया। टेलीविजन विज्ञापनों में बेहद खूबसूरत घड़ियां दिखाई गईं। कहानी बहुत कम थी, लेकिन उनका प्रभाव बेहद गहरा था। इसकी सबसे बड़ी वजह थी मोजार्ट का वह यादगार संगीत, जिसने भारतीय विज्ञापन जगत में इतिहास रच दिया। आज भी वह धुन सुनते ही लोगों के मन में सबसे पहले टाइटन का नाम आता है।
जब स्क्रीन पर जीवंत हुई पुरानी यादें
जब मैंने Made in India: The Titan Story देखी, तो पुरानी यादें एक बार फिर ताजा हो गईं।
यह सीरीज टाइटन के संस्थापक नेतृत्वकर्ता ज़ेरक्सिस देसाई के विजन और भारत में विश्वस्तरीय घड़ी ब्रैंड बनाने के दौरान आई चुनौतियों को बेहद प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करती है। हालांकि कहानी में कुछ काल्पनिक तत्व भी शामिल हैं, लेकिन इसके मूल भाव और यात्रा की सच्चाई बरकरार रहती है।
सीरीज का एक दृश्य मुझे विशेष रूप से प्रभावित कर गया। इसमें बोर्ड के सामने घड़ी पेश करने से पहले उसकी गुणवत्ता पर विशेष जोर दिया जाता है। यह ज़ेरक्सिस देसाई की उस परफेक्शनिस्ट सोच को दर्शाता है, जिसके लिए वे जाने जाते थे। उनके साथ काम करने वाले लोग जानते थे कि उनके लिए उत्कृष्टता कोई विकल्प नहीं, बल्कि अनिवार्य शर्त थी।
सीरीज का एक और मजबूत पक्ष है लगातार आने वाली चुनौतियों और असफलताओं से संघर्ष को दिखाना। कई ऐसे पल आते हैं जब समय सीमा असंभव लगती है, संसाधन कम पड़ते नजर आते हैं और आत्मविश्वास की परीक्षा होती है। लेकिन टीम हार नहीं मानती और आगे बढ़ती रहती है।
इन दृश्यों को देखकर मुझे टाइटन के शुरुआती वर्षों का वही जुनून और दृढ़ संकल्प याद आ गया।
ब्रैंड के पीछे का नेतृत्व
यह सीरीज एक महत्वपूर्ण सच भी सामने लाती है कि महान ब्रैंड सिर्फ उत्पादों के दम पर नहीं बनते।
ज़ेरक्सिस देसाई का नेतृत्व इस विश्वास पर आधारित था कि भारत दुनिया के सर्वश्रेष्ठ उत्पादों के बराबरी वाले उत्पाद बना सकता है। उन्होंने पारंपरिक सोच को चुनौती दी और लोगों को ऐसे मानक हासिल करने के लिए प्रेरित किया, जो उस समय लगभग असंभव लगते थे।
मुझे सबसे ज्यादा प्रभावित इस बात ने किया कि उन्होंने साधारण लोगों को असाधारण परिणाम हासिल करने के लिए प्रेरित किया।
सीरीज में इंजीनियर, डिजाइनर, मार्केटिंग टीम और फैक्ट्री के कर्मचारी सभी एक साझा लक्ष्य के लिए काम करते दिखाई देते हैं। इसी सामूहिक प्रयास ने एक महत्वाकांक्षी विचार को भारत के सबसे प्रतिष्ठित ब्रैंडों में बदल दिया।
टाइटन ने मुझे क्या सिखाया
पीछे मुड़कर देखने पर महसूस होता है कि टाइटन के साथ काम करने का अनुभव मुझे जीवन भर याद रहने वाली सीख दे गया। मैंने सीखा कि ब्रैंड सिर्फ विज्ञापनों से नहीं बनते। वे स्पष्ट विजन, लगातार बेहतर क्रियान्वयन, बारीकियों पर ध्यान और गुणवत्ता के प्रति अटूट प्रतिबद्धता से बनते हैं।
मैंने यह भी सीखा कि नेतृत्व का असली मतलब तब लोगों में विश्वास जगाना होता है, जब सफलता अभी दूर दिखाई दे रही हो और यह भी सीखा कि हर महान ब्रैंड के पीछे ऐसे लोग होते हैं, जो असफलताओं से घबराते नहीं, गलतियों से सीखते हैं और लगातार आगे बढ़ते रहते हैं।
सिर्फ घड़ी का ब्रैंड नहीं
लॉन्च के लगभग चार दशक बाद भी टाइटन आज भारत के सबसे सम्मानित और भरोसेमंद ब्रैंडों में शामिल है। यह नवाचार, विश्वास, बेहतरीन डिजाइन और भारतीय उद्यमिता का प्रतीक बन चुका है। लाखों लोगों के लिए टाइटन सिर्फ एक घड़ी का ब्रैंड है।
लेकिन मेरे लिए यह एक खूबसूरत याद, सीखने का शानदार मंच और उस सपने की याद है, जिसे मैंने करीब से बनते हुए देखा और जिसे आकार देने में छोटी-सी भूमिका निभाने का अवसर मिला।
इसी वजह से Made in India: The Titan Story देखना सिर्फ पुरानी यादों में खो जाना नहीं था। यह इस बात की याद दिलाने वाला अनुभव भी था कि जब दूरदर्शी नेता और समर्पित टीमें असंभव दिखने वाले लक्ष्य को हासिल करने का साहस करती हैं, तभी महान ब्रैंड जन्म लेते हैं।
टाइटन ने सिर्फ घड़ियां नहीं बनाईं, बल्कि भारतीय ब्रैंडिंग, मार्केटिंग, डिजाइन और नेतृत्व के लिए एक नया मानदंड स्थापित किया और यही वजह है कि उसकी कहानी आज भी लोगों को प्रेरित करती है।
खेल कारोबार को आगे बढ़ाने के लिए कंपनी ने Unite8 Sports पोर्टफोलियो के तहत चार नए स्पोर्ट्स चैनल भी लॉन्च किए हैं, जिनमें दो हिंदी और दो अंग्रेजी चैनल शामिल हैं।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
कंचन श्रीवास्तव, एक्सचेंज4मीडिया।।
फीफा वर्ल्ड कप (FIFA World Cup 2026) के आगाज के साथ ही मीडिया एवं एंटरटेनमेंट कंपनी जी एंटरटेनमेंट एंटरप्राइजेज लिमिटेड (Z) अपने स्पोर्ट्स बिजनेस को नई दिशा देने की कोशिश में जुटी है। कंपनी ने हाल ही में भारत के जिम्बाब्वे दौरे के विशेष प्रसारण अधिकार हासिल किए हैं। इससे पहले FIFA World Cup 2026 के प्रसारण अधिकार हासिल कर चुकी कंपनी अब फुटबॉल और क्रिकेट दोनों के जरिए अपने स्पोर्ट्स पोर्टफोलियो को मजबूत करने की स्ट्रैटेजी पर काम कर रही है।
डॉ. सुभाष चंद्रा और कंपनी के प्रबंध निदेशक एवं चीफ एग्जिक्यूटिव ऑफिसर पुनीत गोयनका के लिए यह केवल एक खेल प्रसारण नहीं, बल्कि कंपनी की नई कारोबारी स्ट्रैटेजी की महत्वपूर्ण परीक्षा भी माना जा रहा है। कंपनी यह देखना चाहती है कि क्या लाइव स्पोर्ट्स के जरिए वह विज्ञापनदाताओं को आकर्षित कर सकती है, बाजार का भरोसा मजबूत कर सकती है और अपने डिजिटल प्लेटफॉर्म की स्थिति को और बेहतर बना सकती है।
कंपनी का FIFA World Cup 2026 का अधिकार समझौता पहले से ही उसके सबसे बड़े कंटेंट निवेशों में गिना जा रहा था। अब भारत के जिम्बाब्वे दौरे के प्रसारण अधिकार हासिल करने के बाद यह संकेत मिल रहा है कि कंपनी केवल एक वैश्विक फुटबॉल इवेंट तक सीमित नहीं रहना चाहती, बल्कि खेल प्रसारण के क्षेत्र में व्यापक उपस्थिति दर्ज कराने की तैयारी कर रही है।
जिम्बाब्वे क्रिकेट के साथ हुई साझेदारी ने कंपनी के खेल पोर्टफोलियो को और मजबूत किया है। इसके साथ FIFA World Cup 2026 और ILT20 जैसी संपत्तियां भी कंपनी के पास हैं। इससे फुटबॉल और क्रिकेट दोनों में उसकी मौजूदगी बढ़ी है, जो भारत के खेल विज्ञापन बाजार के दो महत्वपूर्ण क्षेत्र माने जाते हैं।
फुटबॉल के जरिए कंपनी युवा, शहरी और प्रीमियम दर्शकों तक पहुंच बनाने की कोशिश कर रही है, जबकि क्रिकेट उसे बड़े दर्शक वर्ग और विज्ञापनदाताओं का भरोसा दिलाने में मदद कर सकता है। उद्योग विशेषज्ञों का मानना है कि यह संयोजन कंपनी को टीवी और डिजिटल दोनों प्लेटफॉर्म पर अधिक संतुलित खेल पेशकश तैयार करने में मदद कर सकता है।
FIFA World Cup 2026 के अधिकार कंपनी ने टूर्नामेंट शुरू होने से केवल 10 दिन पहले अंतिम रूप से हासिल किए थे। लागत को लेकर लंबे समय तक चली बातचीत और भारत में देर रात होने वाले मैचों के कारण कई प्रसारक इस सौदे को लेकर सतर्क थे। इसके बावजूद कंपनी एक दर्जन से अधिक ब्रांड्स को अपने साथ जोड़ने में सफल रही है।
महिंद्रा टूर्नामेंट का को-प्रेजेंटिंग स्पॉन्सर बना है, जबकि डियाजियो को- पावर्ड स्पॉन्सर के रूप में जुड़ा है। इसके अलावा एप्पल, पर्नोड रिकार्ड और मोंडेलेज जैसे प्रमुख ब्रांड भी विभिन्न प्लेटफॉर्म पर इस आयोजन से जुड़े हैं।
खेल कारोबार को आगे बढ़ाने के लिए कंपनी ने Unite8 Sports पोर्टफोलियो के तहत चार नए स्पोर्ट्स चैनल भी लॉन्च किए हैं, जिनमें दो हिंदी और दो अंग्रेजी चैनल शामिल हैं। माना जा रहा है कि FIFA World Cup 2026 इन चैनलों के लिए प्रमुख आकर्षण साबित हो सकता है, जबकि भारत-जिम्बाब्वे सीरीज दर्शकों को क्रिकेट से जुड़ी परिचित सामग्री उपलब्ध कराएगी।
जी एंटरटेनमेंट एंटरप्राइजेज लिमिटेड के चीफ ऑपरेटिंग ऑफिसर (विज्ञापन राजस्व) संदीप मेहरोत्रा ने कहा कि कंपनी को विश्वास है कि FIFA World Cup 2026 देश में खेलों के मुद्रीकरण के नए मानक स्थापित करेगा। उन्होंने कहा कि कंपनी ने अपने लीनियर और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स की क्षमताओं का उपयोग करते हुए विज्ञापनदाताओं के लिए व्यापक अवसर तैयार किए हैं।
हालांकि इंडस्ट्री से जुड़े कई विशेषज्ञों का मानना है कि FIFA से कंपनी को ब्रैंड विजिबिलिटी और प्रीमियम विज्ञापनदाताओं की रुचि तो मिलेगी, लेकिन निकट भविष्य में राजस्व वृद्धि सीमित रह सकती है। उनका कहना है कि भारत में फुटबॉल की लोकप्रियता बढ़ रही है, लेकिन यह अभी भी क्रिकेट के स्तर तक नहीं पहुंची है। कुछ विशेषज्ञों का अनुमान है कि टूर्नामेंट से लगभग 30 से 40 करोड़ रुपये का विज्ञापन राजस्व प्राप्त हो सकता है, हालांकि यह आंकड़ा कंपनी की स्पॉन्सरशिप रणनीति और डिजिटल विस्तार पर भी निर्भर करेगा।
विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि FIFA जैसे बड़े टूर्नामेंटों में सेमीफाइनल और फाइनल मुकाबलों के दौरान विज्ञापनदाताओं की रुचि और निवेश बढ़ता है। इसलिए इस प्रॉपर्टी की वास्तविक व्यावसायिक सफलता का आकलन टूर्नामेंट समाप्त होने के बाद ही किया जा सकेगा।
कंपनी के सामने एक चुनौती यह भी है कि उसे केवल लाइव मैचों पर निर्भर नहीं रहना होगा। प्री-मैच कार्यक्रम, हाइलाइट्स, क्षेत्रीय भाषाओं में प्रसारण, कनेक्टेड टीवी पैकेज, सोशल मीडिया विस्तार और ब्रांड इंटीग्रेशन जैसे क्षेत्रों में भी मजबूत उपस्थिति बनानी होगी।
यह पूरा प्रयास ऐसे समय में हो रहा है जब कंपनी हाल ही में एक चुनौतीपूर्ण वित्तीय तिमाही से गुजरी है। वित्त वर्ष 2025-26 की चौथी तिमाही में कंपनी को 102 करोड़ रुपये का समेकित शुद्ध घाटा हुआ, जबकि पिछले वर्ष की समान अवधि में उसे 188 करोड़ रुपये का लाभ हुआ था। संचालन से प्राप्त राजस्व में भी 7.3 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई और यह 2,024 करोड़ रुपये रहा।
वित्तीय परिणामों के बाद कंपनी के शेयरों में भी गिरावट देखने को मिली। कई विश्लेषकों ने विज्ञापन राजस्व में कमजोरी, बढ़ती प्रतिस्पर्धा और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स की ओर विज्ञापन बजट के बढ़ते झुकाव को प्रमुख कारण बताया।
ऐसे में खेल प्रसारण कंपनी के लिए महत्वपूर्ण अवसर के रूप में देखा जा रहा है। FIFA World Cup 2026, ILT20 और भारत के जिम्बाब्वे दौरे जैसे अधिकार कंपनी को एक मजबूत स्पोर्ट्स पोर्टफोलियो बनाने का अवसर प्रदान कर रहे हैं। हालांकि यह रणनीति कंपनी की चुनौतियों का तत्काल समाधान नहीं है, लेकिन इससे उसे नए दर्शकों, विज्ञापनदाताओं और डिजिटल अवसरों तक पहुंच बनाने का मौका जरूर मिल सकता है।
FIFA World Cup 2026 के साथ Z के सामने अब यह अवसर है कि वह प्रसारण अधिकारों को दर्शकों तक पहुंच, दर्शकों को राजस्व और खेलों को अपनी नई विकास रणनीति का महत्वपूर्ण आधार बना सके।
(यह लेखिका के निजी विचार हैं। मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी कॉपी को आप यहां क्लिक कर पढ़ सकते हैं।)
लगातार तीन जनादेश और एक दशक से अधिक समय तक प्रधानमंत्री रहने के साथ मोदी स्वतंत्र भारत के सबसे प्रभावशाली और लंबे समय तक सक्रिय रहने वाले नेताओं में शामिल हो गए हैं।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
राजनीति को अक्सर ऐसे खेल के रूप में देखा जाता है, जहां कुछ खास घटनाएं किसी नेता या सरकार की दिशा तय करती हैं। कभी कोई भाषण लोगों का ध्यान खींच लेता है, कभी कोई चुनाव सरकार बदल देता है, तो कभी कोई बड़ा संकट नेतृत्व की छवि को पूरी तरह बदल देता है। लेकिन कुछ नेता ऐसे भी होते हैं, जिनकी पहचान सिर्फ एक-दो बड़ी घटनाओं से नहीं बल्कि लंबे समय तक लगातार प्रभाव बनाए रखने की क्षमता से बनती है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का राजनीतिक सफर भी ऐसा ही है। लगातार तीन बार जनादेश हासिल करने और दस साल से ज्यादा समय तक प्रधानमंत्री बने रहने के कारण वे स्वतंत्र भारत के उन चुनिंदा नेताओं में शामिल हो गए हैं, जिन्होंने लंबे समय तक राष्ट्रीय राजनीति में अपना प्रभाव बनाए रखा है। ऐसे देश में, जहां जनता की राय और राजनीतिक परिस्थितियां तेजी से बदलती हैं, वहां इतने लंबे समय तक लोकप्रिय और प्रासंगिक बने रहना बड़ी उपलब्धि माना जाता है।
हालांकि यह उपलब्धि केवल आंकड़ों तक सीमित नहीं है। इससे यह सवाल उठता है कि आखिर इतने वर्षों बाद भी मोदी की लोकप्रियता क्यों बनी हुई है? इस सवाल का एक जवाब उस चीज में छिपा है, जिसे आज कई राजनीतिक विश्लेषक "ब्रैंड मोदी" के नाम से पहचानते हैं। यह एक ऐसी राजनीतिक पहचान बन चुकी है, जो चुनावी अभियानों और पार्टी के नारों से कहीं आगे निकल चुकी है।
लोगों से जुड़ी एक कहानी
हर सफल नेता किसी न किसी बड़े विचार या भावना का प्रतिनिधित्व करता है। पंडित जवाहरलाल नेहरू ने नए और स्वतंत्र भारत की उम्मीदों का प्रतिनिधित्व किया। इंदिरा गांधी अनिश्चितता के दौर में मजबूत राजनीतिक नेतृत्व का प्रतीक बनीं। अटल बिहारी वाजपेयी ने राष्ट्रवाद और सहमति आधारित राजनीति का अनोखा मिश्रण पेश किया।
नरेंद्र मोदी की कहानी इन सबसे अलग है। उनके समर्थकों के लिए यह एक ऐसे नेता की कहानी है, जिसने साधारण पृष्ठभूमि से निकलकर अपनी मेहनत, अनुशासन और संगठनात्मक क्षमता के दम पर देश के सर्वोच्च पद तक का सफर तय किया। लोग इस कहानी को प्रशंसा की नजर से देखें या संदेह की नजर से, लेकिन यह उनकी सार्वजनिक छवि का अहम हिस्सा बन चुकी है। हालांकि केवल व्यक्तिगत जीवन की कहानी किसी नेता को लंबे समय तक लोकप्रिय नहीं बनाए रख सकती।
राजनीति में वही नेता टिकता है, जो अपने समय की जनता की भावनाओं और जरूरतों को समझ सके। जब नरेंद्र मोदी ने 2014 में राष्ट्रीय राजनीति में प्रमुख भूमिका निभानी शुरू की, तब देश का एक बड़ा वर्ग ऐसी सरकार चाहता था, जो निर्णायक हो, ऊर्जा से भरपूर हो और काम करने वाली दिखे। मोदी का संदेश उस समय की जनता की अपेक्षाओं से मेल खाता था। सबसे बड़ी बात यह रही कि बदलते भारत के बीच भी वह इस जुड़ाव को बनाए रखने में सफल रहे।
आकांक्षाओं की राजनीति
पिछले एक दशक में भारत में सबसे बड़ा बदलाव आकांक्षाओं की राजनीति का उभरना रहा है। आज के युवा भारतीय पहले की पीढ़ियों से काफी अलग हैं। वे ज्यादा जुड़े हुए हैं, ज्यादा महत्वाकांक्षी हैं और अपने आसपास की दुनिया से कहीं ज्यादा अवसरों को पहचानते हैं। अब वे सिर्फ अपने पड़ोसियों से नहीं, बल्कि पूरी दुनिया से अपनी तुलना करते हैं। नरेंद्र मोदी ने इस बदलाव को बहुत पहले पहचान लिया था।
उनके भाषणों में सीमाओं और कमियों की चर्चा कम और संभावनाओं, महत्वाकांक्षाओं तथा राष्ट्रीय आत्मविश्वास की बात ज्यादा दिखाई देती है। उनका संदेश साफ रहता है कि भारत को बड़ा सोचना चाहिए।
यही वजह है कि यह संदेश खासकर युवाओं के बीच लोकप्रिय हुआ, जो देश के भविष्य को अवसरों के नजरिए से देखते हैं, न कि केवल चुनौतियों के नजरिए से। हालांकि आकांक्षाएं दोधारी तलवार की तरह होती हैं। वे उम्मीदें पैदा करती हैं, लेकिन साथ ही अपेक्षाएं भी बढ़ा देती हैं। जो सरकार बड़े बदलाव का वादा करती है, उसे अंततः परिणाम भी दिखाने पड़ते हैं।
काम और उसके दिखने वाले नतीजे
किसी भी सरकार का मूल्यांकन केवल नीतियों या दस्तावेजों से नहीं होता, बल्कि इस आधार पर होता है कि आम लोगों को जमीन पर क्या दिखाई देता है और वे क्या महसूस करते हैं।
यही वह क्षेत्र है, जहां मोदी सरकार ने अपनी राजनीतिक ताकत का बड़ा आधार तैयार किया है।
सड़कें, एयरपोर्ट, रेलवे स्टेशन, डिजिटल पेमेंट सिस्टम और सरकारी योजनाओं की बेहतर डिलीवरी जैसी चीजें बदलाव के स्पष्ट संकेतों के रूप में सामने आई हैं। समर्थकों के अनुसार ये इस बात का प्रमाण हैं कि सरकार केवल घोषणाएं करने के बजाय उन्हें लागू करने पर भी ध्यान देती है।
हालांकि सभी लोग इस मूल्यांकन से सहमत नहीं हैं। आलोचकों का मानना है कि कई क्षेत्रों में प्रगति असमान रही है। फिर भी राजनीतिक विरोधी भी अक्सर यह स्वीकार करते हैं कि योजनाओं को लागू करना सरकार की कार्यशैली का प्रमुख हिस्सा बन चुका है।
कई मायनों में यही डिलीवरी मॉडल जनता के भरोसे को बनाए रखने में मददगार साबित हुआ है। मतदाता विचारधारा पर अलग-अलग राय रख सकते हैं, लेकिन वे आमतौर पर दिखाई देने वाले नतीजों की सराहना करते हैं।
जब 'ब्रैंड मोदी' और 'ब्रैंड इंडिया' एक-दूसरे से जुड़े
पिछले दस वर्षों का सबसे दिलचस्प पहलू यह रहा है कि देश की छवि और नेता की छवि एक-दूसरे से काफी हद तक जुड़ गई हैं। आज भारत खुद को दस या पंद्रह साल पहले की तुलना में अलग तरीके से प्रस्तुत करता है। तकनीक, मैन्युफैक्चरिंग, डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर और वैश्विक प्रभाव जैसे विषयों पर देश पहले से कहीं अधिक आत्मविश्वास के साथ बात करता है। संभावनाओं की भाषा अब महत्वाकांक्षा की भाषा में बदलती दिखाई देती है।
बेशक, इस बदलाव का श्रेय किसी एक व्यक्ति को नहीं दिया जा सकता। किसी भी देश की प्रगति में संस्थानों, उद्योगों, उद्यमियों, कर्मचारियों और नागरिकों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। लेकिन यह भी सच है कि नेतृत्व राष्ट्रीय आत्मविश्वास को आकार देने में अहम भूमिका निभाता है।
नरेंद्र मोदी ने लगातार भारत की विकास यात्रा को एक बड़े राष्ट्रीय मिशन के रूप में पेश किया है। इसी कारण समय के साथ "ब्रैंड मोदी" और "ब्रैंड इंडिया" की अवधारणाएं काफी हद तक एक-दूसरे से जुड़ती चली गईं।
समर्थकों के लिए तो दोनों लगभग एक-दूसरे के पूरक बन चुके हैं।
ब्रैंड मोदी 3.0 के सामने नई चुनौती
हालांकि तीसरे कार्यकाल की चुनौतियां पहले से अलग हैं। अब केवल बदलाव का उत्साह पर्याप्त नहीं है। जनता की अपेक्षाएं 2014 की तुलना में कहीं ज्यादा बढ़ चुकी हैं। रोजगार की तलाश कर रहा युवा, अपने कारोबार को बढ़ाने की कोशिश कर रहा छोटा उद्यमी, अनिश्चितताओं से जूझ रहा किसान और भारत के भविष्य का आकलन कर रहा निवेशक—सभी की सरकार से अलग-अलग अपेक्षाएं हैं। इन सभी उम्मीदों को एक साथ पूरा करना आसान नहीं है।
यही वजह है कि "ब्रैंड मोदी 3.0" का मूल्यांकन पहले के कार्यकालों से अलग तरीके से किया जाएगा।
अब चुनौती लोगों को यह विश्वास दिलाने की नहीं है कि भारत आगे बढ़ सकता है, क्योंकि अधिकांश भारतीय पहले से ही इस पर भरोसा करते हैं। असली चुनौती यह सुनिश्चित करने की है कि देश की आर्थिक और सामाजिक प्रगति इतनी व्यापक हो कि वह भारत की बढ़ती महत्वाकांक्षाओं के अनुरूप अवसर पैदा कर सके। इतिहास कभी भी तुरंत फैसला नहीं सुनाता। उसके निष्कर्ष समय के साथ सामने आते हैं।
फिलहाल इतना जरूर कहा जा सकता है कि नरेंद्र मोदी आधुनिक भारत के सबसे प्रभावशाली राजनीतिक नेताओं में अपनी जगह बना चुके हैं। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या "ब्रैंड मोदी 3.0" उनकी राजनीतिक विरासत का सबसे महत्वपूर्ण अध्याय साबित होता है या नहीं।
इसका जवाब इस बात पर निर्भर करेगा कि भारत आत्मविश्वास को क्षमता में, महत्वाकांक्षा को उपलब्धि में और वादों को वास्तविक प्रगति में कितनी सफलता से बदल पाता है और शायद, यह कहानी अभी शुरू ही हुई है।
अब सिर्फ पॉइंट्स नहीं, अनुभव और जुड़ाव से बन रही कंज्युमर्स की प्रतिबद्धता, ब्रैंड्स अपना रहे हैं भावनात्मक जुड़ाव की स्ट्रैटेजी
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
गणपति विश्वनाथन, कम्युनिकेशन कंसल्टेंट और लेखक।।
आज से कुछ साल पहले तक लॉयल्टी प्रोग्राम्स का मतलब कंज्युमर्स को रिवॉर्ड पॉइंट्स, डिस्काउंट या विशेष सुविधाएं देना होता था। तमाम एयरलाइंस, होटल और रिटेल कंपनियां कंज्युमर्स को अपने साथ बनाए रखने के लिए इसी मॉडल पर काम करती थीं। लेकिन अब बाजार और कंज्युमर्स की सोच दोनों तेजी से बदल रहे हैं। ऐसे में ब्रैंड्स भी पारंपरिक रिवॉर्ड आधारित लॉयल्टी मॉडल से आगे बढ़कर ग्राहकों के साथ भावनात्मक रिश्ते बनाने पर जोर दे रहे हैं।
मार्केटिंग विशेषज्ञ गणपति विश्वनाथन के अनुसार, आज के कंज्युमर्स के पास पहले की तुलना में कहीं अधिक विकल्प मौजूद हैं। होटल बुकिंग, फ्लाइट टिकट, रेस्टोरेंट या शॉपिंग—लगभग हर सेवा की तुलना कुछ ही मिनटों में ऑनलाइन की जा सकती है। ग्राहक लगातार विभिन्न प्लेटफॉर्म्स के बीच स्विच कर रहे हैं, रिव्यू पढ़ रहे हैं और बेहतर अनुभवों की तलाश में रहते हैं। ऐसे माहौल में केवल रिवॉर्ड पॉइंट्स के जरिए लंबे समय तक ग्राहक की निष्ठा बनाए रखना मुश्किल होता जा रहा है।
लेन-देन से आगे बढ़कर अनुभवों की मांग
ब्रैंड्स यह महसूस कर रहे हैं कि खासतौर पर युवा उपभोक्ता अब केवल डिस्काउंट या कैशबैक से संतुष्ट नहीं हैं। वे बेहतर अनुभव, विशेष पहुंच और ब्रैंड्स के साथ व्यक्तिगत जुड़ाव चाहते हैं। यही कारण है कि कई कंपनियां अब अपने ग्राहकों को केवल उत्पाद या सेवाएं बेचने के बजाय उन्हें यादगार अनुभव देने पर ध्यान केंद्रित कर रही हैं।
हॉस्पिटैलिटी सेक्टर में यह बदलाव सबसे स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है। होटल अब केवल कमरे और लग्जरी सुविधाएं बेचने तक सीमित नहीं हैं। वे म्यूजिक कार्यक्रमों, विशेष डाइनिंग अनुभवों, वेलनेस रिट्रीट्स, खेल आयोजनों और एक्सक्लूसिव इवेंट्स के जरिए ग्राहकों के साथ गहरा संबंध बनाने की कोशिश कर रहे हैं।
वैश्विक ब्रैंड्स ने बदली स्ट्रैटेजी
दुनिया के कई बड़े ब्रैंड्स पहले ही इस बदलाव को अपना चुके हैं। स्टारबक्स ने ऐसा इकोसिस्टम तैयार किया है, जहां लॉयल्टी प्रोग्राम पारंपरिक पॉइंट्स सिस्टम से आगे बढ़कर एक व्यक्तिगत सदस्यता अनुभव जैसा महसूस होता है। वहीं एमेजॉन प्राइम ने शॉपिंग के साथ मनोरंजन, संगीत और स्ट्रीमिंग सेवाओं को जोड़कर ग्राहकों की अपेक्षाओं को नई दिशा दी है।
इसी तरह नाइकी ने केवल उत्पाद बेचने के बजाय फिटनेस और लाइफस्टाइल से जुड़ी कम्युनिटीज बनाने पर जोर दिया है। भारत में भी टाटा न्यू जैसे प्लेटफॉर्म यात्रा, रिटेल, ग्रोसरी, इलेक्ट्रॉनिक्स और हॉस्पिटैलिटी सेवाओं को एक साझा रिवॉर्ड ढांचे के तहत जोड़ने की दिशा में काम कर रहे हैं।
मैरियट का नया दृष्टिकोण
हॉस्पिटैलिटी सेक्टर में मैरियट इंटरनेशनल उन कंपनियों में शामिल है, जो लॉयल्टी की परिभाषा को नए तरीके से गढ़ रही हैं। पारंपरिक रूप से होटल कंपनियां अपनी सेवा, लग्जरी और प्रॉपर्टी की गुणवत्ता के आधार पर खुद को प्रस्तुत करती रही हैं, लेकिन अब मैरियट इससे आगे बढ़कर सांस्कृतिक और भावनात्मक जुड़ाव पर ध्यान दे रही है।
कंपनी अपने लॉयल्टी प्लेटफॉर्म ‘मैरियट बॉनवॉय’ के माध्यम से खेल, संगीत, भोजन और मनोरंजन से जुड़े अनुभवों को ग्राहकों तक पहुंचा रही है। इसका उद्देश्य ब्रैंड को केवल यात्रा के दौरान ही नहीं, बल्कि ग्राहकों की रोजमर्रा की रुचियों और आकांक्षाओं का भी हिस्सा बनाना है।
यह स्ट्रैटेजी खासतौर पर जेनजी (Gen Z) उपभोक्ताओं को ध्यान में रखकर बनाई गई है। यह वर्ग पारंपरिक लग्जरी विज्ञापनों से अधिक प्रामाणिक अनुभवों, संस्कृति और अपनी पहचान से मेल खाने वाले ब्रैंड्स की ओर आकर्षित होता है।
लॉयल्टी प्रोग्राम्स का भविष्य
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में लॉयल्टी प्रोग्राम्स पारंपरिक पॉइंट्स आधारित मॉडल से और दूर जाएंगे। कंपनियां ग्राहकों को व्यक्तिगत अनुभव देने के लिए डेटा और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का अधिक उपयोग करेंगी। भविष्य में रिवॉर्ड्स का केंद्र बिंदु पॉइंट्स नहीं, बल्कि विशेष पहुंच, विशिष्ट अनुभव और निजीकरण हो सकता है। साथ ही ‘इकोसिस्टम लॉयल्टी’ का महत्व भी बढ़ेगा। उपभोक्ता अब अलग-अलग श्रेणियों में बंटे ब्रैंड्स के बजाय ऐसे प्लेटफॉर्म्स को पसंद कर रहे हैं, जहां यात्रा, शॉपिंग, मनोरंजन, भुगतान और अन्य सेवाएं एक साथ उपलब्ध हों।
विशेषज्ञों के अनुसार, लॉयल्टी प्रोग्राम्स अब केवल ग्राहकों को खरीदारी के लिए प्रोत्साहित करने का माध्यम नहीं रह गए हैं। वे धीरे-धीरे ऐसे प्लेटफॉर्म्स में बदल रहे हैं, जिनका उद्देश्य ग्राहकों और ब्रैंड्स के बीच मजबूत और दीर्घकालिक रिश्ते बनाना है। ऐसे दौर में, जब प्रतिस्पर्धा लगातार बढ़ रही है और उपभोक्ताओं का ध्यान आकर्षित करना पहले से अधिक चुनौतीपूर्ण हो गया है, भावनात्मक जुड़ाव ही ब्रैंड्स की सबसे बड़ी ताकत बन सकता है।
(यह लेखक के निजी विचार हैं।)